{"id":"10.13","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 13","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ त्रयोदशोऽध्यायः","topics":["ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[210,220]},"verses":[{"id":"10.13.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/1/","page":210,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम।","यन्‍नूतनयसीशस्य शृण्वन्‍नपि कथां मुहुः॥ १"],"iast":["sādhu pṛṣṭaṃ mahābhāga tvayā bhāgavatottama|","yannūtanayasīśasya śṛṇvannapi kathāṃ muhuḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो। भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्‍न किया है। यों तो तुम्हें बार-बार भगवान्‌की लीला-कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्‍न करके उन्हें और भी सरस—और भी नूतन बना देते हो॥ १॥"},{"id":"10.13.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/2/","page":210,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सतामयं सारभृतां निसर्गो","यदर्थवाणीश्रुतिचेतसामपि ।","प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत्","स्त्रिया विटानामिव साधुवार्ता॥ २"],"iast":["satāmayaṃ sārabhṛtāṃ nisargo","yadarthavāṇīśruticetasāmapi |","pratikṣaṇaṃ navyavadacyutasya yat","striyā viṭānāmiva sādhuvārtā|| 2"],"meaning":"रसिक संतोंकी वाणी, कान और हृदय भगवान्‌की लीलाके गान, श्रवण और चिन्तनके लिये ही होते हैं—उनका यह स्वभाव ही होता है कि वे क्षण-प्रतिक्षण भगवान्‌की लीलाओंको अपूर्व रसमयी और नित्य-नूतन अनुभव करते रहें—ठीक वैसे ही, जैसे लम्पट पुरुषोंको स्त्रियोंकी चर्चामें नया-नया रस जान पड़ता है॥ २॥"},{"id":"10.13.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/3/","page":210,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शृणुष्वावहितो राजन्‍नपि गुह्यं वदामि ते।","ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत॥ ३"],"iast":["śṛṇuṣvāvahito rājannapi guhyaṃ vadāmi te|","brūyuḥ snigdhasya śiṣyasya guravo guhyamapyuta|| 3"],"meaning":"परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो। यद्यपि भगवान्‌की यह लीला अत्यन्त रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं॥ ३॥"},{"id":"10.13.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/4/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथाघवदनान्मृत्यो रक्षित्वा वत्सपालकान्।","सरित्पुलिनमानीय भगवानिदमब्रवीत्॥ ४"],"iast":["tathāghavadanānmṛtyo rakṣitvā vatsapālakān|","saritpulinamānīya bhagavānidamabravīt|| 4"],"meaning":"यह तो मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णने अपने साथी ग्वालबालोंको मृत्युरूप अघासुरके मुँहसे बचा लिया। इसके बाद वे उन्हें यमुनाके पुलिनपर ले आये और उनसे कहने लगे—॥ ४॥"},{"id":"10.13.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/5/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहोऽतिरम्यं पुलिनं वयस्याः","स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छवालुकम्।","स्फुटत्सरोगन्धहृतालिपत्रिक-","ध्वनिप्रतिध्वानलसद‍्द्रुमाकुलम् ॥ ५"],"iast":["aho'tiramyaṃ pulinaṃ vayasyāḥ","svakelisampanmṛdulācchavālukam|","sphuṭatsarogandhahṛtālipatrika-","dhvanipratidhvānalasaddrumākulam || 5"],"meaning":"‘मेरे प्यारे मित्रो! यमुनाजीका यह पुलिन अत्यन्त रमणीय है। देखो तो सही, यहाँकी बालू कितनी कोमल और स्वच्छ है। हमलोगोंके लिये खेलनेकी तो यहाँ सभी सामग्री विद्यमान है। देखो, एक ओर रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं और उनकी सुगन्धसे खिंचकर भौंरे गुंजार कर रहे हैं; तो दूसरी ओर सुन्दर-सुन्दर पक्षी बड़ा ही मधुर कलरव कर रहे हैं, जिसकी प्रतिध्वनिसे सुशोभित वृक्ष इस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ५॥"},{"id":"10.13.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/6/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्र भोक्तव्यमस्माभिर्दिवारूढं क्षुधार्दिताः।","वत्साः समीपेऽपः पीत्वा चरन्तु शनकैस्तृणम्॥ ६"],"iast":["atra bhoktavyamasmābhirdivārūḍhaṃ kṣudhārditāḥ|","vatsāḥ samīpe'paḥ pītvā carantu śanakaistṛṇam|| 6"],"meaning":"अब हमलोगोंको यहाँ भोजन कर लेना चाहिये; क्योंकि दिन बहुत चढ़ आया है और हमलोग भूखसे पीड़ित हो रहे हैं। बछड़े पानी पीकर समीप ही धीरे-धीरे हरी-हरी घास चरते रहें’॥ ६॥"},{"id":"10.13.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/7/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथेति पाययित्वार्भा वत्सानारुध्य शाद्वले।","मुक्त्वा शिक्यानि बुभुजुः समं भगवता मुदा॥ ७"],"iast":["tatheti pāyayitvārbhā vatsānārudhya śādvale|","muktvā śikyāni bubhujuḥ samaṃ bhagavatā mudā|| 7"],"meaning":"ग्वालबालोंने एक स्वरसे कहा—‘ठीक है, ठीक है!’ उन्होंने बछड़ोंको पानी पिलाकर हरी-हरी घासमें छोड़ दिया और अपने-अपने छीके खोल-खोलकर भगवान्‌के साथ बड़े आनन्दसे भोजन करने लगे॥ ७॥"},{"id":"10.13.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/8/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णस्य विष्वक् पुरुराजिमण्डलै-","रभ्याननाः फुल्लदृशो व्रजार्भकाः।","सहोपविष्टा विपिने विरेजु-","श्छदा यथाम्भोरुहकर्णिकायाः॥ ८"],"iast":["kṛṣṇasya viṣvak pururājimaṇḍalai-","rabhyānanāḥ phulladṛśo vrajārbhakāḥ|","sahopaviṣṭā vipine vireju-","śchadā yathāmbhoruhakarṇikāyāḥ|| 8"],"meaning":"सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये। उनके चारों ओर ग्वालबालोंने बहुत-सी मण्डलाकार पंक्तियाँ बना लीं और एक-से-एक सटकर बैठ गये। सबके मुँह श्रीकृष्णकी ओर थे और सबकी आँखें आनन्दसे खिल रही थीं। वन-भोजनके समय श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए ग्वालबाल ऐसे शोभायमान हो रहे थे, मानो कमलकी कर्णिकाके चारों ओर उसकी छोटी-बड़ी पँखुड़ियाँ सुशोभित हो रही हों॥ ८॥"},{"id":"10.13.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/9/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["केचित् पुष्पैर्दलैः केचित् पल्लवैरंकुरैः फलैः।","शिग्भिस्त्वग्भिर्दृषद्भिश्‍च बुभुजुः कृतभाजनाः॥ ९"],"iast":["kecit puṣpairdalaiḥ kecit pallavairaṃkuraiḥ phalaiḥ|","śigbhistvagbhirdṛṣadbhiśca bubhujuḥ kṛtabhājanāḥ|| 9"],"meaning":"कोई पुष्प तो कोई पत्ते और कोई-कोई पल्लव, अंकुर, फल, छीके, छाल एवं पत्थरोंके पात्र बनाकर भोजन करने लगे॥ ९॥"},{"id":"10.13.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/10/","page":211,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वे मिथो दर्शयन्तः स्वस्वभोज्यरुचिं पृथक्।","हसन्तो हासयन्तश्‍चाभ्यवजह्रुः सहेश्‍वराः॥ १०"],"iast":["sarve mitho darśayantaḥ svasvabhojyaruciṃ pṛthak|","hasanto hāsayantaścābhyavajahruḥ saheśvarāḥ|| 10"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और ग्वालबाल सभी परस्पर अपनी-अपनी भिन्‍न-भिन्‍न रुचिका प्रदर्शन करते। कोई किसीको हँसा देता, तो कोई स्वयं ही हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाता। इस प्रकार वे सब भोजन करने लगे॥ १०॥"},{"id":"10.13.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/11/","page":212,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बिभ्रद् वेणुं जठरपटयोः","शृंगवेत्रे च कक्षे","वामे पाणौ मसृणकवलं","तत्फलान्यङ्गुलीषु ।","तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो","हासयन् नर्मभिः स्वैः","स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे","यज्ञभुग् बालकेलिः॥ ११"],"iast":["bibhrad veṇuṃ jaṭharapaṭayoḥ","śṛṃgavetre ca kakṣe","vāme pāṇau masṛṇakavalaṃ","tatphalānyaṅgulīṣu |","tiṣṭhan madhye svaparisuhṛdo","hāsayan narmabhiḥ svaiḥ","svarge loke miṣati bubhuje","yajñabhug bālakeliḥ|| 11"],"meaning":"(उस समय श्रीकृष्णकी छटा सबसे निराली थी।) उन्होंने मुरलीको तो कमरकी फेंटमें आगेकी ओर खोंस लिया था। सींगी और बेंत बगलमें दबा लिये थे। बायें हाथमें बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित दही-भातका ग्रास था और अँगुलियोंमें अदरक, नीबू आदिके अचार-मुरब्बे दबा रखे थे। ग्वालबाल उनको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीचमें बैठकर अपनी विनोदभरी बातोंसे अपने साथी ग्वालबालोंको हँसाते जा रहे थे। जो समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता हैं, वे ही भगवान् ग्वालबालोंके साथ बैठकर इस प्रकार बाल-लीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्गके देवता आश्‍चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे॥ ११॥"},{"id":"10.13.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/12/","page":212,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भारतैवं वत्सपेषु भुंजानेष्वच्युतात्मसु।","वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिताः॥ १२"],"iast":["bhārataivaṃ vatsapeṣu bhuṃjāneṣvacyutātmasu|","vatsāstvantarvane dūraṃ viviśustṛṇalobhitāḥ|| 12"],"meaning":"भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार भोजन करते-करते ग्वालबाल भगवान्‌की इस रसमयी लीलामें तन्मय हो गये। उसी समय उनके बछड़े हरी-हरी घासके लालचसे घोर जंगलमें बड़ी दूर निकल गये॥ १२॥"},{"id":"10.13.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/13/","page":212,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तान् दृष्ट्वा भयसंत्रस्तानूचे कृष्णोऽस्य भीभयम्।","मित्राण्याशान्मा विरमतेहानेष्ये वत्सकानहम्॥ १३"],"iast":["tān dṛṣṭvā bhayasaṃtrastānūce kṛṣṇo'sya bhībhayam|","mitrāṇyāśānmā viramatehāneṣye vatsakānaham|| 13"],"meaning":"जब ग्वालबालोंका ध्यान उस ओर गया, तब तो वे भयभीत हो गये। उस समय अपने भक्तोंके भयको भगा देनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘मेरे प्यारे मित्रो! तुमलोग भोजन करना बंद मत करो। मैं अभी बछड़ोंको लिये आता हूँ’॥ १३॥"},{"id":"10.13.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/14/","page":212,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वाद्रिदरीकुञ्जगह्वरेष्वात्मवत्सकान्।","विचिन्वन् भगवान् कृष्णः सपाणिकवलो ययौ॥ १४"],"iast":["ityuktvādridarīkuñjagahvareṣvātmavatsakān|","vicinvan bhagavān kṛṣṇaḥ sapāṇikavalo yayau|| 14"],"meaning":"ग्वालबालोंसे इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्ण हाथमें दही-भातका कौर लिये ही पहाड़ों, गुफाओं, कुंजों एवं अन्यान्य भयंकर स्थानोंमें अपने तथा साथियोंके बछड़ोंको ढूँढ़ने चल दिये॥ १४॥"},{"id":"10.13.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/15/","page":212,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायार्भकस्येशितु-","र्द्रष्टुं मंजु महित्वमन्यदपि तद्वत्सानितो वत्सपान्।","नीत्वान्यत्र कुरूद्वहान्तरदधात् खेऽवस्थितो यः पुरा","दृष्ट्वाघासुरमोक्षणं प्रभवतः प्राप्तः परं विस्मयम्॥ १५"],"iast":["ambhojanmajanistadantaragato māyārbhakasyeśitu-","rdraṣṭuṃ maṃju mahitvamanyadapi tadvatsānito vatsapān|","nītvānyatra kurūdvahāntaradadhāt khe'vasthito yaḥ purā","dṛṣṭvāghāsuramokṣaṇaṃ prabhavataḥ prāptaḥ paraṃ vismayam|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! ब्रह्माजी पहलेसे ही आकाशमें उपस्थित थे। प्रभुके प्रभावसे अघासुरका मोक्ष देखकर उन्हें बड़ा आश्‍चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि लीलासे मनुष्य-बालक बने हुए भगवान् श्रीकृष्णकी कोई और मनोहर महिमामयी लीला देखनी चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने पहले तो बछड़ोंको और भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर ग्वाल-बालोंको भी, अन्यत्र ले जाकर रख दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। अन्ततः वे जड़ कमलकी ही तो सन्तान हैं॥ १५॥"},{"id":"10.13.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/16/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो वत्सानदृष्ट्वैत्य पुलिनेऽपि च वत्सपान्।","उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्ततः॥ १६"],"iast":["tato vatsānadṛṣṭvaitya puline'pi ca vatsapān|","ubhāvapi vane kṛṣṇo vicikāya samantataḥ|| 16"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण बछड़े न मिलनेपर यमुनाजीके पुलिनपर लौट आये, परन्तु यहाँ क्या देखते हैं कि ग्वालबाल भी नहीं हैं। तब उन्होंने वनमें घूम-घूमकर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ा॥ १६॥"},{"id":"10.13.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/17/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वाप्यदृष्ट्वान्तर्विपिने वत्सान् पालांश्‍च विश्‍ववित्।","सर्वं विधिकृतं कृष्णः सहसावजगाम ह॥ १७"],"iast":["kvāpyadṛṣṭvāntarvipine vatsān pālāṃśca viśvavit|","sarvaṃ vidhikṛtaṃ kṛṣṇaḥ sahasāvajagāma ha|| 17"],"meaning":"परन्तु जब ग्वालबाल और बछड़े उन्हें कहीं न मिले, तब वे तुरंत जान गये कि यह सब ब्रह्माकी करतूत है। वे तो सारे विश्‍वके एकमात्र ज्ञाता हैं॥ १७॥"},{"id":"10.13.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/18/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कृष्णो मुदं कर्तुं तन्मातॄणां च कस्य च।","उभयायितमात्मानं चक्रे विश्‍वकृदीश्‍वरः॥ १८"],"iast":["tataḥ kṛṣṇo mudaṃ kartuṃ tanmātṝṇāṃ ca kasya ca|","ubhayāyitamātmānaṃ cakre viśvakṛdīśvaraḥ|| 18"],"meaning":"अब भगवान् श्रीकृष्णने बछड़ों और ग्वालबालोंकी माताओंको तथा ब्रह्माजीको भी आनन्दित करनेके लिये अपने-आपको ही बछड़ों और ग्वालबालों—दोनोंके रूपमें बना लिया। क्योंकि वे ही तो सम्पूर्ण विश्‍वके कर्ता सर्वशक्तिमान् ईश्‍वर हैं॥ १८॥"},{"id":"10.13.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/19/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत् कराङ्‌घ्र्यादिकं","यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद् विभूषाम्बरम्।","यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं","सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ॥ १९"],"iast":["yāvad vatsapavatsakālpakavapuryāvat karāṅghryādikaṃ","yāvad yaṣṭiviṣāṇaveṇudalaśig yāvad vibhūṣāmbaram|","yāvacchīlaguṇābhidhākṛtivayo yāvad vihārādikaṃ","sarvaṃ viṣṇumayaṃ giro'ṅgavadajaḥ sarvasvarūpo babhau|| 19"],"meaning":"परीक्षित्! वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर जैसे-जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सिंगी, बाँसुरी, पत्ते और छीके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव, गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते और चलते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय ‘यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है’—यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी॥ १९॥"},{"id":"10.13.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/20/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वयमात्माऽऽत्मगोवत्सान् प्रतिवार्यात्मवत्सपैः।","क्रीडन्‍नात्मविहारैश्‍च सर्वात्मा प्राविशद् व्रजम्॥ २०"],"iast":["svayamātmā''tmagovatsān prativāryātmavatsapaiḥ|","krīḍannātmavihāraiśca sarvātmā prāviśad vrajam|| 20"],"meaning":"सर्वात्मा भगवान् स्वयं ही बछड़े बन गये और स्वयं ही ग्वालबाल । अपने आत्मस्वरूप बछड़ोंको अपने आत्मस्वरूप ग्वालबालोंके द्वारा घेरकर अपने ही साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते हुए उन्होंने व्रजमें प्रवेश किया॥ २०॥"},{"id":"10.13.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/21/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्तद्वत्सान् पृथङ्नीत्वा तत्तद्गोष्ठे निवेश्य सः।","तत्तदात्माभवद् राजंस्तत्तत्सद्म प्रविष्टवान्॥ २१"],"iast":["tattadvatsān pṛthaṅnītvā tattadgoṣṭhe niveśya saḥ|","tattadātmābhavad rājaṃstattatsadma praviṣṭavān|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! जिस ग्वालबालके जो बछड़े थे, उन्हें उसी ग्वालबालके रूपसे अलग-अलग ले जाकर उसकी बाखलमें घुसा दिया और विभिन्‍न बालकोंके रूपमें उनके भिन्‍न-भिन्‍न घरोंमें चले गये॥ २१॥"},{"id":"10.13.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/22/","page":213,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिता","उत्थाप्य दोर्भिः परिरभ्य निर्भरम्।","स्नेहस्नुतस्तन्यपयःसुधासवं","मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन्॥ २२"],"iast":["tanmātaro veṇuravatvarotthitā","utthāpya dorbhiḥ parirabhya nirbharam|","snehasnutastanyapayaḥsudhāsavaṃ","matvā paraṃ brahma sutānapāyayan|| 22"],"meaning":"ग्वालबालोंकी माताएँ बाँसुरीकी तान सुनते ही जल्दीसे दौड़ आयीं। ग्वालबाल बने हुए परब्रह्म श्रीकृष्णको अपने बच्चे समझकर हाथोंसे उठाकर उन्होंने जोरसे हृदयसे लगा लिया। वे अपने स्तनोंसे वात्सल्य-स्नेहकी अधिकताके कारण सुधासे भी मधुर और आसवसे भी मादक चुचुआता हुआ दूध उन्हें पिलाने लगीं॥ २२॥"},{"id":"10.13.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/23/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो नृपोन्मर्दनमज्जलेपना-","लंकाररक्षातिलकाशनादिभिः ।","संलालितः स्वाचरितैः प्रहर्षयन्","सायं गतो यामयमेन माधवः॥ २३"],"iast":["tato nṛponmardanamajjalepanā-","laṃkārarakṣātilakāśanādibhiḥ |","saṃlālitaḥ svācaritaiḥ praharṣayan","sāyaṃ gato yāmayamena mādhavaḥ|| 23"],"meaning":"परीक्षित्! इसी प्रकार प्रतिदिन सन्ध्यासमय भगवान् श्रीकृष्ण उन ग्वालबालोंके रूपमें वनसे लौट आते और अपनी बालसुलभ लीलाओंसे माताओंको आनन्दित करते। वे माताएँ उन्हें उबटन लगातीं, नहलातीं, चन्दनका लेप करतीं और अच्छे-अच्छे वस्त्रों तथा गहनोंसे सजातीं। दोनों भौंहोंके बीचमें डीठसे बचानेके लिये काजलका डिठौना लगा देतीं तथा भोजन करातीं और तरह-तरहसे बड़े लाड़-प्यारसे उनका लालन-पालन करतीं॥ २३॥"},{"id":"10.13.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/24/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरं","हुंकारघोषैः परिहूतसंगतान्।","स्वकान् स्वकान् वत्सतरानपाययन्","मुहुर्लिहन्त्यः स्रवदौधसं पयः॥ २४"],"iast":["gāvastato goṣṭhamupetya satvaraṃ","huṃkāraghoṣaiḥ parihūtasaṃgatān|","svakān svakān vatsatarānapāyayan","muhurlihantyaḥ sravadaudhasaṃ payaḥ|| 24"],"meaning":"ग्वालिनोंके समान गौएँ भी जब जंगलोंमेंसे चरकर जल्दी-जल्दी लौटतीं और उनकी हुंकार सुनकर उनके प्यारे बछड़े दौड़कर उनके पास आ जाते, तब वे बार-बार उन्हें अपनी जीभसे चाटतीं और अपना दूध पिलातीं । उस समय स्नेहकी अधिकताके कारण उनके थनोंसे स्वयं ही दूधकी धारा बहने लगती॥ २४॥"},{"id":"10.13.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/25/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोगोपीनां मातृतास्मिन् सर्वा स्नेहर्द्धिकां विना।","पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना॥ २५"],"iast":["gogopīnāṃ mātṛtāsmin sarvā sneharddhikāṃ vinā|","purovadāsvapi harestokatā māyayā vinā|| 25"],"meaning":"इन गायों और ग्वालिनोंका मातृभाव पहले-जैसा ही ऐश्‍वर्यज्ञानरहित और विशुद्ध था। हाँ, अपने असली पुत्रोंकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अवश्य अधिक था। इसी प्रकार भगवान् भी उनके पहले पुत्रोंके समान ही पुत्रभाव दिखला रहे थे, परन्तु भगवान्‌में उन बालकोंके जैसा मोहका भाव नहीं था कि मैं इनका पुत्र हूँ॥ २५॥"},{"id":"10.13.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/26/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्रजौकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्‍ल्याब्दमन्वहम्।","शनैर्निःसीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत्॥ २६"],"iast":["vrajaukasāṃ svatokeṣu snehavallyābdamanvaham|","śanairniḥsīma vavṛdhe yathā kṛṣṇe tvapūrvavat|| 26"],"meaning":"अपने-अपने बालकोंके प्रति व्रजवासियोंकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी। यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया॥ २६॥"},{"id":"10.13.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/27/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थमात्माऽऽत्मनाऽऽत्मानं वत्सपालमिषेण सः।","पालयन् वत्सपो वर्षं चिक्रीडे वनगोष्ठयोः॥ २७"],"iast":["itthamātmā''tmanā''tmānaṃ vatsapālamiṣeṇa saḥ|","pālayan vatsapo varṣaṃ cikrīḍe vanagoṣṭhayoḥ|| 27"],"meaning":"इस प्रकार सर्वात्मा श्रीकृष्ण बछड़े और ग्वालबालोंके बहाने गोपाल बनकर अपने बालकरूपसे वत्सरूपका पालन करते हुए एक वर्षतक वन और गोष्ठमें क्रीडा करते रहे॥ २७॥"},{"id":"10.13.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/28/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकदा चारयन् वत्सान् सरामो वनमाविशत्।","पंचषासु त्रियामासु हायनापूरणीष्वजः॥ २८"],"iast":["ekadā cārayan vatsān sarāmo vanamāviśat|","paṃcaṣāsu triyāmāsu hāyanāpūraṇīṣvajaḥ|| 28"],"meaning":"जब एक वर्ष पूरा होनेमें पाँच-छः रातें शेष थीं, तब एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ बछड़ोंको चराते हुए वनमें गये॥ २८॥"},{"id":"10.13.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/29/","page":214,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो विदूराच्चरतो गावो वत्सानुपव्रजम्।","गोवर्धनाद्रिशिरसि चरन्त्यो ददृशुस्तृणम्॥ २९"],"iast":["tato vidūrāccarato gāvo vatsānupavrajam|","govardhanādriśirasi carantyo dadṛśustṛṇam|| 29"],"meaning":"उस समय गौएँ गोवर्धनकी चोटीपर घास चर रही थीं। वहाँसे उन्होंने व्रजके पास ही घास चरते हुए बहुत दूर अपने बछड़ोंको देखा॥ २९॥"},{"id":"10.13.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/30/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वाथ तत्स्नेहवशोऽस्मृतात्मा","स गोव्रजोऽत्यात्मपदुर्गमार्गः।","द्विपात् ककुद्ग्रीव उदास्यपुच्छो-","ऽगाद्धुंकृतैरास्रुपया जवेन॥ ३०"],"iast":["dṛṣṭvātha tatsnehavaśo'smṛtātmā","sa govrajo'tyātmapadurgamārgaḥ|","dvipāt kakudgrīva udāsyapuccho-","'gāddhuṃkṛtairāsrupayā javena|| 30"],"meaning":"बछड़ोंको देखते ही गौओंका वात्सल्य-स्नेह उमड़ आया। वे अपने-आपकी सुध-बुध खो बैठीं और ग्वालोंके रोकनेकी कुछ भी परवा न कर जिस मार्गसे वे न जा सकते थे, उस मार्गसे हुंकार करती हुई बड़े वेगसे दौड़ पड़ीं। उस समय उनके थनोंसे दूध बहता जाता था और उनकी गरदनें सिकुड़कर डीलसे मिल गयी थीं। वे पूँछ तथा सिर उठाकर इतने वेगसे दौड़ रही थीं कि मालूम होता था मानो उनके दो ही पैर हैं॥ ३०॥"},{"id":"10.13.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/31/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["समेत्य गावोऽधो वत्सान् वत्सवत्योऽप्यपाययन्।","गिलन्त्य इव चांगानि लिहन्त्यः स्वौधसं पयः॥ ३१"],"iast":["sametya gāvo'dho vatsān vatsavatyo'pyapāyayan|","gilantya iva cāṃgāni lihantyaḥ svaudhasaṃ payaḥ|| 31"],"meaning":"जिन गौओंके और भी बछड़े हो चुके थे, वे भी गोवर्धनके नीचे अपने पहले बछड़ोंके पास दौड़ आयीं और उन्हें स्नेहवश अपने-आप बहता हुआ दूध पिलाने लगीं। उस समय वे अपने बच्चोंका एक-एक अंग ऐसे चावसे चाट रही थीं, मानो उन्हें अपने पेटमें रख लेंगी॥ ३१॥"},{"id":"10.13.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/32/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपास्तद्रोधनायासमौघ्यलज्जोरुमन्युना।","दुर्गाध्वकृच्छ्रतोऽभ्येत्य गोवत्सैर्ददृशुः सुतान्॥ ३२"],"iast":["gopāstadrodhanāyāsamaughyalajjorumanyunā|","durgādhvakṛcchrato'bhyetya govatsairdadṛśuḥ sutān|| 32"],"meaning":"गोपोंने उन्हें रोकनेका बहुत कुछ प्रयत्‍न किया, परन्तु उनका सारा प्रयत्‍न व्यर्थ रहा। उन्हें अपनी विफलतापर कुछ लज्जा और गायोंपर बड़ा क्रोध आया। जब वे बहुत कष्ट उठाकर उस कठिन मार्गसे उस स्थानपर पहुँचे, तब उन्होंने बछड़ोंके साथ अपने बालकोंको भी देखा॥ ३२॥"},{"id":"10.13.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/33/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशया","जातानुरागा गतमन्यवोऽर्भकान्।","उदुह्य दोर्भिः परिरभ्य मूर्धनि","घ्राणैरवापुः परमां मुदं ते॥ ३३"],"iast":["tadīkṣaṇotpremarasāplutāśayā","jātānurāgā gatamanyavo'rbhakān|","uduhya dorbhiḥ parirabhya mūrdhani","ghrāṇairavāpuḥ paramāṃ mudaṃ te|| 33"],"meaning":"अपने बच्चोंको देखते ही उनका हृदय प्रेमरससे सराबोर हो गया। बालकोंके प्रति अनुरागकी बाढ़ आ गयी, उनका क्रोध न जाने कहाँ हवा हो गया। उन्होंने अपने-अपने बालकोंको गोदमें उठाकर हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ३३॥"},{"id":"10.13.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/34/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः प्रवयसो गोपास्तोकाश्‍लेषसुनिर्वृताः।","कृच्छ्राच्छनैरपगतास्तदनुस्मृत्युदश्रवः ॥ ३४"],"iast":["tataḥ pravayaso gopāstokāśleṣasunirvṛtāḥ|","kṛcchrācchanairapagatāstadanusmṛtyudaśravaḥ || 34"],"meaning":"बूढ़े गोपोंको अपने बालकोंके आलिंगनसे परम आनन्द प्राप्त हुआ। वे निहाल हो गये। फिर बड़े कष्टसे उन्हें छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे गये। जानेके बाद भी बालकोंके और उनके आलिंगनके स्मरणसे उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहते रहे॥ ३४॥"},{"id":"10.13.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/35/","page":215,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्रजस्य रामः प्रेमर्धेर्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम्।","मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत्॥ ३५"],"iast":["vrajasya rāmaḥ premardhervīkṣyautkaṇṭhyamanukṣaṇam|","muktastaneṣvapatyeṣvapyahetuvidacintayat|| 35"],"meaning":"बलरामजीने देखा कि व्रजवासी गोप, गौएँ और ग्वालिनोंकी उन सन्तानोंपर भी, जिन्होंने अपनी माका दूध पीना छोड़ दिया है, क्षण-प्रतिक्षण प्रेम-सम्पत्ति और उसके अनुरूप उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही है, तब वे विचारमें पड़ गये, क्योंकि उन्हें इसका कारण मालूम न था॥ ३५॥"},{"id":"10.13.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/36/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि।","व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते॥ ३६"],"iast":["kimetadadbhutamiva vāsudeve'khilātmani|","vrajasya sātmanastokeṣvapūrvaṃ prema vardhate|| 36"],"meaning":"‘यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है॥ ३६॥"},{"id":"10.13.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/37/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी।","प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी॥ ३७"],"iast":["keyaṃ vā kuta āyātā daivī vā nāryutāsurī|","prāyo māyāstu me bharturnānyā me'pi vimohinī|| 37"],"meaning":"यह कौन-सी माया है? कहाँसे आयी है? यह किसी देवताकी है, मनुष्यकी है अथवा असुरोंकी? परन्तु क्या ऐसा भी सम्भव है? नहीं-नहीं, यह तो मेरे प्रभुकी ही माया है। और किसीकी मायामें ऐसी सामर्थ्य नहीं, जो मुझे भी मोहित कर ले’॥ ३७॥"},{"id":"10.13.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/38/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति संचिन्त्य दाशार्हो वत्सान् सवयसानपि।","सर्वानाचष्ट वैकुण्ठं चक्षुषा वयुनेन सः॥ ३८"],"iast":["iti saṃcintya dāśārho vatsān savayasānapi|","sarvānācaṣṭa vaikuṇṭhaṃ cakṣuṣā vayunena saḥ|| 38"],"meaning":"बलरामजीने ऐसा विचार करके ज्ञानदृष्टिसे देखा, तो उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि इन सब बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें केवल श्रीकृष्ण-ही-श्रीकृष्ण हैं॥ ३८॥"},{"id":"10.13.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/39/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नैते सुरेशा ऋषयो न चैते","त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि।","सर्वं पृथक्त्वं निगमात् कथं वदे-","त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत्॥ ३९"],"iast":["naite sureśā ṛṣayo na caite","tvameva bhāsīśa bhidāśraye'pi|","sarvaṃ pṛthaktvaṃ nigamāt kathaṃ vade-","tyuktena vṛttaṃ prabhuṇā balo'vait|| 39"],"meaning":"तब उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—‘भगवन्! ये ग्वालबाल और बछड़े न देवता हैं और न तो कोई ऋषि ही। इन भिन्‍न-भिन्‍न रूपोंका आश्रय लेनेपर भी आप अकेले ही इन रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं। कृपया स्पष्ट करके थोड़ेमें ही यह बतला दीजिये कि आप इस प्रकार बछड़े, बालक, सिंगी, रस्सी आदिके रूपमें अलग-अलग क्यों प्रकाशित हो रहे हैं?’ तब भगवान्‌ने ब्रह्माकी सारी करतूत सुनायी और बलरामजीने सब बातें जान लीं॥ ३९॥"},{"id":"10.13.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/40/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तावदेत्यात्मभूरात्ममानेन त्रुट्यनेहसा।","पुरोवदब्दं क्रीडन्तं ददृशे सकलं हरिम्॥ ४०"],"iast":["tāvadetyātmabhūrātmamānena truṭyanehasā|","purovadabdaṃ krīḍantaṃ dadṛśe sakalaṃ harim|| 40"],"meaning":"परीक्षित्! तबतक ब्रह्माजी ब्रह्मलोकसे व्रजमें लौट आये। उनके कालमानसे अबतक केवल एक त्रुटि (जितनी देरमें तीखी सूईसे कमलकी पँखुड़ी छिदे) समय व्यतीत हुआ था। उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबाल और बछड़ोंके साथ एक सालसे पहलेकी भाँति ही क्रीडा कर रहे हैं॥ ४०॥"},{"id":"10.13.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/41/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावन्तो गोकुले बालाः सवत्साः सर्व एव हि।","मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिताः॥ ४१"],"iast":["yāvanto gokule bālāḥ savatsāḥ sarva eva hi|","māyāśaye śayānā me nādyāpi punarutthitāḥ|| 41"],"meaning":"वे सोचने लगे—‘गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं—उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए॥ ४१॥"},{"id":"10.13.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/42/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत एतेऽत्र कुत्रत्या मन्मायामोहितेतरे।","तावन्त एव तत्राब्दं क्रीडन्तो विष्णुना समम्॥ ४२"],"iast":["ita ete'tra kutratyā manmāyāmohitetare|","tāvanta eva tatrābdaṃ krīḍanto viṣṇunā samam|| 42"],"meaning":"तब मेरी मायासे मोहित ग्वालबाल और बछड़ोंके अतिरिक्त ये उतने ही दूसरे बालक तथा बछड़े कहाँसे आ गये, जो एक सालसे भगवान्‌के साथ खेल रहे हैं?॥ ४२॥"},{"id":"10.13.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/43/","page":216,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभूः।","सत्याः के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्टे कथंचन॥ ४३"],"iast":["evameteṣu bhedeṣu ciraṃ dhyātvā sa ātmabhūḥ|","satyāḥ ke katare neti jñātuṃ neṣṭe kathaṃcana|| 43"],"meaning":"ब्रह्माजीने दोनों स्थानोंपर दोनोंको देखा और बहुत देरतक ध्यान करके अपनी ज्ञानदृष्टिसे उनका रहस्य खोलना चाहा; परन्तु इन दोनोंमें कौन-से पहलेके ग्वालबाल हैं और कौन-से पीछे बना लिये गये हैं, इनमेंसे कौन सच्चे हैं और कौन बनावटी—यह बात वे किसी प्रकार न समझ सके॥ ४३॥"},{"id":"10.13.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/44/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सम्मोहयन् विष्णुं विमोहं विश्‍वमोहनम्।","स्वयैव माययाजोऽपि स्वयमेव विमोहितः॥ ४४"],"iast":["evaṃ sammohayan viṣṇuṃ vimohaṃ viśvamohanam|","svayaiva māyayājo'pi svayameva vimohitaḥ|| 44"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी मायामें तो सभी मुग्ध हो रहे हैं, परन्तु कोई भी माया-मोह भगवान्‌का स्पर्श नहीं कर सकता। ब्रह्माजी उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको अपनी मायासे मोहित करने चले थे। किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, वे अजन्मा होनेपर भी अपनी ही मायासे अपने-आप मोहित हो गये॥ ४४॥"},{"id":"10.13.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/45/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तम्यां तमोवन्‍नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि।","महतीतरमायैश्यं निहन्त्यात्मनि युंजतः॥ ४५"],"iast":["tamyāṃ tamovannaihāraṃ khadyotārcirivāhani|","mahatītaramāyaiśyaṃ nihantyātmani yuṃjataḥ|| 45"],"meaning":"जिस प्रकार रातके घोर अन्धकारमें कुहरेके अन्धकारका और दिनके प्रकाशमें जुगनूके प्रकाशका पता नहीं चलता, वैसे ही जब क्षुद्र पुरुष महापुरुषोंपर अपनी मायाका प्रयोग करते हैं, तब वह उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकती, अपना ही प्रभाव खो बैठती है॥ ४५॥"},{"id":"10.13.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/46/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तावत् सर्वे वत्सपालाः पश्यतोऽजस्य तत्क्षणात्।","व्यदृश्यन्त घनश्यामाः पीतकौशेयवाससः॥ ४६"],"iast":["tāvat sarve vatsapālāḥ paśyato'jasya tatkṣaṇāt|","vyadṛśyanta ghanaśyāmāḥ pītakauśeyavāsasaḥ|| 46"],"meaning":"ब्रह्माजी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्णके रूपमें दिखायी पड़ने लगे। सब-के-सब सजल जलधरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्मसे युक्त—चतुर्भुज। सबके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कण्ठोंमें मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रही थीं॥ ४६-४७॥","meaning_covers":[46,47]},{"id":"10.13.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/47/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चतुर्भुजाः शंखचक्रगदाराजीवपाणयः।","किरीटिनः कुण्डलिनो हारिणो वनमालिनः॥ ४७"],"iast":["caturbhujāḥ śaṃkhacakragadārājīvapāṇayaḥ|","kirīṭinaḥ kuṇḍalino hāriṇo vanamālinaḥ|| 47"],"meaning":"ब्रह्माजी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्णके रूपमें दिखायी पड़ने लगे। सब-के-सब सजल जलधरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्मसे युक्त—चतुर्भुज। सबके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कण्ठोंमें मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रही थीं॥ ४६-४७॥","meaning_covers":[46,47]},{"id":"10.13.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/48/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रीवत्सांगददोरत्‍नकम्बुकंकणपाणयः ।","नूपुरैः कटकैर्भाताः कटिसूत्रांगुलीयकैः॥ ४८"],"iast":["śrīvatsāṃgadadoratnakambukaṃkaṇapāṇayaḥ |","nūpuraiḥ kaṭakairbhātāḥ kaṭisūtrāṃgulīyakaiḥ|| 48"],"meaning":"उनके वक्षःस्थलपर सुवर्णकी सुनहली रेखा—श्रीवत्स, बाहुओंमें बाजूबंद, कलाइयोंमें शंखाकार रत्‍नोंसे जड़े कंगन, चरणोंमें नूपुर और कड़े, कमरमें करधनी तथा अँगुलियोंमें अँगूठियाँ जगमगा रही थीं॥ ४८॥"},{"id":"10.13.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/49/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आङ्‌घ्रिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभिः।","कोमलैः सर्वगात्रेषु भूरिपुण्यवदर्पितैः॥ ४९"],"iast":["āṅghrimastakamāpūrṇāstulasīnavadāmabhiḥ|","komalaiḥ sarvagātreṣu bhūripuṇyavadarpitaiḥ|| 49"],"meaning":"वे नखसे शिखतक समस्त अंगोंमें कोमल और नूतन तुलसीकी मालाएँ, जो उन्हें बड़े भाग्यशाली भक्तोंने पहनायी थीं, धारण किये हुए थे॥ ४९॥"},{"id":"10.13.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/50/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चन्द्रिकाविशदस्मेरैः सारुणापांगवीक्षितैः।","स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालकाः॥ ५०"],"iast":["candrikāviśadasmeraiḥ sāruṇāpāṃgavīkṣitaiḥ|","svakārthānāmiva rajaḥsattvābhyāṃ sraṣṭṛpālakāḥ|| 50"],"meaning":"उनकी मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी। ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्तजनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं॥ ५०॥"},{"id":"10.13.51","number":51,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/51/","page":217,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैर्मूर्तिमद्भिश्‍चराचरैः ।","नृत्यगीताद्यनेकार्हैः पृथक् पृथगुपासिताः॥ ५१"],"iast":["ātmādistambaparyantairmūrtimadbhiścarācaraiḥ |","nṛtyagītādyanekārhaiḥ pṛthak pṛthagupāsitāḥ|| 51"],"meaning":"ब्रह्माजीने यह भी देखा कि उन्हींके-जैसे दूसरे ब्रह्मासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे अलग-अलग भगवान्‌के उन सब रूपोंकी उपासना कर रहे हैं॥ ५१॥"},{"id":"10.13.52","number":52,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/52/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभिः ।","चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः परीता महदादिभिः॥ ५२"],"iast":["aṇimādyairmahimabhirajādyābhirvibhūtibhiḥ |","caturviṃśatibhistattvaiḥ parītā mahadādibhiḥ|| 52"],"meaning":"उन्हें अलग-अलग अणिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ, माया-विद्या आदि विभूतियाँ और महत्तत्त्व आदि चौबीसों तत्त्व चारों ओरसे घेरे हुए हैं॥ ५२॥"},{"id":"10.13.53","number":53,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/53/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभिः।","स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भिरुपासिताः॥ ५३"],"iast":["kālasvabhāvasaṃskārakāmakarmaguṇādibhiḥ|","svamahidhvastamahibhirmūrtimadbhirupāsitāḥ|| 53"],"meaning":"प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला काल, उसके परिणामका कारण स्वभाव, वासनाओंको जगानेवाला संस्कार, कामनाएँ, कर्म, विषय और फल—सभी मूर्तिमान् होकर भगवान्‌के प्रत्येक रूपकी उपासना कर रहे हैं। भगवान्‌की सत्ता और महत्ताके सामने उन सभीकी सत्ता और महत्ता अपना अस्तित्व खो बैठी थी॥ ५३॥"},{"id":"10.13.54","number":54,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/54/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः ।","अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषद‍्दृशाम्॥ ५४"],"iast":["satyajñānānantānandamātraikarasamūrtayaḥ |","aspṛṣṭabhūrimāhātmyā api hyupaniṣaddṛśām|| 54"],"meaning":"ब्रह्माजीने यह भी देखा कि वे सभी भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालके द्वारा सीमित नहीं हैं, त्रिकालाबाधित सत्य हैं। वे सब-के-सब स्वयंप्रकाश और केवल अनन्त आनन्दस्वरूप हैं। उनमें जड़ता अथवा चेतनताका भेदभाव नहीं है। वे सब-के-सब एकरस हैं। यहाँतक कि उपनिषद्दर्शी तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टि भी उनकी अनन्त महिमाका स्पर्श नहीं कर सकती॥ ५४॥"},{"id":"10.13.55","number":55,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/55/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सकृद् ददर्शाजः परब्रह्मात्मनोऽखिलान्।","यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम्॥ ५५"],"iast":["evaṃ sakṛd dadarśājaḥ parabrahmātmano'khilān|","yasya bhāsā sarvamidaṃ vibhāti sacarācaram|| 55"],"meaning":"इस प्रकार ब्रह्माजीने एक साथ ही देखा कि वे सब-के-सब उन परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके ही स्वरूप हैं, जिनके प्रकाशसे यह सारा चराचर जगत् प्रकाशित हो रहा है॥ ५५॥"},{"id":"10.13.56","number":56,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/56/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽतिकुतुकोद‍्वृत्तस्तिमितैकादशेन्द्रियः।","तद्धाम्‍नाभूदजस्तूष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका॥ ५६"],"iast":["tato'tikutukodvṛttastimitaikādaśendriyaḥ|","taddhāmnābhūdajastūṣṇīṃ pūrdevyantīva putrikā|| 56"],"meaning":"यह अत्यन्त आश्‍चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्माजी तो चकित रह गये। उनकी ग्यारहों इन्द्रियाँ (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन) क्षुब्ध एवं स्तब्ध रह गयीं। वे भगवान्‌के तेजसे निस्तेज होकर मौन हो गये। उस समय वे ऐसे स्तब्ध होकर खड़े रह गये, मानो व्रजके अधिष्ठातृ-देवताके पास एक पुतली खड़ी हो॥ ५६॥"},{"id":"10.13.57","number":57,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/57/","page":218,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इतीरेशेऽतर्क्ये निजमहिमनि स्वप्रमितिके","परत्राजातोऽतन्‍निरसनमुखब्रह्मकमितौ ।","अनीशेऽपि द्रष्टुं किमिदमिति वा मुह्यति सति","चछादाजो ज्ञात्वा सपदि परमोऽजाजवनिकाम्॥ ५७"],"iast":["itīreśe'tarkye nijamahimani svapramitike","paratrājāto'tannirasanamukhabrahmakamitau |","anīśe'pi draṣṭuṃ kimidamiti vā muhyati sati","cachādājo jñātvā sapadi paramo'jājavanikām|| 57"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌का स्वरूप तर्कसे परे है। उसकी महिमा असाधारण है। वह स्वयंप्रकाश, आनन्दस्वरूप और मायासे अतीत है। वेदान्त भी साक्षात्रूपसे उसका वर्णन करनेमें असमर्थ है, इसलिये उससे भिन्‍नका निषेध करके आनन्दस्वरूप ब्रह्मका किसी प्रकार कुछ संकेत करता है। यद्यपि ब्रह्माजी समस्त विद्याओंके अधिपति हैं, तथापि भगवान्‌के दिव्यस्वरूपको वे तनिक भी न समझ सके कि यह क्या है। यहाँतक कि वे भगवान्‌के उन महिमामय रूपोंको देखनेमें भी असमर्थ हो गये। उनकी आँखें मुँद गयीं। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माके इस मोह और असमर्थताको जानकर बिना किसी प्रयासके तुरंत अपनी मायाका परदा हटा दिया॥ ५७॥"},{"id":"10.13.58","number":58,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/58/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽर्वाक् प्रतिलब्धाक्षः कः परेतवदुत्थितः।","कृच्छ्रादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना॥ ५८"],"iast":["tato'rvāk pratilabdhākṣaḥ kaḥ paretavadutthitaḥ|","kṛcchrādunmīlya vai dṛṣṭīrācaṣṭedaṃ sahātmanā|| 58"],"meaning":"इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ। वे मानो मरकर फिर जी उठे। सचेत होकर उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले। तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा॥ ५८॥"},{"id":"10.13.59","number":59,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/59/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सपद्येवाभितः पश्यन् दिशोऽपश्यत् पुरः स्थितम्।","वृन्दावनं जनाजीव्यद्रुमाकीर्णं समाप्रियम्॥ ५९"],"iast":["sapadyevābhitaḥ paśyan diśo'paśyat puraḥ sthitam|","vṛndāvanaṃ janājīvyadrumākīrṇaṃ samāpriyam|| 59"],"meaning":"फिर ब्रह्माजी जब चारों ओर देखने लगे, तब पहले दिशाएँ और उसके बाद तुरंत ही उनके सामने वृन्दावन दिखायी पड़ा। वृन्दावन सबके लिये एक-सा प्यारा है। जिधर देखिये, उधर ही जीवोंको जीवन देनेवाले फल और फूलोंसे लदे हुए, हरे-हरे पत्तोंसे लहलहाते हुए वृक्षोंकी पाँतें शोभा पा रही हैं॥ ५९॥"},{"id":"10.13.60","number":60,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/60/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृमृगादयः।","मित्राणीवाजितावासद्रुतरुट्तर्षकादिकम् ॥ ६०"],"iast":["yatra naisargadurvairāḥ sahāsan nṛmṛgādayaḥ|","mitrāṇīvājitāvāsadrutaruṭtarṣakādikam || 60"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि होनेके कारण वृन्दावनधाममें क्रोध, तृष्णा आदि दोष प्रवेश नहीं कर सकते और वहाँ स्वभावसे ही परस्पर दुस्त्यज वैर रखनेवाले मनुष्य और पशु-पक्षी भी प्रेमी मित्रोंके समान हिल-मिलकर एक साथ रहते हैं॥ ६०॥"},{"id":"10.13.61","number":61,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/61/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रोद्वहत् पशुपवंशशिशुत्वनाट्यं","ब्रह्माद्वयं परमनन्तमगाधबोधम्।","वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व-","देकं सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट॥ ६१"],"iast":["tatrodvahat paśupavaṃśaśiśutvanāṭyaṃ","brahmādvayaṃ paramanantamagādhabodham|","vatsān sakhīniva purā parito vicinva-","dekaṃ sapāṇikavalaṃ parameṣṭhyacaṣṭa|| 61"],"meaning":"ब्रह्माजीने वृन्दावनका दर्शन करनेके बाद देखा कि अद्वितीय परब्रह्म गोपवंशके बालकका-सा नाट्य कर रहा है। एक होनेपर भी उसके सखा हैं, अनन्त होनेपर भी वह इधर-उधर घूम रहा है और उसका ज्ञान अगाध होनेपर भी वह अपने ग्वालबाल और बछड़ोंको ढूँढ़ रहा है। ब्रह्माजीने देखा कि जैसे भगवान् श्रीकृष्ण पहले अपने हाथमें दही-भातका कौर लिये उन्हें ढूँढ़ रहे थे, वैसे ही अब भी अकेले ही उनकी खोजमें लगे हैं॥ ६१॥"},{"id":"10.13.62","number":62,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/62/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा त्वरेण निजधोरणतोऽवतीर्य","पृथ्व्यां वपुः कनकदण्डमिवाभिपात्य।","स्पृष्ट्वा चतुर्मुकुटकोटिभिरङ्‌घ्रियुग्मं","नत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम्॥ ६२"],"iast":["dṛṣṭvā tvareṇa nijadhoraṇato'vatīrya","pṛthvyāṃ vapuḥ kanakadaṇḍamivābhipātya|","spṛṣṭvā caturmukuṭakoṭibhiraṅghriyugmaṃ","natvā mudaśrusujalairakṛtābhiṣekam|| 62"],"meaning":"भगवान्‌को देखते ही ब्रह्माजी अपने वाहन हंसपरसे कूद पड़े और सोनेके समान चमकते हुए अपने शरीरसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिर पड़े। उन्होंने अपने चारों मुकुटोंके अग्रभागसे भगवान्‌के चरण-कमलोंका स्पर्श करके नमस्कार किया और आनन्दके आँसुओंकी धारासे उन्हें नहला दिया॥ ६२॥"},{"id":"10.13.63","number":63,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/63/","page":219,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्थायोत्थाय कृष्णस्य चिरस्य पादयोः पतन्।","आस्ते महित्वं प्राग्दृष्टं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः॥ ६३"],"iast":["utthāyotthāya kṛṣṇasya cirasya pādayoḥ patan|","āste mahitvaṃ prāgdṛṣṭaṃ smṛtvā smṛtvā punaḥ punaḥ|| 63"],"meaning":"वे भगवान् श्रीकृष्णकी पहले देखी हुई महिमाका बार-बार स्मरण करते, उनके चरणोंपर गिरते और उठ-उठकर फिर-फिर गिर पड़ते। इसी प्रकार बहुत देरतक वे भगवान्‌के चरणोंमें ही पड़े रहे॥ ६३॥"},{"id":"10.13.64","number":64,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/64/","page":220,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने","मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धरः।","कृतांजलिः प्रश्रयवान् समाहितः","सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥ ६४"],"iast":["śanairathotthāya vimṛjya locane","mukundamudvīkṣya vinamrakandharaḥ|","kṛtāṃjaliḥ praśrayavān samāhitaḥ","savepathurgadgadayailatelayā || 64"],"meaning":"फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्‌को देखकर उनका सिर झुक गया। वे काँपने लगे। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ६४॥"}],"text":[{"b":28568,"kind":"adhyaya_heading","page":210,"text":"अथ त्रयोदशोऽध्यायः"},{"b":28569,"kind":"topic_heading","page":210,"text":"ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश"},{"b":28570,"kind":"topic_heading","page":210,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":28571,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.1"],"text":"साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम।"},{"b":28572,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.1"],"text":"यन्‍नूतनयसीशस्य शृण्वन्‍नपि कथां मुहुः॥ १"},{"b":28573,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.2"],"text":"सतामयं सारभृतां निसर्गो"},{"b":28574,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.2"],"text":"यदर्थवाणीश्रुतिचेतसामपि ।"},{"b":28575,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.2"],"text":"प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत्"},{"b":28576,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.2"],"text":"स्त्रिया विटानामिव साधुवार्ता॥ २"},{"b":28577,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.3"],"text":"शृणुष्वावहितो राजन्‍नपि गुह्यं वदामि ते।"},{"b":28578,"kind":"sanskrit_shloka","page":210,"verses":["10.13.3"],"text":"ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत॥ ३"},{"b":28579,"kind":"hindi_commentary","page":210,"explains":["10.13.1","10.13.2","10.13.3"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो। भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्‍न किया है। यों तो तुम्हें बार-बार भगवान्‌की लीला-कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्‍न करके उन्हें और भी सरस—और भी नूतन बना देते हो॥ १॥ रसिक संतोंकी वाणी, कान और हृदय भगवान्‌की लीलाके गान, श्रवण और चिन्तनके लिये ही होते हैं—उनका यह स्वभाव ही होता है कि वे क्षण-प्रतिक्षण भगवान्‌की लीलाओंको अपूर्व रसमयी और नित्य-नूतन अनुभव करते रहें—ठीक वैसे ही, जैसे लम्पट पुरुषोंको स्त्रियोंकी चर्चामें नया-नया रस जान पड़ता है॥ २॥ परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो। यद्यपि भगवान्‌की यह लीला अत्यन्त रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं॥ ३॥"},{"b":28580,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.4"],"text":"तथाघवदनान्मृत्यो रक्षित्वा वत्सपालकान्।"},{"b":28581,"kind":"topic_heading","page":211,"verses":["10.13.4"],"text":"सरित्पुलिनमानीय भगवानिदमब्रवीत्॥ ४"},{"b":28582,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.5"],"text":"अहोऽतिरम्यं पुलिनं वयस्याः"},{"b":28583,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.5"],"text":"स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छवालुकम्।"},{"b":28584,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.5"],"text":"स्फुटत्सरोगन्धहृतालिपत्रिक-"},{"b":28585,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.5"],"text":"ध्वनिप्रतिध्वानलसद‍्द्रुमाकुलम् ॥ ५"},{"b":28586,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.6"],"text":"अत्र भोक्तव्यमस्माभिर्दिवारूढं क्षुधार्दिताः।"},{"b":28587,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.6"],"text":"वत्साः समीपेऽपः पीत्वा चरन्तु शनकैस्तृणम्॥ ६"},{"b":28588,"kind":"hindi_commentary","page":211,"explains":["10.13.4","10.13.5","10.13.6"],"text":"यह तो मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णने अपने साथी ग्वालबालोंको मृत्युरूप अघासुरके मुँहसे बचा लिया। इसके बाद वे उन्हें यमुनाके पुलिनपर ले आये और उनसे कहने लगे—॥ ४॥ ‘मेरे प्यारे मित्रो! यमुनाजीका यह पुलिन अत्यन्त रमणीय है। देखो तो सही, यहाँकी बालू कितनी कोमल और स्वच्छ है। हमलोगोंके लिये खेलनेकी तो यहाँ सभी सामग्री विद्यमान है। देखो, एक ओर रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं और उनकी सुगन्धसे खिंचकर भौंरे गुंजार कर रहे हैं; तो दूसरी ओर सुन्दर-सुन्दर पक्षी बड़ा ही मधुर कलरव कर रहे हैं, जिसकी प्रतिध्वनिसे सुशोभित वृक्ष इस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ५॥ अब हमलोगोंको यहाँ भोजन कर लेना चाहिये; क्योंकि दिन बहुत चढ़ आया है और हमलोग भूखसे पीड़ित हो रहे हैं। बछड़े पानी पीकर समीप ही धीरे-धीरे हरी-हरी घास चरते रहें’॥ ६॥"},{"b":28589,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.7"],"text":"तथेति पाययित्वार्भा वत्सानारुध्य शाद्वले।"},{"b":28590,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.7"],"text":"मुक्त्वा शिक्यानि बुभुजुः समं भगवता मुदा॥ ७"},{"b":28591,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.8"],"text":"कृष्णस्य विष्वक् पुरुराजिमण्डलै-"},{"b":28592,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.8"],"text":"रभ्याननाः फुल्लदृशो व्रजार्भकाः।"},{"b":28593,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.8"],"text":"सहोपविष्टा विपिने विरेजु-"},{"b":28594,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.8"],"text":"श्छदा यथाम्भोरुहकर्णिकायाः॥ ८"},{"b":28595,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.9"],"text":"केचित् पुष्पैर्दलैः केचित् पल्लवैरंकुरैः फलैः।"},{"b":28596,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.9"],"text":"शिग्भिस्त्वग्भिर्दृषद्भिश्‍च बुभुजुः कृतभाजनाः॥ ९"},{"b":28597,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.10"],"text":"सर्वे मिथो दर्शयन्तः स्वस्वभोज्यरुचिं पृथक्।"},{"b":28598,"kind":"sanskrit_shloka","page":211,"verses":["10.13.10"],"text":"हसन्तो हासयन्तश्‍चाभ्यवजह्रुः सहेश्‍वराः॥ १०"},{"b":28599,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"बिभ्रद् वेणुं जठरपटयोः"},{"b":28600,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"शृंगवेत्रे च कक्षे"},{"b":28601,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"वामे पाणौ मसृणकवलं"},{"b":28602,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"तत्फलान्यङ्गुलीषु ।"},{"b":28603,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो"},{"b":28604,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"हासयन् नर्मभिः स्वैः"},{"b":28605,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे"},{"b":28606,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.11"],"text":"यज्ञभुग् बालकेलिः॥ ११"},{"b":28607,"kind":"hindi_translation","page":211,"explains":["10.13.7","10.13.8","10.13.9","10.13.10","10.13.11"],"text":"ग्वालबालोंने एक स्वरसे कहा—‘ठीक है, ठीक है!’ उन्होंने बछड़ोंको पानी पिलाकर हरी-हरी घासमें छोड़ दिया और अपने-अपने छीके खोल-खोलकर भगवान्‌के साथ बड़े आनन्दसे भोजन करने लगे॥ ७॥ सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये। उनके चारों ओर ग्वालबालोंने बहुत-सी मण्डलाकार पंक्तियाँ बना लीं और एक-से-एक सटकर बैठ गये। सबके मुँह श्रीकृष्णकी ओर थे और सबकी आँखें आनन्दसे खिल रही थीं। वन-भोजनके समय श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए ग्वालबाल ऐसे शोभायमान हो रहे थे, मानो कमलकी कर्णिकाके चारों ओर उसकी छोटी-बड़ी पँखुड़ियाँ सुशोभित हो रही हों॥ ८॥ कोई पुष्प तो कोई पत्ते और कोई-कोई पल्लव, अंकुर, फल, छीके, छाल एवं पत्थरोंके पात्र बनाकर भोजन करने लगे॥ ९॥ भगवान् श्रीकृष्ण और ग्वालबाल सभी परस्पर अपनी-अपनी भिन्‍न-भिन्‍न रुचिका प्रदर्शन करते। कोई किसीको हँसा देता, तो कोई स्वयं ही हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाता। इस प्रकार वे सब भोजन करने लगे॥ १०॥ (उस समय श्रीकृष्णकी छटा सबसे निराली थी।) उन्होंने मुरलीको तो कमरकी फेंटमें आगेकी ओर खोंस लिया था। सींगी और बेंत बगलमें दबा लिये थे। बायें हाथमें बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित दही-भातका ग्रास था और अँगुलियोंमें अदरक, नीबू आदिके अचार-मुरब्बे दबा रखे थे। ग्वालबाल उनको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीचमें बैठकर अपनी विनोदभरी बातोंसे अपने साथी ग्वालबालोंको हँसाते जा रहे थे। जो समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता हैं, वे ही भगवान् ग्वालबालोंके साथ बैठकर इस प्रकार बाल-लीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्गके देवता आश्‍चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे॥ ११॥"},{"b":28608,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.12"],"text":"भारतैवं वत्सपेषु भुंजानेष्वच्युतात्मसु।"},{"b":28609,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.12"],"text":"वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिताः॥ १२"},{"b":28610,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.13"],"text":"तान् दृष्ट्वा भयसंत्रस्तानूचे कृष्णोऽस्य भीभयम्।"},{"b":28611,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.13"],"text":"मित्राण्याशान्मा विरमतेहानेष्ये वत्सकानहम्॥ १३"},{"b":28612,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.14"],"text":"इत्युक्त्वाद्रिदरीकुञ्जगह्वरेष्वात्मवत्सकान्।"},{"b":28613,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.14"],"text":"विचिन्वन् भगवान् कृष्णः सपाणिकवलो ययौ॥ १४"},{"b":28614,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.15"],"text":"अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायार्भकस्येशितु-"},{"b":28615,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.15"],"text":"र्द्रष्टुं मंजु महित्वमन्यदपि तद्वत्सानितो वत्सपान्।"},{"b":28616,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.15"],"text":"नीत्वान्यत्र कुरूद्वहान्तरदधात् खेऽवस्थितो यः पुरा"},{"b":28617,"kind":"sanskrit_shloka","page":212,"verses":["10.13.15"],"text":"दृष्ट्वाघासुरमोक्षणं प्रभवतः प्राप्तः परं विस्मयम्॥ १५"},{"b":28618,"kind":"hindi_translation","page":212,"explains":["10.13.12","10.13.13","10.13.14","10.13.15"],"text":"भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार भोजन करते-करते ग्वालबाल भगवान्‌की इस रसमयी लीलामें तन्मय हो गये। उसी समय उनके बछड़े हरी-हरी घासके लालचसे घोर जंगलमें बड़ी दूर निकल गये॥ १२॥ जब ग्वालबालोंका ध्यान उस ओर गया, तब तो वे भयभीत हो गये। उस समय अपने भक्तोंके भयको भगा देनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘मेरे प्यारे मित्रो! तुमलोग भोजन करना बंद मत करो। मैं अभी बछड़ोंको लिये आता हूँ’॥ १३॥ ग्वालबालोंसे इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्ण हाथमें दही-भातका कौर लिये ही पहाड़ों, गुफाओं, कुंजों एवं अन्यान्य भयंकर स्थानोंमें अपने तथा साथियोंके बछड़ोंको ढूँढ़ने चल दिये॥ १४॥ परीक्षित्! ब्रह्माजी पहलेसे ही आकाशमें उपस्थित थे। प्रभुके प्रभावसे अघासुरका मोक्ष देखकर उन्हें बड़ा आश्‍चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि लीलासे मनुष्य-बालक बने हुए भगवान् श्रीकृष्णकी कोई और मनोहर महिमामयी लीला देखनी चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने पहले तो बछड़ोंको और भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर ग्वाल-बालोंको भी, अन्यत्र ले जाकर रख दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। अन्ततः वे जड़ कमलकी ही तो सन्तान हैं॥ १५॥"},{"b":28619,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.16"],"text":"ततो वत्सानदृष्ट्वैत्य पुलिनेऽपि च वत्सपान्।"},{"b":28620,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.16"],"text":"उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्ततः॥ १६"},{"b":28621,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.17"],"text":"क्वाप्यदृष्ट्वान्तर्विपिने वत्सान् पालांश्‍च विश्‍ववित्।"},{"b":28622,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.17"],"text":"सर्वं विधिकृतं कृष्णः सहसावजगाम ह॥ १७"},{"b":28623,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.18"],"text":"ततः कृष्णो मुदं कर्तुं तन्मातॄणां च कस्य च।"},{"b":28624,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.18"],"text":"उभयायितमात्मानं चक्रे विश्‍वकृदीश्‍वरः॥ १८"},{"b":28625,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.19"],"text":"यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत् कराङ्‌घ्र्यादिकं"},{"b":28626,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.19"],"text":"यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद् विभूषाम्बरम्।"},{"b":28627,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.19"],"text":"यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं"},{"b":28628,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.19"],"text":"सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ॥ १९"},{"b":28629,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.20"],"text":"स्वयमात्माऽऽत्मगोवत्सान् प्रतिवार्यात्मवत्सपैः।"},{"b":28630,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.20"],"text":"क्रीडन्‍नात्मविहारैश्‍च सर्वात्मा प्राविशद् व्रजम्॥ २०"},{"b":28631,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.21"],"text":"तत्तद्वत्सान् पृथङ्नीत्वा तत्तद्गोष्ठे निवेश्य सः।"},{"b":28632,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.21"],"text":"तत्तदात्माभवद् राजंस्तत्तत्सद्म प्रविष्टवान्॥ २१"},{"b":28633,"kind":"hindi_translation","page":213,"explains":["10.13.16","10.13.17","10.13.18","10.13.19","10.13.20","10.13.21"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण बछड़े न मिलनेपर यमुनाजीके पुलिनपर लौट आये, परन्तु यहाँ क्या देखते हैं कि ग्वालबाल भी नहीं हैं। तब उन्होंने वनमें घूम-घूमकर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ा॥ १६॥ परन्तु जब ग्वालबाल और बछड़े उन्हें कहीं न मिले, तब वे तुरंत जान गये कि यह सब ब्रह्माकी करतूत है। वे तो सारे विश्‍वके एकमात्र ज्ञाता हैं॥ १७॥ अब भगवान् श्रीकृष्णने बछड़ों और ग्वालबालोंकी माताओंको तथा ब्रह्माजीको भी आनन्दित करनेके लिये अपने-आपको ही बछड़ों और ग्वालबालों—दोनोंके रूपमें बना लिया। क्योंकि वे ही तो सम्पूर्ण विश्‍वके कर्ता सर्वशक्तिमान् ईश्‍वर हैं॥ १८॥ परीक्षित्! वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर जैसे-जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सिंगी, बाँसुरी, पत्ते और छीके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव, गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते और चलते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय ‘यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है’—यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी॥ १९॥ सर्वात्मा भगवान् स्वयं ही बछड़े बन गये और स्वयं ही ग्वालबाल । अपने आत्मस्वरूप बछड़ोंको अपने आत्मस्वरूप ग्वालबालोंके द्वारा घेरकर अपने ही साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते हुए उन्होंने व्रजमें प्रवेश किया॥ २०॥ परीक्षित्! जिस ग्वालबालके जो बछड़े थे, उन्हें उसी ग्वालबालके रूपसे अलग-अलग ले जाकर उसकी बाखलमें घुसा दिया और विभिन्‍न बालकोंके रूपमें उनके भिन्‍न-भिन्‍न घरोंमें चले गये॥ २१॥"},{"b":28634,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.22"],"text":"तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिता"},{"b":28635,"kind":"sanskrit_shloka","page":213,"verses":["10.13.22"],"text":"उत्थाप्य दोर्भिः परिरभ्य निर्भरम्।"},{"b":28636,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.22"],"text":"स्नेहस्नुतस्तन्यपयःसुधासवं"},{"b":28637,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.22"],"text":"मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन्॥ २२"},{"b":28638,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.23"],"text":"ततो नृपोन्मर्दनमज्जलेपना-"},{"b":28639,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.23"],"text":"लंकाररक्षातिलकाशनादिभिः ।"},{"b":28640,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.23"],"text":"संलालितः स्वाचरितैः प्रहर्षयन्"},{"b":28641,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.23"],"text":"सायं गतो यामयमेन माधवः॥ २३"},{"b":28642,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.24"],"text":"गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरं"},{"b":28643,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.24"],"text":"हुंकारघोषैः परिहूतसंगतान्।"},{"b":28644,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.24"],"text":"स्वकान् स्वकान् वत्सतरानपाययन्"},{"b":28645,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.24"],"text":"मुहुर्लिहन्त्यः स्रवदौधसं पयः॥ २४"},{"b":28646,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.25"],"text":"गोगोपीनां मातृतास्मिन् सर्वा स्नेहर्द्धिकां विना।"},{"b":28647,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.25"],"text":"पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना॥ २५"},{"b":28648,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.26"],"text":"व्रजौकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्‍ल्याब्दमन्वहम्।"},{"b":28649,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.26"],"text":"शनैर्निःसीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत्॥ २६"},{"b":28650,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.27"],"text":"इत्थमात्माऽऽत्मनाऽऽत्मानं वत्सपालमिषेण सः।"},{"b":28651,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.27"],"text":"पालयन् वत्सपो वर्षं चिक्रीडे वनगोष्ठयोः॥ २७"},{"b":28652,"kind":"hindi_translation","page":213,"explains":["10.13.22","10.13.23","10.13.24","10.13.25","10.13.26","10.13.27"],"text":"ग्वालबालोंकी माताएँ बाँसुरीकी तान सुनते ही जल्दीसे दौड़ आयीं। ग्वालबाल बने हुए परब्रह्म श्रीकृष्णको अपने बच्चे समझकर हाथोंसे उठाकर उन्होंने जोरसे हृदयसे लगा लिया। वे अपने स्तनोंसे वात्सल्य-स्नेहकी अधिकताके कारण सुधासे भी मधुर और आसवसे भी मादक चुचुआता हुआ दूध उन्हें पिलाने लगीं॥ २२॥ परीक्षित्! इसी प्रकार प्रतिदिन सन्ध्यासमय भगवान् श्रीकृष्ण उन ग्वालबालोंके रूपमें वनसे लौट आते और अपनी बालसुलभ लीलाओंसे माताओंको आनन्दित करते। वे माताएँ उन्हें उबटन लगातीं, नहलातीं, चन्दनका लेप करतीं और अच्छे-अच्छे वस्त्रों तथा गहनोंसे सजातीं। दोनों भौंहोंके बीचमें डीठसे बचानेके लिये काजलका डिठौना लगा देतीं तथा भोजन करातीं और तरह-तरहसे बड़े लाड़-प्यारसे उनका लालन-पालन करतीं॥ २३॥ ग्वालिनोंके समान गौएँ भी जब जंगलोंमेंसे चरकर जल्दी-जल्दी लौटतीं और उनकी हुंकार सुनकर उनके प्यारे बछड़े दौड़कर उनके पास आ जाते, तब वे बार-बार उन्हें अपनी जीभसे चाटतीं और अपना दूध पिलातीं । उस समय स्नेहकी अधिकताके कारण उनके थनोंसे स्वयं ही दूधकी धारा बहने लगती॥ २४॥ इन गायों और ग्वालिनोंका मातृभाव पहले-जैसा ही ऐश्‍वर्यज्ञानरहित और विशुद्ध था। हाँ, अपने असली पुत्रोंकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अवश्य अधिक था। इसी प्रकार भगवान् भी उनके पहले पुत्रोंके समान ही पुत्रभाव दिखला रहे थे, परन्तु भगवान्‌में उन बालकोंके जैसा मोहका भाव नहीं था कि मैं इनका पुत्र हूँ॥ २५॥ अपने-अपने बालकोंके प्रति व्रजवासियोंकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी। यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया॥ २६॥ इस प्रकार सर्वात्मा श्रीकृष्ण बछड़े और ग्वालबालोंके बहाने गोपाल बनकर अपने बालकरूपसे वत्सरूपका पालन करते हुए एक वर्षतक वन और गोष्ठमें क्रीडा करते रहे॥ २७॥"},{"b":28653,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.28"],"text":"एकदा चारयन् वत्सान् सरामो वनमाविशत्।"},{"b":28654,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.28"],"text":"पंचषासु त्रियामासु हायनापूरणीष्वजः॥ २८"},{"b":28655,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.29"],"text":"ततो विदूराच्चरतो गावो वत्सानुपव्रजम्।"},{"b":28656,"kind":"sanskrit_shloka","page":214,"verses":["10.13.29"],"text":"गोवर्धनाद्रिशिरसि चरन्त्यो ददृशुस्तृणम्॥ २९"},{"b":28657,"kind":"hindi_translation","page":214,"explains":["10.13.28","10.13.29"],"text":"जब एक वर्ष पूरा होनेमें पाँच-छः रातें शेष थीं, तब एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ बछड़ोंको चराते हुए वनमें गये॥ २८॥ उस समय गौएँ गोवर्धनकी चोटीपर घास चर रही थीं। वहाँसे उन्होंने व्रजके पास ही घास चरते हुए बहुत दूर अपने बछड़ोंको देखा॥ २९॥"},{"b":28658,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.30"],"text":"दृष्ट्वाथ तत्स्नेहवशोऽस्मृतात्मा"},{"b":28659,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.30"],"text":"स गोव्रजोऽत्यात्मपदुर्गमार्गः।"},{"b":28660,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.30"],"text":"द्विपात् ककुद्ग्रीव उदास्यपुच्छो-"},{"b":28661,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.30"],"text":"ऽगाद्धुंकृतैरास्रुपया जवेन॥ ३०"},{"b":28662,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.31"],"text":"समेत्य गावोऽधो वत्सान् वत्सवत्योऽप्यपाययन्।"},{"b":28663,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.31"],"text":"गिलन्त्य इव चांगानि लिहन्त्यः स्वौधसं पयः॥ ३१"},{"b":28664,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.32"],"text":"गोपास्तद्रोधनायासमौघ्यलज्जोरुमन्युना।"},{"b":28665,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.32"],"text":"दुर्गाध्वकृच्छ्रतोऽभ्येत्य गोवत्सैर्ददृशुः सुतान्॥ ३२"},{"b":28666,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.33"],"text":"तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशया"},{"b":28667,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.33"],"text":"जातानुरागा गतमन्यवोऽर्भकान्।"},{"b":28668,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.33"],"text":"उदुह्य दोर्भिः परिरभ्य मूर्धनि"},{"b":28669,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.33"],"text":"घ्राणैरवापुः परमां मुदं ते॥ ३३"},{"b":28670,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.34"],"text":"ततः प्रवयसो गोपास्तोकाश्‍लेषसुनिर्वृताः।"},{"b":28671,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.34"],"text":"कृच्छ्राच्छनैरपगतास्तदनुस्मृत्युदश्रवः ॥ ३४"},{"b":28672,"kind":"hindi_translation","page":215,"explains":["10.13.30","10.13.31","10.13.32","10.13.33","10.13.34"],"text":"बछड़ोंको देखते ही गौओंका वात्सल्य-स्नेह उमड़ आया। वे अपने-आपकी सुध-बुध खो बैठीं और ग्वालोंके रोकनेकी कुछ भी परवा न कर जिस मार्गसे वे न जा सकते थे, उस मार्गसे हुंकार करती हुई बड़े वेगसे दौड़ पड़ीं। उस समय उनके थनोंसे दूध बहता जाता था और उनकी गरदनें सिकुड़कर डीलसे मिल गयी थीं। वे पूँछ तथा सिर उठाकर इतने वेगसे दौड़ रही थीं कि मालूम होता था मानो उनके दो ही पैर हैं॥ ३०॥ जिन गौओंके और भी बछड़े हो चुके थे, वे भी गोवर्धनके नीचे अपने पहले बछड़ोंके पास दौड़ आयीं और उन्हें स्नेहवश अपने-आप बहता हुआ दूध पिलाने लगीं। उस समय वे अपने बच्चोंका एक-एक अंग ऐसे चावसे चाट रही थीं, मानो उन्हें अपने पेटमें रख लेंगी॥ ३१॥ गोपोंने उन्हें रोकनेका बहुत कुछ प्रयत्‍न किया, परन्तु उनका सारा प्रयत्‍न व्यर्थ रहा। उन्हें अपनी विफलतापर कुछ लज्जा और गायोंपर बड़ा क्रोध आया। जब वे बहुत कष्ट उठाकर उस कठिन मार्गसे उस स्थानपर पहुँचे, तब उन्होंने बछड़ोंके साथ अपने बालकोंको भी देखा॥ ३२॥ अपने बच्चोंको देखते ही उनका हृदय प्रेमरससे सराबोर हो गया। बालकोंके प्रति अनुरागकी बाढ़ आ गयी, उनका क्रोध न जाने कहाँ हवा हो गया। उन्होंने अपने-अपने बालकोंको गोदमें उठाकर हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ३३॥ बूढ़े गोपोंको अपने बालकोंके आलिंगनसे परम आनन्द प्राप्त हुआ। वे निहाल हो गये। फिर बड़े कष्टसे उन्हें छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे गये। जानेके बाद भी बालकोंके और उनके आलिंगनके स्मरणसे उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहते रहे॥ ३४॥"},{"b":28673,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.35"],"text":"व्रजस्य रामः प्रेमर्धेर्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम्।"},{"b":28674,"kind":"sanskrit_shloka","page":215,"verses":["10.13.35"],"text":"मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत्॥ ३५"},{"b":28675,"kind":"hindi_translation","page":215,"explains":["10.13.35"],"text":"बलरामजीने देखा कि व्रजवासी गोप, गौएँ और ग्वालिनोंकी उन सन्तानोंपर भी, जिन्होंने अपनी माका दूध पीना छोड़ दिया है, क्षण-प्रतिक्षण प्रेम-सम्पत्ति और उसके अनुरूप उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही है, तब वे विचारमें पड़ गये, क्योंकि उन्हें इसका कारण मालूम न था॥ ३५॥"},{"b":28676,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.36"],"text":"किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि।"},{"b":28677,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.36"],"text":"व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते॥ ३६"},{"b":28678,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.37"],"text":"केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी।"},{"b":28679,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.37"],"text":"प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी॥ ३७"},{"b":28680,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.38"],"text":"इति संचिन्त्य दाशार्हो वत्सान् सवयसानपि।"},{"b":28681,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.38"],"text":"सर्वानाचष्ट वैकुण्ठं चक्षुषा वयुनेन सः॥ ३८"},{"b":28682,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.39"],"text":"नैते सुरेशा ऋषयो न चैते"},{"b":28683,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.39"],"text":"त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि।"},{"b":28684,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.39"],"text":"सर्वं पृथक्त्वं निगमात् कथं वदे-"},{"b":28685,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.39"],"text":"त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत्॥ ३९"},{"b":28686,"kind":"hindi_translation","page":216,"explains":["10.13.36","10.13.37","10.13.38","10.13.39"],"text":"‘यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है॥ ३६॥ यह कौन-सी माया है? कहाँसे आयी है? यह किसी देवताकी है, मनुष्यकी है अथवा असुरोंकी? परन्तु क्या ऐसा भी सम्भव है? नहीं-नहीं, यह तो मेरे प्रभुकी ही माया है। और किसीकी मायामें ऐसी सामर्थ्य नहीं, जो मुझे भी मोहित कर ले’॥ ३७॥ बलरामजीने ऐसा विचार करके ज्ञानदृष्टिसे देखा, तो उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि इन सब बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें केवल श्रीकृष्ण-ही-श्रीकृष्ण हैं॥ ३८॥ तब उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—‘भगवन्! ये ग्वालबाल और बछड़े न देवता हैं और न तो कोई ऋषि ही। इन भिन्‍न-भिन्‍न रूपोंका आश्रय लेनेपर भी आप अकेले ही इन रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं। कृपया स्पष्ट करके थोड़ेमें ही यह बतला दीजिये कि आप इस प्रकार बछड़े, बालक, सिंगी, रस्सी आदिके रूपमें अलग-अलग क्यों प्रकाशित हो रहे हैं?’ तब भगवान्‌ने ब्रह्माकी सारी करतूत सुनायी और बलरामजीने सब बातें जान लीं॥ ३९॥"},{"b":28687,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.40"],"text":"तावदेत्यात्मभूरात्ममानेन त्रुट्यनेहसा।"},{"b":28688,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.40"],"text":"पुरोवदब्दं क्रीडन्तं ददृशे सकलं हरिम्॥ ४०"},{"b":28689,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.41"],"text":"यावन्तो गोकुले बालाः सवत्साः सर्व एव हि।"},{"b":28690,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.41"],"text":"मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिताः॥ ४१"},{"b":28691,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.42"],"text":"इत एतेऽत्र कुत्रत्या मन्मायामोहितेतरे।"},{"b":28692,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.42"],"text":"तावन्त एव तत्राब्दं क्रीडन्तो विष्णुना समम्॥ ४२"},{"b":28693,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.43"],"text":"एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभूः।"},{"b":28694,"kind":"sanskrit_shloka","page":216,"verses":["10.13.43"],"text":"सत्याः के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्टे कथंचन॥ ४३"},{"b":28695,"kind":"hindi_translation","page":216,"explains":["10.13.40","10.13.41","10.13.42","10.13.43"],"text":"परीक्षित्! तबतक ब्रह्माजी ब्रह्मलोकसे व्रजमें लौट आये। उनके कालमानसे अबतक केवल एक त्रुटि (जितनी देरमें तीखी सूईसे कमलकी पँखुड़ी छिदे) समय व्यतीत हुआ था। उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबाल और बछड़ोंके साथ एक सालसे पहलेकी भाँति ही क्रीडा कर रहे हैं॥ ४०॥ वे सोचने लगे—‘गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं—उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए॥ ४१॥ तब मेरी मायासे मोहित ग्वालबाल और बछड़ोंके अतिरिक्त ये उतने ही दूसरे बालक तथा बछड़े कहाँसे आ गये, जो एक सालसे भगवान्‌के साथ खेल रहे हैं?॥ ४२॥ ब्रह्माजीने दोनों स्थानोंपर दोनोंको देखा और बहुत देरतक ध्यान करके अपनी ज्ञानदृष्टिसे उनका रहस्य खोलना चाहा; परन्तु इन दोनोंमें कौन-से पहलेके ग्वालबाल हैं और कौन-से पीछे बना लिये गये हैं, इनमेंसे कौन सच्चे हैं और कौन बनावटी—यह बात वे किसी प्रकार न समझ सके॥ ४३॥"},{"b":28696,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.44"],"text":"एवं सम्मोहयन् विष्णुं विमोहं विश्‍वमोहनम्।"},{"b":28697,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.44"],"text":"स्वयैव माययाजोऽपि स्वयमेव विमोहितः॥ ४४"},{"b":28698,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.45"],"text":"तम्यां तमोवन्‍नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि।"},{"b":28699,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.45"],"text":"महतीतरमायैश्यं निहन्त्यात्मनि युंजतः॥ ४५"},{"b":28700,"kind":"hindi_commentary","page":217,"explains":["10.13.44","10.13.45"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णकी मायामें तो सभी मुग्ध हो रहे हैं, परन्तु कोई भी माया-मोह भगवान्‌का स्पर्श नहीं कर सकता। ब्रह्माजी उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको अपनी मायासे मोहित करने चले थे। किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, वे अजन्मा होनेपर भी अपनी ही मायासे अपने-आप मोहित हो गये॥ ४४॥ जिस प्रकार रातके घोर अन्धकारमें कुहरेके अन्धकारका और दिनके प्रकाशमें जुगनूके प्रकाशका पता नहीं चलता, वैसे ही जब क्षुद्र पुरुष महापुरुषोंपर अपनी मायाका प्रयोग करते हैं, तब वह उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकती, अपना ही प्रभाव खो बैठती है॥ ४५॥"},{"b":28701,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.46"],"text":"तावत् सर्वे वत्सपालाः पश्यतोऽजस्य तत्क्षणात्।"},{"b":28702,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.46"],"text":"व्यदृश्यन्त घनश्यामाः पीतकौशेयवाससः॥ ४६"},{"b":28703,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.47"],"text":"चतुर्भुजाः शंखचक्रगदाराजीवपाणयः।"},{"b":28704,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.47"],"text":"किरीटिनः कुण्डलिनो हारिणो वनमालिनः॥ ४७"},{"b":28705,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.48"],"text":"श्रीवत्सांगददोरत्‍नकम्बुकंकणपाणयः ।"},{"b":28706,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.48"],"text":"नूपुरैः कटकैर्भाताः कटिसूत्रांगुलीयकैः॥ ४८"},{"b":28707,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.49"],"text":"आङ्‌घ्रिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभिः।"},{"b":28708,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.49"],"text":"कोमलैः सर्वगात्रेषु भूरिपुण्यवदर्पितैः॥ ४९"},{"b":28709,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.50"],"text":"चन्द्रिकाविशदस्मेरैः सारुणापांगवीक्षितैः।"},{"b":28710,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.50"],"text":"स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालकाः॥ ५०"},{"b":28711,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.51"],"text":"आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैर्मूर्तिमद्भिश्‍चराचरैः ।"},{"b":28712,"kind":"sanskrit_shloka","page":217,"verses":["10.13.51"],"text":"नृत्यगीताद्यनेकार्हैः पृथक् पृथगुपासिताः॥ ५१"},{"b":28713,"kind":"hindi_translation","page":217,"explains":["10.13.46","10.13.47","10.13.48","10.13.49","10.13.50","10.13.51"],"text":"ब्रह्माजी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्णके रूपमें दिखायी पड़ने लगे। सब-के-सब सजल जलधरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्मसे युक्त—चतुर्भुज। सबके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कण्ठोंमें मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रही थीं॥ ४६-४७॥ उनके वक्षःस्थलपर सुवर्णकी सुनहली रेखा—श्रीवत्स, बाहुओंमें बाजूबंद, कलाइयोंमें शंखाकार रत्‍नोंसे जड़े कंगन, चरणोंमें नूपुर और कड़े, कमरमें करधनी तथा अँगुलियोंमें अँगूठियाँ जगमगा रही थीं॥ ४८॥ वे नखसे शिखतक समस्त अंगोंमें कोमल और नूतन तुलसीकी मालाएँ, जो उन्हें बड़े भाग्यशाली भक्तोंने पहनायी थीं, धारण किये हुए थे॥ ४९॥ उनकी मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी। ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्तजनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं॥ ५०॥ ब्रह्माजीने यह भी देखा कि उन्हींके-जैसे दूसरे ब्रह्मासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे अलग-अलग भगवान्‌के उन सब रूपोंकी उपासना कर रहे हैं॥ ५१॥"},{"b":28714,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.52"],"text":"अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभिः ।"},{"b":28715,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.52"],"text":"चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः परीता महदादिभिः॥ ५२"},{"b":28716,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.53"],"text":"कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभिः।"},{"b":28717,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.53"],"text":"स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भिरुपासिताः॥ ५३"},{"b":28718,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.54"],"text":"सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः ।"},{"b":28719,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.54"],"text":"अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषद‍्दृशाम्॥ ५४"},{"b":28720,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.55"],"text":"एवं सकृद् ददर्शाजः परब्रह्मात्मनोऽखिलान्।"},{"b":28721,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.55"],"text":"यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम्॥ ५५"},{"b":28722,"kind":"hindi_translation","page":217,"explains":["10.13.52","10.13.53","10.13.54","10.13.55"],"text":"उन्हें अलग-अलग अणिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ, माया-विद्या आदि विभूतियाँ और महत्तत्त्व आदि चौबीसों तत्त्व चारों ओरसे घेरे हुए हैं॥ ५२॥ प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला काल, उसके परिणामका कारण स्वभाव, वासनाओंको जगानेवाला संस्कार, कामनाएँ, कर्म, विषय और फल—सभी मूर्तिमान् होकर भगवान्‌के प्रत्येक रूपकी उपासना कर रहे हैं। भगवान्‌की सत्ता और महत्ताके सामने उन सभीकी सत्ता और महत्ता अपना अस्तित्व खो बैठी थी॥ ५३॥ ब्रह्माजीने यह भी देखा कि वे सभी भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालके द्वारा सीमित नहीं हैं, त्रिकालाबाधित सत्य हैं। वे सब-के-सब स्वयंप्रकाश और केवल अनन्त आनन्दस्वरूप हैं। उनमें जड़ता अथवा चेतनताका भेदभाव नहीं है। वे सब-के-सब एकरस हैं। यहाँतक कि उपनिषद्दर्शी तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टि भी उनकी अनन्त महिमाका स्पर्श नहीं कर सकती॥ ५४॥ इस प्रकार ब्रह्माजीने एक साथ ही देखा कि वे सब-के-सब उन परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके ही स्वरूप हैं, जिनके प्रकाशसे यह सारा चराचर जगत् प्रकाशित हो रहा है॥ ५५॥"},{"b":28723,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.56"],"text":"ततोऽतिकुतुकोद‍्वृत्तस्तिमितैकादशेन्द्रियः।"},{"b":28724,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.56"],"text":"तद्धाम्‍नाभूदजस्तूष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका॥ ५६"},{"b":28725,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.57"],"text":"इतीरेशेऽतर्क्ये निजमहिमनि स्वप्रमितिके"},{"b":28726,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.57"],"text":"परत्राजातोऽतन्‍निरसनमुखब्रह्मकमितौ ।"},{"b":28727,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.57"],"text":"अनीशेऽपि द्रष्टुं किमिदमिति वा मुह्यति सति"},{"b":28728,"kind":"sanskrit_shloka","page":218,"verses":["10.13.57"],"text":"चछादाजो ज्ञात्वा सपदि परमोऽजाजवनिकाम्॥ ५७"},{"b":28729,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.58"],"text":"ततोऽर्वाक् प्रतिलब्धाक्षः कः परेतवदुत्थितः।"},{"b":28730,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.58"],"text":"कृच्छ्रादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना॥ ५८"},{"b":28731,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.59"],"text":"सपद्येवाभितः पश्यन् दिशोऽपश्यत् पुरः स्थितम्।"},{"b":28732,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.59"],"text":"वृन्दावनं जनाजीव्यद्रुमाकीर्णं समाप्रियम्॥ ५९"},{"b":28733,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.60"],"text":"यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृमृगादयः।"},{"b":28734,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.60"],"text":"मित्राणीवाजितावासद्रुतरुट्तर्षकादिकम् ॥ ६०"},{"b":28735,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.61"],"text":"तत्रोद्वहत् पशुपवंशशिशुत्वनाट्यं"},{"b":28736,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.61"],"text":"ब्रह्माद्वयं परमनन्तमगाधबोधम्।"},{"b":28737,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.61"],"text":"वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व-"},{"b":28738,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.61"],"text":"देकं सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट॥ ६१"},{"b":28739,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.62"],"text":"दृष्ट्वा त्वरेण निजधोरणतोऽवतीर्य"},{"b":28740,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.62"],"text":"पृथ्व्यां वपुः कनकदण्डमिवाभिपात्य।"},{"b":28741,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.62"],"text":"स्पृष्ट्वा चतुर्मुकुटकोटिभिरङ्‌घ्रियुग्मं"},{"b":28742,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.62"],"text":"नत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम्॥ ६२"},{"b":28743,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.63"],"text":"उत्थायोत्थाय कृष्णस्य चिरस्य पादयोः पतन्।"},{"b":28744,"kind":"sanskrit_shloka","page":219,"verses":["10.13.63"],"text":"आस्ते महित्वं प्राग्दृष्टं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः॥ ६३"},{"b":28745,"kind":"hindi_translation","page":218,"explains":["10.13.56","10.13.57","10.13.58","10.13.59","10.13.60","10.13.61","10.13.62","10.13.63"],"text":"यह अत्यन्त आश्‍चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्माजी तो चकित रह गये। उनकी ग्यारहों इन्द्रियाँ (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन) क्षुब्ध एवं स्तब्ध रह गयीं। वे भगवान्‌के तेजसे निस्तेज होकर मौन हो गये। उस समय वे ऐसे स्तब्ध होकर खड़े रह गये, मानो व्रजके अधिष्ठातृ-देवताके पास एक पुतली खड़ी हो॥ ५६॥ परीक्षित्! भगवान्‌का स्वरूप तर्कसे परे है। उसकी महिमा असाधारण है। वह स्वयंप्रकाश, आनन्दस्वरूप और मायासे अतीत है। वेदान्त भी साक्षात्रूपसे उसका वर्णन करनेमें असमर्थ है, इसलिये उससे भिन्‍नका निषेध करके आनन्दस्वरूप ब्रह्मका किसी प्रकार कुछ संकेत करता है। यद्यपि ब्रह्माजी समस्त विद्याओंके अधिपति हैं, तथापि भगवान्‌के दिव्यस्वरूपको वे तनिक भी न समझ सके कि यह क्या है। यहाँतक कि वे भगवान्‌के उन महिमामय रूपोंको देखनेमें भी असमर्थ हो गये। उनकी आँखें मुँद गयीं। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माके इस मोह और असमर्थताको जानकर बिना किसी प्रयासके तुरंत अपनी मायाका परदा हटा दिया॥ ५७॥ इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान हुआ। वे मानो मरकर फिर जी उठे। सचेत होकर उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले। तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा॥ ५८॥ फिर ब्रह्माजी जब चारों ओर देखने लगे, तब पहले दिशाएँ और उसके बाद तुरंत ही उनके सामने वृन्दावन दिखायी पड़ा। वृन्दावन सबके लिये एक-सा प्यारा है। जिधर देखिये, उधर ही जीवोंको जीवन देनेवाले फल और फूलोंसे लदे हुए, हरे-हरे पत्तोंसे लहलहाते हुए वृक्षोंकी पाँतें शोभा पा रही हैं॥ ५९॥ भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि होनेके कारण वृन्दावनधाममें क्रोध, तृष्णा आदि दोष प्रवेश नहीं कर सकते और वहाँ स्वभावसे ही परस्पर दुस्त्यज वैर रखनेवाले मनुष्य और पशु-पक्षी भी प्रेमी मित्रोंके समान हिल-मिलकर एक साथ रहते हैं॥ ६०॥ ब्रह्माजीने वृन्दावनका दर्शन करनेके बाद देखा कि अद्वितीय परब्रह्म गोपवंशके बालकका-सा नाट्य कर रहा है। एक होनेपर भी उसके सखा हैं, अनन्त होनेपर भी वह इधर-उधर घूम रहा है और उसका ज्ञान अगाध होनेपर भी वह अपने ग्वालबाल और बछड़ोंको ढूँढ़ रहा है। ब्रह्माजीने देखा कि जैसे भगवान् श्रीकृष्ण पहले अपने हाथमें दही-भातका कौर लिये उन्हें ढूँढ़ रहे थे, वैसे ही अब भी अकेले ही उनकी खोजमें लगे हैं॥ ६१॥ भगवान्‌को देखते ही ब्रह्माजी अपने वाहन हंसपरसे कूद पड़े और सोनेके समान चमकते हुए अपने शरीरसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिर पड़े। उन्होंने अपने चारों मुकुटोंके अग्रभागसे भगवान्‌के चरण-कमलोंका स्पर्श करके नमस्कार किया और आनन्दके आँसुओंकी धारासे उन्हें नहला दिया॥ ६२॥ वे भगवान् श्रीकृष्णकी पहले देखी हुई महिमाका बार-बार स्मरण करते, उनके चरणोंपर गिरते और उठ-उठकर फिर-फिर गिर पड़ते। इसी प्रकार बहुत देरतक वे भगवान्‌के चरणोंमें ही पड़े रहे॥ ६३॥"},{"b":28746,"kind":"sanskrit_shloka","page":220,"verses":["10.13.64"],"text":"शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने"},{"b":28747,"kind":"sanskrit_shloka","page":220,"verses":["10.13.64"],"text":"मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धरः।"},{"b":28748,"kind":"sanskrit_shloka","page":220,"verses":["10.13.64"],"text":"कृतांजलिः प्रश्रयवान् समाहितः"},{"b":28749,"kind":"sanskrit_shloka","page":220,"verses":["10.13.64"],"text":"सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥ ६४"},{"b":28750,"kind":"hindi_translation","page":220,"explains":["10.13.64"],"text":"फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्‌को देखकर उनका सिर झुक गया। वे काँपने लगे। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ६४॥"},{"b":28751,"kind":"hindi_translation","page":220,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥"}],"notes":[{"id":"v2:249","mark":"*","page":213,"after_verse":"10.13.21","text":"भगवान् सर्वसमर्थ हैं। वे ब्रह्माजीके चुराये हुए ग्वालबाल और बछड़ोंको ला सकते थे। किन्तु इससे ब्रह्माजीका मोह दूर न होता और वे भगवान्‌की उस दिव्य मायाका ऐश्‍वर्य न देख सकते, जिसने उनके विश्‍वकर्ता होनेके अभिमानको नष्ट किया। इसीलिये भगवान् उन्हीं ग्वालबाल और बछड़ोंको न लाकर स्वयं ही वैसे ही एवं उतने ही ग्वालबाल और बछड़े बन गये।"}],"corrections":{"count":15,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}