{"id":"10.16","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 16","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ षोडशोऽध्यायः","topics":["कालियपर कृपा"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[238,248]},"verses":[{"id":"10.16.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/1/","page":238,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्णः कृष्णाहिना विभुः।","तस्या विशुद्धिमन्विच्छन् सर्पं तमुदवासयत्॥ १"],"iast":["vilokya dūṣitāṃ kṛṣṇāṃ kṛṣṇaḥ kṛṣṇāhinā vibhuḥ|","tasyā viśuddhimanvicchan sarpaṃ tamudavāsayat|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि महाविषधर कालिय नागने यमुनाजीका जल विषैला कर दिया है। तब यमुनाजीको शुद्ध करनेके विचारसे उन्होंने वहाँसे उस सर्पको निकाल दिया॥ १॥"},{"id":"10.16.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/2/","page":238,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कथमन्तर्जलेऽगाधे न्यगृह्णाद् भगवानहिम्।","स वै बहुयुगावासं यथाऽऽसीद् विप्र कथ्यताम्॥ २"],"iast":["kathamantarjale'gādhe nyagṛhṇād bhagavānahim|","sa vai bahuyugāvāsaṃ yathā''sīd vipra kathyatām|| 2"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाजीके अगाध जलमें किस प्रकार उस सर्पका दमन किया? फिर कालिय नाग तो जलचर जीव नहीं था, ऐसी दशामें वह अनेक युगोंतक जलमें क्यों और कैसे रहा? सो बतलाइये॥ २॥"},{"id":"10.16.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/3/","page":238,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["ब्रह्मन् भगवतस्तस्य भूम्‍नः स्वच्छन्दवर्तिनः।","गोपालोदारचरितं कस्तृप्येतामृतं जुषन्॥ ३"],"iast":["brahman bhagavatastasya bhūmnaḥ svacchandavartinaḥ|","gopālodāracaritaṃ kastṛpyetāmṛtaṃ juṣan|| 3"],"meaning":"ब्रह्मस्वरूप महात्मन्! भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी लीला प्रकट करके स्वच्छन्द विहार करते हैं। गोपालरूपसे उन्होंने जो उदार लीला की है, वह तो अमृतस्वरूप है। भला, उसके सेवनसे कौन तृप्त हो सकता है?॥ ३॥"},{"id":"10.16.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/4/","page":238,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालिन्द्यां कालियस्यासीद‍्ध्रदः कश्‍चिद् विषाग्‍निना।","श्रप्यमाणपया यस्मिन् पतन्त्युपरिगाः खगाः॥ ४"],"iast":["kālindyāṃ kāliyasyāsīddhradaḥ kaścid viṣāgninā|","śrapyamāṇapayā yasmin patantyuparigāḥ khagāḥ|| 4"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यमुनाजीमें कालिय नागका एक कुण्ड था। उसका जल विषकी गर्मीसे खौलता रहता था। यहाँतक कि उसके ऊपर उड़नेवाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे॥ ४॥"},{"id":"10.16.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/5/","page":238,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विप्रुष्मता विषोदोर्मिमारुतेनाभिमर्शिताः।","म्रियन्ते तीरगा यस्य प्राणिनः स्थिरजंगमाः॥ ५"],"iast":["vipruṣmatā viṣodormimārutenābhimarśitāḥ|","mriyante tīragā yasya prāṇinaḥ sthirajaṃgamāḥ|| 5"],"meaning":"उसके विषैले जलकी उत्ताल तरंगोंका स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूँदें लेकर जब वायु बाहर आती और तटके घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदिका स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे॥ ५॥"},{"id":"10.16.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/6/","page":238,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं चण्डवेगविषवीर्यमवेक्ष्य तेन","दुष्टां नदीं च खलसंयमनावतारः।","कृष्णः कदम्बमधिरुह्य ततोऽतितुङ्ग-","मास्फोट्य गाढरशनो न्यपतद् विषोदे॥ ६"],"iast":["taṃ caṇḍavegaviṣavīryamavekṣya tena","duṣṭāṃ nadīṃ ca khalasaṃyamanāvatāraḥ|","kṛṣṇaḥ kadambamadhiruhya tato'tituṅga-","māsphoṭya gāḍharaśano nyapatad viṣode|| 6"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌का अवतार तो दुष्टोंका दमन करनेके लिये होता ही है। जब उन्होंने देखा कि उस साँपके विषका वेग बड़ा प्रचण्ड (भयंकर) है और वह भयानक विष ही उसका महान् बल है तथा उसके कारण मेरे विहारका स्थान यमुनाजी भी दूषित हो गयी हैं, तब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी कमरका फेंटा कसकर एक बहुत ऊँचे कदम्बके वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे ताल ठोंककर उस विषैले जलमें कूद पड़े॥ ६॥"},{"id":"10.16.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/7/","page":239,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेग-","संक्षोभितोरगविषोच्छ्वसिताम्बुराशिः।","पर्यक् प्लुतो विषकषायविभीषणोर्मि-","र्धावन् धनुःशतमनन्तबलस्य किं तत्॥ ७"],"iast":["sarpahradaḥ puruṣasāranipātavega-","saṃkṣobhitoragaviṣocchvasitāmburāśiḥ|","paryak pluto viṣakaṣāyavibhīṣaṇormi-","rdhāvan dhanuḥśatamanantabalasya kiṃ tat|| 7"],"meaning":"यमुनाजीका जल साँपके विषके कारण पहलेसे ही खौल रहा था। उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रही थीं। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके कूद पड़नेसे उसका जल और भी उछलने लगा। उस समय तो कालियदहका जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथतक फैल गया। अचिन्त्य अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णके लिये इसमें कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है॥ ७॥"},{"id":"10.16.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/8/","page":239,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य ह्रदे विहरतो भुजदण्डघूर्ण-","वार्घोषमंग वरवारणविक्रमस्य।","आश्रुत्य तत् स्वसदनाभिभवं निरीक्ष्य","चक्षुःश्रवाः समसरत्तदमृष्यमाणः॥ ८"],"iast":["tasya hrade viharato bhujadaṇḍaghūrṇa-","vārghoṣamaṃga varavāraṇavikramasya|","āśrutya tat svasadanābhibhavaṃ nirīkṣya","cakṣuḥśravāḥ samasarattadamṛṣyamāṇaḥ|| 8"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कालियदहमें कूदकर अतुल बलशाली मतवाले गजराजके समान जल उछालने लगे। इस प्रकार जल-क्रीड़ा करनेपर उनकी भुजाओंकी टक्करसे जलमें बड़े जोरका शब्द होने लगा। आँखसे ही सुननेवाले कालिय नागने वह आवाज सुनी और देखा कि कोई मेरे निवासस्थानका तिरस्कार कर रहा है। उसे यह सहन न हुआ। वह चिढ़कर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आ गया॥ ८॥"},{"id":"10.16.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/9/","page":239,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं प्रेक्षणीयसुकुमारघनावदातं","श्रीवत्सपीतवसनं स्मितसुन्दरास्यम्।","क्रीडन्तमप्रतिभयं कमलोदराङ्‌घ्रिं","सन्दश्य मर्मसु रुषा भुजया चछाद॥ ९"],"iast":["taṃ prekṣaṇīyasukumāraghanāvadātaṃ","śrīvatsapītavasanaṃ smitasundarāsyam|","krīḍantamapratibhayaṃ kamalodarāṅghriṃ","sandaśya marmasu ruṣā bhujayā cachāda|| 9"],"meaning":"उसने देखा कि सामने एक साँवला-सलोना बालक है। वर्षाकालीन मेघके समान अत्यन्त सुकुमार शरीर है, उसमें लगकर आँखें हटनेका नाम ही नहीं लेतीं। उसके वक्षःस्थलपर एक सुनहली रेखा—श्रीवत्सका चिह्न है और वह पीले रंगका वस्त्र धारण किये हुए है। बड़े मधुर एवं मनोहर मुखपर मन्द-मन्द मुसकान अत्यन्त शोभायमान हो रही है। चरण इतने सुकुमार और सुन्दर हैं, मानो कमलकी गद्दी हो। इतना आकर्षक रूप होनेपर भी जब कालिय नागने देखा कि बालक तनिक भी न डरकर इस विषैले जलमें मौजसे खेल रहा है, तब उसका क्रोध और भी बढ़ गया। उसने श्रीकृष्णको मर्मस्थानोंमें डँसकर अपने शरीरके बन्धनसे उन्हें जकड़ लिया॥ ९॥"},{"id":"10.16.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/10/","page":239,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं नागभोगपरिवीतमदृष्टचेष्ट-","मालोक्य तत्प्रियसखाः पशुपा भृशार्ताः।","कृष्णेऽर्पितात्मसुहृदर्थकलत्रकामा","दुःखानुशोकभयमूढधियो निपेतुः॥ १०"],"iast":["taṃ nāgabhogaparivītamadṛṣṭaceṣṭa-","mālokya tatpriyasakhāḥ paśupā bhṛśārtāḥ|","kṛṣṇe'rpitātmasuhṛdarthakalatrakāmā","duḥkhānuśokabhayamūḍhadhiyo nipetuḥ|| 10"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण नागपाशमें बँधकर निश्‍चेष्ट हो गये। यह देखकर उनके प्यारे सखा ग्वालबाल बहुत ही पीड़ित हुए और उसी समय दुःख, पश्‍चात्ताप और भयसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। क्योंकि उन्होंने अपने शरीर, सुहृद्, धन-सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, भोग और कामनाएँ—सब कुछ भगवान् श्रीकृष्णको ही समर्पित कर रखा था॥ १०॥"},{"id":"10.16.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/11/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गावो वृषा वत्सतर्यः क्रन्दमानाः सुदुःखिताः।","कृष्णे न्यस्तेक्षणा भीता रुदत्य इव तस्थिरे॥ ११"],"iast":["gāvo vṛṣā vatsataryaḥ krandamānāḥ suduḥkhitāḥ|","kṛṣṇe nyastekṣaṇā bhītā rudatya iva tasthire|| 11"],"meaning":"गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दुःखसे डकराने लगे। श्रीकृष्णकी ओर ही उनकी टकटकी बँध रही थी। वे डरकर इस प्रकार खड़े हो गये, मानो रो रहे हों। उस समय उनका शरीर हिलता-डोलतातक न था॥ ११॥"},{"id":"10.16.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/12/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ व्रजे महोत्पातास्त्रिविधा ह्यतिदारुणाः।","उत्पेतुर्भुवि दिव्यात्मन्यासन्‍नभयशंसिनः॥ १२"],"iast":["atha vraje mahotpātāstrividhā hyatidāruṇāḥ|","utpeturbhuvi divyātmanyāsannabhayaśaṃsinaḥ|| 12"],"meaning":"इधर व्रजमें पृथ्वी, आकाश और शरीरोंमें बड़े भयंकर-भयंकर तीनों प्रकारके उत्पात उठ खड़े हुए, जो इस बातकी सूचना दे रहे थे कि बहुत ही शीघ्र कोई अशुभ घटना घटनेवाली है॥ १२॥"},{"id":"10.16.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/13/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तानालक्ष्य भयोद्वि‌ग्‍ना गोपा नन्दपुरोगमाः।","विना रामेण गाः कृष्णं ज्ञात्वा चारयितुं गतम्॥ १३"],"iast":["tānālakṣya bhayodvignā gopā nandapurogamāḥ|","vinā rāmeṇa gāḥ kṛṣṇaṃ jñātvā cārayituṃ gatam|| 13"],"meaning":"नन्दबाबा आदि गोपोंने पहले तो उन अशकुनोंको देखा और पीछेसे यह जाना कि आज श्रीकृष्ण बिना बलरामके ही गाय चराने चले गये। वे भयसे व्याकुल हो गये॥ १३॥"},{"id":"10.16.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/14/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैर्दुर्निमित्तैर्निधनं मत्वा प्राप्तमतद्विदः।","तत्प्राणास्तन्मनस्कास्ते दुःखशोकभयातुराः॥ १४"],"iast":["tairdurnimittairnidhanaṃ matvā prāptamatadvidaḥ|","tatprāṇāstanmanaskāste duḥkhaśokabhayāturāḥ|| 14"],"meaning":"वे भगवान्‌का प्रभाव नहीं जानते थे। इसीलिये उन अशकुनोंको देखकर उनके मनमें यह बात आयी कि आज तो श्रीकृष्णकी मृत्यु ही हो गयी होगी। वे उसी क्षण दुःख, शोक और भयसे आतुर हो गये। क्यों न हों, श्रीकृष्ण ही उनके प्राण, मन और सर्वस्व जो थे॥ १४॥"},{"id":"10.16.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/15/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आबालवृद्धवनिताः सर्वेऽङ्ग पशुवृत्तयः।","निर्जग्मुर्गोकुलाद् दीनाः कृष्णदर्शनलालसाः॥ १५"],"iast":["ābālavṛddhavanitāḥ sarve'ṅga paśuvṛttayaḥ|","nirjagmurgokulād dīnāḥ kṛṣṇadarśanalālasāḥ|| 15"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! व्रजके बालक, वृद्ध और स्त्रियोंका स्वभाव गायों-जैसा ही वात्सल्यपूर्ण था। वे मनमें ऐसी बात आते ही अत्यन्त दीन हो गये और अपने प्यारे कन्हैयाको देखनेकी उत्कट लालसासे घर-द्वार छोड़कर निकल पड़े॥ १५॥"},{"id":"10.16.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/16/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तांस्तथा कातरान् वीक्ष्य भगवान् माधवो बलः।","प्रहस्य किंचिन्‍नोवाच प्रभावज्ञोऽनुजस्य सः॥ १६"],"iast":["tāṃstathā kātarān vīkṣya bhagavān mādhavo balaḥ|","prahasya kiṃcinnovāca prabhāvajño'nujasya saḥ|| 16"],"meaning":"बलरामजी स्वयं भगवान्‌के स्वरूप और सर्वशक्तिमान् हैं। उन्होंने जब व्रजवासियोंको इतना कातर और इतना आतुर देखा, तब उन्हें हँसी आ गयी। परन्तु वे कुछ बोले नहीं, चुप ही रहे। क्योंकि वे अपने छोटे भाई श्रीकृष्णका प्रभाव भलीभाँति जानते थे॥ १६॥"},{"id":"10.16.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/17/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेऽन्वेषमाणा दयितं कृष्णं सूचितया पदैः।","भगवल्लक्षणैर्जग्मुः पदव्या यमुनातटम्॥ १७"],"iast":["te'nveṣamāṇā dayitaṃ kṛṣṇaṃ sūcitayā padaiḥ|","bhagavallakṣaṇairjagmuḥ padavyā yamunātaṭam|| 17"],"meaning":"व्रजवासी अपने प्यारे श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगे। कोई अधिक कठिनाई न हुई; क्योंकि मार्गमें उन्हें भगवान्‌के चरणचिह्न मिलते जाते थे। जौ, कमल, अंकुश आदिसे युक्त होनेके कारण उन्हें पहचान होती जाती थी। इस प्रकार वे यमुना-तटकी ओर जाने लगे॥ १७॥"},{"id":"10.16.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/18/","page":240,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते तत्र तत्राब्जयवांकुशाशनि-","ध्वजोपपन्‍नानि पदानि विश्पतेः।","मार्गे गवामन्यपदान्तरान्तरे","निरीक्षमाणा ययुरंग सत्वराः॥ १८"],"iast":["te tatra tatrābjayavāṃkuśāśani-","dhvajopapannāni padāni viśpateḥ|","mārge gavāmanyapadāntarāntare","nirīkṣamāṇā yayuraṃga satvarāḥ|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! मार्गमें गौओं और दूसरोंके चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें भगवान्‌के चरणचिह्न भी दीख जाते थे। उनमें कमल, जौ, अंकुश, वज्र और ध्वजाके चिह्न बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए वे बहुत शीघ्रतासे चले॥ १८॥"},{"id":"10.16.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/19/","page":241,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तर्ह्रदे भुजगभोगपरीतमारात्","कृष्णं निरीहमुपलभ्य जलाशयान्ते।","गोपांश्‍च मूढधिषणान् परितः पशूंश्‍च","संक्रन्दतः परमकश्मलमापुरार्ताः॥ १९"],"iast":["antarhrade bhujagabhogaparītamārāt","kṛṣṇaṃ nirīhamupalabhya jalāśayānte|","gopāṃśca mūḍhadhiṣaṇān paritaḥ paśūṃśca","saṃkrandataḥ paramakaśmalamāpurārtāḥ|| 19"],"meaning":"उन्होंने दूरसे ही देखा कि कालियदहमें कालिय नागके शरीरसे बँधे हुए श्रीकृष्ण चेष्टाहीन हो रहे हैं। कुण्डके किनारेपर ग्वालबाल अचेत हुए पड़े हैं और गौएँ, बैल, बछड़े आदि बड़े आर्तस्वरसे डकरा रहे हैं। यह सब देखकर वे सब गोप अत्यन्त व्याकुल और अन्तमें मूर्च्छित हो गये॥ १९॥"},{"id":"10.16.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/20/","page":241,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्योऽनुरक्तमनसो भगवत्यनन्ते","तत्सौहृदस्मितविलोकगिरः स्मरन्त्यः।","ग्रस्तेऽहिना प्रियतमे भृशदुःखतप्ताः","शून्यं प्रियव्यतिहृतं ददृशुस्त्रिलोकम्॥ २०"],"iast":["gopyo'nuraktamanaso bhagavatyanante","tatsauhṛdasmitavilokagiraḥ smarantyaḥ|","graste'hinā priyatame bhṛśaduḥkhataptāḥ","śūnyaṃ priyavyatihṛtaṃ dadṛśustrilokam|| 20"],"meaning":"गोपियोंका मन अनन्त गुणगणनिलय भगवान् श्रीकृष्णके प्रेमके रंगमें रँगा हुआ था। वे तो नित्य-निरन्तर भगवान्‌के सौहार्द, उनकी मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन तथा मीठी वाणीका ही स्मरण करती रहती थीं। जब उन्होंने देखा कि हमारे प्रियतम श्यामसुन्दरको काले साँपने जकड़ रखा है, तब तो उनके हृदयमें बड़ा ही दुःख और बड़ी ही जलन हुई। अपने प्राणवल्लभ जीवनसर्वस्वके बिना उन्हें तीनों लोक सूने दीखने लगे॥ २०॥"},{"id":"10.16.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/21/","page":241,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताः कृष्णमातरमपत्यमनुप्रविष्टां","तुल्यव्यथाः समनुगृह्य शुचः स्रवन्त्यः।","तास्ता व्रजप्रियकथाः कथयन्त्य आसन्","कृष्णाननेऽर्पितदृशो मृतकप्रतीकाः॥ २१"],"iast":["tāḥ kṛṣṇamātaramapatyamanupraviṣṭāṃ","tulyavyathāḥ samanugṛhya śucaḥ sravantyaḥ|","tāstā vrajapriyakathāḥ kathayantya āsan","kṛṣṇānane'rpitadṛśo mṛtakapratīkāḥ|| 21"],"meaning":"माता यशोदा तो अपने लाड़ले लालके पीछे कालियदहमें कूदने ही जा रही थीं; परन्तु गोपियोंने उन्हें पकड़ लिया। उनके हृदयमें भी वैसी ही पीड़ा थी। उनकी आँखोंसे भी आँसुओंकी झड़ी लगी हुई थी। सबकी आँखें श्रीकृष्णके मुखकमलपर लगी थीं। जिनके शरीरमें चेतना थी, वे व्रजमोहन श्रीकृष्णकी पूतना-वध आदिकी प्यारी-प्यारी ऐश्‍वर्यकी लीलाएँ कह-कहकर यशोदाजीको धीरज बँधाने लगीं। किन्तु अधिकांश तो मुर्देकी तरह पड़ ही गयी थीं॥ २१॥"},{"id":"10.16.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/22/","page":241,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णप्राणान्‍निर्विशतो नन्दादीन् वीक्ष्य तं ह्रदम्।","प्रत्यषेधत् स भगवान् रामः कृष्णानुभाववित्॥ २२"],"iast":["kṛṣṇaprāṇānnirviśato nandādīn vīkṣya taṃ hradam|","pratyaṣedhat sa bhagavān rāmaḥ kṛṣṇānubhāvavit|| 22"],"meaning":"परीक्षित्! नन्दबाबा आदिके जीवन-प्राण तो श्रीकृष्ण ही थे। वे श्रीकृष्णके लिये कालियदहमें घुसने लगे। यह देखकर श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेवाले भगवान् बलरामजीने किन्हींको समझा-बुझाकर, किन्हींको बलपूर्वक और किन्हींको उनके हृदयोंमें प्रेरणा करके रोक दिया॥ २२॥"},{"id":"10.16.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/23/","page":241,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं स्वगोकुलमनन्यगतिं निरीक्ष्य","सस्त्रीकुमारमतिदुःखितमात्महेतोः।","आज्ञाय मर्त्यपदवीमनुवर्तमानः","स्थित्वा मुहूर्तमुदतिष्ठदुरंगबन्धात्॥ २३"],"iast":["itthaṃ svagokulamananyagatiṃ nirīkṣya","sastrīkumāramatiduḥkhitamātmahetoḥ|","ājñāya martyapadavīmanuvartamānaḥ","sthitvā muhūrtamudatiṣṭhaduraṃgabandhāt|| 23"],"meaning":"परीक्षित्! यह साँपके शरीरसे बँध जाना तो श्रीकृष्णकी मनुष्यों-जैसी एक लीला थी। जब उन्होंने देखा कि व्रजके सभी लोग स्त्री और बच्चोंके साथ मेरे लिये इस प्रकार अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं और सचमुच मेरे सिवा इनका कोई दूसरा सहारा भी नहीं है, तब वे एक मुहूर्ततक सर्पके बन्धनमें रहकर बाहर निकल आये॥ २३॥"},{"id":"10.16.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/24/","page":242,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्प्रथ्यमानवपुषा व्यथितात्मभोग-","स्त्यक्त्वोन्‍नमय्य कुपितः स्वफणान् भुजंगः।","तस्थौ श्‍वसञ्छ्वसनरन्ध्रविषाम्बरीष-","स्तब्धेक्षणोल्मुकमुखो हरिमीक्षमाणः॥ २४"],"iast":["tatprathyamānavapuṣā vyathitātmabhoga-","styaktvonnamayya kupitaḥ svaphaṇān bhujaṃgaḥ|","tasthau śvasañchvasanarandhraviṣāmbarīṣa-","stabdhekṣaṇolmukamukho harimīkṣamāṇaḥ|| 24"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपना शरीर फुलाकर खूब मोटा कर लिया। इससे साँपका शरीर टूटने लगा। वह अपना नागपाश छोड़कर अलग खड़ा हो गया और क्रोधसे आग बबूला हो अपने फण ऊँचा करके फुफकारें मारने लगा। घात मिलते ही श्रीकृष्णपर चोट करनेके लिये वह उनकी ओर टकटकी लगाकर देखने लगा। उस समय उसके नथुनोंसे विषकी फुहारें निकल रही थीं। उसकी आँखें स्थिर थीं और इतनी लाल-लाल हो रही थीं, मानो भट्ठीपर तपाया हुआ खपड़ा हो। उसके मुँहसे आगकी लपटें निकल रही थीं॥ २४॥"},{"id":"10.16.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/25/","page":242,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं जिह्वया द्विशिखया परिलेलिहानं","द्वे सृक्किणी ह्यतिकरालविषाग्‍निदृष्टिम्।","क्रीडन्‍नमुं परिससार यथा खगेन्द्रो","बभ्राम सोऽप्यवसरं प्रसमीक्षमाणः॥ २५"],"iast":["taṃ jihvayā dviśikhayā parilelihānaṃ","dve sṛkkiṇī hyatikarālaviṣāgnidṛṣṭim|","krīḍannamuṃ parisasāra yathā khagendro","babhrāma so'pyavasaraṃ prasamīkṣamāṇaḥ|| 25"],"meaning":"उस समय कालिय नाग अपनी दुहरी जीभ लपलपाकर अपने होठोंके दोनों किनारोंको चाट रहा था और अपनी कराल आँखोंसे विषकी ज्वाला उगलता जा रहा था। अपने वाहन गरुड़के समान भगवान् श्रीकृष्ण उसके साथ खेलते हुए पैंतरा बदलने लगे और वह साँप भी उनपर चोट करनेका दाँव देखता हुआ पैंतरा बदलने लगा॥ २५॥"},{"id":"10.16.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/26/","page":242,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं परिभ्रमहतौजसमुन्‍नतांस-","मानम्य तत्पृथुशिरस्स्वधिरूढ आद्यः।","तन्मूर्धरत्‍ननिकरस्पर्शातिताम्र-","पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥ २६"],"iast":["evaṃ paribhramahataujasamunnatāṃsa-","mānamya tatpṛthuśirassvadhirūḍha ādyaḥ|","tanmūrdharatnanikarasparśātitāmra-","pādāmbujo'khilakalādigururnanarta || 26"],"meaning":"इस प्रकार पैंतरा बदलते-बदलते उसका बल क्षीण हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्णने उसके बड़े-बड़े सिरोंको तनिक दबा दिया और उछलकर उनपर सवार हो गये। कालिय नागके मस्तकोंपर बहुत-सी लाल-लाल मणियाँ थीं। उनके स्पर्शसे भगवान्‌के सुकुमार तलुओंकी लालिमा और भी बढ़ गयी। नृत्य-गान आदि समस्त कलाओंके आदिप्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण उसके सिरोंपर कलापूर्ण नृत्य करने लगे॥ २६॥"},{"id":"10.16.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/27/","page":242,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं नर्तुमुद्यतमवेक्ष्य तदा तदीय-","गन्धर्वसिद्धसुरचारणदेववध्वः ।","प्रीत्या मृदंगपणवानकवाद्यगीत-","पुष्पोपहारनुतिभिः सहसोपसेदुः॥ २७"],"iast":["taṃ nartumudyatamavekṣya tadā tadīya-","gandharvasiddhasuracāraṇadevavadhvaḥ |","prītyā mṛdaṃgapaṇavānakavādyagīta-","puṣpopahāranutibhiḥ sahasopaseduḥ|| 27"],"meaning":"भगवान्‌के प्यारे भक्त गन्धर्व, सिद्ध, देवता, चारण और देवांगनाओंने जब देखा कि भगवान् नृत्य करना चाहते हैं, तब वे बड़े प्रेमसे मृदंग, ढोल, नगारे आदि बाजे बजाते हुए, सुन्दर-सुन्दर गीत गाते हुए, पुष्पोंकी वर्षा करते हुए और अपनेको निछावर करते हुए भेंट ले-लेकर उसी समय भगवान्‌के पास आ पहुँचे॥ २७॥"},{"id":"10.16.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/28/","page":242,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद् यच्छिरो न नमतेऽङ्ग शतैकशीर्ष्ण-","स्तत्तन् ममर्द खरदण्डधरोऽङ्‌घ्रिपातैः।","क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोऽसृङ्","नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नागः॥ २८"],"iast":["yad yacchiro na namate'ṅga śataikaśīrṣṇa-","stattan mamarda kharadaṇḍadharo'ṅghripātaiḥ|","kṣīṇāyuṣo bhramata ulbaṇamāsyato'sṛṅ","nasto vaman paramakaśmalamāpa nāgaḥ|| 28"],"meaning":"परीक्षित्! कालिय नागके एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस सिरको नहीं झुकाता था, उसीको प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरोंकी चोटसे कुचल डालते। इससे कालिय नागकी जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुँह और नथुनोंसे खून उगलने लगा। अन्तमें चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया॥ २८॥"},{"id":"10.16.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/29/","page":243,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्याक्षिभिर्गरलमुद्वमतः शिरस्सु","यद् यत् समुन्‍नमति निःश्‍वसतो रुषोच्चैः।","नृत्यन् पदानुनमयन् दमयाम्बभूव","पुष्पैः प्रपूजित इवेह पुमान् पुराणः॥ २९"],"iast":["tasyākṣibhirgaralamudvamataḥ śirassu","yad yat samunnamati niḥśvasato ruṣoccaiḥ|","nṛtyan padānunamayan damayāmbabhūva","puṣpaiḥ prapūjita iveha pumān purāṇaḥ|| 29"],"meaning":"तनिक भी चेत होता तो वह अपनी आँखोंसे विष उगलने लगता और क्रोधके मारे जोर-जोरसे फुफकारें मारने लगता। इस प्रकार वह अपने सिरोंमेंसे जिस सिरको ऊपर उठाता, उसीको नाचते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणोंकी ठोकरसे झुकाकर रौंद डालते। उस समय पुराण-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर जो खूनकी बूँदें पड़ती थीं, उनसे ऐसा मालूम होता, मानो रक्त-पुष्पोंसे उनकी पूजा की जा रही हो॥ २९॥"},{"id":"10.16.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/30/","page":243,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रो","रक्तं मुखैरुरु वमन् नृप भ‌ग्‍नगात्रः।","स्मृत्वा चराचरगुरुं पुरुषं पुराणं","नारायणं तमरणं मनसा जगाम॥ ३०"],"iast":["taccitratāṇḍavavirugṇaphaṇātapatro","raktaṃ mukhairuru vaman nṛpa bhagnagātraḥ|","smṛtvā carācaraguruṃ puruṣaṃ purāṇaṃ","nārāyaṇaṃ tamaraṇaṃ manasā jagāma|| 30"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के इस अद्भुत ताण्डव-नृत्यसे कालियके फणरूप छत्ते छिन्‍न-भिन्‍न हो गये। उसका एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँहसे खूनकी उलटी होने लगी। अब उसे सारे जगत‍्के आदिशिक्षक पुराणपुरुष भगवान् नारायणकी स्मृति हुई। वह मन-ही-मन भगवान्‌की शरणमें गया॥ ३०॥"},{"id":"10.16.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/31/","page":243,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्‍नं","पार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम्।","दृष्ट्वाहिमाद्यमुपसेदुरमुष्य पत्‍न्य","आर्ताः श्‍लथद्वसनभूषणकेशबन्धाः॥ ३१"],"iast":["kṛṣṇasya garbhajagato'tibharāvasannaṃ","pārṣṇiprahāraparirugṇaphaṇātapatram|","dṛṣṭvāhimādyamupaseduramuṣya patnya","ārtāḥ ślathadvasanabhūṣaṇakeśabandhāḥ|| 31"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके उदरमें सम्पूर्ण विश्‍व है। इसलिये उनके भारी बोझसे कालिय नागके शरीरकी एक-एक गाँठ ढीली पड़ गयी। उनकी एड़ियोंकी चोटसे उसके छत्रके समान फण छिन्‍न-भिन्‍न हो गये। अपने पतिकी यह दशा देखकर उसकी पत्‍नियाँ भगवान्‌की शरणमें आयीं। वे अत्यन्त आतुर हो रही थीं। भयके मारे उनके वस्त्राभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे थे और केशकी चोटियाँ भी बिखर रही थीं॥ ३१॥"},{"id":"10.16.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/32/","page":243,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तास्तं सुवि‌ग्‍नमनसोऽथ पुरस्कृतार्भाः","कायं निधाय भुवि भूतपतिं प्रणेमुः।","साध्व्यः कृतांजलिपुटाः शमलस्य भर्तु-","र्मोक्षेप्सवः शरणदं शरणं प्रपन्‍नाः॥ ३२"],"iast":["tāstaṃ suvignamanaso'tha puraskṛtārbhāḥ","kāyaṃ nidhāya bhuvi bhūtapatiṃ praṇemuḥ|","sādhvyaḥ kṛtāṃjalipuṭāḥ śamalasya bhartu-","rmokṣepsavaḥ śaraṇadaṃ śaraṇaṃ prapannāḥ|| 32"],"meaning":"उस समय उन साध्वी नागपत्‍नियोंके चित्तमें बड़ी घबराहट थी। अपने बालकोंको आगे करके वे पृथ्वीपर लोट गयीं और हाथ जोड़कर उन्होंने समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया। भगवान् श्रीकृष्णको शरणागतवत्सल जानकर अपने अपराधी पतिको छुड़ानेकी इच्छासे उन्होंने उनकी शरण ग्रहण की॥ ३२॥"},{"id":"10.16.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/33/","page":243,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["न्याय्यो हि दण्डः कृतकिल्बिषेऽस्मिं-","स्तवावतारः खलनिग्रहाय।","रिपोः सुतानामपि तुल्यदृष्टे-","र्धत्से दमं फलमेवानुशंसन्॥ ३३"],"iast":["nyāyyo hi daṇḍaḥ kṛtakilbiṣe'smiṃ-","stavāvatāraḥ khalanigrahāya|","ripoḥ sutānāmapi tulyadṛṣṭe-","rdhatse damaṃ phalamevānuśaṃsan|| 33"],"meaning":"नागपत्‍नियोंने कहा—प्रभो! आपका यह अवतार ही दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये हुआ है। इसलिये इस अपराधीको दण्ड देना सर्वथा उचित है। आपकी दृष्टिमें शत्रु और पुत्रका कोई भेदभाव नहीं है। इसलिये आप जो किसीको दण्ड देते हैं, वह उसके पापोंका प्रायश्‍चित्त कराने और उसका परम कल्याण करनेके लिये ही॥ ३३॥"},{"id":"10.16.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/34/","page":244,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["अनुग्रहोऽयं भवतः कृतो हि नो","दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः।","यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः","क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः॥ ३४"],"iast":["anugraho'yaṃ bhavataḥ kṛto hi no","daṇḍo'satāṃ te khalu kalmaṣāpahaḥ|","yad dandaśūkatvamamuṣya dehinaḥ","krodho'pi te'nugraha eva sammataḥ|| 34"],"meaning":"आपने हमलोगोंपर यह बड़ा ही अनुग्रह किया। यह तो आपका कृपा-प्रसाद ही है। क्योंकि आप जो दुष्टोंको दण्ड देते हैं, उससे उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस सर्पके अपराधी होनेमें तो कोई सन्देह ही नहीं है। यदि यह अपराधी न होता तो इसे सर्पकी योनि ही क्यों मिलती? इसलिये हम सच्चे हृदयसे आपके इस क्रोधको भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं॥ ३४॥"},{"id":"10.16.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/35/","page":244,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["तपः सुतप्तं किमनेन पूर्वं","निरस्तमानेन च मानदेन।","धर्मोऽथ वा सर्वजनानुकम्पया","यतो भवांस्तुष्यति सर्वजीवः॥ ३५"],"iast":["tapaḥ sutaptaṃ kimanena pūrvaṃ","nirastamānena ca mānadena|","dharmo'tha vā sarvajanānukampayā","yato bhavāṃstuṣyati sarvajīvaḥ|| 35"],"meaning":"अवश्य ही पूर्वजन्ममें इसने स्वयं मानरहित होकर और दूसरोंका सम्मान करते हुए कोई बहुत बड़ी तपस्या की है। अथवा सब जीवोंपर दया करते हुए इसने कोई बहुत बड़ा धर्म किया है तभी तो आप इसके ऊपर सन्तुष्ट हुए हैं। क्योंकि सर्व-जीवस्वरूप आपकी प्रसन्‍नताका यही उपाय है॥ ३५॥"},{"id":"10.16.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/36/","page":244,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे","तवाङ्‌घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः ।","यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपो","विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ ३६"],"iast":["kasyānubhāvo'sya na deva vidmahe","tavāṅghrireṇusparśādhikāraḥ |","yadvāñchayā śrīrlalanā''carattapo","vihāya kāmān suciraṃ dhṛtavratā|| 36"],"meaning":"भगवन्! हम नहीं समझ पातीं कि यह इसकी किस साधनाका फल है, जो यह आपके चरणकमलोंकी धूलका स्पर्श पानेका अधिकारी हुआ है। आपके चरणोंकी रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिये आपकी अर्द्धांगिनी लक्ष्मीजीको भी बहुत दिनोंतक समस्त भोगोंका त्याग करके नियमोंका पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी॥ ३६॥"},{"id":"10.16.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/37/","page":244,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं","न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम्।","न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा","वाञ्छन्ति यत्पादरजःप्रपन्‍नाः॥ ३७"],"iast":["na nākapṛṣṭhaṃ na ca sārvabhaumaṃ","na pārameṣṭhyaṃ na rasādhipatyam|","na yogasiddhīrapunarbhavaṃ vā","vāñchanti yatpādarajaḥprapannāḥ|| 37"],"meaning":"प्रभो! जो आपके चरणोंकी धूलकी शरण ले लेते हैं, वे भक्तजन स्वर्गका राज्य या पृथ्वीकी बादशाही नहीं चाहते। न वे रसातलका ही राज्य चाहते और न तो ब्रह्माका पद ही लेना चाहते हैं। उन्हें अणिमादि योग-सिद्धियोंकी भी चाह नहीं होती। यहाँतक कि वे जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले कैवल्य-मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते॥ ३७॥"},{"id":"10.16.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/38/","page":244,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["तदेष नाथाप दुरापमन्यै-","स्तमोजनिः क्रोधवशोऽप्यहीशः।","संसारचक्रे भ्रमतः शरीरिणो","यदिच्छतः स्याद् विभवः समक्षः॥ ३८"],"iast":["tadeṣa nāthāpa durāpamanyai-","stamojaniḥ krodhavaśo'pyahīśaḥ|","saṃsāracakre bhramataḥ śarīriṇo","yadicchataḥ syād vibhavaḥ samakṣaḥ|| 38"],"meaning":"स्वामी! यह नागराज तमोगुणी योनिमें उत्पन्‍न हुआ है और अत्यन्त क्रोधी है। फिर भी इसे आपकी वह परम पवित्र चरणरज प्राप्त हुई, जो दूसरोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है; तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छा-मात्रसे ही संसारचक्रमें पड़े हुए जीवको संसारके वैभव-सम्पत्तिकी तो बात ही क्या—मोक्षकी भी प्राप्ति हो जाती है॥ ३८॥"},{"id":"10.16.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/39/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने।","भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने॥ ३९"],"iast":["namastubhyaṃ bhagavate puruṣāya mahātmane|","bhūtāvāsāya bhūtāya parāya paramātmane|| 39"],"meaning":"प्रभो! हम आपको प्रणाम करती हैं। आप अनन्त एवं अचिन्त्य ऐश्‍वर्यके नित्य निधि हैं। आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान होनेपर भी अनन्त हैं। आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके आश्रय तथा सब पदार्थोंके रूपमें भी विद्यमान हैं। आप प्रकृतिसे परे स्वयं परमात्मा हैं॥ ३९॥"},{"id":"10.16.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/40/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।","अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च॥ ४०"],"iast":["jñānavijñānanidhaye brahmaṇe'nantaśaktaye|","aguṇāyāvikārāya namaste'prākṛtāya ca|| 40"],"meaning":"आप सब प्रकारके ज्ञान और अनुभवोंके खजाने हैं। आपकी महिमा और शक्ति अनन्त है। आपका स्वरूप अप्राकृत—दिव्य चिन्मय है, प्राकृतिक गुणों एवं विकारोंका आप कभी स्पर्श ही नहीं करते। आप ही ब्रह्म हैं, हम आपको नमस्कार कर रही हैं॥ ४०॥"},{"id":"10.16.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/41/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे।","विश्‍वाय तदुपद्रष्ट्रे तत्कर्त्रे विश्‍वहेतवे॥ ४१"],"iast":["kālāya kālanābhāya kālāvayavasākṣiṇe|","viśvāya tadupadraṣṭre tatkartre viśvahetave|| 41"],"meaning":"आप प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाले काल हैं, कालशक्तिके आश्रय हैं और कालके क्षण-कल्प आदि समस्त अवयवोंके साक्षी हैं। आप विश्‍वरूप होते हुए भी उससे अलग रहकर उसके द्रष्टा हैं। आप उसके बनानेवाले निमित्तकारण तो हैं ही, उसके रूपमें बननेवाले उपादानकारण भी हैं॥ ४१॥"},{"id":"10.16.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/42/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोबुद्ध्याशयात्मने ।","त्रिगुणेनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये॥ ४२"],"iast":["bhūtamātrendriyaprāṇamanobuddhyāśayātmane |","triguṇenābhimānena gūḍhasvātmānubhūtaye|| 42"],"meaning":"प्रभो! पंचभूत, उनकी तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और इन सबका खजाना चित्त—ये सब आप ही हैं। तीनों गुण और उनके कार्योंमें होनेवाले अभिमानके द्वारा आपने अपने साक्षात्कारको छिपा रखा है॥ ४२॥"},{"id":"10.16.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/43/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय कूटस्थाय विपश्‍चिते।","नानावादानुरोधाय वाच्यवाचकशक्तये॥ ४३"],"iast":["namo'nantāya sūkṣmāya kūṭasthāya vipaścite|","nānāvādānurodhāya vācyavācakaśaktaye|| 43"],"meaning":"आप देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे बाहर—अनन्त हैं। सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और कार्य-कारणोंके समस्त विकारोंमें भी एकरस, विकाररहित और सर्वज्ञ हैं। ईश्‍वर हैं कि नहीं हैं, सर्वज्ञ हैं कि अल्पज्ञ इत्यादि अनेक मतभेदोंके अनुसार आप उन-उन मतवादियोंको उन्हीं-उन्हीं रूपोंमें दर्शन देते हैं। समस्त शब्दोंके अर्थके रूपमें तो आप हैं ही, शब्दोंके रूपमें भी हैं तथा उन दोनोंका सम्बन्ध जोड़नेवाली शक्ति भी आप ही हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४३॥"},{"id":"10.16.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/44/","page":245,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["नमः प्रमाणमूलाय कवये शास्त्रयोनये।","प्रवृत्ताय निवृत्ताय निगमाय नमो नमः॥ ४४"],"iast":["namaḥ pramāṇamūlāya kavaye śāstrayonaye|","pravṛttāya nivṛttāya nigamāya namo namaḥ|| 44"],"meaning":"प्रत्यक्ष-अनुमान आदि जितने भी प्रमाण हैं, उनको प्रमाणित करनेवाले मूल आप ही हैं। समस्त शास्त्र आपसे ही निकले हैं और आपका ज्ञान स्वतःसिद्ध है। आप ही मनको लगानेकी विधिके रूपमें और उसको सब कहींसे हटा लेनेकी आज्ञाके रूपमें प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग हैं। इन दोनोंके मूल वेद भी स्वयं आप ही हैं। हम आपको बार-बार नमस्कार करती हैं॥ ४४॥"},{"id":"10.16.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/45/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["नमः कृष्णाय रामाय वसुदेवसुताय च।","प्रद्युम्‍नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः॥ ४५"],"iast":["namaḥ kṛṣṇāya rāmāya vasudevasutāya ca|","pradyumnāyāniruddhāya sātvatāṃ pataye namaḥ|| 45"],"meaning":"आप शुद्धसत्त्वमय वसुदेवके पुत्र वासुदेव, संकर्षण एवं प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध भी हैं। इस प्रकार चतुर्व्यूहके रूपमें आप भक्तों तथा यादवोंके स्वामी हैं। श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४५॥"},{"id":"10.16.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/46/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च।","गुणवृत्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्रे स्वसंविदे॥ ४६"],"iast":["namo guṇapradīpāya guṇātmacchādanāya ca|","guṇavṛttyupalakṣyāya guṇadraṣṭre svasaṃvide|| 46"],"meaning":"आप अन्तःकरण और उसकी वृत्तियोंके प्रकाशक हैं और उन्हींके द्वारा अपने-आपको ढक रखते हैं। उन अन्तःकरण और वृत्तियोंके द्वारा ही आपके स्वरूपका कुछ-कुछ संकेत भी मिलता है। आप उन गुणों और उनकी वृत्तियोंके साक्षी तथा स्वयंप्रकाश हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४६॥"},{"id":"10.16.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/47/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["अव्याकृतविहाराय सर्वव्याकृतसिद्धये।","हृषीकेश नमस्तेऽस्तु मुनये मौनशीलिने॥ ४७"],"iast":["avyākṛtavihārāya sarvavyākṛtasiddhaye|","hṛṣīkeśa namaste'stu munaye maunaśīline|| 47"],"meaning":"आप मूलप्रकृतिमें नित्य विहार करते रहते हैं। समस्त स्थूल और सूक्ष्म जगत‍्की सिद्धि आपसे ही होती है। हृषीकेश! आप मननशील आत्माराम हैं। मौन ही आपका स्वभाव है। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४७॥"},{"id":"10.16.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/48/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः।","अविश्‍वाय च विश्‍वाय तद‍्द्रष्ट्रेऽस्य च हेतवे॥ ४८"],"iast":["parāvaragatijñāya sarvādhyakṣāya te namaḥ|","aviśvāya ca viśvāya taddraṣṭre'sya ca hetave|| 48"],"meaning":"आप स्थूल, सूक्ष्म समस्त गतियोंके जाननेवाले तथा सबके साक्षी हैं। आप नामरूपात्मक विश्‍वप्रपंचके निषेधकी अवधि तथा उसके अधिष्ठान होनेके कारण विश्‍वरूप भी हैं। आप विश्‍वके अध्यास तथा अपवादके साक्षी हैं एवं अज्ञानके द्वारा उसकी सत्यत्वभ्रान्ति एवं स्वरूपज्ञानके द्वारा उसकी आत्यन्तिक निवृत्तिके भी कारण हैं। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४८॥"},{"id":"10.16.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/49/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् प्रभो","गुणैरनीहोऽकृत कालशक्तिधृक्।","तत्तत्स्वभावान् प्रतिबोधयन् सतः","समीक्षयामोघविहार ईहसे॥ ४९"],"iast":["tvaṃ hyasya janmasthitisaṃyamān prabho","guṇairanīho'kṛta kālaśaktidhṛk|","tattatsvabhāvān pratibodhayan sataḥ","samīkṣayāmoghavihāra īhase|| 49"],"meaning":"प्रभो! यद्यपि कर्तापन न होनेके कारण आप कोई भी कर्म नहीं करते, निष्क्रिय हैं—तथापि अनादि कालशक्तिको स्वीकार करके प्रकृतिके गुणोंके द्वारा आप इस विश्‍वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं। क्योंकि आपकी लीलाएँ अमोघ हैं। आप सत्यसंकल्प हैं। इसलिये जीवोंके संस्काररूपसे छिपे हुए स्वभावोंको अपनी दृष्टिसे जाग्रत् कर देते हैं॥ ४९॥"},{"id":"10.16.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/50/","page":246,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां","शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः।","शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनावितुं सतां","स्थातुश्‍च ते धर्मपरीप्सयेहतः॥ ५०"],"iast":["tasyaiva te'mūstanavastrilokyāṃ","śāntā aśāntā uta mūḍhayonayaḥ|","śāntāḥ priyāste hyadhunāvituṃ satāṃ","sthātuśca te dharmaparīpsayehataḥ|| 50"],"meaning":"त्रिलोकीमें तीन प्रकारकी योनियाँ हैं—सत्त्वगुणप्रधान शान्त, रजोगुणप्रधान अशान्त और तमोगुणप्रधान मूढ। वे सब-की-सब आपकी लीला-मूर्तियाँ हैं। फिर भी इस समय आपको सत्त्वगुणप्रधान शान्तजन ही विशेष प्रिय हैं। क्योंकि आपका यह अवतार और ये लीलाएँ साधुजनोंकी रक्षा तथा धर्मकी रक्षा एवं विस्तारके लिये ही हैं॥ ५०॥"},{"id":"10.16.51","number":51,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/51/","page":247,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["अपराधः सकृद् भर्त्रा सोढव्यः स्वप्रजाकृतः।","क्षन्तुमर्हसि शान्तात्मन् मूढस्य त्वामजानतः॥ ५१"],"iast":["aparādhaḥ sakṛd bhartrā soḍhavyaḥ svaprajākṛtaḥ|","kṣantumarhasi śāntātman mūḍhasya tvāmajānataḥ|| 51"],"meaning":"शान्तात्मन्! स्वामीको एक बार अपनी प्रजाका अपराध सह लेना चाहिये। यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिये इसे क्षमा कर दीजिये॥ ५१॥"},{"id":"10.16.52","number":52,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/52/","page":247,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["अनुगृह्णीष्व भगवन् प्राणांस्त्यजति पन्‍नगः।","स्त्रीणां नः साधुशोच्यानां पतिः प्राणः प्रदीयताम्॥ ५२"],"iast":["anugṛhṇīṣva bhagavan prāṇāṃstyajati pannagaḥ|","strīṇāṃ naḥ sādhuśocyānāṃ patiḥ prāṇaḥ pradīyatām|| 52"],"meaning":"भगवन्! कृपा कीजिये; अब यह सर्प मरने ही वाला है। साधुपुरुष सदासे ही हम अबलाओंपर दया करते आये हैं। अतः आप हमें हमारे प्राणस्वरूप पतिदेवको दे दीजिये॥ ५२॥"},{"id":"10.16.53","number":53,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/53/","page":247,"speaker":"नागपत्‍न्य ऊचुः","sanskrit":["विधेहि ते किंकरीणामनुष्ठेयं तवाज्ञया।","यच्छ्रद्धयानुतिष्ठन् वै मुच्यते सर्वतोभयात्॥ ५३"],"iast":["vidhehi te kiṃkarīṇāmanuṣṭheyaṃ tavājñayā|","yacchraddhayānutiṣṭhan vai mucyate sarvatobhayāt|| 53"],"meaning":"हम आपकी दासी हैं। हमें आप आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें? क्योंकि जो श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाओंका पालन—आपकी सेवा करता है, वह सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ५३॥"},{"id":"10.16.54","number":54,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/54/","page":247,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं स नागपत्‍नीभिर्भगवान् समभिष्टुतः।","मूर्च्छितं भ‌ग्‍नशिरसं विससर्जाङ्‌घ्रिकुट्टनैः॥ ५४"],"iast":["itthaṃ sa nāgapatnībhirbhagavān samabhiṣṭutaḥ|","mūrcchitaṃ bhagnaśirasaṃ visasarjāṅghrikuṭṭanaiḥ|| 54"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्‍न-भिन्‍न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्‍नियोंने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया॥ ५४॥"},{"id":"10.16.55","number":55,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/55/","page":247,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रतिलब्धेन्द्रियप्राणः कालियः शनकैर्हरिम्।","कृच्छ्रात् समुच्छ्वसन् दीनः कृष्णं प्राह कृतांजलिः॥ ५५"],"iast":["pratilabdhendriyaprāṇaḥ kāliyaḥ śanakairharim|","kṛcchrāt samucchvasan dīnaḥ kṛṣṇaṃ prāha kṛtāṃjaliḥ|| 55"],"meaning":"धीरे-धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनतासे श्‍वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला॥ ५५॥"},{"id":"10.16.56","number":56,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/56/","page":247,"speaker":"कालिय उवाच","sanskrit":["वयं खलाः सहोत्पत्त्या तामसा दीर्घमन्यवः।","स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः॥ ५६"],"iast":["vayaṃ khalāḥ sahotpattyā tāmasā dīrghamanyavaḥ|","svabhāvo dustyajo nātha lokānāṃ yadasadgrahaḥ|| 56"],"meaning":"कालिय नागने कहा—नाथ! हम जन्मसे ही दुष्ट, तमोगुणी और बहुत दिनोंके बाद भी बदला लेनेवाले—बड़े क्रोधी जीव हैं। जीवोंके लिये अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है। इसीके कारण संसारके लोग नाना प्रकारके दुराग्रहोंमें फँस जाते हैं॥ ५६॥"},{"id":"10.16.57","number":57,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/57/","page":247,"speaker":"कालिय उवाच","sanskrit":["त्वया सृष्टमिदं विश्‍वं धातर्गुणविसर्जनम्।","नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति॥ ५७"],"iast":["tvayā sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ dhātarguṇavisarjanam|","nānāsvabhāvavīryaujoyonibījāśayākṛti|| 57"],"meaning":"विश्‍वविधाता! आपने ही गुणोंके भेदसे इस जगत‍्में नाना प्रकारके स्वभाव, वीर्य, बल, योनि, बीज, चित्त और आकृतियोंका निर्माण किया है॥ ५७॥"},{"id":"10.16.58","number":58,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/58/","page":247,"speaker":"कालिय उवाच","sanskrit":["वयं च तत्र भगवन् सर्पा जात्युरुमन्यवः।","कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस्त्यजां मोहिताः स्वयम्॥ ५८"],"iast":["vayaṃ ca tatra bhagavan sarpā jātyurumanyavaḥ|","kathaṃ tyajāmastvanmāyāṃ dustyajāṃ mohitāḥ svayam|| 58"],"meaning":"भगवन्! आपकी ही सृष्टिमें हम सर्प भी हैं। हम जन्मसे ही बड़े क्रोधी होते हैं। हम इस मायाके चक्करमें स्वयं मोहित हो रहे हैं। फिर अपने प्रयत्‍नसे इस दुस्त्यज मायाका त्याग कैसे करें॥ ५८॥"},{"id":"10.16.59","number":59,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/59/","page":247,"speaker":"कालिय उवाच","sanskrit":["भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्‍वरः।","अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद् विधेहि नः॥ ५९"],"iast":["bhavān hi kāraṇaṃ tatra sarvajño jagadīśvaraḥ|","anugrahaṃ nigrahaṃ vā manyase tad vidhehi naḥ|| 59"],"meaning":"आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत‍्के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस मायाके कारण हैं। अब आप अपनी इच्छासे—जैसा ठीक समझें—कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये॥ ५९॥"},{"id":"10.16.60","number":60,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/60/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्याकर्ण्य वचः प्राह भगवान् कार्यमानुषः।","नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम्।","स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यतां नदी॥ ६०"],"iast":["ityākarṇya vacaḥ prāha bhagavān kāryamānuṣaḥ|","nātra stheyaṃ tvayā sarpa samudraṃ yāhi mā ciram|","svajñātyapatyadārāḍhyo gonṛbhirbhujyatāṃ nadī|| 60"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—कालिय नागकी बात सुनकर लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘सर्प! अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये। तू अपने जाति-भाई, पुत्र और स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही यहाँसे समुद्रमें चला जा। अब गौएँ और मनुष्य यमुना-जलका उपभोग करें॥ ६०॥"},{"id":"10.16.61","number":61,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/61/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["य एतत् संस्मरेन्मर्त्यस्तुभ्यं मदनुशासनम्।","कीर्तयन्‍नुभयोः सन्ध्योर्न युष्मद् भयमाप्नुयात्॥ ६१"],"iast":["ya etat saṃsmarenmartyastubhyaṃ madanuśāsanam|","kīrtayannubhayoḥ sandhyorna yuṣmad bhayamāpnuyāt|| 61"],"meaning":"जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपोंसे कभी भय न हो॥ ६१॥"},{"id":"10.16.62","number":62,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/62/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योऽस्मिन् स्नात्वा मदाक्रीडे देवादींस्तर्पयेज्जलैः।","उपोष्य मां स्मरन्‍नर्चेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ६२"],"iast":["yo'smin snātvā madākrīḍe devādīṃstarpayejjalaiḥ|","upoṣya māṃ smarannarcet sarvapāpaiḥ pramucyate|| 62"],"meaning":"मैंने इस कालियदहमें क्रीड़ा की है। इसलिये जो पुरुष इसमें स्नान करके जलसे देवता और पितरोंका तर्पण करेगा, एवं उपवास करके मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा—वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ६२॥"},{"id":"10.16.63","number":63,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/63/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः।","यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम्॥ ६३"],"iast":["dvīpaṃ ramaṇakaṃ hitvā hradametamupāśritaḥ|","yadbhayāt sa suparṇastvāṃ nādyānmatpādalāñchitam|| 63"],"meaning":"मैं जानता हूँ कि तू गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं॥ ६३॥"},{"id":"10.16.64","number":64,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/64/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमुक्तो भगवता कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।","तं पूजयामास मुदा नागपत्‍न्यश्‍च सादरम्॥ ६४"],"iast":["evamukto bhagavatā kṛṣṇenādbhutakarmaṇā|","taṃ pūjayāmāsa mudā nāgapatnyaśca sādaram|| 64"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णकी एक-एक लीला अद्भुत है। उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्‍नियोंने आनन्दसे भरकर बड़े आदरसे उनकी पूजा की॥ ६४॥"},{"id":"10.16.65","number":65,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/65/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिव्याम्बरस्रङ्मणिभिः परार्घ्यैरपि भूषणैः।","दिव्यगन्धानुलेपैश्‍च महत्योत्पलमालया॥ ६५"],"iast":["divyāmbarasraṅmaṇibhiḥ parārghyairapi bhūṣaṇaiḥ|","divyagandhānulepaiśca mahatyotpalamālayā|| 65"],"meaning":"उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत‍्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्‍नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया॥ ६५—६७॥","meaning_covers":[65,67]},{"id":"10.16.66","number":66,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/66/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पूजयित्वा जगन्‍नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम्।","ततः प्रीतोऽभ्यनुज्ञातः परिक्रम्याभिवन्द्य तम्॥ ६६"],"iast":["pūjayitvā jagannāthaṃ prasādya garuḍadhvajam|","tataḥ prīto'bhyanujñātaḥ parikramyābhivandya tam|| 66"],"meaning":"उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत‍्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्‍नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया॥ ६५—६७॥","meaning_covers":[65,67]},{"id":"10.16.67","number":67,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/67/","page":248,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सकलत्रसुहृत्पुत्रो द्वीपमब्धेर्जगाम ह।","तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत्।","अनुग्रहाद् भगवतः क्रीडामानुषरूपिणः॥ ६७"],"iast":["sakalatrasuhṛtputro dvīpamabdherjagāma ha|","tadaiva sāmṛtajalā yamunā nirviṣābhavat|","anugrahād bhagavataḥ krīḍāmānuṣarūpiṇaḥ|| 67"],"meaning":"उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत‍्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्‍नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया॥ ६५—६७॥","meaning_covers":[65,67]}],"text":[{"b":29117,"kind":"adhyaya_heading","page":238,"text":"अथ षोडशोऽध्यायः"},{"b":29118,"kind":"topic_heading","page":238,"text":"कालियपर कृपा"},{"b":29119,"kind":"topic_heading","page":238,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29120,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.1"],"text":"विलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्णः कृष्णाहिना विभुः।"},{"b":29121,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.1"],"text":"तस्या विशुद्धिमन्विच्छन् सर्पं तमुदवासयत्॥ १"},{"b":29122,"kind":"hindi_commentary","page":238,"explains":["10.16.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि महाविषधर कालिय नागने यमुनाजीका जल विषैला कर दिया है। तब यमुनाजीको शुद्ध करनेके विचारसे उन्होंने वहाँसे उस सर्पको निकाल दिया॥ १॥"},{"b":29123,"kind":"topic_heading","page":238,"text":"राजोवाच"},{"b":29124,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.2"],"text":"कथमन्तर्जलेऽगाधे न्यगृह्णाद् भगवानहिम्।"},{"b":29125,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.2"],"text":"स वै बहुयुगावासं यथाऽऽसीद् विप्र कथ्यताम्॥ २"},{"b":29126,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.3"],"text":"ब्रह्मन् भगवतस्तस्य भूम्‍नः स्वच्छन्दवर्तिनः।"},{"b":29127,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.3"],"text":"गोपालोदारचरितं कस्तृप्येतामृतं जुषन्॥ ३"},{"b":29128,"kind":"hindi_commentary","page":238,"explains":["10.16.2","10.16.3"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाजीके अगाध जलमें किस प्रकार उस सर्पका दमन किया? फिर कालिय नाग तो जलचर जीव नहीं था, ऐसी दशामें वह अनेक युगोंतक जलमें क्यों और कैसे रहा? सो बतलाइये॥ २॥ ब्रह्मस्वरूप महात्मन्! भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी लीला प्रकट करके स्वच्छन्द विहार करते हैं। गोपालरूपसे उन्होंने जो उदार लीला की है, वह तो अमृतस्वरूप है। भला, उसके सेवनसे कौन तृप्त हो सकता है?॥ ३॥"},{"b":29129,"kind":"topic_heading","page":238,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29130,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.4"],"text":"कालिन्द्यां कालियस्यासीद‍्ध्रदः कश्‍चिद् विषाग्‍निना।"},{"b":29131,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.4"],"text":"श्रप्यमाणपया यस्मिन् पतन्त्युपरिगाः खगाः॥ ४"},{"b":29132,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.5"],"text":"विप्रुष्मता विषोदोर्मिमारुतेनाभिमर्शिताः।"},{"b":29133,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.5"],"text":"म्रियन्ते तीरगा यस्य प्राणिनः स्थिरजंगमाः॥ ५"},{"b":29134,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.6"],"text":"तं चण्डवेगविषवीर्यमवेक्ष्य तेन"},{"b":29135,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.16.6"],"text":"दुष्टां नदीं च खलसंयमनावतारः।"},{"b":29136,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.6"],"text":"कृष्णः कदम्बमधिरुह्य ततोऽतितुङ्ग-"},{"b":29137,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.6"],"text":"मास्फोट्य गाढरशनो न्यपतद् विषोदे॥ ६"},{"b":29138,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.7"],"text":"सर्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेग-"},{"b":29139,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.7"],"text":"संक्षोभितोरगविषोच्छ्वसिताम्बुराशिः।"},{"b":29140,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.7"],"text":"पर्यक् प्लुतो विषकषायविभीषणोर्मि-"},{"b":29141,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.7"],"text":"र्धावन् धनुःशतमनन्तबलस्य किं तत्॥ ७"},{"b":29142,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.8"],"text":"तस्य ह्रदे विहरतो भुजदण्डघूर्ण-"},{"b":29143,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.8"],"text":"वार्घोषमंग वरवारणविक्रमस्य।"},{"b":29144,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.8"],"text":"आश्रुत्य तत् स्वसदनाभिभवं निरीक्ष्य"},{"b":29145,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.8"],"text":"चक्षुःश्रवाः समसरत्तदमृष्यमाणः॥ ८"},{"b":29146,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.9"],"text":"तं प्रेक्षणीयसुकुमारघनावदातं"},{"b":29147,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.9"],"text":"श्रीवत्सपीतवसनं स्मितसुन्दरास्यम्।"},{"b":29148,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.9"],"text":"क्रीडन्तमप्रतिभयं कमलोदराङ्‌घ्रिं"},{"b":29149,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.9"],"text":"सन्दश्य मर्मसु रुषा भुजया चछाद॥ ९"},{"b":29150,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.10"],"text":"तं नागभोगपरिवीतमदृष्टचेष्ट-"},{"b":29151,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.10"],"text":"मालोक्य तत्प्रियसखाः पशुपा भृशार्ताः।"},{"b":29152,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.10"],"text":"कृष्णेऽर्पितात्मसुहृदर्थकलत्रकामा"},{"b":29153,"kind":"sanskrit_shloka","page":239,"verses":["10.16.10"],"text":"दुःखानुशोकभयमूढधियो निपेतुः॥ १०"},{"b":29154,"kind":"hindi_commentary","page":238,"explains":["10.16.4","10.16.5","10.16.6","10.16.7","10.16.8","10.16.9","10.16.10"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यमुनाजीमें कालिय नागका एक कुण्ड था। उसका जल विषकी गर्मीसे खौलता रहता था। यहाँतक कि उसके ऊपर उड़नेवाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे॥ ४॥ उसके विषैले जलकी उत्ताल तरंगोंका स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूँदें लेकर जब वायु बाहर आती और तटके घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदिका स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे॥ ५॥ परीक्षित्! भगवान्‌का अवतार तो दुष्टोंका दमन करनेके लिये होता ही है। जब उन्होंने देखा कि उस साँपके विषका वेग बड़ा प्रचण्ड (भयंकर) है और वह भयानक विष ही उसका महान् बल है तथा उसके कारण मेरे विहारका स्थान यमुनाजी भी दूषित हो गयी हैं, तब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी कमरका फेंटा कसकर एक बहुत ऊँचे कदम्बके वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे ताल ठोंककर उस विषैले जलमें कूद पड़े॥ ६॥ यमुनाजीका जल साँपके विषके कारण पहलेसे ही खौल रहा था। उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रही थीं। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके कूद पड़नेसे उसका जल और भी उछलने लगा। उस समय तो कालियदहका जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथतक फैल गया। अचिन्त्य अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णके लिये इसमें कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है॥ ७॥ प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कालियदहमें कूदकर अतुल बलशाली मतवाले गजराजके समान जल उछालने लगे। इस प्रकार जल-क्रीड़ा करनेपर उनकी भुजाओंकी टक्करसे जलमें बड़े जोरका शब्द होने लगा। आँखसे ही सुननेवाले कालिय नागने वह आवाज सुनी और देखा कि कोई मेरे निवासस्थानका तिरस्कार कर रहा है। उसे यह सहन न हुआ। वह चिढ़कर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आ गया॥ ८॥ उसने देखा कि सामने एक साँवला-सलोना बालक है। वर्षाकालीन मेघके समान अत्यन्त सुकुमार शरीर है, उसमें लगकर आँखें हटनेका नाम ही नहीं लेतीं। उसके वक्षःस्थलपर एक सुनहली रेखा—श्रीवत्सका चिह्न है और वह पीले रंगका वस्त्र धारण किये हुए है। बड़े मधुर एवं मनोहर मुखपर मन्द-मन्द मुसकान अत्यन्त शोभायमान हो रही है। चरण इतने सुकुमार और सुन्दर हैं, मानो कमलकी गद्दी हो। इतना आकर्षक रूप होनेपर भी जब कालिय नागने देखा कि बालक तनिक भी न डरकर इस विषैले जलमें मौजसे खेल रहा है, तब उसका क्रोध और भी बढ़ गया। उसने श्रीकृष्णको मर्मस्थानोंमें डँसकर अपने शरीरके बन्धनसे उन्हें जकड़ लिया॥ ९॥ भगवान् श्रीकृष्ण नागपाशमें बँधकर निश्‍चेष्ट हो गये। यह देखकर उनके प्यारे सखा ग्वालबाल बहुत ही पीड़ित हुए और उसी समय दुःख, पश्‍चात्ताप और भयसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। क्योंकि उन्होंने अपने शरीर, सुहृद्, धन-सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, भोग और कामनाएँ—सब कुछ भगवान् श्रीकृष्णको ही समर्पित कर रखा था॥ १०॥"},{"b":29155,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.11"],"text":"गावो वृषा वत्सतर्यः क्रन्दमानाः सुदुःखिताः।"},{"b":29156,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.11"],"text":"कृष्णे न्यस्तेक्षणा भीता रुदत्य इव तस्थिरे॥ ११"},{"b":29157,"kind":"hindi_commentary","page":240,"explains":["10.16.11"],"text":"गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दुःखसे डकराने लगे। श्रीकृष्णकी ओर ही उनकी टकटकी बँध रही थी। वे डरकर इस प्रकार खड़े हो गये, मानो रो रहे हों। उस समय उनका शरीर हिलता-डोलतातक न था॥ ११॥"},{"b":29158,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.12"],"text":"अथ व्रजे महोत्पातास्त्रिविधा ह्यतिदारुणाः।"},{"b":29159,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.12"],"text":"उत्पेतुर्भुवि दिव्यात्मन्यासन्‍नभयशंसिनः॥ १२"},{"b":29160,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.13"],"text":"तानालक्ष्य भयोद्वि‌ग्‍ना गोपा नन्दपुरोगमाः।"},{"b":29161,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.13"],"text":"विना रामेण गाः कृष्णं ज्ञात्वा चारयितुं गतम्॥ १३"},{"b":29162,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.14"],"text":"तैर्दुर्निमित्तैर्निधनं मत्वा प्राप्तमतद्विदः।"},{"b":29163,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.14"],"text":"तत्प्राणास्तन्मनस्कास्ते दुःखशोकभयातुराः॥ १४"},{"b":29164,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.15"],"text":"आबालवृद्धवनिताः सर्वेऽङ्ग पशुवृत्तयः।"},{"b":29165,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.15"],"text":"निर्जग्मुर्गोकुलाद् दीनाः कृष्णदर्शनलालसाः॥ १५"},{"b":29166,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.16"],"text":"तांस्तथा कातरान् वीक्ष्य भगवान् माधवो बलः।"},{"b":29167,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.16"],"text":"प्रहस्य किंचिन्‍नोवाच प्रभावज्ञोऽनुजस्य सः॥ १६"},{"b":29168,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.17"],"text":"तेऽन्वेषमाणा दयितं कृष्णं सूचितया पदैः।"},{"b":29169,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.17"],"text":"भगवल्लक्षणैर्जग्मुः पदव्या यमुनातटम्॥ १७"},{"b":29170,"kind":"hindi_commentary","page":240,"explains":["10.16.12","10.16.13","10.16.14","10.16.15","10.16.16","10.16.17"],"text":"इधर व्रजमें पृथ्वी, आकाश और शरीरोंमें बड़े भयंकर-भयंकर तीनों प्रकारके उत्पात उठ खड़े हुए, जो इस बातकी सूचना दे रहे थे कि बहुत ही शीघ्र कोई अशुभ घटना घटनेवाली है॥ १२॥ नन्दबाबा आदि गोपोंने पहले तो उन अशकुनोंको देखा और पीछेसे यह जाना कि आज श्रीकृष्ण बिना बलरामके ही गाय चराने चले गये। वे भयसे व्याकुल हो गये॥ १३॥ वे भगवान्‌का प्रभाव नहीं जानते थे। इसीलिये उन अशकुनोंको देखकर उनके मनमें यह बात आयी कि आज तो श्रीकृष्णकी मृत्यु ही हो गयी होगी। वे उसी क्षण दुःख, शोक और भयसे आतुर हो गये। क्यों न हों, श्रीकृष्ण ही उनके प्राण, मन और सर्वस्व जो थे॥ १४॥ प्रिय परीक्षित्! व्रजके बालक, वृद्ध और स्त्रियोंका स्वभाव गायों-जैसा ही वात्सल्यपूर्ण था। वे मनमें ऐसी बात आते ही अत्यन्त दीन हो गये और अपने प्यारे कन्हैयाको देखनेकी उत्कट लालसासे घर-द्वार छोड़कर निकल पड़े॥ १५॥ बलरामजी स्वयं भगवान्‌के स्वरूप और सर्वशक्तिमान् हैं। उन्होंने जब व्रजवासियोंको इतना कातर और इतना आतुर देखा, तब उन्हें हँसी आ गयी। परन्तु वे कुछ बोले नहीं, चुप ही रहे। क्योंकि वे अपने छोटे भाई श्रीकृष्णका प्रभाव भलीभाँति जानते थे॥ १६॥ व्रजवासी अपने प्यारे श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगे। कोई अधिक कठिनाई न हुई; क्योंकि मार्गमें उन्हें भगवान्‌के चरणचिह्न मिलते जाते थे। जौ, कमल, अंकुश आदिसे युक्त होनेके कारण उन्हें पहचान होती जाती थी। इस प्रकार वे यमुना-तटकी ओर जाने लगे॥ १७॥"},{"b":29171,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.18"],"text":"ते तत्र तत्राब्जयवांकुशाशनि-"},{"b":29172,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.18"],"text":"ध्वजोपपन्‍नानि पदानि विश्पतेः।"},{"b":29173,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.18"],"text":"मार्गे गवामन्यपदान्तरान्तरे"},{"b":29174,"kind":"sanskrit_shloka","page":240,"verses":["10.16.18"],"text":"निरीक्षमाणा ययुरंग सत्वराः॥ १८"},{"b":29175,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.19"],"text":"अन्तर्ह्रदे भुजगभोगपरीतमारात्"},{"b":29176,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.19"],"text":"कृष्णं निरीहमुपलभ्य जलाशयान्ते।"},{"b":29177,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.19"],"text":"गोपांश्‍च मूढधिषणान् परितः पशूंश्‍च"},{"b":29178,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.19"],"text":"संक्रन्दतः परमकश्मलमापुरार्ताः॥ १९"},{"b":29179,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.20"],"text":"गोप्योऽनुरक्तमनसो भगवत्यनन्ते"},{"b":29180,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.20"],"text":"तत्सौहृदस्मितविलोकगिरः स्मरन्त्यः।"},{"b":29181,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.20"],"text":"ग्रस्तेऽहिना प्रियतमे भृशदुःखतप्ताः"},{"b":29182,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.20"],"text":"शून्यं प्रियव्यतिहृतं ददृशुस्त्रिलोकम्॥ २०"},{"b":29183,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.21"],"text":"ताः कृष्णमातरमपत्यमनुप्रविष्टां"},{"b":29184,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.21"],"text":"तुल्यव्यथाः समनुगृह्य शुचः स्रवन्त्यः।"},{"b":29185,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.21"],"text":"तास्ता व्रजप्रियकथाः कथयन्त्य आसन्"},{"b":29186,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.21"],"text":"कृष्णाननेऽर्पितदृशो मृतकप्रतीकाः॥ २१"},{"b":29187,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.22"],"text":"कृष्णप्राणान्‍निर्विशतो नन्दादीन् वीक्ष्य तं ह्रदम्।"},{"b":29188,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.22"],"text":"प्रत्यषेधत् स भगवान् रामः कृष्णानुभाववित्॥ २२"},{"b":29189,"kind":"hindi_commentary","page":240,"explains":["10.16.18","10.16.19","10.16.20","10.16.21","10.16.22"],"text":"परीक्षित्! मार्गमें गौओं और दूसरोंके चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें भगवान्‌के चरणचिह्न भी दीख जाते थे। उनमें कमल, जौ, अंकुश, वज्र और ध्वजाके चिह्न बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए वे बहुत शीघ्रतासे चले॥ १८॥ उन्होंने दूरसे ही देखा कि कालियदहमें कालिय नागके शरीरसे बँधे हुए श्रीकृष्ण चेष्टाहीन हो रहे हैं। कुण्डके किनारेपर ग्वालबाल अचेत हुए पड़े हैं और गौएँ, बैल, बछड़े आदि बड़े आर्तस्वरसे डकरा रहे हैं। यह सब देखकर वे सब गोप अत्यन्त व्याकुल और अन्तमें मूर्च्छित हो गये॥ १९॥ गोपियोंका मन अनन्त गुणगणनिलय भगवान् श्रीकृष्णके प्रेमके रंगमें रँगा हुआ था। वे तो नित्य-निरन्तर भगवान्‌के सौहार्द, उनकी मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन तथा मीठी वाणीका ही स्मरण करती रहती थीं। जब उन्होंने देखा कि हमारे प्रियतम श्यामसुन्दरको काले साँपने जकड़ रखा है, तब तो उनके हृदयमें बड़ा ही दुःख और बड़ी ही जलन हुई। अपने प्राणवल्लभ जीवनसर्वस्वके बिना उन्हें तीनों लोक सूने दीखने लगे॥ २०॥ माता यशोदा तो अपने लाड़ले लालके पीछे कालियदहमें कूदने ही जा रही थीं; परन्तु गोपियोंने उन्हें पकड़ लिया। उनके हृदयमें भी वैसी ही पीड़ा थी। उनकी आँखोंसे भी आँसुओंकी झड़ी लगी हुई थी। सबकी आँखें श्रीकृष्णके मुखकमलपर लगी थीं। जिनके शरीरमें चेतना थी, वे व्रजमोहन श्रीकृष्णकी पूतना-वध आदिकी प्यारी-प्यारी ऐश्‍वर्यकी लीलाएँ कह-कहकर यशोदाजीको धीरज बँधाने लगीं। किन्तु अधिकांश तो मुर्देकी तरह पड़ ही गयी थीं॥ २१॥ परीक्षित्! नन्दबाबा आदिके जीवन-प्राण तो श्रीकृष्ण ही थे। वे श्रीकृष्णके लिये कालियदहमें घुसने लगे। यह देखकर श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेवाले भगवान् बलरामजीने किन्हींको समझा-बुझाकर, किन्हींको बलपूर्वक और किन्हींको उनके हृदयोंमें प्रेरणा करके रोक दिया॥ २२॥"},{"b":29190,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.23"],"text":"इत्थं स्वगोकुलमनन्यगतिं निरीक्ष्य"},{"b":29191,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.23"],"text":"सस्त्रीकुमारमतिदुःखितमात्महेतोः।"},{"b":29192,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.23"],"text":"आज्ञाय मर्त्यपदवीमनुवर्तमानः"},{"b":29193,"kind":"sanskrit_shloka","page":241,"verses":["10.16.23"],"text":"स्थित्वा मुहूर्तमुदतिष्ठदुरंगबन्धात्॥ २३"},{"b":29194,"kind":"hindi_commentary","page":241,"explains":["10.16.23"],"text":"परीक्षित्! यह साँपके शरीरसे बँध जाना तो श्रीकृष्णकी मनुष्यों-जैसी एक लीला थी। जब उन्होंने देखा कि व्रजके सभी लोग स्त्री और बच्चोंके साथ मेरे लिये इस प्रकार अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं और सचमुच मेरे सिवा इनका कोई दूसरा सहारा भी नहीं है, तब वे एक मुहूर्ततक सर्पके बन्धनमें रहकर बाहर निकल आये॥ २३॥"},{"b":29195,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.24"],"text":"तत्प्रथ्यमानवपुषा व्यथितात्मभोग-"},{"b":29196,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.24"],"text":"स्त्यक्त्वोन्‍नमय्य कुपितः स्वफणान् भुजंगः।"},{"b":29197,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.24"],"text":"तस्थौ श्‍वसञ्छ्वसनरन्ध्रविषाम्बरीष-"},{"b":29198,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.24"],"text":"स्तब्धेक्षणोल्मुकमुखो हरिमीक्षमाणः॥ २४"},{"b":29199,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.25"],"text":"तं जिह्वया द्विशिखया परिलेलिहानं"},{"b":29200,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.25"],"text":"द्वे सृक्किणी ह्यतिकरालविषाग्‍निदृष्टिम्।"},{"b":29201,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.25"],"text":"क्रीडन्‍नमुं परिससार यथा खगेन्द्रो"},{"b":29202,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.25"],"text":"बभ्राम सोऽप्यवसरं प्रसमीक्षमाणः॥ २५"},{"b":29203,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.26"],"text":"एवं परिभ्रमहतौजसमुन्‍नतांस-"},{"b":29204,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.26"],"text":"मानम्य तत्पृथुशिरस्स्वधिरूढ आद्यः।"},{"b":29205,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.26"],"text":"तन्मूर्धरत्‍ननिकरस्पर्शातिताम्र-"},{"b":29206,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.26"],"text":"पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥ २६"},{"b":29207,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.27"],"text":"तं नर्तुमुद्यतमवेक्ष्य तदा तदीय-"},{"b":29208,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.27"],"text":"गन्धर्वसिद्धसुरचारणदेववध्वः ।"},{"b":29209,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.27"],"text":"प्रीत्या मृदंगपणवानकवाद्यगीत-"},{"b":29210,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.27"],"text":"पुष्पोपहारनुतिभिः सहसोपसेदुः॥ २७"},{"b":29211,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.28"],"text":"यद् यच्छिरो न नमतेऽङ्ग शतैकशीर्ष्ण-"},{"b":29212,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.28"],"text":"स्तत्तन् ममर्द खरदण्डधरोऽङ्‌घ्रिपातैः।"},{"b":29213,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.28"],"text":"क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोऽसृङ्"},{"b":29214,"kind":"sanskrit_shloka","page":242,"verses":["10.16.28"],"text":"नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नागः॥ २८"},{"b":29215,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.29"],"text":"तस्याक्षिभिर्गरलमुद्वमतः शिरस्सु"},{"b":29216,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.29"],"text":"यद् यत् समुन्‍नमति निःश्‍वसतो रुषोच्चैः।"},{"b":29217,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.29"],"text":"नृत्यन् पदानुनमयन् दमयाम्बभूव"},{"b":29218,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.29"],"text":"पुष्पैः प्रपूजित इवेह पुमान् पुराणः॥ २९"},{"b":29219,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.30"],"text":"तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रो"},{"b":29220,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.30"],"text":"रक्तं मुखैरुरु वमन् नृप भ‌ग्‍नगात्रः।"},{"b":29221,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.30"],"text":"स्मृत्वा चराचरगुरुं पुरुषं पुराणं"},{"b":29222,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.30"],"text":"नारायणं तमरणं मनसा जगाम॥ ३०"},{"b":29223,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.31"],"text":"कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्‍नं"},{"b":29224,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.31"],"text":"पार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम्।"},{"b":29225,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.31"],"text":"दृष्ट्वाहिमाद्यमुपसेदुरमुष्य पत्‍न्य"},{"b":29226,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.31"],"text":"आर्ताः श्‍लथद्वसनभूषणकेशबन्धाः॥ ३१"},{"b":29227,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.32"],"text":"तास्तं सुवि‌ग्‍नमनसोऽथ पुरस्कृतार्भाः"},{"b":29228,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.32"],"text":"कायं निधाय भुवि भूतपतिं प्रणेमुः।"},{"b":29229,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.32"],"text":"साध्व्यः कृतांजलिपुटाः शमलस्य भर्तु-"},{"b":29230,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.32"],"text":"र्मोक्षेप्सवः शरणदं शरणं प्रपन्‍नाः॥ ३२"},{"b":29231,"kind":"hindi_commentary","page":241,"explains":["10.16.24","10.16.25","10.16.26","10.16.27","10.16.28","10.16.29","10.16.30","10.16.31","10.16.32"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपना शरीर फुलाकर खूब मोटा कर लिया। इससे साँपका शरीर टूटने लगा। वह अपना नागपाश छोड़कर अलग खड़ा हो गया और क्रोधसे आग बबूला हो अपने फण ऊँचा करके फुफकारें मारने लगा। घात मिलते ही श्रीकृष्णपर चोट करनेके लिये वह उनकी ओर टकटकी लगाकर देखने लगा। उस समय उसके नथुनोंसे विषकी फुहारें निकल रही थीं। उसकी आँखें स्थिर थीं और इतनी लाल-लाल हो रही थीं, मानो भट्ठीपर तपाया हुआ खपड़ा हो। उसके मुँहसे आगकी लपटें निकल रही थीं॥ २४॥ उस समय कालिय नाग अपनी दुहरी जीभ लपलपाकर अपने होठोंके दोनों किनारोंको चाट रहा था और अपनी कराल आँखोंसे विषकी ज्वाला उगलता जा रहा था। अपने वाहन गरुड़के समान भगवान् श्रीकृष्ण उसके साथ खेलते हुए पैंतरा बदलने लगे और वह साँप भी उनपर चोट करनेका दाँव देखता हुआ पैंतरा बदलने लगा॥ २५॥ इस प्रकार पैंतरा बदलते-बदलते उसका बल क्षीण हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्णने उसके बड़े-बड़े सिरोंको तनिक दबा दिया और उछलकर उनपर सवार हो गये। कालिय नागके मस्तकोंपर बहुत-सी लाल-लाल मणियाँ थीं। उनके स्पर्शसे भगवान्‌के सुकुमार तलुओंकी लालिमा और भी बढ़ गयी। नृत्य-गान आदि समस्त कलाओंके आदिप्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण उसके सिरोंपर कलापूर्ण नृत्य करने लगे॥ २६॥ भगवान्‌के प्यारे भक्त गन्धर्व, सिद्ध, देवता, चारण और देवांगनाओंने जब देखा कि भगवान् नृत्य करना चाहते हैं, तब वे बड़े प्रेमसे मृदंग, ढोल, नगारे आदि बाजे बजाते हुए, सुन्दर-सुन्दर गीत गाते हुए, पुष्पोंकी वर्षा करते हुए और अपनेको निछावर करते हुए भेंट ले-लेकर उसी समय भगवान्‌के पास आ पहुँचे॥ २७॥ परीक्षित्! कालिय नागके एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस सिरको नहीं झुकाता था, उसीको प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरोंकी चोटसे कुचल डालते। इससे कालिय नागकी जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुँह और नथुनोंसे खून उगलने लगा। अन्तमें चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया॥ २८॥ तनिक भी चेत होता तो वह अपनी आँखोंसे विष उगलने लगता और क्रोधके मारे जोर-जोरसे फुफकारें मारने लगता। इस प्रकार वह अपने सिरोंमेंसे जिस सिरको ऊपर उठाता, उसीको नाचते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणोंकी ठोकरसे झुकाकर रौंद डालते। उस समय पुराण-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर जो खूनकी बूँदें पड़ती थीं, उनसे ऐसा मालूम होता, मानो रक्त-पुष्पोंसे उनकी पूजा की जा रही हो॥ २९॥ परीक्षित्! भगवान्‌के इस अद्भुत ताण्डव-नृत्यसे कालियके फणरूप छत्ते छिन्‍न-भिन्‍न हो गये। उसका एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँहसे खूनकी उलटी होने लगी। अब उसे सारे जगत‍्के आदिशिक्षक पुराणपुरुष भगवान् नारायणकी स्मृति हुई। वह मन-ही-मन भगवान्‌की शरणमें गया॥ ३०॥ भगवान् श्रीकृष्णके उदरमें सम्पूर्ण विश्‍व है। इसलिये उनके भारी बोझसे कालिय नागके शरीरकी एक-एक गाँठ ढीली पड़ गयी। उनकी एड़ियोंकी चोटसे उसके छत्रके समान फण छिन्‍न-भिन्‍न हो गये। अपने पतिकी यह दशा देखकर उसकी पत्‍नियाँ भगवान्‌की शरणमें आयीं। वे अत्यन्त आतुर हो रही थीं। भयके मारे उनके वस्त्राभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे थे और केशकी चोटियाँ भी बिखर रही थीं॥ ३१॥ उस समय उन साध्वी नागपत्‍नियोंके चित्तमें बड़ी घबराहट थी। अपने बालकोंको आगे करके वे पृथ्वीपर लोट गयीं और हाथ जोड़कर उन्होंने समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया। भगवान् श्रीकृष्णको शरणागतवत्सल जानकर अपने अपराधी पतिको छुड़ानेकी इच्छासे उन्होंने उनकी शरण ग्रहण की॥ ३२॥"},{"b":29232,"kind":"topic_heading","page":243,"text":"नागपत्‍न्य ऊचुः"},{"b":29233,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.33"],"text":"न्याय्यो हि दण्डः कृतकिल्बिषेऽस्मिं-"},{"b":29234,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.33"],"text":"स्तवावतारः खलनिग्रहाय।"},{"b":29235,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.33"],"text":"रिपोः सुतानामपि तुल्यदृष्टे-"},{"b":29236,"kind":"sanskrit_shloka","page":243,"verses":["10.16.33"],"text":"र्धत्से दमं फलमेवानुशंसन्॥ ३३"},{"b":29237,"kind":"hindi_commentary","page":243,"explains":["10.16.33"],"text":"नागपत्‍नियोंने कहा—प्रभो! आपका यह अवतार ही दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये हुआ है। इसलिये इस अपराधीको दण्ड देना सर्वथा उचित है। आपकी दृष्टिमें शत्रु और पुत्रका कोई भेदभाव नहीं है। इसलिये आप जो किसीको दण्ड देते हैं, वह उसके पापोंका प्रायश्‍चित्त कराने और उसका परम कल्याण करनेके लिये ही॥ ३३॥"},{"b":29238,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.34"],"text":"अनुग्रहोऽयं भवतः कृतो हि नो"},{"b":29239,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.34"],"text":"दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः।"},{"b":29240,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.34"],"text":"यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः"},{"b":29241,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.34"],"text":"क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः॥ ३४"},{"b":29242,"kind":"hindi_commentary","page":244,"explains":["10.16.34"],"text":"आपने हमलोगोंपर यह बड़ा ही अनुग्रह किया। यह तो आपका कृपा-प्रसाद ही है। क्योंकि आप जो दुष्टोंको दण्ड देते हैं, उससे उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस सर्पके अपराधी होनेमें तो कोई सन्देह ही नहीं है। यदि यह अपराधी न होता तो इसे सर्पकी योनि ही क्यों मिलती? इसलिये हम सच्चे हृदयसे आपके इस क्रोधको भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं॥ ३४॥"},{"b":29243,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.35"],"text":"तपः सुतप्तं किमनेन पूर्वं"},{"b":29244,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.35"],"text":"निरस्तमानेन च मानदेन।"},{"b":29245,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.35"],"text":"धर्मोऽथ वा सर्वजनानुकम्पया"},{"b":29246,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.35"],"text":"यतो भवांस्तुष्यति सर्वजीवः॥ ३५"},{"b":29247,"kind":"hindi_commentary","page":244,"explains":["10.16.35"],"text":"अवश्य ही पूर्वजन्ममें इसने स्वयं मानरहित होकर और दूसरोंका सम्मान करते हुए कोई बहुत बड़ी तपस्या की है। अथवा सब जीवोंपर दया करते हुए इसने कोई बहुत बड़ा धर्म किया है तभी तो आप इसके ऊपर सन्तुष्ट हुए हैं। क्योंकि सर्व-जीवस्वरूप आपकी प्रसन्‍नताका यही उपाय है॥ ३५॥"},{"b":29248,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.36"],"text":"कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे"},{"b":29249,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.36"],"text":"तवाङ्‌घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः ।"},{"b":29250,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.36"],"text":"यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपो"},{"b":29251,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.36"],"text":"विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ ३६"},{"b":29252,"kind":"hindi_commentary","page":244,"explains":["10.16.36"],"text":"भगवन्! हम नहीं समझ पातीं कि यह इसकी किस साधनाका फल है, जो यह आपके चरणकमलोंकी धूलका स्पर्श पानेका अधिकारी हुआ है। आपके चरणोंकी रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिये आपकी अर्द्धांगिनी लक्ष्मीजीको भी बहुत दिनोंतक समस्त भोगोंका त्याग करके नियमोंका पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी॥ ३६॥"},{"b":29253,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.37"],"text":"न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं"},{"b":29254,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.37"],"text":"न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम्।"},{"b":29255,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.37"],"text":"न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा"},{"b":29256,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.37"],"text":"वाञ्छन्ति यत्पादरजःप्रपन्‍नाः॥ ३७"},{"b":29257,"kind":"hindi_commentary","page":244,"explains":["10.16.37"],"text":"प्रभो! जो आपके चरणोंकी धूलकी शरण ले लेते हैं, वे भक्तजन स्वर्गका राज्य या पृथ्वीकी बादशाही नहीं चाहते। न वे रसातलका ही राज्य चाहते और न तो ब्रह्माका पद ही लेना चाहते हैं। उन्हें अणिमादि योग-सिद्धियोंकी भी चाह नहीं होती। यहाँतक कि वे जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले कैवल्य-मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते॥ ३७॥"},{"b":29258,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.38"],"text":"तदेष नाथाप दुरापमन्यै-"},{"b":29259,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.38"],"text":"स्तमोजनिः क्रोधवशोऽप्यहीशः।"},{"b":29260,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.38"],"text":"संसारचक्रे भ्रमतः शरीरिणो"},{"b":29261,"kind":"sanskrit_shloka","page":244,"verses":["10.16.38"],"text":"यदिच्छतः स्याद् विभवः समक्षः॥ ३८"},{"b":29262,"kind":"hindi_commentary","page":244,"explains":["10.16.38"],"text":"स्वामी! यह नागराज तमोगुणी योनिमें उत्पन्‍न हुआ है और अत्यन्त क्रोधी है। फिर भी इसे आपकी वह परम पवित्र चरणरज प्राप्त हुई, जो दूसरोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है; तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छा-मात्रसे ही संसारचक्रमें पड़े हुए जीवको संसारके वैभव-सम्पत्तिकी तो बात ही क्या—मोक्षकी भी प्राप्ति हो जाती है॥ ३८॥"},{"b":29263,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.39"],"text":"नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने।"},{"b":29264,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.39"],"text":"भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने॥ ३९"},{"b":29265,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.40"],"text":"ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।"},{"b":29266,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.40"],"text":"अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च॥ ४०"},{"b":29267,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.41"],"text":"कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे।"},{"b":29268,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.41"],"text":"विश्‍वाय तदुपद्रष्ट्रे तत्कर्त्रे विश्‍वहेतवे॥ ४१"},{"b":29269,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.42"],"text":"भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोबुद्ध्याशयात्मने ।"},{"b":29270,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.42"],"text":"त्रिगुणेनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये॥ ४२"},{"b":29271,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.43"],"text":"नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय कूटस्थाय विपश्‍चिते।"},{"b":29272,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.43"],"text":"नानावादानुरोधाय वाच्यवाचकशक्तये॥ ४३"},{"b":29273,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.44"],"text":"नमः प्रमाणमूलाय कवये शास्त्रयोनये।"},{"b":29274,"kind":"sanskrit_shloka","page":245,"verses":["10.16.44"],"text":"प्रवृत्ताय निवृत्ताय निगमाय नमो नमः॥ ४४"},{"b":29275,"kind":"hindi_translation","page":245,"explains":["10.16.39","10.16.40","10.16.41","10.16.42","10.16.43","10.16.44"],"text":"प्रभो! हम आपको प्रणाम करती हैं। आप अनन्त एवं अचिन्त्य ऐश्‍वर्यके नित्य निधि हैं। आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान होनेपर भी अनन्त हैं। आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके आश्रय तथा सब पदार्थोंके रूपमें भी विद्यमान हैं। आप प्रकृतिसे परे स्वयं परमात्मा हैं॥ ३९॥ आप सब प्रकारके ज्ञान और अनुभवोंके खजाने हैं। आपकी महिमा और शक्ति अनन्त है। आपका स्वरूप अप्राकृत—दिव्य चिन्मय है, प्राकृतिक गुणों एवं विकारोंका आप कभी स्पर्श ही नहीं करते। आप ही ब्रह्म हैं, हम आपको नमस्कार कर रही हैं॥ ४०॥ आप प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाले काल हैं, कालशक्तिके आश्रय हैं और कालके क्षण-कल्प आदि समस्त अवयवोंके साक्षी हैं। आप विश्‍वरूप होते हुए भी उससे अलग रहकर उसके द्रष्टा हैं। आप उसके बनानेवाले निमित्तकारण तो हैं ही, उसके रूपमें बननेवाले उपादानकारण भी हैं॥ ४१॥ प्रभो! पंचभूत, उनकी तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और इन सबका खजाना चित्त—ये सब आप ही हैं। तीनों गुण और उनके कार्योंमें होनेवाले अभिमानके द्वारा आपने अपने साक्षात्कारको छिपा रखा है॥ ४२॥ आप देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे बाहर—अनन्त हैं। सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और कार्य-कारणोंके समस्त विकारोंमें भी एकरस, विकाररहित और सर्वज्ञ हैं। ईश्‍वर हैं कि नहीं हैं, सर्वज्ञ हैं कि अल्पज्ञ इत्यादि अनेक मतभेदोंके अनुसार आप उन-उन मतवादियोंको उन्हीं-उन्हीं रूपोंमें दर्शन देते हैं। समस्त शब्दोंके अर्थके रूपमें तो आप हैं ही, शब्दोंके रूपमें भी हैं तथा उन दोनोंका सम्बन्ध जोड़नेवाली शक्ति भी आप ही हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४३॥ प्रत्यक्ष-अनुमान आदि जितने भी प्रमाण हैं, उनको प्रमाणित करनेवाले मूल आप ही हैं। समस्त शास्त्र आपसे ही निकले हैं और आपका ज्ञान स्वतःसिद्ध है। आप ही मनको लगानेकी विधिके रूपमें और उसको सब कहींसे हटा लेनेकी आज्ञाके रूपमें प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग हैं। इन दोनोंके मूल वेद भी स्वयं आप ही हैं। हम आपको बार-बार नमस्कार करती हैं॥ ४४॥"},{"b":29276,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.45"],"text":"नमः कृष्णाय रामाय वसुदेवसुताय च।"},{"b":29277,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.45"],"text":"प्रद्युम्‍नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः॥ ४५"},{"b":29278,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.46"],"text":"नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च।"},{"b":29279,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.46"],"text":"गुणवृत्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्रे स्वसंविदे॥ ४६"},{"b":29280,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.47"],"text":"अव्याकृतविहाराय सर्वव्याकृतसिद्धये।"},{"b":29281,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.47"],"text":"हृषीकेश नमस्तेऽस्तु मुनये मौनशीलिने॥ ४७"},{"b":29282,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.48"],"text":"परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः।"},{"b":29283,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.48"],"text":"अविश्‍वाय च विश्‍वाय तद‍्द्रष्ट्रेऽस्य च हेतवे॥ ४८"},{"b":29284,"kind":"hindi_commentary","page":246,"explains":["10.16.45","10.16.46","10.16.47","10.16.48"],"text":"आप शुद्धसत्त्वमय वसुदेवके पुत्र वासुदेव, संकर्षण एवं प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध भी हैं। इस प्रकार चतुर्व्यूहके रूपमें आप भक्तों तथा यादवोंके स्वामी हैं। श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४५॥ आप अन्तःकरण और उसकी वृत्तियोंके प्रकाशक हैं और उन्हींके द्वारा अपने-आपको ढक रखते हैं। उन अन्तःकरण और वृत्तियोंके द्वारा ही आपके स्वरूपका कुछ-कुछ संकेत भी मिलता है। आप उन गुणों और उनकी वृत्तियोंके साक्षी तथा स्वयंप्रकाश हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४६॥ आप मूलप्रकृतिमें नित्य विहार करते रहते हैं। समस्त स्थूल और सूक्ष्म जगत‍्की सिद्धि आपसे ही होती है। हृषीकेश! आप मननशील आत्माराम हैं। मौन ही आपका स्वभाव है। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४७॥ आप स्थूल, सूक्ष्म समस्त गतियोंके जाननेवाले तथा सबके साक्षी हैं। आप नामरूपात्मक विश्‍वप्रपंचके निषेधकी अवधि तथा उसके अधिष्ठान होनेके कारण विश्‍वरूप भी हैं। आप विश्‍वके अध्यास तथा अपवादके साक्षी हैं एवं अज्ञानके द्वारा उसकी सत्यत्वभ्रान्ति एवं स्वरूपज्ञानके द्वारा उसकी आत्यन्तिक निवृत्तिके भी कारण हैं। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४८॥"},{"b":29285,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.49"],"text":"त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् प्रभो"},{"b":29286,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.49"],"text":"गुणैरनीहोऽकृत कालशक्तिधृक्।"},{"b":29287,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.49"],"text":"तत्तत्स्वभावान् प्रतिबोधयन् सतः"},{"b":29288,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.49"],"text":"समीक्षयामोघविहार ईहसे॥ ४९"},{"b":29289,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.50"],"text":"तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां"},{"b":29290,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.50"],"text":"शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः।"},{"b":29291,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.50"],"text":"शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनावितुं सतां"},{"b":29292,"kind":"sanskrit_shloka","page":246,"verses":["10.16.50"],"text":"स्थातुश्‍च ते धर्मपरीप्सयेहतः॥ ५०"},{"b":29293,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.51"],"text":"अपराधः सकृद् भर्त्रा सोढव्यः स्वप्रजाकृतः।"},{"b":29294,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.51"],"text":"क्षन्तुमर्हसि शान्तात्मन् मूढस्य त्वामजानतः॥ ५१"},{"b":29295,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.52"],"text":"अनुगृह्णीष्व भगवन् प्राणांस्त्यजति पन्‍नगः।"},{"b":29296,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.52"],"text":"स्त्रीणां नः साधुशोच्यानां पतिः प्राणः प्रदीयताम्॥ ५२"},{"b":29297,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.53"],"text":"विधेहि ते किंकरीणामनुष्ठेयं तवाज्ञया।"},{"b":29298,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.53"],"text":"यच्छ्रद्धयानुतिष्ठन् वै मुच्यते सर्वतोभयात्॥ ५३"},{"b":29299,"kind":"hindi_translation","page":246,"explains":["10.16.49","10.16.50","10.16.51","10.16.52","10.16.53"],"text":"प्रभो! यद्यपि कर्तापन न होनेके कारण आप कोई भी कर्म नहीं करते, निष्क्रिय हैं—तथापि अनादि कालशक्तिको स्वीकार करके प्रकृतिके गुणोंके द्वारा आप इस विश्‍वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं। क्योंकि आपकी लीलाएँ अमोघ हैं। आप सत्यसंकल्प हैं। इसलिये जीवोंके संस्काररूपसे छिपे हुए स्वभावोंको अपनी दृष्टिसे जाग्रत् कर देते हैं॥ ४९॥ त्रिलोकीमें तीन प्रकारकी योनियाँ हैं—सत्त्वगुणप्रधान शान्त, रजोगुणप्रधान अशान्त और तमोगुणप्रधान मूढ। वे सब-की-सब आपकी लीला-मूर्तियाँ हैं। फिर भी इस समय आपको सत्त्वगुणप्रधान शान्तजन ही विशेष प्रिय हैं। क्योंकि आपका यह अवतार और ये लीलाएँ साधुजनोंकी रक्षा तथा धर्मकी रक्षा एवं विस्तारके लिये ही हैं॥ ५०॥ शान्तात्मन्! स्वामीको एक बार अपनी प्रजाका अपराध सह लेना चाहिये। यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिये इसे क्षमा कर दीजिये॥ ५१॥ भगवन्! कृपा कीजिये; अब यह सर्प मरने ही वाला है। साधुपुरुष सदासे ही हम अबलाओंपर दया करते आये हैं। अतः आप हमें हमारे प्राणस्वरूप पतिदेवको दे दीजिये॥ ५२॥ हम आपकी दासी हैं। हमें आप आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें? क्योंकि जो श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाओंका पालन—आपकी सेवा करता है, वह सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ५३॥"},{"b":29300,"kind":"hindi_commentary","page":247,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29301,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.54"],"text":"इत्थं स नागपत्‍नीभिर्भगवान् समभिष्टुतः।"},{"b":29302,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.54"],"text":"मूर्च्छितं भ‌ग्‍नशिरसं विससर्जाङ्‌घ्रिकुट्टनैः॥ ५४"},{"b":29303,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.55"],"text":"प्रतिलब्धेन्द्रियप्राणः कालियः शनकैर्हरिम्।"},{"b":29304,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.55"],"text":"कृच्छ्रात् समुच्छ्वसन् दीनः कृष्णं प्राह कृतांजलिः॥ ५५"},{"b":29305,"kind":"hindi_commentary","page":247,"explains":["10.16.54","10.16.55"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्‍न-भिन्‍न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्‍नियोंने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया॥ ५४॥ धीरे-धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनतासे श्‍वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला॥ ५५॥"},{"b":29306,"kind":"topic_heading","page":247,"text":"कालिय उवाच"},{"b":29307,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.56"],"text":"वयं खलाः सहोत्पत्त्या तामसा दीर्घमन्यवः।"},{"b":29308,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.56"],"text":"स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः॥ ५६"},{"b":29309,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.57"],"text":"त्वया सृष्टमिदं विश्‍वं धातर्गुणविसर्जनम्।"},{"b":29310,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.57"],"text":"नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति॥ ५७"},{"b":29311,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.58"],"text":"वयं च तत्र भगवन् सर्पा जात्युरुमन्यवः।"},{"b":29312,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.58"],"text":"कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस्त्यजां मोहिताः स्वयम्॥ ५८"},{"b":29313,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.59"],"text":"भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्‍वरः।"},{"b":29314,"kind":"sanskrit_shloka","page":247,"verses":["10.16.59"],"text":"अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद् विधेहि नः॥ ५९"},{"b":29315,"kind":"hindi_commentary","page":247,"explains":["10.16.56","10.16.57","10.16.58","10.16.59"],"text":"कालिय नागने कहा—नाथ! हम जन्मसे ही दुष्ट, तमोगुणी और बहुत दिनोंके बाद भी बदला लेनेवाले—बड़े क्रोधी जीव हैं। जीवोंके लिये अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है। इसीके कारण संसारके लोग नाना प्रकारके दुराग्रहोंमें फँस जाते हैं॥ ५६॥ विश्‍वविधाता! आपने ही गुणोंके भेदसे इस जगत‍्में नाना प्रकारके स्वभाव, वीर्य, बल, योनि, बीज, चित्त और आकृतियोंका निर्माण किया है॥ ५७॥ भगवन्! आपकी ही सृष्टिमें हम सर्प भी हैं। हम जन्मसे ही बड़े क्रोधी होते हैं। हम इस मायाके चक्करमें स्वयं मोहित हो रहे हैं। फिर अपने प्रयत्‍नसे इस दुस्त्यज मायाका त्याग कैसे करें॥ ५८॥ आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत‍्के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस मायाके कारण हैं। अब आप अपनी इच्छासे—जैसा ठीक समझें—कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये॥ ५९॥"},{"b":29316,"kind":"topic_heading","page":247,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29317,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.60"],"text":"इत्याकर्ण्य वचः प्राह भगवान् कार्यमानुषः।"},{"b":29318,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.60"],"text":"नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम्।"},{"b":29319,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.60"],"text":"स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यतां नदी॥ ६०"},{"b":29320,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.61"],"text":"य एतत् संस्मरेन्मर्त्यस्तुभ्यं मदनुशासनम्।"},{"b":29321,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.61"],"text":"कीर्तयन्‍नुभयोः सन्ध्योर्न युष्मद् भयमाप्नुयात्॥ ६१"},{"b":29322,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.62"],"text":"योऽस्मिन् स्नात्वा मदाक्रीडे देवादींस्तर्पयेज्जलैः।"},{"b":29323,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.62"],"text":"उपोष्य मां स्मरन्‍नर्चेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ६२"},{"b":29324,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.63"],"text":"द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः।"},{"b":29325,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.63"],"text":"यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम्॥ ६३"},{"b":29326,"kind":"hindi_commentary","page":248,"explains":["10.16.60","10.16.61","10.16.62","10.16.63"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—कालिय नागकी बात सुनकर लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘सर्प! अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये। तू अपने जाति-भाई, पुत्र और स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही यहाँसे समुद्रमें चला जा। अब गौएँ और मनुष्य यमुना-जलका उपभोग करें॥ ६०॥ जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञाका स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपोंसे कभी भय न हो॥ ६१॥ मैंने इस कालियदहमें क्रीड़ा की है। इसलिये जो पुरुष इसमें स्नान करके जलसे देवता और पितरोंका तर्पण करेगा, एवं उपवास करके मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा—वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ६२॥ मैं जानता हूँ कि तू गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं॥ ६३॥"},{"b":29327,"kind":"topic_heading","page":247,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29328,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.64"],"text":"एवमुक्तो भगवता कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।"},{"b":29329,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.64"],"text":"तं पूजयामास मुदा नागपत्‍न्यश्‍च सादरम्॥ ६४"},{"b":29330,"kind":"hindi_commentary","page":248,"explains":["10.16.64"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णकी एक-एक लीला अद्भुत है। उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्‍नियोंने आनन्दसे भरकर बड़े आदरसे उनकी पूजा की॥ ६४॥"},{"b":29331,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.65"],"text":"दिव्याम्बरस्रङ्मणिभिः परार्घ्यैरपि भूषणैः।"},{"b":29332,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.65"],"text":"दिव्यगन्धानुलेपैश्‍च महत्योत्पलमालया॥ ६५"},{"b":29333,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.66"],"text":"पूजयित्वा जगन्‍नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम्।"},{"b":29334,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.66"],"text":"ततः प्रीतोऽभ्यनुज्ञातः परिक्रम्याभिवन्द्य तम्॥ ६६"},{"b":29335,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.67"],"text":"सकलत्रसुहृत्पुत्रो द्वीपमब्धेर्जगाम ह।"},{"b":29336,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.67"],"text":"तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत्।"},{"b":29337,"kind":"sanskrit_shloka","page":248,"verses":["10.16.67"],"text":"अनुग्रहाद् भगवतः क्रीडामानुषरूपिणः॥ ६७"},{"b":29338,"kind":"hindi_translation","page":248,"explains":["10.16.65","10.16.66","10.16.67"],"text":"उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत‍्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्‍नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया॥ ६५—६७॥"},{"b":29339,"kind":"hindi_translation","page":248,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कालियमोक्षणं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":6,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}