{"id":"10.17","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 17","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ सप्तदशोऽध्यायः","topics":["कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्‌का व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[248,251]},"verses":[{"id":"10.17.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/1/","page":249,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["नागालयं रमणकं कस्मात्तत्याज कालियः।","कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमंजसम्॥ १"],"iast":["nāgālayaṃ ramaṇakaṃ kasmāttatyāja kāliyaḥ|","kṛtaṃ kiṃ vā suparṇasya tenaikenāsamaṃjasam|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! कालिय नागने नागोंके निवासस्थान रमणक द्वीपको क्यों छोड़ा था? और उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन-सा अपराध किया था?॥ १॥"},{"id":"10.17.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/2/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपहार्यैः सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलिः।","वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ् निरूपितः॥ २"],"iast":["upahāryaiḥ sarpajanairmāsi māsīha yo baliḥ|","vānaspatyo mahābāho nāgānāṃ prāṅ nirūpitaḥ|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवीजीने कहा—परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय॥ २॥"},{"id":"10.17.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/3/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि।","गोपीथायात्मनः सर्वे सुपर्णाय महात्मने॥ ३"],"iast":["svaṃ svaṃ bhāgaṃ prayacchanti nāgāḥ parvaṇi parvaṇi|","gopīthāyātmanaḥ sarve suparṇāya mahātmane|| 3"],"meaning":"इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना-अपना भाग देते रहते थे॥ ३॥"},{"id":"10.17.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/4/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विषवीर्यमदाविष्टः काद्रवेयस्तु कालियः।","कदर्थीकृत्य गरुडं स्वयं तं बुभुजे बलिम्॥ ४"],"iast":["viṣavīryamadāviṣṭaḥ kādraveyastu kāliyaḥ|","kadarthīkṛtya garuḍaṃ svayaṃ taṃ bubhuje balim|| 4"],"meaning":"उन सर्पोंमें कद्रूका पुत्र कालिय नाग अपने विष और बलके घमंडसे मतवाला हो रहा था। उसने गरुडका तिरस्कार करके स्वयं तो बलि देना दूर रहा—दूसरे साँप जो गरुडको बलि देते, उसे भी खा लेता॥ ४॥"},{"id":"10.17.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/5/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तच्छ्रुत्वा कुपितो राजन् भगवान् भगवत्प्रियः।","विजिघांसुर्महावेगः कालियं समुपाद्रवत्॥ ५"],"iast":["tacchrutvā kupito rājan bhagavān bhagavatpriyaḥ|","vijighāṃsurmahāvegaḥ kāliyaṃ samupādravat|| 5"],"meaning":"परीक्षित्! यह सुनकर भगवान्‌के प्यारे पार्षद शक्तिशाली गरुडको बड़ा क्रोध आया। इसलिये उन्होंने कालिय नागको मार डालनेके विचारसे बड़े वेगसे उसपर आक्रमण किया॥ ५॥"},{"id":"10.17.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/6/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमापतन्तं तरसा विषायुधः","प्रत्यभ्ययादुच्छ्रितनैकमस्तकः ।","दद्भिः सुपर्णं व्यदशद् ददायुधः","करालजिह्वोच्छ्वसितोग्रलोचनः ॥ ६"],"iast":["tamāpatantaṃ tarasā viṣāyudhaḥ","pratyabhyayāducchritanaikamastakaḥ |","dadbhiḥ suparṇaṃ vyadaśad dadāyudhaḥ","karālajihvocchvasitogralocanaḥ || 6"],"meaning":"विषधर कालिय नागने जब देखा कि गरुड बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण करने आ रहे हैं, तब वह अपने एक सौ एक फण फैलाकर डसनेके लिये उनपर टूट पड़ा। उसके पास शस्त्र थे केवल दाँत, इसलिये उसने दाँतोंसे गरुडको डस लिया। उस समय वह अपनी भयावनी जीभें लपलपा रहा था, उसकी साँस लंबी चल रही थी और आँखें बड़ी डरावनी जान पड़ती थीं॥ ६॥"},{"id":"10.17.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/7/","page":249,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं तार्क्ष्यपुत्रः स निरस्य मन्युमान्","प्रचण्डवेगो मधुसूदनासनः।","पक्षेण सव्येन हिरण्यरोचिषा","जघान कद्रूसुतमुग्रविक्रमः॥ ७"],"iast":["taṃ tārkṣyaputraḥ sa nirasya manyumān","pracaṇḍavego madhusūdanāsanaḥ|","pakṣeṇa savyena hiraṇyarociṣā","jaghāna kadrūsutamugravikramaḥ|| 7"],"meaning":"तार्क्ष्यनन्दन गरुडजी विष्णुभगवान्‌के वाहन हैं और उनका वेग तथा पराक्रम भी अतुलनीय है। कालिय नागकी यह ढिठाई देखकर उनका क्रोध और भी बढ़ गया तथा उन्होंने उसे अपने शरीरसे झटककर फेंक दिया एवं अपने सुनहले बायें पंखसे कालिय नागपर बड़े जोरसे प्रहार किया॥ ७॥"},{"id":"10.17.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/8/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः।","ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम्॥ ८"],"iast":["suparṇapakṣābhihataḥ kāliyo'tīva vihvalaḥ|","hradaṃ viveśa kālindyāstadagamyaṃ durāsadam|| 8"],"meaning":"उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया। यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे॥ ८॥"},{"id":"10.17.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/9/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम्।","निवारितः सौभरिणा प्रसह्य क्षुधितोऽहरत्॥ ९"],"iast":["tatraikadā jalacaraṃ garuḍo bhakṣyamīpsitam|","nivāritaḥ saubhariṇā prasahya kṣudhito'harat|| 9"],"meaning":"इसी स्थानपर एक दिन क्षुधातुर गरुडने तपस्वी सौभरिके मना करनेपर भी अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्यको बलपूर्वक पकड़कर खा लिया॥ ९॥"},{"id":"10.17.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/10/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मीनान् सुदुःखितान् दृष्ट्वा दीनान् मीनपतौ हते।","कृपया सौभरिः प्राह तत्रत्यक्षेममाचरन्॥ १०"],"iast":["mīnān suduḥkhitān dṛṣṭvā dīnān mīnapatau hate|","kṛpayā saubhariḥ prāha tatratyakṣemamācaran|| 10"],"meaning":"अपने मुखिया मत्स्यराजके मारे जानेके कारण मछलियोंको बड़ा कष्ट हुआ। वे अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयीं। उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौभरिको बड़ी दया आयी। उन्होंने उस कुण्डमें रहने-वाले सब जीवोंकी भलाईके लिये गरुडको यह शाप दे दिया॥ १०॥"},{"id":"10.17.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/11/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति।","सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ११"],"iast":["atra praviśya garuḍo yadi matsyān sa khādati|","sadyaḥ prāṇairviyujyeta satyametad bravīmyaham|| 11"],"meaning":"‘यदि गरुड फिर कभी इस कुण्डमें घुसकर मछलियोंको खायेंगे, तो उसी क्षण प्राणोंसे हाथ धो बैठेंगे। मैं यह सत्य-सत्य कहता हूँ’॥ ११॥"},{"id":"10.17.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/12/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं कालियः परं वेद नान्यः कश्‍चन लेलिहः।","अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः॥ १२"],"iast":["taṃ kāliyaḥ paraṃ veda nānyaḥ kaścana lelihaḥ|","avātsīd garuḍād bhītaḥ kṛṣṇena ca vivāsitaḥ|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! महर्षि सौभरिके इस शापकी बात कालिय नागके सिवा और कोई साँप नहीं जानता था। इसलिये वह गरुडके भयसे वहाँ रहने लगा था और अब भगवान् श्रीकृष्णने उसे निर्भय करके वहाँसे रमणक द्वीपमें भेज दिया॥ १२॥"},{"id":"10.17.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/13/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णं ह्रदाद् विनिष्क्रान्तं दिव्यस्रग्गन्धवाससम्।","महामणिगणाकीर्णं जाम्बूनदपरिष्कृतम्॥ १३"],"iast":["kṛṣṇaṃ hradād viniṣkrāntaṃ divyasraggandhavāsasam|","mahāmaṇigaṇākīrṇaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam|| 13"],"meaning":"परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस कुण्डसे बाहर निकले॥ १३॥"},{"id":"10.17.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/14/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपलभ्योत्थिताः सर्वे लब्धप्राणा इवासवः।","प्रमोदनिभृतात्मानो गोपाः प्रीत्याभिरेभिरे॥ १४"],"iast":["upalabhyotthitāḥ sarve labdhaprāṇā ivāsavaḥ|","pramodanibhṛtātmāno gopāḥ prītyābhirebhire|| 14"],"meaning":"उनको देखकर सब-के-सब व्रजवासी इस प्रकार उठ खड़े हुए, जैसे प्राणोंको पाकर इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं। सभी गोपोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे बड़े प्रेम और प्रसन्‍नतासे अपने कन्हैयाको हृदयसे लगाने लगे॥ १४॥"},{"id":"10.17.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/15/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यशोदा रोहिणी नन्दो गोप्यो गोपाश्‍च कौरव।","कृष्णं समेत्य लब्धेहा आसँल्लब्धमनोरथाः॥ १५"],"iast":["yaśodā rohiṇī nando gopyo gopāśca kaurava|","kṛṣṇaṃ sametya labdhehā āsam̐llabdhamanorathāḥ|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा, गोपी और गोप—सभी श्रीकृष्णको पाकर सचेत हो गये। उनका मनोरथ सफल हो गया॥ १५॥"},{"id":"10.17.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/16/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रामश्‍चाच्युतमालिंग्य जहासास्यानुभाववित्।","नगा गावो वृषा वत्सा लेभिरे परमां मुदम्॥ १६"],"iast":["rāmaścācyutamāliṃgya jahāsāsyānubhāvavit|","nagā gāvo vṛṣā vatsā lebhire paramāṃ mudam|| 16"],"meaning":"बलरामजी तो भगवान्‌का प्रभाव जानते ही थे। वे श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर हँसने लगे। पर्वत, वृक्ष, गाय, बैल, बछड़े—सब-के-सब आनन्दम‌ग्‍न हो गये॥ १६॥"},{"id":"10.17.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/17/","page":250,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दं विप्राः समागत्य गुरवः सकलत्रकाः।","ऊचुस्ते कालियग्रस्तो दिष्ट्या मुक्तस्तवात्मजः॥ १७"],"iast":["nandaṃ viprāḥ samāgatya guravaḥ sakalatrakāḥ|","ūcuste kāliyagrasto diṣṭyā muktastavātmajaḥ|| 17"],"meaning":"गोपोंके कुलगुरु ब्राह्मणोंने अपनी पत्‍नियोंके साथ नन्दबाबाके पास आकर कहा—‘नन्दजी! तुम्हारे बालकको कालिय नागने पकड़ लिया था। सो छूटकर आ गया। यह बड़े सौभाग्यकी बात है!॥ १७॥"},{"id":"10.17.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/18/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देहि दानं द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे।","नन्दः प्रीतमना राजन् गाः सुवर्णं तदादिशत्॥ १८"],"iast":["dehi dānaṃ dvijātīnāṃ kṛṣṇanirmuktihetave|","nandaḥ prītamanā rājan gāḥ suvarṇaṃ tadādiśat|| 18"],"meaning":"श्रीकृष्णके मृत्युके मुखसे लौट आनेके उपलक्ष्यमें तुम ब्राह्मणोंको दान करो।’ परीक्षित्! ब्राह्मणोंकी बात सुनकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्‍नता हुई। उन्होंने बहुत-सा सोना और गौएँ ब्राह्मणोंको दान दीं॥ १८॥"},{"id":"10.17.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/19/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यशोदापि महाभागा नष्टलब्धप्रजा सती।","परिष्वज्याङ्कमारोप्य मुमोचाश्रुकलां मुहुः॥ १९"],"iast":["yaśodāpi mahābhāgā naṣṭalabdhaprajā satī|","pariṣvajyāṅkamāropya mumocāśrukalāṃ muhuḥ|| 19"],"meaning":"परम सौभाग्यवती देवी यशोदाने भी कालके गालसे बचे हुए अपने लालको गोदमें लेकर हृदयसे चिपका लिया। उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें बार-बार टपकी पड़ती थीं॥ १९॥"},{"id":"10.17.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/20/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तां रात्रिं तत्र राजेन्द्र क्षुत्तृड्भ्यां श्रमकर्शिताः।","ऊषुर्व्रजौकसो गावः कालिन्द्या उपकूलतः॥ २०"],"iast":["tāṃ rātriṃ tatra rājendra kṣuttṛḍbhyāṃ śramakarśitāḥ|","ūṣurvrajaukaso gāvaḥ kālindyā upakūlataḥ|| 20"],"meaning":"राजेन्द्र! व्रजवासी और गौएँ सब बहुत ही थक गये थे। ऊपरसे भूख-प्यास भी लग रही थी। इसलिये उस रात वे व्रजमें नहीं गये, वहीं यमुनाजीके तटपर सो रहे॥ २०॥"},{"id":"10.17.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/21/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदा शुचिवनोद्भूतो दावाग्‍निः सर्वतो व्रजम्।","सुप्तं निशीथ आवृत्य प्रदग्धुमुपचक्रमे॥ २१"],"iast":["tadā śucivanodbhūto dāvāgniḥ sarvato vrajam|","suptaṃ niśītha āvṛtya pradagdhumupacakrame|| 21"],"meaning":"गर्मीके दिन थे, उधरका वन सूख गया था। आधी रातके समय उसमें आग लग गयी। उस आगने सोये हुए व्रजवासियोंको चारों ओरसे घेर लिया और वह उन्हें जलाने लगी॥ २१॥"},{"id":"10.17.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/22/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत उत्थाय सम्भ्रान्ता दह्यमाना व्रजौकसः।","कृष्णं ययुस्ते शरणं मायामनुजमीश्‍वरम्॥ २२"],"iast":["tata utthāya sambhrāntā dahyamānā vrajaukasaḥ|","kṛṣṇaṃ yayuste śaraṇaṃ māyāmanujamīśvaram|| 22"],"meaning":"आगकी आँच लगनेपर व्रजवासी घबड़ाकर उठ खड़े हुए और लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें गये॥ २२॥"},{"id":"10.17.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/23/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्ण कृष्ण महाभाग हे रामामितविक्रम।","एष घोरतमो वह्निस्तावकान् ग्रसते हि नः॥ २३"],"iast":["kṛṣṇa kṛṣṇa mahābhāga he rāmāmitavikrama|","eṣa ghoratamo vahnistāvakān grasate hi naḥ|| 23"],"meaning":"उन्होंने कहा—‘प्यारे श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! महाभाग्यवान् बलराम! तुम दोनोंका बल-विक्रम अनन्त है। देखो, देखो, यह भयंकर आग तुम्हारे सगे-सम्बन्धी हम स्वजनोंको जलाना ही चाहती है॥ २३॥"},{"id":"10.17.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/24/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुदुस्तरान्‍नः स्वान् पाहि काला‌ग्‍नेः सुहृदः प्रभो।","न शक्‍नुमस्त्वच्चरणं संत्यक्तुमकुतोभयम्॥ २४"],"iast":["sudustarānnaḥ svān pāhi kālāgneḥ suhṛdaḥ prabho|","na śaknumastvaccaraṇaṃ saṃtyaktumakutobhayam|| 24"],"meaning":"तुममें सब सामर्थ्य है। हम तुम्हारे सुहृद् हैं, इसलिये इस प्रलयकी अपार आगसे हमें बचाओ। प्रभो! हम मृत्युसे नहीं डरते, परन्तु तुम्हारे अकुतोभय चरणकमल छोड़नेमें हम असमर्थ हैं॥ २४॥"},{"id":"10.17.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/17/25/","page":251,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं स्वजनवैक्लव्यं निरीक्ष्य जगदीश्‍वरः।","तमग्‍निमपिबत्तीव्रमनन्तोऽनन्तशक्तिधृक्॥ २५"],"iast":["itthaṃ svajanavaiklavyaṃ nirīkṣya jagadīśvaraḥ|","tamagnimapibattīvramananto'nantaśaktidhṛk|| 25"],"meaning":"भगवान् अनन्त हैं; वे अनन्त शक्तियोंको धारण करते हैं, उन जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि मेरे स्वजन इस प्रकार व्याकुल हो रहे हैं तब वे उस भयंकर आगको पी गये॥ २५॥"}],"text":[{"b":29341,"kind":"adhyaya_heading","page":249,"text":"अथ सप्तदशोऽध्यायः"},{"b":29342,"kind":"topic_heading","page":249,"text":"कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्‌का व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना"},{"b":29343,"kind":"topic_heading","page":249,"text":"राजोवाच"},{"b":29344,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.1"],"text":"नागालयं रमणकं कस्मात्तत्याज कालियः।"},{"b":29345,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.1"],"text":"कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमंजसम्॥ १"},{"b":29346,"kind":"hindi_commentary","page":249,"explains":["10.17.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! कालिय नागने नागोंके निवासस्थान रमणक द्वीपको क्यों छोड़ा था? और उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन-सा अपराध किया था?॥ १॥"},{"b":29347,"kind":"topic_heading","page":248,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29348,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.2"],"text":"उपहार्यैः सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलिः।"},{"b":29349,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.2"],"text":"वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ् निरूपितः॥ २"},{"b":29350,"kind":"hindi_commentary","page":249,"explains":["10.17.2"],"text":"श्रीशुकदेवीजीने कहा—परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय॥ २॥"},{"b":29351,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.3"],"text":"स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि।"},{"b":29352,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.3"],"text":"गोपीथायात्मनः सर्वे सुपर्णाय महात्मने॥ ३"},{"b":29353,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.4"],"text":"विषवीर्यमदाविष्टः काद्रवेयस्तु कालियः।"},{"b":29354,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.4"],"text":"कदर्थीकृत्य गरुडं स्वयं तं बुभुजे बलिम्॥ ४"},{"b":29355,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.5"],"text":"तच्छ्रुत्वा कुपितो राजन् भगवान् भगवत्प्रियः।"},{"b":29356,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.5"],"text":"विजिघांसुर्महावेगः कालियं समुपाद्रवत्॥ ५"},{"b":29357,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.6"],"text":"तमापतन्तं तरसा विषायुधः"},{"b":29358,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.6"],"text":"प्रत्यभ्ययादुच्छ्रितनैकमस्तकः ।"},{"b":29359,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.6"],"text":"दद्भिः सुपर्णं व्यदशद् ददायुधः"},{"b":29360,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.6"],"text":"करालजिह्वोच्छ्वसितोग्रलोचनः ॥ ६"},{"b":29361,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.7"],"text":"तं तार्क्ष्यपुत्रः स निरस्य मन्युमान्"},{"b":29362,"kind":"sanskrit_shloka","page":249,"verses":["10.17.7"],"text":"प्रचण्डवेगो मधुसूदनासनः।"},{"b":29363,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.7"],"text":"पक्षेण सव्येन हिरण्यरोचिषा"},{"b":29364,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.7"],"text":"जघान कद्रूसुतमुग्रविक्रमः॥ ७"},{"b":29365,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.8"],"text":"सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः।"},{"b":29366,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.8"],"text":"ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम्॥ ८"},{"b":29367,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.9"],"text":"तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम्।"},{"b":29368,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.9"],"text":"निवारितः सौभरिणा प्रसह्य क्षुधितोऽहरत्॥ ९"},{"b":29369,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.10"],"text":"मीनान् सुदुःखितान् दृष्ट्वा दीनान् मीनपतौ हते।"},{"b":29370,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.10"],"text":"कृपया सौभरिः प्राह तत्रत्यक्षेममाचरन्॥ १०"},{"b":29371,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.11"],"text":"अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति।"},{"b":29372,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.11"],"text":"सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ११"},{"b":29373,"kind":"hindi_translation","page":249,"explains":["10.17.3","10.17.4","10.17.5","10.17.6","10.17.7","10.17.8","10.17.9","10.17.10","10.17.11"],"text":"इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना-अपना भाग देते रहते थे॥ ३॥ उन सर्पोंमें कद्रूका पुत्र कालिय नाग अपने विष और बलके घमंडसे मतवाला हो रहा था। उसने गरुडका तिरस्कार करके स्वयं तो बलि देना दूर रहा—दूसरे साँप जो गरुडको बलि देते, उसे भी खा लेता॥ ४॥ परीक्षित्! यह सुनकर भगवान्‌के प्यारे पार्षद शक्तिशाली गरुडको बड़ा क्रोध आया। इसलिये उन्होंने कालिय नागको मार डालनेके विचारसे बड़े वेगसे उसपर आक्रमण किया॥ ५॥ विषधर कालिय नागने जब देखा कि गरुड बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण करने आ रहे हैं, तब वह अपने एक सौ एक फण फैलाकर डसनेके लिये उनपर टूट पड़ा। उसके पास शस्त्र थे केवल दाँत, इसलिये उसने दाँतोंसे गरुडको डस लिया। उस समय वह अपनी भयावनी जीभें लपलपा रहा था, उसकी साँस लंबी चल रही थी और आँखें बड़ी डरावनी जान पड़ती थीं॥ ६॥ तार्क्ष्यनन्दन गरुडजी विष्णुभगवान्‌के वाहन हैं और उनका वेग तथा पराक्रम भी अतुलनीय है। कालिय नागकी यह ढिठाई देखकर उनका क्रोध और भी बढ़ गया तथा उन्होंने उसे अपने शरीरसे झटककर फेंक दिया एवं अपने सुनहले बायें पंखसे कालिय नागपर बड़े जोरसे प्रहार किया॥ ७॥ उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया। यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे॥ ८॥ इसी स्थानपर एक दिन क्षुधातुर गरुडने तपस्वी सौभरिके मना करनेपर भी अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्यको बलपूर्वक पकड़कर खा लिया॥ ९॥ अपने मुखिया मत्स्यराजके मारे जानेके कारण मछलियोंको बड़ा कष्ट हुआ। वे अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयीं। उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौभरिको बड़ी दया आयी। उन्होंने उस कुण्डमें रहने-वाले सब जीवोंकी भलाईके लिये गरुडको यह शाप दे दिया॥ १०॥ ‘यदि गरुड फिर कभी इस कुण्डमें घुसकर मछलियोंको खायेंगे, तो उसी क्षण प्राणोंसे हाथ धो बैठेंगे। मैं यह सत्य-सत्य कहता हूँ’॥ ११॥"},{"b":29374,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.12"],"text":"तं कालियः परं वेद नान्यः कश्‍चन लेलिहः।"},{"b":29375,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.12"],"text":"अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः॥ १२"},{"b":29376,"kind":"hindi_translation","page":250,"explains":["10.17.12"],"text":"परीक्षित्! महर्षि सौभरिके इस शापकी बात कालिय नागके सिवा और कोई साँप नहीं जानता था। इसलिये वह गरुडके भयसे वहाँ रहने लगा था और अब भगवान् श्रीकृष्णने उसे निर्भय करके वहाँसे रमणक द्वीपमें भेज दिया॥ १२॥"},{"b":29377,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.13"],"text":"कृष्णं ह्रदाद् विनिष्क्रान्तं दिव्यस्रग्गन्धवाससम्।"},{"b":29378,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.13"],"text":"महामणिगणाकीर्णं जाम्बूनदपरिष्कृतम्॥ १३"},{"b":29379,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.14"],"text":"उपलभ्योत्थिताः सर्वे लब्धप्राणा इवासवः।"},{"b":29380,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.14"],"text":"प्रमोदनिभृतात्मानो गोपाः प्रीत्याभिरेभिरे॥ १४"},{"b":29381,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.15"],"text":"यशोदा रोहिणी नन्दो गोप्यो गोपाश्‍च कौरव।"},{"b":29382,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.15"],"text":"कृष्णं समेत्य लब्धेहा आसँल्लब्धमनोरथाः॥ १५"},{"b":29383,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.16"],"text":"रामश्‍चाच्युतमालिंग्य जहासास्यानुभाववित्।"},{"b":29384,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.16"],"text":"नगा गावो वृषा वत्सा लेभिरे परमां मुदम्॥ १६"},{"b":29385,"kind":"hindi_translation","page":250,"explains":["10.17.13","10.17.14","10.17.15","10.17.16"],"text":"परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस कुण्डसे बाहर निकले॥ १३॥ उनको देखकर सब-के-सब व्रजवासी इस प्रकार उठ खड़े हुए, जैसे प्राणोंको पाकर इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं। सभी गोपोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे बड़े प्रेम और प्रसन्‍नतासे अपने कन्हैयाको हृदयसे लगाने लगे॥ १४॥ परीक्षित्! यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा, गोपी और गोप—सभी श्रीकृष्णको पाकर सचेत हो गये। उनका मनोरथ सफल हो गया॥ १५॥ बलरामजी तो भगवान्‌का प्रभाव जानते ही थे। वे श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर हँसने लगे। पर्वत, वृक्ष, गाय, बैल, बछड़े—सब-के-सब आनन्दम‌ग्‍न हो गये॥ १६॥"},{"b":29386,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.17"],"text":"नन्दं विप्राः समागत्य गुरवः सकलत्रकाः।"},{"b":29387,"kind":"sanskrit_shloka","page":250,"verses":["10.17.17"],"text":"ऊचुस्ते कालियग्रस्तो दिष्ट्या मुक्तस्तवात्मजः॥ १७"},{"b":29388,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.18"],"text":"देहि दानं द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे।"},{"b":29389,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.18"],"text":"नन्दः प्रीतमना राजन् गाः सुवर्णं तदादिशत्॥ १८"},{"b":29390,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.19"],"text":"यशोदापि महाभागा नष्टलब्धप्रजा सती।"},{"b":29391,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.19"],"text":"परिष्वज्याङ्कमारोप्य मुमोचाश्रुकलां मुहुः॥ १९"},{"b":29392,"kind":"hindi_translation","page":250,"explains":["10.17.17","10.17.18","10.17.19"],"text":"गोपोंके कुलगुरु ब्राह्मणोंने अपनी पत्‍नियोंके साथ नन्दबाबाके पास आकर कहा—‘नन्दजी! तुम्हारे बालकको कालिय नागने पकड़ लिया था। सो छूटकर आ गया। यह बड़े सौभाग्यकी बात है!॥ १७॥ श्रीकृष्णके मृत्युके मुखसे लौट आनेके उपलक्ष्यमें तुम ब्राह्मणोंको दान करो।’ परीक्षित्! ब्राह्मणोंकी बात सुनकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्‍नता हुई। उन्होंने बहुत-सा सोना और गौएँ ब्राह्मणोंको दान दीं॥ १८॥ परम सौभाग्यवती देवी यशोदाने भी कालके गालसे बचे हुए अपने लालको गोदमें लेकर हृदयसे चिपका लिया। उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें बार-बार टपकी पड़ती थीं॥ १९॥"},{"b":29393,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.20"],"text":"तां रात्रिं तत्र राजेन्द्र क्षुत्तृड्भ्यां श्रमकर्शिताः।"},{"b":29394,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.20"],"text":"ऊषुर्व्रजौकसो गावः कालिन्द्या उपकूलतः॥ २०"},{"b":29395,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.21"],"text":"तदा शुचिवनोद्भूतो दावाग्‍निः सर्वतो व्रजम्।"},{"b":29396,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.21"],"text":"सुप्तं निशीथ आवृत्य प्रदग्धुमुपचक्रमे॥ २१"},{"b":29397,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.22"],"text":"तत उत्थाय सम्भ्रान्ता दह्यमाना व्रजौकसः।"},{"b":29398,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.22"],"text":"कृष्णं ययुस्ते शरणं मायामनुजमीश्‍वरम्॥ २२"},{"b":29399,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.23"],"text":"कृष्ण कृष्ण महाभाग हे रामामितविक्रम।"},{"b":29400,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.23"],"text":"एष घोरतमो वह्निस्तावकान् ग्रसते हि नः॥ २३"},{"b":29401,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.24"],"text":"सुदुस्तरान्‍नः स्वान् पाहि काला‌ग्‍नेः सुहृदः प्रभो।"},{"b":29402,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.24"],"text":"न शक्‍नुमस्त्वच्चरणं संत्यक्तुमकुतोभयम्॥ २४"},{"b":29403,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.25"],"text":"इत्थं स्वजनवैक्लव्यं निरीक्ष्य जगदीश्‍वरः।"},{"b":29404,"kind":"sanskrit_shloka","page":251,"verses":["10.17.25"],"text":"तमग्‍निमपिबत्तीव्रमनन्तोऽनन्तशक्तिधृक्॥ २५"},{"b":29405,"kind":"hindi_translation","page":251,"explains":["10.17.20","10.17.21","10.17.22","10.17.23","10.17.24","10.17.25"],"text":"राजेन्द्र! व्रजवासी और गौएँ सब बहुत ही थक गये थे। ऊपरसे भूख-प्यास भी लग रही थी। इसलिये उस रात वे व्रजमें नहीं गये, वहीं यमुनाजीके तटपर सो रहे॥ २०॥ गर्मीके दिन थे, उधरका वन सूख गया था। आधी रातके समय उसमें आग लग गयी। उस आगने सोये हुए व्रजवासियोंको चारों ओरसे घेर लिया और वह उन्हें जलाने लगी॥ २१॥ आगकी आँच लगनेपर व्रजवासी घबड़ाकर उठ खड़े हुए और लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें गये॥ २२॥ उन्होंने कहा—‘प्यारे श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! महाभाग्यवान् बलराम! तुम दोनोंका बल-विक्रम अनन्त है। देखो, देखो, यह भयंकर आग तुम्हारे सगे-सम्बन्धी हम स्वजनोंको जलाना ही चाहती है॥ २३॥ तुममें सब सामर्थ्य है। हम तुम्हारे सुहृद् हैं, इसलिये इस प्रलयकी अपार आगसे हमें बचाओ। प्रभो! हम मृत्युसे नहीं डरते, परन्तु तुम्हारे अकुतोभय चरणकमल छोड़नेमें हम असमर्थ हैं॥ २४॥ भगवान् अनन्त हैं; वे अनन्त शक्तियोंको धारण करते हैं, उन जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि मेरे स्वजन इस प्रकार व्याकुल हो रहे हैं तब वे उस भयंकर आगको पी गये॥ २५॥"},{"b":29406,"kind":"hindi_translation","page":251,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे दावाग्‍निमोचनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥"}],"notes":[{"id":"v2:250","mark":"*","page":249,"after_verse":"10.17.11","text":"यह कथा इस प्रकार है—गरुडजीकी माता विनता और सर्पोंकी माता कद्रूमें परस्पर वैर था। माताका वैर स्मरण कर गरुडजी जो सर्प मिलता उसीको खा जाते। इससे व्याकुल होकर सब सर्प ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब ब्रह्माजीने यह नियम कर दिया कि प्रत्येक अमावास्याको प्रत्येक सर्पपरिवार बारी-बारीसे गरुडजीको एक सर्पकी बलि दिया करे।"},{"id":"v2:251","mark":"*","page":251,"after_verse":"10.17.25","text":"अग्‍नि-पान १. मैं सबका दाह दूर करनेके लिये ही अवतीर्ण हुआ हूँ। इसलिये यह दाह दूर करना भी मेरा कर्तव्य है। २. रामावतारमें श्रीजानकीजीको सुरक्षित रखकर अग्‍निने मेरा उपकार किया था। अब उसको अपने मुखमें स्थापित करके उसका सत्कार करना कर्तव्य है। ३. कार्यका कारणमें लय होता है। भगवान्‌के मुखसे अग्‍नि प्रकट हुआ—मुखाद् अग्‍निरजायत। इसलिये भगवान्‌ने उसे मुखमें ही स्थापित किया। ४. मुखके द्वारा अग्‍नि शान्त करके यह भाव प्रकट किया कि भव-दावाग्‍निको शान्त करनेमें भगवान्‌के मुख-स्थानीय ब्राह्मण ही समर्थ हैं।"}],"corrections":{"count":2,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}