{"id":"10.21","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 21","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथैकविंशोऽध्यायः","topics":["वेणुगीत"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.21.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[264,270]},"verses":[{"id":"10.21.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/1/","page":265,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना।","न्यविशद् वायुना वातं सगोगोपालकोऽच्युतः॥ १"],"iast":["itthaṃ śaratsvacchajalaṃ padmākarasugandhinā|","nyaviśad vāyunā vātaṃ sagogopālako'cyutaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरद् ऋतुके कारण वह वन बड़ा सुन्दर हो रहा था। जल निर्मल था और जलाशयोंमें खिले हुए कमलोंकी सुगन्धसे सनकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। भगवान् श्रीकृष्णने गौओं और ग्वालबालोंके साथ उस वनमें प्रवेश किया॥ १॥"},{"id":"10.21.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/2/","page":265,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुसुमितवनराजिशुष्मिभृंग-","द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् ।","मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः","सहपशुपालबलश्‍चुकूज वेणुम्॥ २"],"iast":["kusumitavanarājiśuṣmibhṛṃga-","dvijakulaghuṣṭasaraḥsarinmahīdhram |","madhupatiravagāhya cārayan gāḥ","sahapaśupālabalaścukūja veṇum|| 2"],"meaning":"सुन्दर-सुन्दर पुष्पोंसे परिपूर्ण हरी-हरी वृक्ष-पंक्तियोंमें मतवाले भौंरे स्थान-स्थानपर गुनगुना रहे थे और तरह-तरहके पक्षी झुंड-के-झुंड अलग-अलग कलरव कर रहे थे, जिससे उस वनके सरोवर, नदियाँ और पर्वत—सब-के-सब गूँजते रहते थे। मधुपति श्रीकृष्णने बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ उसके भीतर घुसकर गौओंको चराते हुए अपनी बाँसुरीपर बड़ी मधुर तान छेड़ी॥ २॥"},{"id":"10.21.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/3/","page":265,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।","काश्‍चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन्॥ ३"],"iast":["tad vrajastriya āśrutya veṇugītaṃ smarodayam|","kāścit parokṣaṃ kṛṣṇasya svasakhībhyo'nvavarṇayan|| 3"],"meaning":"श्रीकृष्णकी वह वंशीध्वनि भगवान्‌के प्रति प्रेमभावको, उनके मिलनकी आकांक्षाको जगानेवाली थी। (उसे सुनकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे परिपूर्ण हो गया) वे एकान्तमें अपनी सखियोंसे उनके रूप, गुण और वंशीध्वनिके प्रभावका वर्णन करने लगीं॥ ३॥"},{"id":"10.21.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/4/","page":265,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् वर्णयितुमारब्धाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्।","नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ ४"],"iast":["tad varṇayitumārabdhāḥ smarantyaḥ kṛṣṇaceṣṭitam|","nāśakan smaravegena vikṣiptamanaso nṛpa|| 4"],"meaning":"व्रजकी गोपियोंने वंशीध्वनिका माधुर्य आपसमें वर्णन करना चाहा तो अवश्य; परन्तु वंशीका स्मरण होते ही उन्हें श्रीकृष्णकी मधुर चेष्टाओंकी, प्रेमपूर्ण चितवन, भौंहोंके इशारे और मधुर मुसकान आदिकी याद हो आयी। उनकी भगवान्‌से मिलनेकी आकांक्षा और भी बढ़ गयी। उनका मन हाथसे निकल गया। वे मन-ही-मन वहाँ पहुँच गयीं, जहाँ श्रीकृष्ण थे। अब उनकी वाणी बोले कैसे? वे उसके वर्णनमें असमर्थ हो गयीं॥ ४॥"},{"id":"10.21.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/5/","page":265,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं","बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।","रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-","र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ ५"],"iast":["barhāpīḍaṃ naṭavaravapuḥ karṇayoḥ karṇikāraṃ","bibhrad vāsaḥ kanakakapiśaṃ vaijayantīṃ ca mālām|","randhrān veṇoradharasudhayā pūrayan gopavṛndai-","rvṛndāraṇyaṃ svapadaramaṇaṃ prāviśad gītakīrtiḥ|| 5"],"meaning":"(वे मन-ही-मन देखने लगीं कि) श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानोंपर कनेरके पीले-पीले पुष्प; शरीरपर सुनहला पीताम्बर और गलेमें पाँच प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंकी बनी वैजयन्ती माला है। रंगमंचपर अभिनय करते हुए श्रेष्ठ नटका-सा क्या ही सुन्दर वेष है। बाँसुरीके छिद्रोंको वे अपने अधरामृतसे भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्तिका गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठसे भी श्रेष्ठ वह वृन्दावनधाम उनके चरणचिह्नोंसे और भी रमणीय बन गया है॥ ५॥"},{"id":"10.21.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/6/","page":266,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्।","श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ ६"],"iast":["iti veṇuravaṃ rājan sarvabhūtamanoharam|","śrutvā vrajastriyaḥ sarvā varṇayantyo'bhirebhire|| 6"],"meaning":"परीक्षित्! यह वंशीध्वनि जड, चेतन—समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है। गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं॥ ६॥"},{"id":"10.21.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/7/","page":266,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः","सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः।","वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं","यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ ७"],"iast":["akṣaṇvatāṃ phalamidaṃ na paraṃ vidāmaḥ","sakhyaḥ paśūnanu viveśayatorvayasyaiḥ|","vaktraṃ vrajeśasutayoranuveṇu juṣṭaṃ","yairvā nipītamanuraktakaṭākṣamokṣam|| 7"],"meaning":"गोपियाँ आपसमें बातचीत करने लगीं—अरी सखी! हमने तो आँखवालोंके जीवनकी और उनकी आँखोंकी बस, यही—इतनी ही सफलता समझी है; और तो हमें कुछ मालूम ही नहीं है। वह कौन-सा लाभ है? वह यही है कि जब श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम ग्वालबालोंके साथ गायोंको हाँककर वनमें ले जा रहे हों या लौटाकर व्रजमें ला रहे हों, उन्होंने अपने अधरोंपर मुरली धर रखी हो और प्रेमभरी तिरछी चितवनसे हमारी ओर देख रहे हों, उस समय हम उनकी मुख-माधुरीका पान करती रहें॥ ७॥"},{"id":"10.21.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/8/","page":266,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-","मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेषौ ।","मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां","रंगे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ॥ ८"],"iast":["cūtapravālabarhastabakotpalābja-","mālānupṛktaparidhānavicitraveṣau |","madhye virejaturalaṃ paśupālagoṣṭhyāṃ","raṃge yathā naṭavarau kva ca gāyamānau|| 8"],"meaning":"अरी सखी! जब वे आमकी नयी कोंपलें, मोरोंके पंख, फूलोंके गुच्छे, रंग-बिरंगे कमल और कुमुदकी मालाएँ धारण कर लेते हैं, श्रीकृष्णके साँवरे शरीरपर पीताम्बर और बलरामके गोरे शरीरपर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा ही विचित्र बन जाता है। ग्वालबालोंकी गोष्ठीमें वे दोनों बीचो-बीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीतकी तान छेड़ देते हैं। मेरी प्यारी सखी! उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोभा होती है॥ ८॥"},{"id":"10.21.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/9/","page":266,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-","र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।","भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो","हृष्यत्त्वचोऽश्रुमुमुचुस्तरवो यथाऽऽर्याः॥ ९"],"iast":["gopyaḥ kimācaradayaṃ kuśalaṃ sma veṇu-","rdāmodarādharasudhāmapi gopikānām|","bhuṅkte svayaṃ yadavaśiṣṭarasaṃ hradinyo","hṛṣyattvaco'śrumumucustaravo yathā''ryāḥ|| 9"],"meaning":"अरी गोपियो! यह वेणु पुरुष जातिका होनेपर भी पूर्वजन्ममें न जाने ऐसा कौन-सा साधन-भजन कर चुका है कि हम गोपियोंकी अपनी सम्पत्ति—दामोदरके अधरोंकी सुधा स्वयं ही इस प्रकार पिये जा रहा है कि हमलोगोंके लिये थोड़ा-सा भी रस शेष नहीं रहेगा। इस वेणुको अपने रससे सींचनेवाली ह्रदिनियाँ आज कमलोंके मिस रोमाञ्चित हो रही हैं और अपने वंशमें भगवत्प्रेमी सन्तानोंको देखकर श्रेष्ठ पुरुषोंके समान वृक्ष भी इसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर आँखोंसे आनन्दाश्रु बहा रहे हैं॥ ९॥"},{"id":"10.21.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/10/","page":267,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं","यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि।","गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं","प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम्॥ १०"],"iast":["vṛndāvanaṃ sakhi bhuvo vitanoti kīrtiṃ","yad devakīsutapadāmbujalabdhalakṣmi|","govindaveṇumanu mattamayūranṛtyaṃ","prekṣyādrisānvaparatānyasamastasattvam|| 10"],"meaning":"अरी सखी! यह वृन्दावन वैकुण्ठलोकतक पृथ्वीकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। क्योंकि यशोदानन्दन श्रीकृष्णके चरणकमलोंके चिह्नोंसे यह चिह्नित हो रहा है! सखि! जब श्रीकृष्ण अपनी मुनिजनमोहिनी मुरली बजाते हैं तब मोर मतवाले होकर उसकी तालपर नाचने लगते हैं। यह देखकर पर्वतकी चोटियोंपर विचरनेवाले सभी पशु-पक्षी चुपचाप—शान्त होकर खड़े रह जाते हैं। अरी सखी! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिनियाँ भी वंशीकी तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साथ नन्दनन्दनके पास चली आती हैं और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखोंसे उन्हें निरखने लगती हैं। निरखती क्या हैं, अपनी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्णके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्णकी प्रेमभरी चितवनके द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती हैं।’ वास्तवमें उनका जीवन धन्य है! (हम वृन्दावनकी गोपी होनेपर भी इस प्रकार उनपर अपनेको निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं। कितनी विडम्बना है!)॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"10.21.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/11/","page":267,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता","या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्।","आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः","पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ ११"],"iast":["dhanyāḥ sma mūḍhamatayo'pi hariṇya etā","yā nandanandanamupāttavicitraveṣam|","ākarṇya veṇuraṇitaṃ sahakṛṣṇasārāḥ","pūjāṃ dadhurviracitāṃ praṇayāvalokaiḥ|| 11"],"meaning":"अरी सखी! यह वृन्दावन वैकुण्ठलोकतक पृथ्वीकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। क्योंकि यशोदानन्दन श्रीकृष्णके चरणकमलोंके चिह्नोंसे यह चिह्नित हो रहा है! सखि! जब श्रीकृष्ण अपनी मुनिजनमोहिनी मुरली बजाते हैं तब मोर मतवाले होकर उसकी तालपर नाचने लगते हैं। यह देखकर पर्वतकी चोटियोंपर विचरनेवाले सभी पशु-पक्षी चुपचाप—शान्त होकर खड़े रह जाते हैं। अरी सखी! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिनियाँ भी वंशीकी तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साथ नन्दनन्दनके पास चली आती हैं और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखोंसे उन्हें निरखने लगती हैं। निरखती क्या हैं, अपनी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्णके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्णकी प्रेमभरी चितवनके द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती हैं।’ वास्तवमें उनका जीवन धन्य है! (हम वृन्दावनकी गोपी होनेपर भी इस प्रकार उनपर अपनेको निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं। कितनी विडम्बना है!)॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"10.21.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/12/","page":267,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलं","श्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविचित्रगीतम्।","देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्‍नसारा","भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः॥ १२"],"iast":["kṛṣṇaṃ nirīkṣya vanitotsavarūpaśīlaṃ","śrutvā ca tatkvaṇitaveṇuvicitragītam|","devyo vimānagatayaḥ smaranunnasārā","bhraśyatprasūnakabarā mumuhurvinīvyaḥ|| 12"],"meaning":"अरी सखी! हरिनियोंकी तो बात ही क्या है—स्वर्गकी देवियाँ जब युवतियोंको आनन्दित करनेवाले सौन्दर्य और शीलके खजाने श्रीकृष्णको देखती हैं और बाँसुरीपर उनके द्वारा गाया हुआ मधुर संगीत सुनती हैं, तब उनके चित्र-विचित्र आलाप सुनकर वे अपने विमानपर ही सुध-बुध खो बैठती हैं—मूर्च्छित हो जाती हैं। यह कैसे मालूम हुआ सखी? सुनो तो, जब उनके हृदयमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जग जाती है तब वे अपना धीरज खो बैठती हैं, बेहोश हो जाती हैं। उन्हें इस बातका भी पता नहीं चलता कि उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल पृथ्वीपर गिर रहे हैं। यहाँतक कि उन्हें अपनी साड़ीका भी पता नहीं रहता, वह कमरसे खिसककर जमीनपर गिर जाती है॥ १२॥"},{"id":"10.21.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/13/","page":268,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["गावश्‍च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत-","पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः।","शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थु-","र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः॥ १३"],"iast":["gāvaśca kṛṣṇamukhanirgataveṇugīta-","pīyūṣamuttabhitakarṇapuṭaiḥ pibantyaḥ|","śāvāḥ snutastanapayaḥkavalāḥ sma tasthu-","rgovindamātmani dṛśāśrukalāḥ spṛśantyaḥ|| 13"],"meaning":"अरी सखी! तुम देवियोंकी बात क्या कह रही हो, इन गौओंको नहीं देखती? जब हमारे कृष्ण-प्यारे अपने मुखसे बाँसुरीमें स्वर भरते हैं और गौएँ उनका मधुर संगीत सुनती हैं, तब ये अपने दोनों कानोंके दोने सम्हाल लेती हैं—खड़े कर लेती हैं और मानो उनसे अमृत पी रही हों, इस प्रकार उस संगीतका रस लेने लगती हैं? ऐसा क्यों होता है सखी? अपने नेत्रोंके द्वारसे श्यामसुन्दरको हृदयमें ले जाकर वे उन्हें वहीं विराजमान कर देती हैं और मन-ही-मन उनका आलिंगन करती हैं। देखती नहीं हो, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसू छलकने लगते हैं! और उनके बछड़े, बछड़ोंकी तो दशा ही निराली हो जाती है। यद्यपि गायोंके थनोंसे अपने-आप दूध झरता रहता है, वे जब दूध पीते-पीते अचानक ही वंशीध्वनि सुनते हैं तब मुँहमें लिया हुआ दूधका घूँट न उगल पाते हैं और न निगल पाते हैं। उनके हृदयमें भी होता है भगवान्‌का संस्पर्श और नेत्रोंमें छलकते होते हैं आनन्दके आँसू। वे ज्यों-के-त्यों ठिठके रह जाते हैं॥ १३॥"},{"id":"10.21.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/14/","page":268,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन्","कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्।","आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान्","शृण्वन्त्यमीलितदृशो विगतान्यवाचः॥ १४"],"iast":["prāyo batāmba vihagā munayo vane'smin","kṛṣṇekṣitaṃ taduditaṃ kalaveṇugītam|","āruhya ye drumabhujān rucirapravālān","śṛṇvantyamīlitadṛśo vigatānyavācaḥ|| 14"],"meaning":"अरी सखी! गौएँ और बछड़े तो हमारी घरकी वस्तु हैं। उनकी बात तो जाने ही दो। वृन्दावनके पक्षियोंको तुम नहीं देखती हो! उन्हें पक्षी कहना ही भूल है! सच पूछो तो उनमेंसे अधिकांश बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हैं। वे वृन्दावनके सुन्दर-सुन्दर वृक्षोंकी नयी और मनोहर कोंपलोंवाली डालियोंपर चुपचाप बैठ जाते हैं और आँखें बंद नहीं करते, निर्निमेष नयनोंसे श्रीकृष्णकी रूप-माधुरी तथा प्यार-भरी चितवन देख-देखकर निहाल होते रहते हैं, तथा कानोंसे अन्य सब प्रकारके शब्दोंको छोड़कर केवल उन्हींकी मोहनी वाणी और वंशीका त्रिभुवनमोहन संगीत सुनते रहते हैं। मेरी प्यारी सखी! उनका जीवन कितना धन्य है!॥ १४॥"},{"id":"10.21.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/15/","page":268,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत-","मावर्तलक्षितमनोभवभ‌ग्‍नवेगाः ।","आलिंगनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारे-","र्गृह्णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः॥ १५"],"iast":["nadyastadā tadupadhārya mukundagīta-","māvartalakṣitamanobhavabhagnavegāḥ |","āliṃganasthagitamūrmibhujairmurāre-","rgṛhṇanti pādayugalaṃ kamalopahārāḥ|| 15"],"meaning":"अरी सखी! देवता, गौओं और पक्षियोंकी बात क्यों करती हो ? वे तो चेतन हैं। इन जड नदियोंको नहीं देखतीं? इनमें जो भँवर दीख रहे हैं, उनसे इनके हृदयमें श्यामसुन्दरसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षाका पता चलता है? उसके वेगसे ही तो इनका प्रवाह रुक गया है। इन्होंने भी प्रेमस्वरूप श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि सुन ली है। देखो, देखो! ये अपनी तरंगोंके हाथोंसे उनके चरण पकड़कर कमलके फूलोंका उपहार चढ़ा रही हैं और उनका आलिंगन कर रही हैं; मानो उनके चरणोंपर अपना हृदय ही निछावर कर रही हैं॥ १५॥"},{"id":"10.21.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/16/","page":269,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["दृष्ट्वाऽऽतपे व्रजपशून् सह रामगोपैः","संचारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम्।","प्रेमप्रवृद्ध उदितः कुसुमावलीभिः","सख्युर्व्यधात् स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम्॥ १६"],"iast":["dṛṣṭvā''tape vrajapaśūn saha rāmagopaiḥ","saṃcārayantamanu veṇumudīrayantam|","premapravṛddha uditaḥ kusumāvalībhiḥ","sakhyurvyadhāt svavapuṣāmbuda ātapatram|| 16"],"meaning":"अरी सखी! ये नदियाँ तो हमारी पृथ्वीकी, हमारे वृन्दावनकी वस्तुएँ हैं; तनिक इन बादलोंको भी देखो! जब वे देखते हैं कि व्रजराजकुमार श्रीकृष्ण और बलरामजी ग्वालबालोंके साथ धूपमें गौएँ चरा रहे हैं और साथ-साथ बाँसुरी भी बजाते जा रहे हैं, तब उनके हृदयमें प्रेम उमड़ आता है। वे उनके ऊपर मँड़राने लगते हैं और वे श्यामघन अपने सखा घनश्यामके ऊपर अपने शरीरको ही छाता बनाकर तान देते हैं। इतना ही नहीं सखी! वे जब उनपर नन्हीं-नन्हीं फुहियोंकी वर्षा करने लगते हैं तब ऐसा जान पड़ता है कि वे उनके ऊपर सुन्दर-सुन्दर श्‍वेत कुसुम चढ़ा रहे हैं। नहीं सखी, उनके बहाने वे तो अपना जीवन ही निछावर कर देते हैं!॥ १६॥"},{"id":"10.21.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/17/","page":269,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग-","श्रीकुंकुमेन दयितास्तनमण्डितेन।","तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन","लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ १७"],"iast":["pūrṇāḥ pulindya urugāyapadābjarāga-","śrīkuṃkumena dayitāstanamaṇḍitena|","taddarśanasmararujastṛṇarūṣitena","limpantya ānanakuceṣu jahustadādhim|| 17"],"meaning":"अरी भटू! हम तो वृन्दावनकी इन भीलनियोंको ही धन्य और कृतकृत्य मानती हैं। ऐसा क्यों सखी? इसलिये कि इनके हृदयमें बड़ा प्रेम है। जब ये हमारे कृष्ण-प्यारेको देखती हैं, तब इनके हृदयमें भी उनसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जाग उठती है। इनके हृदयमें भी प्रेमकी व्याधि लग जाती है। उस समय ये क्या उपाय करती हैं, यह भी सुन लो। हमारे प्रियतमकी प्रेयसी गोपियाँ अपने वक्षःस्थलोंपर जो केसर लगाती हैं, वह श्यामसुन्दरके चरणोंमें लगी होती है और वे जब वृन्दावनके घास-पातपर चलते हैं, तब उनमें भी लग जाती है। ये सौभाग्यवती भीलनियाँ उन्हें उन तिनकोंपरसे छुड़ाकर अपने स्तनों और मुखोंपर मल लेती हैं और इस प्रकार अपने हृदयकी प्रेम-पीड़ा शान्त करती हैं॥ १७॥"},{"id":"10.21.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/18/","page":269,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो","यद् रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः।","मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्","पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥ १८"],"iast":["hantāyamadrirabalā haridāsavaryo","yad rāmakṛṣṇacaraṇasparśapramodaḥ|","mānaṃ tanoti sahagogaṇayostayoryat","pānīyasūyavasakandarakandamūlaiḥ || 18"],"meaning":"अरी गोपियो! यह गिरिराज गोवर्द्धन तो भगवान्‌के भक्तोंमें बहुत ही श्रेष्ठ है। धन्य हैं इसके भाग्य! देखती नहीं हो, हमारे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण और नयनाभिराम बलरामके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके यह कितना आनन्दित रहता है। इसके भाग्यकी सराहना कौन करे? यह तो उन दोनोंका—ग्वालबालों और गौओंका बड़ा ही सत्कार करता है। स्नानपानके लिये झरनोंका जल देता है, गौओंके लिये सुन्दर हरी-हरी घास प्रस्तुत करता है, विश्राम करनेके लिये कन्दराएँ और खानेके लिये कन्द-मूल फल देता है। वास्तवमें यह धन्य है!॥ १८॥"},{"id":"10.21.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/19/","page":270,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार-","वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः।","अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां","निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ १९"],"iast":["gā gopakairanuvanaṃ nayatorudāra-","veṇusvanaiḥ kalapadaistanubhṛtsu sakhyaḥ|","aspandanaṃ gatimatāṃ pulakastarūṇāṃ","niryogapāśakṛtalakṣaṇayorvicitram|| 19"],"meaning":"अरी सखी! इन साँवरे-गोरे किशोरोंकी तो गति ही निराली है। जब वे सिरपर नोवना (दुहते समय गायके पैर बाँधनेकी रस्सी) लपेटकर और कंधोंपर फंदा (भागनेवाली गायोंको पकड़नेकी रस्सी) रखकर गायोंको एक वनसे दूसरे वनमें हाँककर ले जाते हैं, साथमें ग्वालबाल भी होते हैं और मधुर-मधुर संगीत गाते हुए बाँसुरीकी तान छेड़ते हैं, उस समय मनुष्योंकी तो बात ही क्या अन्य शरीरधारियोंमें भी चलनेवाले चेतन पशु-पक्षी और जड नदी आदि तो स्थिर हो जाते हैं, तथा अचल-वृक्षोंको भी रोमांच हो आता है। जादूभरी वंशीका और क्या चमत्कार सुनाऊँ?॥ १९॥"},{"id":"10.21.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/21/20/","page":270,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिणः।","वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयतां ययुः॥ २०"],"iast":["evaṃvidhā bhagavato yā vṛndāvanacāriṇaḥ|","varṇayantyo mitho gopyaḥ krīḍāstanmayatāṃ yayuḥ|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! वृन्दावनविहारी श्रीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एक नहीं, अनेक लीलाएँ हैं। गोपियाँ प्रतिदिन आपसमें उनका वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। भगवान्‌की लीलाएँ उनके हृदयमें स्फुरित होने लगतीं॥ २०॥"}],"text":[{"b":29665,"kind":"adhyaya_heading","page":265,"text":"अथैकविंशोऽध्यायः"},{"b":29666,"kind":"topic_heading","page":265,"text":"वेणुगीत"},{"b":29667,"kind":"topic_heading","page":265,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29668,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.1"],"text":"इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना।"},{"b":29669,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.1"],"text":"न्यविशद् वायुना वातं सगोगोपालकोऽच्युतः॥ १"},{"b":29670,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.2"],"text":"कुसुमितवनराजिशुष्मिभृंग-"},{"b":29671,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.2"],"text":"द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् ।"},{"b":29672,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.2"],"text":"मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः"},{"b":29673,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.2"],"text":"सहपशुपालबलश्‍चुकूज वेणुम्॥ २"},{"b":29674,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.3"],"text":"तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।"},{"b":29675,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.3"],"text":"काश्‍चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन्॥ ३"},{"b":29676,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.4"],"text":"तद् वर्णयितुमारब्धाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्।"},{"b":29677,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.4"],"text":"नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ ४"},{"b":29678,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.5"],"text":"बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं"},{"b":29679,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.5"],"text":"बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।"},{"b":29680,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.5"],"text":"रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-"},{"b":29681,"kind":"sanskrit_shloka","page":265,"verses":["10.21.5"],"text":"र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ ५"},{"b":29682,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.6"],"text":"इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्।"},{"b":29683,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.6"],"text":"श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ ६"},{"b":29684,"kind":"hindi_commentary","page":264,"explains":["10.21.1","10.21.2","10.21.3","10.21.4","10.21.5","10.21.6"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरद् ऋतुके कारण वह वन बड़ा सुन्दर हो रहा था। जल निर्मल था और जलाशयोंमें खिले हुए कमलोंकी सुगन्धसे सनकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। भगवान् श्रीकृष्णने गौओं और ग्वालबालोंके साथ उस वनमें प्रवेश किया॥ १॥ सुन्दर-सुन्दर पुष्पोंसे परिपूर्ण हरी-हरी वृक्ष-पंक्तियोंमें मतवाले भौंरे स्थान-स्थानपर गुनगुना रहे थे और तरह-तरहके पक्षी झुंड-के-झुंड अलग-अलग कलरव कर रहे थे, जिससे उस वनके सरोवर, नदियाँ और पर्वत—सब-के-सब गूँजते रहते थे। मधुपति श्रीकृष्णने बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ उसके भीतर घुसकर गौओंको चराते हुए अपनी बाँसुरीपर बड़ी मधुर तान छेड़ी॥ २॥ श्रीकृष्णकी वह वंशीध्वनि भगवान्‌के प्रति प्रेमभावको, उनके मिलनकी आकांक्षाको जगानेवाली थी। (उसे सुनकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे परिपूर्ण हो गया) वे एकान्तमें अपनी सखियोंसे उनके रूप, गुण और वंशीध्वनिके प्रभावका वर्णन करने लगीं॥ ३॥ व्रजकी गोपियोंने वंशीध्वनिका माधुर्य आपसमें वर्णन करना चाहा तो अवश्य; परन्तु वंशीका स्मरण होते ही उन्हें श्रीकृष्णकी मधुर चेष्टाओंकी, प्रेमपूर्ण चितवन, भौंहोंके इशारे और मधुर मुसकान आदिकी याद हो आयी। उनकी भगवान्‌से मिलनेकी आकांक्षा और भी बढ़ गयी। उनका मन हाथसे निकल गया। वे मन-ही-मन वहाँ पहुँच गयीं, जहाँ श्रीकृष्ण थे। अब उनकी वाणी बोले कैसे? वे उसके वर्णनमें असमर्थ हो गयीं॥ ४॥ (वे मन-ही-मन देखने लगीं कि) श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानोंपर कनेरके पीले-पीले पुष्प; शरीरपर सुनहला पीताम्बर और गलेमें पाँच प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंकी बनी वैजयन्ती माला है। रंगमंचपर अभिनय करते हुए श्रेष्ठ नटका-सा क्या ही सुन्दर वेष है। बाँसुरीके छिद्रोंको वे अपने अधरामृतसे भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्तिका गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठसे भी श्रेष्ठ वह वृन्दावनधाम उनके चरणचिह्नोंसे और भी रमणीय बन गया है॥ ५॥ परीक्षित्! यह वंशीध्वनि जड, चेतन—समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है। गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं॥ ६॥"},{"b":29685,"kind":"topic_heading","page":266,"text":"गोप्य ऊचुः"},{"b":29686,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.7"],"text":"अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः"},{"b":29687,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.7"],"text":"सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः।"},{"b":29688,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.7"],"text":"वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं"},{"b":29689,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.7"],"text":"यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ ७"},{"b":29690,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.8"],"text":"चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-"},{"b":29691,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.8"],"text":"मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेषौ ।"},{"b":29692,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.8"],"text":"मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां"},{"b":29693,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.8"],"text":"रंगे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ॥ ८"},{"b":29694,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.9"],"text":"गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-"},{"b":29695,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.9"],"text":"र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।"},{"b":29696,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.9"],"text":"भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो"},{"b":29697,"kind":"sanskrit_shloka","page":266,"verses":["10.21.9"],"text":"हृष्यत्त्वचोऽश्रुमुमुचुस्तरवो यथाऽऽर्याः॥ ९"},{"b":29698,"kind":"hindi_commentary","page":266,"explains":["10.21.7","10.21.8","10.21.9"],"text":"गोपियाँ आपसमें बातचीत करने लगीं—अरी सखी! हमने तो आँखवालोंके जीवनकी और उनकी आँखोंकी बस, यही—इतनी ही सफलता समझी है; और तो हमें कुछ मालूम ही नहीं है। वह कौन-सा लाभ है? वह यही है कि जब श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम ग्वालबालोंके साथ गायोंको हाँककर वनमें ले जा रहे हों या लौटाकर व्रजमें ला रहे हों, उन्होंने अपने अधरोंपर मुरली धर रखी हो और प्रेमभरी तिरछी चितवनसे हमारी ओर देख रहे हों, उस समय हम उनकी मुख-माधुरीका पान करती रहें॥ ७॥ अरी सखी! जब वे आमकी नयी कोंपलें, मोरोंके पंख, फूलोंके गुच्छे, रंग-बिरंगे कमल और कुमुदकी मालाएँ धारण कर लेते हैं, श्रीकृष्णके साँवरे शरीरपर पीताम्बर और बलरामके गोरे शरीरपर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा ही विचित्र बन जाता है। ग्वालबालोंकी गोष्ठीमें वे दोनों बीचो-बीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीतकी तान छेड़ देते हैं। मेरी प्यारी सखी! उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोभा होती है॥ ८॥ अरी गोपियो! यह वेणु पुरुष जातिका होनेपर भी पूर्वजन्ममें न जाने ऐसा कौन-सा साधन-भजन कर चुका है कि हम गोपियोंकी अपनी सम्पत्ति—दामोदरके अधरोंकी सुधा स्वयं ही इस प्रकार पिये जा रहा है कि हमलोगोंके लिये थोड़ा-सा भी रस शेष नहीं रहेगा। इस वेणुको अपने रससे सींचनेवाली ह्रदिनियाँ आज कमलोंके मिस रोमाञ्चित हो रही हैं और अपने वंशमें भगवत्प्रेमी सन्तानोंको देखकर श्रेष्ठ पुरुषोंके समान वृक्ष भी इसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर आँखोंसे आनन्दाश्रु बहा रहे हैं॥ ९॥"},{"b":29699,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.10"],"text":"वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं"},{"b":29700,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.10"],"text":"यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि।"},{"b":29701,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.10"],"text":"गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं"},{"b":29702,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.10"],"text":"प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम्॥ १०"},{"b":29703,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.11"],"text":"धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता"},{"b":29704,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.11"],"text":"या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्।"},{"b":29705,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.11"],"text":"आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः"},{"b":29706,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.11"],"text":"पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ ११"},{"b":29707,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.12"],"text":"कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलं"},{"b":29708,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.12"],"text":"श्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविचित्रगीतम्।"},{"b":29709,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.12"],"text":"देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्‍नसारा"},{"b":29710,"kind":"sanskrit_shloka","page":267,"verses":["10.21.12"],"text":"भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः॥ १२"},{"b":29711,"kind":"hindi_translation","page":267,"explains":["10.21.10","10.21.11","10.21.12"],"text":"अरी सखी! यह वृन्दावन वैकुण्ठलोकतक पृथ्वीकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। क्योंकि यशोदानन्दन श्रीकृष्णके चरणकमलोंके चिह्नोंसे यह चिह्नित हो रहा है! सखि! जब श्रीकृष्ण अपनी मुनिजनमोहिनी मुरली बजाते हैं तब मोर मतवाले होकर उसकी तालपर नाचने लगते हैं। यह देखकर पर्वतकी चोटियोंपर विचरनेवाले सभी पशु-पक्षी चुपचाप—शान्त होकर खड़े रह जाते हैं। अरी सखी! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिनियाँ भी वंशीकी तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साथ नन्दनन्दनके पास चली आती हैं और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखोंसे उन्हें निरखने लगती हैं। निरखती क्या हैं, अपनी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्णके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्णकी प्रेमभरी चितवनके द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती हैं।’ वास्तवमें उनका जीवन धन्य है! (हम वृन्दावनकी गोपी होनेपर भी इस प्रकार उनपर अपनेको निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं। कितनी विडम्बना है!)॥ १०-११॥ अरी सखी! हरिनियोंकी तो बात ही क्या है—स्वर्गकी देवियाँ जब युवतियोंको आनन्दित करनेवाले सौन्दर्य और शीलके खजाने श्रीकृष्णको देखती हैं और बाँसुरीपर उनके द्वारा गाया हुआ मधुर संगीत सुनती हैं, तब उनके चित्र-विचित्र आलाप सुनकर वे अपने विमानपर ही सुध-बुध खो बैठती हैं—मूर्च्छित हो जाती हैं। यह कैसे मालूम हुआ सखी? सुनो तो, जब उनके हृदयमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जग जाती है तब वे अपना धीरज खो बैठती हैं, बेहोश हो जाती हैं। उन्हें इस बातका भी पता नहीं चलता कि उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल पृथ्वीपर गिर रहे हैं। यहाँतक कि उन्हें अपनी साड़ीका भी पता नहीं रहता, वह कमरसे खिसककर जमीनपर गिर जाती है॥ १२॥"},{"b":29712,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.13"],"text":"गावश्‍च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत-"},{"b":29713,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.13"],"text":"पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः।"},{"b":29714,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.13"],"text":"शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थु-"},{"b":29715,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.13"],"text":"र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः॥ १३"},{"b":29716,"kind":"hindi_commentary","page":268,"explains":["10.21.13"],"text":"अरी सखी! तुम देवियोंकी बात क्या कह रही हो, इन गौओंको नहीं देखती? जब हमारे कृष्ण-प्यारे अपने मुखसे बाँसुरीमें स्वर भरते हैं और गौएँ उनका मधुर संगीत सुनती हैं, तब ये अपने दोनों कानोंके दोने सम्हाल लेती हैं—खड़े कर लेती हैं और मानो उनसे अमृत पी रही हों, इस प्रकार उस संगीतका रस लेने लगती हैं? ऐसा क्यों होता है सखी? अपने नेत्रोंके द्वारसे श्यामसुन्दरको हृदयमें ले जाकर वे उन्हें वहीं विराजमान कर देती हैं और मन-ही-मन उनका आलिंगन करती हैं। देखती नहीं हो, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसू छलकने लगते हैं! और उनके बछड़े, बछड़ोंकी तो दशा ही निराली हो जाती है। यद्यपि गायोंके थनोंसे अपने-आप दूध झरता रहता है, वे जब दूध पीते-पीते अचानक ही वंशीध्वनि सुनते हैं तब मुँहमें लिया हुआ दूधका घूँट न उगल पाते हैं और न निगल पाते हैं। उनके हृदयमें भी होता है भगवान्‌का संस्पर्श और नेत्रोंमें छलकते होते हैं आनन्दके आँसू। वे ज्यों-के-त्यों ठिठके रह जाते हैं॥ १३॥"},{"b":29717,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.14"],"text":"प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन्"},{"b":29718,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.14"],"text":"कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्।"},{"b":29719,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.14"],"text":"आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान्"},{"b":29720,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.14"],"text":"शृण्वन्त्यमीलितदृशो विगतान्यवाचः॥ १४"},{"b":29721,"kind":"hindi_commentary","page":268,"explains":["10.21.14"],"text":"अरी सखी! गौएँ और बछड़े तो हमारी घरकी वस्तु हैं। उनकी बात तो जाने ही दो। वृन्दावनके पक्षियोंको तुम नहीं देखती हो! उन्हें पक्षी कहना ही भूल है! सच पूछो तो उनमेंसे अधिकांश बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हैं। वे वृन्दावनके सुन्दर-सुन्दर वृक्षोंकी नयी और मनोहर कोंपलोंवाली डालियोंपर चुपचाप बैठ जाते हैं और आँखें बंद नहीं करते, निर्निमेष नयनोंसे श्रीकृष्णकी रूप-माधुरी तथा प्यार-भरी चितवन देख-देखकर निहाल होते रहते हैं, तथा कानोंसे अन्य सब प्रकारके शब्दोंको छोड़कर केवल उन्हींकी मोहनी वाणी और वंशीका त्रिभुवनमोहन संगीत सुनते रहते हैं। मेरी प्यारी सखी! उनका जीवन कितना धन्य है!॥ १४॥"},{"b":29722,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.15"],"text":"नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत-"},{"b":29723,"kind":"sanskrit_shloka","page":268,"verses":["10.21.15"],"text":"मावर्तलक्षितमनोभवभ‌ग्‍नवेगाः ।"},{"b":29724,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.15"],"text":"आलिंगनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारे-"},{"b":29725,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.15"],"text":"र्गृह्णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः॥ १५"},{"b":29726,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.16"],"text":"दृष्ट्वाऽऽतपे व्रजपशून् सह रामगोपैः"},{"b":29727,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.16"],"text":"संचारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम्।"},{"b":29728,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.16"],"text":"प्रेमप्रवृद्ध उदितः कुसुमावलीभिः"},{"b":29729,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.16"],"text":"सख्युर्व्यधात् स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम्॥ १६"},{"b":29730,"kind":"hindi_translation","page":268,"explains":["10.21.15","10.21.16"],"text":"अरी सखी! देवता, गौओं और पक्षियोंकी बात क्यों करती हो ? वे तो चेतन हैं। इन जड नदियोंको नहीं देखतीं? इनमें जो भँवर दीख रहे हैं, उनसे इनके हृदयमें श्यामसुन्दरसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षाका पता चलता है? उसके वेगसे ही तो इनका प्रवाह रुक गया है। इन्होंने भी प्रेमस्वरूप श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि सुन ली है। देखो, देखो! ये अपनी तरंगोंके हाथोंसे उनके चरण पकड़कर कमलके फूलोंका उपहार चढ़ा रही हैं और उनका आलिंगन कर रही हैं; मानो उनके चरणोंपर अपना हृदय ही निछावर कर रही हैं॥ १५॥ अरी सखी! ये नदियाँ तो हमारी पृथ्वीकी, हमारे वृन्दावनकी वस्तुएँ हैं; तनिक इन बादलोंको भी देखो! जब वे देखते हैं कि व्रजराजकुमार श्रीकृष्ण और बलरामजी ग्वालबालोंके साथ धूपमें गौएँ चरा रहे हैं और साथ-साथ बाँसुरी भी बजाते जा रहे हैं, तब उनके हृदयमें प्रेम उमड़ आता है। वे उनके ऊपर मँड़राने लगते हैं और वे श्यामघन अपने सखा घनश्यामके ऊपर अपने शरीरको ही छाता बनाकर तान देते हैं। इतना ही नहीं सखी! वे जब उनपर नन्हीं-नन्हीं फुहियोंकी वर्षा करने लगते हैं तब ऐसा जान पड़ता है कि वे उनके ऊपर सुन्दर-सुन्दर श्‍वेत कुसुम चढ़ा रहे हैं। नहीं सखी, उनके बहाने वे तो अपना जीवन ही निछावर कर देते हैं!॥ १६॥"},{"b":29731,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.17"],"text":"पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग-"},{"b":29732,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.17"],"text":"श्रीकुंकुमेन दयितास्तनमण्डितेन।"},{"b":29733,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.17"],"text":"तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन"},{"b":29734,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.17"],"text":"लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ १७"},{"b":29735,"kind":"hindi_translation","page":269,"explains":["10.21.17"],"text":"अरी भटू! हम तो वृन्दावनकी इन भीलनियोंको ही धन्य और कृतकृत्य मानती हैं। ऐसा क्यों सखी? इसलिये कि इनके हृदयमें बड़ा प्रेम है। जब ये हमारे कृष्ण-प्यारेको देखती हैं, तब इनके हृदयमें भी उनसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जाग उठती है। इनके हृदयमें भी प्रेमकी व्याधि लग जाती है। उस समय ये क्या उपाय करती हैं, यह भी सुन लो। हमारे प्रियतमकी प्रेयसी गोपियाँ अपने वक्षःस्थलोंपर जो केसर लगाती हैं, वह श्यामसुन्दरके चरणोंमें लगी होती है और वे जब वृन्दावनके घास-पातपर चलते हैं, तब उनमें भी लग जाती है। ये सौभाग्यवती भीलनियाँ उन्हें उन तिनकोंपरसे छुड़ाकर अपने स्तनों और मुखोंपर मल लेती हैं और इस प्रकार अपने हृदयकी प्रेम-पीड़ा शान्त करती हैं॥ १७॥"},{"b":29736,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.18"],"text":"हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो"},{"b":29737,"kind":"sanskrit_shloka","page":269,"verses":["10.21.18"],"text":"यद् रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः।"},{"b":29738,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.18"],"text":"मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्"},{"b":29739,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.18"],"text":"पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥ १८"},{"b":29740,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.19"],"text":"गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार-"},{"b":29741,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.19"],"text":"वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः।"},{"b":29742,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.19"],"text":"अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां"},{"b":29743,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.19"],"text":"निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ १९"},{"b":29744,"kind":"hindi_translation","page":269,"explains":["10.21.18","10.21.19"],"text":"अरी गोपियो! यह गिरिराज गोवर्द्धन तो भगवान्‌के भक्तोंमें बहुत ही श्रेष्ठ है। धन्य हैं इसके भाग्य! देखती नहीं हो, हमारे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण और नयनाभिराम बलरामके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके यह कितना आनन्दित रहता है। इसके भाग्यकी सराहना कौन करे? यह तो उन दोनोंका—ग्वालबालों और गौओंका बड़ा ही सत्कार करता है। स्नानपानके लिये झरनोंका जल देता है, गौओंके लिये सुन्दर हरी-हरी घास प्रस्तुत करता है, विश्राम करनेके लिये कन्दराएँ और खानेके लिये कन्द-मूल फल देता है। वास्तवमें यह धन्य है!॥ १८॥ अरी सखी! इन साँवरे-गोरे किशोरोंकी तो गति ही निराली है। जब वे सिरपर नोवना (दुहते समय गायके पैर बाँधनेकी रस्सी) लपेटकर और कंधोंपर फंदा (भागनेवाली गायोंको पकड़नेकी रस्सी) रखकर गायोंको एक वनसे दूसरे वनमें हाँककर ले जाते हैं, साथमें ग्वालबाल भी होते हैं और मधुर-मधुर संगीत गाते हुए बाँसुरीकी तान छेड़ते हैं, उस समय मनुष्योंकी तो बात ही क्या अन्य शरीरधारियोंमें भी चलनेवाले चेतन पशु-पक्षी और जड नदी आदि तो स्थिर हो जाते हैं, तथा अचल-वृक्षोंको भी रोमांच हो आता है। जादूभरी वंशीका और क्या चमत्कार सुनाऊँ?॥ १९॥"},{"b":29745,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.20"],"text":"एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिणः।"},{"b":29746,"kind":"sanskrit_shloka","page":270,"verses":["10.21.20"],"text":"वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयतां ययुः॥ २०"},{"b":29747,"kind":"hindi_translation","page":270,"explains":["10.21.20"],"text":"परीक्षित्! वृन्दावनविहारी श्रीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एक नहीं, अनेक लीलाएँ हैं। गोपियाँ प्रतिदिन आपसमें उनका वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। भगवान्‌की लीलाएँ उनके हृदयमें स्फुरित होने लगतीं॥ २०॥"},{"b":29748,"kind":"hindi_translation","page":270,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे वेणुगीतं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥"}],"notes":[{"id":"v2:257","mark":"१","page":270,"after_verse":null,"text":"वृन्दावनक्रीडायामेक०।"}],"corrections":{"count":6,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}