{"id":"10.25","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 25","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ पञ्चविंशोऽध्यायः","topics":["गोवर्धनधारण"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[292,297]},"verses":[{"id":"10.25.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/1/","page":293,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इन्द्रस्तदाऽऽत्मनः पूजां विज्ञाय विहतां नृप।","गोपेभ्यः कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्‍चुकोप सः॥ १"],"iast":["indrastadā''tmanaḥ pūjāṃ vijñāya vihatāṃ nṛpa|","gopebhyaḥ kṛṣṇanāthebhyo nandādibhyaścukopa saḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब इन्द्रको पता लगा कि मेरी पूजा बंद कर दी गयी है, तब वे नन्दबाबा आदि गोपोंपर बहुत ही क्रोधित हुए। परन्तु उनके क्रोध करनेसे होता क्या, उन गोपोंके रक्षक तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे॥ १॥"},{"id":"10.25.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/2/","page":293,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम्।","इन्द्रः प्राचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत॥ २"],"iast":["gaṇaṃ sāṃvartakaṃ nāma meghānāṃ cāntakāriṇām|","indraḥ prācodayat kruddho vākyaṃ cāheśamānyuta|| 2"],"meaning":"इन्द्रको अपने पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्‍वर हूँ। उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा—॥ २॥"},{"id":"10.25.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/3/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्।","कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्॥ ३"],"iast":["aho śrīmadamāhātmyaṃ gopānāṃ kānanaukasām|","kṛṣṇaṃ martyamupāśritya ye cakrurdevahelanam|| 3"],"meaning":"‘ओह, इन जंगली ग्वालोंको इतना घमण्ड! सचमुच यह धनका ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्णके बलपर उन्होंने मुझ देवराजका अपमान कर डाला॥ ३॥"},{"id":"10.25.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/4/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथादृढैः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिभैः।","विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम्॥ ४"],"iast":["yathādṛḍhaiḥ karmamayaiḥ kratubhirnāmanaunibhaiḥ|","vidyāmānvīkṣikīṃ hitvā titīrṣanti bhavārṇavam|| 4"],"meaning":"जैसे पृथ्वीपर बहुत-से मन्दबुद्धि पुरुष भवसागरसे पार जानेके सच्चे साधन ब्रह्मविद्याको तो छोड़ देते हैं और नाममात्रकी टूटी हुई नावसे—कर्ममय यज्ञोंसे इस घोर संसार-सागरको पार करना चाहते हैं॥ ४॥"},{"id":"10.25.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/5/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।","कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम्॥ ५"],"iast":["vācālaṃ bāliśaṃ stabdhamajñaṃ paṇḍitamāninam|","kṛṣṇaṃ martyamupāśritya gopā me cakrurapriyam|| 5"],"meaning":"कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होनेपर भी अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्युका ग्रास है। फिर भी उसीका सहारा लेकर इन अहीरोंने मेरी अवहेलना की है॥ ५॥"},{"id":"10.25.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/6/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एषां श्रियावलिप्तानां कृष्णेनाध्मायितात्मनाम्।","धुनुत श्रीमदस्तम्भं पशून् नयत संक्षयम्॥ ६"],"iast":["eṣāṃ śriyāvaliptānāṃ kṛṣṇenādhmāyitātmanām|","dhunuta śrīmadastambhaṃ paśūn nayata saṃkṣayam|| 6"],"meaning":"एक तो ये यों ही धनके नशेमें चूर हो रहे थे; दूसरे कृष्णने इनको और बढ़ावा दे दिया है। अब तुमलोग जाकर इनके इस धनके घमण्ड और हेकड़ीको धूलमें मिला दो तथा उनके पशुओंका संहार कर डालो॥ ६॥"},{"id":"10.25.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/7/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहं चैरावतं नागमारुह्यानुव्रजे व्रजम्।","मरुद्गणैर्महावीर्यैर्नन्दगोष्ठजिघांसया ॥ ७"],"iast":["ahaṃ cairāvataṃ nāgamāruhyānuvraje vrajam|","marudgaṇairmahāvīryairnandagoṣṭhajighāṃsayā || 7"],"meaning":"मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे ऐरावत हाथीपर चढ़कर नन्दके व्रजका नाश करनेके लिये महापराक्रमी मरुद्गणोंके साथ आता हूँ’॥ ७॥"},{"id":"10.25.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/8/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं मघवताऽऽज्ञप्ता मेघा निर्मुक्तबन्धनाः।","नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा॥ ८"],"iast":["itthaṃ maghavatā''jñaptā meghā nirmuktabandhanāḥ|","nandagokulamāsāraiḥ pīḍayāmāsurojasā|| 8"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इन्द्रने इस प्रकार प्रलयके मेघोंको आज्ञा दी और उनके बन्धन खोल दिये। अब वे बड़े वेगसे नन्दबाबाके व्रजपर चढ़ आये और मूसलधार पानी बरसाकर सारे व्रजको पीड़ित करने लगे॥ ८॥"},{"id":"10.25.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/9/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विद्योतमाना विद्युद्भिः स्तनन्तः स्तनयित्‍नुभिः।","तीव्रैर्मरुद्गणैर्नुन्‍ना ववृषुर्जलशर्कराः॥ ९"],"iast":["vidyotamānā vidyudbhiḥ stanantaḥ stanayitnubhiḥ|","tīvrairmarudgaṇairnunnā vavṛṣurjalaśarkarāḥ|| 9"],"meaning":"चारों ओर बिजलियाँ चमकने लगीं, बादल आपसमें टकराकर कड़कने लगे और प्रचण्ड आँधीकी प्रेरणासे वे बड़े-बड़े ओले बरसाने लगे॥ ९॥"},{"id":"10.25.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/10/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्थूणास्थूला वर्षधारा मुञ्चत्स्वभ्रेष्वभीक्ष्णशः।","जलौघैः प्लाव्यमाना भूर्नादृश्यत नतोन्‍नतम्॥ १०"],"iast":["sthūṇāsthūlā varṣadhārā muñcatsvabhreṣvabhīkṣṇaśaḥ|","jalaughaiḥ plāvyamānā bhūrnādṛśyata natonnatam|| 10"],"meaning":"इस प्रकार जब दल-के-दल बादल बार-बार आ-आकर खंभेके समान मोटी-मोटी धाराएँ गिराने लगे, तब व्रजभूमिका कोना-कोना पानीसे भर गया और कहाँ नीचा है, कहाँ ऊँचा—इसका पता चलना कठिन हो गया॥ १०॥"},{"id":"10.25.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/11/","page":294,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्यासारातिवातेन पशवो जातवेपनाः।","गोपा गोप्यश्‍च शीतार्ता गोविन्दं शरणं ययुः॥ ११"],"iast":["atyāsārātivātena paśavo jātavepanāḥ|","gopā gopyaśca śītārtā govindaṃ śaraṇaṃ yayuḥ|| 11"],"meaning":"इस प्रकार मूसलधार वर्षा तथा झंझावातके झपाटेसे जब एक-एक पशु ठिठुरने और काँपने लगा, ग्वाल और ग्वालिनें भी ठंडके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं, तब वे सब-के-सब भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये॥ ११॥"},{"id":"10.25.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/12/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिरः सुतांश्‍च कायेन प्रच्छाद्यासारपीडिताः।","वेपमाना भगवतः पादमूलमुपाययुः॥ १२"],"iast":["śiraḥ sutāṃśca kāyena pracchādyāsārapīḍitāḥ|","vepamānā bhagavataḥ pādamūlamupāyayuḥ|| 12"],"meaning":"मूसलधार वर्षासे सताये जानेके कारण सबने अपने-अपने सिर और बच्चोंको निहुककर अपने शरीरके नीचे छिपा लिया था और वे काँपते-काँपते भगवान्‌की चरणशरणमें पहुँचे॥ १२॥"},{"id":"10.25.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/13/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्‍नाथं गोकुलं प्रभो।","त्रातुमर्हसि देवान्‍नः कुपिताद् भक्तवत्सल॥ १३"],"iast":["kṛṣṇa kṛṣṇa mahābhāga tvannāthaṃ gokulaṃ prabho|","trātumarhasi devānnaḥ kupitād bhaktavatsala|| 13"],"meaning":"और बोले—‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम बड़े भाग्यवान् हो। अब तो कृष्ण! केवल तुम्हारे ही भाग्यसे हमारी रक्षा होगी। प्रभो! इस सारे गोकुलके एकमात्र स्वामी, एकमात्र रक्षक तुम्हीं हो। भक्तवत्सल! इन्द्रके क्रोधसे अब तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो’॥ १३॥"},{"id":"10.25.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/14/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिलावर्षनिपातेन हन्यमानमचेतनम्।","निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरिः॥ १४"],"iast":["śilāvarṣanipātena hanyamānamacetanam|","nirīkṣya bhagavān mene kupitendrakṛtaṃ hariḥ|| 14"],"meaning":"भगवान्‌ने देखा कि वर्षा और ओलोंकी मारसे पीड़ित होकर सब बेहोश हो रहे हैं। वे समझ गये कि यह सारी करतूत इन्द्रकी है। उन्होंने ही क्रोधवश ऐसा किया है॥ १४॥"},{"id":"10.25.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/15/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपर्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम्।","स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति॥ १५"],"iast":["apartvatyulbaṇaṃ varṣamativātaṃ śilāmayam|","svayāge vihate'smābhirindro nāśāya varṣati|| 15"],"meaning":"वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं॥ १५॥"},{"id":"10.25.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/16/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र प्रतिविधिं सम्यगात्मयोगेन साधये।","लोकेशमानिनां मौढ्याद्धरिष्ये श्रीमदं तमः॥ १६"],"iast":["tatra pratividhiṃ samyagātmayogena sādhaye|","lokeśamānināṃ mauḍhyāddhariṣye śrīmadaṃ tamaḥ|| 16"],"meaning":"अच्छा, मैं अपनी योगमायासे इसका भलीभाँति जवाब दूँगा। ये मूर्खतावश अपनेको लोक-पाल मानते हैं, इनके ऐश्‍वर्य और धनका घमण्ड तथा अज्ञान मैं चूर-चूर कर दूँगा॥ १६॥"},{"id":"10.25.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/17/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः।","मत्तोऽसतां मानभंगः प्रशमायोपकल्पते॥ १७"],"iast":["na hi sadbhāvayuktānāṃ surāṇāmīśavismayaḥ|","matto'satāṃ mānabhaṃgaḥ praśamāyopakalpate|| 17"],"meaning":"देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐश्‍वर्य और पदका अभिमान न होना चाहिये। अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी॥ १७॥"},{"id":"10.25.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/18/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्‍नाथं मत्परिग्रहम्।","गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः॥ १८"],"iast":["tasmānmaccharaṇaṃ goṣṭhaṃ mannāthaṃ matparigraham|","gopāye svātmayogena so'yaṃ me vrata āhitaḥ|| 18"],"meaning":"यह सारा व्रज मेरे आश्रित है, मेरे द्वारा स्वीकृत है और एकमात्र मैं ही इसका रक्षक हूँ। अतः मैं अपनी योगमायासे इसकी रक्षा करूँगा। संतोंकी रक्षा करना तो मेरा व्रत ही है। अब उसके पालनका अवसर आ पहुँचा है’॥ १८॥"},{"id":"10.25.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/19/","page":295,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम्।","दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालकः॥ १९"],"iast":["ityuktvaikena hastena kṛtvā govardhanācalam|","dadhāra līlayā kṛṣṇaśchatrākamiva bālakaḥ|| 19"],"meaning":"इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्णने खेल-खेलमें एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और जैसे छोटे-छोटे बालक बरसाती छत्तेके पुष्पको उखाड़कर हाथमें रख लेते हैं, वैसे ही उन्होंने उस पर्वतको धारण कर लिया॥ १९॥"},{"id":"10.25.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/20/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथाह भगवान् गोपान् हेऽम्ब तात व्रजौकसः।","यथोपजोषं विशत गिरिगर्तं सगोधनाः॥ २०"],"iast":["athāha bhagavān gopān he'mba tāta vrajaukasaḥ|","yathopajoṣaṃ viśata girigartaṃ sagodhanāḥ|| 20"],"meaning":"इसके बाद भगवान्‌ने गोपोंसे कहा—‘माताजी, पिताजी और व्रजवासियो! तुमलोग अपनी गौओं और सब सामग्रियोंके साथ इस पर्वतके गड्ढेमें आकर आरामसे बैठ जाओ॥ २०॥"},{"id":"10.25.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/21/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातने।","वातवर्षभयेनालं तत्त्राणं विहितं हि वः॥ २१"],"iast":["na trāsa iha vaḥ kāryo maddhastādrinipātane|","vātavarṣabhayenālaṃ tattrāṇaṃ vihitaṃ hi vaḥ|| 21"],"meaning":"देखो, तुमलोग ऐसी शंका न करना कि मेरे हाथसे यह पर्वत गिर पड़ेगा। तुमलोग तनिक भी मत डरो। इस आँधी-पानीके डरसे तुम्हें बचानेके लिये ही मैंने यह युक्ति रची है’॥ २१॥"},{"id":"10.25.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/22/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथा निर्विविशुर्गर्तं कृष्णाश्‍वासितमानसाः।","यथावकाशं सधनाः सव्रजाः सोपजीविनः॥ २२"],"iast":["tathā nirviviśurgartaṃ kṛṣṇāśvāsitamānasāḥ|","yathāvakāśaṃ sadhanāḥ savrajāḥ sopajīvinaḥ|| 22"],"meaning":"जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सबको आश्‍वासन दिया—ढाढ़स बँधाया, तब सब-के-सब ग्वाल अपने-अपने गोधन, छकड़ों, आश्रितों, पुरोहितों और भृत्योंको अपने-अपने साथ लेकर सुभीतेके अनुसार गोवर्द्धनके गड्ढेमें आ घुसे॥ २२॥"},{"id":"10.25.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/23/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः।","वीक्ष्यमाणो दधावद्रिं सप्ताहं नाचलत् पदात्॥ २३"],"iast":["kṣuttṛḍvyathāṃ sukhāpekṣāṃ hitvā tairvrajavāsibhiḥ|","vīkṣyamāṇo dadhāvadriṃ saptāhaṃ nācalat padāt|| 23"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने सब व्रजवासियोंके देखते-देखते भूख-प्यासकी पीड़ा, आराम-विश्रामकी आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिनतक लगातार उस पर्वतको उठाये रखा। वे एक डग भी वहाँसे इधर-उधर नहीं हुए॥ २३॥"},{"id":"10.25.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/24/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णयोगानुभावं तं निशाम्येन्द्रोऽतिविस्मितः।","निःस्तम्भो भ्रष्टसंकल्पः स्वान् मेघान् संन्यवारयत्॥ २४"],"iast":["kṛṣṇayogānubhāvaṃ taṃ niśāmyendro'tivismitaḥ|","niḥstambho bhraṣṭasaṃkalpaḥ svān meghān saṃnyavārayat|| 24"],"meaning":"श्रीकृष्णकी योगमायाका यह प्रभाव देखकर इन्द्रके आश्‍चर्यका ठिकाना न रहा। अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी, वे भौंचक्के-से रह गये। इसके बाद उन्होंने मेघोंको अपने-आप वर्षा करनेसे रोक दिया॥ २४॥"},{"id":"10.25.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/25/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["खं व्यभ्रमुदितादित्यं वातवर्षं च दारुणम्।","निशाम्योपरतं गोपान् गोवर्धनधरोऽब्रवीत्॥ २५"],"iast":["khaṃ vyabhramuditādityaṃ vātavarṣaṃ ca dāruṇam|","niśāmyoparataṃ gopān govardhanadharo'bravīt|| 25"],"meaning":"जब गोवर्द्धनधारी भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि वह भयंकर आँधी और घनघोर वर्षा बंद हो गयी, आकाशसे बादल छँट गये और सूर्य दीखने लगे, तब उन्होंने गोपोंसे कहा—॥ २५॥"},{"id":"10.25.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/26/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निर्यात त्यजत त्रासं गोपाः सस्त्रीधनार्भकाः।","उपारतं वातवर्षं व्युदप्रायाश्‍च निम्‍नगाः॥ २६"],"iast":["niryāta tyajata trāsaṃ gopāḥ sastrīdhanārbhakāḥ|","upārataṃ vātavarṣaṃ vyudaprāyāśca nimnagāḥ|| 26"],"meaning":"‘मेरे प्यारे गोपो! अब तुमलोग निडर हो जाओ और अपनी स्त्रियों, गोधन तथा बच्चोंके साथ बाहर निकल आओ। देखो, अब आँधी-पानी बंद हो गया तथा नदियोंका पानी भी उतर गया’॥ २६॥"},{"id":"10.25.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/27/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततस्ते निर्ययुर्गोपाः स्वं स्वमादाय गोधनम्।","शकटोढोपकरणं स्त्रीबालस्थविराः शनैः॥ २७"],"iast":["tataste niryayurgopāḥ svaṃ svamādāya godhanam|","śakaṭoḍhopakaraṇaṃ strībālasthavirāḥ śanaiḥ|| 27"],"meaning":"भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर अपने-अपने गोधन, स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको साथ ले तथा अपनी सामग्री छकड़ोंपर लादकर धीरे-धीरे सब लोग बाहर निकल आये॥ २७॥"},{"id":"10.25.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/28/","page":296,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवानपि तं शैलं स्वस्थाने पूर्ववत् प्रभुः।","पश्यतां सर्वभूतानां स्थापयामास लीलया॥ २८"],"iast":["bhagavānapi taṃ śailaṃ svasthāne pūrvavat prabhuḥ|","paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ sthāpayāmāsa līlayā|| 28"],"meaning":"सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने भी सब प्राणियोंके देखते-देखते खेल-खेलमें ही गिरिराजको पूर्ववत् उसके स्थानपर रख दिया॥ २८॥"},{"id":"10.25.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/29/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं प्रेमवेगान्‍निभृता व्रजौकसो","यथा समीयुः परिरम्भणादिभिः।","गोप्यश्‍च सस्नेहमपूजयन् मुदा","दध्यक्षताद्भिर्युयुजुः सदाशिषः॥ २९"],"iast":["taṃ premavegānnibhṛtā vrajaukaso","yathā samīyuḥ parirambhaṇādibhiḥ|","gopyaśca sasnehamapūjayan mudā","dadhyakṣatādbhiryuyujuḥ sadāśiṣaḥ|| 29"],"meaning":"व्रजवासियोंका हृदय प्रेमके आवेगसे भर रहा था। पर्वतको रखते ही वे भगवान् श्रीकृष्णके पास दौड़ आये। कोई उन्हें हृदयसे लगाने और कोई चूमने लगा। सबने उनका सत्कार किया। बड़ी-बूढ़ी गोपियोंने बड़े आनन्द और स्नेहसे दही, चावल, जल आदिसे उनका मंगल-तिलक किया और उन्मुक्त हृदयसे शुभ आशीर्वाद दिये॥ २९॥"},{"id":"10.25.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/30/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यशोदा रोहिणी नन्दो रामश्‍च बलिनां वरः।","कृष्णमालिङ्‌ग्‍य युयुजुराशिषः स्नेहकातराः॥ ३०"],"iast":["yaśodā rohiṇī nando rāmaśca balināṃ varaḥ|","kṛṣṇamāliṅgya yuyujurāśiṣaḥ snehakātarāḥ|| 30"],"meaning":"यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा और बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने स्नेहातुर होकर श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया तथा आशीर्वाद दिये॥ ३०॥"},{"id":"10.25.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/31/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिवि देवगणाः साध्याः सिद्धगन्धर्वचारणाः।","तुष्टुवुर्मुमुचुस्तुष्टाः पुष्पवर्षाणि पार्थिव॥ ३१"],"iast":["divi devagaṇāḥ sādhyāḥ siddhagandharvacāraṇāḥ|","tuṣṭuvurmumucustuṣṭāḥ puṣpavarṣāṇi pārthiva|| 31"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय आकाशमें स्थित देवता, साध्य, सिद्ध, गन्धर्व और चारण आदि प्रसन्‍न होकर भगवान्‌की स्तुति करते हुए उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ३१॥"},{"id":"10.25.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/32/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शंखदुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवप्रणोदिताः।","जगुर्गन्धर्वपतयस्तुम्बुरुप्रमुखा नृप॥ ३२"],"iast":["śaṃkhadundubhayo nedurdivi devapraṇoditāḥ|","jagurgandharvapatayastumburupramukhā nṛpa|| 32"],"meaning":"राजन्! स्वर्गमें देवतालोग शंख और नौबत बजाने लगे। तुम्बुरु आदि गन्धर्वराज भगवान्‌की मधुर लीलाका गान करने लगे॥ ३२॥"},{"id":"10.25.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/25/33/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽनुरक्तैः पशुपैः परिश्रितो","राजन् स गोष्ठं सबलोऽव्रजद्धरिः।","तथाविधान्यस्य कृतानि गोपिका","गायन्त्य ईयुर्मुदिता हृदिस्पृशः॥ ३३"],"iast":["tato'nuraktaiḥ paśupaiḥ pariśrito","rājan sa goṣṭhaṃ sabalo'vrajaddhariḥ|","tathāvidhānyasya kṛtāni gopikā","gāyantya īyurmuditā hṛdispṛśaḥ|| 33"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने व्रजकी यात्रा की। उनके बगलमें बलरामजी चल रहे थे और उनके प्रेमी ग्वालबाल उनकी सेवा कर रहे थे। उनके साथ ही प्रेममयी गोपियाँ भी अपने हृदयको आकर्षित करनेवाले, उसमें प्रेम जगानेवाले भगवान्‌की गोवर्द्धन-धारण आदि लीलाओंका गान करती हुई बड़े आनन्दसे व्रजमें लौट आयीं॥ ३३॥"}],"text":[{"b":30099,"kind":"adhyaya_heading","page":293,"text":"अथ पञ्चविंशोऽध्यायः"},{"b":30100,"kind":"topic_heading","page":293,"text":"गोवर्धनधारण"},{"b":30101,"kind":"topic_heading","page":292,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30102,"kind":"sanskrit_shloka","page":293,"verses":["10.25.1"],"text":"इन्द्रस्तदाऽऽत्मनः पूजां विज्ञाय विहतां नृप।"},{"b":30103,"kind":"sanskrit_shloka","page":293,"verses":["10.25.1"],"text":"गोपेभ्यः कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्‍चुकोप सः॥ १"},{"b":30104,"kind":"sanskrit_shloka","page":293,"verses":["10.25.2"],"text":"गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम्।"},{"b":30105,"kind":"sanskrit_shloka","page":293,"verses":["10.25.2"],"text":"इन्द्रः प्राचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत॥ २"},{"b":30106,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.3"],"text":"अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्।"},{"b":30107,"kind":"hindi_commentary","page":294,"verses":["10.25.3"],"text":"कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्॥ ३"},{"b":30108,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.4"],"text":"यथादृढैः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिभैः।"},{"b":30109,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.4"],"text":"विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम्॥ ४"},{"b":30110,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.5"],"text":"वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।"},{"b":30111,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.5"],"text":"कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम्॥ ५"},{"b":30112,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.6"],"text":"एषां श्रियावलिप्तानां कृष्णेनाध्मायितात्मनाम्।"},{"b":30113,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.6"],"text":"धुनुत श्रीमदस्तम्भं पशून् नयत संक्षयम्॥ ६"},{"b":30114,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.7"],"text":"अहं चैरावतं नागमारुह्यानुव्रजे व्रजम्।"},{"b":30115,"kind":"hindi_commentary","page":294,"verses":["10.25.7"],"text":"मरुद्गणैर्महावीर्यैर्नन्दगोष्ठजिघांसया ॥ ७"},{"b":30116,"kind":"hindi_commentary","page":293,"explains":["10.25.1","10.25.2","10.25.3","10.25.4","10.25.5","10.25.6","10.25.7"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब इन्द्रको पता लगा कि मेरी पूजा बंद कर दी गयी है, तब वे नन्दबाबा आदि गोपोंपर बहुत ही क्रोधित हुए। परन्तु उनके क्रोध करनेसे होता क्या, उन गोपोंके रक्षक तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे॥ १॥ इन्द्रको अपने पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्‍वर हूँ। उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा—॥ २॥ ‘ओह, इन जंगली ग्वालोंको इतना घमण्ड! सचमुच यह धनका ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्णके बलपर उन्होंने मुझ देवराजका अपमान कर डाला॥ ३॥ जैसे पृथ्वीपर बहुत-से मन्दबुद्धि पुरुष भवसागरसे पार जानेके सच्चे साधन ब्रह्मविद्याको तो छोड़ देते हैं और नाममात्रकी टूटी हुई नावसे—कर्ममय यज्ञोंसे इस घोर संसार-सागरको पार करना चाहते हैं॥ ४॥ कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होनेपर भी अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्युका ग्रास है। फिर भी उसीका सहारा लेकर इन अहीरोंने मेरी अवहेलना की है॥ ५॥ एक तो ये यों ही धनके नशेमें चूर हो रहे थे; दूसरे कृष्णने इनको और बढ़ावा दे दिया है। अब तुमलोग जाकर इनके इस धनके घमण्ड और हेकड़ीको धूलमें मिला दो तथा उनके पशुओंका संहार कर डालो॥ ६॥ मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे ऐरावत हाथीपर चढ़कर नन्दके व्रजका नाश करनेके लिये महापराक्रमी मरुद्गणोंके साथ आता हूँ’॥ ७॥"},{"b":30117,"kind":"topic_heading","page":293,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30118,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.8"],"text":"इत्थं मघवताऽऽज्ञप्ता मेघा निर्मुक्तबन्धनाः।"},{"b":30119,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.8"],"text":"नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा॥ ८"},{"b":30120,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.9"],"text":"विद्योतमाना विद्युद्भिः स्तनन्तः स्तनयित्‍नुभिः।"},{"b":30121,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.9"],"text":"तीव्रैर्मरुद्गणैर्नुन्‍ना ववृषुर्जलशर्कराः॥ ९"},{"b":30122,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.10"],"text":"स्थूणास्थूला वर्षधारा मुञ्चत्स्वभ्रेष्वभीक्ष्णशः।"},{"b":30123,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.10"],"text":"जलौघैः प्लाव्यमाना भूर्नादृश्यत नतोन्‍नतम्॥ १०"},{"b":30124,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.11"],"text":"अत्यासारातिवातेन पशवो जातवेपनाः।"},{"b":30125,"kind":"sanskrit_shloka","page":294,"verses":["10.25.11"],"text":"गोपा गोप्यश्‍च शीतार्ता गोविन्दं शरणं ययुः॥ ११"},{"b":30126,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.12"],"text":"शिरः सुतांश्‍च कायेन प्रच्छाद्यासारपीडिताः।"},{"b":30127,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.12"],"text":"वेपमाना भगवतः पादमूलमुपाययुः॥ १२"},{"b":30128,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.13"],"text":"कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्‍नाथं गोकुलं प्रभो।"},{"b":30129,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.13"],"text":"त्रातुमर्हसि देवान्‍नः कुपिताद् भक्तवत्सल॥ १३"},{"b":30130,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.14"],"text":"शिलावर्षनिपातेन हन्यमानमचेतनम्।"},{"b":30131,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.14"],"text":"निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरिः॥ १४"},{"b":30132,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.15"],"text":"अपर्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम्।"},{"b":30133,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.15"],"text":"स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति॥ १५"},{"b":30134,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.16"],"text":"तत्र प्रतिविधिं सम्यगात्मयोगेन साधये।"},{"b":30135,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.16"],"text":"लोकेशमानिनां मौढ्याद्धरिष्ये श्रीमदं तमः॥ १६"},{"b":30136,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.17"],"text":"न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः।"},{"b":30137,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.17"],"text":"मत्तोऽसतां मानभंगः प्रशमायोपकल्पते॥ १७"},{"b":30138,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.18"],"text":"तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्‍नाथं मत्परिग्रहम्।"},{"b":30139,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.18"],"text":"गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः॥ १८"},{"b":30140,"kind":"hindi_commentary","page":294,"explains":["10.25.8","10.25.9","10.25.10","10.25.11","10.25.12","10.25.13","10.25.14","10.25.15","10.25.16","10.25.17","10.25.18"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इन्द्रने इस प्रकार प्रलयके मेघोंको आज्ञा दी और उनके बन्धन खोल दिये। अब वे बड़े वेगसे नन्दबाबाके व्रजपर चढ़ आये और मूसलधार पानी बरसाकर सारे व्रजको पीड़ित करने लगे॥ ८॥ चारों ओर बिजलियाँ चमकने लगीं, बादल आपसमें टकराकर कड़कने लगे और प्रचण्ड आँधीकी प्रेरणासे वे बड़े-बड़े ओले बरसाने लगे॥ ९॥ इस प्रकार जब दल-के-दल बादल बार-बार आ-आकर खंभेके समान मोटी-मोटी धाराएँ गिराने लगे, तब व्रजभूमिका कोना-कोना पानीसे भर गया और कहाँ नीचा है, कहाँ ऊँचा—इसका पता चलना कठिन हो गया॥ १०॥ इस प्रकार मूसलधार वर्षा तथा झंझावातके झपाटेसे जब एक-एक पशु ठिठुरने और काँपने लगा, ग्वाल और ग्वालिनें भी ठंडके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं, तब वे सब-के-सब भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये॥ ११॥ मूसलधार वर्षासे सताये जानेके कारण सबने अपने-अपने सिर और बच्चोंको निहुककर अपने शरीरके नीचे छिपा लिया था और वे काँपते-काँपते भगवान्‌की चरणशरणमें पहुँचे॥ १२॥ और बोले—‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम बड़े भाग्यवान् हो। अब तो कृष्ण! केवल तुम्हारे ही भाग्यसे हमारी रक्षा होगी। प्रभो! इस सारे गोकुलके एकमात्र स्वामी, एकमात्र रक्षक तुम्हीं हो। भक्तवत्सल! इन्द्रके क्रोधसे अब तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो’॥ १३॥ भगवान्‌ने देखा कि वर्षा और ओलोंकी मारसे पीड़ित होकर सब बेहोश हो रहे हैं। वे समझ गये कि यह सारी करतूत इन्द्रकी है। उन्होंने ही क्रोधवश ऐसा किया है॥ १४॥ वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं॥ १५॥ अच्छा, मैं अपनी योगमायासे इसका भलीभाँति जवाब दूँगा। ये मूर्खतावश अपनेको लोक-पाल मानते हैं, इनके ऐश्‍वर्य और धनका घमण्ड तथा अज्ञान मैं चूर-चूर कर दूँगा॥ १६॥ देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐश्‍वर्य और पदका अभिमान न होना चाहिये। अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी॥ १७॥ यह सारा व्रज मेरे आश्रित है, मेरे द्वारा स्वीकृत है और एकमात्र मैं ही इसका रक्षक हूँ। अतः मैं अपनी योगमायासे इसकी रक्षा करूँगा। संतोंकी रक्षा करना तो मेरा व्रत ही है। अब उसके पालनका अवसर आ पहुँचा है’॥ १८॥"},{"b":30141,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.19"],"text":"इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम्।"},{"b":30142,"kind":"sanskrit_shloka","page":295,"verses":["10.25.19"],"text":"दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालकः॥ १९"},{"b":30143,"kind":"hindi_translation","page":295,"explains":["10.25.19"],"text":"इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्णने खेल-खेलमें एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और जैसे छोटे-छोटे बालक बरसाती छत्तेके पुष्पको उखाड़कर हाथमें रख लेते हैं, वैसे ही उन्होंने उस पर्वतको धारण कर लिया॥ १९॥"},{"b":30144,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.20"],"text":"अथाह भगवान् गोपान् हेऽम्ब तात व्रजौकसः।"},{"b":30145,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.20"],"text":"यथोपजोषं विशत गिरिगर्तं सगोधनाः॥ २०"},{"b":30146,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.21"],"text":"न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातने।"},{"b":30147,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.21"],"text":"वातवर्षभयेनालं तत्त्राणं विहितं हि वः॥ २१"},{"b":30148,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.22"],"text":"तथा निर्विविशुर्गर्तं कृष्णाश्‍वासितमानसाः।"},{"b":30149,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.22"],"text":"यथावकाशं सधनाः सव्रजाः सोपजीविनः॥ २२"},{"b":30150,"kind":"hindi_translation","page":296,"explains":["10.25.20","10.25.21","10.25.22"],"text":"इसके बाद भगवान्‌ने गोपोंसे कहा—‘माताजी, पिताजी और व्रजवासियो! तुमलोग अपनी गौओं और सब सामग्रियोंके साथ इस पर्वतके गड्ढेमें आकर आरामसे बैठ जाओ॥ २०॥ देखो, तुमलोग ऐसी शंका न करना कि मेरे हाथसे यह पर्वत गिर पड़ेगा। तुमलोग तनिक भी मत डरो। इस आँधी-पानीके डरसे तुम्हें बचानेके लिये ही मैंने यह युक्ति रची है’॥ २१॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सबको आश्‍वासन दिया—ढाढ़स बँधाया, तब सब-के-सब ग्वाल अपने-अपने गोधन, छकड़ों, आश्रितों, पुरोहितों और भृत्योंको अपने-अपने साथ लेकर सुभीतेके अनुसार गोवर्द्धनके गड्ढेमें आ घुसे॥ २२॥"},{"b":30151,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.23"],"text":"क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः।"},{"b":30152,"kind":"hindi_commentary","page":296,"verses":["10.25.23"],"text":"वीक्ष्यमाणो दधावद्रिं सप्ताहं नाचलत् पदात्॥ २३"},{"b":30153,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.24"],"text":"कृष्णयोगानुभावं तं निशाम्येन्द्रोऽतिविस्मितः।"},{"b":30154,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.24"],"text":"निःस्तम्भो भ्रष्टसंकल्पः स्वान् मेघान् संन्यवारयत्॥ २४"},{"b":30155,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.25"],"text":"खं व्यभ्रमुदितादित्यं वातवर्षं च दारुणम्।"},{"b":30156,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.25"],"text":"निशाम्योपरतं गोपान् गोवर्धनधरोऽब्रवीत्॥ २५"},{"b":30157,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.26"],"text":"निर्यात त्यजत त्रासं गोपाः सस्त्रीधनार्भकाः।"},{"b":30158,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.26"],"text":"उपारतं वातवर्षं व्युदप्रायाश्‍च निम्‍नगाः॥ २६"},{"b":30159,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.27"],"text":"ततस्ते निर्ययुर्गोपाः स्वं स्वमादाय गोधनम्।"},{"b":30160,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.27"],"text":"शकटोढोपकरणं स्त्रीबालस्थविराः शनैः॥ २७"},{"b":30161,"kind":"hindi_translation","page":296,"explains":["10.25.23","10.25.24","10.25.25","10.25.26","10.25.27"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने सब व्रजवासियोंके देखते-देखते भूख-प्यासकी पीड़ा, आराम-विश्रामकी आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिनतक लगातार उस पर्वतको उठाये रखा। वे एक डग भी वहाँसे इधर-उधर नहीं हुए॥ २३॥ श्रीकृष्णकी योगमायाका यह प्रभाव देखकर इन्द्रके आश्‍चर्यका ठिकाना न रहा। अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी, वे भौंचक्के-से रह गये। इसके बाद उन्होंने मेघोंको अपने-आप वर्षा करनेसे रोक दिया॥ २४॥ जब गोवर्द्धनधारी भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि वह भयंकर आँधी और घनघोर वर्षा बंद हो गयी, आकाशसे बादल छँट गये और सूर्य दीखने लगे, तब उन्होंने गोपोंसे कहा—॥ २५॥ ‘मेरे प्यारे गोपो! अब तुमलोग निडर हो जाओ और अपनी स्त्रियों, गोधन तथा बच्चोंके साथ बाहर निकल आओ। देखो, अब आँधी-पानी बंद हो गया तथा नदियोंका पानी भी उतर गया’॥ २६॥ भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर अपने-अपने गोधन, स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको साथ ले तथा अपनी सामग्री छकड़ोंपर लादकर धीरे-धीरे सब लोग बाहर निकल आये॥ २७॥"},{"b":30162,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.28"],"text":"भगवानपि तं शैलं स्वस्थाने पूर्ववत् प्रभुः।"},{"b":30163,"kind":"sanskrit_shloka","page":296,"verses":["10.25.28"],"text":"पश्यतां सर्वभूतानां स्थापयामास लीलया॥ २८"},{"b":30164,"kind":"hindi_translation","page":296,"explains":["10.25.28"],"text":"सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने भी सब प्राणियोंके देखते-देखते खेल-खेलमें ही गिरिराजको पूर्ववत् उसके स्थानपर रख दिया॥ २८॥"},{"b":30165,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.29"],"text":"तं प्रेमवेगान्‍निभृता व्रजौकसो"},{"b":30166,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.29"],"text":"यथा समीयुः परिरम्भणादिभिः।"},{"b":30167,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.29"],"text":"गोप्यश्‍च सस्नेहमपूजयन् मुदा"},{"b":30168,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.29"],"text":"दध्यक्षताद्भिर्युयुजुः सदाशिषः॥ २९"},{"b":30169,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.30"],"text":"यशोदा रोहिणी नन्दो रामश्‍च बलिनां वरः।"},{"b":30170,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.30"],"text":"कृष्णमालिङ्‌ग्‍य युयुजुराशिषः स्नेहकातराः॥ ३०"},{"b":30171,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.31"],"text":"दिवि देवगणाः साध्याः सिद्धगन्धर्वचारणाः।"},{"b":30172,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.31"],"text":"तुष्टुवुर्मुमुचुस्तुष्टाः पुष्पवर्षाणि पार्थिव॥ ३१"},{"b":30173,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.32"],"text":"शंखदुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवप्रणोदिताः।"},{"b":30174,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.32"],"text":"जगुर्गन्धर्वपतयस्तुम्बुरुप्रमुखा नृप॥ ३२"},{"b":30175,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.33"],"text":"ततोऽनुरक्तैः पशुपैः परिश्रितो"},{"b":30176,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.33"],"text":"राजन् स गोष्ठं सबलोऽव्रजद्धरिः।"},{"b":30177,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.33"],"text":"तथाविधान्यस्य कृतानि गोपिका"},{"b":30178,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.25.33"],"text":"गायन्त्य ईयुर्मुदिता हृदिस्पृशः॥ ३३"},{"b":30179,"kind":"hindi_translation","page":297,"explains":["10.25.29","10.25.30","10.25.31","10.25.32","10.25.33"],"text":"व्रजवासियोंका हृदय प्रेमके आवेगसे भर रहा था। पर्वतको रखते ही वे भगवान् श्रीकृष्णके पास दौड़ आये। कोई उन्हें हृदयसे लगाने और कोई चूमने लगा। सबने उनका सत्कार किया। बड़ी-बूढ़ी गोपियोंने बड़े आनन्द और स्नेहसे दही, चावल, जल आदिसे उनका मंगल-तिलक किया और उन्मुक्त हृदयसे शुभ आशीर्वाद दिये॥ २९॥ यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा और बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने स्नेहातुर होकर श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया तथा आशीर्वाद दिये॥ ३०॥ परीक्षित्! उस समय आकाशमें स्थित देवता, साध्य, सिद्ध, गन्धर्व और चारण आदि प्रसन्‍न होकर भगवान्‌की स्तुति करते हुए उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ३१॥ राजन्! स्वर्गमें देवतालोग शंख और नौबत बजाने लगे। तुम्बुरु आदि गन्धर्वराज भगवान्‌की मधुर लीलाका गान करने लगे॥ ३२॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने व्रजकी यात्रा की। उनके बगलमें बलरामजी चल रहे थे और उनके प्रेमी ग्वालबाल उनकी सेवा कर रहे थे। उनके साथ ही प्रेममयी गोपियाँ भी अपने हृदयको आकर्षित करनेवाले, उसमें प्रेम जगानेवाले भगवान्‌की गोवर्द्धन-धारण आदि लीलाओंका गान करती हुई बड़े आनन्दसे व्रजमें लौट आयीं॥ ३३॥"},{"b":30180,"kind":"hindi_translation","page":297,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥"}],"notes":[{"id":"v2:276","mark":"३","page":293,"after_verse":null,"text":"बादरायणिरुवाच।"},{"id":"v2:277","mark":"१","page":294,"after_verse":"10.25.3","text":"मखभंगमचीकरन्।"},{"id":"v2:278","mark":"२","page":294,"after_verse":"10.25.7","text":"हावेगैर्न०।"},{"id":"v2:279","mark":"*","page":295,"after_verse":"10.25.18","text":"भगवान् कहते हैं— सकृदेव प्रपन्‍नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥ ‘जो केवल एक बार मेरी शरणमें आ जाता है और ‘मैं तुम्हारा हूँ’ इस प्रकार याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है।’"},{"id":"v2:280","mark":"१","page":296,"after_verse":"10.25.23","text":"धाराद्रिं।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}