{"id":"10.29","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 29","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः","topics":["रासलीलाका आरम्भ"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.29.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[307,316]},"verses":[{"id":"10.29.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/1/","page":307,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः।","वीक्ष्य रन्तुं मनश्‍चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ १"],"iast":["bhagavānapi tā rātrīḥ śaradotphullamallikāḥ|","vīkṣya rantuṃ manaścakre yogamāyāmupāśritaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरद् ऋतु थी। उसके कारण बेला, चमेली आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर महँ-महँ महँक रहे थे। भगवान्‌ने चीरहरणके समय गोपियोंको जिन रात्रियोंका संकेत किया था, वे सब-की-सब पुंजीभूत होकर एक ही रात्रिके रूपमें उल्लसित हो रही थीं। भगवान्‌ने उन्हें देखा, देखकर दिव्य बनाया। गोपियाँ तो चाहती ही थीं। अब भगवान्‌ने भी अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमयी रासक्रीडा करनेका संकल्प किया। अमना होनेपर भी उन्होंने अपने प्रेमियोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मन स्वीकार किया॥ १॥"},{"id":"10.29.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/2/","page":307,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं","प्राच्या विलिम्पन्‍नरुणेन शन्तमैः।","स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्","प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः॥ २"],"iast":["tadoḍurājaḥ kakubhaḥ karairmukhaṃ","prācyā vilimpannaruṇena śantamaiḥ|","sa carṣaṇīnāmudagācchuco mṛjan","priyaḥ priyāyā iva dīrghadarśanaḥ|| 2"],"meaning":"भगवान्‌के संकल्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके मुखमण्डलपर अपने शीतल किरणरूपी करकमलोंसे लालिमाकी रोली-केसर मल दी, जैसे बहुत दिनोंके बाद अपनी प्राणप्रिया पत्‍नीके पास आकर उसके प्रियतम पतिने उसे आनन्दित करनेके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर न केवल पूर्वदिशाका, प्रत्युत संसारके समस्त चर-अचर प्राणियोंका सन्ताप—जो दिनमें शरत्कालीन प्रखर सूर्य-रश्मियोंके कारण बढ़ गया था—दूर कर दिया॥ २॥"},{"id":"10.29.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/3/","page":307,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं","रमाननाभं नवकुंकुमारुणम्।","वनं च तत्कोमलगोभिरंजितं","जगौ कलं वामदृशां मनोहरम्॥ ३"],"iast":["dṛṣṭvā kumudvantamakhaṇḍamaṇḍalaṃ","ramānanābhaṃ navakuṃkumāruṇam|","vanaṃ ca tatkomalagobhiraṃjitaṃ","jagau kalaṃ vāmadṛśāṃ manoharam|| 3"],"meaning":"उस दिन चन्द्रदेवका मण्डल अखण्ड था। पूर्णिमाकी रात्रि थी। वे नूतन केशरके समान लाल-लाल हो रहे थे, कुछ संकोचमिश्रित अभिलाषासे युक्त जान पड़ते थे। उनका मुखमण्डल लक्ष्मीजीके समान मालूम हो रहा था। उनकी कोमल किरणोंसे सारा वन अनुरागके रंगमें रँग गया था। वनके कोने-कोनेमें उन्होंने अपनी चाँदनीके द्वारा अमृतका समुद्र उड़ेल दिया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने दिव्य उज्ज्वल रसके उद्दीपनकी पूरी सामग्री उन्हें और उस वनको देखकर अपनी बाँसुरीपर व्रजसुन्दरियोंके मनको हरण करनेवाली कामबीज ‘क्लीं’ की अस्पष्ट एवं मधुर तान छेड़ी॥ ३॥"},{"id":"10.29.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/4/","page":308,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं","व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः।","आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः","स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः॥ ४"],"iast":["niśamya gītaṃ tadanaṅgavardhanaṃ","vrajastriyaḥ kṛṣṇagṛhītamānasāḥ|","ājagmuranyonyamalakṣitodyamāḥ","sa yatra kānto javalolakuṇḍalāḥ|| 4"],"meaning":"भगवान्‌का वह वंशीवादन भगवान्‌के प्रेमको, उनके मिलनकी लालसाको अत्यन्त उकसाने-वाला—बढ़ानेवाला था। यों तो श्यामसुन्दरने पहलेसे ही गोपियोंके मनको अपने वशमें कर रखा था। अब तो उनके मनकी सारी वस्तुएँ—भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा आदिकी वृत्तियाँ भी—छीन लीं। वंशीध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गयी। जिन्होंने एक साथ साधना की थी श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये, वे गोपियाँ भी एक-दूसरेको सूचना न देकर—यहाँतक कि एक-दूसरेसे अपनी चेष्टाको छिपाकर जहाँ वे थे, वहाँके लिये चल पड़ीं। परीक्षित्! वे इतने वेगसे चली थीं कि उनके कानोंके कुण्डल झोंके खा रहे थे॥ ४॥"},{"id":"10.29.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/5/","page":308,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुहन्त्योऽभिययुः काश्‍चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः।","पयोऽधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यापरा ययुः॥ ५"],"iast":["duhantyo'bhiyayuḥ kāścid dohaṃ hitvā samutsukāḥ|","payo'dhiśritya saṃyāvamanudvāsyāparā yayuḥ|| 5"],"meaning":"वंशीध्वनि सुनकर जो गोपियाँ दूध दुह रही थीं, वे अत्यन्त उत्सुकतावश दूध दुहना छोड़कर चल पड़ीं। जो चूल्हेपर दूध औंटा रही थीं, वे उफनता हुआ दूध छोड़कर और जो लपसी पका रही थीं वे पकी हुई लपसी बिना उतारे ही ज्यों-की-त्यों छोड़कर चल दीं॥ ५॥"},{"id":"10.29.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/6/","page":308,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["परिवेषयन्त्यस्तद्धित्वा पाययन्त्यः शिशून् पयः।","शुश्रूषन्त्यः पतीन् काश्‍चिदश्‍नन्त्योऽपास्य भोजनम्॥ ६"],"iast":["pariveṣayantyastaddhitvā pāyayantyaḥ śiśūn payaḥ|","śuśrūṣantyaḥ patīn kāścidaśnantyo'pāsya bhojanam|| 6"],"meaning":"जो भोजन परस रही थीं वे परसना छोड़कर, जो छोटे-छोटे बच्चोंको दूध पिला रही थीं वे दूध पिलाना छोड़कर, जो पतियोंकी सेवा-शुश्रूषा कर रही थीं वे सेवा-शुश्रूषा छोड़कर और जो स्वयं भोजन कर रही थीं वे भोजन करना छोड़कर अपने कृष्णप्यारेके पास चल पड़ीं॥ ६॥"},{"id":"10.29.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/7/","page":308,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजन्त्यः काश्‍च लोचने।","व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्‍चित् कृष्णान्तिकं ययुः॥ ७"],"iast":["limpantyaḥ pramṛjantyo'nyā aṃjantyaḥ kāśca locane|","vyatyastavastrābharaṇāḥ kāścit kṛṣṇāntikaṃ yayuḥ|| 7"],"meaning":"कोई-कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे-पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं॥ ७॥"},{"id":"10.29.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/8/","page":309,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृबन्धुभिः।","गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्तन्त मोहिताः॥ ८"],"iast":["tā vāryamāṇāḥ patibhiḥ pitṛbhirbhrātṛbandhubhiḥ|","govindāpahṛtātmāno na nyavartanta mohitāḥ|| 8"],"meaning":"पिता और पतियोंने, भाई और जाति-बन्धुओंने उन्हें रोका, उनकी मंगलमयी प्रेमयात्रामें विघ्न डाला। परन्तु वे इतनी मोहित हो गयी थीं कि रोकनेपर भी न रुकीं, न रुक सकीं। रुकतीं कैसे? विश्‍वविमोहन श्रीकृष्णने उनके प्राण, मन और आत्मा सब कुछका अपहरण जो कर लिया था॥ ८॥"},{"id":"10.29.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/9/","page":309,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तर्गृहगताः काश्‍चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः।","कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ ९"],"iast":["antargṛhagatāḥ kāścid gopyo'labdhavinirgamāḥ|","kṛṣṇaṃ tadbhāvanāyuktā dadhyurmīlitalocanāḥ|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय कुछ गोपियाँ घरोंके भीतर थीं। उन्हें बाहर निकलनेका मार्ग ही न मिला। तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और बड़ी तन्मयतासे श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और लीलाओंका ध्यान करने लगीं॥ ९॥"},{"id":"10.29.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/10/","page":309,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।","ध्यानप्राप्ताच्युताश्‍लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ १०"],"iast":["duḥsahapreṣṭhavirahatīvratāpadhutāśubhāḥ |","dhyānaprāptācyutāśleṣanirvṛtyā kṣīṇamaṅgalāḥ|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! अपने परम प्रियतम श्रीकृष्णके असह्य विरहकी तीव्र वेदनासे उनके हृदयमें इतनी व्यथा—इतनी जलन हुई कि उनमें जो कुछ अशुभ संस्कारोंका लेशमात्र अवशेष था, वह भस्म हो गया। इसके बाद तुरंत ही ध्यान लग गया। ध्यानमें उनके सामने भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने मन-ही-मन बड़े प्रेमसे, बड़े आवेगसे उनका आलिंगन किया। उस समय उन्हें इतना सुख, इतनी शान्ति मिली कि उनके सब-के-सब पुण्यके संस्कार एक साथ ही क्षीण हो गये॥ १०॥"},{"id":"10.29.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/11/","page":309,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।","जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ ११"],"iast":["tameva paramātmānaṃ jārabuddhyāpi saṅgatāḥ|","jahurguṇamayaṃ dehaṃ sadyaḥ prakṣīṇabandhanāḥ|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! यद्यपि उनका उस समय श्रीकृष्णके प्रति जारभाव भी था; तथापि कहीं सत्य वस्तु भी भावकी अपेक्षा रखती है? उन्होंने जिनका आलिंगन किया, चाहे किसी भी भावसे किया हो, वे स्वयं परमात्मा ही तो थे। इसलिये उन्होंने पाप और पुण्यरूप कर्मके परिणामसे बने हुए गुणमय शरीरका परित्याग कर दिया। (भगवान्‌की लीलामें सम्मिलित होनेके योग्य दिव्य अप्राकृत शरीर प्राप्त कर लिया।) इस शरीरसे भोगे जानेवाले कर्मबन्धन तो ध्यानके समय ही छिन्‍न-भिन्‍न हो चुके थे॥ ११॥"},{"id":"10.29.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/12/","page":309,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने।","गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम्॥ १२"],"iast":["kṛṣṇaṃ viduḥ paraṃ kāntaṃ na tu brahmatayā mune|","guṇapravāhoparamastāsāṃ guṇadhiyāṃ katham|| 12"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! गोपियाँ तो भगवान् श्रीकृष्णको केवल अपना परम प्रियतम ही मानती थीं। उनका उनमें ब्रह्मभाव नहीं था। इस प्रकार उनकी दृष्टि प्राकृत गुणोंमें ही आसक्त दीखती है। ऐसी स्थितिमें उनके लिये गुणोंके प्रवाहरूप इस संसारकी निवृत्ति कैसे सम्भव हुई?॥ १२॥"},{"id":"10.29.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/13/","page":310,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः।","द्विषन्‍नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः॥ १३"],"iast":["uktaṃ purastādetatte caidyaḥ siddhiṃ yathā gataḥ|","dviṣannapi hṛṣīkeśaṃ kimutādhokṣajapriyāḥ|| 13"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि चेदिराज शिशुपाल भगवान्‌के प्रति द्वेषभाव रखनेपर भी अपने प्राकृत शरीरको छोड़कर अप्राकृत शरीरसे उनका पार्षद हो गया। ऐसी स्थितिमें जो समस्त प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी हैं और उनसे अनन्य प्रेम करती हैं, वे गोपियाँ उन्हें प्राप्त हो जायँ—इसमें कौन-सी आश्‍चर्यकी बात है॥ १३॥"},{"id":"10.29.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/14/","page":310,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।","अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ १४"],"iast":["nṛṇāṃ niḥśreyasārthāya vyaktirbhagavato nṛpa|","avyayasyāprameyasya nirguṇasya guṇātmanaḥ|| 14"],"meaning":"परीक्षित्! वास्तवमें भगवान् प्रकृतिसम्बन्धी वृद्धि-विनाश, प्रमाण-प्रमेय और गुण-गुणीभावसे रहित हैं। वे अचिन्त्य अनन्त अप्राकृत परम कल्याणस्वरूप गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं। उन्होंने यह जो अपनेको तथा अपनी लीलाको प्रकट किया है, उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि जीव उसके सहारे अपना परम कल्याण सम्पादन करे॥ १४॥"},{"id":"10.29.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/15/","page":310,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।","नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ १५"],"iast":["kāmaṃ krodhaṃ bhayaṃ snehamaikyaṃ sauhṛdameva ca|","nityaṃ harau vidadhato yānti tanmayatāṃ hi te|| 15"],"meaning":"इसलिये भगवान्‌से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिये। वह सम्बन्ध चाहे जैसा हो—कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो। चाहे जिस भावसे भगवान्‌में नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान्‌से ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्‌की ही प्राप्ति होती है॥ १५॥"},{"id":"10.29.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/16/","page":310,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे।","योगेश्‍वरेश्‍वरे कृष्णे यत एतद् विमुच्यते॥ १६"],"iast":["na caivaṃ vismayaḥ kāryo bhavatā bhagavatyaje|","yogeśvareśvare kṛṣṇe yata etad vimucyate|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! तुम्हारे-जैसे परम भागवत भगवान्‌का रहस्य जाननेवाले भक्तको श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिये। योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर अजन्मा भगवान्‌के लिये भी यह कोई आश्‍चर्यकी बात है? अरे! उनके संकल्पमात्रसे—भौंहोंके इशारेसे सारे जगत‍्का परम कल्याण हो सकता है॥ १६॥"},{"id":"10.29.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/17/","page":310,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ता दृष्ट्वान्तिकमायाता भगवान् व्रजयोषितः।","अवदद् वदतां श्रेष्ठो वाचः पेशैर्विमोहयन्॥ १७"],"iast":["tā dṛṣṭvāntikamāyātā bhagavān vrajayoṣitaḥ|","avadad vadatāṃ śreṣṭho vācaḥ peśairvimohayan|| 17"],"meaning":"जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि व्रजकी अनुपम विभूतियाँ गोपियाँ मेरे बिलकुल पास आ गयी हैं, तब उन्होंने अपनी विनोदभरी वाक्चातुरीसे उन्हें मोहित करते हुए कहा—क्यों न हो—भूत, भविष्य और वर्तमानकालके जितने वक्ता हैं, उनमें वे ही तो सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १७॥"},{"id":"10.29.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/18/","page":310,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः।","व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम्॥ १८"],"iast":["svāgataṃ vo mahābhāgāḥ priyaṃ kiṃ karavāṇi vaḥ|","vrajasyānāmayaṃ kaccid brūtāgamanakāraṇam|| 18"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग्यवती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है। बतलाओ, तुम्हें प्रसन्‍न करनेके लिये मैं कौन-सा काम करूँ? व्रजमें तो सब कुशल-मंगल है न? कहो, इस समय यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी?॥ १८॥"},{"id":"10.29.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/19/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["रजन्येषा घोररूपा घोरसत्त्वनिषेविता।","प्रतियात व्रजं नेह स्थेयं स्त्रीभिः सुमध्यमाः॥ १९"],"iast":["rajanyeṣā ghorarūpā ghorasattvaniṣevitā|","pratiyāta vrajaṃ neha stheyaṃ strībhiḥ sumadhyamāḥ|| 19"],"meaning":"सुन्दरी गोपियो! रातका समय है, यह स्वयं ही बड़ा भयावना होता है और इसमें बड़े-बड़े भयावने जीव-जन्तु इधर-उधर घूमते रहते हैं। अतः तुम सब तुरंत व्रजमें लौट जाओ। रातके समय घोर जंगलमें स्त्रियोंको नहीं रुकना चाहिये॥ १९॥"},{"id":"10.29.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/20/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मातरः पितरः पुत्रा भ्रातरः पतयश्‍च वः।","विचिन्वन्ति ह्यपश्यन्तो मा कृढ्वं बन्धुसाध्वसम्॥ २०"],"iast":["mātaraḥ pitaraḥ putrā bhrātaraḥ patayaśca vaḥ|","vicinvanti hyapaśyanto mā kṛḍhvaṃ bandhusādhvasam|| 20"],"meaning":"तुम्हें न देखकर तुम्हारे माँ-बाप, पति-पुत्र और भाई-बन्धु ढूँढ़ रहे होंगे। उन्हें भयमें न डालो॥ २०॥"},{"id":"10.29.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/21/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररंजितम्।","यमुनानिललीलैजत्तरुपल्लवशोभितम् ॥ २१"],"iast":["dṛṣṭaṃ vanaṃ kusumitaṃ rākeśakararaṃjitam|","yamunānilalīlaijattarupallavaśobhitam || 21"],"meaning":"तुमलोगोंने रंग-बिरंगे पुष्पोंसे लदे हुए इस वनकी शोभाको देखा। पूर्ण चन्द्रमाकी कोमल रश्मियोंसे यह रँगा हुआ है, मानो उन्होंने अपने हाथों चित्रकारी की हो; और यमुनाजीके जलका स्पर्श करके बहनेवाले शीतल समीरकी मन्द-मन्द गतिसे हिलते हुए ये वृक्षोंके पत्ते तो इस वनकी शोभाको और भी बढ़ा रहे हैं। परन्तु अब तो तुमलोगोंने यह सब कुछ देख लिया॥ २१॥"},{"id":"10.29.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/22/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तद् यात मा चिरं गोष्ठं शुश्रूषध्वं पतीन् सतीः।","क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्‍च तान् पाययत दुह्यत॥ २२"],"iast":["tad yāta mā ciraṃ goṣṭhaṃ śuśrūṣadhvaṃ patīn satīḥ|","krandanti vatsā bālāśca tān pāyayata duhyata|| 22"],"meaning":"अब देर मत करो, शीघ्र-से-शीघ्र व्रजमें लौट जाओ। तुमलोग कुलीन स्त्री हो और स्वयं भी सती हो; जाओ, अपने पतियोंकी और सतियोंकी सेवा-शुश्रूषा करो। देखो, तुम्हारे घरके नन्हे-नन्हे बच्चे और गौओंके बछड़े रो-रँभा रहे हैं; उन्हें दूध पिलाओ, गौएँ दुहो॥ २२॥"},{"id":"10.29.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/23/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः।","आगता ह्युपपन्‍नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ २३"],"iast":["athavā madabhisnehād bhavatyo yantritāśayāḥ|","āgatā hyupapannaṃ vaḥ prīyante mayi jantavaḥ|| 23"],"meaning":"अथवा यदि मेरे प्रेमसे परवश होकर तुमलोग यहाँ आयी हो तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं हुई, यह तो तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि जगत‍्के पशु-पक्षीतक मुझसे प्रेम करते हैं, मुझे देखकर प्रसन्‍न होते हैं॥ २३॥"},{"id":"10.29.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/24/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया।","तद्बन्धूनां च कल्याण्यः प्रजानां चानुपोषणम्॥ २४"],"iast":["bhartuḥ śuśrūṣaṇaṃ strīṇāṃ paro dharmo hyamāyayā|","tadbandhūnāṃ ca kalyāṇyaḥ prajānāṃ cānupoṣaṇam|| 24"],"meaning":"कल्याणी गोपियो! स्त्रियोंका परम धर्म यही है कि वे पति और उसके भाई-बन्धुओंकी निष्कपटभावसे सेवा करें और सन्तानका पालन-पोषण करें॥ २४॥"},{"id":"10.29.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/25/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा।","पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी॥ २५"],"iast":["duḥśīlo durbhago vṛddho jaḍo rogyadhano'pi vā|","patiḥ strībhirna hātavyo lokepsubhirapātakī|| 25"],"meaning":"जिन स्त्रियोंको उत्तम लोक प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, वे पातकीको छोड़कर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो॥ २५॥"},{"id":"10.29.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/26/","page":311,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अस्वर्ग्यमयशस्यं च फल्गु कृच्छ्रं भयावहम्।","जुगुप्सितं च सर्वत्र औपपत्यं कुलस्त्रियाः॥ २६"],"iast":["asvargyamayaśasyaṃ ca phalgu kṛcchraṃ bhayāvaham|","jugupsitaṃ ca sarvatra aupapatyaṃ kulastriyāḥ|| 26"],"meaning":"कुलीन स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब तरहसे निन्दनीय ही है। इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोकमें अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष—वर्तमानमें भी कष्ट-ही-कष्ट है। मोक्ष आदिकी तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय—नरक आदिका हेतु है॥ २६॥"},{"id":"10.29.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/27/","page":312,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्रवणाद् दर्शनाद् ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात्।","न तथा सन्‍निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान्॥ २७"],"iast":["śravaṇād darśanād dhyānānmayi bhāvo'nukīrtanāt|","na tathā sannikarṣeṇa pratiyāta tato gṛhān|| 27"],"meaning":"गोपियो! मेरी लीला और गुणोंके श्रवणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन और ध्यानसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी प्राप्ति होती है, वैसे प्रेमकी प्राप्ति पास रहनेसे नहीं होती। इसलिये तुमलोग अभी अपने-अपने घर लौट जाओ॥ २७॥"},{"id":"10.29.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/28/","page":312,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम्।","विषण्णा भ‌ग्‍नसंकल्पाश्‍चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्॥ २८"],"iast":["iti vipriyamākarṇya gopyo govindabhāṣitam|","viṣaṇṇā bhagnasaṃkalpāścintāmāpurduratyayām|| 28"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्‍न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ २८॥"},{"id":"10.29.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/29/","page":312,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृत्वा मुखान्यव शुचः श्‍वसनेन शुष्यद्","बिम्बाधराणि चरणेन भुवं लिखन्त्यः।","अस्रैरुपात्तमषिभिः कुचकुंकुमानि","तस्थुर्मृजन्त्य उरुदुःखभराः स्म तूष्णीम्॥ २९"],"iast":["kṛtvā mukhānyava śucaḥ śvasanena śuṣyad","bimbādharāṇi caraṇena bhuvaṃ likhantyaḥ|","asrairupāttamaṣibhiḥ kucakuṃkumāni","tasthurmṛjantya uruduḥkhabharāḥ sma tūṣṇīm|| 29"],"meaning":"उनके बिम्बाफल (पके हुए कुँदरू) के समान लाल-लाल अधर शोकके कारण चलनेवाली लम्बी और गरम साँससे सूख गये। उन्होंने अपने मुँह नीचेकी ओर लटका लिये, वे पैरके नखोंसे धरती कुरेदने लगीं। नेत्रोंसे दुःखके आँसू बह-बहकर काजलके साथ वक्षःस्थलपर पहुँचने और वहाँ लगी हुई केशरको धोने लगे। उनका हृदय दुःखसे इतना भर गया कि वे कुछ बोल न सकीं, चुपचाप खड़ी रह गयीं॥ २९॥"},{"id":"10.29.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/30/","page":312,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रेष्ठं प्रियेतरमिव प्रतिभाषमाणं","कृष्णं तदर्थविनिवर्तितसर्वकामाः।","नेत्रे विमृज्य रुदितोपहते स्म किंचित्","संरम्भगद्गदगिरोऽब्रुवतानुरक्ताः॥ ३०"],"iast":["preṣṭhaṃ priyetaramiva pratibhāṣamāṇaṃ","kṛṣṇaṃ tadarthavinivartitasarvakāmāḥ|","netre vimṛjya ruditopahate sma kiṃcit","saṃrambhagadgadagiro'bruvatānuraktāḥ|| 30"],"meaning":"गोपियोंने अपने प्यारे श्यामसुन्दरके लिये सारी कामनाएँ, सारे भोग छोड़ दिये थे। श्रीकृष्णमें उनका अनन्य अनुराग, परम प्रेम था। जब उन्होंने अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी यह निष्ठुरतासे भरी बात सुनी, जो बड़ी ही अप्रिय-सी मालूम हो रही थी, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। आँखें रोते-रोते लाल हो गयीं, आँसुओंके मारे रुँध गयीं। उन्होंने धीरज धारण करके अपनी आँखोंके आँसू पोंछे और फिर प्रणयकोपके कारण वे गद्गद वाणीसे कहने लगीं॥ ३०॥"},{"id":"10.29.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/31/","page":312,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं","सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।","भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्","देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्॥ ३१"],"iast":["maivaṃ vibho'rhati bhavān gadituṃ nṛśaṃsaṃ","santyajya sarvaviṣayāṃstava pādamūlam|","bhaktā bhajasva duravagraha mā tyajāsmān","devo yathā''dipuruṣo bhajate mumukṣūn|| 31"],"meaning":"गोपियोंने कहा—प्यारे श्रीकृष्ण! तुम घट-घट व्यापी हो। हमारे हृदयकी बात जानते हो। तुम्हें इस प्रकार निष्ठुरताभरे वचन नहीं कहने चाहिये। हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणोंमें ही प्रेम करती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि तुम स्वतन्त्र और हठीले हो। तुमपर हमारा कोई वश नहीं है। फिर भी तुम अपनी ओरसे, जैसे आदिपुरुष भगवान् नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तोंसे प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें स्वीकार कर लो। हमारा त्याग मत करो॥ ३१॥"},{"id":"10.29.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/32/","page":313,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरङ्ग","स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्।","अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे","प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा॥ ३२"],"iast":["yatpatyapatyasuhṛdāmanuvṛttiraṅga","strīṇāṃ svadharma iti dharmavidā tvayoktam|","astvevametadupadeśapade tvayīśe","preṣṭho bhavāṃstanubhṛtāṃ kila bandhurātmā|| 32"],"meaning":"प्यारे श्यामसुन्दर! तुम सब धर्मोंका रहस्य जानते हो। तुम्हारा यह कहना कि ‘अपने पति, पुत्र और भाई-बन्धुओंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका स्वधर्म है’—अक्षरशः ठीक है। परन्तु इस उपदेशके अनुसार हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिये; क्योंकि तुम्हीं सब उपदेशोंके पद (चरम लक्ष्य) हो; साक्षात् भगवान् हो। तुम्हीं समस्त शरीरधारियोंके सुहृद् हो, आत्मा हो और परम प्रियतम हो॥ ३२॥"},{"id":"10.29.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/33/","page":313,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन्","नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्।","तन्‍नः प्रसीद परमेश्‍वर मा स्म छिन्द्या","आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥ ३३"],"iast":["kurvanti hi tvayi ratiṃ kuśalāḥ sva ātman","nityapriye patisutādibhirārtidaiḥ kim|","tannaḥ prasīda parameśvara mā sma chindyā","āśāṃ bhṛtāṃ tvayi cirādaravindanetra|| 33"],"meaning":"आत्मज्ञानमें निपुण महापुरुष तुमसे ही प्रेम करते हैं; क्योंकि तुम नित्य प्रिय एवं अपने ही आत्मा हो। अनित्य एवं दुःखद पति-पुत्रादिसे क्या प्रयोजन है? परमेश्‍वर! इसलिये हमपर प्रसन्‍न होओ। कृपा करो। कमलनयन! चिरकालसे तुम्हारे प्रति पाली-पोसी आशा-अभिलाषाकी लहलहाती लताका छेदन मत करो॥ ३३॥"},{"id":"10.29.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/34/","page":313,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु","यन्‍निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये।","पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्","यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ ३४"],"iast":["cittaṃ sukhena bhavatāpahṛtaṃ gṛheṣu","yannirviśatyuta karāvapi gṛhyakṛtye|","pādau padaṃ na calatastava pādamūlād","yāmaḥ kathaṃ vrajamatho karavāma kiṃ vā|| 34"],"meaning":"मनमोहन! अबतक हमारा चित्त घरके काम-धंधोंमें लगता था। इसीसे हमारे हाथ भी उनमें रमे हुए थे। परन्तु तुमने हमारे देखते-देखते हमारा वह चित्त लूट लिया। इसमें तुम्हें कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ी, तुम तो सुखस्वरूप हो न! परन्तु अब तो हमारी गति-मति निराली ही हो गयी है। हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमलोंको छोड़कर एक पग भी हटनेके लिये तैयार नहीं हैं, नहीं हट रहे हैं। फिर हम व्रजमें कैसे जायँ? और यदि वहाँ जायँ भी तो करें क्या?॥ ३४॥"},{"id":"10.29.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/35/","page":313,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण","हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्‍निम्।","नो चेद् वयं विरहजा‌ग्‍न्युपयुक्तदेहा","ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते॥ ३५"],"iast":["siñcāṅga nastvadadharāmṛtapūrakeṇa","hāsāvalokakalagītajahṛcchayāgnim|","no ced vayaṃ virahajāgnyupayuktadehā","dhyānena yāma padayoḥ padavīṃ sakhe te|| 35"],"meaning":"प्राणवल्लभ! हमारे प्यारे सखा! तुम्हारी मन्द-मन्द मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन और मनोहर संगीतने हमारे हृदयमें तुम्हारे प्रेम और मिलनकी आग धधका दी है। उसे तुम अपने अधरोंकी रसधारासे बुझा दो। नहीं तो प्रियतम! हम सच कहती हैं, तुम्हारी विरहव्यथाकी आगसे हम अपने-अपने शरीर जला देंगी और ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणकमलोंको प्राप्त करेंगी॥ ३५॥"},{"id":"10.29.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/36/","page":313,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया","दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य।","अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमङ्ग","स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥ ३६"],"iast":["yarhyambujākṣa tava pādatalaṃ ramāyā","dattakṣaṇaṃ kvacidaraṇyajanapriyasya|","asprākṣma tatprabhṛti nānyasamakṣamaṅga","sthātuṃ tvayābhiramitā bata pārayāmaḥ|| 36"],"meaning":"प्यारे कमलनयन! तुम वनवासियोंके प्यारे हो और वे भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं। इससे प्रायः तुम उन्हींके पास रहते हो। यहाँतक कि तुम्हारे जिन चरणकमलोंकी सेवाका अवसर स्वयं लक्ष्मीजीको कभी-कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणोंका स्पर्श हमें प्राप्त हुआ। जिस दिन यह सौभाग्य हमें मिला और तुमने हमें स्वीकार करके आनन्दित किया, उसी दिनसे हम और किसीके सामने एक क्षणके लिये भी ठहरनेमें असमर्थ हो गयी हैं—पति-पुत्रादिकोंकी सेवा तो दूर रही॥ ३६॥"},{"id":"10.29.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/37/","page":314,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्‍चकमे तुलस्या","लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्।","यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास-","स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्‍नाः॥ ३७"],"iast":["śrīryatpadāmbujarajaścakame tulasyā","labdhvāpi vakṣasi padaṃ kila bhṛtyajuṣṭam|","yasyāḥ svavīkṣaṇakṛte'nyasuraprayāsa-","stadvad vayaṃ ca tava pādarajaḥ prapannāḥ|| 37"],"meaning":"हमारे स्वामी! जिन लक्ष्मीजीका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये बड़े-बड़े देवता तपस्या करते रहते हैं, वही लक्ष्मीजी तुम्हारे वक्षःस्थलमें बिना किसीकी प्रतिद्वन्द्विताके स्थान प्राप्त कर लेनेपर भी अपनी सौत तुलसीके साथ तुम्हारे चरणोंकी रज पानेकी अभिलाषा किया करती हैं। अबतकके सभी भक्तोंने उस चरणरजका सेवन किया है। उन्हींके समान हम भी तुम्हारी उसी चरणरजकी शरणमें आयी हैं॥ ३७॥"},{"id":"10.29.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/38/","page":314,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["तन्‍नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्‌घ्रिमूलं","प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः।","त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकाम-","तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम्॥ ३८"],"iast":["tannaḥ prasīda vṛjinārdana te'ṅghrimūlaṃ","prāptā visṛjya vasatīstvadupāsanāśāḥ|","tvatsundarasmitanirīkṣaṇatīvrakāma-","taptātmanāṃ puruṣabhūṣaṇa dehi dāsyam|| 38"],"meaning":"भगवन्! अबतक जिसने भी तुम्हारे चरणोंकी शरण ली, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये। अब तुम हमपर कृपा करो। हमें भी अपने प्रसादका भाजन बनाओ। हम तुम्हारी सेवा करनेकी आशा-अभिलाषासे घर, गाँव, कुटुम्ब—सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल चरणोंकी शरणमें आयी हैं। प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधनाके लिये अवकाश ही नहीं है। पुरुषभूषण! पुरुषोत्तम! तुम्हारी मधुर मुसकान और चारु चितवनने हमारे हृदयमें प्रेमकी—मिलनकी आकांक्षाकी आग धधका दी है; हमारा रोम-रोम उससे जल रहा है। तुम हमें अपनी दासीके रूपमें स्वीकार कर लो। हमें अपनी सेवाका अवसर दो॥ ३८॥"},{"id":"10.29.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/39/","page":314,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री-","गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्।","दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य","वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः॥ ३९"],"iast":["vīkṣyālakāvṛtamukhaṃ tava kuṇḍalaśrī-","gaṇḍasthalādharasudhaṃ hasitāvalokam|","dattābhayaṃ ca bhujadaṇḍayugaṃ vilokya","vakṣaḥ śriyaikaramaṇaṃ ca bhavāma dāsyaḥ|| 39"],"meaning":"प्रियतम! तुम्हारा सुन्दर मुखकमल, जिसपर घुँघराली अलकें झलक रही हैं; तुम्हारे ये कमनीय कपोल, जिनपर सुन्दर-सुन्दर कुण्डल अपना अनन्त सौन्दर्य बिखेर रहे हैं; तुम्हारे ये मधुर अधर, जिनकी सुधा सुधाको भी लजानेवाली है; तुम्हारी यह नयनमनोहारी चितवन, जो मन्द-मन्द मुसकानसे उल्लसित हो रही है; तुम्हारी ये दोनों भुजाएँ, जो शरणागतोंको अभयदान देनेमें अत्यन्त उदार हैं और तुम्हारा यह वक्षःस्थल, जो लक्ष्मीजीका—सौन्दर्यकी एकमात्र देवीका नित्य क्रीडास्थल है, देखकर हम सब तुम्हारी दासी हो गयी हैं॥ ३९॥"},{"id":"10.29.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/40/","page":314,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन","सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्‍न चलेत्त्रिलोक्याम्।","त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं","यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ ४०"],"iast":["kā stryaṅga te kalapadāyatamūrcchitena","sammohitā''ryacaritānna calettrilokyām|","trailokyasaubhagamidaṃ ca nirīkṣya rūpaṃ","yad godvijadrumamṛgāḥ pulakānyabibhran|| 40"],"meaning":"प्यारे श्यामसुन्दर! तीनों लोकोंमें भी और ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह-क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तान सुनकर तथा इस त्रिलोकसुन्दर मोहिनी मूर्तिको—जो अपने एक बूँद सौन्दर्यसे त्रिलोकीको सौन्दर्यका दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, वृक्ष और हरिन भी रोमांचित, पुलकित हो जाते हैं—अपने नेत्रोंसे निहारकर आर्य—मर्यादासे विचलित न हो जाय, कुल-कान और लोकलज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय॥ ४०॥"},{"id":"10.29.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/41/","page":315,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो","देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता।","तन्‍नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो","तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम्॥ ४१"],"iast":["vyaktaṃ bhavān vrajabhayārtiharo'bhijāto","devo yathā''dipuruṣaḥ suralokagoptā|","tanno nidhehi karapaṃkajamārtabandho","taptastaneṣu ca śirassu ca kiṃkarīṇām|| 41"],"meaning":"हमसे यह बात छिपी नहीं है कि जैसे भगवान् नारायण देवताओंकी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रजमण्डलका भय और दुःख मिटानेके लिये ही प्रकट हुए हो! और यह भी स्पष्ट ही है कि दीन-दुखियोंपर तुम्हारा बड़ा प्रेम, बड़ी कृपा है। प्रियतम! हम भी बड़ी दुःखिनी हैं। तुम्हारे मिलनकी आकांक्षाकी आगसे हमारा वक्षःस्थल जल रहा है। तुम अपनी इन दासियोंके वक्षःस्थल और सिरपर अपने कोमल करकमल रखकर इन्हें अपना लो; हमें जीवनदान दो॥ ४१॥"},{"id":"10.29.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/42/","page":315,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति विक्लवितं तासां श्रुत्वा योगेश्‍वरेश्‍वरः।","प्रहस्य सदयं गोपीरात्मारामोऽप्यरीरमत्॥ ४२"],"iast":["iti viklavitaṃ tāsāṃ śrutvā yogeśvareśvaraḥ|","prahasya sadayaṃ gopīrātmārāmo'pyarīramat|| 42"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सनकादि योगियों और शिवादि योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। जब उन्होंने गोपियोंकी व्यथा और व्याकुलतासे भरी वाणी सुनी, तब उनका हृदय दयासे भर गया और यद्यपि वे आत्माराम हैं—अपने-आपमें ही रमण करते रहते हैं, उन्हें अपने अतिरिक्त और किसी भी बाह्य वस्तुकी अपेक्षा नहीं है, फिर भी उन्होंने हँसकर उनके साथ क्रीडा प्रारम्भ की॥ ४२॥"},{"id":"10.29.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/43/","page":315,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताभिः समेताभिरुदारचेष्टितः","प्रियेक्षणोत्फुल्लमुखीभिरच्युतः ।","उदारहासद्विजकुन्ददीधिति-","र्व्यरोचतैणांक इवोडुभिर्वृतः॥ ४३"],"iast":["tābhiḥ sametābhirudāraceṣṭitaḥ","priyekṣaṇotphullamukhībhiracyutaḥ |","udārahāsadvijakundadīdhiti-","rvyarocataiṇāṃka ivoḍubhirvṛtaḥ|| 43"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने अपनी भाव-भंगी और चेष्टाएँ गोपियोंके अनुकूल कर दीं; फिर भी वे अपने स्वरूपमें ज्यों-के-त्यों एकरस स्थित थे, अच्युत थे। जब वे खुलकर हँसते, तब उनके उज्ज्वल-उज्ज्वल दाँत कुन्दकलीके समान जान पड़ते थे। उनकी प्रेमभरी चितवनसे और उनके दर्शनके आनन्दसे गोपियोंका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया। वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं। उस समय श्रीकृष्णकी ऐसी शोभा हुई, मानो अपनी पत्‍नी तारिकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमा ही हों॥ ४३॥"},{"id":"10.29.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/44/","page":315,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपगीयमान उद्गायन् वनिताशतयूथपः।","मालां बिभ्रद् वैजयन्तीं व्यचरन्मण्डयन् वनम्॥ ४४"],"iast":["upagīyamāna udgāyan vanitāśatayūthapaḥ|","mālāṃ bibhrad vaijayantīṃ vyacaranmaṇḍayan vanam|| 44"],"meaning":"गोपियोंके शत-शत यूथोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला पहने वृन्दावनको शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे। कभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियोंके प्रेम और सौन्दर्यके गीत गाने लगते॥ ४४॥"},{"id":"10.29.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/45/","page":316,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नद्याः पुलिनमाविश्य गोपीभिर्हिमवालुकम्।","रेमे तत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना॥ ४५"],"iast":["nadyāḥ pulinamāviśya gopībhirhimavālukam|","reme tattaralānandakumudāmodavāyunā|| 45"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ यमुनाजीके पावन पुलिनपर, जो कपूरके समान चमकीली बालूसे जगमगा रहा था, पदार्पण किया। वह यमुनाजीकी तरल तरंगोंके स्पर्शसे शीतल और कुमुदिनीकी सहज सुगन्धसे सुवासित वायुके द्वारा सेवित हो रहा था। उस आनन्दप्रद पुलिनपर भगवान्‌ने गोपियोंके साथ क्रीडा की॥ ४५॥"},{"id":"10.29.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/46/","page":316,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु-","नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः ।","क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा-","मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार॥ ४६"],"iast":["bāhuprasāraparirambhakarālakoru-","nīvīstanālabhananarmanakhāgrapātaiḥ |","kṣvelyāvalokahasitairvrajasundarīṇā-","muttambhayan ratipatiṃ ramayāñcakāra|| 46"],"meaning":"हाथ फैलाना, आलिंगन करना, गोपियोंके हाथ दबाना, उनकी चोटी, जाँघ, नीवी और स्तन आदिका स्पर्श करना, विनोद करना, नखक्षत करना, विनोदपूर्ण चितवनसे देखना और मुसकाना—इन क्रियाओंके द्वारा गोपियोंके दिव्य कामरसको, परमोज्ज्वल प्रेमभावको उत्तेजित करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें क्रीडाद्वारा आनन्दित करने लगे॥ ४६॥"},{"id":"10.29.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/47/","page":316,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं भगवतः कृष्णाल्लब्धमाना महात्मनः।","आत्मानं मेनिरे स्त्रीणां मानिन्योऽभ्यधिकं भुवि॥ ४७"],"iast":["evaṃ bhagavataḥ kṛṣṇāllabdhamānā mahātmanaḥ|","ātmānaṃ menire strīṇāṃ māninyo'bhyadhikaṃ bhuvi|| 47"],"meaning":"उदारशिरोमणि सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार गोपियोंका सम्मान किया, तब गोपियोंके मनमें ऐसा भाव आया कि संसारकी समस्त स्त्रियोंमें हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं, हमारे समान और कोई नहीं है। वे कुछ मानवती हो गयीं॥ ४७॥"},{"id":"10.29.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/48/","page":316,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः।","प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ४८"],"iast":["tāsāṃ tat saubhagamadaṃ vīkṣya mānaṃ ca keśavaḥ|","praśamāya prasādāya tatraivāntaradhīyata|| 48"],"meaning":"जब भगवान्‌ने देखा कि इन्हें तो अपने सुहागका कुछ गर्व हो आया है और अब मान भी करने लगी हैं, तब वे उनका गर्व शान्त करनेके लिये तथा उनका मान दूर कर प्रसन्‍न करनेके लिये वहीं—उनके बीचमें ही अन्तर्धान हो गये॥ ४८॥"}],"text":[{"b":30388,"kind":"adhyaya_heading","page":307,"text":"अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः"},{"b":30389,"kind":"topic_heading","page":307,"text":"रासलीलाका आरम्भ"},{"b":30390,"kind":"topic_heading","page":307,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30391,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.1"],"text":"भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः।"},{"b":30392,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.1"],"text":"वीक्ष्य रन्तुं मनश्‍चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ १"},{"b":30393,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.2"],"text":"तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं"},{"b":30394,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.2"],"text":"प्राच्या विलिम्पन्‍नरुणेन शन्तमैः।"},{"b":30395,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.2"],"text":"स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्"},{"b":30396,"kind":"hindi_commentary","page":307,"verses":["10.29.2"],"text":"प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः॥ २"},{"b":30397,"kind":"hindi_commentary","page":307,"explains":["10.29.1","10.29.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरद् ऋतु थी। उसके कारण बेला, चमेली आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर महँ-महँ महँक रहे थे। भगवान्‌ने चीरहरणके समय गोपियोंको जिन रात्रियोंका संकेत किया था, वे सब-की-सब पुंजीभूत होकर एक ही रात्रिके रूपमें उल्लसित हो रही थीं। भगवान्‌ने उन्हें देखा, देखकर दिव्य बनाया। गोपियाँ तो चाहती ही थीं। अब भगवान्‌ने भी अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमयी रासक्रीडा करनेका संकल्प किया। अमना होनेपर भी उन्होंने अपने प्रेमियोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मन स्वीकार किया॥ १॥ भगवान्‌के संकल्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके मुखमण्डलपर अपने शीतल किरणरूपी करकमलोंसे लालिमाकी रोली-केसर मल दी, जैसे बहुत दिनोंके बाद अपनी प्राणप्रिया पत्‍नीके पास आकर उसके प्रियतम पतिने उसे आनन्दित करनेके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर न केवल पूर्वदिशाका, प्रत्युत संसारके समस्त चर-अचर प्राणियोंका सन्ताप—जो दिनमें शरत्कालीन प्रखर सूर्य-रश्मियोंके कारण बढ़ गया था—दूर कर दिया॥ २॥"},{"b":30398,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.3"],"text":"दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं"},{"b":30399,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.29.3"],"text":"रमाननाभं नवकुंकुमारुणम्।"},{"b":30400,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.3"],"text":"वनं च तत्कोमलगोभिरंजितं"},{"b":30401,"kind":"hindi_commentary","page":308,"verses":["10.29.3"],"text":"जगौ कलं वामदृशां मनोहरम्॥ ३"},{"b":30402,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.4"],"text":"निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं"},{"b":30403,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.4"],"text":"व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः।"},{"b":30404,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.4"],"text":"आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः"},{"b":30405,"kind":"hindi_commentary","page":308,"verses":["10.29.4"],"text":"स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः॥ ४"},{"b":30406,"kind":"hindi_translation","page":307,"explains":["10.29.3","10.29.4"],"text":"उस दिन चन्द्रदेवका मण्डल अखण्ड था। पूर्णिमाकी रात्रि थी। वे नूतन केशरके समान लाल-लाल हो रहे थे, कुछ संकोचमिश्रित अभिलाषासे युक्त जान पड़ते थे। उनका मुखमण्डल लक्ष्मीजीके समान मालूम हो रहा था। उनकी कोमल किरणोंसे सारा वन अनुरागके रंगमें रँग गया था। वनके कोने-कोनेमें उन्होंने अपनी चाँदनीके द्वारा अमृतका समुद्र उड़ेल दिया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने दिव्य उज्ज्वल रसके उद्दीपनकी पूरी सामग्री उन्हें और उस वनको देखकर अपनी बाँसुरीपर व्रजसुन्दरियोंके मनको हरण करनेवाली कामबीज ‘क्लीं’ की अस्पष्ट एवं मधुर तान छेड़ी॥ ३॥ भगवान्‌का वह वंशीवादन भगवान्‌के प्रेमको, उनके मिलनकी लालसाको अत्यन्त उकसाने-वाला—बढ़ानेवाला था। यों तो श्यामसुन्दरने पहलेसे ही गोपियोंके मनको अपने वशमें कर रखा था। अब तो उनके मनकी सारी वस्तुएँ—भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा आदिकी वृत्तियाँ भी—छीन लीं। वंशीध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गयी। जिन्होंने एक साथ साधना की थी श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये, वे गोपियाँ भी एक-दूसरेको सूचना न देकर—यहाँतक कि एक-दूसरेसे अपनी चेष्टाको छिपाकर जहाँ वे थे, वहाँके लिये चल पड़ीं। परीक्षित्! वे इतने वेगसे चली थीं कि उनके कानोंके कुण्डल झोंके खा रहे थे॥ ४॥"},{"b":30407,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.5"],"text":"दुहन्त्योऽभिययुः काश्‍चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः।"},{"b":30408,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.5"],"text":"पयोऽधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यापरा ययुः॥ ५"},{"b":30409,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.6"],"text":"परिवेषयन्त्यस्तद्धित्वा पाययन्त्यः शिशून् पयः।"},{"b":30410,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.6"],"text":"शुश्रूषन्त्यः पतीन् काश्‍चिदश्‍नन्त्योऽपास्य भोजनम्॥ ६"},{"b":30411,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.7"],"text":"लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजन्त्यः काश्‍च लोचने।"},{"b":30412,"kind":"sanskrit_shloka","page":308,"verses":["10.29.7"],"text":"व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्‍चित् कृष्णान्तिकं ययुः॥ ७"},{"b":30413,"kind":"hindi_translation","page":308,"explains":["10.29.5","10.29.6","10.29.7"],"text":"वंशीध्वनि सुनकर जो गोपियाँ दूध दुह रही थीं, वे अत्यन्त उत्सुकतावश दूध दुहना छोड़कर चल पड़ीं। जो चूल्हेपर दूध औंटा रही थीं, वे उफनता हुआ दूध छोड़कर और जो लपसी पका रही थीं वे पकी हुई लपसी बिना उतारे ही ज्यों-की-त्यों छोड़कर चल दीं॥ ५॥ जो भोजन परस रही थीं वे परसना छोड़कर, जो छोटे-छोटे बच्चोंको दूध पिला रही थीं वे दूध पिलाना छोड़कर, जो पतियोंकी सेवा-शुश्रूषा कर रही थीं वे सेवा-शुश्रूषा छोड़कर और जो स्वयं भोजन कर रही थीं वे भोजन करना छोड़कर अपने कृष्णप्यारेके पास चल पड़ीं॥ ६॥ कोई-कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं। वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे-पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं॥ ७॥"},{"b":30414,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.8"],"text":"ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृबन्धुभिः।"},{"b":30415,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.8"],"text":"गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्तन्त मोहिताः॥ ८"},{"b":30416,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.9"],"text":"अन्तर्गृहगताः काश्‍चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः।"},{"b":30417,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.9"],"text":"कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ ९"},{"b":30418,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.10"],"text":"दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।"},{"b":30419,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.10"],"text":"ध्यानप्राप्ताच्युताश्‍लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ १०"},{"b":30420,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.11"],"text":"तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।"},{"b":30421,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.11"],"text":"जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ ११"},{"b":30422,"kind":"hindi_commentary","page":309,"explains":["10.29.8","10.29.9","10.29.10","10.29.11"],"text":"पिता और पतियोंने, भाई और जाति-बन्धुओंने उन्हें रोका, उनकी मंगलमयी प्रेमयात्रामें विघ्न डाला। परन्तु वे इतनी मोहित हो गयी थीं कि रोकनेपर भी न रुकीं, न रुक सकीं। रुकतीं कैसे? विश्‍वविमोहन श्रीकृष्णने उनके प्राण, मन और आत्मा सब कुछका अपहरण जो कर लिया था॥ ८॥ परीक्षित्! उस समय कुछ गोपियाँ घरोंके भीतर थीं। उन्हें बाहर निकलनेका मार्ग ही न मिला। तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और बड़ी तन्मयतासे श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और लीलाओंका ध्यान करने लगीं॥ ९॥ परीक्षित्! अपने परम प्रियतम श्रीकृष्णके असह्य विरहकी तीव्र वेदनासे उनके हृदयमें इतनी व्यथा—इतनी जलन हुई कि उनमें जो कुछ अशुभ संस्कारोंका लेशमात्र अवशेष था, वह भस्म हो गया। इसके बाद तुरंत ही ध्यान लग गया। ध्यानमें उनके सामने भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने मन-ही-मन बड़े प्रेमसे, बड़े आवेगसे उनका आलिंगन किया। उस समय उन्हें इतना सुख, इतनी शान्ति मिली कि उनके सब-के-सब पुण्यके संस्कार एक साथ ही क्षीण हो गये॥ १०॥ परीक्षित्! यद्यपि उनका उस समय श्रीकृष्णके प्रति जारभाव भी था; तथापि कहीं सत्य वस्तु भी भावकी अपेक्षा रखती है? उन्होंने जिनका आलिंगन किया, चाहे किसी भी भावसे किया हो, वे स्वयं परमात्मा ही तो थे। इसलिये उन्होंने पाप और पुण्यरूप कर्मके परिणामसे बने हुए गुणमय शरीरका परित्याग कर दिया। (भगवान्‌की लीलामें सम्मिलित होनेके योग्य दिव्य अप्राकृत शरीर प्राप्त कर लिया।) इस शरीरसे भोगे जानेवाले कर्मबन्धन तो ध्यानके समय ही छिन्‍न-भिन्‍न हो चुके थे॥ ११॥"},{"b":30423,"kind":"topic_heading","page":309,"text":"राजोवाच"},{"b":30424,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.12"],"text":"कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने।"},{"b":30425,"kind":"sanskrit_shloka","page":309,"verses":["10.29.12"],"text":"गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम्॥ १२"},{"b":30426,"kind":"hindi_commentary","page":309,"explains":["10.29.12"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! गोपियाँ तो भगवान् श्रीकृष्णको केवल अपना परम प्रियतम ही मानती थीं। उनका उनमें ब्रह्मभाव नहीं था। इस प्रकार उनकी दृष्टि प्राकृत गुणोंमें ही आसक्त दीखती है। ऐसी स्थितिमें उनके लिये गुणोंके प्रवाहरूप इस संसारकी निवृत्ति कैसे सम्भव हुई?॥ १२॥"},{"b":30427,"kind":"topic_heading","page":310,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30428,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.13"],"text":"उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः।"},{"b":30429,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.13"],"text":"द्विषन्‍नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः॥ १३"},{"b":30430,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.14"],"text":"नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।"},{"b":30431,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.14"],"text":"अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ १४"},{"b":30432,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.15"],"text":"कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।"},{"b":30433,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.15"],"text":"नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ १५"},{"b":30434,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.16"],"text":"न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे।"},{"b":30435,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.16"],"text":"योगेश्‍वरेश्‍वरे कृष्णे यत एतद् विमुच्यते॥ १६"},{"b":30436,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.17"],"text":"ता दृष्ट्वान्तिकमायाता भगवान् व्रजयोषितः।"},{"b":30437,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.17"],"text":"अवदद् वदतां श्रेष्ठो वाचः पेशैर्विमोहयन्॥ १७"},{"b":30438,"kind":"hindi_commentary","page":310,"explains":["10.29.13","10.29.14","10.29.15","10.29.16","10.29.17"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि चेदिराज शिशुपाल भगवान्‌के प्रति द्वेषभाव रखनेपर भी अपने प्राकृत शरीरको छोड़कर अप्राकृत शरीरसे उनका पार्षद हो गया। ऐसी स्थितिमें जो समस्त प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी हैं और उनसे अनन्य प्रेम करती हैं, वे गोपियाँ उन्हें प्राप्त हो जायँ—इसमें कौन-सी आश्‍चर्यकी बात है॥ १३॥ परीक्षित्! वास्तवमें भगवान् प्रकृतिसम्बन्धी वृद्धि-विनाश, प्रमाण-प्रमेय और गुण-गुणीभावसे रहित हैं। वे अचिन्त्य अनन्त अप्राकृत परम कल्याणस्वरूप गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं। उन्होंने यह जो अपनेको तथा अपनी लीलाको प्रकट किया है, उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि जीव उसके सहारे अपना परम कल्याण सम्पादन करे॥ १४॥ इसलिये भगवान्‌से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिये। वह सम्बन्ध चाहे जैसा हो—कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो। चाहे जिस भावसे भगवान्‌में नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान्‌से ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्‌की ही प्राप्ति होती है॥ १५॥ परीक्षित्! तुम्हारे-जैसे परम भागवत भगवान्‌का रहस्य जाननेवाले भक्तको श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिये। योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर अजन्मा भगवान्‌के लिये भी यह कोई आश्‍चर्यकी बात है? अरे! उनके संकल्पमात्रसे—भौंहोंके इशारेसे सारे जगत‍्का परम कल्याण हो सकता है॥ १६॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि व्रजकी अनुपम विभूतियाँ गोपियाँ मेरे बिलकुल पास आ गयी हैं, तब उन्होंने अपनी विनोदभरी वाक्चातुरीसे उन्हें मोहित करते हुए कहा—क्यों न हो—भूत, भविष्य और वर्तमानकालके जितने वक्ता हैं, उनमें वे ही तो सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १७॥"},{"b":30439,"kind":"topic_heading","page":310,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":30440,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.18"],"text":"स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः।"},{"b":30441,"kind":"sanskrit_shloka","page":310,"verses":["10.29.18"],"text":"व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम्॥ १८"},{"b":30442,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.19"],"text":"रजन्येषा घोररूपा घोरसत्त्वनिषेविता।"},{"b":30443,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.19"],"text":"प्रतियात व्रजं नेह स्थेयं स्त्रीभिः सुमध्यमाः॥ १९"},{"b":30444,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.20"],"text":"मातरः पितरः पुत्रा भ्रातरः पतयश्‍च वः।"},{"b":30445,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.20"],"text":"विचिन्वन्ति ह्यपश्यन्तो मा कृढ्वं बन्धुसाध्वसम्॥ २०"},{"b":30446,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.21"],"text":"दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररंजितम्।"},{"b":30447,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.21"],"text":"यमुनानिललीलैजत्तरुपल्लवशोभितम् ॥ २१"},{"b":30448,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.22"],"text":"तद् यात मा चिरं गोष्ठं शुश्रूषध्वं पतीन् सतीः।"},{"b":30449,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.22"],"text":"क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्‍च तान् पाययत दुह्यत॥ २२"},{"b":30450,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.23"],"text":"अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः।"},{"b":30451,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.23"],"text":"आगता ह्युपपन्‍नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ २३"},{"b":30452,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.24"],"text":"भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया।"},{"b":30453,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.24"],"text":"तद्बन्धूनां च कल्याण्यः प्रजानां चानुपोषणम्॥ २४"},{"b":30454,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.25"],"text":"दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा।"},{"b":30455,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.25"],"text":"पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी॥ २५"},{"b":30456,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.26"],"text":"अस्वर्ग्यमयशस्यं च फल्गु कृच्छ्रं भयावहम्।"},{"b":30457,"kind":"sanskrit_shloka","page":311,"verses":["10.29.26"],"text":"जुगुप्सितं च सर्वत्र औपपत्यं कुलस्त्रियाः॥ २६"},{"b":30458,"kind":"hindi_commentary","page":310,"explains":["10.29.18","10.29.19","10.29.20","10.29.21","10.29.22","10.29.23","10.29.24","10.29.25","10.29.26"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग्यवती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है। बतलाओ, तुम्हें प्रसन्‍न करनेके लिये मैं कौन-सा काम करूँ? व्रजमें तो सब कुशल-मंगल है न? कहो, इस समय यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी?॥ १८॥ सुन्दरी गोपियो! रातका समय है, यह स्वयं ही बड़ा भयावना होता है और इसमें बड़े-बड़े भयावने जीव-जन्तु इधर-उधर घूमते रहते हैं। अतः तुम सब तुरंत व्रजमें लौट जाओ। रातके समय घोर जंगलमें स्त्रियोंको नहीं रुकना चाहिये॥ १९॥ तुम्हें न देखकर तुम्हारे माँ-बाप, पति-पुत्र और भाई-बन्धु ढूँढ़ रहे होंगे। उन्हें भयमें न डालो॥ २०॥ तुमलोगोंने रंग-बिरंगे पुष्पोंसे लदे हुए इस वनकी शोभाको देखा। पूर्ण चन्द्रमाकी कोमल रश्मियोंसे यह रँगा हुआ है, मानो उन्होंने अपने हाथों चित्रकारी की हो; और यमुनाजीके जलका स्पर्श करके बहनेवाले शीतल समीरकी मन्द-मन्द गतिसे हिलते हुए ये वृक्षोंके पत्ते तो इस वनकी शोभाको और भी बढ़ा रहे हैं। परन्तु अब तो तुमलोगोंने यह सब कुछ देख लिया॥ २१॥ अब देर मत करो, शीघ्र-से-शीघ्र व्रजमें लौट जाओ। तुमलोग कुलीन स्त्री हो और स्वयं भी सती हो; जाओ, अपने पतियोंकी और सतियोंकी सेवा-शुश्रूषा करो। देखो, तुम्हारे घरके नन्हे-नन्हे बच्चे और गौओंके बछड़े रो-रँभा रहे हैं; उन्हें दूध पिलाओ, गौएँ दुहो॥ २२॥ अथवा यदि मेरे प्रेमसे परवश होकर तुमलोग यहाँ आयी हो तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं हुई, यह तो तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि जगत‍्के पशु-पक्षीतक मुझसे प्रेम करते हैं, मुझे देखकर प्रसन्‍न होते हैं॥ २३॥ कल्याणी गोपियो! स्त्रियोंका परम धर्म यही है कि वे पति और उसके भाई-बन्धुओंकी निष्कपटभावसे सेवा करें और सन्तानका पालन-पोषण करें॥ २४॥ जिन स्त्रियोंको उत्तम लोक प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, वे पातकीको छोड़कर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो॥ २५॥ कुलीन स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब तरहसे निन्दनीय ही है। इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोकमें अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष—वर्तमानमें भी कष्ट-ही-कष्ट है। मोक्ष आदिकी तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय—नरक आदिका हेतु है॥ २६॥"},{"b":30459,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.27"],"text":"श्रवणाद् दर्शनाद् ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात्।"},{"b":30460,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.27"],"text":"न तथा सन्‍निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान्॥ २७"},{"b":30461,"kind":"hindi_commentary","page":312,"explains":["10.29.27"],"text":"गोपियो! मेरी लीला और गुणोंके श्रवणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन और ध्यानसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी प्राप्ति होती है, वैसे प्रेमकी प्राप्ति पास रहनेसे नहीं होती। इसलिये तुमलोग अभी अपने-अपने घर लौट जाओ॥ २७॥"},{"b":30462,"kind":"topic_heading","page":312,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30463,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.28"],"text":"इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम्।"},{"b":30464,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.28"],"text":"विषण्णा भ‌ग्‍नसंकल्पाश्‍चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्॥ २८"},{"b":30465,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.29"],"text":"कृत्वा मुखान्यव शुचः श्‍वसनेन शुष्यद्"},{"b":30466,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.29"],"text":"बिम्बाधराणि चरणेन भुवं लिखन्त्यः।"},{"b":30467,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.29"],"text":"अस्रैरुपात्तमषिभिः कुचकुंकुमानि"},{"b":30468,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.29"],"text":"तस्थुर्मृजन्त्य उरुदुःखभराः स्म तूष्णीम्॥ २९"},{"b":30469,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.30"],"text":"प्रेष्ठं प्रियेतरमिव प्रतिभाषमाणं"},{"b":30470,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.30"],"text":"कृष्णं तदर्थविनिवर्तितसर्वकामाः।"},{"b":30471,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.30"],"text":"नेत्रे विमृज्य रुदितोपहते स्म किंचित्"},{"b":30472,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.30"],"text":"संरम्भगद्गदगिरोऽब्रुवतानुरक्ताः॥ ३०"},{"b":30473,"kind":"hindi_commentary","page":312,"explains":["10.29.28","10.29.29","10.29.30"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्‍न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ २८॥ उनके बिम्बाफल (पके हुए कुँदरू) के समान लाल-लाल अधर शोकके कारण चलनेवाली लम्बी और गरम साँससे सूख गये। उन्होंने अपने मुँह नीचेकी ओर लटका लिये, वे पैरके नखोंसे धरती कुरेदने लगीं। नेत्रोंसे दुःखके आँसू बह-बहकर काजलके साथ वक्षःस्थलपर पहुँचने और वहाँ लगी हुई केशरको धोने लगे। उनका हृदय दुःखसे इतना भर गया कि वे कुछ बोल न सकीं, चुपचाप खड़ी रह गयीं॥ २९॥ गोपियोंने अपने प्यारे श्यामसुन्दरके लिये सारी कामनाएँ, सारे भोग छोड़ दिये थे। श्रीकृष्णमें उनका अनन्य अनुराग, परम प्रेम था। जब उन्होंने अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी यह निष्ठुरतासे भरी बात सुनी, जो बड़ी ही अप्रिय-सी मालूम हो रही थी, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। आँखें रोते-रोते लाल हो गयीं, आँसुओंके मारे रुँध गयीं। उन्होंने धीरज धारण करके अपनी आँखोंके आँसू पोंछे और फिर प्रणयकोपके कारण वे गद्गद वाणीसे कहने लगीं॥ ३०॥"},{"b":30474,"kind":"topic_heading","page":312,"text":"गोप्य ऊचुः"},{"b":30475,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.31"],"text":"मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं"},{"b":30476,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.31"],"text":"सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।"},{"b":30477,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.31"],"text":"भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्"},{"b":30478,"kind":"sanskrit_shloka","page":312,"verses":["10.29.31"],"text":"देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्॥ ३१"},{"b":30479,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.32"],"text":"यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरङ्ग"},{"b":30480,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.32"],"text":"स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्।"},{"b":30481,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.32"],"text":"अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे"},{"b":30482,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.32"],"text":"प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा॥ ३२"},{"b":30483,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.33"],"text":"कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन्"},{"b":30484,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.33"],"text":"नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्।"},{"b":30485,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.33"],"text":"तन्‍नः प्रसीद परमेश्‍वर मा स्म छिन्द्या"},{"b":30486,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.33"],"text":"आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥ ३३"},{"b":30487,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.34"],"text":"चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु"},{"b":30488,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.34"],"text":"यन्‍निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये।"},{"b":30489,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.34"],"text":"पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्"},{"b":30490,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.34"],"text":"यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ ३४"},{"b":30491,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.35"],"text":"सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण"},{"b":30492,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.35"],"text":"हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्‍निम्।"},{"b":30493,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.35"],"text":"नो चेद् वयं विरहजा‌ग्‍न्युपयुक्तदेहा"},{"b":30494,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.35"],"text":"ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते॥ ३५"},{"b":30495,"kind":"hindi_commentary","page":312,"explains":["10.29.31","10.29.32","10.29.33","10.29.34","10.29.35"],"text":"गोपियोंने कहा—प्यारे श्रीकृष्ण! तुम घट-घट व्यापी हो। हमारे हृदयकी बात जानते हो। तुम्हें इस प्रकार निष्ठुरताभरे वचन नहीं कहने चाहिये। हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणोंमें ही प्रेम करती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि तुम स्वतन्त्र और हठीले हो। तुमपर हमारा कोई वश नहीं है। फिर भी तुम अपनी ओरसे, जैसे आदिपुरुष भगवान् नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तोंसे प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें स्वीकार कर लो। हमारा त्याग मत करो॥ ३१॥ प्यारे श्यामसुन्दर! तुम सब धर्मोंका रहस्य जानते हो। तुम्हारा यह कहना कि ‘अपने पति, पुत्र और भाई-बन्धुओंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका स्वधर्म है’—अक्षरशः ठीक है। परन्तु इस उपदेशके अनुसार हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिये; क्योंकि तुम्हीं सब उपदेशोंके पद (चरम लक्ष्य) हो; साक्षात् भगवान् हो। तुम्हीं समस्त शरीरधारियोंके सुहृद् हो, आत्मा हो और परम प्रियतम हो॥ ३२॥ आत्मज्ञानमें निपुण महापुरुष तुमसे ही प्रेम करते हैं; क्योंकि तुम नित्य प्रिय एवं अपने ही आत्मा हो। अनित्य एवं दुःखद पति-पुत्रादिसे क्या प्रयोजन है? परमेश्‍वर! इसलिये हमपर प्रसन्‍न होओ। कृपा करो। कमलनयन! चिरकालसे तुम्हारे प्रति पाली-पोसी आशा-अभिलाषाकी लहलहाती लताका छेदन मत करो॥ ३३॥ मनमोहन! अबतक हमारा चित्त घरके काम-धंधोंमें लगता था। इसीसे हमारे हाथ भी उनमें रमे हुए थे। परन्तु तुमने हमारे देखते-देखते हमारा वह चित्त लूट लिया। इसमें तुम्हें कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ी, तुम तो सुखस्वरूप हो न! परन्तु अब तो हमारी गति-मति निराली ही हो गयी है। हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमलोंको छोड़कर एक पग भी हटनेके लिये तैयार नहीं हैं, नहीं हट रहे हैं। फिर हम व्रजमें कैसे जायँ? और यदि वहाँ जायँ भी तो करें क्या?॥ ३४॥ प्राणवल्लभ! हमारे प्यारे सखा! तुम्हारी मन्द-मन्द मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन और मनोहर संगीतने हमारे हृदयमें तुम्हारे प्रेम और मिलनकी आग धधका दी है। उसे तुम अपने अधरोंकी रसधारासे बुझा दो। नहीं तो प्रियतम! हम सच कहती हैं, तुम्हारी विरहव्यथाकी आगसे हम अपने-अपने शरीर जला देंगी और ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणकमलोंको प्राप्त करेंगी॥ ३५॥"},{"b":30496,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.36"],"text":"यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया"},{"b":30497,"kind":"sanskrit_shloka","page":313,"verses":["10.29.36"],"text":"दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य।"},{"b":30498,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.36"],"text":"अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमङ्ग"},{"b":30499,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.36"],"text":"स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥ ३६"},{"b":30500,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.37"],"text":"श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्‍चकमे तुलस्या"},{"b":30501,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.37"],"text":"लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्।"},{"b":30502,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.37"],"text":"यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास-"},{"b":30503,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.37"],"text":"स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्‍नाः॥ ३७"},{"b":30504,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.38"],"text":"तन्‍नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्‌घ्रिमूलं"},{"b":30505,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.38"],"text":"प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः।"},{"b":30506,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.38"],"text":"त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकाम-"},{"b":30507,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.38"],"text":"तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम्॥ ३८"},{"b":30508,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.39"],"text":"वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री-"},{"b":30509,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.39"],"text":"गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्।"},{"b":30510,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.39"],"text":"दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य"},{"b":30511,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.39"],"text":"वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः॥ ३९"},{"b":30512,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.40"],"text":"का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन"},{"b":30513,"kind":"sanskrit_shloka","page":314,"verses":["10.29.40"],"text":"सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्‍न चलेत्त्रिलोक्याम्।"},{"b":30514,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.40"],"text":"त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं"},{"b":30515,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.40"],"text":"यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ ४०"},{"b":30516,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.41"],"text":"व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो"},{"b":30517,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.41"],"text":"देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता।"},{"b":30518,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.41"],"text":"तन्‍नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो"},{"b":30519,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.41"],"text":"तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम्॥ ४१"},{"b":30520,"kind":"hindi_commentary","page":313,"explains":["10.29.36","10.29.37","10.29.38","10.29.39","10.29.40","10.29.41"],"text":"प्यारे कमलनयन! तुम वनवासियोंके प्यारे हो और वे भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं। इससे प्रायः तुम उन्हींके पास रहते हो। यहाँतक कि तुम्हारे जिन चरणकमलोंकी सेवाका अवसर स्वयं लक्ष्मीजीको कभी-कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणोंका स्पर्श हमें प्राप्त हुआ। जिस दिन यह सौभाग्य हमें मिला और तुमने हमें स्वीकार करके आनन्दित किया, उसी दिनसे हम और किसीके सामने एक क्षणके लिये भी ठहरनेमें असमर्थ हो गयी हैं—पति-पुत्रादिकोंकी सेवा तो दूर रही॥ ३६॥ हमारे स्वामी! जिन लक्ष्मीजीका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये बड़े-बड़े देवता तपस्या करते रहते हैं, वही लक्ष्मीजी तुम्हारे वक्षःस्थलमें बिना किसीकी प्रतिद्वन्द्विताके स्थान प्राप्त कर लेनेपर भी अपनी सौत तुलसीके साथ तुम्हारे चरणोंकी रज पानेकी अभिलाषा किया करती हैं। अबतकके सभी भक्तोंने उस चरणरजका सेवन किया है। उन्हींके समान हम भी तुम्हारी उसी चरणरजकी शरणमें आयी हैं॥ ३७॥ भगवन्! अबतक जिसने भी तुम्हारे चरणोंकी शरण ली, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये। अब तुम हमपर कृपा करो। हमें भी अपने प्रसादका भाजन बनाओ। हम तुम्हारी सेवा करनेकी आशा-अभिलाषासे घर, गाँव, कुटुम्ब—सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल चरणोंकी शरणमें आयी हैं। प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधनाके लिये अवकाश ही नहीं है। पुरुषभूषण! पुरुषोत्तम! तुम्हारी मधुर मुसकान और चारु चितवनने हमारे हृदयमें प्रेमकी—मिलनकी आकांक्षाकी आग धधका दी है; हमारा रोम-रोम उससे जल रहा है। तुम हमें अपनी दासीके रूपमें स्वीकार कर लो। हमें अपनी सेवाका अवसर दो॥ ३८॥ प्रियतम! तुम्हारा सुन्दर मुखकमल, जिसपर घुँघराली अलकें झलक रही हैं; तुम्हारे ये कमनीय कपोल, जिनपर सुन्दर-सुन्दर कुण्डल अपना अनन्त सौन्दर्य बिखेर रहे हैं; तुम्हारे ये मधुर अधर, जिनकी सुधा सुधाको भी लजानेवाली है; तुम्हारी यह नयनमनोहारी चितवन, जो मन्द-मन्द मुसकानसे उल्लसित हो रही है; तुम्हारी ये दोनों भुजाएँ, जो शरणागतोंको अभयदान देनेमें अत्यन्त उदार हैं और तुम्हारा यह वक्षःस्थल, जो लक्ष्मीजीका—सौन्दर्यकी एकमात्र देवीका नित्य क्रीडास्थल है, देखकर हम सब तुम्हारी दासी हो गयी हैं॥ ३९॥ प्यारे श्यामसुन्दर! तीनों लोकोंमें भी और ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह-क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तान सुनकर तथा इस त्रिलोकसुन्दर मोहिनी मूर्तिको—जो अपने एक बूँद सौन्दर्यसे त्रिलोकीको सौन्दर्यका दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, वृक्ष और हरिन भी रोमांचित, पुलकित हो जाते हैं—अपने नेत्रोंसे निहारकर आर्य—मर्यादासे विचलित न हो जाय, कुल-कान और लोकलज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय॥ ४०॥ हमसे यह बात छिपी नहीं है कि जैसे भगवान् नारायण देवताओंकी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रजमण्डलका भय और दुःख मिटानेके लिये ही प्रकट हुए हो! और यह भी स्पष्ट ही है कि दीन-दुखियोंपर तुम्हारा बड़ा प्रेम, बड़ी कृपा है। प्रियतम! हम भी बड़ी दुःखिनी हैं। तुम्हारे मिलनकी आकांक्षाकी आगसे हमारा वक्षःस्थल जल रहा है। तुम अपनी इन दासियोंके वक्षःस्थल और सिरपर अपने कोमल करकमल रखकर इन्हें अपना लो; हमें जीवनदान दो॥ ४१॥"},{"b":30521,"kind":"topic_heading","page":315,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30522,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.42"],"text":"इति विक्लवितं तासां श्रुत्वा योगेश्‍वरेश्‍वरः।"},{"b":30523,"kind":"sanskrit_shloka","page":315,"verses":["10.29.42"],"text":"प्रहस्य सदयं गोपीरात्मारामोऽप्यरीरमत्॥ 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कर दीं; फिर भी वे अपने स्वरूपमें ज्यों-के-त्यों एकरस स्थित थे, अच्युत थे। जब वे खुलकर हँसते, तब उनके उज्ज्वल-उज्ज्वल दाँत कुन्दकलीके समान जान पड़ते थे। उनकी प्रेमभरी चितवनसे और उनके दर्शनके आनन्दसे गोपियोंका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया। वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं। उस समय श्रीकृष्णकी ऐसी शोभा हुई, मानो अपनी पत्‍नी तारिकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमा ही हों॥ ४३॥ गोपियोंके शत-शत यूथोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला पहने वृन्दावनको शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे। कभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियोंके प्रेम और सौन्दर्यके गीत गाने लगते॥ ४४॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ यमुनाजीके पावन पुलिनपर, जो कपूरके समान चमकीली बालूसे जगमगा रहा था, पदार्पण किया। वह यमुनाजीकी तरल तरंगोंके स्पर्शसे शीतल और कुमुदिनीकी सहज सुगन्धसे सुवासित वायुके द्वारा सेवित हो रहा था। उस आनन्दप्रद पुलिनपर भगवान्‌ने गोपियोंके साथ क्रीडा की॥ ४५॥ हाथ फैलाना, आलिंगन करना, गोपियोंके हाथ दबाना, उनकी चोटी, जाँघ, नीवी और स्तन आदिका स्पर्श करना, विनोद 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भगवान्‌ने देखा कि इन्हें तो अपने सुहागका कुछ गर्व हो आया है और अब मान भी करने लगी हैं, तब वे उनका गर्व शान्त करनेके लिये तथा उनका मान दूर कर प्रसन्‍न करनेके लिये वहीं—उनके बीचमें ही अन्तर्धान हो गये॥ ४८॥"},{"b":30542,"kind":"hindi_translation","page":316,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे भगवतो रासक्रीडावर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":6,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}