{"id":"10.35","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 35","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः","topics":["युगलगीत"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.35.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[350,356]},"verses":[{"id":"10.35.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/1/","page":350,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यः कृष्णे वनं याते तमनुद्रुतचेतसः।","कृष्णलीलाः प्रगायन्त्यो निन्युर्दुःखेन वासरान्॥ १"],"iast":["gopyaḥ kṛṣṇe vanaṃ yāte tamanudrutacetasaḥ|","kṛṣṇalīlāḥ pragāyantyo ninyurduḥkhena vāsarān|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके गौओंको चरानेके लिये प्रतिदिन वनमें चले जानेपर उनके साथ गोपियोंका चित्त भी चला जाता था। उनका मन श्रीकृष्णका चिन्तन करता रहता और वे वाणीसे उनकी लीलाओंका गान करती रहतीं। इस प्रकार वे बड़ी कठिनाईसे अपना दिन बितातीं॥ १॥"},{"id":"10.35.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/2/","page":351,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वामबाहुकृतवामकपोलो","वल्गितभ्रुरधरार्पितवेणुम् ।","कोमलाङ्गुलिभिराश्रितमार्गं","गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः॥ २"],"iast":["vāmabāhukṛtavāmakapolo","valgitabhruradharārpitaveṇum |","komalāṅgulibhirāśritamārgaṃ","gopya īrayati yatra mukundaḥ|| 2"],"meaning":"गोपियाँ आपसमें कहतीं—अरी सखी! अपने प्रेमीजनोंको प्रेम वितरण करनेवाले और द्वेष करनेवालों- तकको मोक्ष दे देनेवाले श्यामसुन्दर नटनागर जब अपने बायें कपोलको बायीं बाँहकी ओर लटका देते हैं और अपनी भौंहें नचाते हुए बाँसुरीको अधरोंसे लगाते हैं तथा अपनी सुकुमार अंगुलियोंको उसके छेदोंपर फिराते हुए मधुर तान छेड़ते हैं, उस समय सिद्धपत्‍नियाँ आकाशमें अपने पति सिद्धगणोंके साथ विमानोंपर चढ़कर आ जाती हैं और उस तानको सुनकर अत्यन्त ही चकित तथा विस्मित हो जाती हैं। पहले तो उन्हें अपने पतियोंके साथ रहनेपर भी चित्तकी यह दशा देखकर लज्जा मालूम होती है; परन्तु क्षणभरमें ही उनका चित्त कामबाणसे बिंध जाता है, वे विवश और अचेत हो जाती हैं। उन्हें इस बातकी भी सुधि नहीं रहती कि उनकी नीवी खुल गयी है और उनके वस्त्र खिसक गये हैं॥ २-३॥","meaning_covers":[2,3]},{"id":"10.35.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/3/","page":351,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["व्योमयानवनिताः सह सिद्धै-","र्विस्मितास्तदुपधार्य सलज्जाः।","काममार्गणसमर्पितचित्ताः","कश्मलं ययुरपस्मृतनीव्यः॥ ३"],"iast":["vyomayānavanitāḥ saha siddhai-","rvismitāstadupadhārya salajjāḥ|","kāmamārgaṇasamarpitacittāḥ","kaśmalaṃ yayurapasmṛtanīvyaḥ|| 3"],"meaning":"गोपियाँ आपसमें कहतीं—अरी सखी! अपने प्रेमीजनोंको प्रेम वितरण करनेवाले और द्वेष करनेवालों- तकको मोक्ष दे देनेवाले श्यामसुन्दर नटनागर जब अपने बायें कपोलको बायीं बाँहकी ओर लटका देते हैं और अपनी भौंहें नचाते हुए बाँसुरीको अधरोंसे लगाते हैं तथा अपनी सुकुमार अंगुलियोंको उसके छेदोंपर फिराते हुए मधुर तान छेड़ते हैं, उस समय सिद्धपत्‍नियाँ आकाशमें अपने पति सिद्धगणोंके साथ विमानोंपर चढ़कर आ जाती हैं और उस तानको सुनकर अत्यन्त ही चकित तथा विस्मित हो जाती हैं। पहले तो उन्हें अपने पतियोंके साथ रहनेपर भी चित्तकी यह दशा देखकर लज्जा मालूम होती है; परन्तु क्षणभरमें ही उनका चित्त कामबाणसे बिंध जाता है, वे विवश और अचेत हो जाती हैं। उन्हें इस बातकी भी सुधि नहीं रहती कि उनकी नीवी खुल गयी है और उनके वस्त्र खिसक गये हैं॥ २-३॥","meaning_covers":[2,3]},{"id":"10.35.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/4/","page":351,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["हन्त चित्रमबलाः शृणुतेदं","हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।","नन्दसूनुरयमार्तजनानां","नर्मदो यर्हि कूजितवेणुः॥ ४"],"iast":["hanta citramabalāḥ śṛṇutedaṃ","hārahāsa urasi sthiravidyut|","nandasūnurayamārtajanānāṃ","narmado yarhi kūjitaveṇuḥ|| 4"],"meaning":"अरी गोपियो! तुम यह आश्‍चर्यकी बात सुनो! ये नन्दनन्दन कितने सुन्दर हैं। जब वे हँसते हैं तब हास्यरेखाएँ हारका रूप धारण कर लेती हैं, शुभ्र मोती-सी चमकने लगती हैं। अरी वीर! उनके वक्षः-स्थलपर लहराते हुए हारमें हास्यकी किरणें चमकने लगती हैं। उनके वक्षःस्थलपर जो श्रीवत्सकी सुनहली रेखा है, वह तो ऐसी जान पड़ती है, मानो श्याम मेघपर बिजली ही स्थिररूपसे बैठ गयी है। वे जब दुःखीजनोंको सुख देनेके लिये, विरहियोंके मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार करनेके लिये बाँसुरी बजाते हैं, तब व्रजके झुंड-के-झुंड बैल, गौएँ और हरिन उनके पास ही दौड़ आते हैं। केवल आते ही नहीं, सखी! दाँतोंसे चबाया हुआ घासका ग्रास उनके मुँहमें ज्यों-का-त्यों पड़ा रह जाता है, वे उसे न निगल पाते और न तो उगल ही पाते हैं। दोनों कान खड़े करके इस प्रकार स्थिरभावसे खड़े हो जाते हैं, मानो सो गये हैं या केवल भीतपर लिखे हुए चित्र हैं। उनकी ऐसी दशा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह बाँसुरीकी तान उनके चित्तको चुरा लेती है॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"10.35.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/5/","page":351,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वृन्दशो व्रजवृषा मृगगावो","वेणुवाद्यहृतचेतस आरात्।","दन्तदष्टकवला धृतकर्णा","निद्रिता लिखितचित्रमिवासन्॥ ५"],"iast":["vṛndaśo vrajavṛṣā mṛgagāvo","veṇuvādyahṛtacetasa ārāt|","dantadaṣṭakavalā dhṛtakarṇā","nidritā likhitacitramivāsan|| 5"],"meaning":"अरी गोपियो! तुम यह आश्‍चर्यकी बात सुनो! ये नन्दनन्दन कितने सुन्दर हैं। जब वे हँसते हैं तब हास्यरेखाएँ हारका रूप धारण कर लेती हैं, शुभ्र मोती-सी चमकने लगती हैं। अरी वीर! उनके वक्षः-स्थलपर लहराते हुए हारमें हास्यकी किरणें चमकने लगती हैं। उनके वक्षःस्थलपर जो श्रीवत्सकी सुनहली रेखा है, वह तो ऐसी जान पड़ती है, मानो श्याम मेघपर बिजली ही स्थिररूपसे बैठ गयी है। वे जब दुःखीजनोंको सुख देनेके लिये, विरहियोंके मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार करनेके लिये बाँसुरी बजाते हैं, तब व्रजके झुंड-के-झुंड बैल, गौएँ और हरिन उनके पास ही दौड़ आते हैं। केवल आते ही नहीं, सखी! दाँतोंसे चबाया हुआ घासका ग्रास उनके मुँहमें ज्यों-का-त्यों पड़ा रह जाता है, वे उसे न निगल पाते और न तो उगल ही पाते हैं। दोनों कान खड़े करके इस प्रकार स्थिरभावसे खड़े हो जाते हैं, मानो सो गये हैं या केवल भीतपर लिखे हुए चित्र हैं। उनकी ऐसी दशा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह बाँसुरीकी तान उनके चित्तको चुरा लेती है॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"10.35.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/6/","page":352,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["बर्हिणस्तबकधातुपलाशै-","र्बद्धमल्लपरिबर्हविडम्बः ।","कर्हिचित् सबल आलि स गोपै-","र्गाः समाह्वयति यत्र मुकुन्दः॥ ६"],"iast":["barhiṇastabakadhātupalāśai-","rbaddhamallaparibarhaviḍambaḥ |","karhicit sabala āli sa gopai-","rgāḥ samāhvayati yatra mukundaḥ|| 6"],"meaning":"हे सखि! जब वे नन्दके लाड़ले लाल अपने सिरपर मोरपंखका मुकुट बाँध लेते हैं, घुँघराली अलकोंमें फूलके गुच्छे खोंस लेते हैं, रंगीन धातुओंसे अपना अंग-अंग रँग लेते हैं और नये-नये पल्लवोंसे ऐसा वेष सजा लेते हैं, जैसे कोई बहुत बड़ा पहलवान हो और फिर बलरामजी तथा ग्वालबालोंके साथ बाँसुरीमें गौओंका नाम ले-लेकर उन्हें पुकारते हैं; उस समय प्यारी सखियो! नदियोंकी गति भी रुक जाती है। वे चाहती हैं कि वायु उड़ाकर हमारे प्रियतमके चरणोंकी धूलि हमारे पास पहुँचा दे और उसे पाकर हम निहाल हो जायँ, परन्तु सखियो! वे भी हमारे ही जैसी मन्दभागिनी हैं। जैसे नन्दनन्दन श्रीकृष्णका आलिंगन करते समय हमारी भुजाएँ काँप जाती हैं और जड़तारूप संचारीभावका उदय हो जानेसे हम अपने हाथोंको हिला भी नहीं पातीं, वैसे ही वे भी प्रेमके कारण काँपने लगती हैं। दो-चार बार अपनी तरंगरूप भुजाओंको काँपते-काँपते उठाती तो अवश्य हैं, परन्तु फिर विवश होकर स्थिर हो जाती हैं, प्रेमावेशसे स्तम्भित हो जाती हैं॥ ६-७॥","meaning_covers":[6,7]},{"id":"10.35.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/7/","page":352,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["तर्हि भ‌ग्‍नगतयः सरितो वै","तत्पदाम्बुजरजोऽनिलनीतम् ।","स्पृहयतीर्वयमिवाबहुपुण्याः","प्रेमवेपितभुजाः स्तिमितापः॥ ७"],"iast":["tarhi bhagnagatayaḥ sarito vai","tatpadāmbujarajo'nilanītam |","spṛhayatīrvayamivābahupuṇyāḥ","premavepitabhujāḥ stimitāpaḥ|| 7"],"meaning":"हे सखि! जब वे नन्दके लाड़ले लाल अपने सिरपर मोरपंखका मुकुट बाँध लेते हैं, घुँघराली अलकोंमें फूलके गुच्छे खोंस लेते हैं, रंगीन धातुओंसे अपना अंग-अंग रँग लेते हैं और नये-नये पल्लवोंसे ऐसा वेष सजा लेते हैं, जैसे कोई बहुत बड़ा पहलवान हो और फिर बलरामजी तथा ग्वालबालोंके साथ बाँसुरीमें गौओंका नाम ले-लेकर उन्हें पुकारते हैं; उस समय प्यारी सखियो! नदियोंकी गति भी रुक जाती है। वे चाहती हैं कि वायु उड़ाकर हमारे प्रियतमके चरणोंकी धूलि हमारे पास पहुँचा दे और उसे पाकर हम निहाल हो जायँ, परन्तु सखियो! वे भी हमारे ही जैसी मन्दभागिनी हैं। जैसे नन्दनन्दन श्रीकृष्णका आलिंगन करते समय हमारी भुजाएँ काँप जाती हैं और जड़तारूप संचारीभावका उदय हो जानेसे हम अपने हाथोंको हिला भी नहीं पातीं, वैसे ही वे भी प्रेमके कारण काँपने लगती हैं। दो-चार बार अपनी तरंगरूप भुजाओंको काँपते-काँपते उठाती तो अवश्य हैं, परन्तु फिर विवश होकर स्थिर हो जाती हैं, प्रेमावेशसे स्तम्भित हो जाती हैं॥ ६-७॥","meaning_covers":[6,7]},{"id":"10.35.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/8/","page":352,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अनुचरैः समनुवर्णितवीर्य","आदिपूरुष इवाचलभूतिः।","वनचरो गिरितटेषु चरन्ती-","र्वेणुनाऽऽह्वयति गाः स यदा हि॥ ८"],"iast":["anucaraiḥ samanuvarṇitavīrya","ādipūruṣa ivācalabhūtiḥ|","vanacaro giritaṭeṣu carantī-","rveṇunā''hvayati gāḥ sa yadā hi|| 8"],"meaning":"अरी वीर! जैसे देवता लोग अनन्त और अचिन्त्य ऐश्‍वर्योंके स्वामी भगवान् नारायणकी शक्तियोंका गान करते हैं, वैसे ही ग्वालबाल अनन्तसुन्दर नटनागर श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करते रहते हैं। वे अचिन्त्य ऐश्‍वर्य-सम्पन्‍न श्रीकृष्ण जब वृन्दावनमें विहार करते रहते हैं और बाँसुरी बजाकर गिरिराज गोवर्धनकी तराईमें चरती हुई गौओंको नाम ले-लेकर पुकारते हैं, उस समय वनके वृक्ष और लताएँ फूल और फलोंसे लद जाती हैं, उनके भारसे डालियाँ झुककर धरती छूने लगती हैं, मानो प्रणाम कर रही हों, वे वृक्ष और लताएँ अपने भीतर भगवान् विष्णुकी अभिव्यक्ति सूचित करती हुई-सी प्रेमसे फूल उठती हैं, उनका रोम-रोम खिल जाता है और सब-की-सब मधुधाराएँ उँड़ेलने लगती हैं॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"10.35.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/9/","page":352,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं","व्यंजयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः।","प्रणतभारविटपा मधुधाराः","प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥ ९"],"iast":["vanalatāstarava ātmani viṣṇuṃ","vyaṃjayantya iva puṣpaphalāḍhyāḥ|","praṇatabhāraviṭapā madhudhārāḥ","premahṛṣṭatanavaḥ sasṛjuḥ sma|| 9"],"meaning":"अरी वीर! जैसे देवता लोग अनन्त और अचिन्त्य ऐश्‍वर्योंके स्वामी भगवान् नारायणकी शक्तियोंका गान करते हैं, वैसे ही ग्वालबाल अनन्तसुन्दर नटनागर श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करते रहते हैं। वे अचिन्त्य ऐश्‍वर्य-सम्पन्‍न श्रीकृष्ण जब वृन्दावनमें विहार करते रहते हैं और बाँसुरी बजाकर गिरिराज गोवर्धनकी तराईमें चरती हुई गौओंको नाम ले-लेकर पुकारते हैं, उस समय वनके वृक्ष और लताएँ फूल और फलोंसे लद जाती हैं, उनके भारसे डालियाँ झुककर धरती छूने लगती हैं, मानो प्रणाम कर रही हों, वे वृक्ष और लताएँ अपने भीतर भगवान् विष्णुकी अभिव्यक्ति सूचित करती हुई-सी प्रेमसे फूल उठती हैं, उनका रोम-रोम खिल जाता है और सब-की-सब मधुधाराएँ उँड़ेलने लगती हैं॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"10.35.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/10/","page":353,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["दर्शनीयतिलको वनमाला-","दिव्यगन्धतुलसीमधुमत्तैः ।","अलिकुलैरलघुगीतमभीष्ट-","माद्रियन् यर्हि सन्धितवेणुः॥ १०"],"iast":["darśanīyatilako vanamālā-","divyagandhatulasīmadhumattaiḥ |","alikulairalaghugītamabhīṣṭa-","mādriyan yarhi sandhitaveṇuḥ|| 10"],"meaning":"अरी सखी! जितनी भी वस्तुएँ संसारमें या उसके बाहर देखनेयोग्य हैं, उनमें सबसे सुन्दर, सबसे मधुर, सबके शिरोमणि हैं—ये हमारे मनमोहन। उनके साँवले ललाटपर केसरकी खौर कितनी फबती है—बस, देखती ही जाओ! गलेमें घुटनोंतक लटकती हुई वनमाला, उसमें पिरोयी हुई तुलसीकी दिव्य गन्ध और मधुर मधुसे मतवाले होकर झुंड-के-झुंड भौंरे बड़े मनोहर एवं उच्च स्वरसे गुंजार करते रहते हैं। हमारे नटनागर श्यामसुन्दर भौंरोंकी उस गुनगुनाहटका आदर करते हैं और उन्हींके स्वरमें स्वर मिलाकर अपनी बाँसुरी फूँकने लगते हैं। उस समय सखि! उस मुनिजनमोहन संगीतको सुनकर सरोवरमें रहनेवाले सारस-हंस आदि पक्षियोंका भी चित्त उनके हाथसे निकल जाता है, छिन जाता है। वे विवश होकर प्यारे श्यामसुन्दरके पास आ बैठते हैं तथा आँखें मूँद, चुपचाप, चित्त एकाग्र करके उनकी आराधना करने लगते हैं—मानो कोई विहंगमवृत्तिके रसिक परमहंस ही हों, भला कहो तो यह कितने आश्‍चर्यकी बात है!॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"10.35.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/11/","page":353,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सरसि सारसहंसविहङ्गा-","श्‍चारुगीतहृतचेतस एत्य।","हरिमुपासत ते यतचित्ता","हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ ११"],"iast":["sarasi sārasahaṃsavihaṅgā-","ścārugītahṛtacetasa etya|","harimupāsata te yatacittā","hanta mīlitadṛśo dhṛtamaunāḥ|| 11"],"meaning":"अरी सखी! जितनी भी वस्तुएँ संसारमें या उसके बाहर देखनेयोग्य हैं, उनमें सबसे सुन्दर, सबसे मधुर, सबके शिरोमणि हैं—ये हमारे मनमोहन। उनके साँवले ललाटपर केसरकी खौर कितनी फबती है—बस, देखती ही जाओ! गलेमें घुटनोंतक लटकती हुई वनमाला, उसमें पिरोयी हुई तुलसीकी दिव्य गन्ध और मधुर मधुसे मतवाले होकर झुंड-के-झुंड भौंरे बड़े मनोहर एवं उच्च स्वरसे गुंजार करते रहते हैं। हमारे नटनागर श्यामसुन्दर भौंरोंकी उस गुनगुनाहटका आदर करते हैं और उन्हींके स्वरमें स्वर मिलाकर अपनी बाँसुरी फूँकने लगते हैं। उस समय सखि! उस मुनिजनमोहन संगीतको सुनकर सरोवरमें रहनेवाले सारस-हंस आदि पक्षियोंका भी चित्त उनके हाथसे निकल जाता है, छिन जाता है। वे विवश होकर प्यारे श्यामसुन्दरके पास आ बैठते हैं तथा आँखें मूँद, चुपचाप, चित्त एकाग्र करके उनकी आराधना करने लगते हैं—मानो कोई विहंगमवृत्तिके रसिक परमहंस ही हों, भला कहो तो यह कितने आश्‍चर्यकी बात है!॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"10.35.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/12/","page":353,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सहबलः स्रगवतंसविलासः","सानुषु क्षितिभृतो व्रजदेव्यः।","हर्षयन् यर्हि वेणुरवेण","जातहर्ष उपरम्भति विश्‍वम्॥ १२"],"iast":["sahabalaḥ sragavataṃsavilāsaḥ","sānuṣu kṣitibhṛto vrajadevyaḥ|","harṣayan yarhi veṇuraveṇa","jātaharṣa uparambhati viśvam|| 12"],"meaning":"अरी व्रजदेवियो! हमारे श्यामसुन्दर जब पुष्पोंके कुण्डल बनाकर अपने कानोंमें धारण कर लेते हैं और बलरामजीके साथ गिरिराजके शिखरोंपर खड़े होकर सारे जगत‍्को हर्षित करते हुए बाँसुरी बजाने लगते हैं—बाँसुरी क्या बजाते हैं, आनन्दमें भरकर उसकी ध्वनिके द्वारा सारे विश्‍वका आलिंगन करने लगते हैं—उस समय श्याम मेघ बाँसुरीकी तानके साथ मन्द-मन्द गरजने लगता है। उसके चित्तमें इस बातकी शंका बनी रहती है कि कहीं मैं जोरसे गर्जना कर उठूँ और वह कहीं बाँसुरीकी तानके विपरीत पड़ जाय, उसमें बेसुरापन ले आये, तो मुझसे महात्मा श्रीकृष्णका अपराध हो जायगा। सखी! वह इतना ही नहीं करता; वह जब देखता है कि हमारे सखा घनश्यामको घाम लग रहा है, तब वह उनके ऊपर आकर छाया कर लेता है, उनका छत्र बन जाता है। अरी वीर! वह तो प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उनके ऊपर अपना जीवन ही निछावर कर देता है—नन्हीं-नन्हीं फुहियोंके रूपमें ऐसा बरसने लगता है, मानो दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहा हो। कभी-कभी बादलोंकी ओटमें छिपकर देवता-लोग भी पुष्पवर्षा कर जाया करते हैं॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.35.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/13/","page":353,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["महदतिक्रमणशंकितचेता","मन्दमन्दमनुगर्जति मेघः।","सुहृदमभ्यवर्षत् सुमनोभि-","श्छायया च विदधत् प्रतपत्रम्॥ १३"],"iast":["mahadatikramaṇaśaṃkitacetā","mandamandamanugarjati meghaḥ|","suhṛdamabhyavarṣat sumanobhi-","śchāyayā ca vidadhat pratapatram|| 13"],"meaning":"अरी व्रजदेवियो! हमारे श्यामसुन्दर जब पुष्पोंके कुण्डल बनाकर अपने कानोंमें धारण कर लेते हैं और बलरामजीके साथ गिरिराजके शिखरोंपर खड़े होकर सारे जगत‍्को हर्षित करते हुए बाँसुरी बजाने लगते हैं—बाँसुरी क्या बजाते हैं, आनन्दमें भरकर उसकी ध्वनिके द्वारा सारे विश्‍वका आलिंगन करने लगते हैं—उस समय श्याम मेघ बाँसुरीकी तानके साथ मन्द-मन्द गरजने लगता है। उसके चित्तमें इस बातकी शंका बनी रहती है कि कहीं मैं जोरसे गर्जना कर उठूँ और वह कहीं बाँसुरीकी तानके विपरीत पड़ जाय, उसमें बेसुरापन ले आये, तो मुझसे महात्मा श्रीकृष्णका अपराध हो जायगा। सखी! वह इतना ही नहीं करता; वह जब देखता है कि हमारे सखा घनश्यामको घाम लग रहा है, तब वह उनके ऊपर आकर छाया कर लेता है, उनका छत्र बन जाता है। अरी वीर! वह तो प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उनके ऊपर अपना जीवन ही निछावर कर देता है—नन्हीं-नन्हीं फुहियोंके रूपमें ऐसा बरसने लगता है, मानो दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहा हो। कभी-कभी बादलोंकी ओटमें छिपकर देवता-लोग भी पुष्पवर्षा कर जाया करते हैं॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.35.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/14/","page":354,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["विविधगोपचरणेषु विदग्धो","वेणुवाद्य उरुधा निजशिक्षाः।","तव सुतः सति यदाधरबिम्बे","दत्तवेणुरनयत् स्वरजातीः॥ १४"],"iast":["vividhagopacaraṇeṣu vidagdho","veṇuvādya urudhā nijaśikṣāḥ|","tava sutaḥ sati yadādharabimbe","dattaveṇuranayat svarajātīḥ|| 14"],"meaning":"सतीशिरोमणि यशोदाजी! तुम्हारे सुन्दर कुँवर ग्वालबालोंके साथ खेल खेलनेमें बड़े निपुण हैं। रानीजी! तुम्हारे लाड़ले लाल सबके प्यारे तो हैं ही, चतुर भी बहुत हैं। देखो, उन्होंने बाँसुरी बजाना किसीसे सीखा नहीं। अपने ही अनेकों प्रकारकी राग-रागिनियाँ उन्होंने निकाल लीं। जब वे अपने बिम्बाफल सदृश लाल-लाल अधरोंपर बाँसुरी रखकर ऋषभ, निषाद आदि स्वरोंकी अनेक जातियाँ बजाने लगते हैं, उस समय वंशीकी परम मोहिनी और नयी तान सुनकर ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता भी—जो सर्वज्ञ हैं—उसे नहीं पहचान पाते। वे इतने मोहित हो जाते हैं कि उनका चित्त तो उनके रोकनेपर भी उनके हाथसे निकलकर वंशीध्वनिमें तल्लीन हो ही जाता है, सिर भी झुक जाता है, और वे अपनी सुध-बुध खोकर उसीमें तन्मय हो जाते हैं॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.35.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/15/","page":354,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सवनशस्तदुपधार्य सुरेशाः","शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः ।","कवय आनतकन्धरचित्ताः","कश्मलं ययुरनिश्‍चिततत्त्वाः॥ १५"],"iast":["savanaśastadupadhārya sureśāḥ","śakraśarvaparameṣṭhipurogāḥ |","kavaya ānatakandharacittāḥ","kaśmalaṃ yayuraniścitatattvāḥ|| 15"],"meaning":"सतीशिरोमणि यशोदाजी! तुम्हारे सुन्दर कुँवर ग्वालबालोंके साथ खेल खेलनेमें बड़े निपुण हैं। रानीजी! तुम्हारे लाड़ले लाल सबके प्यारे तो हैं ही, चतुर भी बहुत हैं। देखो, उन्होंने बाँसुरी बजाना किसीसे सीखा नहीं। अपने ही अनेकों प्रकारकी राग-रागिनियाँ उन्होंने निकाल लीं। जब वे अपने बिम्बाफल सदृश लाल-लाल अधरोंपर बाँसुरी रखकर ऋषभ, निषाद आदि स्वरोंकी अनेक जातियाँ बजाने लगते हैं, उस समय वंशीकी परम मोहिनी और नयी तान सुनकर ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता भी—जो सर्वज्ञ हैं—उसे नहीं पहचान पाते। वे इतने मोहित हो जाते हैं कि उनका चित्त तो उनके रोकनेपर भी उनके हाथसे निकलकर वंशीध्वनिमें तल्लीन हो ही जाता है, सिर भी झुक जाता है, और वे अपनी सुध-बुध खोकर उसीमें तन्मय हो जाते हैं॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.35.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/16/","page":354,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र-","नीरजांकुशविचित्रललामैः ।","व्रजभुवः शमयन् खुरतोदं","वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणुः ॥ १६"],"iast":["nijapadābjadalairdhvajavajra-","nīrajāṃkuśavicitralalāmaiḥ |","vrajabhuvaḥ śamayan khuratodaṃ","varṣmadhuryagatirīḍitaveṇuḥ || 16"],"meaning":"अरी वीर! उनके चरणकमलोंमें ध्वजा, वज्र, कमल, अंकुश आदिके विचित्र और सुन्दर-सुन्दर चिह्न हैं। जब व्रजभूमि गौओंके खुरसे खुद जाती है, तब वे अपने सुकुमार चरणोंसे उसकी पीड़ा मिटाते हुए गजराजके समान मन्दगतिसे आते हैं और बाँसुरी भी बजाते रहते हैं। उनकी वह वंशीध्वनि, उनकी वह चाल और उनकी वह विलासभरी चितवन हमारे हृदयमें प्रेमके, मिलनकी आकांक्षाका आवेग बढ़ा देती है। हम उस समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती हैं कि हिल-डोलतक नहीं सकतीं, मानो हम जड़ वृक्ष हों! हमें तो इस बातका भी पता नहीं चलता कि हमारा जूड़ा खुल गया है या बँधा है, हमारे शरीरपरका वस्त्र उतर गया है या है॥ १६-१७॥","meaning_covers":[16,17]},{"id":"10.35.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/17/","page":354,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["व्रजति तेन वयं सविलास-","वीक्षणार्पितमनोभववेगाः ।","कुजगतिं गमिता न विदामः","कश्मलेन कबरं वसनं वा॥ १७"],"iast":["vrajati tena vayaṃ savilāsa-","vīkṣaṇārpitamanobhavavegāḥ |","kujagatiṃ gamitā na vidāmaḥ","kaśmalena kabaraṃ vasanaṃ vā|| 17"],"meaning":"अरी वीर! उनके चरणकमलोंमें ध्वजा, वज्र, कमल, अंकुश आदिके विचित्र और सुन्दर-सुन्दर चिह्न हैं। जब व्रजभूमि गौओंके खुरसे खुद जाती है, तब वे अपने सुकुमार चरणोंसे उसकी पीड़ा मिटाते हुए गजराजके समान मन्दगतिसे आते हैं और बाँसुरी भी बजाते रहते हैं। उनकी वह वंशीध्वनि, उनकी वह चाल और उनकी वह विलासभरी चितवन हमारे हृदयमें प्रेमके, मिलनकी आकांक्षाका आवेग बढ़ा देती है। हम उस समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती हैं कि हिल-डोलतक नहीं सकतीं, मानो हम जड़ वृक्ष हों! हमें तो इस बातका भी पता नहीं चलता कि हमारा जूड़ा खुल गया है या बँधा है, हमारे शरीरपरका वस्त्र उतर गया है या है॥ १६-१७॥","meaning_covers":[16,17]},{"id":"10.35.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/18/","page":354,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["मणिधरः क्वचिदागणयन् गा","मालया दयितगन्धतुलस्याः।","प्रणयिनोऽनुचरस्य कदांसे","प्रक्षिपन् भुजमगायत यत्र॥ १८"],"iast":["maṇidharaḥ kvacidāgaṇayan gā","mālayā dayitagandhatulasyāḥ|","praṇayino'nucarasya kadāṃse","prakṣipan bhujamagāyata yatra|| 18"],"meaning":"अरी वीर! उनके गलेमें मणियोंकी माला बहुत ही भली मालूम होती है। तुलसीकी मधुर गन्ध उन्हें बहुत प्यारी है। इसीसे तुलसीकी मालाको तो वे कभी छोड़ते ही नहीं, सदा धारण किये रहते हैं। जब वे श्यामसुन्दर उस मणियोंकी मालासे गौओंकी गिनती करते-करते किसी प्रेमी सखाके गलेमें बाँह डाल देते हैं और भाव बता-बताकर बाँसुरी बजाते हुए गाने लगते हैं, उस समय बजती हुई उस बाँसुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर कृष्णसार मृगोंकी पत्‍नी हरिनियाँ भी अपना चित्त उनके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और जैसे हम गोपियाँ अपने घर-गृहस्थीकी आशा-अभिलाषा छोड़कर गुणसागर नागर नन्दनन्दनको घेरे रहती हैं, वैसे ही वे भी उनके पास दौड़ आती हैं और वहीं एकटक देखती हुई खड़ी रह जाती हैं, लौटनेका नाम भी नहीं लेतीं॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"10.35.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/19/","page":355,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["क्वणितवेणुरववंचितचित्ताः","कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः।","गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो","गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ १९"],"iast":["kvaṇitaveṇuravavaṃcitacittāḥ","kṛṣṇamanvasata kṛṣṇagṛhiṇyaḥ|","guṇagaṇārṇamanugatya hariṇyo","gopikā iva vimuktagṛhāśāḥ|| 19"],"meaning":"अरी वीर! उनके गलेमें मणियोंकी माला बहुत ही भली मालूम होती है। तुलसीकी मधुर गन्ध उन्हें बहुत प्यारी है। इसीसे तुलसीकी मालाको तो वे कभी छोड़ते ही नहीं, सदा धारण किये रहते हैं। जब वे श्यामसुन्दर उस मणियोंकी मालासे गौओंकी गिनती करते-करते किसी प्रेमी सखाके गलेमें बाँह डाल देते हैं और भाव बता-बताकर बाँसुरी बजाते हुए गाने लगते हैं, उस समय बजती हुई उस बाँसुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर कृष्णसार मृगोंकी पत्‍नी हरिनियाँ भी अपना चित्त उनके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और जैसे हम गोपियाँ अपने घर-गृहस्थीकी आशा-अभिलाषा छोड़कर गुणसागर नागर नन्दनन्दनको घेरे रहती हैं, वैसे ही वे भी उनके पास दौड़ आती हैं और वहीं एकटक देखती हुई खड़ी रह जाती हैं, लौटनेका नाम भी नहीं लेतीं॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"10.35.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/20/","page":355,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कुन्ददामकृतकौतुकवेषो","गोपगोधनवृतो यमुनायाम्।","नन्दसूनुरनघे तव वत्सो","नर्मदः प्रणयिनां विजहार॥ २०"],"iast":["kundadāmakṛtakautukaveṣo","gopagodhanavṛto yamunāyām|","nandasūnuranaghe tava vatso","narmadaḥ praṇayināṃ vijahāra|| 20"],"meaning":"नन्दरानी यशोदाजी! वास्तवमें तुम बड़ी पुण्यवती हो। तभी तो तुम्हें ऐसे पुत्र मिले हैं। तुम्हारे वे लाड़ले लाल बड़े प्रेमी हैं, उनका चित्त बड़ा कोमल है। वे प्रेमी सखाओंको तरह-तरहसे हास-परिहासके द्वारा सुख पहुँचाते हैं। कुन्दकलीका हार पहनकर जब वे अपनेको विचित्र वेषमें सजा लेते हैं और ग्वालबाल तथा गौओंके साथ यमुनाजीके तटपर खेलने लगते हैं, उस समय मलयज चन्दनके समान शीतल और सुगन्धित स्पर्शसे मन्द-मन्द अनुकूल बहकर वायु तुम्हारे लालकी सेवा करती है और गन्धर्व आदि उपदेवता वंदीजनोंके समान गा-बजाकर उन्हें सन्तुष्ट करते हैं तथा अनेकों प्रकारकी भेंटें देते हुए सब ओरसे घेरकर उनकी सेवा करते हैं॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"10.35.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/21/","page":355,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["मन्दवायुरुपवात्यनुकूलं","मानयन् मलयजस्पर्शेन।","वन्दिनस्तमुपदेवगणा ये","वाद्यगीतबलिभिः परिवव्रुः॥ २१"],"iast":["mandavāyurupavātyanukūlaṃ","mānayan malayajasparśena|","vandinastamupadevagaṇā ye","vādyagītabalibhiḥ parivavruḥ|| 21"],"meaning":"नन्दरानी यशोदाजी! वास्तवमें तुम बड़ी पुण्यवती हो। तभी तो तुम्हें ऐसे पुत्र मिले हैं। तुम्हारे वे लाड़ले लाल बड़े प्रेमी हैं, उनका चित्त बड़ा कोमल है। वे प्रेमी सखाओंको तरह-तरहसे हास-परिहासके द्वारा सुख पहुँचाते हैं। कुन्दकलीका हार पहनकर जब वे अपनेको विचित्र वेषमें सजा लेते हैं और ग्वालबाल तथा गौओंके साथ यमुनाजीके तटपर खेलने लगते हैं, उस समय मलयज चन्दनके समान शीतल और सुगन्धित स्पर्शसे मन्द-मन्द अनुकूल बहकर वायु तुम्हारे लालकी सेवा करती है और गन्धर्व आदि उपदेवता वंदीजनोंके समान गा-बजाकर उन्हें सन्तुष्ट करते हैं तथा अनेकों प्रकारकी भेंटें देते हुए सब ओरसे घेरकर उनकी सेवा करते हैं॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"10.35.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/22/","page":355,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["वत्सलो व्रजगवां यदगध्रो","वन्द्यमानचरणः पथि वृद्धैः।","कृत्स्नगोधनमुपोह्य दिनान्ते","गीतवेणुरनुगेडितकीर्तिः ॥ २२"],"iast":["vatsalo vrajagavāṃ yadagadhro","vandyamānacaraṇaḥ pathi vṛddhaiḥ|","kṛtsnagodhanamupohya dinānte","gītaveṇuranugeḍitakīrtiḥ || 22"],"meaning":"अरी सखी! श्यामसुन्दर व्रजकी गौओंसे बड़ा प्रेम करते हैं। इसीलिये तो उन्होंने गोवर्धन धारण किया था। अब वे सब गौओंको लौटाकर आते ही होंगे; देखो, सायंकाल हो चला है। तब इतनी देर क्यों होती है, सखी? रास्तेमें बड़े-बड़े ब्रह्मा आदि वयोवृद्ध और शंकर आदि ज्ञानवृद्ध उनके चरणोंकी वन्दना जो करने लगते हैं। अब गौओंके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए वे आते ही होंगे। ग्वालबाल उनकी कीर्तिका गान कर रहे होंगे। देखो न, यह क्या आ रहे हैं। गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर बहुत-सी धूल वनमालापर पड़ गयी है। वे दिनभर जंगलोंमें घूमते-घूमते थक गये हैं। फिर भी अपनी इस शोभासे हमारी आँखोंको कितना सुख, कितना आनन्द दे रहे हैं। देखो, ये यशोदाकी कोखसे प्रकट हुए सबको आह्लादित करनेवाले चन्द्रमा हम प्रेमीजनोंकी भलाईके लिये, हमारी आशा-अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही हमारे पास चले आ रहे हैं॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.35.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/23/","page":355,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["उत्सवं श्रमरुचापि दृशीना-","मुन्‍नयन् खुररजश्छुरितस्रक्।","दित्सयैति सुहृदाशिष एष","देवकीजठरभूरुडुराजः ॥ २३"],"iast":["utsavaṃ śramarucāpi dṛśīnā-","munnayan khurarajaśchuritasrak|","ditsayaiti suhṛdāśiṣa eṣa","devakījaṭharabhūruḍurājaḥ || 23"],"meaning":"अरी सखी! श्यामसुन्दर व्रजकी गौओंसे बड़ा प्रेम करते हैं। इसीलिये तो उन्होंने गोवर्धन धारण किया था। अब वे सब गौओंको लौटाकर आते ही होंगे; देखो, सायंकाल हो चला है। तब इतनी देर क्यों होती है, सखी? रास्तेमें बड़े-बड़े ब्रह्मा आदि वयोवृद्ध और शंकर आदि ज्ञानवृद्ध उनके चरणोंकी वन्दना जो करने लगते हैं। अब गौओंके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए वे आते ही होंगे। ग्वालबाल उनकी कीर्तिका गान कर रहे होंगे। देखो न, यह क्या आ रहे हैं। गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर बहुत-सी धूल वनमालापर पड़ गयी है। वे दिनभर जंगलोंमें घूमते-घूमते थक गये हैं। फिर भी अपनी इस शोभासे हमारी आँखोंको कितना सुख, कितना आनन्द दे रहे हैं। देखो, ये यशोदाकी कोखसे प्रकट हुए सबको आह्लादित करनेवाले चन्द्रमा हम प्रेमीजनोंकी भलाईके लिये, हमारी आशा-अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही हमारे पास चले आ रहे हैं॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.35.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/24/","page":356,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["मदविघूर्णितलोचन ईषन्","मानदः स्वसुहृदां वनमाली।","बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं","मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या॥ २४"],"iast":["madavighūrṇitalocana īṣan","mānadaḥ svasuhṛdāṃ vanamālī|","badarapāṇḍuvadano mṛdugaṇḍaṃ","maṇḍayan kanakakuṇḍalalakṣmyā|| 24"],"meaning":"सखी! देखो कैसा सौन्दर्य है! मदभरी आँखें कुछ चढ़ी हुई हैं। कुछ-कुछ ललाई लिये हुए कैसी भली जान पड़ती हैं। गलेमें वनमाला लहरा रही है। सोनेके कुण्डलोंकी कान्तिसे वे अपने कोमल कपोलोंको अलंकृत कर रहे हैं। इसीसे मुँहपर अधपके बेरके समान कुछ पीलापन जान पड़ता है और रोम-रोमसे विशेष करके मुखकमलसे प्रसन्‍नता फूटी पड़ती है। देखो, अब वे अपने सखा ग्वालबालोंका सम्मान करके उन्हें विदा कर रहे हैं। देखो, देखो सखी! व्रज-विभूषण श्रीकृष्ण गजराजके समान मदभरी चालसे इस सन्ध्या वेलामें हमारी ओर आ रहे हैं। अब व्रजमें रहनेवाली गौओंका, हमलोगोंका दिनभरका असह्य विरह-ताप मिटानेके लिये उदित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति ये हमारे प्यारे श्यामसुन्दर समीप चले आ रहे हैं॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"10.35.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/25/","page":356,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["यदुपतिर्द्विरदराजविहारो","यामिनीपतिरिवैष दिनान्ते।","मुदितवक्त्र उपयाति दुरन्तं","मोचयन् व्रजगवां दिनतापम्॥ २५"],"iast":["yadupatirdviradarājavihāro","yāminīpatirivaiṣa dinānte|","muditavaktra upayāti durantaṃ","mocayan vrajagavāṃ dinatāpam|| 25"],"meaning":"सखी! देखो कैसा सौन्दर्य है! मदभरी आँखें कुछ चढ़ी हुई हैं। कुछ-कुछ ललाई लिये हुए कैसी भली जान पड़ती हैं। गलेमें वनमाला लहरा रही है। सोनेके कुण्डलोंकी कान्तिसे वे अपने कोमल कपोलोंको अलंकृत कर रहे हैं। इसीसे मुँहपर अधपके बेरके समान कुछ पीलापन जान पड़ता है और रोम-रोमसे विशेष करके मुखकमलसे प्रसन्‍नता फूटी पड़ती है। देखो, अब वे अपने सखा ग्वालबालोंका सम्मान करके उन्हें विदा कर रहे हैं। देखो, देखो सखी! व्रज-विभूषण श्रीकृष्ण गजराजके समान मदभरी चालसे इस सन्ध्या वेलामें हमारी ओर आ रहे हैं। अब व्रजमें रहनेवाली गौओंका, हमलोगोंका दिनभरका असह्य विरह-ताप मिटानेके लिये उदित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति ये हमारे प्यारे श्यामसुन्दर समीप चले आ रहे हैं॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"10.35.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/35/26/","page":356,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं व्रजस्त्रियो राजन् कृष्णलीला नु गायतीः।","रेमिरेऽहःसु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदयाः॥ २६"],"iast":["evaṃ vrajastriyo rājan kṛṣṇalīlā nu gāyatīḥ|","remire'haḥsu taccittāstanmanaskā mahodayāḥ|| 26"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! बड़भागिनी गोपियोंका मन श्रीकृष्णमें ही लगा रहता था। वे श्रीकृष्णमय हो गयी थीं। जब भगवान् श्रीकृष्ण दिनमें गौओंको चरानेके लिये वनमें चले जाते, तब वे उन्हींका चिन्तन करती रहतीं और अपनी-अपनी सखियोंके साथ अलग-अलग उन्हींकी लीलाओंका गान करके उसीमें रम जातीं। इस प्रकार उनके दिन बीत जाते॥ २६॥"}],"text":[{"b":31016,"kind":"adhyaya_heading","page":350,"text":"अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः"},{"b":31017,"kind":"topic_heading","page":350,"text":"युगलगीत"},{"b":31018,"kind":"topic_heading","page":350,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31019,"kind":"sanskrit_shloka","page":350,"verses":["10.35.1"],"text":"गोप्यः कृष्णे वनं याते तमनुद्रुतचेतसः।"},{"b":31020,"kind":"sanskrit_shloka","page":350,"verses":["10.35.1"],"text":"कृष्णलीलाः प्रगायन्त्यो निन्युर्दुःखेन वासरान्॥ १"},{"b":31021,"kind":"hindi_commentary","page":350,"explains":["10.35.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके गौओंको चरानेके लिये प्रतिदिन वनमें चले जानेपर उनके साथ गोपियोंका चित्त भी चला जाता था। उनका मन श्रीकृष्णका चिन्तन करता रहता और वे वाणीसे उनकी लीलाओंका गान करती रहतीं। इस प्रकार वे बड़ी कठिनाईसे अपना दिन बितातीं॥ १॥"},{"b":31022,"kind":"topic_heading","page":351,"text":"गोप्य ऊचुः"},{"b":31023,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.2"],"text":"वामबाहुकृतवामकपोलो"},{"b":31024,"kind":"hindi_commentary","page":351,"verses":["10.35.2"],"text":"वल्गितभ्रुरधरार्पितवेणुम् ।"},{"b":31025,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.2"],"text":"कोमलाङ्गुलिभिराश्रितमार्गं"},{"b":31026,"kind":"hindi_commentary","page":351,"verses":["10.35.2"],"text":"गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः॥ २"},{"b":31027,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.3"],"text":"व्योमयानवनिताः सह सिद्धै-"},{"b":31028,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.3"],"text":"र्विस्मितास्तदुपधार्य सलज्जाः।"},{"b":31029,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.3"],"text":"काममार्गणसमर्पितचित्ताः"},{"b":31030,"kind":"hindi_commentary","page":351,"verses":["10.35.3"],"text":"कश्मलं ययुरपस्मृतनीव्यः॥ ३"},{"b":31031,"kind":"hindi_commentary","page":351,"explains":["10.35.2","10.35.3"],"text":"गोपियाँ आपसमें कहतीं—अरी सखी! अपने प्रेमीजनोंको प्रेम वितरण करनेवाले और द्वेष करनेवालों- तकको मोक्ष दे देनेवाले श्यामसुन्दर नटनागर जब अपने बायें कपोलको बायीं बाँहकी ओर लटका देते हैं और अपनी भौंहें नचाते हुए बाँसुरीको अधरोंसे लगाते हैं तथा अपनी सुकुमार अंगुलियोंको उसके छेदोंपर फिराते हुए मधुर तान छेड़ते हैं, उस समय सिद्धपत्‍नियाँ आकाशमें अपने पति सिद्धगणोंके साथ विमानोंपर चढ़कर आ जाती हैं और उस तानको सुनकर अत्यन्त ही चकित तथा विस्मित हो जाती हैं। पहले तो उन्हें अपने पतियोंके साथ रहनेपर भी चित्तकी यह दशा देखकर लज्जा मालूम होती है; परन्तु क्षणभरमें ही उनका चित्त कामबाणसे बिंध जाता है, वे विवश और अचेत हो जाती हैं। उन्हें इस बातकी भी सुधि नहीं रहती कि उनकी नीवी खुल गयी है और उनके वस्त्र खिसक गये हैं॥ २-३॥"},{"b":31032,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.4"],"text":"हन्त चित्रमबलाः शृणुतेदं"},{"b":31033,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.4"],"text":"हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।"},{"b":31034,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.4"],"text":"नन्दसूनुरयमार्तजनानां"},{"b":31035,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.4"],"text":"नर्मदो यर्हि कूजितवेणुः॥ ४"},{"b":31036,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.5"],"text":"वृन्दशो व्रजवृषा मृगगावो"},{"b":31037,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.5"],"text":"वेणुवाद्यहृतचेतस आरात्।"},{"b":31038,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.5"],"text":"दन्तदष्टकवला धृतकर्णा"},{"b":31039,"kind":"sanskrit_shloka","page":351,"verses":["10.35.5"],"text":"निद्रिता लिखितचित्रमिवासन्॥ ५"},{"b":31040,"kind":"hindi_commentary","page":351,"explains":["10.35.4","10.35.5"],"text":"अरी गोपियो! तुम यह आश्‍चर्यकी बात सुनो! ये नन्दनन्दन कितने सुन्दर हैं। जब वे हँसते हैं तब हास्यरेखाएँ हारका रूप धारण कर लेती हैं, शुभ्र मोती-सी चमकने लगती हैं। अरी वीर! उनके वक्षः-स्थलपर लहराते हुए हारमें हास्यकी किरणें चमकने लगती हैं। उनके वक्षःस्थलपर जो श्रीवत्सकी सुनहली रेखा है, वह तो ऐसी जान पड़ती है, मानो श्याम मेघपर बिजली ही स्थिररूपसे बैठ गयी है। वे जब दुःखीजनोंको सुख देनेके लिये, विरहियोंके मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार करनेके लिये बाँसुरी बजाते हैं, तब व्रजके झुंड-के-झुंड बैल, गौएँ और हरिन उनके पास ही दौड़ आते हैं। केवल आते ही नहीं, सखी! दाँतोंसे चबाया हुआ घासका ग्रास उनके मुँहमें ज्यों-का-त्यों पड़ा रह जाता है, वे उसे न निगल पाते और न तो उगल ही पाते हैं। दोनों कान खड़े करके इस प्रकार स्थिरभावसे खड़े हो जाते हैं, मानो सो गये हैं या केवल भीतपर लिखे हुए चित्र हैं। उनकी ऐसी दशा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह बाँसुरीकी तान उनके चित्तको चुरा लेती है॥ ४-५॥"},{"b":31041,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.6"],"text":"बर्हिणस्तबकधातुपलाशै-"},{"b":31042,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.6"],"text":"र्बद्धमल्लपरिबर्हविडम्बः ।"},{"b":31043,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.6"],"text":"कर्हिचित् सबल आलि स गोपै-"},{"b":31044,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.6"],"text":"र्गाः समाह्वयति यत्र मुकुन्दः॥ ६"},{"b":31045,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.7"],"text":"तर्हि भ‌ग्‍नगतयः सरितो वै"},{"b":31046,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.7"],"text":"तत्पदाम्बुजरजोऽनिलनीतम् ।"},{"b":31047,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.7"],"text":"स्पृहयतीर्वयमिवाबहुपुण्याः"},{"b":31048,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.7"],"text":"प्रेमवेपितभुजाः स्तिमितापः॥ ७"},{"b":31049,"kind":"hindi_translation","page":352,"explains":["10.35.6","10.35.7"],"text":"हे सखि! जब वे नन्दके लाड़ले लाल अपने सिरपर मोरपंखका मुकुट बाँध लेते हैं, घुँघराली अलकोंमें फूलके गुच्छे खोंस लेते हैं, रंगीन धातुओंसे अपना अंग-अंग रँग लेते हैं और नये-नये पल्लवोंसे ऐसा वेष सजा लेते हैं, जैसे कोई बहुत बड़ा पहलवान हो और फिर बलरामजी तथा ग्वालबालोंके साथ बाँसुरीमें गौओंका नाम ले-लेकर उन्हें पुकारते हैं; उस समय प्यारी सखियो! नदियोंकी गति भी रुक जाती है। वे चाहती हैं कि वायु उड़ाकर हमारे प्रियतमके चरणोंकी धूलि हमारे पास पहुँचा दे और उसे पाकर हम निहाल हो जायँ, परन्तु सखियो! वे भी हमारे ही जैसी मन्दभागिनी हैं। जैसे नन्दनन्दन श्रीकृष्णका आलिंगन करते समय हमारी भुजाएँ काँप जाती हैं और जड़तारूप संचारीभावका उदय हो जानेसे हम अपने हाथोंको हिला भी नहीं पातीं, वैसे ही वे भी प्रेमके कारण काँपने लगती हैं। दो-चार बार अपनी तरंगरूप भुजाओंको काँपते-काँपते उठाती तो अवश्य हैं, परन्तु फिर विवश होकर स्थिर हो जाती हैं, प्रेमावेशसे स्तम्भित हो जाती हैं॥ ६-७॥"},{"b":31050,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.8"],"text":"अनुचरैः समनुवर्णितवीर्य"},{"b":31051,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.8"],"text":"आदिपूरुष इवाचलभूतिः।"},{"b":31052,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.8"],"text":"वनचरो गिरितटेषु चरन्ती-"},{"b":31053,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.8"],"text":"र्वेणुनाऽऽह्वयति गाः स यदा हि॥ ८"},{"b":31054,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.9"],"text":"वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं"},{"b":31055,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.9"],"text":"व्यंजयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः।"},{"b":31056,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.9"],"text":"प्रणतभारविटपा मधुधाराः"},{"b":31057,"kind":"sanskrit_shloka","page":352,"verses":["10.35.9"],"text":"प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥ ९"},{"b":31058,"kind":"hindi_translation","page":352,"explains":["10.35.8","10.35.9"],"text":"अरी वीर! जैसे देवता लोग अनन्त और अचिन्त्य ऐश्‍वर्योंके स्वामी भगवान् नारायणकी शक्तियोंका गान करते हैं, वैसे ही ग्वालबाल अनन्तसुन्दर नटनागर श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करते रहते हैं। वे अचिन्त्य ऐश्‍वर्य-सम्पन्‍न श्रीकृष्ण जब वृन्दावनमें विहार करते रहते हैं और बाँसुरी बजाकर गिरिराज गोवर्धनकी तराईमें चरती हुई गौओंको नाम ले-लेकर पुकारते हैं, उस समय वनके वृक्ष और लताएँ फूल और फलोंसे लद जाती हैं, उनके भारसे डालियाँ झुककर धरती छूने लगती हैं, मानो प्रणाम कर रही हों, वे वृक्ष और लताएँ अपने भीतर भगवान् विष्णुकी अभिव्यक्ति सूचित करती हुई-सी प्रेमसे फूल उठती हैं, उनका रोम-रोम खिल जाता है और सब-की-सब मधुधाराएँ उँड़ेलने लगती हैं॥ ८-९॥"},{"b":31059,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.10"],"text":"दर्शनीयतिलको वनमाला-"},{"b":31060,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.10"],"text":"दिव्यगन्धतुलसीमधुमत्तैः ।"},{"b":31061,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.10"],"text":"अलिकुलैरलघुगीतमभीष्ट-"},{"b":31062,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.10"],"text":"माद्रियन् यर्हि सन्धितवेणुः॥ १०"},{"b":31063,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.11"],"text":"सरसि सारसहंसविहङ्गा-"},{"b":31064,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.11"],"text":"श्‍चारुगीतहृतचेतस एत्य।"},{"b":31065,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.11"],"text":"हरिमुपासत ते यतचित्ता"},{"b":31066,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.11"],"text":"हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ ११"},{"b":31067,"kind":"hindi_translation","page":353,"explains":["10.35.10","10.35.11"],"text":"अरी सखी! जितनी भी वस्तुएँ संसारमें या उसके बाहर देखनेयोग्य हैं, उनमें सबसे सुन्दर, सबसे मधुर, सबके शिरोमणि हैं—ये हमारे मनमोहन। उनके साँवले ललाटपर केसरकी खौर कितनी फबती है—बस, देखती ही जाओ! गलेमें घुटनोंतक लटकती हुई वनमाला, उसमें पिरोयी हुई तुलसीकी दिव्य गन्ध और मधुर मधुसे मतवाले होकर झुंड-के-झुंड भौंरे बड़े मनोहर एवं उच्च स्वरसे गुंजार करते रहते हैं। हमारे नटनागर श्यामसुन्दर भौंरोंकी उस गुनगुनाहटका आदर करते हैं और उन्हींके स्वरमें स्वर मिलाकर अपनी बाँसुरी फूँकने लगते हैं। उस समय सखि! उस मुनिजनमोहन संगीतको सुनकर सरोवरमें रहनेवाले सारस-हंस आदि पक्षियोंका भी चित्त उनके हाथसे निकल जाता है, छिन जाता है। वे विवश होकर प्यारे श्यामसुन्दरके पास आ बैठते हैं तथा आँखें मूँद, चुपचाप, चित्त एकाग्र करके उनकी आराधना करने लगते हैं—मानो कोई विहंगमवृत्तिके रसिक परमहंस ही हों, भला कहो तो यह कितने आश्‍चर्यकी बात है!॥ १०-११॥"},{"b":31068,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.12"],"text":"सहबलः स्रगवतंसविलासः"},{"b":31069,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.12"],"text":"सानुषु क्षितिभृतो व्रजदेव्यः।"},{"b":31070,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.12"],"text":"हर्षयन् यर्हि वेणुरवेण"},{"b":31071,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.12"],"text":"जातहर्ष उपरम्भति विश्‍वम्॥ १२"},{"b":31072,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.13"],"text":"महदतिक्रमणशंकितचेता"},{"b":31073,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.13"],"text":"मन्दमन्दमनुगर्जति मेघः।"},{"b":31074,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.13"],"text":"सुहृदमभ्यवर्षत् सुमनोभि-"},{"b":31075,"kind":"sanskrit_shloka","page":353,"verses":["10.35.13"],"text":"श्छायया च विदधत् प्रतपत्रम्॥ १३"},{"b":31076,"kind":"hindi_translation","page":353,"explains":["10.35.12","10.35.13"],"text":"अरी व्रजदेवियो! हमारे श्यामसुन्दर जब पुष्पोंके कुण्डल बनाकर अपने कानोंमें धारण कर लेते हैं और बलरामजीके साथ गिरिराजके शिखरोंपर खड़े होकर सारे जगत‍्को हर्षित करते हुए बाँसुरी बजाने लगते हैं—बाँसुरी क्या बजाते हैं, आनन्दमें भरकर उसकी ध्वनिके द्वारा सारे विश्‍वका आलिंगन करने लगते हैं—उस समय श्याम मेघ बाँसुरीकी तानके साथ मन्द-मन्द गरजने लगता है। उसके चित्तमें इस बातकी शंका बनी रहती है कि कहीं मैं जोरसे गर्जना कर उठूँ और वह कहीं बाँसुरीकी तानके विपरीत पड़ जाय, उसमें बेसुरापन ले आये, तो मुझसे महात्मा श्रीकृष्णका अपराध हो जायगा। सखी! वह इतना ही नहीं करता; वह जब देखता है कि हमारे सखा घनश्यामको घाम लग रहा है, तब वह उनके ऊपर आकर छाया कर लेता है, उनका छत्र बन जाता है। अरी वीर! वह तो प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उनके ऊपर अपना जीवन ही निछावर कर देता है—नन्हीं-नन्हीं फुहियोंके रूपमें ऐसा बरसने लगता है, मानो दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहा हो। कभी-कभी बादलोंकी ओटमें छिपकर देवता-लोग भी पुष्पवर्षा कर जाया करते हैं॥ १२-१३॥"},{"b":31077,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.14"],"text":"विविधगोपचरणेषु विदग्धो"},{"b":31078,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.14"],"text":"वेणुवाद्य उरुधा निजशिक्षाः।"},{"b":31079,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.14"],"text":"तव सुतः सति यदाधरबिम्बे"},{"b":31080,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.14"],"text":"दत्तवेणुरनयत् स्वरजातीः॥ १४"},{"b":31081,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.15"],"text":"सवनशस्तदुपधार्य सुरेशाः"},{"b":31082,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.15"],"text":"शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः ।"},{"b":31083,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.15"],"text":"कवय आनतकन्धरचित्ताः"},{"b":31084,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.15"],"text":"कश्मलं ययुरनिश्‍चिततत्त्वाः॥ १५"},{"b":31085,"kind":"hindi_commentary","page":354,"explains":["10.35.14","10.35.15"],"text":"सतीशिरोमणि यशोदाजी! तुम्हारे सुन्दर कुँवर ग्वालबालोंके साथ खेल खेलनेमें बड़े निपुण हैं। रानीजी! तुम्हारे लाड़ले लाल सबके प्यारे तो हैं ही, चतुर भी बहुत हैं। देखो, उन्होंने बाँसुरी बजाना किसीसे सीखा नहीं। अपने ही अनेकों प्रकारकी राग-रागिनियाँ उन्होंने निकाल लीं। जब वे अपने बिम्बाफल सदृश लाल-लाल अधरोंपर बाँसुरी रखकर ऋषभ, निषाद आदि स्वरोंकी अनेक जातियाँ बजाने लगते हैं, उस समय वंशीकी परम मोहिनी और नयी तान सुनकर ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता भी—जो सर्वज्ञ हैं—उसे नहीं पहचान पाते। वे इतने मोहित हो जाते हैं कि उनका चित्त तो उनके रोकनेपर भी उनके हाथसे निकलकर वंशीध्वनिमें तल्लीन हो ही जाता है, सिर भी झुक जाता है, और वे अपनी सुध-बुध खोकर उसीमें तन्मय हो जाते हैं॥ १४-१५॥"},{"b":31086,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.16"],"text":"निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र-"},{"b":31087,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.16"],"text":"नीरजांकुशविचित्रललामैः ।"},{"b":31088,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.16"],"text":"व्रजभुवः शमयन् खुरतोदं"},{"b":31089,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.16"],"text":"वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणुः ॥ १६"},{"b":31090,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.17"],"text":"व्रजति तेन वयं सविलास-"},{"b":31091,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.17"],"text":"वीक्षणार्पितमनोभववेगाः ।"},{"b":31092,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.17"],"text":"कुजगतिं गमिता न विदामः"},{"b":31093,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.17"],"text":"कश्मलेन कबरं वसनं वा॥ १७"},{"b":31094,"kind":"hindi_commentary","page":354,"explains":["10.35.16","10.35.17"],"text":"अरी वीर! उनके चरणकमलोंमें ध्वजा, वज्र, कमल, अंकुश आदिके विचित्र और सुन्दर-सुन्दर चिह्न हैं। जब व्रजभूमि गौओंके खुरसे खुद जाती है, तब वे अपने सुकुमार चरणोंसे उसकी पीड़ा मिटाते हुए गजराजके समान मन्दगतिसे आते हैं और बाँसुरी भी बजाते रहते हैं। उनकी वह वंशीध्वनि, उनकी वह चाल और उनकी वह विलासभरी चितवन हमारे हृदयमें प्रेमके, मिलनकी आकांक्षाका आवेग बढ़ा देती है। हम उस समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती हैं कि हिल-डोलतक नहीं सकतीं, मानो हम जड़ वृक्ष हों! हमें तो इस बातका भी पता नहीं चलता कि हमारा जूड़ा खुल गया है या बँधा है, हमारे शरीरपरका वस्त्र उतर गया है या है॥ १६-१७॥"},{"b":31095,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.18"],"text":"मणिधरः क्वचिदागणयन् गा"},{"b":31096,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.18"],"text":"मालया दयितगन्धतुलस्याः।"},{"b":31097,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.18"],"text":"प्रणयिनोऽनुचरस्य कदांसे"},{"b":31098,"kind":"sanskrit_shloka","page":354,"verses":["10.35.18"],"text":"प्रक्षिपन् भुजमगायत यत्र॥ १८"},{"b":31099,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.19"],"text":"क्वणितवेणुरववंचितचित्ताः"},{"b":31100,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.19"],"text":"कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः।"},{"b":31101,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.19"],"text":"गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो"},{"b":31102,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.19"],"text":"गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ १९"},{"b":31103,"kind":"hindi_translation","page":354,"explains":["10.35.18","10.35.19"],"text":"अरी वीर! उनके गलेमें मणियोंकी माला बहुत ही भली मालूम होती है। तुलसीकी मधुर गन्ध उन्हें बहुत प्यारी है। इसीसे तुलसीकी मालाको तो वे कभी छोड़ते ही नहीं, सदा धारण किये रहते हैं। जब वे श्यामसुन्दर उस मणियोंकी मालासे गौओंकी गिनती करते-करते किसी प्रेमी सखाके गलेमें बाँह डाल देते हैं और भाव बता-बताकर बाँसुरी बजाते हुए गाने लगते हैं, उस समय बजती हुई उस बाँसुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर कृष्णसार मृगोंकी पत्‍नी हरिनियाँ भी अपना चित्त उनके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और जैसे हम गोपियाँ अपने घर-गृहस्थीकी आशा-अभिलाषा छोड़कर गुणसागर नागर नन्दनन्दनको घेरे रहती हैं, वैसे ही वे भी उनके पास दौड़ आती हैं और वहीं एकटक देखती हुई खड़ी रह जाती हैं, लौटनेका नाम भी नहीं लेतीं॥ १८-१९॥"},{"b":31104,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.20"],"text":"कुन्ददामकृतकौतुकवेषो"},{"b":31105,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.20"],"text":"गोपगोधनवृतो यमुनायाम्।"},{"b":31106,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.20"],"text":"नन्दसूनुरनघे तव वत्सो"},{"b":31107,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.20"],"text":"नर्मदः प्रणयिनां विजहार॥ २०"},{"b":31108,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.21"],"text":"मन्दवायुरुपवात्यनुकूलं"},{"b":31109,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.21"],"text":"मानयन् मलयजस्पर्शेन।"},{"b":31110,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.21"],"text":"वन्दिनस्तमुपदेवगणा ये"},{"b":31111,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.21"],"text":"वाद्यगीतबलिभिः परिवव्रुः॥ २१"},{"b":31112,"kind":"hindi_translation","page":355,"explains":["10.35.20","10.35.21"],"text":"नन्दरानी यशोदाजी! वास्तवमें तुम बड़ी पुण्यवती हो। तभी तो तुम्हें ऐसे पुत्र मिले हैं। तुम्हारे वे लाड़ले लाल बड़े प्रेमी हैं, उनका चित्त बड़ा कोमल है। वे प्रेमी सखाओंको तरह-तरहसे हास-परिहासके द्वारा सुख पहुँचाते हैं। कुन्दकलीका हार पहनकर जब वे अपनेको विचित्र वेषमें सजा लेते हैं और ग्वालबाल तथा गौओंके साथ यमुनाजीके तटपर खेलने लगते हैं, उस समय मलयज चन्दनके समान शीतल और सुगन्धित स्पर्शसे मन्द-मन्द अनुकूल बहकर वायु तुम्हारे लालकी सेवा करती है और गन्धर्व आदि उपदेवता वंदीजनोंके समान गा-बजाकर उन्हें सन्तुष्ट करते हैं तथा अनेकों प्रकारकी भेंटें देते हुए सब ओरसे घेरकर उनकी सेवा करते हैं॥ २०-२१॥"},{"b":31113,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.22"],"text":"वत्सलो व्रजगवां यदगध्रो"},{"b":31114,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.22"],"text":"वन्द्यमानचरणः पथि वृद्धैः।"},{"b":31115,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.22"],"text":"कृत्स्नगोधनमुपोह्य दिनान्ते"},{"b":31116,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.22"],"text":"गीतवेणुरनुगेडितकीर्तिः ॥ २२"},{"b":31117,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.23"],"text":"उत्सवं श्रमरुचापि दृशीना-"},{"b":31118,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.23"],"text":"मुन्‍नयन् खुररजश्छुरितस्रक्।"},{"b":31119,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.23"],"text":"दित्सयैति सुहृदाशिष एष"},{"b":31120,"kind":"sanskrit_shloka","page":355,"verses":["10.35.23"],"text":"देवकीजठरभूरुडुराजः ॥ २३"},{"b":31121,"kind":"hindi_commentary","page":355,"explains":["10.35.22","10.35.23"],"text":"अरी सखी! श्यामसुन्दर व्रजकी गौओंसे बड़ा प्रेम करते हैं। इसीलिये तो उन्होंने गोवर्धन धारण किया था। अब वे सब गौओंको लौटाकर आते ही होंगे; देखो, सायंकाल हो चला है। तब इतनी देर क्यों होती है, सखी? रास्तेमें बड़े-बड़े ब्रह्मा आदि वयोवृद्ध और शंकर आदि ज्ञानवृद्ध उनके चरणोंकी वन्दना जो करने लगते हैं। अब गौओंके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए वे आते ही होंगे। ग्वालबाल उनकी कीर्तिका गान कर रहे होंगे। देखो न, यह क्या आ रहे हैं। गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर बहुत-सी धूल वनमालापर पड़ गयी है। वे दिनभर जंगलोंमें घूमते-घूमते थक गये हैं। फिर भी अपनी इस शोभासे हमारी आँखोंको कितना सुख, कितना आनन्द दे रहे हैं। देखो, ये यशोदाकी कोखसे प्रकट हुए सबको आह्लादित करनेवाले चन्द्रमा हम प्रेमीजनोंकी भलाईके लिये, हमारी आशा-अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही हमारे पास चले आ रहे हैं॥ २२-२३॥"},{"b":31122,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.24"],"text":"मदविघूर्णितलोचन ईषन्"},{"b":31123,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.24"],"text":"मानदः स्वसुहृदां वनमाली।"},{"b":31124,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.24"],"text":"बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं"},{"b":31125,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.24"],"text":"मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या॥ २४"},{"b":31126,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.25"],"text":"यदुपतिर्द्विरदराजविहारो"},{"b":31127,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.25"],"text":"यामिनीपतिरिवैष दिनान्ते।"},{"b":31128,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.25"],"text":"मुदितवक्त्र उपयाति दुरन्तं"},{"b":31129,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.25"],"text":"मोचयन् व्रजगवां दिनतापम्॥ २५"},{"b":31130,"kind":"hindi_translation","page":356,"explains":["10.35.24","10.35.25"],"text":"सखी! देखो कैसा सौन्दर्य है! मदभरी आँखें कुछ चढ़ी हुई हैं। कुछ-कुछ ललाई लिये हुए कैसी भली जान पड़ती हैं। गलेमें वनमाला लहरा रही है। सोनेके कुण्डलोंकी कान्तिसे वे अपने कोमल कपोलोंको अलंकृत कर रहे हैं। इसीसे मुँहपर अधपके बेरके समान कुछ पीलापन जान पड़ता है और रोम-रोमसे विशेष करके मुखकमलसे प्रसन्‍नता फूटी पड़ती है। देखो, अब वे अपने सखा ग्वालबालोंका सम्मान करके उन्हें विदा कर रहे हैं। देखो, देखो सखी! व्रज-विभूषण श्रीकृष्ण गजराजके समान मदभरी चालसे इस सन्ध्या वेलामें हमारी ओर आ रहे हैं। अब व्रजमें रहनेवाली गौओंका, हमलोगोंका दिनभरका असह्य विरह-ताप मिटानेके लिये उदित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति ये हमारे प्यारे श्यामसुन्दर समीप चले आ रहे हैं॥ २४-२५॥"},{"b":31131,"kind":"topic_heading","page":356,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31132,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.26"],"text":"एवं व्रजस्त्रियो राजन् कृष्णलीला नु गायतीः।"},{"b":31133,"kind":"sanskrit_shloka","page":356,"verses":["10.35.26"],"text":"रेमिरेऽहःसु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदयाः॥ २६"},{"b":31134,"kind":"hindi_commentary","page":356,"explains":["10.35.26"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! बड़भागिनी गोपियोंका मन श्रीकृष्णमें ही लगा रहता था। वे श्रीकृष्णमय हो गयी थीं। जब भगवान् श्रीकृष्ण दिनमें गौओंको चरानेके लिये वनमें चले जाते, तब वे उन्हींका चिन्तन करती रहतीं और अपनी-अपनी सखियोंके साथ अलग-अलग उन्हींकी लीलाओंका गान करके उसीमें रम जातीं। इस प्रकार उनके दिन बीत जाते॥ २६॥"},{"b":31135,"kind":"hindi_translation","page":356,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे वृन्दावनक्रीडायां गोपिकायुगलगीतं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}