{"id":"10.43","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 43","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["कुवलयापीडका उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.43.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[397,401]},"verses":[{"id":"10.43.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/1/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ कृष्णश्‍च रामश्‍च कृतशौचौ परन्तप।","मल्लदुन्दुभिनिर्घोषं श्रुत्वा द्रष्टुमुपेयतुः॥ १"],"iast":["atha kṛṣṇaśca rāmaśca kṛtaśaucau parantapa|","malladundubhinirghoṣaṃ śrutvā draṣṭumupeyatuḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—काम-क्रोधादि शत्रुओंको पराजित करनेवाले परीक्षित्! अब श्रीकृष्ण और बलराम भी स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो दंगलके अनुरूप नगाड़ेकी ध्वनि सुनकर रंगभूमि देखनेके लिये चल पड़े॥ १॥"},{"id":"10.43.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/2/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रंगद्वारं समासाद्य तस्मिन् नागमवस्थितम्।","अपश्यत् कुवलयापीडं कृष्णोऽम्बष्ठप्रचोदितम्॥ २"],"iast":["raṃgadvāraṃ samāsādya tasmin nāgamavasthitam|","apaśyat kuvalayāpīḍaṃ kṛṣṇo'mbaṣṭhapracoditam|| 2"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने रंग-भूमिके दरवाजेपर पहुँचकर देखा कि वहाँ महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामका हाथी खड़ा है॥ २॥"},{"id":"10.43.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/3/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बद‍्ध्वा परिकरं शौरिः समुह्य कुटिलालकान्।","उवाच हस्तिपं वाचा मेघनादगभीरया॥ ३"],"iast":["baddhvā parikaraṃ śauriḥ samuhya kuṭilālakān|","uvāca hastipaṃ vācā meghanādagabhīrayā|| 3"],"meaning":"तब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी कमर कस ली और घुँघराली अलकें समेट लीं तथा मेघके समान गम्भीर वाणीसे महावतको ललकारकर कहा॥ ३॥"},{"id":"10.43.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/4/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अम्बष्ठाम्बष्ठ मार्गं नौ देह्यपक्रम मा चिरम्।","नो चेत् सकुंजरं त्वाद्य नयामि यमसादनम्॥ ४"],"iast":["ambaṣṭhāmbaṣṭha mārgaṃ nau dehyapakrama mā ciram|","no cet sakuṃjaraṃ tvādya nayāmi yamasādanam|| 4"],"meaning":"‘महावत, ओ महावत! हम दोनोंको रास्ता दे दे। हमारे मार्गसे हट जा। अरे, सुनता नहीं? देर मत कर। नहीं तो मैं हाथीके साथ अभी तुझे यमराजके घर पहुँचाता हूँ’॥ ४॥"},{"id":"10.43.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/5/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं निर्भर्त्सितोऽम्बष्ठः कुपितः कोपितं गजम्।","चोदयामास कृष्णाय कालान्तकयमोपमम्॥ ५"],"iast":["evaṃ nirbhartsito'mbaṣṭhaḥ kupitaḥ kopitaṃ gajam|","codayāmāsa kṛṣṇāya kālāntakayamopamam|| 5"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने महावतको जब इस प्रकार धमकाया, तब वह क्रोधसे तिलमिला उठा और उसने काल, मृत्यु तथा यमराजके समान अत्यन्त भयंकर कुवलयापीडको अंकुशकी मारसे क्रुद्ध करके श्रीकृष्णकी ओर बढ़ाया॥ ५॥"},{"id":"10.43.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/6/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["करीन्द्रस्तमभिद्रुत्य करेण तरसाग्रहीत्।","कराद् विगलितः सोऽमुं निहत्याङ्‌घ्रिष्वलीयत॥ ६"],"iast":["karīndrastamabhidrutya kareṇa tarasāgrahīt|","karād vigalitaḥ so'muṃ nihatyāṅghriṣvalīyata|| 6"],"meaning":"कुवलयापीडने भगवान्‌की ओर झपटकर उन्हें बड़ी तेजीसे सूँड़में लपेट लिया; परन्तु भगवान् सूँड़से बाहर सरक आये और उसे एक घूँसा जमाकर उसके पैरोंके बीचमें जा छिपे॥ ६॥"},{"id":"10.43.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/7/","page":397,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संक्रुद्धस्तमचक्षाणो घ्राणदृष्टिः स केशवम्।","परामृशत् पुष्करेण स प्रसह्य विनिर्गतः॥ ७"],"iast":["saṃkruddhastamacakṣāṇo ghrāṇadṛṣṭiḥ sa keśavam|","parāmṛśat puṣkareṇa sa prasahya vinirgataḥ|| 7"],"meaning":"उन्हें अपने सामने न देखकर कुवलयापीडको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सूँघकर भगवान्‌को अपनी सूँड़से टटोल लिया और पकड़ा भी; परन्तु उन्होंने बलपूर्वक अपनेको उससे छुड़ा लिया॥ ७॥"},{"id":"10.43.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/8/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम्।","विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया॥ ८"],"iast":["pucche pragṛhyātibalaṃ dhanuṣaḥ paṃcaviṃśatim|","vicakarṣa yathā nāgaṃ suparṇa iva līlayā|| 8"],"meaning":"इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल-खेलमें ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं॥ ८॥"},{"id":"10.43.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/9/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स पर्यावर्तमानेन सव्यदक्षिणतोऽच्युतः।","बभ्राम भ्राम्यमाणेन गोवत्सेनेव बालकः॥ ९"],"iast":["sa paryāvartamānena savyadakṣiṇato'cyutaḥ|","babhrāma bhrāmyamāṇena govatseneva bālakaḥ|| 9"],"meaning":"जिस प्रकार घूमते हुए बछड़ेके साथ बालक घूमता है अथवा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार बछड़ोंसे खेलते थे, वैसे ही वे उसकी पूँछ पकड़कर उसे घुमाने और खेलने लगे। जब वह दायेंसे घूमकर उनको पकड़ना चाहता, तब वे बायें आ जाते और जब वह बायेंकी ओर घूमता, तब वे दायें घूम जाते॥ ९॥"},{"id":"10.43.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/10/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽभिमुखमभ्येत्य पाणिनाऽऽहत्य वारणम्।","प्राद्रवन् पातयामास स्पृश्यमानः पदे पदे॥ १०"],"iast":["tato'bhimukhamabhyetya pāṇinā''hatya vāraṇam|","prādravan pātayāmāsa spṛśyamānaḥ pade pade|| 10"],"meaning":"इसके बाद हाथीके सामने आकर उन्होंने उसे एक घूँसा जमाया और वे उसे गिरानेके लिये इस प्रकार उसके सामनेसे भागने लगे, मानो वह अब छू लेता है, तब छू लेता है॥ १०॥"},{"id":"10.43.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/11/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स धावन् क्रीडया भूमौ पतित्वा सहसोत्थितः।","तं मत्वा पतितं क्रुद्धो दन्ताभ्यां सोऽहनत्क्षितिम्॥ ११"],"iast":["sa dhāvan krīḍayā bhūmau patitvā sahasotthitaḥ|","taṃ matvā patitaṃ kruddho dantābhyāṃ so'hanatkṣitim|| 11"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने दौड़ते-दौड़ते एक बार खेल-खेलमें ही पृथ्वीपर गिरनेका अभिनय किया और झट वहाँसे उठकर भाग खड़े हुए। उस समय वह हाथी क्रोधसे जल-भुन रहा था। उसने समझा कि वे गिर पड़े और बड़े जोरसे अपने दोनों दाँत धरतीपर मारे॥ ११॥"},{"id":"10.43.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/12/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वविक्रमे प्रतिहते कुंजरेन्द्रोऽत्यमर्षितः।","चोद्यमानो महामात्रैः कृष्णमभ्यद्रवद् रुषा॥ १२"],"iast":["svavikrame pratihate kuṃjarendro'tyamarṣitaḥ|","codyamāno mahāmātraiḥ kṛṣṇamabhyadravad ruṣā|| 12"],"meaning":"जब कुवलयापीडका यह आक्रमण व्यर्थ हो गया, तब वह और भी चिढ़ गया। महावतोंकी प्रेरणासे वह क्रुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णपर टूट पड़ा॥ १२॥"},{"id":"10.43.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/13/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमापतन्तमासाद्य भगवान् मधुसूदनः।","निगृह्य पाणिना हस्तं पातयामास भूतले॥ १३"],"iast":["tamāpatantamāsādya bhagavān madhusūdanaḥ|","nigṛhya pāṇinā hastaṃ pātayāmāsa bhūtale|| 13"],"meaning":"भगवान् मधुसूदनने जब उसे अपनी ओर झपटते देखा, तब उसके पास चले गये और अपने एक ही हाथसे उसकी सूँड़ पकड़कर उसे धरतीपर पटक दिया॥ १३॥"},{"id":"10.43.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/14/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पतितस्य पदाऽऽक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया।","दन्तमुत्पाट्य तेनेभं हस्तिपांश्‍चाहनद्धरिः॥ १४"],"iast":["patitasya padā''kramya mṛgendra iva līlayā|","dantamutpāṭya tenebhaṃ hastipāṃścāhanaddhariḥ|| 14"],"meaning":"उसके गिर जानेपर भगवान्‌ने सिंहके समान खेल-ही-खेलमें उसे पैरोंसे दबाकर उसके दाँत उखाड़ लिये और उन्हींसे हाथी और महावतोंका काम तमाम कर दिया॥ १४॥"},{"id":"10.43.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/15/","page":398,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मृतकं द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणिः समाविशत्।","अंसन्यस्तविषाणोऽसृङ्मदबिन्दुभिरंकितः।","विरूढस्वेदकणिकावदनाम्बुरुहो बभौ॥ १५"],"iast":["mṛtakaṃ dvipamutsṛjya dantapāṇiḥ samāviśat|","aṃsanyastaviṣāṇo'sṛṅmadabindubhiraṃkitaḥ|","virūḍhasvedakaṇikāvadanāmburuho babhau|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! मरे हुए हाथीको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णने हाथमें उसके दाँत लिये-लिये ही रंगभूमिमें प्रवेश किया। उस समय उनकी शोभा देखने ही योग्य थी। उनके कंधेपर हाथीका दाँत रखा हुआ था, शरीर रक्त और मदकी बूँदोंसे सुशोभित था और मुखकमलपर पसीनेकी बूँदें झलक रही थीं॥ १५॥"},{"id":"10.43.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/16/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वृतौ गोपैः कतिपयैर्बलदेवजनार्दनौ।","रंगं विविशतू राजन् गजदन्तवरायुधौ॥ १६"],"iast":["vṛtau gopaiḥ katipayairbaladevajanārdanau|","raṃgaṃ viviśatū rājan gajadantavarāyudhau|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंके ही हाथोंमें कुवलयापीडके बड़े-बड़े दाँत शस्त्रके रूपमें सुशोभित हो रहे थे और कुछ ग्वालबाल उनके साथ-साथ चल रहे थे। इस प्रकार उन्होंने रंगभूमिमें प्रवेश किया॥ १६॥"},{"id":"10.43.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/17/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्","गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।","मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां","वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ १७"],"iast":["mallānāmaśanirnṛṇāṃ naravaraḥ strīṇāṃ smaro mūrtimān","gopānāṃ svajano'satāṃ kṣitibhujāṃ śāstā svapitroḥ śiśuḥ|","mṛtyurbhojapatervirāḍaviduṣāṃ tattvaṃ paraṃ yogināṃ","vṛṣṇīnāṃ paradevateti vidito raṃgaṃ gataḥ sāgrajaḥ|| 17"],"meaning":"जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकठोर शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्‍न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परम तत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णिवंशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेमभक्तिरसका अनुभव किया)॥ १७॥"},{"id":"10.43.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/18/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ।","कंसो मनस्व्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप॥ १८"],"iast":["hataṃ kuvalayāpīḍaṃ dṛṣṭvā tāvapi durjayau|","kaṃso manasvyapi tadā bhṛśamudvivije nṛpa|| 18"],"meaning":"राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जब उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है। उस समय वह बहुत घबड़ा गया॥ १८॥"},{"id":"10.43.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/19/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तौ रेजतू रंगगतौ महाभुजौ विचित्रवेषाभरणस्रगम्बरौ ।","यथा नटावुत्तमवेषधारिणौ मनः क्षिपन्तौ प्रभया निरीक्षताम्॥ १९"],"iast":["tau rejatū raṃgagatau mahābhujau vicitraveṣābharaṇasragambarau |","yathā naṭāvuttamaveṣadhāriṇau manaḥ kṣipantau prabhayā nirīkṣatām|| 19"],"meaning":"श्रीकृष्ण और बलरामकी बाँहें बड़ी लम्बी-लम्बी थीं। पुष्पोंके हार, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनका वेष विचित्र हो रहा था; ऐसा जान पड़ता था, मानो उत्तम वेष धारण करके दो नट अभिनय करनेके लिये आये हों। जिनके नेत्र एक बार उनपर पड़ जाते, बस, लग ही जाते। यही नहीं, वे अपनी कान्तिसे उसका मन भी चुरा लेते। इस प्रकार दोनों रंगभूमिमें शोभायमान हुए॥ १९॥"},{"id":"10.43.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/20/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना मंचस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।","प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाः पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम्॥ २०"],"iast":["nirīkṣya tāvuttamapūruṣau janā maṃcasthitā nāgararāṣṭrakā nṛpa|","praharṣavegotkalitekṣaṇānanāḥ papurna tṛptā nayanaistadānanam|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! मंचोंपर जितने लोग बैठे थे—वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्‍न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे। उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंके द्वारा उनकी मुखमाधुरीका पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे॥ २०॥"},{"id":"10.43.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/21/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।","जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्‍लिष्यन्त इव बाहुभिः॥ २१"],"iast":["pibanta iva cakṣurbhyāṃ lihanta iva jihvayā|","jighranta iva nāsābhyāṃ śliṣyanta iva bāhubhiḥ|| 21"],"meaning":"मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों॥ २१॥"},{"id":"10.43.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/22/","page":399,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाश्रुतम्।","तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव॥ २२"],"iast":["ūcuḥ parasparaṃ te vai yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam|","tadrūpaguṇamādhuryaprāgalbhyasmāritā iva|| 22"],"meaning":"उनके सौन्दर्य, गुण, माधुर्य और निर्भयताने मानो दर्शकोंको उनकी लीलाओंका स्मरण करा दिया और वे लोग आपसमें उनके सम्बन्धकी देखी-सुनी बातें कहने-सुनने लगे॥ २२॥"},{"id":"10.43.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/23/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतौ भगवतः साक्षाद्धरेर्नारायणस्य हि।","अवतीर्णाविहांशेन वसुदेवस्य वेश्मनि॥ २३"],"iast":["etau bhagavataḥ sākṣāddharernārāyaṇasya hi|","avatīrṇāvihāṃśena vasudevasya veśmani|| 23"],"meaning":"‘ये दोनों साक्षात् भगवान् नारायणके अंश हैं। इस पृथ्वीपर वसुदेवजीके घरमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २३॥"},{"id":"10.43.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/24/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष वै किल देवक्यां जातो नीतश्‍च गोकुलम्।","कालमेतं वसन् गूढो ववृधे नन्दवेश्मनि॥ २४"],"iast":["eṣa vai kila devakyāṃ jāto nītaśca gokulam|","kālametaṃ vasan gūḍho vavṛdhe nandaveśmani|| 24"],"meaning":"[अँगुलीसे दिखलाकर] ये साँवले-सलोने कुमार देवकीके गर्भसे उत्पन्‍न हुए थे। जन्मते ही वसुदेवजीने इन्हें गोकुल पहुँचा दिया था। इतने दिनोंतक ये वहाँ छिपकर रहे और नन्दजीके घरमें ही पलकर इतने बड़े हुए॥ २४॥"},{"id":"10.43.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/25/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पूतनानेन नीतान्तं चक्रवातश्‍च दानवः।","अर्जुनौ गुह्यकः केशी धेनुकोऽन्ये च तद्विधाः॥ २५"],"iast":["pūtanānena nītāntaṃ cakravātaśca dānavaḥ|","arjunau guhyakaḥ keśī dhenuko'nye ca tadvidhāḥ|| 25"],"meaning":"इन्होंने ही पूतना, तृणावर्त, शंखचूड़, केशी और धेनुक आदिका तथा और भी दुष्ट दैत्योंका वध तथा यमलार्जुनका उद्धार किया है॥ २५॥"},{"id":"10.43.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/26/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गावः सपाला एतेन दावा‌ग्‍नेः परिमोचिताः।","कालियो दमितः सर्प इन्द्रश्‍च विमदः कृतः॥ २६"],"iast":["gāvaḥ sapālā etena dāvāgneḥ parimocitāḥ|","kāliyo damitaḥ sarpa indraśca vimadaḥ kṛtaḥ|| 26"],"meaning":"इन्होंने ही गौ और ग्वालोंको दावानलकी ज्वालासे बचाया था। कालियनागका दमन और इन्द्रका मान-मर्दन भी इन्होंने ही किया था॥ २६॥"},{"id":"10.43.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/27/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सप्ताहमेकहस्तेन धृतोऽद्रिप्रवरोऽमुना।","वर्षवाताशनिभ्यश्‍च परित्रातं च गोकुलम्॥ २७"],"iast":["saptāhamekahastena dhṛto'dripravaro'munā|","varṣavātāśanibhyaśca paritrātaṃ ca gokulam|| 27"],"meaning":"इन्होंने सात दिनोंतक एक ही हाथपर गिरिराज गोवर्धनको उठाये रखा और उसके द्वारा आँधी-पानी तथा वज्रपातसे गोकुलको बचा लिया॥ २७॥"},{"id":"10.43.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/28/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्योऽस्य नित्यमुदितहसितप्रेक्षणं मुखम्।","पश्यन्त्यो विविधांस्तापांस्तरन्ति स्माश्रमं मुदा॥ २८"],"iast":["gopyo'sya nityamuditahasitaprekṣaṇaṃ mukham|","paśyantyo vividhāṃstāpāṃstaranti smāśramaṃ mudā|| 28"],"meaning":"गोपियाँ इनकी मन्द-मन्द मुसकान, मधुर चितवन और सर्वदा एकरस प्रसन्‍न रहनेवाले मुखारविन्दके दर्शनसे आनन्दित रहती थीं और अनायास ही सब प्रकारके तापोंसे मुक्त हो जाती थीं॥ २८॥"},{"id":"10.43.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/29/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वदन्त्यनेन वंशोऽयं यदोः सुबहुविश्रुतः।","श्रियं यशो महत्त्वं च लप्स्यते परिरक्षितः॥ २९"],"iast":["vadantyanena vaṃśo'yaṃ yadoḥ subahuviśrutaḥ|","śriyaṃ yaśo mahattvaṃ ca lapsyate parirakṣitaḥ|| 29"],"meaning":"कहते हैं कि ये यदुवंशकी रक्षा करेंगे। यह विख्यात वंश इनके द्वारा महान् समृद्धि, यश और गौरव प्राप्त करेगा॥ २९॥"},{"id":"10.43.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/30/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अयं चास्याग्रजः श्रीमान् रामः कमललोचनः।","प्रलम्बो निहतो येन वत्सको ये बकादयः॥ ३०"],"iast":["ayaṃ cāsyāgrajaḥ śrīmān rāmaḥ kamalalocanaḥ|","pralambo nihato yena vatsako ye bakādayaḥ|| 30"],"meaning":"ये दूसरे इन्हीं श्यामसुन्दरके बड़े भाई कमलनयन श्रीबलरामजी हैं। हमने किसी-किसीके मुँहसे ऐसा सुना है कि इन्होंने ही प्रलम्बासुर, वत्सासुर और बकासुर आदिको मारा है’॥ ३०॥"},{"id":"10.43.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/31/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जनेष्वेवं ब्रुवाणेषु तूर्येषु निनदत्सु च।","कृष्णरामौ समाभाष्य चाणूरो वाक्यमब्रवीत्॥ ३१"],"iast":["janeṣvevaṃ bruvāṇeṣu tūryeṣu ninadatsu ca|","kṛṣṇarāmau samābhāṣya cāṇūro vākyamabravīt|| 31"],"meaning":"जिस समय दर्शकोंमें यह चर्चा हो रही थी और अखाड़ेमें तुरही आदि बाजे बज रहे थे, उस समय चाणूरने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामको सम्बोधन करके यह बात कही—॥ ३१॥"},{"id":"10.43.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/32/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हे नन्दसूनो हे राम भवन्तौ वीरसंमतौ।","नियुद्धकुशलौ श्रुत्वा राज्ञाऽऽहूतौ दिदृक्षुणा॥ ३२"],"iast":["he nandasūno he rāma bhavantau vīrasaṃmatau|","niyuddhakuśalau śrutvā rājñā''hūtau didṛkṣuṇā|| 32"],"meaning":"‘नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरोंके आदरणीय हो। हमारे महाराजने यह सुनकर कि तुमलोग कुश्ती लड़नेमें बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखनेके लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है॥ ३२॥"},{"id":"10.43.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/33/","page":400,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रियं राज्ञः प्रकुर्वन्त्यः श्रेयो विन्दन्ति वै प्रजाः।","मनसा कर्मणा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा॥ ३३"],"iast":["priyaṃ rājñaḥ prakurvantyaḥ śreyo vindanti vai prajāḥ|","manasā karmaṇā vācā viparītamato'nyathā|| 33"],"meaning":"देखो भाई! जो प्रजा मन, वचन और कर्मसे राजाका प्रिय कार्य करती है, उसका भला होता है और जो राजाकी इच्छाके विपरीत काम करती है, उसे हानि उठानी पड़ती है॥ ३३॥"},{"id":"10.43.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/34/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नित्यं प्रमुदिता गोपा वत्सपाला यथा स्फुटम्।","वनेषु मल्लयुद्धेन क्रीडन्तश्‍चारयन्ति गाः॥ ३४"],"iast":["nityaṃ pramuditā gopā vatsapālā yathā sphuṭam|","vaneṣu mallayuddhena krīḍantaścārayanti gāḥ|| 34"],"meaning":"यह सभी जानते हैं कि गाय और बछड़े चरानेवाले ग्वालिये प्रतिदिन आनन्दसे जंगलोंमें कुश्ती लड़-लड़कर खेलते रहते हैं और गायें चराते रहते हैं॥ ३४॥"},{"id":"10.43.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/35/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्माद् राज्ञः प्रियं यूयं वयं च करवाम हे।","भूतानि नः प्रसीदन्ति सर्वभूतमयो नृपः॥ ३५"],"iast":["tasmād rājñaḥ priyaṃ yūyaṃ vayaṃ ca karavāma he|","bhūtāni naḥ prasīdanti sarvabhūtamayo nṛpaḥ|| 35"],"meaning":"इसलिये आओ, हम और तुम मिलकर महाराजको प्रसन्‍न करनेके लिये कुश्ती लड़ें। ऐसा करनेसे हमपर सभी प्राणी प्रसन्‍न होंगे, क्योंकि राजा सारी प्रजाका प्रतीक है’॥ ३५॥"},{"id":"10.43.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/36/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्‍निशम्याब्रवीत् कृष्णो देशकालोचितं वचः।","नियुद्धमात्मनोऽभीष्टं मन्यमानोऽभिनन्द्य च॥ ३६"],"iast":["tanniśamyābravīt kṛṣṇo deśakālocitaṃ vacaḥ|","niyuddhamātmano'bhīṣṭaṃ manyamāno'bhinandya ca|| 36"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण तो चाहते ही थे कि इनसे दो-दो हाथ करें। इसलिये उन्होंने चाणूरकी बात सुनकर उसका अनुमोदन किया और देश-कालके अनुसार यह बात कही—॥ ३६॥"},{"id":"10.43.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/37/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रजा भोजपतेरस्य वयं चापि वनेचराः।","करवाम प्रियं नित्यं तन्‍नः परमनुग्रहः॥ ३७"],"iast":["prajā bhojapaterasya vayaṃ cāpi vanecarāḥ|","karavāma priyaṃ nityaṃ tannaḥ paramanugrahaḥ|| 37"],"meaning":"‘चाणूर! हम भी इन भोजराज कंसकी वनवासी प्रजा हैं। हमें इनको प्रसन्‍न करनेका प्रयत्‍न अवश्य करना चाहिये। इसीमें हमारा कल्याण है॥ ३७॥"},{"id":"10.43.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/38/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बाला वयं तुल्यबलैः क्रीडिष्यामो यथोचितम्।","भवेन्‍नियुद्धं माधर्मः स्पृशेन्मल्ल सभासदः॥ ३८"],"iast":["bālā vayaṃ tulyabalaiḥ krīḍiṣyāmo yathocitam|","bhavenniyuddhaṃ mādharmaḥ spṛśenmalla sabhāsadaḥ|| 38"],"meaning":"किन्तु चाणूर! हमलोग अभी बालक हैं। इसलिये हम अपने समान बलवाले बालकोंके साथ ही कुश्ती लड़नेका खेल करेंगे। कुश्ती समान बलवालोंके साथ ही होनी चाहिये, जिससे देखनेवाले सभासदोंको अन्यायके समर्थक होनेका पाप न लगे’॥ ३८॥"},{"id":"10.43.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/39/","page":401,"speaker":"चाणूर उवाच","sanskrit":["न बालो न किशोरस्त्वं बलश्‍च बलिनां वरः।","लीलयेभो हतो येन सहस्रद्विपसत्त्वभृत्॥ ३९"],"iast":["na bālo na kiśorastvaṃ balaśca balināṃ varaḥ|","līlayebho hato yena sahasradvipasattvabhṛt|| 39"],"meaning":"चाणूरने कहा—अजी! तुम और बलराम न बालक हो और न तो किशोर। तुम दोनों बलवानोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अभी-अभी हजार हाथियोंका बल रखनेवाले कुवलयापीडको खेल-ही-खेलमें मार डाला॥ ३९॥"},{"id":"10.43.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/43/40/","page":401,"speaker":"चाणूर उवाच","sanskrit":["तस्माद् भवद‍्भ्यां बलिभिर्योद्धव्यं नानयोऽत्र वै।","मयि विक्रम वार्ष्णेय बलेन सह मुष्टिकः॥ ४०"],"iast":["tasmād bhavadbhyāṃ balibhiryoddhavyaṃ nānayo'tra vai|","mayi vikrama vārṣṇeya balena saha muṣṭikaḥ|| 40"],"meaning":"इसलिये तुम दोनोंको हम-जैसे बलवानोंके साथ ही लड़ना चाहिये। इसमें अन्यायकी कोई बात नहीं है। इसलिये श्रीकृष्ण! तुम मुझपर अपना जोर आजमाओ और बलरामके साथ मुष्टिक लड़ेगा॥ ४०॥"}],"text":[{"b":31995,"kind":"adhyaya_heading","page":397,"text":"अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":31996,"kind":"topic_heading","page":397,"text":"कुवलयापीडका उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश"},{"b":31997,"kind":"topic_heading","page":397,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31998,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.1"],"text":"अथ कृष्णश्‍च रामश्‍च कृतशौचौ परन्तप।"},{"b":31999,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.1"],"text":"मल्लदुन्दुभिनिर्घोषं श्रुत्वा द्रष्टुमुपेयतुः॥ १"},{"b":32000,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.2"],"text":"रंगद्वारं समासाद्य तस्मिन् नागमवस्थितम्।"},{"b":32001,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.2"],"text":"अपश्यत् कुवलयापीडं कृष्णोऽम्बष्ठप्रचोदितम्॥ २"},{"b":32002,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.3"],"text":"बद‍्ध्वा परिकरं शौरिः समुह्य कुटिलालकान्।"},{"b":32003,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.3"],"text":"उवाच हस्तिपं वाचा मेघनादगभीरया॥ ३"},{"b":32004,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.4"],"text":"अम्बष्ठाम्बष्ठ मार्गं नौ देह्यपक्रम मा चिरम्।"},{"b":32005,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.4"],"text":"नो चेत् सकुंजरं त्वाद्य नयामि यमसादनम्॥ ४"},{"b":32006,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.5"],"text":"एवं निर्भर्त्सितोऽम्बष्ठः कुपितः कोपितं गजम्।"},{"b":32007,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.5"],"text":"चोदयामास कृष्णाय कालान्तकयमोपमम्॥ ५"},{"b":32008,"kind":"hindi_commentary","page":397,"explains":["10.43.1","10.43.2","10.43.3","10.43.4","10.43.5"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—काम-क्रोधादि शत्रुओंको पराजित करनेवाले परीक्षित्! अब श्रीकृष्ण और बलराम भी स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो दंगलके अनुरूप नगाड़ेकी ध्वनि सुनकर रंगभूमि देखनेके लिये चल पड़े॥ १॥ भगवान् श्रीकृष्णने रंग-भूमिके दरवाजेपर पहुँचकर देखा कि वहाँ महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामका हाथी खड़ा है॥ २॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी कमर कस ली और घुँघराली अलकें समेट लीं तथा मेघके समान गम्भीर वाणीसे महावतको ललकारकर कहा॥ ३॥ ‘महावत, ओ महावत! हम दोनोंको रास्ता दे दे। हमारे मार्गसे हट जा। अरे, सुनता नहीं? देर मत कर। नहीं तो मैं हाथीके साथ अभी तुझे यमराजके घर पहुँचाता हूँ’॥ ४॥ भगवान् श्रीकृष्णने महावतको जब इस प्रकार धमकाया, तब वह क्रोधसे तिलमिला उठा और उसने काल, मृत्यु तथा यमराजके समान अत्यन्त भयंकर कुवलयापीडको अंकुशकी मारसे क्रुद्ध करके श्रीकृष्णकी ओर बढ़ाया॥ ५॥"},{"b":32009,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.6"],"text":"करीन्द्रस्तमभिद्रुत्य करेण तरसाग्रहीत्।"},{"b":32010,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.6"],"text":"कराद् विगलितः सोऽमुं निहत्याङ्‌घ्रिष्वलीयत॥ ६"},{"b":32011,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.7"],"text":"संक्रुद्धस्तमचक्षाणो घ्राणदृष्टिः स केशवम्।"},{"b":32012,"kind":"sanskrit_shloka","page":397,"verses":["10.43.7"],"text":"परामृशत् पुष्करेण स प्रसह्य विनिर्गतः॥ ७"},{"b":32013,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.8"],"text":"पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम्।"},{"b":32014,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.8"],"text":"विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया॥ ८"},{"b":32015,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.9"],"text":"स पर्यावर्तमानेन सव्यदक्षिणतोऽच्युतः।"},{"b":32016,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.9"],"text":"बभ्राम भ्राम्यमाणेन गोवत्सेनेव बालकः॥ ९"},{"b":32017,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.10"],"text":"ततोऽभिमुखमभ्येत्य पाणिनाऽऽहत्य वारणम्।"},{"b":32018,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.10"],"text":"प्राद्रवन् पातयामास स्पृश्यमानः पदे पदे॥ १०"},{"b":32019,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.11"],"text":"स धावन् क्रीडया भूमौ पतित्वा सहसोत्थितः।"},{"b":32020,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.11"],"text":"तं मत्वा पतितं क्रुद्धो दन्ताभ्यां सोऽहनत्क्षितिम्॥ ११"},{"b":32021,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.12"],"text":"स्वविक्रमे प्रतिहते कुंजरेन्द्रोऽत्यमर्षितः।"},{"b":32022,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.12"],"text":"चोद्यमानो महामात्रैः कृष्णमभ्यद्रवद् रुषा॥ १२"},{"b":32023,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.13"],"text":"तमापतन्तमासाद्य भगवान् मधुसूदनः।"},{"b":32024,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.13"],"text":"निगृह्य पाणिना हस्तं पातयामास भूतले॥ १३"},{"b":32025,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.14"],"text":"पतितस्य पदाऽऽक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया।"},{"b":32026,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.14"],"text":"दन्तमुत्पाट्य तेनेभं हस्तिपांश्‍चाहनद्धरिः॥ १४"},{"b":32027,"kind":"hindi_commentary","page":397,"explains":["10.43.6","10.43.7","10.43.8","10.43.9","10.43.10","10.43.11","10.43.12","10.43.13","10.43.14"],"text":"कुवलयापीडने भगवान्‌की ओर झपटकर उन्हें बड़ी तेजीसे सूँड़में लपेट लिया; परन्तु भगवान् सूँड़से बाहर सरक आये और उसे एक घूँसा जमाकर उसके पैरोंके बीचमें जा छिपे॥ ६॥ उन्हें अपने सामने न देखकर कुवलयापीडको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सूँघकर भगवान्‌को अपनी सूँड़से टटोल लिया और पकड़ा भी; परन्तु उन्होंने बलपूर्वक अपनेको उससे छुड़ा लिया॥ ७॥ इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल-खेलमें ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं॥ ८॥ जिस प्रकार घूमते हुए बछड़ेके साथ बालक घूमता है अथवा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार बछड़ोंसे खेलते थे, वैसे ही वे उसकी पूँछ पकड़कर उसे घुमाने और खेलने लगे। जब वह दायेंसे घूमकर उनको पकड़ना चाहता, तब वे बायें आ जाते और जब वह बायेंकी ओर घूमता, तब वे दायें घूम जाते॥ ९॥ इसके बाद हाथीके सामने आकर उन्होंने उसे एक घूँसा जमाया और वे उसे गिरानेके लिये इस प्रकार उसके सामनेसे भागने लगे, मानो वह अब छू लेता है, तब छू लेता है॥ १०॥ भगवान् श्रीकृष्णने दौड़ते-दौड़ते एक बार खेल-खेलमें ही पृथ्वीपर गिरनेका अभिनय किया और झट वहाँसे उठकर भाग खड़े हुए। उस समय वह हाथी क्रोधसे जल-भुन रहा था। उसने समझा कि वे गिर पड़े और बड़े जोरसे अपने दोनों दाँत धरतीपर मारे॥ ११॥ जब कुवलयापीडका यह आक्रमण व्यर्थ हो गया, तब वह और भी चिढ़ गया। महावतोंकी प्रेरणासे वह क्रुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णपर टूट पड़ा॥ १२॥ भगवान् मधुसूदनने जब उसे अपनी ओर झपटते देखा, तब उसके पास चले गये और अपने एक ही हाथसे उसकी सूँड़ पकड़कर उसे धरतीपर पटक दिया॥ १३॥ उसके गिर जानेपर भगवान्‌ने सिंहके समान खेल-ही-खेलमें उसे पैरोंसे दबाकर उसके दाँत उखाड़ लिये और उन्हींसे हाथी और महावतोंका काम तमाम कर दिया॥ १४॥"},{"b":32028,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.15"],"text":"मृतकं द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणिः समाविशत्।"},{"b":32029,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.15"],"text":"अंसन्यस्तविषाणोऽसृङ्मदबिन्दुभिरंकितः।"},{"b":32030,"kind":"sanskrit_shloka","page":398,"verses":["10.43.15"],"text":"विरूढस्वेदकणिकावदनाम्बुरुहो बभौ॥ १५"},{"b":32031,"kind":"hindi_commentary","page":398,"explains":["10.43.15"],"text":"परीक्षित्! मरे हुए हाथीको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णने हाथमें उसके दाँत लिये-लिये ही रंगभूमिमें प्रवेश किया। उस समय उनकी शोभा देखने ही योग्य थी। उनके कंधेपर हाथीका दाँत रखा हुआ था, शरीर रक्त और मदकी बूँदोंसे सुशोभित था और मुखकमलपर पसीनेकी बूँदें झलक रही थीं॥ १५॥"},{"b":32032,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.16"],"text":"वृतौ गोपैः कतिपयैर्बलदेवजनार्दनौ।"},{"b":32033,"kind":"topic_heading","page":399,"verses":["10.43.16"],"text":"रंगं विविशतू राजन् गजदन्तवरायुधौ॥ १६"},{"b":32034,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.17"],"text":"मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्"},{"b":32035,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.17"],"text":"गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।"},{"b":32036,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.17"],"text":"मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां"},{"b":32037,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.17"],"text":"वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ १७"},{"b":32038,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.18"],"text":"हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ।"},{"b":32039,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.18"],"text":"कंसो मनस्व्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप॥ १८"},{"b":32040,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.19"],"text":"तौ रेजतू रंगगतौ महाभुजौ विचित्रवेषाभरणस्रगम्बरौ ।"},{"b":32041,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.19"],"text":"यथा नटावुत्तमवेषधारिणौ मनः क्षिपन्तौ प्रभया निरीक्षताम्॥ १९"},{"b":32042,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.20"],"text":"निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना मंचस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।"},{"b":32043,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.20"],"text":"प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाः पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम्॥ २०"},{"b":32044,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.21"],"text":"पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।"},{"b":32045,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.21"],"text":"जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्‍लिष्यन्त इव बाहुभिः॥ २१"},{"b":32046,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.22"],"text":"ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाश्रुतम्।"},{"b":32047,"kind":"sanskrit_shloka","page":399,"verses":["10.43.22"],"text":"तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव॥ २२"},{"b":32048,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.23"],"text":"एतौ भगवतः साक्षाद्धरेर्नारायणस्य हि।"},{"b":32049,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.23"],"text":"अवतीर्णाविहांशेन वसुदेवस्य वेश्मनि॥ २३"},{"b":32050,"kind":"hindi_commentary","page":399,"explains":["10.43.16","10.43.17","10.43.18","10.43.19","10.43.20","10.43.21","10.43.22","10.43.23"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंके ही हाथोंमें कुवलयापीडके बड़े-बड़े दाँत शस्त्रके रूपमें सुशोभित हो रहे थे और कुछ ग्वालबाल उनके साथ-साथ चल रहे थे। इस प्रकार उन्होंने रंगभूमिमें प्रवेश किया॥ १६॥ जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकठोर शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्‍न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परम तत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णिवंशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेमभक्तिरसका अनुभव किया)॥ १७॥ राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जब उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है। उस समय वह बहुत घबड़ा गया॥ १८॥ श्रीकृष्ण और बलरामकी बाँहें बड़ी लम्बी-लम्बी थीं। पुष्पोंके हार, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनका वेष विचित्र हो रहा था; ऐसा जान पड़ता था, मानो उत्तम वेष धारण करके दो नट अभिनय करनेके लिये आये हों। जिनके नेत्र एक बार उनपर पड़ जाते, बस, लग ही जाते। यही नहीं, वे अपनी कान्तिसे उसका मन भी चुरा लेते। इस प्रकार दोनों रंगभूमिमें शोभायमान हुए॥ १९॥ परीक्षित्! मंचोंपर जितने लोग बैठे थे—वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्‍न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे। उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंके द्वारा उनकी मुखमाधुरीका पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे॥ २०॥ मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों॥ २१॥ उनके सौन्दर्य, गुण, माधुर्य और निर्भयताने मानो दर्शकोंको उनकी लीलाओंका स्मरण करा दिया और वे लोग आपसमें उनके सम्बन्धकी देखी-सुनी बातें कहने-सुनने लगे॥ २२॥ ‘ये दोनों साक्षात् भगवान् नारायणके अंश हैं। इस पृथ्वीपर वसुदेवजीके घरमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २३॥"},{"b":32051,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.24"],"text":"एष वै किल देवक्यां जातो नीतश्‍च गोकुलम्।"},{"b":32052,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.24"],"text":"कालमेतं वसन् गूढो ववृधे नन्दवेश्मनि॥ २४"},{"b":32053,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.25"],"text":"पूतनानेन नीतान्तं चक्रवातश्‍च दानवः।"},{"b":32054,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.25"],"text":"अर्जुनौ गुह्यकः केशी धेनुकोऽन्ये च तद्विधाः॥ २५"},{"b":32055,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.26"],"text":"गावः सपाला एतेन दावा‌ग्‍नेः परिमोचिताः।"},{"b":32056,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.26"],"text":"कालियो दमितः सर्प इन्द्रश्‍च विमदः कृतः॥ २६"},{"b":32057,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.27"],"text":"सप्ताहमेकहस्तेन धृतोऽद्रिप्रवरोऽमुना।"},{"b":32058,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.27"],"text":"वर्षवाताशनिभ्यश्‍च परित्रातं च गोकुलम्॥ २७"},{"b":32059,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.28"],"text":"गोप्योऽस्य नित्यमुदितहसितप्रेक्षणं मुखम्।"},{"b":32060,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.28"],"text":"पश्यन्त्यो विविधांस्तापांस्तरन्ति स्माश्रमं मुदा॥ २८"},{"b":32061,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.29"],"text":"वदन्त्यनेन वंशोऽयं यदोः सुबहुविश्रुतः।"},{"b":32062,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.29"],"text":"श्रियं यशो महत्त्वं च लप्स्यते परिरक्षितः॥ २९"},{"b":32063,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.30"],"text":"अयं चास्याग्रजः श्रीमान् रामः कमललोचनः।"},{"b":32064,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.30"],"text":"प्रलम्बो निहतो येन वत्सको ये बकादयः॥ ३०"},{"b":32065,"kind":"hindi_commentary","page":400,"explains":["10.43.24","10.43.25","10.43.26","10.43.27","10.43.28","10.43.29","10.43.30"],"text":"[अँगुलीसे दिखलाकर] ये साँवले-सलोने कुमार देवकीके गर्भसे उत्पन्‍न हुए थे। जन्मते ही वसुदेवजीने इन्हें गोकुल पहुँचा दिया था। इतने दिनोंतक ये वहाँ छिपकर रहे और नन्दजीके घरमें ही पलकर इतने बड़े हुए॥ २४॥ इन्होंने ही पूतना, तृणावर्त, शंखचूड़, केशी और धेनुक आदिका तथा और भी दुष्ट दैत्योंका वध तथा यमलार्जुनका उद्धार किया है॥ २५॥ इन्होंने ही गौ और ग्वालोंको दावानलकी ज्वालासे बचाया था। कालियनागका दमन और इन्द्रका मान-मर्दन भी इन्होंने ही किया था॥ २६॥ इन्होंने सात दिनोंतक एक ही हाथपर गिरिराज गोवर्धनको उठाये रखा और उसके द्वारा आँधी-पानी तथा वज्रपातसे गोकुलको बचा लिया॥ २७॥ गोपियाँ इनकी मन्द-मन्द मुसकान, मधुर चितवन और सर्वदा एकरस प्रसन्‍न रहनेवाले मुखारविन्दके दर्शनसे आनन्दित रहती थीं और अनायास ही सब प्रकारके तापोंसे मुक्त हो जाती थीं॥ २८॥ कहते हैं कि ये यदुवंशकी रक्षा करेंगे। यह विख्यात वंश इनके द्वारा महान् समृद्धि, यश और गौरव प्राप्त करेगा॥ २९॥ ये दूसरे इन्हीं श्यामसुन्दरके बड़े भाई कमलनयन श्रीबलरामजी हैं। हमने किसी-किसीके मुँहसे ऐसा सुना है कि इन्होंने ही प्रलम्बासुर, वत्सासुर और बकासुर आदिको मारा है’॥ ३०॥"},{"b":32066,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.31"],"text":"जनेष्वेवं ब्रुवाणेषु तूर्येषु निनदत्सु च।"},{"b":32067,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.31"],"text":"कृष्णरामौ समाभाष्य चाणूरो वाक्यमब्रवीत्॥ ३१"},{"b":32068,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.32"],"text":"हे नन्दसूनो हे राम भवन्तौ वीरसंमतौ।"},{"b":32069,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.32"],"text":"नियुद्धकुशलौ श्रुत्वा राज्ञाऽऽहूतौ दिदृक्षुणा॥ ३२"},{"b":32070,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.33"],"text":"प्रियं राज्ञः प्रकुर्वन्त्यः श्रेयो विन्दन्ति वै प्रजाः।"},{"b":32071,"kind":"sanskrit_shloka","page":400,"verses":["10.43.33"],"text":"मनसा कर्मणा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा॥ ३३"},{"b":32072,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.34"],"text":"नित्यं प्रमुदिता गोपा वत्सपाला यथा स्फुटम्।"},{"b":32073,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.34"],"text":"वनेषु मल्लयुद्धेन क्रीडन्तश्‍चारयन्ति गाः॥ ३४"},{"b":32074,"kind":"hindi_commentary","page":400,"explains":["10.43.31","10.43.32","10.43.33","10.43.34"],"text":"जिस समय दर्शकोंमें यह चर्चा हो रही थी और अखाड़ेमें तुरही आदि बाजे बज रहे थे, उस समय चाणूरने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामको सम्बोधन करके यह बात कही—॥ ३१॥ ‘नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरोंके आदरणीय हो। हमारे महाराजने यह सुनकर कि तुमलोग कुश्ती लड़नेमें बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखनेके लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है॥ ३२॥ देखो भाई! जो प्रजा मन, वचन और कर्मसे राजाका प्रिय कार्य करती है, उसका भला होता है और जो राजाकी इच्छाके विपरीत काम करती है, उसे हानि उठानी पड़ती है॥ ३३॥ यह सभी जानते हैं कि गाय और बछड़े चरानेवाले ग्वालिये प्रतिदिन आनन्दसे जंगलोंमें कुश्ती लड़-लड़कर खेलते रहते हैं और गायें चराते रहते हैं॥ ३४॥"},{"b":32075,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.35"],"text":"तस्माद् राज्ञः प्रियं यूयं वयं च करवाम हे।"},{"b":32076,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.35"],"text":"भूतानि नः प्रसीदन्ति सर्वभूतमयो नृपः॥ ३५"},{"b":32077,"kind":"hindi_commentary","page":401,"explains":["10.43.35"],"text":"इसलिये आओ, हम और तुम मिलकर महाराजको प्रसन्‍न करनेके लिये कुश्ती लड़ें। ऐसा करनेसे हमपर सभी प्राणी प्रसन्‍न होंगे, क्योंकि राजा सारी प्रजाका प्रतीक है’॥ ३५॥"},{"b":32078,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.36"],"text":"तन्‍निशम्याब्रवीत् कृष्णो देशकालोचितं वचः।"},{"b":32079,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.36"],"text":"नियुद्धमात्मनोऽभीष्टं मन्यमानोऽभिनन्द्य च॥ ३६"},{"b":32080,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.37"],"text":"प्रजा भोजपतेरस्य वयं चापि वनेचराः।"},{"b":32081,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.37"],"text":"करवाम प्रियं नित्यं तन्‍नः परमनुग्रहः॥ ३७"},{"b":32082,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.38"],"text":"बाला वयं तुल्यबलैः क्रीडिष्यामो यथोचितम्।"},{"b":32083,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.38"],"text":"भवेन्‍नियुद्धं माधर्मः स्पृशेन्मल्ल सभासदः॥ ३८"},{"b":32084,"kind":"hindi_commentary","page":401,"explains":["10.43.36","10.43.37","10.43.38"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण तो चाहते ही थे कि इनसे दो-दो हाथ करें। इसलिये उन्होंने चाणूरकी बात सुनकर उसका अनुमोदन किया और देश-कालके अनुसार यह बात कही—॥ ३६॥ ‘चाणूर! हम भी इन भोजराज कंसकी वनवासी प्रजा हैं। हमें इनको प्रसन्‍न करनेका प्रयत्‍न अवश्य करना चाहिये। इसीमें हमारा कल्याण है॥ ३७॥ किन्तु चाणूर! हमलोग अभी बालक हैं। इसलिये हम अपने समान बलवाले बालकोंके साथ ही कुश्ती लड़नेका खेल करेंगे। कुश्ती समान बलवालोंके साथ ही होनी चाहिये, जिससे देखनेवाले सभासदोंको अन्यायके समर्थक होनेका पाप न लगे’॥ ३८॥"},{"b":32085,"kind":"topic_heading","page":401,"text":"चाणूर उवाच"},{"b":32086,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.39"],"text":"न बालो न किशोरस्त्वं बलश्‍च बलिनां वरः।"},{"b":32087,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.39"],"text":"लीलयेभो हतो येन सहस्रद्विपसत्त्वभृत्॥ ३९"},{"b":32088,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.40"],"text":"तस्माद् भवद‍्भ्यां बलिभिर्योद्धव्यं नानयोऽत्र वै।"},{"b":32089,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.43.40"],"text":"मयि विक्रम वार्ष्णेय बलेन सह मुष्टिकः॥ ४०"},{"b":32090,"kind":"hindi_commentary","page":401,"explains":["10.43.39","10.43.40"],"text":"चाणूरने कहा—अजी! तुम और बलराम न बालक हो और न तो किशोर। तुम दोनों बलवानोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अभी-अभी हजार हाथियोंका बल रखनेवाले कुवलयापीडको खेल-ही-खेलमें मार डाला॥ ३९॥ इसलिये तुम दोनोंको हम-जैसे बलवानोंके साथ ही लड़ना चाहिये। इसमें अन्यायकी कोई बात नहीं है। इसलिये श्रीकृष्ण! तुम मुझपर अपना जोर आजमाओ और बलरामके साथ मुष्टिक लड़ेगा॥ ४०॥"},{"b":32091,"kind":"hindi_translation","page":401,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कुवलयापीडवधो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":0,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}