{"id":"10.45","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 45","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्ण-बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुलप्रवेश"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[407,414]},"verses":[{"id":"10.45.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/1/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः।","मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम्॥ १"],"iast":["pitarāvupalabdhārthau viditvā puruṣottamaḥ|","mā bhūditi nijāṃ māyāṃ tatāna janamohinīm|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि माता-पिताको मेरे ऐश्‍वर्यका, मेरे भगवद्भावका ज्ञान हो गया है, परंतु इन्हें ऐसा ज्ञान होना ठीक नहीं, (इससे तो ये पुत्र-स्नेहका सुख नहीं पा सकेंगे—) ऐसा सोचकर उन्होंने उनपर अपनी वह योगमाया फैला दी, जो उनके स्वजनोंको मुग्ध रखकर उनकी लीलामें सहायक होती है॥ १॥"},{"id":"10.45.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/2/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः।","प्रश्रयावनतः प्रीणन्‍नम्ब तातेति सादरम्॥ २"],"iast":["uvāca pitarāvetya sāgrajaḥ sātvatarṣabhaḥ|","praśrayāvanataḥ prīṇannamba tāteti sādaram|| 2"],"meaning":"यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ अपने माँ-बापके पास जाकर आदरपूर्वक और विनयसे झुककर ‘मेरी अम्मा! मेरे पिताजी!’ इन शब्दोंसे उन्हें प्रसन्‍न करते हुए कहने लगे—॥ २॥"},{"id":"10.45.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/3/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि।","बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन् क्‍वचित्॥ ३"],"iast":["nāsmatto yuvayostāta nityotkaṇṭhitayorapi|","bālyapaugaṇḍakaiśorāḥ putrābhyāmabhavan kvacit|| 3"],"meaning":"‘पिताजी! माताजी! हम आपके पुत्र हैं और आप हमारे लिये सर्वदा उत्कण्ठित रहे हैं, फिर भी आप हमारे बाल्य, पौगण्ड और किशोर-अवस्थाका सुख हमसे नहीं पा सके॥ ३॥"},{"id":"10.45.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/4/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके।","यां बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम्॥ ४"],"iast":["na labdho daivahatayorvāso nau bhavadantike|","yāṃ bālāḥ pitṛgehasthā vindante lālitā mudam|| 4"],"meaning":"दुर्दैववश हमलोगोंको आपके पास रहनेका सौभाग्य ही नहीं मिला। इसीसे बालकोंको माता-पिताके घरमें रहकर जो लाड़-प्यारका सुख मिलता है, वह हमें भी नहीं मिल सका॥ ४॥"},{"id":"10.45.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/5/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः।","न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा॥ ५"],"iast":["sarvārthasambhavo deho janitaḥ poṣito yataḥ|","na tayoryāti nirveśaṃ pitrormartyaḥ śatāyuṣā|| 5"],"meaning":"पिता और माता ही इस शरीरको जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं। तब कहीं जाकर यह शरीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षकी प्राप्तिका साधन बनता है। यदि कोई मनुष्य सौ वर्षतक जीकर माता और पिताकी सेवा करता रहे, तब भी वह उनके उपकारसे उऋण नहीं हो सकता॥ ५॥"},{"id":"10.45.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/6/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च।","वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥ ६"],"iast":["yastayorātmajaḥ kalpa ātmanā ca dhanena ca|","vṛttiṃ na dadyāttaṃ pretya svamāṃsaṃ khādayanti hi|| 6"],"meaning":"जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं॥ ६॥"},{"id":"10.45.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/7/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्।","गुरुं विप्रं प्रपन्‍नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः॥ ७"],"iast":["mātaraṃ pitaraṃ vṛddhaṃ bhāryāṃ sādhvīṃ sutaṃ śiśum|","guruṃ vipraṃ prapannaṃ ca kalpo'bibhracchvasan mṛtaḥ|| 7"],"meaning":"जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता-पिता, सती पत्‍नी, बालक, सन्तान, गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण-पोषण नहीं करता—वह जीता हुआ भी मुर्देके समान ही है!॥ ७॥"},{"id":"10.45.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/8/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्‍नावकल्पयोः कंसान्‍नित्यमुद्वि‌ग्‍नचेतसोः।","मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः॥ ८"],"iast":["tannāvakalpayoḥ kaṃsānnityamudvignacetasoḥ|","moghamete vyatikrāntā divasā vāmanarcatoḥ|| 8"],"meaning":"पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये। क्योंकि कंसके भयसे सदा उद्वि‌ग्‍नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे॥ ८॥"},{"id":"10.45.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/9/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः।","अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम्॥ ९"],"iast":["tat kṣantumarhathastāta mātarnau paratantrayoḥ|","akurvatorvāṃ śuśrūṣāṃ kliṣṭayordurhṛdā bhṛśam|| 9"],"meaning":"मेरी माँ और मेरे पिताजी! आप दोनों हमें क्षमा करें। हाय! दुष्ट कंसने आपको इतने-इतने कष्ट दिये, परंतु हम परतन्त्र रहनेके कारण आपकी कोई सेवा-शुश्रूषा न कर सके’॥ ९॥"},{"id":"10.45.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/10/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति मायामनुष्यस्य हरेर्विश्‍वात्मनो गिरा।","मोहितावङ्कमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम्॥ १०"],"iast":["iti māyāmanuṣyasya harerviśvātmano girā|","mohitāvaṅkamāropya pariṣvajyāpaturmudam|| 10"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपनी लीलासे मनुष्य बने हुए विश्‍वात्मा श्रीहरिकी इस वाणीसे मोहित हो देवकी-वसुदेवने उन्हें गोदमें उठा लिया और हृदयसे चिपकाकर परमानन्द प्राप्त किया॥ १०॥"},{"id":"10.45.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/11/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सिंचन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ।","न किंचिदूचतू राजन् बाष्पकण्ठौ विमोहितौ॥ ११"],"iast":["siṃcantāvaśrudhārābhiḥ snehapāśena cāvṛtau|","na kiṃcidūcatū rājan bāṣpakaṇṭhau vimohitau|| 11"],"meaning":"राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे। यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके॥ ११॥"},{"id":"10.45.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/12/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमाश्‍वास्य पितरौ भगवान् देवकीसुतः।","मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्‍नृपम्॥ १२"],"iast":["evamāśvāsya pitarau bhagavān devakīsutaḥ|","mātāmahaṃ tūgrasenaṃ yadūnāmakaronnṛpam|| 12"],"meaning":"देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार अपने माता-पिताको सान्त्वना देकर अपने नाना उग्रसेनको यदुवंशियोंका राजा बना दिया॥ १२॥"},{"id":"10.45.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/13/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आह चास्मान् महाराज प्रजाश्‍चाज्ञप्तुमर्हसि।","ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने॥ १३"],"iast":["āha cāsmān mahārāja prajāścājñaptumarhasi|","yayātiśāpād yadubhirnāsitavyaṃ nṛpāsane|| 13"],"meaning":"और उनसे कहा—‘महाराज! हम आपकी प्रजा हैं। आप हमलोगोंपर शासन कीजिये। राजा ययातिका शाप होनेके कारण यदुवंशी राजसिंहासनपर नहीं बैठ सकते; (परंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है, इसलिये आपको कोई दोष न होगा)॥ १३॥"},{"id":"10.45.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/14/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः।","बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः॥ १४"],"iast":["mayi bhṛtya upāsīne bhavato vibudhādayaḥ|","baliṃ harantyavanatāḥ kimutānye narādhipāḥ|| 14"],"meaning":"जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥"},{"id":"10.45.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/15/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वान् स्वाञ्ज्ञातिसंबन्धान् दिग्भ्यः कंसभयाकुलान्।","यदुवृष्ण्यन्धकमधुदाशार्हकुकुरादिकान् ॥ १५"],"iast":["sarvān svāñjñātisaṃbandhān digbhyaḥ kaṃsabhayākulān|","yaduvṛṣṇyandhakamadhudāśārhakukurādikān || 15"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे विश्‍वके विधाता हैं। उन्होंने, जो कंसके भयसे व्याकुल होकर इधर-उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशोंमें उत्पन्‍न समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर बुलवाया। उन्हें घरसे बाहर रहनेमें बड़ा क्लेश उठाना पड़ा था। भगवान्‌ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें खूब धन-सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने-अपने घरोंमें बसा दिया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.45.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/16/","page":409,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सभाजितान् समाश्‍वास्य विदेशावासकर्शितान्।","न्यवासयत् स्वगेहेषु वित्तैः संतर्प्य विश्‍वकृत्॥ १६"],"iast":["sabhājitān samāśvāsya videśāvāsakarśitān|","nyavāsayat svageheṣu vittaiḥ saṃtarpya viśvakṛt|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे विश्‍वके विधाता हैं। उन्होंने, जो कंसके भयसे व्याकुल होकर इधर-उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशोंमें उत्पन्‍न समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर बुलवाया। उन्हें घरसे बाहर रहनेमें बड़ा क्लेश उठाना पड़ा था। भगवान्‌ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें खूब धन-सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने-अपने घरोंमें बसा दिया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.45.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/17/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णसंकर्षणभुजैर्गुप्ता लब्धमनोरथाः।","गृहेषु रेमिरे सिद्धाः कृष्णरामगतज्वराः॥ १७"],"iast":["kṛṣṇasaṃkarṣaṇabhujairguptā labdhamanorathāḥ|","gṛheṣu remire siddhāḥ kṛṣṇarāmagatajvarāḥ|| 17"],"meaning":"अब सारे-के-सारे यदुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीके बाहुबलसे सुरक्षित थे। उनकी कृपासे उन्हें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था। उनके सारे मनोरथ सफल हो गये थे। वे कृतार्थ हो गये थे। अब वे अपने-अपने घरोंमें आनन्दसे विहार करने लगे॥ १७॥"},{"id":"10.45.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/18/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वीक्षन्तोऽहरहः प्रीता मुकुन्दवदनाम्बुजम्।","नित्यं प्रमुदितं श्रीमत् सदयस्मितवीक्षणम्॥ १८"],"iast":["vīkṣanto'harahaḥ prītā mukundavadanāmbujam|","nityaṃ pramuditaṃ śrīmat sadayasmitavīkṣaṇam|| 18"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णका वदन आनन्दका सदन है। वह नित्य प्रफुल्लित, कभी न कुम्हलानेवाला कमल है। उसका सौन्दर्य अपार है। सदय हास और चितवन उसपर सदा नाचती रहती है। यदुवंशी दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके आनन्दम‌ग्‍न रहते॥ १८॥"},{"id":"10.45.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/19/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र प्रवयसोऽप्यासन् युवानोऽतिबलौजसः।","पिबन्तोऽक्षैर्मुकुन्दस्य मुखाम्बुजसुधां मुहुः॥ १९"],"iast":["tatra pravayaso'pyāsan yuvāno'tibalaujasaḥ|","pibanto'kṣairmukundasya mukhāmbujasudhāṃ muhuḥ|| 19"],"meaning":"मथुराके वृद्ध पुरुष भी युवकोंके समान अत्यन्त बलवान् और उत्साही हो गये थे; क्योंकि वे अपने नेत्रोंके दोनोंसे बारंबार भगवान्‌के मुखारविन्दका अमृतमय मकरन्द-रस पान करते रहते थे॥ १९॥"},{"id":"10.45.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/20/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ नन्दं समासाद्य भगवान् देवकीसुतः।","संकर्षणश्‍च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः॥ २०"],"iast":["atha nandaṃ samāsādya bhagavān devakīsutaḥ|","saṃkarṣaṇaśca rājendra pariṣvajyedamūcatuḥ|| 20"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे—॥ २०॥"},{"id":"10.45.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/21/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितौ लालितौ भृशम्।","पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोऽपि हि॥ २१"],"iast":["pitaryuvābhyāṃ snigdhābhyāṃ poṣitau lālitau bhṛśam|","pitrorabhyadhikā prītirātmajeṣvātmano'pi hi|| 21"],"meaning":"‘पिताजी! आपने और माँ यशोदाने बड़े स्नेह और दुलारसे हमारा लालन-पालन किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते हैं॥ २१॥"},{"id":"10.45.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/22/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत्।","शिशून् बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पैः पोषरक्षणे॥ २२"],"iast":["sa pitā sā ca jananī yau puṣṇītāṃ svaputravat|","śiśūn bandhubhirutsṛṣṭānakalpaiḥ poṣarakṣaṇe|| 22"],"meaning":"जिन्हें पालन-पोषण न कर सकनेके कारण स्वजन-सम्बन्धियोंने त्याग दिया है, उन बालकोंको जो लोग अपने पुत्रके समान लाड़-प्यारसे पालते हैं, वे ही वास्तवमें उनके माँ-बाप हैं॥ २२॥"},{"id":"10.45.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/23/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान्।","ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥ २३"],"iast":["yāta yūyaṃ vrajaṃ tāta vayaṃ ca snehaduḥkhitān|","jñātīn vo draṣṭumeṣyāmo vidhāya suhṛdāṃ sukham|| 23"],"meaning":"पिताजी! अब आपलोग व्रजमें जाइये। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य-स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा। यहाँके सुहृद्-सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे’॥ २३॥"},{"id":"10.45.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/24/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सान्त्वय्य भगवान् नन्दं सव्रजमच्युतः।","वासोऽलंकारकुप्याद्यैरर्हयामास सादरम्॥ २४"],"iast":["evaṃ sāntvayya bhagavān nandaṃ savrajamacyutaḥ|","vāso'laṃkārakupyādyairarhayāmāsa sādaram|| 24"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियोंको इस प्रकार समझा-बुझाकर बड़े आदरके साथ वस्त्र, आभूषण और अनेक धातुओंके बने बरतन आदि देकर उनका सत्कार किया॥ २४॥"},{"id":"10.45.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/25/","page":410,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः।","पूरयन्‍नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ॥ २५"],"iast":["ityuktastau pariṣvajya nandaḥ praṇayavihvalaḥ|","pūrayannaśrubhirnetre saha gopairvrajaṃ yayau|| 25"],"meaning":"भगवान्‌की बात सुनकर नन्दबाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया॥ २५॥"},{"id":"10.45.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/26/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ शूरसुतो राजन् पुत्रयोः समकारयत्।","पुरोधसा ब्राह्मणैश्‍च यथावद् द्विजसंस्कृतिम्॥ २६"],"iast":["atha śūrasuto rājan putrayoḥ samakārayat|","purodhasā brāhmaṇaiśca yathāvad dvijasaṃskṛtim|| 26"],"meaning":"हे राजन्! इसके बाद वसुदेवजीने अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणोंसे दोनों पुत्रोंका विधिपूर्वक द्विजाति-समुचित यज्ञोपवीत संस्कार करवाया॥ २६॥"},{"id":"10.45.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/27/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेभ्योऽदाद् दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलंकृताः।","स्वलंकृतेभ्यः संपूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः॥ २७"],"iast":["tebhyo'dād dakṣiṇā gāvo rukmamālāḥ svalaṃkṛtāḥ|","svalaṃkṛtebhyaḥ saṃpūjya savatsāḥ kṣaumamālinīḥ|| 27"],"meaning":"उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं॥ २७॥"},{"id":"10.45.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/28/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["याः कृष्णरामजन्मर्क्षे मनोदत्ता महामतिः।","ताश्‍चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हृताः॥ २८"],"iast":["yāḥ kṛṣṇarāmajanmarkṣe manodattā mahāmatiḥ|","tāścādadādanusmṛtya kaṃsenādharmato hṛtāḥ|| 28"],"meaning":"महामति वसुदेवजीने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके जन्म-नक्षत्रमें जितनी गौएँ मन-ही-मन संकल्प करके दी थीं, उन्हें पहले कंसने अन्यायसे छीन लिया था। अब उनका स्मरण करके उन्होंने ब्राह्मणोंको वे फिरसे दीं॥ २८॥"},{"id":"10.45.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/29/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततश्‍च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ।","गर्गाद् यदुकुलाचार्याद् गायत्रं व्रतमास्थितौ॥ २९"],"iast":["tataśca labdhasaṃskārau dvijatvaṃ prāpya suvratau|","gargād yadukulācāryād gāyatraṃ vratamāsthitau|| 29"],"meaning":"इस प्रकार यदुवंशके आचार्य गर्गजीसे संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान् श्रीकृष्ण द्विजत्वको प्राप्त हुए। उनका ब्रह्मचर्यव्रत अखण्ड तो था ही, अब उन्होंने गायत्रीपूर्वक अध्ययन करनेके लिये उसे नियमतः स्वीकार किया॥ २९॥"},{"id":"10.45.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/30/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्‍वरौ।","नान्यसिद्धामलज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः॥ ३०"],"iast":["prabhavau sarvavidyānāṃ sarvajñau jagadīśvarau|","nānyasiddhāmalajñānaṃ gūhamānau narehitaiḥ|| 30"],"meaning":"श्रीकृष्ण और बलराम जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। सर्वज्ञ हैं। सभी विद्याएँ उन्हींसे निकली हैं। उनका निर्मल ज्ञान स्वतःसिद्ध है। फिर भी उन्होंने मनुष्यकी-सी लीला करके उसे छिपा रखा था॥ ३०॥"},{"id":"10.45.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/31/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः।","काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवासिनम्॥ ३१"],"iast":["atho gurukule vāsamicchantāvupajagmatuḥ|","kāśyaṃ sāndīpaniṃ nāma hyavantīpuravāsinam|| 31"],"meaning":"अब वे दोनों गुरुकुलमें निवास करनेकी इच्छासे काश्यपगोत्री सान्दीपनि मुनिके पास गये, जो अवन्तीपुर (उज्जैन) में रहते थे॥ ३१॥"},{"id":"10.45.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/32/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम्।","ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ॥ ३२"],"iast":["yathopasādya tau dāntau gurau vṛttimaninditām|","grāhayantāvupetau sma bhaktyā devamivādṛtau|| 32"],"meaning":"वे दोनों भाई विधिपूर्वक गुरुजीके पास रहने लगे। उस समय वे बड़े ही सुसंयत, अपनी चेष्टाओंको सर्वथा नियमित रखे हुए थे। गुरुजी तो उनका आदर करते ही थे, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी भी गुरुकी उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिये, इसका आदर्श लोगोंके सामने रखते हुए बड़ी भक्तिसे इष्टदेवके समान उनकी सेवा करने लगे॥ ३२॥"},{"id":"10.45.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/33/","page":411,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः।","प्रोवाच वेदानखिलान् सांगोपनिषदो गुरुः॥ ३३"],"iast":["tayordvijavarastuṣṭaḥ śuddhabhāvānuvṛttibhiḥ|","provāca vedānakhilān sāṃgopaniṣado guruḥ|| 33"],"meaning":"गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी शुद्धभावसे युक्त सेवासे बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने दोनों भाइयोंको छहों अंग और उपनिषदोंके सहित सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा दी॥ ३३॥"},{"id":"10.45.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/34/","page":412,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा।","तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम्॥ ३४"],"iast":["sarahasyaṃ dhanurvedaṃ dharmān nyāyapathāṃstathā|","tathā cānvīkṣikīṃ vidyāṃ rājanītiṃ ca ṣaḍvidhām|| 34"],"meaning":"इनके सिवा मन्त्र और देवताओंके ज्ञानके साथ धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा आदि, वेदोंका तात्पर्य बतलानेवाले शास्त्र, तर्कविद्या (न्यायशास्त्र) आदिकी भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय—इन छः भेदोंसे युक्त राजनीतिका भी अध्ययन कराया॥ ३४॥"},{"id":"10.45.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/35/","page":412,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ।","सकृन्‍निगदमात्रेण तौ संजगृहतुर्नृप॥ ३५"],"iast":["sarvaṃ naravaraśreṣṭhau sarvavidyāpravartakau|","sakṛnnigadamātreṇa tau saṃjagṛhaturnṛpa|| 35"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओंके प्रवर्तक हैं। इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्यका-सा व्यवहार करते हुए ही वे अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने गुरुजीके केवल एक बार कहनेमात्रसे सारी विद्याएँ सीख लीं॥ ३५॥"},{"id":"10.45.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/36/","page":412,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहोरात्रैश्‍चतुःषष्ट्या संयत्तौ तावतीः कलाः।","गुरुदक्षिणयाऽऽचार्यं छन्दयामासतुर्नृप॥ ३६"],"iast":["ahorātraiścatuḥṣaṣṭyā saṃyattau tāvatīḥ kalāḥ|","gurudakṣiṇayā''cāryaṃ chandayāmāsaturnṛpa|| 36"],"meaning":"केवल चौंसठ दिन-रातमें ही संयमीशिरोमणि दोनों भाइयोंने चौंसठों कलाओंका ज्ञान प्राप्त कर लिया। इस प्रकार अध्ययन समाप्त होनेपर उन्होंने सान्दीपनि मुनिसे प्रार्थना की कि ‘आपकी जो इच्छा हो, गुरु-दक्षिणा माँग लें’॥ ३६॥"},{"id":"10.45.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/37/","page":412,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्विजस्तयोस्तं महिमानमद्भुतं","संलक्ष्य राजन्‍नतिमानुषीं मतिम्।","सम्मन्त्र्य पत्‍न्या स महार्णवे मृतं","बालं प्रभासे वरयाम्बभूव ह॥ ३७"],"iast":["dvijastayostaṃ mahimānamadbhutaṃ","saṃlakṣya rājannatimānuṣīṃ matim|","sammantrya patnyā sa mahārṇave mṛtaṃ","bālaṃ prabhāse varayāmbabhūva ha|| 37"],"meaning":"महाराज! सान्दीपनि मुनिने उनकी अद्भुत महिमा और अलौकिक बुद्धिका अनुभव कर लिया था। इसलिये उन्होंने अपनी पत्‍नीसे सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘प्रभासक्षेत्रमें हमारा बालक समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे तुमलोग ला दो’॥ ३७॥"},{"id":"10.45.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/38/","page":413,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथेत्यथारुह्य महारथौ रथं","प्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ।","वेलामुपव्रज्य निषीदतुः क्षणं","सिन्धुर्विदित्वार्हणमाहरत्तयोः ॥ ३८"],"iast":["tathetyathāruhya mahārathau rathaṃ","prabhāsamāsādya durantavikramau|","velāmupavrajya niṣīdatuḥ kṣaṇaṃ","sindhurviditvārhaṇamāharattayoḥ || 38"],"meaning":"बलरामजी और श्रीकृष्णका पराक्रम अनन्त था। दोनों ही महारथी थे। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर गुरुजीकी आज्ञा स्वीकार की और रथपर सवार होकर प्रभासक्षेत्रमें गये। वे समुद्रतटपर जाकर क्षणभर बैठे रहे। उस समय यह जानकर कि ये साक्षात् परमेश्‍वर हैं, अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्री लेकर समुद्र उनके सामने उपस्थित हुआ॥ ३८॥"},{"id":"10.45.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/39/","page":413,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमाह भगवानाशु गुरुपुत्रः प्रदीयताम्।","योऽसाविह त्वया ग्रस्तो बालको महतोर्मिणा॥ ३९"],"iast":["tamāha bhagavānāśu guruputraḥ pradīyatām|","yo'sāviha tvayā grasto bālako mahatormiṇā|| 39"],"meaning":"भगवान्‌ने समुद्रसे कहा—‘समुद्र! तुम यहाँ अपनी बड़ी-बड़ी तरंगोंसे हमारे जिस गुरुपुत्रको बहा ले गये थे, उसे लाकर शीघ्र हमें दो’॥ ३९॥"},{"id":"10.45.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/40/","page":413,"speaker":"समुद्र उवाच","sanskrit":["नैवाहार्षमहं देव दैत्यः पंचजनो महान्।","अन्तर्जलचरः कृष्ण शंखरूपधरोऽसुरः॥ ४०"],"iast":["naivāhārṣamahaṃ deva daityaḥ paṃcajano mahān|","antarjalacaraḥ kṛṣṇa śaṃkharūpadharo'suraḥ|| 40"],"meaning":"मनुष्यवेषधारी समुद्रने कहा—‘देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालकको नहीं लिया है। मेरे जलमें पंचजन नामका एक बड़ा भारी दैत्य जातिका असुर शंखके रूपमें रहता है। अवश्य ही उसीने वह बालक चुरा लिया होगा’॥ ४०॥"},{"id":"10.45.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/41/","page":413,"speaker":"समुद्र उवाच","sanskrit":["आस्ते तेनाहृतो नूनं तच्छ्रुत्वा सत्वरं प्रभुः।","जलमाविश्य तं हत्वा नापश्यदुदरेऽर्भकम्॥ ४१"],"iast":["āste tenāhṛto nūnaṃ tacchrutvā satvaraṃ prabhuḥ|","jalamāviśya taṃ hatvā nāpaśyadudare'rbhakam|| 41"],"meaning":"समुद्रकी बात सुनकर भगवान् तुरंत ही जलमें जा घुसे और शंखासुरको मार डाला। परन्तु वह बालक उसके पेटमें नहीं मिला॥ ४१॥"},{"id":"10.45.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/42/","page":413,"speaker":"समुद्र उवाच","sanskrit":["तदंगप्रभवं शंखमादाय रथमागमत्।","ततः संयमनीं नाम यमस्य दयितां पुरीम्॥ ४२"],"iast":["tadaṃgaprabhavaṃ śaṃkhamādāya rathamāgamat|","tataḥ saṃyamanīṃ nāma yamasya dayitāṃ purīm|| 42"],"meaning":"तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥","meaning_covers":[42,44]},{"id":"10.45.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/43/","page":413,"speaker":"समुद्र उवाच","sanskrit":["गत्वा जनार्दनः शंखं प्रदध्मौ सहलायुधः।","शंखनिर्ह्रादमाकर्ण्य प्रजासंयमनो यमः॥ ४३"],"iast":["gatvā janārdanaḥ śaṃkhaṃ pradadhmau sahalāyudhaḥ|","śaṃkhanirhrādamākarṇya prajāsaṃyamano yamaḥ|| 43"],"meaning":"तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥","meaning_covers":[42,44]},{"id":"10.45.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/44/","page":413,"speaker":"समुद्र उवाच","sanskrit":["तयोः सपर्यां महतीं चक्रे भक्त्युपबृंहिताम्।","उवाचावनतः कृष्णं सर्वभूताशयालयम्।","लीलामनुष्य हे विष्णो युवयोः करवाम किम्॥ ४४"],"iast":["tayoḥ saparyāṃ mahatīṃ cakre bhaktyupabṛṃhitām|","uvācāvanataḥ kṛṣṇaṃ sarvabhūtāśayālayam|","līlāmanuṣya he viṣṇo yuvayoḥ karavāma kim|| 44"],"meaning":"तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥","meaning_covers":[42,44]},{"id":"10.45.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/45/","page":413,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गुरुपुत्रमिहानीतं निजकर्मनिबन्धनम्।","आनयस्व महाराज मच्छासनपुरस्कृतः॥ ४५"],"iast":["guruputramihānītaṃ nijakarmanibandhanam|","ānayasva mahārāja macchāsanapuraskṛtaḥ|| 45"],"meaning":"श्रीभगवान्‌ने कहा—‘यमराज! यहाँ अपने कर्मबन्धनके अनुसार मेरा गुरुपुत्र लाया गया है। तुम मेरी आज्ञा स्वीकार करो और उसके कर्मपर ध्यान न देकर उसे मेरे पास ले आओ॥ ४५॥"},{"id":"10.45.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/46/","page":413,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तथेति तेनोपानीतं गुरुपुत्रं यदूत्तमौ।","दत्त्वा स्वगुरवे भूयो वृणीष्वेति तमूचतुः॥ ४६"],"iast":["tatheti tenopānītaṃ guruputraṃ yadūttamau|","dattvā svagurave bhūyo vṛṇīṣveti tamūcatuḥ|| 46"],"meaning":"यमराजने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान्‌का आदेश स्वीकार किया और उनका गुरुपुत्र ला दिया। तब यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी उस बालकको लेकर उज्जैन लौट आये और उसे अपने गुरुदेवको सौंपकर कहा कि ‘आप और जो कुछ चाहें, माँग लें’॥ ४६॥"},{"id":"10.45.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/47/","page":414,"speaker":"गुरुरुवाच","sanskrit":["सम्यक् संपादितो वत्स भवद‍्भ्यां गुरुनिष्क्रयः।","को नु युष्मद्विधगुरोः कामानामवशिष्यते॥ ४७"],"iast":["samyak saṃpādito vatsa bhavadbhyāṃ guruniṣkrayaḥ|","ko nu yuṣmadvidhaguroḥ kāmānāmavaśiṣyate|| 47"],"meaning":"गुरुजीने कहा—‘बेटा! तुम दोनोंने भलीभाँति गुरुदक्षिणा दी। अब और क्या चाहिये? जो तुम्हारे जैसे पुरुषोत्तमोंका गुरु है, उसका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?॥ ४७॥"},{"id":"10.45.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/48/","page":414,"speaker":"गुरुरुवाच","sanskrit":["गच्छतं स्वगृहं वीरौ कीर्तिर्वामस्तु पावनी।","छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च॥ ४८"],"iast":["gacchataṃ svagṛhaṃ vīrau kīrtirvāmastu pāvanī|","chandāṃsyayātayāmāni bhavantviha paratra ca|| 48"],"meaning":"वीरो! अब तुम दोनों अपने घर जाओ। तुम्हें लोकोंको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त हो। तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या इस लोक और परलोकमें सदा नवीन बनी रहे, कभी विस्मृत न हो’॥ ४८॥"},{"id":"10.45.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/49/","page":414,"speaker":"गुरुरुवाच","sanskrit":["गुरुणैवमनुज्ञातौ रथेनानिलरंहसा।","आयातौ स्वपुरं तात पर्जन्यनिनदेन वै॥ ४९"],"iast":["guruṇaivamanujñātau rathenānilaraṃhasā|","āyātau svapuraṃ tāta parjanyaninadena vai|| 49"],"meaning":"बेटा परीक्षित्! फिर गुरुजीसे आज्ञा लेकर वायुके समान वेग और मेघके समान शब्दवाले रथपर सवार होकर दोनों भाई मथुरा लौट आये॥ ४९॥"},{"id":"10.45.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/50/","page":414,"speaker":"गुरुरुवाच","sanskrit":["समनन्दन् प्रजाः सर्वा दृष्ट्वा रामजनार्दनौ।","अपश्यन्त्यो बह्वहानि नष्टलब्धधना इव॥ ५०"],"iast":["samanandan prajāḥ sarvā dṛṣṭvā rāmajanārdanau|","apaśyantyo bahvahāni naṣṭalabdhadhanā iva|| 50"],"meaning":"मथुराकी प्रजा बहुत दिनोंतक श्रीकृष्ण और बलरामको न देखनेसे अत्यन्त दुःखी हो रही थी। अब उन्हें आया हुआ देख सब-के-सब परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये, मानो खोया हुआ धन मिल गया हो॥ ५०॥"}],"text":[{"b":32233,"kind":"adhyaya_heading","page":408,"text":"अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":32234,"kind":"topic_heading","page":408,"text":"श्रीकृष्ण-बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुलप्रवेश"},{"b":32235,"kind":"topic_heading","page":407,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32236,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.1"],"text":"पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः।"},{"b":32237,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.1"],"text":"मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम्॥ १"},{"b":32238,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.2"],"text":"उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः।"},{"b":32239,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.2"],"text":"प्रश्रयावनतः प्रीणन्‍नम्ब तातेति सादरम्॥ २"},{"b":32240,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.3"],"text":"नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि।"},{"b":32241,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.3"],"text":"बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन् क्‍वचित्॥ ३"},{"b":32242,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.4"],"text":"न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके।"},{"b":32243,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.4"],"text":"यां बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम्॥ ४"},{"b":32244,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.5"],"text":"सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः।"},{"b":32245,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.5"],"text":"न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा॥ ५"},{"b":32246,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.6"],"text":"यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च।"},{"b":32247,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.45.6"],"text":"वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥ ६"},{"b":32248,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.7"],"text":"मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्।"},{"b":32249,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.7"],"text":"गुरुं विप्रं प्रपन्‍नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः॥ ७"},{"b":32250,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.8"],"text":"तन्‍नावकल्पयोः कंसान्‍नित्यमुद्वि‌ग्‍नचेतसोः।"},{"b":32251,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.8"],"text":"मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः॥ ८"},{"b":32252,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.9"],"text":"तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः।"},{"b":32253,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.9"],"text":"अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम्॥ ९"},{"b":32254,"kind":"hindi_commentary","page":408,"explains":["10.45.1","10.45.2","10.45.3","10.45.4","10.45.5","10.45.6","10.45.7","10.45.8","10.45.9"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि माता-पिताको मेरे ऐश्‍वर्यका, मेरे भगवद्भावका ज्ञान हो गया है, परंतु इन्हें ऐसा ज्ञान होना ठीक नहीं, (इससे तो ये पुत्र-स्नेहका सुख नहीं पा सकेंगे—) ऐसा सोचकर उन्होंने उनपर अपनी वह योगमाया फैला दी, जो उनके स्वजनोंको मुग्ध रखकर उनकी लीलामें सहायक होती है॥ १॥ यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ अपने माँ-बापके पास जाकर आदरपूर्वक और विनयसे झुककर ‘मेरी अम्मा! मेरे पिताजी!’ इन शब्दोंसे उन्हें प्रसन्‍न करते हुए कहने लगे—॥ २॥ ‘पिताजी! माताजी! हम आपके पुत्र हैं और आप हमारे लिये सर्वदा उत्कण्ठित रहे हैं, फिर भी आप हमारे बाल्य, पौगण्ड और किशोर-अवस्थाका सुख हमसे नहीं पा सके॥ ३॥ दुर्दैववश हमलोगोंको आपके पास रहनेका सौभाग्य ही नहीं मिला। इसीसे बालकोंको माता-पिताके घरमें रहकर जो लाड़-प्यारका सुख मिलता है, वह हमें भी नहीं मिल सका॥ ४॥ पिता और माता ही इस शरीरको जन्म देते हैं और इसका लालन-पालन करते हैं। तब कहीं जाकर यह शरीर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षकी प्राप्तिका साधन बनता है। यदि कोई मनुष्य सौ वर्षतक जीकर माता और पिताकी सेवा करता रहे, तब भी वह उनके उपकारसे उऋण नहीं हो सकता॥ ५॥ जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं॥ ६॥ जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता-पिता, सती पत्‍नी, बालक, सन्तान, गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण-पोषण नहीं करता—वह जीता हुआ भी मुर्देके समान ही है!॥ ७॥ पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये। क्योंकि कंसके भयसे सदा उद्वि‌ग्‍नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे॥ ८॥ मेरी माँ और मेरे पिताजी! आप दोनों हमें क्षमा करें। हाय! दुष्ट कंसने आपको इतने-इतने कष्ट दिये, परंतु हम परतन्त्र रहनेके कारण आपकी कोई सेवा-शुश्रूषा न कर सके’॥ ९॥"},{"b":32255,"kind":"topic_heading","page":408,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32256,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.10"],"text":"इति मायामनुष्यस्य हरेर्विश्‍वात्मनो गिरा।"},{"b":32257,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.10"],"text":"मोहितावङ्कमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम्॥ १०"},{"b":32258,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.11"],"text":"सिंचन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ।"},{"b":32259,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.11"],"text":"न किंचिदूचतू राजन् बाष्पकण्ठौ विमोहितौ॥ ११"},{"b":32260,"kind":"hindi_commentary","page":409,"explains":["10.45.10","10.45.11"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपनी लीलासे मनुष्य बने हुए विश्‍वात्मा श्रीहरिकी इस वाणीसे मोहित हो देवकी-वसुदेवने उन्हें गोदमें उठा लिया और हृदयसे चिपकाकर परमानन्द प्राप्त किया॥ १०॥ राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे। यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके॥ ११॥"},{"b":32261,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.12"],"text":"एवमाश्‍वास्य पितरौ भगवान् देवकीसुतः।"},{"b":32262,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.12"],"text":"मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्‍नृपम्॥ १२"},{"b":32263,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.13"],"text":"आह चास्मान् महाराज प्रजाश्‍चाज्ञप्तुमर्हसि।"},{"b":32264,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.13"],"text":"ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने॥ १३"},{"b":32265,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.14"],"text":"मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः।"},{"b":32266,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.14"],"text":"बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः॥ १४"},{"b":32267,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.15"],"text":"सर्वान् स्वाञ्ज्ञातिसंबन्धान् दिग्भ्यः कंसभयाकुलान्।"},{"b":32268,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.15"],"text":"यदुवृष्ण्यन्धकमधुदाशार्हकुकुरादिकान् ॥ १५"},{"b":32269,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.16"],"text":"सभाजितान् समाश्‍वास्य विदेशावासकर्शितान्।"},{"b":32270,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["10.45.16"],"text":"न्यवासयत् स्वगेहेषु वित्तैः संतर्प्य विश्‍वकृत्॥ १६"},{"b":32271,"kind":"hindi_commentary","page":409,"explains":["10.45.12","10.45.13","10.45.14","10.45.15","10.45.16"],"text":"देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार अपने माता-पिताको सान्त्वना देकर अपने नाना उग्रसेनको यदुवंशियोंका राजा बना दिया॥ १२॥ और उनसे कहा—‘महाराज! हम आपकी प्रजा हैं। आप हमलोगोंपर शासन कीजिये। राजा ययातिका शाप होनेके कारण यदुवंशी राजसिंहासनपर नहीं बैठ सकते; (परंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है, इसलिये आपको कोई दोष न होगा)॥ १३॥ जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे विश्‍वके विधाता हैं। उन्होंने, जो कंसके भयसे व्याकुल होकर इधर-उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशोंमें उत्पन्‍न समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर बुलवाया। उन्हें घरसे बाहर रहनेमें बड़ा क्लेश उठाना पड़ा था। भगवान्‌ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें खूब धन-सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने-अपने घरोंमें बसा दिया॥ १५-१६॥"},{"b":32272,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.17"],"text":"कृष्णसंकर्षणभुजैर्गुप्ता लब्धमनोरथाः।"},{"b":32273,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.17"],"text":"गृहेषु रेमिरे सिद्धाः कृष्णरामगतज्वराः॥ १७"},{"b":32274,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.18"],"text":"वीक्षन्तोऽहरहः प्रीता मुकुन्दवदनाम्बुजम्।"},{"b":32275,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.18"],"text":"नित्यं प्रमुदितं श्रीमत् सदयस्मितवीक्षणम्॥ १८"},{"b":32276,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.19"],"text":"तत्र प्रवयसोऽप्यासन् युवानोऽतिबलौजसः।"},{"b":32277,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.19"],"text":"पिबन्तोऽक्षैर्मुकुन्दस्य मुखाम्बुजसुधां मुहुः॥ १९"},{"b":32278,"kind":"hindi_commentary","page":410,"explains":["10.45.17","10.45.18","10.45.19"],"text":"अब सारे-के-सारे यदुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीके बाहुबलसे सुरक्षित थे। उनकी कृपासे उन्हें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था। उनके सारे मनोरथ सफल हो गये थे। वे कृतार्थ हो गये थे। अब वे अपने-अपने घरोंमें आनन्दसे विहार करने लगे॥ १७॥ भगवान् श्रीकृष्णका वदन आनन्दका सदन है। वह नित्य प्रफुल्लित, कभी न कुम्हलानेवाला कमल है। उसका सौन्दर्य अपार है। सदय हास और चितवन उसपर सदा नाचती रहती है। यदुवंशी दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके आनन्दम‌ग्‍न रहते॥ १८॥ मथुराके वृद्ध पुरुष भी युवकोंके समान अत्यन्त बलवान् और उत्साही हो गये थे; क्योंकि वे अपने नेत्रोंके दोनोंसे बारंबार भगवान्‌के मुखारविन्दका अमृतमय मकरन्द-रस पान करते रहते थे॥ १९॥"},{"b":32279,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.20"],"text":"अथ नन्दं समासाद्य भगवान् देवकीसुतः।"},{"b":32280,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.20"],"text":"संकर्षणश्‍च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः॥ २०"},{"b":32281,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.21"],"text":"पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितौ लालितौ भृशम्।"},{"b":32282,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.21"],"text":"पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोऽपि हि॥ २१"},{"b":32283,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.22"],"text":"स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत्।"},{"b":32284,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.22"],"text":"शिशून् बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पैः पोषरक्षणे॥ २२"},{"b":32285,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.23"],"text":"यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान्।"},{"b":32286,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.23"],"text":"ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥ २३"},{"b":32287,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.24"],"text":"एवं सान्त्वय्य भगवान् नन्दं सव्रजमच्युतः।"},{"b":32288,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.24"],"text":"वासोऽलंकारकुप्याद्यैरर्हयामास सादरम्॥ २४"},{"b":32289,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.25"],"text":"इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः।"},{"b":32290,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["10.45.25"],"text":"पूरयन्‍नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ॥ २५"},{"b":32291,"kind":"hindi_commentary","page":410,"explains":["10.45.20","10.45.21","10.45.22","10.45.23","10.45.24","10.45.25"],"text":"प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे—॥ २०॥ ‘पिताजी! आपने और माँ यशोदाने बड़े स्नेह और दुलारसे हमारा लालन-पालन किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते हैं॥ २१॥ जिन्हें पालन-पोषण न कर सकनेके कारण स्वजन-सम्बन्धियोंने त्याग दिया है, उन बालकोंको जो लोग अपने पुत्रके समान लाड़-प्यारसे पालते हैं, वे ही वास्तवमें उनके माँ-बाप हैं॥ २२॥ पिताजी! अब आपलोग व्रजमें जाइये। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य-स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा। यहाँके सुहृद्-सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे’॥ २३॥ भगवान् श्रीकृष्णने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियोंको इस प्रकार समझा-बुझाकर बड़े आदरके साथ वस्त्र, आभूषण और अनेक धातुओंके बने बरतन आदि देकर उनका सत्कार किया॥ २४॥ भगवान्‌की बात सुनकर नन्दबाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया॥ २५॥"},{"b":32292,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.26"],"text":"अथ शूरसुतो राजन् पुत्रयोः समकारयत्।"},{"b":32293,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.26"],"text":"पुरोधसा ब्राह्मणैश्‍च यथावद् द्विजसंस्कृतिम्॥ २६"},{"b":32294,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.27"],"text":"तेभ्योऽदाद् दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलंकृताः।"},{"b":32295,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.27"],"text":"स्वलंकृतेभ्यः संपूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः॥ २७"},{"b":32296,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.28"],"text":"याः कृष्णरामजन्मर्क्षे मनोदत्ता महामतिः।"},{"b":32297,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.28"],"text":"ताश्‍चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हृताः॥ २८"},{"b":32298,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.29"],"text":"ततश्‍च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ।"},{"b":32299,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.29"],"text":"गर्गाद् यदुकुलाचार्याद् गायत्रं व्रतमास्थितौ॥ २९"},{"b":32300,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.30"],"text":"प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्‍वरौ।"},{"b":32301,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.30"],"text":"नान्यसिद्धामलज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः॥ ३०"},{"b":32302,"kind":"hindi_commentary","page":411,"explains":["10.45.26","10.45.27","10.45.28","10.45.29","10.45.30"],"text":"हे राजन्! इसके बाद वसुदेवजीने अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणोंसे दोनों पुत्रोंका विधिपूर्वक द्विजाति-समुचित यज्ञोपवीत संस्कार करवाया॥ २६॥ उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं॥ २७॥ महामति वसुदेवजीने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके जन्म-नक्षत्रमें जितनी गौएँ मन-ही-मन संकल्प करके दी थीं, उन्हें पहले कंसने अन्यायसे छीन लिया था। अब उनका स्मरण करके उन्होंने ब्राह्मणोंको वे फिरसे दीं॥ २८॥ इस प्रकार यदुवंशके आचार्य गर्गजीसे संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान् श्रीकृष्ण द्विजत्वको प्राप्त हुए। उनका ब्रह्मचर्यव्रत अखण्ड तो था ही, अब उन्होंने गायत्रीपूर्वक अध्ययन करनेके लिये उसे नियमतः स्वीकार किया॥ २९॥ श्रीकृष्ण और बलराम जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। सर्वज्ञ हैं। सभी विद्याएँ उन्हींसे निकली हैं। उनका निर्मल ज्ञान स्वतःसिद्ध है। फिर भी उन्होंने मनुष्यकी-सी लीला करके उसे छिपा रखा था॥ ३०॥"},{"b":32303,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.31"],"text":"अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः।"},{"b":32304,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.31"],"text":"काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवासिनम्॥ ३१"},{"b":32305,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.32"],"text":"यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम्।"},{"b":32306,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.32"],"text":"ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ॥ ३२"},{"b":32307,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.33"],"text":"तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः।"},{"b":32308,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["10.45.33"],"text":"प्रोवाच वेदानखिलान् सांगोपनिषदो गुरुः॥ ३३"},{"b":32309,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.34"],"text":"सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा।"},{"b":32310,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.34"],"text":"तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम्॥ ३४"},{"b":32311,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.35"],"text":"सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ।"},{"b":32312,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.35"],"text":"सकृन्‍निगदमात्रेण तौ संजगृहतुर्नृप॥ ३५"},{"b":32313,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.36"],"text":"अहोरात्रैश्‍चतुःषष्ट्या संयत्तौ तावतीः कलाः।"},{"b":32314,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.36"],"text":"गुरुदक्षिणयाऽऽचार्यं छन्दयामासतुर्नृप॥ ३६"},{"b":32315,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.37"],"text":"द्विजस्तयोस्तं महिमानमद्भुतं"},{"b":32316,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.37"],"text":"संलक्ष्य राजन्‍नतिमानुषीं मतिम्।"},{"b":32317,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.37"],"text":"सम्मन्त्र्य पत्‍न्या स महार्णवे मृतं"},{"b":32318,"kind":"sanskrit_shloka","page":412,"verses":["10.45.37"],"text":"बालं प्रभासे वरयाम्बभूव ह॥ ३७"},{"b":32319,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"explains":["10.45.31","10.45.32","10.45.33","10.45.34","10.45.35","10.45.36","10.45.37"],"text":"अब वे दोनों गुरुकुलमें निवास करनेकी इच्छासे काश्यपगोत्री सान्दीपनि मुनिके पास गये, जो अवन्तीपुर (उज्जैन) में रहते थे॥ ३१॥ वे दोनों भाई विधिपूर्वक गुरुजीके पास रहने लगे। उस समय वे बड़े ही सुसंयत, अपनी चेष्टाओंको सर्वथा नियमित रखे हुए थे। गुरुजी तो उनका आदर करते ही थे, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी भी गुरुकी उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिये, इसका आदर्श लोगोंके सामने रखते हुए बड़ी भक्तिसे इष्टदेवके समान उनकी सेवा करने लगे॥ ३२॥ गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी शुद्धभावसे युक्त सेवासे बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने दोनों भाइयोंको छहों अंग और उपनिषदोंके सहित सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा दी॥ ३३॥ इनके सिवा मन्त्र और देवताओंके ज्ञानके साथ धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा आदि, वेदोंका तात्पर्य बतलानेवाले शास्त्र, तर्कविद्या (न्यायशास्त्र) आदिकी भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय—इन छः भेदोंसे युक्त राजनीतिका भी अध्ययन कराया॥ ३४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओंके प्रवर्तक हैं। इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्यका-सा व्यवहार करते हुए ही वे अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने गुरुजीके केवल एक बार कहनेमात्रसे सारी विद्याएँ सीख लीं॥ ३५॥ केवल चौंसठ दिन-रातमें ही संयमीशिरोमणि दोनों भाइयोंने चौंसठों कलाओंका ज्ञान प्राप्त कर लिया। इस प्रकार अध्ययन समाप्त होनेपर उन्होंने सान्दीपनि मुनिसे प्रार्थना की कि ‘आपकी जो इच्छा हो, गुरु-दक्षिणा माँग लें’॥ ३६॥ महाराज! सान्दीपनि मुनिने उनकी अद्भुत महिमा और अलौकिक बुद्धिका अनुभव कर लिया था। इसलिये उन्होंने अपनी पत्‍नीसे सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘प्रभासक्षेत्रमें हमारा बालक समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे तुमलोग ला दो’॥ ३७॥"},{"b":32320,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.38"],"text":"तथेत्यथारुह्य महारथौ रथं"},{"b":32321,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.38"],"text":"प्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ।"},{"b":32322,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.38"],"text":"वेलामुपव्रज्य निषीदतुः क्षणं"},{"b":32323,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.38"],"text":"सिन्धुर्विदित्वार्हणमाहरत्तयोः ॥ ३८"},{"b":32324,"kind":"hindi_translation","page":413,"explains":["10.45.38"],"text":"बलरामजी और श्रीकृष्णका पराक्रम अनन्त था। दोनों ही महारथी थे। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर गुरुजीकी आज्ञा स्वीकार की और रथपर सवार होकर प्रभासक्षेत्रमें गये। वे समुद्रतटपर जाकर क्षणभर बैठे रहे। उस समय यह जानकर कि ये साक्षात् परमेश्‍वर हैं, अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्री लेकर समुद्र उनके सामने उपस्थित हुआ॥ ३८॥"},{"b":32325,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.39"],"text":"तमाह भगवानाशु गुरुपुत्रः प्रदीयताम्।"},{"b":32326,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.39"],"text":"योऽसाविह त्वया ग्रस्तो बालको महतोर्मिणा॥ ३९"},{"b":32327,"kind":"hindi_translation","page":413,"explains":["10.45.39"],"text":"भगवान्‌ने समुद्रसे कहा—‘समुद्र! तुम यहाँ अपनी बड़ी-बड़ी तरंगोंसे हमारे जिस गुरुपुत्रको बहा ले गये थे, उसे लाकर शीघ्र हमें दो’॥ ३९॥"},{"b":32328,"kind":"topic_heading","page":413,"text":"समुद्र उवाच"},{"b":32329,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.40"],"text":"नैवाहार्षमहं देव दैत्यः पंचजनो महान्।"},{"b":32330,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.40"],"text":"अन्तर्जलचरः कृष्ण शंखरूपधरोऽसुरः॥ ४०"},{"b":32331,"kind":"hindi_commentary","page":413,"explains":["10.45.40"],"text":"मनुष्यवेषधारी समुद्रने कहा—‘देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालकको नहीं लिया है। मेरे जलमें पंचजन नामका एक बड़ा भारी दैत्य जातिका असुर शंखके रूपमें रहता है। अवश्य ही उसीने वह बालक चुरा लिया होगा’॥ ४०॥"},{"b":32332,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.41"],"text":"आस्ते तेनाहृतो नूनं तच्छ्रुत्वा सत्वरं प्रभुः।"},{"b":32333,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.41"],"text":"जलमाविश्य तं हत्वा नापश्यदुदरेऽर्भकम्॥ ४१"},{"b":32334,"kind":"hindi_translation","page":413,"explains":["10.45.41"],"text":"समुद्रकी बात सुनकर भगवान् तुरंत ही जलमें जा घुसे और शंखासुरको मार डाला। परन्तु वह बालक उसके पेटमें नहीं मिला॥ ४१॥"},{"b":32335,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.42"],"text":"तदंगप्रभवं शंखमादाय रथमागमत्।"},{"b":32336,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.42"],"text":"ततः संयमनीं नाम यमस्य दयितां पुरीम्॥ ४२"},{"b":32337,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.43"],"text":"गत्वा जनार्दनः शंखं प्रदध्मौ सहलायुधः।"},{"b":32338,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.43"],"text":"शंखनिर्ह्रादमाकर्ण्य प्रजासंयमनो यमः॥ ४३"},{"b":32339,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.44"],"text":"तयोः सपर्यां महतीं चक्रे भक्त्युपबृंहिताम्।"},{"b":32340,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.44"],"text":"उवाचावनतः कृष्णं सर्वभूताशयालयम्।"},{"b":32341,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.44"],"text":"लीलामनुष्य हे विष्णो युवयोः करवाम किम्॥ ४४"},{"b":32342,"kind":"hindi_translation","page":413,"explains":["10.45.42","10.45.43","10.45.44"],"text":"तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥"},{"b":32343,"kind":"topic_heading","page":413,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":32344,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.45"],"text":"गुरुपुत्रमिहानीतं निजकर्मनिबन्धनम्।"},{"b":32345,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.45"],"text":"आनयस्व महाराज मच्छासनपुरस्कृतः॥ ४५"},{"b":32346,"kind":"hindi_commentary","page":413,"explains":["10.45.45"],"text":"श्रीभगवान्‌ने कहा—‘यमराज! यहाँ अपने कर्मबन्धनके अनुसार मेरा गुरुपुत्र लाया गया है। तुम मेरी आज्ञा स्वीकार करो और उसके कर्मपर ध्यान न देकर उसे मेरे पास ले आओ॥ ४५॥"},{"b":32347,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.46"],"text":"तथेति तेनोपानीतं गुरुपुत्रं यदूत्तमौ।"},{"b":32348,"kind":"sanskrit_shloka","page":413,"verses":["10.45.46"],"text":"दत्त्वा स्वगुरवे भूयो वृणीष्वेति तमूचतुः॥ ४६"},{"b":32349,"kind":"hindi_translation","page":413,"explains":["10.45.46"],"text":"यमराजने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान्‌का आदेश स्वीकार किया और उनका गुरुपुत्र ला दिया। तब यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी उस बालकको लेकर उज्जैन लौट आये और उसे अपने गुरुदेवको सौंपकर कहा कि ‘आप और जो कुछ चाहें, माँग लें’॥ ४६॥"},{"b":32350,"kind":"topic_heading","page":414,"text":"गुरुरुवाच"},{"b":32351,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.47"],"text":"सम्यक् संपादितो वत्स भवद‍्भ्यां गुरुनिष्क्रयः।"},{"b":32352,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.47"],"text":"को नु युष्मद्विधगुरोः कामानामवशिष्यते॥ ४७"},{"b":32353,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.48"],"text":"गच्छतं स्वगृहं वीरौ कीर्तिर्वामस्तु पावनी।"},{"b":32354,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.48"],"text":"छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च॥ ४८"},{"b":32355,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.49"],"text":"गुरुणैवमनुज्ञातौ रथेनानिलरंहसा।"},{"b":32356,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.49"],"text":"आयातौ स्वपुरं तात पर्जन्यनिनदेन वै॥ ४९"},{"b":32357,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.50"],"text":"समनन्दन् प्रजाः सर्वा दृष्ट्वा रामजनार्दनौ।"},{"b":32358,"kind":"sanskrit_shloka","page":414,"verses":["10.45.50"],"text":"अपश्यन्त्यो बह्वहानि नष्टलब्धधना इव॥ ५०"},{"b":32359,"kind":"hindi_commentary","page":414,"explains":["10.45.47","10.45.48","10.45.49","10.45.50"],"text":"गुरुजीने कहा—‘बेटा! तुम दोनोंने भलीभाँति गुरुदक्षिणा दी। अब और क्या चाहिये? जो तुम्हारे जैसे पुरुषोत्तमोंका गुरु है, उसका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?॥ ४७॥ वीरो! अब तुम दोनों अपने घर जाओ। तुम्हें लोकोंको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त हो। तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या इस लोक और परलोकमें सदा नवीन बनी रहे, कभी विस्मृत न हो’॥ ४८॥ बेटा परीक्षित्! फिर गुरुजीसे आज्ञा लेकर वायुके समान वेग और मेघके समान शब्दवाले रथपर सवार होकर दोनों भाई मथुरा लौट आये॥ ४९॥ मथुराकी प्रजा बहुत दिनोंतक श्रीकृष्ण और बलरामको न देखनेसे अत्यन्त दुःखी हो रही थी। अब उन्हें आया हुआ देख सब-के-सब परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये, मानो खोया हुआ धन मिल गया हो॥ ५०॥"},{"b":32360,"kind":"hindi_translation","page":414,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे गुरुपुत्रानयनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥"}],"notes":[{"id":"v2:295","mark":"*","page":412,"after_verse":"10.45.37","text":"चौंसठ कलाएँ ये हैं— १ गानविद्या, २ वाद्य—भाँति-भाँतिके बाजे बजाना, ३ नृत्य, ४ नाट्य, ५ चित्रकारी, ६ बेल-बूटे बनाना, ७ चावल और पुष्पादिसे पूजाके उपहारकी रचना करना, ८ फूलोंकी सेज बनाना, ९ दाँत, वस्त्र और अंगोंको रँगना, १० मणियोंकी फर्श बनाना, ११ शय्या-रचना, १२ जलको बाँध देना, १३ विचित्र सिद्धियाँ दिखलाना, १४ हार-माला आदि बनाना, १५ कान और चोटीके फूलोंके गहने बनाना, १६ कपड़े और गहने बनाना, १७ फूलोंके आभूषणोंसे शृंगार करना, १८ कानोंके पत्तोंकी रचना करना, १९ सुगन्धित वस्तुएँ—इत्र, तैल आदि बनाना, २० इन्द्रजाल—जादूगरी, २१ चाहे जैसा वेष धारण कर लेना, २२ हाथकी फुर्तीके काम, २३ तरह-तरहकी खानेकी वस्तुएँ बनाना, २४ तरह-तरहके पीनेके पदार्थ बनाना, २५ सूईका काम, २६ कठपुतली बनाना, नचाना, २७ पहेली, २८ प्रतिमा आदि बनाना, २९ कूटनीति, ३० ग्रन्थोंके पढ़ानेकी चातुरी, ३१ नाटक, आख्यायिका आदिकी रचना करना, ३२ समस्यापूर्ति करना, ३३ पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना, ३४ गलीचे, दरी आदि बनाना, ३५ बढ़ईकी कारीगरी, ३६ गृह आदि बनानेकी कारीगरी, ३७ सोने, चाँदी आदि धातु तथा हीरे-पन्‍ने आदि रत्‍नोंकी परीक्षा, ३८ सोना-चाँदी आदि बना लेना, ३९ मणियोंके रंगको पहचानना, ४० खानोंकी पहचान, ४१ वृक्षोंकी चिकित्सा, ४२ भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदिको लड़ानेकी रीति, ४३ तोता-मैना आदिकी बोलियाँ बोलना, ४४ उच्चाटनकी विधि, ४५ केशोंकी सफाईका कौशल, ४६ मुट्ठीकी चीज या मनकी बात बता देना, ४७ म्लेच्छ-काव्योंका समझ लेना, ४८ विभिन्‍न देशोंकी भाषाका ज्ञान, ४९ शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्‍नोंके उत्तरमें शुभाशुभ बतलाना, ५० नाना प्रकारके मातृकायन्त्र बनाना, ५१ रत्‍नोंको नाना प्रकारके आकारोंमें काटना, ५२ सांकेतिक भाषा बनाना, ५३ मनमें कटकरचना करना, ५४ नयी-नयी बातें निकालना, ५५ छलसे काम निकालना, ५६ समस्त कोशोंका ज्ञान, ५७ समस्त छन्दोंका ज्ञान, ५८ वस्त्रोंको छिपाने या बदलनेकी विद्या, ५९ द्यूत क्रीड़ा, ६० दूरके मनुष्य या वस्तुओंका आकर्षण कर लेना, ६१ बालकोंके खेल, ६२ मन्त्रविद्या, ६३ विजय प्राप्त करानेवाली विद्या, ६४ वेताल आदिको वशमें रखनेकी विद्या।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}