{"id":"10.56","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 56","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः","topics":["स्यमन्तकमणिकी कथा, जाम्बवती और सत्यभामाके साथ श्रीकृष्णका विवाह"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.56.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[486,491]},"verses":[{"id":"10.56.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/1/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्राजितः स्वतनयां कृष्णाय कृतकिल्बिषः।","स्यमन्तकेन मणिना स्वयमुद्यम्य दत्तवान्॥ १"],"iast":["satrājitaḥ svatanayāṃ kṛṣṇāya kṛtakilbiṣaḥ|","syamantakena maṇinā svayamudyamya dattavān|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सत्राजित्‍ने श्रीकृष्णको झूठा कलंक लगाया था। फिर उस अपराधका मार्जन करनेके लिये उसने स्वयं स्यमन्तकमणि सहित अपनी कन्या सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णको सौंप दी॥ १॥"},{"id":"10.56.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/2/","page":486,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["सत्राजितः किमकरोद् ब्रह्मन् कृष्णस्य किल्बिषम्।","स्यमन्तकः कुतस्तस्य कस्माद् दत्ता सुता हरेः॥ २"],"iast":["satrājitaḥ kimakarod brahman kṛṣṇasya kilbiṣam|","syamantakaḥ kutastasya kasmād dattā sutā hareḥ|| 2"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! सत्राजित्‍ने भगवान् श्रीकृष्णका क्या अपराध किया था? उसे स्यमन्तकमणि कहाँसे मिली? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी?॥ २॥"},{"id":"10.56.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/3/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसीत् सत्राजितः सूर्यो भक्तस्य परमः सखा।","प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात् सूर्यस्तुष्टः स्यमन्तकम्॥ ३"],"iast":["āsīt satrājitaḥ sūryo bhaktasya paramaḥ sakhā|","prītastasmai maṇiṃ prādāt sūryastuṣṭaḥ syamantakam|| 3"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! सत्राजित् भगवान् सूर्यका बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्तिसे प्रसन्‍न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान्‌ने ही प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उसे स्यमन्तकमणि दी थी॥ ३॥"},{"id":"10.56.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/4/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तं बिभ्रन् मणिं कण्ठे भ्राजमानो यथा रविः।","प्रविष्टो द्वारकां राजंस्तेजसा नोपलक्षितः॥ ४"],"iast":["sa taṃ bibhran maṇiṃ kaṇṭhe bhrājamāno yathā raviḥ|","praviṣṭo dvārakāṃ rājaṃstejasā nopalakṣitaḥ|| 4"],"meaning":"सत्राजित् उस मणिको गलेमें धारणकर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। परीक्षित्! जब सत्राजित् द्वारकामें आया, तब अत्यन्त तेजस्विताके कारण लोग उसे पहचान न सके॥ ४॥"},{"id":"10.56.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/5/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं विलोक्य जना दूरात्तेजसा मुष्टदृष्टयः।","दीव्यतेऽक्षैर्भगवते शशंसुः सूर्यशंकिताः॥ ५"],"iast":["taṃ vilokya janā dūrāttejasā muṣṭadṛṣṭayaḥ|","dīvyate'kṣairbhagavate śaśaṃsuḥ sūryaśaṃkitāḥ|| 5"],"meaning":"दूरसे ही उसे देखकर लोगोंकी आँखें उसके तेजसे चौंधिया गयीं। लोगोंने समझा कि कदाचित् स्वयं भगवान् सूर्य आ रहे हैं। उन लोगोंने भगवान्‌के पास आकर उन्हें इस बातकी सूचना दी। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण चौसर खेल रहे थे॥ ५॥"},{"id":"10.56.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/6/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नारायण नमस्तेऽस्तु शंखचक्रगदाधर।","दामोदरारविन्दाक्ष गोविन्द यदुनन्दन॥ ६"],"iast":["nārāyaṇa namaste'stu śaṃkhacakragadādhara|","dāmodarāravindākṣa govinda yadunandana|| 6"],"meaning":"लोगोंने कहा—‘शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! कमलनयन दामोदर! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द! आपको नमस्कार है॥ ६॥"},{"id":"10.56.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/7/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष आयाति सविता त्वां दिदृक्षुर्जगत्पते।","मुष्णन् गभस्तिचक्रेण नृणां चक्षूंषि तिग्मगुः॥ ७"],"iast":["eṣa āyāti savitā tvāṃ didṛkṣurjagatpate|","muṣṇan gabhasticakreṇa nṛṇāṃ cakṣūṃṣi tigmaguḥ|| 7"],"meaning":"जगदीश्‍वर! देखिये! अपनी चमकीली किरणोंसे लोगोंके नेत्रोंको चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान् सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं॥ ७॥"},{"id":"10.56.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/8/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्वन्विच्छन्ति ते मार्गं त्रिलोक्यां विबुधर्षभाः।","ज्ञात्वाद्य गूढं यदुषु द्रष्टुं त्वां यात्यजः प्रभो॥ ८"],"iast":["nanvanvicchanti te mārgaṃ trilokyāṃ vibudharṣabhāḥ|","jñātvādya gūḍhaṃ yaduṣu draṣṭuṃ tvāṃ yātyajaḥ prabho|| 8"],"meaning":"प्रभो! सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोकीमें आपकी प्राप्तिका मार्ग ढूँढ़ते रहते हैं; किन्तु उसे पाते नहीं। आज आपको यदुवंशमें छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं’॥ ८॥"},{"id":"10.56.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/9/","page":486,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निशम्य बालवचनं प्रहस्याम्बुजलोचनः।","प्राह नासौ रविर्देवः सत्राजिन्मणिना ज्वलन्॥ ९"],"iast":["niśamya bālavacanaṃ prahasyāmbujalocanaḥ|","prāha nāsau ravirdevaḥ satrājinmaṇinā jvalan|| 9"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अनजान पुरुषोंकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने कहा—‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं हैं। यह तो सत्राजित् है, जो मणिके कारण इतना चमक रहा है॥ ९॥"},{"id":"10.56.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/10/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्राजित् स्वगृहं श्रीमत् कृतकौतुकमंगलम्।","प्रविश्य देवसदने मणिं विप्रैर्न्यवेशयत्॥ १०"],"iast":["satrājit svagṛhaṃ śrīmat kṛtakautukamaṃgalam|","praviśya devasadane maṇiṃ viprairnyaveśayat|| 10"],"meaning":"इसके बाद सत्राजित् अपने समृद्ध घरमें चला आया। घरपर उसके शुभागमनके उपलक्ष्यमें मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणोंके द्वारा स्यमन्तकमणिको एक देवमन्दिरमें स्थापित करा दिया॥ १०॥"},{"id":"10.56.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/11/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिने दिने स्वर्णभारानष्टौ स सृजति प्रभो।","दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोऽशुभाः।","न सन्ति मायिनस्तत्र यत्रास्तेऽभ्यर्चितो मणिः॥ ११"],"iast":["dine dine svarṇabhārānaṣṭau sa sṛjati prabho|","durbhikṣamāryariṣṭāni sarpādhivyādhayo'śubhāḥ|","na santi māyinastatra yatrāste'bhyarcito maṇiḥ|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीडा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियोंका उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था॥ ११॥"},{"id":"10.56.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/12/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स याचितो मणिं क्वापि यदुराजाय शौरिणा।","नैवार्थकामुकः प्रादाद् याच्ञाभंगमतर्कयन्॥ १२"],"iast":["sa yācito maṇiṃ kvāpi yadurājāya śauriṇā|","naivārthakāmukaḥ prādād yācñābhaṃgamatarkayan|| 12"],"meaning":"एक बार भगवान् श्रीकृष्णने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेनको दे दो।’ परन्तु वह इतना अर्थलोलुप—लोभी था कि भगवान्‌की आज्ञाका उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया॥ १२॥"},{"id":"10.56.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/13/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमेकदा मणिं कण्ठे प्रतिमुच्य महाप्रभम्।","प्रसेनो हयमारुह्य मृगयां व्यचरद् वने॥ १३"],"iast":["tamekadā maṇiṃ kaṇṭhe pratimucya mahāprabham|","praseno hayamāruhya mṛgayāṃ vyacarad vane|| 13"],"meaning":"एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस परम प्रकाशमयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह घोड़ेपर सवार होकर शिकार खेलने वनमें चला गया॥ १३॥"},{"id":"10.56.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/14/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रसेनं सहयं हत्वा मणिमाच्छिद्य केसरी।","गिरिं विशञ्जाम्बवता निहतो मणिमिच्छता॥ १४"],"iast":["prasenaṃ sahayaṃ hatvā maṇimācchidya kesarī|","giriṃ viśañjāmbavatā nihato maṇimicchatā|| 14"],"meaning":"वहाँ एक सिंहने घोड़े सहित प्रसेनको मार डाला और उस मणिको छीन लिया। वह अभी पर्वतकी गुफामें प्रवेश कर ही रहा था कि मणिके लिये ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने उसे मार डाला॥ १४॥"},{"id":"10.56.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/15/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽपि चक्रे कुमारस्य मणिं क्रीडनकं बिले।","अपश्यन् भ्रातरं भ्राता सत्राजित् पर्यतप्यत॥ १५"],"iast":["so'pi cakre kumārasya maṇiṃ krīḍanakaṃ bile|","apaśyan bhrātaraṃ bhrātā satrājit paryatapyata|| 15"],"meaning":"उन्होंने वह मणि अपनी गुफामें ले जाकर बच्चेको खेलनेके लिये दे दी। अपने भाई प्रसेनके न लौटनेसे उसके भाई सत्राजित्को बड़ा दुःख हुआ॥ १५॥"},{"id":"10.56.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/16/","page":487,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रायः कृष्णेन निहतो मणिग्रीवो वनं गतः।","भ्राता ममेति तच्छ्रुत्वा कर्णे कर्णेऽजपञ्जनाः॥ १६"],"iast":["prāyaḥ kṛṣṇena nihato maṇigrīvo vanaṃ gataḥ|","bhrātā mameti tacchrutvā karṇe karṇe'japañjanāḥ|| 16"],"meaning":"वह कहने लगा, ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्णने ही मेरे भाईको मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गलेमें डालकर वनमें गया था।’ सत्राजित्की यह बात सुनकर लोग आपसमें काना-फूसी करने लगे॥ १६॥"},{"id":"10.56.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/17/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवांस्तदुपश्रुत्य दुर्यशो लिप्तमात्मनि।","मार्ष्टुं प्रसेनपदवीमन्वपद्यत नागरैः॥ १७"],"iast":["bhagavāṃstadupaśrutya duryaśo liptamātmani|","mārṣṭuṃ prasenapadavīmanvapadyata nāgaraiḥ|| 17"],"meaning":"जब भगवान् श्रीकृष्णने सुना कि यह कलंकका टीका मेरे ही सिर लगाया गया है, तब वे उसे धो-बहानेके उद्देश्यसे नगरके कुछ सभ्य पुरुषोंको साथ लेकर प्रसेनको ढूँढ़नेके लिये वनमें गये॥ १७॥"},{"id":"10.56.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/18/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हतं प्रसेनमश्‍वं च वीक्ष्य केसरिणा वने।","तं चाद्रिपृष्ठे निहतमृक्षेण ददृशुर्जनाः॥ १८"],"iast":["hataṃ prasenamaśvaṃ ca vīkṣya kesariṇā vane|","taṃ cādripṛṣṭhe nihatamṛkṣeṇa dadṛśurjanāḥ|| 18"],"meaning":"वहाँ खोजते-खोजते लोगोंने देखा कि घोर जंगलमें सिंहने प्रसेन और उसके घोड़ेको मार डाला है। जब वे लोग सिंहके पैरोंका चिह्न देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगोंने यह भी देखा कि पर्वतपर एक रीछने सिंहको भी मार डाला है॥ १८॥"},{"id":"10.56.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/19/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऋक्षराजबिलं भीममन्धेन तमसाऽऽवृतम्।","एको विवेश भगवानवस्थाप्य बहिः प्रजाः॥ १९"],"iast":["ṛkṣarājabilaṃ bhīmamandhena tamasā''vṛtam|","eko viveśa bhagavānavasthāpya bahiḥ prajāḥ|| 19"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंको बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकारसे भरी हुई ऋक्षराजकी भयंकर गुफामें प्रवेश किया॥ १९॥"},{"id":"10.56.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/20/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं बालक्रीडनकं कृतम्।","हर्तुं कृतमतिस्तस्मिन्‍नवतस्थेऽर्भकान्तिके॥ २०"],"iast":["tatra dṛṣṭvā maṇiśreṣṭhaṃ bālakrīḍanakaṃ kṛtam|","hartuṃ kṛtamatistasminnavatasthe'rbhakāntike|| 20"],"meaning":"भगवान्‌ने वहाँ जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तकको बच्चोंका खिलौना बना दिया गया है। वे उसे हर लेनेकी इच्छासे बच्चेके पास जा खड़े हुए॥ २०॥"},{"id":"10.56.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/21/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमपूर्वं नरं दृष्ट्वा धात्री चुक्रोश भीतवत्।","तच्छ्रुत्वाभ्यद्रवत् क्रुद्धो जाम्बवान् बलिनां वरः॥ २१"],"iast":["tamapūrvaṃ naraṃ dṛṣṭvā dhātrī cukrośa bhītavat|","tacchrutvābhyadravat kruddho jāmbavān balināṃ varaḥ|| 21"],"meaning":"उस गुफामें एक अपरिचित मनुष्यको देखकर बच्चेकी धाय भयभीतकी भाँति चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान् क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये॥ २१॥"},{"id":"10.56.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/22/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स वै भगवता तेन युयुधे स्वामिनाऽऽत्मनः।","पुरुषं प्राकृतं मत्वा कुपितो नानुभाववित्॥ २२"],"iast":["sa vai bhagavatā tena yuyudhe svāminā''tmanaḥ|","puruṣaṃ prākṛtaṃ matvā kupito nānubhāvavit|| 22"],"meaning":"परीक्षित्! जाम्बवान् उस समय कुपित हो रहे थे। उन्हें भगवान्‌की महिमा, उनके प्रभावका पता न चला। उन्होंने उन्हें एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे युद्ध करने लगे॥ २२॥"},{"id":"10.56.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/23/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्वन्द्वयुद्धं सुतुमुलमुभयोर्विजिगीषतोः।","आयुधाश्मद्रुमैर्दोर्भिः क्रव्यार्थे श्येनयोरिव॥ २३"],"iast":["dvandvayuddhaṃ sutumulamubhayorvijigīṣatoḥ|","āyudhāśmadrumairdorbhiḥ kravyārthe śyenayoriva|| 23"],"meaning":"जिस प्रकार मांसके लिये दो बाज आपसमें लड़ते हैं, वैसे ही विजयाभिलाषी भगवान् श्रीकृष्ण और जाम्बवान् आपसमें घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार किया, फिर शिलाओंका, तत्पश्‍चात् वे वृक्ष उखाड़कर एक-दूसरेपर फेंकने लगे। अन्तमें उनमें बाहुयुद्ध होने लगा॥ २३॥"},{"id":"10.56.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/24/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसीत्तदष्टाविंशाहमितरेतरमुष्टिभिः ।","वज्रनिष्पेषपरुषैरविश्रममहर्निशम् ॥ २४"],"iast":["āsīttadaṣṭāviṃśāhamitaretaramuṣṭibhiḥ |","vajraniṣpeṣaparuṣairaviśramamaharniśam || 24"],"meaning":"परीक्षित्! वज्र-प्रहारके समान कठोर घूँसोंसे आपसमें वे अट्ठाईस दिनतक बिना विश्राम किये रात-दिन लड़ते रहे॥ २४॥"},{"id":"10.56.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/25/","page":488,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णमुष्टिविनिष्पातनिष्पिष्टांगोरुबन्धनः ।","क्षीणसत्त्वः स्विन्‍नगात्रस्तमाहातीव विस्मितः॥ २५"],"iast":["kṛṣṇamuṣṭiviniṣpātaniṣpiṣṭāṃgorubandhanaḥ |","kṣīṇasattvaḥ svinnagātrastamāhātīva vismitaḥ|| 25"],"meaning":"अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके घूँसोंकी चोटसे जाम्बवान्के शरीरकी एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यन्त विस्मित—चकित होकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥ २५॥"},{"id":"10.56.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/26/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जाने त्वां सर्वभूतानां प्राण ओजः सहो बलम्।","विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमधीश्‍वरम्॥ २६"],"iast":["jāne tvāṃ sarvabhūtānāṃ prāṇa ojaḥ saho balam|","viṣṇuṃ purāṇapuruṣaṃ prabhaviṣṇumadhīśvaram|| 26"],"meaning":"‘प्रभो! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियोंके स्वामी, रक्षक, पुराणपुरुष भगवान् विष्णु हैं। आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबल हैं॥ २६॥"},{"id":"10.56.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/27/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वं हि विश्‍वसृजां स्रष्टा सृज्यानामपि यच्च सत्।","कालः कलयतामीशः पर आत्मा तथाऽऽत्मनाम्॥ २७"],"iast":["tvaṃ hi viśvasṛjāṃ sraṣṭā sṛjyānāmapi yacca sat|","kālaḥ kalayatāmīśaḥ para ātmā tathā''tmanām|| 27"],"meaning":"आप विश्‍वके रचयिता ब्रह्मा आदिको भी बनानेवाले हैं। बनाये हुए पदार्थोंमें भी सत्तारूपसे आप ही विराजमान हैं। कालके जितने भी अवयव हैं, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर-भेदसे भिन्‍न-भिन्‍न प्रतीयमान अन्तरात्माओंके परम आत्मा भी आप ही हैं॥ २७॥"},{"id":"10.56.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/28/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्येषदुत्कलितरोषकटाक्षमोक्षै-","र्वर्त्मादिशत् क्षुभितनक्रतिमिंगिलोऽब्धिः।","सेतुः कृतः स्वयश उज्ज्वलिता च लंका","रक्षःशिरांसि भुवि पेतुरिषुक्षतानि॥ २८"],"iast":["yasyeṣadutkalitaroṣakaṭākṣamokṣai-","rvartmādiśat kṣubhitanakratimiṃgilo'bdhiḥ|","setuḥ kṛtaḥ svayaśa ujjvalitā ca laṃkā","rakṣaḥśirāṃsi bhuvi peturiṣukṣatāni|| 28"],"meaning":"प्रभो! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रोंमें तनिक-सा क्रोधका भाव लेकर तिरछी दृष्टिसे समुद्रकी ओर देखा था। उस समय समुद्रके अंदर रहनेवाले बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्रने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उसपर सेतु बाँधकर सुन्दर यशकी स्थापना की तथा लंकाका विध्वंस किया। आपके बाणोंसे कट-कटकर राक्षसोंके सिर पृथ्वीपर लोट रहे थे (अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्णके रूपमें आये हैं)’॥ २८॥"},{"id":"10.56.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/29/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति विज्ञातविज्ञानमृक्षराजानमच्युतः।","व्याजहार महाराज भगवान् देवकीसुतः॥ २९"],"iast":["iti vijñātavijñānamṛkṣarājānamacyutaḥ|","vyājahāra mahārāja bhagavān devakīsutaḥ|| 29"],"meaning":"परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने भगवान्‌को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"10.56.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/30/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अभिमृश्यारविन्दाक्षः पाणिना शंकरेण तम्।","कृपया परया भक्तं प्रेमगम्भीरया गिरा॥ ३०"],"iast":["abhimṛśyāravindākṣaḥ pāṇinā śaṃkareṇa tam|","kṛpayā parayā bhaktaṃ premagambhīrayā girā|| 30"],"meaning":"परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने भगवान्‌को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"10.56.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/31/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्।","मिथ्याभिशापं प्रमृजन्‍नात्मनो मणिनामुना॥ ३१"],"iast":["maṇihetoriha prāptā vayamṛkṣapate bilam|","mithyābhiśāpaṃ pramṛjannātmano maṇināmunā|| 31"],"meaning":"‘ऋक्षराज! हम मणिके लिये ही तुम्हारी इस गुफामें आये हैं। इस मणिके द्वारा मैं अपनेपर लगे झूठे कलंकको मिटाना चाहता हूँ’॥ ३१॥"},{"id":"10.56.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/32/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्तः स्वां दुहितरं कन्यां जाम्बवतीं मुदा।","अर्हणार्थं स मणिना कृष्णायोपजहार ह॥ ३२"],"iast":["ityuktaḥ svāṃ duhitaraṃ kanyāṃ jāmbavatīṃ mudā|","arhaṇārthaṃ sa maṇinā kṛṣṇāyopajahāra ha|| 32"],"meaning":"भगवान्‌के ऐसा कहनेपर जाम्बवान्‍ने बड़े आनन्दसे उनकी पूजा करनेके लिये अपनी कन्या कुमारी जाम्बवतीको मणिके साथ उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ ३२॥"},{"id":"10.56.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/33/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अदृष्ट्वा निर्गमं शौरेः प्रविष्टस्य बिलं जनाः।","प्रतीक्ष्य द्वादशाहानि दुःखिताः स्वपुरं ययुः॥ ३३"],"iast":["adṛṣṭvā nirgamaṃ śaureḥ praviṣṭasya bilaṃ janāḥ|","pratīkṣya dvādaśāhāni duḥkhitāḥ svapuraṃ yayuḥ|| 33"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण जिन लोगोंको गुफाके बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिनतक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अबतक वे गुफामेंसे नहीं निकले, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर द्वारकाको लौट गये॥ ३३॥"},{"id":"10.56.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/34/","page":489,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निशम्य देवकी देवी रुक्मिण्यानकदुन्दुभिः।","सुहृदो ज्ञातयोऽशोचन् बिलात् कृष्णमनिर्गतम्॥ ३४"],"iast":["niśamya devakī devī rukmiṇyānakadundubhiḥ|","suhṛdo jñātayo'śocan bilāt kṛṣṇamanirgatam|| 34"],"meaning":"वहाँ जब माता देवकी, रुक्मिणी, वसुदेवजी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियोंको यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफामेंसे नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ॥ ३४॥"},{"id":"10.56.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/35/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्राजितं शपन्तस्ते दुःखिता द्वारकौकसः।","उपतस्थुर्महामायां दुर्गां कृष्णोपलब्धये॥ ३५"],"iast":["satrājitaṃ śapantaste duḥkhitā dvārakaukasaḥ|","upatasthurmahāmāyāṃ durgāṃ kṛṣṇopalabdhaye|| 35"],"meaning":"सभी द्वारकावासी अत्यन्त दुःखित होकर सत्राजित्को भला-बुरा कहने लगे और भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये महामाया दुर्गादेवीकी शरणमें गये, उनकी उपासना करने लगे॥ ३५॥"},{"id":"10.56.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/36/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेषां तु देव्युपस्थानात् प्रत्यादिष्टाशिषा स च।","प्रादुर्बभूव सिद्धार्थः सदारो हर्षयन् हरिः॥ ३६"],"iast":["teṣāṃ tu devyupasthānāt pratyādiṣṭāśiṣā sa ca|","prādurbabhūva siddhārthaḥ sadāro harṣayan hariḥ|| 36"],"meaning":"उनकी उपासनासे दुर्गादेवी प्रसन्‍न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीचमें मणि और अपनी नववधू जाम्बवतीके साथ सफलमनोरथ होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन्‍न करते हुए प्रकट हो गये॥ ३६॥"},{"id":"10.56.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/37/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपलभ्य हृषीकेशं मृतं पुनरिवागतम्।","सह पत्‍न्या मणिग्रीवं सर्वे जातमहोत्सवाः॥ ३७"],"iast":["upalabhya hṛṣīkeśaṃ mṛtaṃ punarivāgatam|","saha patnyā maṇigrīvaṃ sarve jātamahotsavāḥ|| 37"],"meaning":"सभी द्वारकावासी भगवान् श्रीकृष्णको पत्‍नीके साथ और गलेमें मणि धारण किये हुए देखकर परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये, मानो कोई मरकर लौट आया हो॥ ३७॥"},{"id":"10.56.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/38/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्राजितं समाहूय सभायां राजसन्‍निधौ।","प्राप्तिं चाख्याय भगवान् मणिं तस्मै न्यवेदयत्॥ ३८"],"iast":["satrājitaṃ samāhūya sabhāyāṃ rājasannidhau|","prāptiṃ cākhyāya bhagavān maṇiṃ tasmai nyavedayat|| 38"],"meaning":"तदनन्तर भगवान्‌ने सत्राजित्को राजसभामें महाराज उग्रसेनके पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित्को सौंप दी॥ ३८॥"},{"id":"10.56.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/39/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स चातिव्रीडितो रत्‍नं गृहीत्वावाङ्मुखस्ततः।","अनुतप्यमानो भवनमगमत् स्वेन पाप्मना॥ ३९"],"iast":["sa cātivrīḍito ratnaṃ gṛhītvāvāṅmukhastataḥ|","anutapyamāno bhavanamagamat svena pāpmanā|| 39"],"meaning":"सत्राजित् अत्यन्त लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचेकी ओर लटक गया। अपने अपराधपर उसे बड़ा पश्‍चात्ताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा॥ ३९॥"},{"id":"10.56.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/40/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽनुध्यायंस्तदेवाघं बलवद्विग्रहाकुलः।","कथं मृजाम्यात्मरजः प्रसीदेद् वाच्युतः कथम्॥ ४०"],"iast":["so'nudhyāyaṃstadevāghaṃ balavadvigrahākulaḥ|","kathaṃ mṛjāmyātmarajaḥ prasīded vācyutaḥ katham|| 40"],"meaning":"उसके मनकी आँखोंके सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान्के साथ विरोध करनेके कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराधका मार्जन कैसे करूँ? मुझपर भगवान् श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्‍न हों॥ ४०॥"},{"id":"10.56.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/41/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं कृत्वा साधु मह्यं स्यान्‍न शपेद् वा जनो यथा।","अदीर्घदर्शनं क्षुद्रं मूढं द्रविणलोलुपम्॥ ४१"],"iast":["kiṃ kṛtvā sādhu mahyaṃ syānna śaped vā jano yathā|","adīrghadarśanaṃ kṣudraṃ mūḍhaṃ draviṇalolupam|| 41"],"meaning":"मैं ऐसा कौन-सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसें नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धनके लोभसे मैं बड़ी मूढ़ताका काम कर बैठा॥ ४१॥"},{"id":"10.56.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/42/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दास्ये दुहितरं तस्मै स्त्रीरत्‍नं रत्‍नमेव च।","उपायोऽयं समीचीनस्तस्य शान्तिर्न चान्यथा॥ ४२"],"iast":["dāsye duhitaraṃ tasmai strīratnaṃ ratnameva ca|","upāyo'yaṃ samīcīnastasya śāntirna cānyathā|| 42"],"meaning":"अब मैं रमणियोंमें रत्‍नके समान अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमन्तकमणि दोनों ही श्रीकृष्णको दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। इसीसे मेरे अपराधका मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है’॥ ४२॥"},{"id":"10.56.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/43/","page":490,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं व्यवसितो बुद्ध्या सत्राजित् स्वसुतां शुभाम्।","मणिं च स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार ह॥ ४३"],"iast":["evaṃ vyavasito buddhyā satrājit svasutāṃ śubhām|","maṇiṃ ca svayamudyamya kṛṣṇāyopajahāra ha|| 43"],"meaning":"सत्राजित्‍ने अपनी विवेक-बुद्धिसे ऐसा निश्‍चय करके स्वयं ही इसके लिये उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्णको अर्पण कर दीं॥ ४३॥"},{"id":"10.56.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/44/","page":491,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तां सत्यभामां भगवानुपयेमे यथाविधि।","बहुभिर्याचितां शीलरूपौदार्यगुणान्विताम्॥ ४४"],"iast":["tāṃ satyabhāmāṃ bhagavānupayeme yathāvidhi|","bahubhiryācitāṃ śīlarūpaudāryaguṇānvitām|| 44"],"meaning":"सत्यभामा शील-स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सद्गुणोंसे सम्पन्‍न थीं। बहुत-से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिलें और उन लोगोंने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान् श्रीकृष्णने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया॥ ४४॥"},{"id":"10.56.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/45/","page":491,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवानाह न मणिं प्रतीच्छामो वयं नृप।","तवास्तां देवभक्तस्य वयं च फलभागिनः॥ ४५"],"iast":["bhagavānāha na maṇiṃ pratīcchāmo vayaṃ nṛpa|","tavāstāṃ devabhaktasya vayaṃ ca phalabhāginaḥ|| 45"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने सत्राजित्से कहा—‘हम स्यमन्तकमणि न लेंगे। आप सूर्यभगवान्‌के भक्त हैं, इसलिये वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फलके, अर्थात् उससे निकले हुए सोनेके अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें’॥ ४५॥"}],"text":[{"b":33797,"kind":"adhyaya_heading","page":486,"text":"अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः"},{"b":33798,"kind":"topic_heading","page":486,"text":"स्यमन्तकमणिकी कथा, जाम्बवती और सत्यभामाके साथ श्रीकृष्णका विवाह"},{"b":33799,"kind":"topic_heading","page":486,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":33800,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.1"],"text":"सत्राजितः स्वतनयां कृष्णाय कृतकिल्बिषः।"},{"b":33801,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.1"],"text":"स्यमन्तकेन मणिना स्वयमुद्यम्य दत्तवान्॥ १"},{"b":33802,"kind":"hindi_commentary","page":486,"explains":["10.56.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सत्राजित्‍ने श्रीकृष्णको झूठा कलंक लगाया था। फिर उस अपराधका मार्जन करनेके लिये उसने स्वयं स्यमन्तकमणि सहित अपनी कन्या सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णको सौंप दी॥ १॥"},{"b":33803,"kind":"topic_heading","page":486,"text":"राजोवाच"},{"b":33804,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.2"],"text":"सत्राजितः किमकरोद् ब्रह्मन् कृष्णस्य किल्बिषम्।"},{"b":33805,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.2"],"text":"स्यमन्तकः कुतस्तस्य कस्माद् दत्ता सुता हरेः॥ २"},{"b":33806,"kind":"hindi_commentary","page":486,"explains":["10.56.2"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! सत्राजित्‍ने भगवान् श्रीकृष्णका क्या अपराध किया था? उसे स्यमन्तकमणि कहाँसे मिली? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी?॥ २॥"},{"b":33807,"kind":"topic_heading","page":486,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":33808,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.3"],"text":"आसीत् सत्राजितः सूर्यो भक्तस्य परमः सखा।"},{"b":33809,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.3"],"text":"प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात् सूर्यस्तुष्टः स्यमन्तकम्॥ ३"},{"b":33810,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.4"],"text":"स तं बिभ्रन् मणिं कण्ठे भ्राजमानो यथा रविः।"},{"b":33811,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.4"],"text":"प्रविष्टो द्वारकां राजंस्तेजसा नोपलक्षितः॥ ४"},{"b":33812,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.5"],"text":"तं विलोक्य जना दूरात्तेजसा मुष्टदृष्टयः।"},{"b":33813,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.5"],"text":"दीव्यतेऽक्षैर्भगवते शशंसुः सूर्यशंकिताः॥ ५"},{"b":33814,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.6"],"text":"नारायण नमस्तेऽस्तु शंखचक्रगदाधर।"},{"b":33815,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.6"],"text":"दामोदरारविन्दाक्ष गोविन्द यदुनन्दन॥ ६"},{"b":33816,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.7"],"text":"एष आयाति सविता त्वां दिदृक्षुर्जगत्पते।"},{"b":33817,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.7"],"text":"मुष्णन् गभस्तिचक्रेण नृणां चक्षूंषि तिग्मगुः॥ ७"},{"b":33818,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.8"],"text":"नन्वन्विच्छन्ति ते मार्गं त्रिलोक्यां विबुधर्षभाः।"},{"b":33819,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.8"],"text":"ज्ञात्वाद्य गूढं यदुषु द्रष्टुं त्वां यात्यजः प्रभो॥ ८"},{"b":33820,"kind":"hindi_commentary","page":486,"explains":["10.56.3","10.56.4","10.56.5","10.56.6","10.56.7","10.56.8"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! सत्राजित् भगवान् सूर्यका बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्तिसे प्रसन्‍न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान्‌ने ही प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उसे स्यमन्तकमणि दी थी॥ ३॥ सत्राजित् उस मणिको गलेमें धारणकर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। परीक्षित्! जब सत्राजित् द्वारकामें आया, तब अत्यन्त तेजस्विताके कारण लोग उसे पहचान न सके॥ ४॥ दूरसे ही उसे देखकर लोगोंकी आँखें उसके तेजसे चौंधिया गयीं। लोगोंने समझा कि कदाचित् स्वयं भगवान् सूर्य आ रहे हैं। उन लोगोंने भगवान्‌के पास आकर उन्हें इस बातकी सूचना दी। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण चौसर खेल रहे थे॥ ५॥ लोगोंने कहा—‘शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! कमलनयन दामोदर! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द! आपको नमस्कार है॥ ६॥ जगदीश्‍वर! देखिये! अपनी चमकीली किरणोंसे लोगोंके नेत्रोंको चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान् सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं॥ ७॥ प्रभो! सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोकीमें आपकी प्राप्तिका मार्ग ढूँढ़ते रहते हैं; किन्तु उसे पाते नहीं। आज आपको यदुवंशमें छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं’॥ ८॥"},{"b":33821,"kind":"topic_heading","page":486,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":33822,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.9"],"text":"निशम्य बालवचनं प्रहस्याम्बुजलोचनः।"},{"b":33823,"kind":"sanskrit_shloka","page":486,"verses":["10.56.9"],"text":"प्राह नासौ रविर्देवः सत्राजिन्मणिना ज्वलन्॥ ९"},{"b":33824,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.10"],"text":"सत्राजित् स्वगृहं श्रीमत् कृतकौतुकमंगलम्।"},{"b":33825,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.10"],"text":"प्रविश्य देवसदने मणिं विप्रैर्न्यवेशयत्॥ १०"},{"b":33826,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.11"],"text":"दिने दिने स्वर्णभारानष्टौ स सृजति प्रभो।"},{"b":33827,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.11"],"text":"दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोऽशुभाः।"},{"b":33828,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.11"],"text":"न सन्ति मायिनस्तत्र यत्रास्तेऽभ्यर्चितो मणिः॥ ११"},{"b":33829,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.12"],"text":"स याचितो मणिं क्वापि यदुराजाय शौरिणा।"},{"b":33830,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.12"],"text":"नैवार्थकामुकः प्रादाद् याच्ञाभंगमतर्कयन्॥ १२"},{"b":33831,"kind":"hindi_commentary","page":486,"explains":["10.56.9","10.56.10","10.56.11","10.56.12"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अनजान पुरुषोंकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने कहा—‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं हैं। यह तो सत्राजित् है, जो मणिके कारण इतना चमक रहा है॥ ९॥ इसके बाद सत्राजित् अपने समृद्ध घरमें चला आया। घरपर उसके शुभागमनके उपलक्ष्यमें मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणोंके द्वारा स्यमन्तकमणिको एक देवमन्दिरमें स्थापित करा दिया॥ १०॥ परीक्षित्! वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीडा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियोंका उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था॥ ११॥ एक बार भगवान् श्रीकृष्णने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेनको दे दो।’ परन्तु वह इतना अर्थलोलुप—लोभी था कि भगवान्‌की आज्ञाका उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया॥ १२॥"},{"b":33832,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.13"],"text":"तमेकदा मणिं कण्ठे प्रतिमुच्य महाप्रभम्।"},{"b":33833,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.13"],"text":"प्रसेनो हयमारुह्य मृगयां व्यचरद् वने॥ १३"},{"b":33834,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.14"],"text":"प्रसेनं सहयं हत्वा मणिमाच्छिद्य केसरी।"},{"b":33835,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.14"],"text":"गिरिं विशञ्जाम्बवता निहतो मणिमिच्छता॥ १४"},{"b":33836,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.15"],"text":"सोऽपि चक्रे कुमारस्य मणिं क्रीडनकं बिले।"},{"b":33837,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.15"],"text":"अपश्यन् भ्रातरं भ्राता सत्राजित् पर्यतप्यत॥ १५"},{"b":33838,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.16"],"text":"प्रायः कृष्णेन निहतो मणिग्रीवो वनं गतः।"},{"b":33839,"kind":"sanskrit_shloka","page":487,"verses":["10.56.16"],"text":"भ्राता ममेति तच्छ्रुत्वा कर्णे कर्णेऽजपञ्जनाः॥ १६"},{"b":33840,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.17"],"text":"भगवांस्तदुपश्रुत्य दुर्यशो लिप्तमात्मनि।"},{"b":33841,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.17"],"text":"मार्ष्टुं प्रसेनपदवीमन्वपद्यत नागरैः॥ १७"},{"b":33842,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.18"],"text":"हतं प्रसेनमश्‍वं च वीक्ष्य केसरिणा वने।"},{"b":33843,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.18"],"text":"तं चाद्रिपृष्ठे निहतमृक्षेण ददृशुर्जनाः॥ १८"},{"b":33844,"kind":"hindi_commentary","page":487,"explains":["10.56.13","10.56.14","10.56.15","10.56.16","10.56.17","10.56.18"],"text":"एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस परम प्रकाशमयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह घोड़ेपर सवार होकर शिकार खेलने वनमें चला गया॥ १३॥ वहाँ एक सिंहने घोड़े सहित प्रसेनको मार डाला और उस मणिको छीन लिया। वह अभी पर्वतकी गुफामें प्रवेश कर ही रहा था कि मणिके लिये ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने उसे मार डाला॥ १४॥ उन्होंने वह मणि अपनी गुफामें ले जाकर बच्चेको खेलनेके लिये दे दी। अपने भाई प्रसेनके न लौटनेसे उसके भाई सत्राजित्को बड़ा दुःख हुआ॥ १५॥ वह कहने लगा, ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्णने ही मेरे भाईको मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गलेमें डालकर वनमें गया था।’ सत्राजित्की यह बात सुनकर लोग आपसमें काना-फूसी करने लगे॥ १६॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने सुना कि यह कलंकका टीका मेरे ही सिर लगाया गया है, तब वे उसे धो-बहानेके उद्देश्यसे नगरके कुछ सभ्य पुरुषोंको साथ लेकर प्रसेनको ढूँढ़नेके लिये वनमें गये॥ १७॥ वहाँ खोजते-खोजते लोगोंने देखा कि घोर जंगलमें सिंहने प्रसेन और उसके घोड़ेको मार डाला है। जब वे लोग सिंहके पैरोंका चिह्न देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगोंने यह भी देखा कि पर्वतपर एक रीछने सिंहको भी मार डाला है॥ १८॥"},{"b":33845,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.19"],"text":"ऋक्षराजबिलं भीममन्धेन तमसाऽऽवृतम्।"},{"b":33846,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.19"],"text":"एको विवेश भगवानवस्थाप्य बहिः प्रजाः॥ १९"},{"b":33847,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.20"],"text":"तत्र दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं बालक्रीडनकं कृतम्।"},{"b":33848,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.20"],"text":"हर्तुं कृतमतिस्तस्मिन्‍नवतस्थेऽर्भकान्तिके॥ २०"},{"b":33849,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.21"],"text":"तमपूर्वं नरं दृष्ट्वा धात्री चुक्रोश भीतवत्।"},{"b":33850,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.21"],"text":"तच्छ्रुत्वाभ्यद्रवत् क्रुद्धो जाम्बवान् बलिनां वरः॥ २१"},{"b":33851,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.22"],"text":"स वै भगवता तेन युयुधे स्वामिनाऽऽत्मनः।"},{"b":33852,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.22"],"text":"पुरुषं प्राकृतं मत्वा कुपितो नानुभाववित्॥ २२"},{"b":33853,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.23"],"text":"द्वन्द्वयुद्धं सुतुमुलमुभयोर्विजिगीषतोः।"},{"b":33854,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.23"],"text":"आयुधाश्मद्रुमैर्दोर्भिः क्रव्यार्थे श्येनयोरिव॥ २३"},{"b":33855,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.24"],"text":"आसीत्तदष्टाविंशाहमितरेतरमुष्टिभिः ।"},{"b":33856,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.24"],"text":"वज्रनिष्पेषपरुषैरविश्रममहर्निशम् ॥ २४"},{"b":33857,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.25"],"text":"कृष्णमुष्टिविनिष्पातनिष्पिष्टांगोरुबन्धनः ।"},{"b":33858,"kind":"sanskrit_shloka","page":488,"verses":["10.56.25"],"text":"क्षीणसत्त्वः स्विन्‍नगात्रस्तमाहातीव विस्मितः॥ २५"},{"b":33859,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.26"],"text":"जाने त्वां सर्वभूतानां प्राण ओजः सहो बलम्।"},{"b":33860,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.26"],"text":"विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमधीश्‍वरम्॥ २६"},{"b":33861,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.27"],"text":"त्वं हि विश्‍वसृजां स्रष्टा सृज्यानामपि यच्च सत्।"},{"b":33862,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.27"],"text":"कालः कलयतामीशः पर आत्मा तथाऽऽत्मनाम्॥ २७"},{"b":33863,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.28"],"text":"यस्येषदुत्कलितरोषकटाक्षमोक्षै-"},{"b":33864,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.28"],"text":"र्वर्त्मादिशत् क्षुभितनक्रतिमिंगिलोऽब्धिः।"},{"b":33865,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.28"],"text":"सेतुः कृतः स्वयश उज्ज्वलिता च लंका"},{"b":33866,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.28"],"text":"रक्षःशिरांसि भुवि पेतुरिषुक्षतानि॥ २८"},{"b":33867,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.29"],"text":"इति विज्ञातविज्ञानमृक्षराजानमच्युतः।"},{"b":33868,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.29"],"text":"व्याजहार महाराज भगवान् देवकीसुतः॥ २९"},{"b":33869,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.30"],"text":"अभिमृश्यारविन्दाक्षः पाणिना शंकरेण तम्।"},{"b":33870,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.30"],"text":"कृपया परया भक्तं प्रेमगम्भीरया गिरा॥ ३०"},{"b":33871,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.31"],"text":"मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्।"},{"b":33872,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.31"],"text":"मिथ्याभिशापं प्रमृजन्‍नात्मनो मणिनामुना॥ ३१"},{"b":33873,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.32"],"text":"इत्युक्तः स्वां दुहितरं कन्यां जाम्बवतीं मुदा।"},{"b":33874,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.32"],"text":"अर्हणार्थं स मणिना कृष्णायोपजहार ह॥ ३२"},{"b":33875,"kind":"hindi_commentary","page":488,"explains":["10.56.19","10.56.20","10.56.21","10.56.22","10.56.23","10.56.24","10.56.25","10.56.26","10.56.27","10.56.28","10.56.29","10.56.30","10.56.31","10.56.32"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंको बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकारसे भरी हुई ऋक्षराजकी भयंकर गुफामें प्रवेश किया॥ १९॥ भगवान्‌ने वहाँ जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तकको बच्चोंका खिलौना बना दिया गया है। वे उसे हर लेनेकी इच्छासे बच्चेके पास जा खड़े हुए॥ २०॥ उस गुफामें एक अपरिचित मनुष्यको देखकर बच्चेकी धाय भयभीतकी भाँति चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान् क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये॥ २१॥ परीक्षित्! जाम्बवान् उस समय कुपित हो रहे थे। उन्हें भगवान्‌की महिमा, उनके प्रभावका पता न चला। उन्होंने उन्हें एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे युद्ध करने लगे॥ २२॥ जिस प्रकार मांसके लिये दो बाज आपसमें लड़ते हैं, वैसे ही विजयाभिलाषी भगवान् श्रीकृष्ण और जाम्बवान् आपसमें घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार किया, फिर शिलाओंका, तत्पश्‍चात् वे वृक्ष उखाड़कर एक-दूसरेपर फेंकने लगे। अन्तमें उनमें बाहुयुद्ध होने लगा॥ २३॥ परीक्षित्! वज्र-प्रहारके समान कठोर घूँसोंसे आपसमें वे अट्ठाईस दिनतक बिना विश्राम किये रात-दिन लड़ते रहे॥ २४॥ अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके घूँसोंकी चोटसे जाम्बवान्के शरीरकी एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यन्त विस्मित—चकित होकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥ २५॥ ‘प्रभो! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियोंके स्वामी, रक्षक, पुराणपुरुष भगवान् विष्णु हैं। आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबल हैं॥ २६॥ आप विश्‍वके रचयिता ब्रह्मा आदिको भी बनानेवाले हैं। बनाये हुए पदार्थोंमें भी सत्तारूपसे आप ही विराजमान हैं। कालके जितने भी अवयव हैं, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर-भेदसे भिन्‍न-भिन्‍न प्रतीयमान अन्तरात्माओंके परम आत्मा भी आप ही हैं॥ २७॥ प्रभो! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रोंमें तनिक-सा क्रोधका भाव लेकर तिरछी दृष्टिसे समुद्रकी ओर देखा था। उस समय समुद्रके अंदर रहनेवाले बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्रने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उसपर सेतु बाँधकर सुन्दर यशकी स्थापना की तथा लंकाका विध्वंस किया। आपके बाणोंसे कट-कटकर राक्षसोंके सिर पृथ्वीपर लोट रहे थे (अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्णके रूपमें आये हैं)’॥ २८॥ परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने भगवान्‌को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥ ‘ऋक्षराज! हम मणिके लिये ही तुम्हारी इस गुफामें आये हैं। इस मणिके द्वारा मैं अपनेपर लगे झूठे कलंकको मिटाना चाहता हूँ’॥ ३१॥ भगवान्‌के ऐसा कहनेपर जाम्बवान्‍ने बड़े आनन्दसे उनकी पूजा करनेके लिये अपनी कन्या कुमारी जाम्बवतीको मणिके साथ उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ ३२॥"},{"b":33876,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.33"],"text":"अदृष्ट्वा निर्गमं शौरेः प्रविष्टस्य बिलं जनाः।"},{"b":33877,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.33"],"text":"प्रतीक्ष्य द्वादशाहानि दुःखिताः स्वपुरं ययुः॥ ३३"},{"b":33878,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.34"],"text":"निशम्य देवकी देवी रुक्मिण्यानकदुन्दुभिः।"},{"b":33879,"kind":"sanskrit_shloka","page":489,"verses":["10.56.34"],"text":"सुहृदो ज्ञातयोऽशोचन् बिलात् कृष्णमनिर्गतम्॥ ३४"},{"b":33880,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.35"],"text":"सत्राजितं शपन्तस्ते दुःखिता द्वारकौकसः।"},{"b":33881,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.35"],"text":"उपतस्थुर्महामायां दुर्गां कृष्णोपलब्धये॥ ३५"},{"b":33882,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.36"],"text":"तेषां तु देव्युपस्थानात् प्रत्यादिष्टाशिषा स च।"},{"b":33883,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.36"],"text":"प्रादुर्बभूव सिद्धार्थः सदारो हर्षयन् हरिः॥ ३६"},{"b":33884,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.37"],"text":"उपलभ्य हृषीकेशं मृतं पुनरिवागतम्।"},{"b":33885,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.37"],"text":"सह पत्‍न्या मणिग्रीवं सर्वे जातमहोत्सवाः॥ ३७"},{"b":33886,"kind":"hindi_commentary","page":489,"explains":["10.56.33","10.56.34","10.56.35","10.56.36","10.56.37"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण जिन लोगोंको गुफाके बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिनतक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अबतक वे गुफामेंसे नहीं निकले, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर द्वारकाको लौट गये॥ ३३॥ वहाँ जब माता देवकी, रुक्मिणी, वसुदेवजी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियोंको यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफामेंसे नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ॥ ३४॥ सभी द्वारकावासी अत्यन्त दुःखित होकर सत्राजित्को भला-बुरा कहने लगे और भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये महामाया दुर्गादेवीकी शरणमें गये, उनकी उपासना करने लगे॥ ३५॥ उनकी उपासनासे दुर्गादेवी प्रसन्‍न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीचमें मणि और अपनी नववधू जाम्बवतीके साथ सफलमनोरथ होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन्‍न करते हुए प्रकट हो गये॥ ३६॥ सभी द्वारकावासी भगवान् श्रीकृष्णको पत्‍नीके साथ और गलेमें मणि धारण किये हुए देखकर परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये, मानो कोई मरकर लौट आया हो॥ ३७॥"},{"b":33887,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.38"],"text":"सत्राजितं समाहूय सभायां राजसन्‍निधौ।"},{"b":33888,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.38"],"text":"प्राप्तिं चाख्याय भगवान् मणिं तस्मै न्यवेदयत्॥ ३८"},{"b":33889,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.39"],"text":"स चातिव्रीडितो रत्‍नं गृहीत्वावाङ्मुखस्ततः।"},{"b":33890,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.39"],"text":"अनुतप्यमानो भवनमगमत् स्वेन पाप्मना॥ ३९"},{"b":33891,"kind":"hindi_commentary","page":490,"explains":["10.56.38","10.56.39"],"text":"तदनन्तर भगवान्‌ने सत्राजित्को राजसभामें महाराज उग्रसेनके पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित्को सौंप दी॥ ३८॥ सत्राजित् अत्यन्त लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचेकी ओर लटक गया। अपने अपराधपर उसे बड़ा पश्‍चात्ताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा॥ ३९॥"},{"b":33892,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.40"],"text":"सोऽनुध्यायंस्तदेवाघं बलवद्विग्रहाकुलः।"},{"b":33893,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.40"],"text":"कथं मृजाम्यात्मरजः प्रसीदेद् वाच्युतः कथम्॥ ४०"},{"b":33894,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.41"],"text":"किं कृत्वा साधु मह्यं स्यान्‍न शपेद् वा जनो यथा।"},{"b":33895,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.41"],"text":"अदीर्घदर्शनं क्षुद्रं मूढं द्रविणलोलुपम्॥ ४१"},{"b":33896,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.42"],"text":"दास्ये दुहितरं तस्मै स्त्रीरत्‍नं रत्‍नमेव च।"},{"b":33897,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.42"],"text":"उपायोऽयं समीचीनस्तस्य शान्तिर्न चान्यथा॥ ४२"},{"b":33898,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.43"],"text":"एवं व्यवसितो बुद्ध्या सत्राजित् स्वसुतां शुभाम्।"},{"b":33899,"kind":"sanskrit_shloka","page":490,"verses":["10.56.43"],"text":"मणिं च स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार ह॥ ४३"},{"b":33900,"kind":"sanskrit_shloka","page":491,"verses":["10.56.44"],"text":"तां सत्यभामां भगवानुपयेमे यथाविधि।"},{"b":33901,"kind":"sanskrit_shloka","page":491,"verses":["10.56.44"],"text":"बहुभिर्याचितां शीलरूपौदार्यगुणान्विताम्॥ ४४"},{"b":33902,"kind":"sanskrit_shloka","page":491,"verses":["10.56.45"],"text":"भगवानाह न मणिं प्रतीच्छामो वयं नृप।"},{"b":33903,"kind":"sanskrit_shloka","page":491,"verses":["10.56.45"],"text":"तवास्तां देवभक्तस्य वयं च फलभागिनः॥ ४५"},{"b":33904,"kind":"hindi_commentary","page":490,"explains":["10.56.40","10.56.41","10.56.42","10.56.43","10.56.44","10.56.45"],"text":"उसके मनकी आँखोंके सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान्के साथ विरोध करनेके कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराधका मार्जन कैसे करूँ? मुझपर भगवान् श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्‍न हों॥ ४०॥ मैं ऐसा कौन-सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसें नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धनके लोभसे मैं बड़ी मूढ़ताका काम कर बैठा॥ ४१॥ अब मैं रमणियोंमें रत्‍नके समान अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमन्तकमणि दोनों ही श्रीकृष्णको दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। इसीसे मेरे अपराधका मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है’॥ ४२॥ सत्राजित्‍ने अपनी विवेक-बुद्धिसे ऐसा निश्‍चय करके स्वयं ही इसके लिये उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्णको अर्पण कर दीं॥ ४३॥ सत्यभामा शील-स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सद्गुणोंसे सम्पन्‍न थीं। बहुत-से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिलें और उन लोगोंने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान् श्रीकृष्णने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया॥ ४४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने सत्राजित्से कहा—‘हम स्यमन्तकमणि न लेंगे। आप सूर्यभगवान्‌के भक्त हैं, इसलिये वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फलके, अर्थात् उससे निकले हुए सोनेके अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें’॥ ४५॥"},{"b":33905,"kind":"hindi_translation","page":491,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे स्यमन्तकोपाख्याने षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५६॥"}],"notes":[{"id":"v2:302","mark":"*","page":487,"after_verse":"10.56.12","text":"भारका परिमाण इस प्रकार है— चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुंजं गुंजान्पंच पणं पणान्। अष्टौ धरणमष्टौ च कर्षं तांश्‍चतुरः पलम्। तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥ अर्थात् ‘चार व्रीहि (धान) की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।’"}],"corrections":{"count":5,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}