{"id":"10.66","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 66","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः","topics":["पौण्ड्रक और काशिराजका उद्धार"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[546,550]},"verses":[{"id":"10.66.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/1/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दव्रजं गते रामे करूषाधिपतिर्नृप।","वासुदेवोऽहमित्यज्ञो दूतं कृष्णाय प्राहिणोत्॥ १"],"iast":["nandavrajaṃ gate rāme karūṣādhipatirnṛpa|","vāsudevo'hamityajño dūtaṃ kṛṣṇāya prāhiṇot|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् बलरामजी नन्दबाबाके व्रजमें गये हुए थे, तब पीछेसे करूष देशके अज्ञानी राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णके पास एक दूत भेजकर यह कहलाया कि ‘भगवान् वासुदेव मैं हूँ’॥ १॥"},{"id":"10.66.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/2/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वं वासुदेवो भगवानवतीर्णो जगत्पतिः।","इति प्रस्तोभितो बालैर्मेन आत्मानमच्युतम्॥ २"],"iast":["tvaṃ vāsudevo bhagavānavatīrṇo jagatpatiḥ|","iti prastobhito bālairmena ātmānamacyutam|| 2"],"meaning":"मूर्खलोग उसे बहकाया करते थे कि ‘आप ही भगवान् वासुदेव हैं और जगत‍्की रक्षाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं।’ इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपनेको ही भगवान् मान बैठा॥ २॥"},{"id":"10.66.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/3/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवर्त्मने।","द्वारकायां यथा बालो नृपो बालकृतोऽबुधः॥ ३"],"iast":["dūtaṃ ca prāhiṇonmandaḥ kṛṣṇāyāvyaktavartmane|","dvārakāyāṃ yathā bālo nṛpo bālakṛto'budhaḥ|| 3"],"meaning":"जैसे बच्चे आपसमें खेलते समय किसी बालकको ही राजा मान लेते हैं और वह राजाकी तरह उनके साथ व्यवहार करने लगता है, वैसे ही मन्दमति अज्ञानी पौण्ड्रकने अचिन्त्यगति भगवान् श्रीकृष्णकी लीला और रहस्य न जानकर द्वारकामें उनके पास दूत भेज दिया॥ ३॥"},{"id":"10.66.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/4/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दूतस्तु द्वारकामेत्य सभायामास्थितं प्रभुम्।","कृष्णं कमलपत्राक्षं राजसन्देशमब्रवीत्॥ ४"],"iast":["dūtastu dvārakāmetya sabhāyāmāsthitaṃ prabhum|","kṛṣṇaṃ kamalapatrākṣaṃ rājasandeśamabravīt|| 4"],"meaning":"पौण्ड्रकका दूत द्वारका आया और राजसभामें बैठे हुए कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उसने अपने राजाका यह सन्देश कह सुनाया—॥ ४॥"},{"id":"10.66.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/5/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापरः।","भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज॥ ५"],"iast":["vāsudevo'vatīrṇo'hameka eva na cāparaḥ|","bhūtānāmanukampārthaṃ tvaṃ tu mithyābhidhāṃ tyaja|| 5"],"meaning":"‘एकमात्र मैं ही वासुदेव हूँ। दूसरा कोई नहीं है। प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये मैंने ही अवतार ग्रहण किया है। तुमने झूठ-मूठ अपना नाम वासुदेव रख लिया है, अब उसे छोड़ दो॥ ५॥"},{"id":"10.66.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/6/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत।","त्यक्त्वैहि मां त्वं शरणं नो चेद् देहि ममाहवम्॥ ६"],"iast":["yāni tvamasmaccihnāni mauḍhyād bibharṣi sātvata|","tyaktvaihi māṃ tvaṃ śaraṇaṃ no ced dehi mamāhavam|| 6"],"meaning":"यदुवंशी! तुमने मूर्खतावश मेरे चिह्न धारण कर रखे हैं। उन्हें छोड़कर मेरी शरणमें आओ और यदि मेरी बात तुम्हें स्वीकार न हो, तो मुझसे युद्ध करो’॥ ६॥"},{"id":"10.66.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/7/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कत्थनं तदुपाकर्ण्य पौण्ड्रकस्याल्पमेधसः।","उग्रसेनादयः सभ्या उच्चकैर्जहसुस्तदा॥ ७"],"iast":["katthanaṃ tadupākarṇya pauṇḍrakasyālpamedhasaḥ|","ugrasenādayaḥ sabhyā uccakairjahasustadā|| 7"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मन्दमति पौण्ड्रककी यह बहक सुनकर उग्रसेन आदि सभासद् जोर-जोरसे हँसने लगे॥ ७॥"},{"id":"10.66.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/8/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उवाच दूतं भगवान् परिहासकथामनु।","उत्स्रक्ष्ये मूढ चिह्नानि यैस्त्वमेवं विकत्थसे॥ ८"],"iast":["uvāca dūtaṃ bhagavān parihāsakathāmanu|","utsrakṣye mūḍha cihnāni yaistvamevaṃ vikatthase|| 8"],"meaning":"उन लोगोंकी हँसी समाप्त होनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने दूतसे कहा—‘तुम जाकर अपने राजासे कह देना कि ‘रे मूढ़! मैं अपने चक्र आदि चिह्न यों नहीं छोड़ूँगा। इन्हें मैं तुझपर छोड़ूँगा और केवल तुझपर ही नहीं, तेरे उन सब साथियोंपर भी, जिनके बहकानेसे तू इस प्रकार बहक रहा है। उस समय मूर्ख! तू अपना मुँह छिपाकर—औंधे मुँह गिरकर चील, गीध, बटेर आदि मांसभोजी पक्षियोंसे घिरकर सो जायगा और तू मेरा शरणदाता नहीं, उन कुत्तोंकी शरण होगा, जो तेरा मांस चींथ-चींथकर खा जायँगे’॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"10.66.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/9/","page":546,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुखं तदपिधायाज्ञ कंकगृध्रवटैर्वृतः।","शयिष्यसे हतस्तत्र भविता शरणं शुनाम्॥ ९"],"iast":["mukhaṃ tadapidhāyājña kaṃkagṛdhravaṭairvṛtaḥ|","śayiṣyase hatastatra bhavitā śaraṇaṃ śunām|| 9"],"meaning":"उन लोगोंकी हँसी समाप्त होनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने दूतसे कहा—‘तुम जाकर अपने राजासे कह देना कि ‘रे मूढ़! मैं अपने चक्र आदि चिह्न यों नहीं छोड़ूँगा। इन्हें मैं तुझपर छोड़ूँगा और केवल तुझपर ही नहीं, तेरे उन सब साथियोंपर भी, जिनके बहकानेसे तू इस प्रकार बहक रहा है। उस समय मूर्ख! तू अपना मुँह छिपाकर—औंधे मुँह गिरकर चील, गीध, बटेर आदि मांसभोजी पक्षियोंसे घिरकर सो जायगा और तू मेरा शरणदाता नहीं, उन कुत्तोंकी शरण होगा, जो तेरा मांस चींथ-चींथकर खा जायँगे’॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"10.66.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/10/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति दूतस्तदाक्षेपं स्वामिने सर्वमाहरत्।","कृष्णोऽपि रथमास्थाय काशीमुपजगाम ह॥ १०"],"iast":["iti dūtastadākṣepaṃ svāmine sarvamāharat|","kṛṣṇo'pi rathamāsthāya kāśīmupajagāma ha|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌का यह तिरस्कारपूर्ण संवाद लेकर पौण्ड्रकका दूत अपने स्वामीके पास गया और उसे कह सुनाया। इधर भगवान् श्रीकृष्णने भी रथपर सवार होकर काशीपर चढ़ाई कर दी। (क्योंकि वह करूषका राजा उन दिनों वहीं अपने मित्र काशिराजके पास रहता था)॥ १०॥"},{"id":"10.66.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/11/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पौण्ड्रकोऽपि तदुद्योगमुपलभ्य महारथः।","अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तो निश्‍चक्राम पुराद् द्रुतम्॥ ११"],"iast":["pauṇḍrako'pi tadudyogamupalabhya mahārathaḥ|","akṣauhiṇībhyāṃ saṃyukto niścakrāma purād drutam|| 11"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके आक्रमणका समाचार पाकर महारथी पौण्ड्रक भी दो अक्षौहिणी सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकल आया॥ ११॥"},{"id":"10.66.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/12/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य काशिपतिर्मित्रं पार्ष्णिग्राहोऽन्वयान्‍नृप।","अक्षौहिणीभिस्तिसृभिरपश्यत् पौण्ड्रकं हरिः॥ १२"],"iast":["tasya kāśipatirmitraṃ pārṣṇigrāho'nvayānnṛpa|","akṣauhiṇībhistisṛbhirapaśyat pauṇḍrakaṃ hariḥ|| 12"],"meaning":"काशीका राजा पौण्ड्रकका मित्र था। अतः वह भी उसकी सहायता करनेके लिये तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ उसके पीछे-पीछे आया। परीक्षित्! अब भगवान् श्रीकृष्णने पौण्ड्रकको देखा॥ १२॥"},{"id":"10.66.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/13/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शंखार्यसिगदाशार्ङ्गश्रीवत्साद्युपलक्षितम् ।","बिभ्राणं कौस्तुभमणिं वनमालाविभूषितम्॥ १३"],"iast":["śaṃkhāryasigadāśārṅgaśrīvatsādyupalakṣitam |","bibhrāṇaṃ kaustubhamaṇiṃ vanamālāvibhūṣitam|| 13"],"meaning":"पौण्ड्रकने भी शंख, चक्र, तलवार, गदा, शार्ङ्गधनुष और श्रीवत्सचिह्न आदि धारण कर रखे थे। उसके वक्षःस्थलपर बनावटी कौस्तुभमणि और वनमाला भी लटक रही थी॥ १३॥"},{"id":"10.66.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/14/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कौशेयवाससी पीते वसानं गरुडध्वजम्।","अमूल्यमौल्याभरणं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ १४"],"iast":["kauśeyavāsasī pīte vasānaṃ garuḍadhvajam|","amūlyamaulyābharaṇaṃ sphuranmakarakuṇḍalam|| 14"],"meaning":"उसने रेशमी पीले वस्त्र पहन रखे थे और रथकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न भी लगा रखा था। उसके सिरपर अमूल्य मुकुट था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे॥ १४॥"},{"id":"10.66.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/15/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा तमात्मनस्तुल्यवेषं कृत्रिममास्थितम्।","यथा नटं रंगगतं विजहास भृशं हरिः॥ १५"],"iast":["dṛṣṭvā tamātmanastulyaveṣaṃ kṛtrimamāsthitam|","yathā naṭaṃ raṃgagataṃ vijahāsa bhṛśaṃ hariḥ|| 15"],"meaning":"उसका यह सारा-का-सारा वेष बनावटी था, मानो कोई अभिनेता रंगमंचपर अभिनय करनेके लिये आया हो। उसकी वेष-भूषा अपने समान देखकर भगवान् श्रीकृष्ण खिलखिलाकर हँसने लगे॥ १५॥"},{"id":"10.66.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/16/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शूलैर्गदाभिः परिघैः शक्त्यृष्टिप्रासतोमरैः।","असिभिः पट्टिशैर्बाणैः प्राहरन्‍नरयो हरिम्॥ १६"],"iast":["śūlairgadābhiḥ parighaiḥ śaktyṛṣṭiprāsatomaraiḥ|","asibhiḥ paṭṭiśairbāṇaiḥ prāharannarayo harim|| 16"],"meaning":"अब शत्रुओंने भगवान् श्रीकृष्णपर त्रिशूल, गदा, मुद्गर, शक्ति, ऋष्टि, प्रास, तोमर, तलवार, पट्टिश और बाण आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार किया॥ १६॥"},{"id":"10.66.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/17/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णस्तु तत्पौण्ड्रककाशिराजयो-","र्बलं गजस्यन्दनवाजिपत्तिमत्।","गदासिचक्रेषुभिरार्दयद् भृशं","यथा युगान्ते हुतभुक् पृथक् प्रजाः॥ १७"],"iast":["kṛṣṇastu tatpauṇḍrakakāśirājayo-","rbalaṃ gajasyandanavājipattimat|","gadāsicakreṣubhirārdayad bhṛśaṃ","yathā yugānte hutabhuk pṛthak prajāḥ|| 17"],"meaning":"प्रलयके समय जिस प्रकार आग सभी प्रकारके प्राणियोंको जला देती है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णने भी गदा, तलवार, चक्र और बाण आदि शस्त्रास्त्रोंसे पौण्ड्रक तथा काशिराजके हाथी, रथ, घोड़े और पैदलकी चतुरंगिणी सेनाको तहस-नहस कर दिया॥ १७॥"},{"id":"10.66.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/18/","page":547,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आयोधनं तद्रथवाजिकुंजर-","द्विपत्खरोष्ट्रैररिणावखण्डितैः ।","बभौ चितं मोदवहं मनस्विना-","माक्रीडनं भूतपतेरिवोल्बणम्॥ १८"],"iast":["āyodhanaṃ tadrathavājikuṃjara-","dvipatkharoṣṭrairariṇāvakhaṇḍitaiḥ |","babhau citaṃ modavahaṃ manasvinā-","mākrīḍanaṃ bhūtapaterivolbaṇam|| 18"],"meaning":"वह रणभूमि भगवान्‌के चक्रसे खण्ड-खण्ड हुए रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य, गधे और ऊँटोंसे पट गयी। उस समय ऐसा मालूम हो रहा था, मानो वह भूतनाथ शंकरकी भयंकर क्रीडास्थली हो। उसे देख-देखकर शूरवीरोंका उत्साह और भी बढ़ रहा था॥ १८॥"},{"id":"10.66.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/19/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथाह पौण्ड्रकं शौरिर्भो भोः पौण्ड्रक यद् भवान्।","दूतवाक्येन मामाह तान्यस्त्राण्युत्सृजामि ते॥ १९"],"iast":["athāha pauṇḍrakaṃ śaurirbho bhoḥ pauṇḍraka yad bhavān|","dūtavākyena māmāha tānyastrāṇyutsṛjāmi te|| 19"],"meaning":"अब भगवान् श्रीकृष्णने पौण्ड्रकसे कहा—‘रे पौण्ड्रक! तूने दूतके द्वारा कहलाया था कि मेरे चिह्न अस्त्र-शस्त्रादि छोड़ दो। सो अब मैं उन्हें तुझपर छोड़ रहा हूँ॥ १९॥"},{"id":"10.66.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/20/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्याजयिष्येऽभिधानं मे यत्त्वयाज्ञ मृषा धृतम्।","व्रजामि शरणं तेऽद्य यदि नेच्छामि संयुगम्॥ २०"],"iast":["tyājayiṣye'bhidhānaṃ me yattvayājña mṛṣā dhṛtam|","vrajāmi śaraṇaṃ te'dya yadi necchāmi saṃyugam|| 20"],"meaning":"तूने झूठ-मूठ मेरा नाम रख लिया है। अतः मूर्ख! अब मैं तुझसे उन नामोंको भी छुड़ाकर रहूँगा। रही तेरे शरणमें आनेकी बात; सो यदि मैं तुझसे युद्ध न कर सकूँगा तो तेरी शरण ग्रहण करूँगा’॥ २०॥"},{"id":"10.66.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/21/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति क्षिप्त्वा शितैर्बाणैर्विरथीकृत्य पौण्ड्रकम्।","शिरोऽवृश्‍चद् रथांगेन वज्रेणेन्द्रो यथा गिरेः॥ २१"],"iast":["iti kṣiptvā śitairbāṇairvirathīkṛtya pauṇḍrakam|","śiro'vṛścad rathāṃgena vajreṇendro yathā gireḥ|| 21"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार पौण्ड्रकका तिरस्कार करके अपने तीखे बाणोंसे उसके रथको तोड़-फोड़ डाला और चक्रसे उसका सिर वैसे ही उतार लिया, जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पहाड़की चोटियोंको उड़ा दिया था॥ २१॥"},{"id":"10.66.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/22/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथा काशिपतेः कायाच्छिर उत्कृत्य पत्रिभिः।","न्यपातयत् काशिपुर्यां पद्मकोशमिवानिलः॥ २२"],"iast":["tathā kāśipateḥ kāyācchira utkṛtya patribhiḥ|","nyapātayat kāśipuryāṃ padmakośamivānilaḥ|| 22"],"meaning":"इसी प्रकार भगवान्‌ने अपने बाणोंसे काशिनरेशका सिर भी धड़से ऊपर उड़ाकर काशीपुरीमें गिरा दिया, जैसे वायु कमलका पुष्प गिरा देती है॥ २२॥"},{"id":"10.66.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/23/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं मत्सरिणं हत्वा पौण्ड्रकं ससखं हरिः।","द्वारकामाविशत् सिद्धैर्गीयमानकथामृतः॥ २३"],"iast":["evaṃ matsariṇaṃ hatvā pauṇḍrakaṃ sasakhaṃ hariḥ|","dvārakāmāviśat siddhairgīyamānakathāmṛtaḥ|| 23"],"meaning":"इस प्रकार अपने साथ डाह रखनेवाले पौण्ड्रकको और उसके सखा काशिनरेशको मारकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी राजधानी द्वारकामें लौट आये। उस समय सिद्धगण भगवान्‌की अमृतमयी कथाका गान कर रहे थे॥ २३॥"},{"id":"10.66.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/24/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स नित्यं भगवद्ध्यानप्रध्वस्ताखिलबन्धनः।","बिभ्राणश्‍च हरे राजन् स्वरूपं तन्मयोऽभवत्॥ २४"],"iast":["sa nityaṃ bhagavaddhyānapradhvastākhilabandhanaḥ|","bibhrāṇaśca hare rājan svarūpaṃ tanmayo'bhavat|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! पौण्ड्रक भगवान्‌के रूपका, चाहे वह किसी भावसे हो, सदा चिन्तन करता रहता था। इससे उसके सारे बन्धन कट गये। वह भगवान्‌का बनावटी वेष धारण किये रहता था, इससे बार-बार उसीका स्मरण होनेके कारण वह भगवान्‌के सारूप्यको ही प्राप्त हुआ॥ २४॥"},{"id":"10.66.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/25/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्।","किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिश्यिरे जनाः॥ २५"],"iast":["śiraḥ patitamālokya rājadvāre sakuṇḍalam|","kimidaṃ kasya vā vaktramiti saṃśiśyire janāḥ|| 25"],"meaning":"इधर काशीमें राजमहलके दरवाजेपर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरहका सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है?’॥ २५॥"},{"id":"10.66.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/26/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राज्ञः काशिपतेर्ज्ञात्वा महिष्यः पुत्रबान्धवाः।","पौराश्‍च हा हता राजन् नाथ नाथेति प्रारुदन्॥ २६"],"iast":["rājñaḥ kāśipaterjñātvā mahiṣyaḥ putrabāndhavāḥ|","paurāśca hā hatā rājan nātha nātheti prārudan|| 26"],"meaning":"जब यह मालूम हुआ कि वह तो काशिनरेशका ही सिर है, तब रानियाँ, राजकुमार, राजपरिवारके लोग तथा नागरिक रो-रोकर विलाप करने लगे—‘हा नाथ! हा राजन्! हाय-हाय! हमारा तो सर्वनाश हो गया’॥ २६॥"},{"id":"10.66.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/27/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुदक्षिणस्तस्य सुतः कृत्वा संस्थाविधिं पितुः।","निहत्य पितृहन्तारं यास्याम्यपचितिं पितुः॥ २७"],"iast":["sudakṣiṇastasya sutaḥ kṛtvā saṃsthāvidhiṃ pituḥ|","nihatya pitṛhantāraṃ yāsyāmyapacitiṃ pituḥ|| 27"],"meaning":"काशिनरेशका पुत्र था सुदक्षिण। उसने अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करके मन-ही-मन यह निश्‍चय किया कि अपने पितृघातीको मारकर ही मैं पिताके ऋणसे उऋण हो सकूँगा। निदान वह अपने कुलपुरोहित और आचार्योंके साथ अत्यन्त एकाग्रतासे भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"10.66.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/28/","page":548,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यात्मनाभिसन्धाय सोपाध्यायो महेश्‍वरम्।","सुदक्षिणोऽर्चयामास परमेण समाधिना॥ २८"],"iast":["ityātmanābhisandhāya sopādhyāyo maheśvaram|","sudakṣiṇo'rcayāmāsa parameṇa samādhinā|| 28"],"meaning":"काशिनरेशका पुत्र था सुदक्षिण। उसने अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करके मन-ही-मन यह निश्‍चय किया कि अपने पितृघातीको मारकर ही मैं पिताके ऋणसे उऋण हो सकूँगा। निदान वह अपने कुलपुरोहित और आचार्योंके साथ अत्यन्त एकाग्रतासे भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"10.66.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/29/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रीतोऽविमुक्ते भगवांस्तस्मै वरमदाद् भवः।","पितृहन्तृवधोपायं स वव्रे वरमीप्सितम्॥ २९"],"iast":["prīto'vimukte bhagavāṃstasmai varamadād bhavaḥ|","pitṛhantṛvadhopāyaṃ sa vavre varamīpsitam|| 29"],"meaning":"काशी नगरीमें उसकी आराधनासे प्रसन्‍न होकर भगवान् शंकरने वर देनेको कहा। सुदक्षिणने यह अभीष्ट वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघातीके वधका उपाय बतलाइये॥ २९॥"},{"id":"10.66.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/30/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दक्षिणाग्‍निं परिचर ब्राह्मणैः सममृत्विजम्।","अभिचारविधानेन स चाग्‍निः प्रमथैर्वृतः॥ ३०"],"iast":["dakṣiṇāgniṃ paricara brāhmaṇaiḥ samamṛtvijam|","abhicāravidhānena sa cāgniḥ pramathairvṛtaḥ|| 30"],"meaning":"भगवान् शंकरने कहा—‘तुम ब्राह्मणोंके साथ मिलकर यज्ञके देवता ऋत्विग्भूत दक्षिणाग्‍निकी अभिचारविधिसे आराधना करो। इससे वह अग्‍नि प्रमथगणोंके साथ प्रकट होकर यदि ब्राह्मणोंके अभक्तपर प्रयोग करोगे तो वह तुम्हारा संकल्प सिद्ध करेगा।’ भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्त करके सुदक्षिणने अनुष्ठानके उपयुक्त नियम ग्रहण किये और वह भगवान् श्रीकृष्णके लिये अभिचार (मारणका पुरश्‍चरण) करने लगा॥ ३०-३१॥","meaning_covers":[30,31]},{"id":"10.66.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/31/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["साधयिष्यति संकल्पमब्रह्मण्ये प्रयोजितः।","इत्यादिष्टस्तथा चक्रे कृष्णायाभिचरन् व्रती॥ ३१"],"iast":["sādhayiṣyati saṃkalpamabrahmaṇye prayojitaḥ|","ityādiṣṭastathā cakre kṛṣṇāyābhicaran vratī|| 31"],"meaning":"भगवान् शंकरने कहा—‘तुम ब्राह्मणोंके साथ मिलकर यज्ञके देवता ऋत्विग्भूत दक्षिणाग्‍निकी अभिचारविधिसे आराधना करो। इससे वह अग्‍नि प्रमथगणोंके साथ प्रकट होकर यदि ब्राह्मणोंके अभक्तपर प्रयोग करोगे तो वह तुम्हारा संकल्प सिद्ध करेगा।’ भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्त करके सुदक्षिणने अनुष्ठानके उपयुक्त नियम ग्रहण किये और वह भगवान् श्रीकृष्णके लिये अभिचार (मारणका पुरश्‍चरण) करने लगा॥ ३०-३१॥","meaning_covers":[30,31]},{"id":"10.66.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/32/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽग्‍निरुत्थितः कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषणः।","तप्तताम्रशिखाश्मश्रुरंगारोद्गारिलोचनः॥ ३२"],"iast":["tato'gnirutthitaḥ kuṇḍānmūrtimānatibhīṣaṇaḥ|","taptatāmraśikhāśmaśruraṃgārodgārilocanaḥ|| 32"],"meaning":"अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्‍नि मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल-लाल थे। आँखोंसे अंगारे बरस रहे थे॥ ३२॥"},{"id":"10.66.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/33/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीदण्डकठोरास्यः स्वजिह्वया।","आलिहन् सृक्किणी न‌ग्‍नो विधुन्वंस्त्रिशिखं ज्वलन्॥ ३३"],"iast":["daṃṣṭrograbhrukuṭīdaṇḍakaṭhorāsyaḥ svajihvayā|","ālihan sṛkkiṇī nagno vidhunvaṃstriśikhaṃ jvalan|| 33"],"meaning":"उग्र दाढ़ों और टेढ़ी भृकुटियोंके कारण उसके मुखसे क्रूरता टपक रही थी। वह अपनी जीभसे मुँहके दोनों कोने चाट रहा था। शरीर नंग-धड़ंग था। हाथमें त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमेंसे अग्‍निकी लपटें निकल रही थीं॥ ३३॥"},{"id":"10.66.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/34/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पद‍्भ्यां तालप्रमाणाभ्यां कम्पयन्‍नवनीतलम्।","सोऽभ्यधावद् वृतो भूतैर्द्वारकां प्रदहन् दिशः॥ ३४"],"iast":["padbhyāṃ tālapramāṇābhyāṃ kampayannavanītalam|","so'bhyadhāvad vṛto bhūtairdvārakāṃ pradahan diśaḥ|| 34"],"meaning":"ताड़के पेड़के समान बड़ी-बड़ी टाँगें थीं। वह अपने वेगसे धरतीको कँपाता हुआ और ज्वालाओंसे दसों दिशाओंको दग्ध करता हुआ द्वारकाकी ओर दौड़ा और बात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे॥ ३४॥"},{"id":"10.66.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/35/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमाभिचारदहनमायान्तं द्वारकौकसः।","विलोक्य तत्रसुः सर्वे वनदाहे मृगा यथा॥ ३५"],"iast":["tamābhicāradahanamāyāntaṃ dvārakaukasaḥ|","vilokya tatrasuḥ sarve vanadāhe mṛgā yathā|| 35"],"meaning":"उस अभिचारकी आगको बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी वैसे ही डर गये, जैसे जंगलमें आग लगनेपर हरिन डर जाते हैं॥ ३५॥"},{"id":"10.66.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/36/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्षैः सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुराः।","त्राहि त्राहि त्रिलोकेश वह्नेः प्रदहतः पुरम्॥ ३६"],"iast":["akṣaiḥ sabhāyāṃ krīḍantaṃ bhagavantaṃ bhayāturāḥ|","trāhi trāhi trilokeśa vahneḥ pradahataḥ puram|| 36"],"meaning":"वे लोग भयभीत होकर भगवान्‌के पास दौड़े हुए आये; भगवान् उस समय सभामें चौसर खेल रहे थे, उन लोगोंने भगवान्‌से प्रार्थना की—‘तीनों लोकोंके एकमात्र स्वामी! द्वारका नगरी इस आगसे भस्म होना चाहती है। आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा इसकी रक्षा और कोई नहीं कर सकता’॥ ३६॥"},{"id":"10.66.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/37/","page":549,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुत्वा तज्जनवैक्लव्यं दृष्ट्वा स्वानां च साध्वसम्।","शरण्यः सम्प्रहस्याह मा भैष्टेत्यवितास्म्यहम्॥ ३७"],"iast":["śrutvā tajjanavaiklavyaṃ dṛṣṭvā svānāṃ ca sādhvasam|","śaraṇyaḥ samprahasyāha mā bhaiṣṭetyavitāsmyaham|| 37"],"meaning":"शरणागतवत्सल भगवान्‌ने देखा कि हमारे स्वजन भयभीत हो गये हैं और पुकार-पुकारकर विकलताभरे स्वरसे हमारी प्रार्थना कर रहे हैं; तब उन्होंने हँसकर कहा—‘डरो मत, मैं तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा’॥ ३७॥"},{"id":"10.66.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/38/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वस्यान्तर्बहिःसाक्षी कृत्यां माहेश्‍वरीं विभुः।","विज्ञाय तद्विघातार्थं पार्श्‍वस्थं चक्रमादिशत्॥ ३८"],"iast":["sarvasyāntarbahiḥsākṣī kṛtyāṃ māheśvarīṃ vibhuḥ|","vijñāya tadvighātārthaṃ pārśvasthaṃ cakramādiśat|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् सबके बाहर-भीतरकी जाननेवाले हैं। वे जान गये कि यह काशीसे चली हुई माहेश्‍वरी कृत्या है। उन्होंने उसके प्रतीकारके लिये अपने पास ही विराजमान चक्रसुदर्शनको आज्ञा दी॥ ३८॥"},{"id":"10.66.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/39/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत् सूर्यकोटिप्रतिमं सुदर्शनं","जाज्वल्यमानं प्रलयानलप्रभम्।","स्वतेजसा खं ककुभोऽथ रोदसी","चक्रं मुकुन्दास्त्रमथाग्‍निमार्दयत्॥ ३९"],"iast":["tat sūryakoṭipratimaṃ sudarśanaṃ","jājvalyamānaṃ pralayānalaprabham|","svatejasā khaṃ kakubho'tha rodasī","cakraṃ mukundāstramathāgnimārdayat|| 39"],"meaning":"भगवान् मुकुन्दका प्यारा अस्त्र सुदर्शनचक्र कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी और प्रलयकालीन अग्‍निके समान जाज्वल्यमान है। उसके तेजसे आकाश, दिशाएँ और अन्तरिक्ष चमक उठे और अब उसने उस अभिचार-अग्‍निको कुचल डाला॥ ३९॥"},{"id":"10.66.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/40/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृत्यानलः प्रतिहतः स रथांगपाणे-","रस्त्रौजसा स नृप भ‌ग्‍नमुखो निवृत्तः।","वाराणसीं परिसमेत्य सुदक्षिणं तं","सर्त्विग्जनं समदहत् स्वकृतोऽभिचारः॥ ४०"],"iast":["kṛtyānalaḥ pratihataḥ sa rathāṃgapāṇe-","rastraujasā sa nṛpa bhagnamukho nivṛttaḥ|","vārāṇasīṃ parisametya sudakṣiṇaṃ taṃ","sartvigjanaṃ samadahat svakṛto'bhicāraḥ|| 40"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके अस्त्र सुदर्शनचक्रकी शक्तिसे कृत्यारूप आगका मुँह टूट-फूट गया, उसका तेज नष्ट हो गया, शक्ति कुण्ठित हो गयी और वह वहाँसे लौटकर काशी आ गयी तथा उसने ऋत्विज् आचार्योंके साथ सुदक्षिणको जलाकर भस्म कर दिया। इस प्रकार उसका अभिचार उसीके विनाशका कारण हुआ॥ ४०॥"},{"id":"10.66.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/41/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चक्रं च विष्णोस्तदनुप्रविष्टं","वाराणसीं साट्टसभालयापणाम्।","सगोपुराट्टालककोष्ठसंकुलां","सकोशहस्त्यश्‍वरथान्‍नशालाम्॥ ४१"],"iast":["cakraṃ ca viṣṇostadanupraviṣṭaṃ","vārāṇasīṃ sāṭṭasabhālayāpaṇām|","sagopurāṭṭālakakoṣṭhasaṃkulāṃ","sakośahastyaśvarathānnaśālām|| 41"],"meaning":"कृत्याके पीछे-पीछे सुदर्शनचक्र भी काशी पहुँचा। काशी बड़ी विशाल नगरी थी। वह बड़ी-बड़ी अटारियों, सभाभवन, बाजार, नगरद्वार, द्वारोंके शिखर, चहारदीवारियों, खजाने, हाथी, घोड़े, रथ और अन्‍नोंके गोदामसे सुसज्जित थी। भगवान् श्रीकृष्णके सुदर्शनचक्रने सारी काशीको जलाकर भस्म कर दिया और फिर वह परमानन्दमयी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया॥ ४१-४२॥","meaning_covers":[41,42]},{"id":"10.66.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/42/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दग्ध्वा वाराणसीं सर्वां विष्णोश्‍चक्रं सुदर्शनम्।","भूयः पार्श्‍वमुपातिष्ठत् कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ४२"],"iast":["dagdhvā vārāṇasīṃ sarvāṃ viṣṇoścakraṃ sudarśanam|","bhūyaḥ pārśvamupātiṣṭhat kṛṣṇasyākliṣṭakarmaṇaḥ|| 42"],"meaning":"कृत्याके पीछे-पीछे सुदर्शनचक्र भी काशी पहुँचा। काशी बड़ी विशाल नगरी थी। वह बड़ी-बड़ी अटारियों, सभाभवन, बाजार, नगरद्वार, द्वारोंके शिखर, चहारदीवारियों, खजाने, हाथी, घोड़े, रथ और अन्‍नोंके गोदामसे सुसज्जित थी। भगवान् श्रीकृष्णके सुदर्शनचक्रने सारी काशीको जलाकर भस्म कर दिया और फिर वह परमानन्दमयी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया॥ ४१-४२॥","meaning_covers":[41,42]},{"id":"10.66.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/43/","page":550,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["य एतच्छ्रावयेन्मर्त्य उत्तमश्‍लोकविक्रमम्।","समाहितो वा शृणुयात् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४३"],"iast":["ya etacchrāvayenmartya uttamaślokavikramam|","samāhito vā śṛṇuyāt sarvapāpaiḥ pramucyate|| 43"],"meaning":"जो मनुष्य पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके इस चरित्रको एकाग्रताके साथ सुनता या सुनाता है, वह सारे पापोंसे छूट जाता है॥ ४३॥"}],"text":[{"b":35042,"kind":"adhyaya_heading","page":546,"text":"अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः"},{"b":35043,"kind":"topic_heading","page":546,"text":"पौण्ड्रक और काशिराजका उद्धार"},{"b":35044,"kind":"topic_heading","page":546,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":35045,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.1"],"text":"नन्दव्रजं गते रामे करूषाधिपतिर्नृप।"},{"b":35046,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.1"],"text":"वासुदेवोऽहमित्यज्ञो दूतं कृष्णाय प्राहिणोत्॥ १"},{"b":35047,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.2"],"text":"त्वं वासुदेवो भगवानवतीर्णो जगत्पतिः।"},{"b":35048,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.2"],"text":"इति प्रस्तोभितो बालैर्मेन आत्मानमच्युतम्॥ २"},{"b":35049,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.3"],"text":"दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवर्त्मने।"},{"b":35050,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.3"],"text":"द्वारकायां यथा बालो नृपो बालकृतोऽबुधः॥ ३"},{"b":35051,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.4"],"text":"दूतस्तु द्वारकामेत्य सभायामास्थितं प्रभुम्।"},{"b":35052,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.4"],"text":"कृष्णं कमलपत्राक्षं राजसन्देशमब्रवीत्॥ ४"},{"b":35053,"kind":"hindi_commentary","page":546,"explains":["10.66.1","10.66.2","10.66.3","10.66.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् बलरामजी नन्दबाबाके व्रजमें गये हुए थे, तब पीछेसे करूष देशके अज्ञानी राजा पौण्ड्रकने भगवान् श्रीकृष्णके पास एक दूत भेजकर यह कहलाया कि ‘भगवान् वासुदेव मैं हूँ’॥ १॥ मूर्खलोग उसे बहकाया करते थे कि ‘आप ही भगवान् वासुदेव हैं और जगत‍्की रक्षाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं।’ इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपनेको ही भगवान् मान बैठा॥ २॥ जैसे बच्चे आपसमें खेलते समय किसी बालकको ही राजा मान लेते हैं और वह राजाकी तरह उनके साथ व्यवहार करने लगता है, वैसे ही मन्दमति अज्ञानी पौण्ड्रकने अचिन्त्यगति भगवान् श्रीकृष्णकी लीला और रहस्य न जानकर द्वारकामें उनके पास दूत भेज दिया॥ ३॥ पौण्ड्रकका दूत द्वारका आया और राजसभामें बैठे हुए कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उसने अपने राजाका यह सन्देश कह सुनाया—॥ ४॥"},{"b":35054,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.5"],"text":"वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापरः।"},{"b":35055,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.5"],"text":"भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज॥ ५"},{"b":35056,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.6"],"text":"यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत।"},{"b":35057,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.6"],"text":"त्यक्त्वैहि मां त्वं शरणं नो चेद् देहि ममाहवम्॥ ६"},{"b":35058,"kind":"hindi_translation","page":546,"explains":["10.66.5","10.66.6"],"text":"‘एकमात्र मैं ही वासुदेव हूँ। दूसरा कोई नहीं है। प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये मैंने ही अवतार ग्रहण किया है। तुमने झूठ-मूठ अपना नाम वासुदेव रख लिया है, अब उसे छोड़ दो॥ ५॥ यदुवंशी! तुमने मूर्खतावश मेरे चिह्न धारण कर रखे हैं। उन्हें छोड़कर मेरी शरणमें आओ और यदि मेरी बात तुम्हें स्वीकार न हो, तो मुझसे युद्ध करो’॥ ६॥"},{"b":35059,"kind":"topic_heading","page":546,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":35060,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.7"],"text":"कत्थनं तदुपाकर्ण्य पौण्ड्रकस्याल्पमेधसः।"},{"b":35061,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.7"],"text":"उग्रसेनादयः सभ्या उच्चकैर्जहसुस्तदा॥ ७"},{"b":35062,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.8"],"text":"उवाच दूतं भगवान् परिहासकथामनु।"},{"b":35063,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.8"],"text":"उत्स्रक्ष्ये मूढ चिह्नानि यैस्त्वमेवं विकत्थसे॥ ८"},{"b":35064,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.9"],"text":"मुखं तदपिधायाज्ञ कंकगृध्रवटैर्वृतः।"},{"b":35065,"kind":"sanskrit_shloka","page":546,"verses":["10.66.9"],"text":"शयिष्यसे हतस्तत्र भविता शरणं शुनाम्॥ ९"},{"b":35066,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.10"],"text":"इति दूतस्तदाक्षेपं स्वामिने सर्वमाहरत्।"},{"b":35067,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.10"],"text":"कृष्णोऽपि रथमास्थाय काशीमुपजगाम ह॥ १०"},{"b":35068,"kind":"hindi_commentary","page":546,"explains":["10.66.7","10.66.8","10.66.9","10.66.10"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मन्दमति पौण्ड्रककी यह बहक सुनकर उग्रसेन आदि सभासद् जोर-जोरसे हँसने लगे॥ ७॥ उन लोगोंकी हँसी समाप्त होनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने दूतसे कहा—‘तुम जाकर अपने राजासे कह देना कि ‘रे मूढ़! मैं अपने चक्र आदि चिह्न यों नहीं छोड़ूँगा। इन्हें मैं तुझपर छोड़ूँगा और केवल तुझपर ही नहीं, तेरे उन सब साथियोंपर भी, जिनके बहकानेसे तू इस प्रकार बहक रहा है। उस समय मूर्ख! तू अपना मुँह छिपाकर—औंधे मुँह गिरकर चील, गीध, बटेर आदि मांसभोजी पक्षियोंसे घिरकर सो जायगा और तू मेरा शरणदाता नहीं, उन कुत्तोंकी शरण होगा, जो तेरा मांस चींथ-चींथकर खा जायँगे’॥ ८-९॥ परीक्षित्! भगवान्‌का यह तिरस्कारपूर्ण संवाद लेकर पौण्ड्रकका दूत अपने स्वामीके पास गया और उसे कह सुनाया। इधर भगवान् श्रीकृष्णने भी रथपर सवार होकर काशीपर चढ़ाई कर दी। (क्योंकि वह करूषका राजा उन दिनों वहीं अपने मित्र काशिराजके पास रहता था)॥ १०॥"},{"b":35069,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.11"],"text":"पौण्ड्रकोऽपि तदुद्योगमुपलभ्य महारथः।"},{"b":35070,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.11"],"text":"अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तो निश्‍चक्राम पुराद् द्रुतम्॥ ११"},{"b":35071,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.12"],"text":"तस्य काशिपतिर्मित्रं पार्ष्णिग्राहोऽन्वयान्‍नृप।"},{"b":35072,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.12"],"text":"अक्षौहिणीभिस्तिसृभिरपश्यत् पौण्ड्रकं हरिः॥ १२"},{"b":35073,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.13"],"text":"शंखार्यसिगदाशार्ङ्गश्रीवत्साद्युपलक्षितम् ।"},{"b":35074,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.13"],"text":"बिभ्राणं कौस्तुभमणिं वनमालाविभूषितम्॥ १३"},{"b":35075,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.14"],"text":"कौशेयवाससी पीते वसानं गरुडध्वजम्।"},{"b":35076,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.14"],"text":"अमूल्यमौल्याभरणं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ १४"},{"b":35077,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.15"],"text":"दृष्ट्वा तमात्मनस्तुल्यवेषं कृत्रिममास्थितम्।"},{"b":35078,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.15"],"text":"यथा नटं रंगगतं विजहास भृशं हरिः॥ १५"},{"b":35079,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.16"],"text":"शूलैर्गदाभिः परिघैः शक्त्यृष्टिप्रासतोमरैः।"},{"b":35080,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.16"],"text":"असिभिः पट्टिशैर्बाणैः प्राहरन्‍नरयो हरिम्॥ १६"},{"b":35081,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.17"],"text":"कृष्णस्तु तत्पौण्ड्रककाशिराजयो-"},{"b":35082,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.17"],"text":"र्बलं गजस्यन्दनवाजिपत्तिमत्।"},{"b":35083,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.17"],"text":"गदासिचक्रेषुभिरार्दयद् भृशं"},{"b":35084,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.17"],"text":"यथा युगान्ते हुतभुक् पृथक् प्रजाः॥ १७"},{"b":35085,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.18"],"text":"आयोधनं तद्रथवाजिकुंजर-"},{"b":35086,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.18"],"text":"द्विपत्खरोष्ट्रैररिणावखण्डितैः ।"},{"b":35087,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.18"],"text":"बभौ चितं मोदवहं मनस्विना-"},{"b":35088,"kind":"sanskrit_shloka","page":547,"verses":["10.66.18"],"text":"माक्रीडनं भूतपतेरिवोल्बणम्॥ १८"},{"b":35089,"kind":"hindi_commentary","page":547,"explains":["10.66.11","10.66.12","10.66.13","10.66.14","10.66.15","10.66.16","10.66.17","10.66.18"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णके आक्रमणका समाचार पाकर महारथी पौण्ड्रक भी दो अक्षौहिणी सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकल आया॥ ११॥ काशीका राजा पौण्ड्रकका मित्र था। अतः वह भी उसकी सहायता करनेके लिये तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ उसके पीछे-पीछे आया। परीक्षित्! अब भगवान् श्रीकृष्णने पौण्ड्रकको देखा॥ १२॥ पौण्ड्रकने भी शंख, चक्र, तलवार, गदा, शार्ङ्गधनुष और श्रीवत्सचिह्न आदि धारण कर रखे थे। उसके वक्षःस्थलपर बनावटी कौस्तुभमणि और वनमाला भी लटक रही थी॥ १३॥ उसने रेशमी पीले वस्त्र पहन रखे थे और रथकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न भी लगा रखा था। उसके सिरपर अमूल्य मुकुट था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे॥ १४॥ उसका यह सारा-का-सारा वेष बनावटी था, मानो कोई अभिनेता रंगमंचपर अभिनय करनेके लिये आया हो। उसकी वेष-भूषा अपने समान देखकर भगवान् श्रीकृष्ण खिलखिलाकर हँसने लगे॥ १५॥ अब शत्रुओंने भगवान् श्रीकृष्णपर त्रिशूल, गदा, मुद्गर, शक्ति, ऋष्टि, प्रास, तोमर, तलवार, पट्टिश और बाण आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार किया॥ १६॥ प्रलयके समय जिस प्रकार आग सभी प्रकारके प्राणियोंको जला देती है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णने भी गदा, तलवार, चक्र और बाण आदि शस्त्रास्त्रोंसे पौण्ड्रक तथा काशिराजके हाथी, रथ, घोड़े और पैदलकी चतुरंगिणी सेनाको तहस-नहस कर दिया॥ १७॥ वह रणभूमि भगवान्‌के चक्रसे खण्ड-खण्ड हुए रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य, गधे और ऊँटोंसे पट गयी। उस समय ऐसा मालूम हो रहा था, मानो वह भूतनाथ शंकरकी भयंकर क्रीडास्थली हो। उसे देख-देखकर शूरवीरोंका उत्साह और भी बढ़ रहा था॥ १८॥"},{"b":35090,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.19"],"text":"अथाह पौण्ड्रकं शौरिर्भो भोः पौण्ड्रक यद् भवान्।"},{"b":35091,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.19"],"text":"दूतवाक्येन मामाह तान्यस्त्राण्युत्सृजामि ते॥ १९"},{"b":35092,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.20"],"text":"त्याजयिष्येऽभिधानं मे यत्त्वयाज्ञ मृषा धृतम्।"},{"b":35093,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.20"],"text":"व्रजामि शरणं तेऽद्य यदि नेच्छामि संयुगम्॥ २०"},{"b":35094,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.21"],"text":"इति क्षिप्त्वा शितैर्बाणैर्विरथीकृत्य पौण्ड्रकम्।"},{"b":35095,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.21"],"text":"शिरोऽवृश्‍चद् रथांगेन वज्रेणेन्द्रो यथा गिरेः॥ २१"},{"b":35096,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.22"],"text":"तथा काशिपतेः कायाच्छिर उत्कृत्य पत्रिभिः।"},{"b":35097,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.22"],"text":"न्यपातयत् काशिपुर्यां पद्मकोशमिवानिलः॥ २२"},{"b":35098,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.23"],"text":"एवं मत्सरिणं हत्वा पौण्ड्रकं ससखं हरिः।"},{"b":35099,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.23"],"text":"द्वारकामाविशत् सिद्धैर्गीयमानकथामृतः॥ २३"},{"b":35100,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.24"],"text":"स नित्यं भगवद्ध्यानप्रध्वस्ताखिलबन्धनः।"},{"b":35101,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.24"],"text":"बिभ्राणश्‍च हरे राजन् स्वरूपं तन्मयोऽभवत्॥ २४"},{"b":35102,"kind":"hindi_translation","page":548,"explains":["10.66.19","10.66.20","10.66.21","10.66.22","10.66.23","10.66.24"],"text":"अब भगवान् श्रीकृष्णने पौण्ड्रकसे कहा—‘रे पौण्ड्रक! तूने दूतके द्वारा कहलाया था कि मेरे चिह्न अस्त्र-शस्त्रादि छोड़ दो। सो अब मैं उन्हें तुझपर छोड़ रहा हूँ॥ १९॥ तूने झूठ-मूठ मेरा नाम रख लिया है। अतः मूर्ख! अब मैं तुझसे उन नामोंको भी छुड़ाकर रहूँगा। रही तेरे शरणमें आनेकी बात; सो यदि मैं तुझसे युद्ध न कर सकूँगा तो तेरी शरण ग्रहण करूँगा’॥ २०॥ भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार पौण्ड्रकका तिरस्कार करके अपने तीखे बाणोंसे उसके रथको तोड़-फोड़ डाला और चक्रसे उसका सिर वैसे ही उतार लिया, जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पहाड़की चोटियोंको उड़ा दिया था॥ २१॥ इसी प्रकार भगवान्‌ने अपने बाणोंसे काशिनरेशका सिर भी धड़से ऊपर उड़ाकर काशीपुरीमें गिरा दिया, जैसे वायु कमलका पुष्प गिरा देती है॥ २२॥ इस प्रकार अपने साथ डाह रखनेवाले पौण्ड्रकको और उसके सखा काशिनरेशको मारकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी राजधानी द्वारकामें लौट आये। उस समय सिद्धगण भगवान्‌की अमृतमयी कथाका गान कर रहे थे॥ २३॥ परीक्षित्! पौण्ड्रक भगवान्‌के रूपका, चाहे वह किसी भावसे हो, सदा चिन्तन करता रहता था। इससे उसके सारे बन्धन कट गये। वह भगवान्‌का बनावटी वेष धारण किये रहता था, इससे बार-बार उसीका स्मरण होनेके कारण वह भगवान्‌के सारूप्यको ही प्राप्त हुआ॥ २४॥"},{"b":35103,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.25"],"text":"शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्।"},{"b":35104,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.25"],"text":"किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिश्यिरे जनाः॥ २५"},{"b":35105,"kind":"hindi_translation","page":548,"explains":["10.66.25"],"text":"इधर काशीमें राजमहलके दरवाजेपर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरहका सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है?’॥ २५॥"},{"b":35106,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.26"],"text":"राज्ञः काशिपतेर्ज्ञात्वा महिष्यः पुत्रबान्धवाः।"},{"b":35107,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.26"],"text":"पौराश्‍च हा हता राजन् नाथ नाथेति प्रारुदन्॥ २६"},{"b":35108,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.27"],"text":"सुदक्षिणस्तस्य सुतः कृत्वा संस्थाविधिं पितुः।"},{"b":35109,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.27"],"text":"निहत्य पितृहन्तारं यास्याम्यपचितिं पितुः॥ २७"},{"b":35110,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.28"],"text":"इत्यात्मनाभिसन्धाय सोपाध्यायो महेश्‍वरम्।"},{"b":35111,"kind":"sanskrit_shloka","page":548,"verses":["10.66.28"],"text":"सुदक्षिणोऽर्चयामास परमेण समाधिना॥ २८"},{"b":35112,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.29"],"text":"प्रीतोऽविमुक्ते भगवांस्तस्मै वरमदाद् भवः।"},{"b":35113,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.29"],"text":"पितृहन्तृवधोपायं स वव्रे वरमीप्सितम्॥ २९"},{"b":35114,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.30"],"text":"दक्षिणाग्‍निं परिचर ब्राह्मणैः सममृत्विजम्।"},{"b":35115,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.30"],"text":"अभिचारविधानेन स चाग्‍निः प्रमथैर्वृतः॥ ३०"},{"b":35116,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.31"],"text":"साधयिष्यति संकल्पमब्रह्मण्ये प्रयोजितः।"},{"b":35117,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.31"],"text":"इत्यादिष्टस्तथा चक्रे कृष्णायाभिचरन् व्रती॥ ३१"},{"b":35118,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.32"],"text":"ततोऽग्‍निरुत्थितः कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषणः।"},{"b":35119,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.32"],"text":"तप्तताम्रशिखाश्मश्रुरंगारोद्गारिलोचनः॥ ३२"},{"b":35120,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.33"],"text":"दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीदण्डकठोरास्यः स्वजिह्वया।"},{"b":35121,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.33"],"text":"आलिहन् सृक्किणी न‌ग्‍नो विधुन्वंस्त्रिशिखं ज्वलन्॥ ३३"},{"b":35122,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.34"],"text":"पद‍्भ्यां तालप्रमाणाभ्यां कम्पयन्‍नवनीतलम्।"},{"b":35123,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.34"],"text":"सोऽभ्यधावद् वृतो भूतैर्द्वारकां प्रदहन् दिशः॥ ३४"},{"b":35124,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.35"],"text":"तमाभिचारदहनमायान्तं द्वारकौकसः।"},{"b":35125,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.35"],"text":"विलोक्य तत्रसुः सर्वे वनदाहे मृगा यथा॥ ३५"},{"b":35126,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.36"],"text":"अक्षैः सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुराः।"},{"b":35127,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.36"],"text":"त्राहि त्राहि त्रिलोकेश वह्नेः प्रदहतः पुरम्॥ ३६"},{"b":35128,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.37"],"text":"श्रुत्वा तज्जनवैक्लव्यं दृष्ट्वा स्वानां च साध्वसम्।"},{"b":35129,"kind":"sanskrit_shloka","page":549,"verses":["10.66.37"],"text":"शरण्यः सम्प्रहस्याह मा भैष्टेत्यवितास्म्यहम्॥ ३७"},{"b":35130,"kind":"hindi_translation","page":548,"explains":["10.66.26","10.66.27","10.66.28","10.66.29","10.66.30","10.66.31","10.66.32","10.66.33","10.66.34","10.66.35","10.66.36","10.66.37"],"text":"जब यह मालूम हुआ कि वह तो काशिनरेशका ही सिर है, तब रानियाँ, राजकुमार, राजपरिवारके लोग तथा नागरिक रो-रोकर विलाप करने लगे—‘हा नाथ! हा राजन्! हाय-हाय! हमारा तो सर्वनाश हो गया’॥ २६॥ काशिनरेशका पुत्र था सुदक्षिण। उसने अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करके मन-ही-मन यह निश्‍चय किया कि अपने पितृघातीको मारकर ही मैं पिताके ऋणसे उऋण हो सकूँगा। निदान वह अपने कुलपुरोहित और आचार्योंके साथ अत्यन्त एकाग्रतासे भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ २७-२८॥ काशी नगरीमें उसकी आराधनासे प्रसन्‍न होकर भगवान् शंकरने वर देनेको कहा। सुदक्षिणने यह अभीष्ट वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघातीके वधका उपाय बतलाइये॥ २९॥ भगवान् शंकरने कहा—‘तुम ब्राह्मणोंके साथ मिलकर यज्ञके देवता ऋत्विग्भूत दक्षिणाग्‍निकी अभिचारविधिसे आराधना करो। इससे वह अग्‍नि प्रमथगणोंके साथ प्रकट होकर यदि ब्राह्मणोंके अभक्तपर प्रयोग करोगे तो वह तुम्हारा संकल्प सिद्ध करेगा।’ भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्त करके सुदक्षिणने अनुष्ठानके उपयुक्त नियम ग्रहण किये और वह भगवान् श्रीकृष्णके लिये अभिचार (मारणका पुरश्‍चरण) करने लगा॥ ३०-३१॥ अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्‍नि मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल-लाल थे। आँखोंसे अंगारे बरस रहे थे॥ ३२॥ उग्र दाढ़ों और टेढ़ी भृकुटियोंके कारण उसके मुखसे क्रूरता टपक रही थी। वह अपनी जीभसे मुँहके दोनों कोने चाट रहा था। शरीर नंग-धड़ंग था। हाथमें त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमेंसे अग्‍निकी लपटें निकल रही थीं॥ ३३॥ ताड़के पेड़के समान बड़ी-बड़ी टाँगें थीं। वह अपने वेगसे धरतीको कँपाता हुआ और ज्वालाओंसे दसों दिशाओंको दग्ध करता हुआ द्वारकाकी ओर दौड़ा और बात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे॥ ३४॥ उस अभिचारकी आगको बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी वैसे ही डर गये, जैसे जंगलमें आग लगनेपर हरिन डर जाते हैं॥ ३५॥ वे लोग भयभीत होकर भगवान्‌के पास दौड़े हुए आये; भगवान् उस समय सभामें चौसर खेल रहे थे, उन लोगोंने भगवान्‌से प्रार्थना की—‘तीनों लोकोंके एकमात्र स्वामी! द्वारका नगरी इस आगसे भस्म होना चाहती है। आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा इसकी रक्षा और कोई नहीं कर सकता’॥ ३६॥ शरणागतवत्सल भगवान्‌ने देखा कि हमारे स्वजन भयभीत हो गये हैं और पुकार-पुकारकर विकलताभरे स्वरसे हमारी प्रार्थना कर रहे हैं; तब उन्होंने हँसकर कहा—‘डरो मत, मैं तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा’॥ ३७॥"},{"b":35131,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.38"],"text":"सर्वस्यान्तर्बहिःसाक्षी कृत्यां माहेश्‍वरीं विभुः।"},{"b":35132,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.38"],"text":"विज्ञाय तद्विघातार्थं पार्श्‍वस्थं चक्रमादिशत्॥ ३८"},{"b":35133,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.39"],"text":"तत् सूर्यकोटिप्रतिमं सुदर्शनं"},{"b":35134,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.39"],"text":"जाज्वल्यमानं प्रलयानलप्रभम्।"},{"b":35135,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.39"],"text":"स्वतेजसा खं ककुभोऽथ रोदसी"},{"b":35136,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.39"],"text":"चक्रं मुकुन्दास्त्रमथाग्‍निमार्दयत्॥ ३९"},{"b":35137,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.40"],"text":"कृत्यानलः प्रतिहतः स रथांगपाणे-"},{"b":35138,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.40"],"text":"रस्त्रौजसा स नृप भ‌ग्‍नमुखो निवृत्तः।"},{"b":35139,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.40"],"text":"वाराणसीं परिसमेत्य सुदक्षिणं तं"},{"b":35140,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.40"],"text":"सर्त्विग्जनं समदहत् स्वकृतोऽभिचारः॥ ४०"},{"b":35141,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.41"],"text":"चक्रं च विष्णोस्तदनुप्रविष्टं"},{"b":35142,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.41"],"text":"वाराणसीं साट्टसभालयापणाम्।"},{"b":35143,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.41"],"text":"सगोपुराट्टालककोष्ठसंकुलां"},{"b":35144,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.41"],"text":"सकोशहस्त्यश्‍वरथान्‍नशालाम्॥ ४१"},{"b":35145,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.42"],"text":"दग्ध्वा वाराणसीं सर्वां विष्णोश्‍चक्रं सुदर्शनम्।"},{"b":35146,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.42"],"text":"भूयः पार्श्‍वमुपातिष्ठत् कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ४२"},{"b":35147,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.43"],"text":"य एतच्छ्रावयेन्मर्त्य उत्तमश्‍लोकविक्रमम्।"},{"b":35148,"kind":"sanskrit_shloka","page":550,"verses":["10.66.43"],"text":"समाहितो वा शृणुयात् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४३"},{"b":35149,"kind":"hindi_translation","page":550,"explains":["10.66.38","10.66.39","10.66.40","10.66.41","10.66.42"],"text":"परीक्षित्! भगवान् सबके बाहर-भीतरकी जाननेवाले हैं। वे जान गये कि यह काशीसे चली हुई माहेश्‍वरी कृत्या है। उन्होंने उसके प्रतीकारके लिये अपने पास ही विराजमान चक्रसुदर्शनको आज्ञा दी॥ ३८॥ भगवान् मुकुन्दका प्यारा अस्त्र सुदर्शनचक्र कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी और प्रलयकालीन अग्‍निके समान जाज्वल्यमान है। उसके तेजसे आकाश, दिशाएँ और अन्तरिक्ष चमक उठे और अब उसने उस अभिचार-अग्‍निको कुचल डाला॥ ३९॥ भगवान् श्रीकृष्णके अस्त्र सुदर्शनचक्रकी शक्तिसे कृत्यारूप आगका मुँह टूट-फूट गया, उसका तेज नष्ट हो गया, शक्ति कुण्ठित हो गयी और वह वहाँसे लौटकर काशी आ गयी तथा उसने ऋत्विज् आचार्योंके साथ सुदक्षिणको जलाकर भस्म कर दिया। इस प्रकार उसका अभिचार उसीके विनाशका कारण हुआ॥ ४०॥ कृत्याके पीछे-पीछे सुदर्शनचक्र भी काशी पहुँचा। काशी बड़ी विशाल नगरी थी। वह बड़ी-बड़ी अटारियों, सभाभवन, बाजार, नगरद्वार, द्वारोंके शिखर, चहारदीवारियों, खजाने, हाथी, घोड़े, रथ और अन्‍नोंके गोदामसे सुसज्जित थी। भगवान् श्रीकृष्णके सुदर्शनचक्रने सारी काशीको जलाकर भस्म कर दिया और फिर वह परमानन्दमयी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया॥ ४१-४२॥"},{"b":35150,"kind":"hindi_translation","page":550,"explains":["10.66.43"],"text":"जो मनुष्य पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके इस चरित्रको एकाग्रताके साथ सुनता या सुनाता है, वह सारे पापोंसे छूट जाता है॥ ४३॥"},{"b":35151,"kind":"hindi_translation","page":550,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पौण्ड्रकादिवधो नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः॥ ६६॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":3,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}