{"id":"10.78","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 78","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः","topics":["दन्तवक्त्र और विदूरथका उद्धार तथा तीर्थयात्रामें बलरामजीके हाथसे सूतजीका वध"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.78.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[610,615]},"verses":[{"id":"10.78.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/1/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिशुपालस्य शाल्वस्य पौण्ड्रकस्यापि दुर्मतिः।","परलोकगतानां च कुर्वन् पारोक्ष्यसौहृदम्॥ १"],"iast":["śiśupālasya śālvasya pauṇḍrakasyāpi durmatiḥ|","paralokagatānāṃ ca kurvan pārokṣyasauhṛdam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका। वह क्रोधके मारे आग-बबूला हो रहा था। शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.78.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/2/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकः पदातिः संक्रुद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन्।","पद‍्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यदृश्यत॥ २"],"iast":["ekaḥ padātiḥ saṃkruddho gadāpāṇiḥ prakampayan|","padbhyāmimāṃ mahārāja mahāsattvo vyadṛśyata|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका। वह क्रोधके मारे आग-बबूला हो रहा था। शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.78.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/3/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं तथाऽऽयान्तमालोक्य गदामादाय सत्वरः।","अवप्लुत्य रथात् कृष्णः सिन्धुं वेलेव प्रत्यधात्॥ ३"],"iast":["taṃ tathā''yāntamālokya gadāmādāya satvaraḥ|","avaplutya rathāt kṛṣṇaḥ sindhuṃ veleva pratyadhāt|| 3"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने जब उसे इस प्रकार आते देखा, तब झटपट हाथमें गदा लेकर वे रथसे कूद पड़े। फिर जैसे समुद्रके तटकी भूमि उसके ज्वार-भाटेको आगे बढ़नेसे रोक देती है, वैसे ही उन्होंने उसे रोक दिया॥ ३॥"},{"id":"10.78.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/4/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मदः।","दिष्ट्या दिष्ट्या भवानद्य मम दृष्टिपथं गतः॥ ४"],"iast":["gadāmudyamya kārūṣo mukundaṃ prāha durmadaḥ|","diṣṭyā diṣṭyā bhavānadya mama dṛṣṭipathaṃ gataḥ|| 4"],"meaning":"घमंडके नशेमें चूर करूषनरेश दन्तवक्त्रने गदा तानकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है कि आज तुम मेरी आँखोंके सामने पड़ गये॥ ४॥"},{"id":"10.78.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/5/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वं मातुलेयो नः कृष्ण मित्रध्रुङ्मां जिघांससि।","अतस्त्वां गदया मन्द हनिष्ये वज्रकल्पया॥ ५"],"iast":["tvaṃ mātuleyo naḥ kṛṣṇa mitradhruṅmāṃ jighāṃsasi|","atastvāṃ gadayā manda haniṣye vajrakalpayā|| 5"],"meaning":"कृष्ण! तुम मेरे मामाके लड़के हो, इसलिये तुम्हें मारना तो नहीं चाहिये; परन्तु एक तो तुमने मेरे मित्रोंको मार डाला है और दूसरे मुझे भी मारना चाहते हो। इसलिये मतिमन्द! आज मैं तुम्हें अपनी वज्रकर्कश गदासे चूर-चूर कर डालूँगा॥ ५॥"},{"id":"10.78.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/6/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तर्ह्यानृण्यमुपैम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सलः।","बन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधिं देहचरं यथा॥ ६"],"iast":["tarhyānṛṇyamupaimyajña mitrāṇāṃ mitravatsalaḥ|","bandhurūpamariṃ hatvā vyādhiṃ dehacaraṃ yathā|| 6"],"meaning":"मूर्ख! वैसे तो तुम मेरे सम्बन्धी हो, फिर भी हो शत्रु ही, जैसे अपने ही शरीरमें रहनेवाला कोई रोग हो! मैं अपने मित्रोंसे बड़ा प्रेम करता हूँ, उनका मुझपर ऋण है। अब तुम्हें मारकर ही मैं उनके ऋणसे उऋण हो सकता हूँ॥ ६॥"},{"id":"10.78.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/7/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं रूक्षैस्तुदन् वाक्यैः कृष्णं तोत्त्रैरिव द्विपम्।","गदयाताडयन्मूर्ध्नि सिंहवद् व्यनदच्च सः॥ ७"],"iast":["evaṃ rūkṣaistudan vākyaiḥ kṛṣṇaṃ tottrairiva dvipam|","gadayātāḍayanmūrdhni siṃhavad vyanadacca saḥ|| 7"],"meaning":"जैसे महावत अंकुशसे हाथीको घायल करता है, वैसे ही दन्तवक्त्रने अपनी कड़वी बातोंसे श्रीकृष्णको चोट पहुँचानेकी चेष्टा की और फिर वह उनके सिरपर बड़े वेगसे गदा मारकर सिंहके समान गरज उठा॥ ७॥"},{"id":"10.78.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/8/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गदयाभिहतोऽप्याजौ न चचाल यदूद्वहः।","कृष्णोऽपि तमहन् गुर्व्या कौमोदक्या स्तनान्तरे॥ ८"],"iast":["gadayābhihato'pyājau na cacāla yadūdvahaḥ|","kṛṣṇo'pi tamahan gurvyā kaumodakyā stanāntare|| 8"],"meaning":"रणभूमिमें गदाकी चोट खाकर भी भगवान् श्रीकृष्ण टस-से-मस न हुए। उन्होंने अपनी बहुत बड़ी कौमोदकी गदा सँभालकर उससे दन्तवक्त्रके वक्षःस्थलपर प्रहार किया॥ ८॥"},{"id":"10.78.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/9/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गदानिर्भिन्‍नहृदय उद्वमन् रुधिरं मुखात्।","प्रसार्य केशबाह्वङ्‌घ्रीन् धरण्यां न्यपतद् व्यसुः॥ ९"],"iast":["gadānirbhinnahṛdaya udvaman rudhiraṃ mukhāt|","prasārya keśabāhvaṅghrīn dharaṇyāṃ nyapatad vyasuḥ|| 9"],"meaning":"गदाकी चोटसे दन्तवक्त्रका कलेजा फट गया। वह मुँहसे खून उगलने लगा। उसके बाल बिखर गये, भुजाएँ और पैर फैल गये। निदान निष्प्राण होकर वह धरतीपर गिर पड़ा॥ ९॥"},{"id":"10.78.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/10/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः सूक्ष्मतरं ज्योतिः कृष्णमाविशदद्भुतम्।","पश्यतां सर्वभूतानां यथा चैद्यवधे नृप॥ १०"],"iast":["tataḥ sūkṣmataraṃ jyotiḥ kṛṣṇamāviśadadbhutam|","paśyatāṃ sarvabhūtānāṃ yathā caidyavadhe nṛpa|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! जैसा कि शिशुपालकी मृत्युके समय हुआ था, सब प्राणियोंके सामने ही दन्तवक्त्रके मृत शरीरसे एक अत्यन्त सूक्ष्म ज्योति निकली और वह बड़ी विचित्र रीतिसे भगवान् श्रीकृष्णमें समा गयी॥ १०॥"},{"id":"10.78.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/11/","page":611,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विदूरथस्तु तद‍्भ्राता भ्रातृशोकपरिप्लुतः।","आगच्छदसिचर्मभ्यामुच्छ्वसंस्तज्जिघांसया॥ ११"],"iast":["vidūrathastu tadbhrātā bhrātṛśokapariplutaḥ|","āgacchadasicarmabhyāmucchvasaṃstajjighāṃsayā|| 11"],"meaning":"दन्तवक्त्रके भाईका नाम था विदूरथ। वह अपने भाईकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो गया। अब वह क्रोधके मारे लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ हाथमें ढाल-तलवार लेकर भगवान् श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे आया॥ ११॥"},{"id":"10.78.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/12/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य चापततः कृष्णश्‍चक्रेण क्षुरनेमिना।","शिरो जहार राजेन्द्र सकिरीटं सकुण्डलम्॥ १२"],"iast":["tasya cāpatataḥ kṛṣṇaścakreṇa kṣuraneminā|","śiro jahāra rājendra sakirīṭaṃ sakuṇḍalam|| 12"],"meaning":"राजेन्द्र! जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि अब वह प्रहार करना ही चाहता है, तब उन्होंने अपने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे किरीट और कुण्डलके साथ उसका सिर धड़से अलग कर दिया॥ १२॥"},{"id":"10.78.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/13/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सौभं च शाल्वं च दन्तवक्त्रं सहानुजम्।","हत्वा दुर्विषहानन्यैरीडितः सुरमानवैः॥ १३"],"iast":["evaṃ saubhaṃ ca śālvaṃ ca dantavaktraṃ sahānujam|","hatvā durviṣahānanyairīḍitaḥ suramānavaiḥ|| 13"],"meaning":"इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने शाल्व, उसके विमान सौभ, दन्तवक्त्र और विदूरथको, जिन्हें मारना दूसरोंके लिये अशक्य था, मारकर द्वारकापुरीमें प्रवेश किया। उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति कर रहे थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, सिद्ध-गन्धर्व, विद्याधर और वासुकि आदि महानाग, अप्सराएँ, पितर, यक्ष, किन्‍नर तथा चारण उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी विजयके गीत गा रहे थे। भगवान्‌के प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा दी गयी थी और बड़े-बड़े वृष्णिवंशी यादव वीर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ १३—१५॥","meaning_covers":[13,15]},{"id":"10.78.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/14/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुनिभिः सिद्धगन्धर्वैर्विद्याधरमहोरगैः।","अप्सरोभिः पितृगणैर्यक्षैः किन्‍नरचारणैः॥ १४"],"iast":["munibhiḥ siddhagandharvairvidyādharamahoragaiḥ|","apsarobhiḥ pitṛgaṇairyakṣaiḥ kinnaracāraṇaiḥ|| 14"],"meaning":"इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने शाल्व, उसके विमान सौभ, दन्तवक्त्र और विदूरथको, जिन्हें मारना दूसरोंके लिये अशक्य था, मारकर द्वारकापुरीमें प्रवेश किया। उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति कर रहे थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, सिद्ध-गन्धर्व, विद्याधर और वासुकि आदि महानाग, अप्सराएँ, पितर, यक्ष, किन्‍नर तथा चारण उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी विजयके गीत गा रहे थे। भगवान्‌के प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा दी गयी थी और बड़े-बड़े वृष्णिवंशी यादव वीर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ १३—१५॥","meaning_covers":[13,15]},{"id":"10.78.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/15/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपगीयमानविजयः कुसुमैरभिवर्षितः।","वृतश्‍च वृष्णिप्रवरैर्विवेशालङ्कृतां पुरीम्॥ १५"],"iast":["upagīyamānavijayaḥ kusumairabhivarṣitaḥ|","vṛtaśca vṛṣṇipravarairviveśālaṅkṛtāṃ purīm|| 15"],"meaning":"इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने शाल्व, उसके विमान सौभ, दन्तवक्त्र और विदूरथको, जिन्हें मारना दूसरोंके लिये अशक्य था, मारकर द्वारकापुरीमें प्रवेश किया। उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति कर रहे थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, सिद्ध-गन्धर्व, विद्याधर और वासुकि आदि महानाग, अप्सराएँ, पितर, यक्ष, किन्‍नर तथा चारण उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी विजयके गीत गा रहे थे। भगवान्‌के प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा दी गयी थी और बड़े-बड़े वृष्णिवंशी यादव वीर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ १३—१५॥","meaning_covers":[13,15]},{"id":"10.78.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/16/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं योगेश्‍वरः कृष्णो भगवान् जगदीश्‍वरः।","ईयते पशुदृष्टीनां निर्जितो जयतीति सः॥ १६"],"iast":["evaṃ yogeśvaraḥ kṛṣṇo bhagavān jagadīśvaraḥ|","īyate paśudṛṣṭīnāṃ nirjito jayatīti saḥ|| 16"],"meaning":"योगेश्‍वर एवं जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण इसी प्रकार अनेकों खेल खेलते रहते हैं। जो पशुओंके समान अविवेकी हैं, वे उन्हें कभी हारते भी देखते हैं। परन्तु वास्तवमें तो वे सदा-सर्वदा विजयी ही हैं॥ १६॥"},{"id":"10.78.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/17/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुत्वा युद्धोद्यमं रामः कुरूणां सह पाण्डवैः।","तीर्थाभिषेकव्याजेन मध्यस्थः प्रययौ किल॥ १७"],"iast":["śrutvā yuddhodyamaṃ rāmaḥ kurūṇāṃ saha pāṇḍavaiḥ|","tīrthābhiṣekavyājena madhyasthaḥ prayayau kila|| 17"],"meaning":"एक बार बलरामजीने सुना कि दुर्योधनादि कौरव पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेकी तैयारी कर रहे हैं। वे मध्यस्थ थे, उन्हें किसीका पक्ष लेकर लड़ना पसंद नहीं था। इसलिये वे तीर्थोंमें स्नान करनेके बहाने द्वारकासे चले गये॥ १७॥"},{"id":"10.78.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/18/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्नात्वा प्रभासे सन्तर्प्य देवर्षिपितृमानवान्।","सरस्वतीं प्रतिस्रोतं ययौ ब्राह्मणसंवृतः॥ १८"],"iast":["snātvā prabhāse santarpya devarṣipitṛmānavān|","sarasvatīṃ pratisrotaṃ yayau brāhmaṇasaṃvṛtaḥ|| 18"],"meaning":"वहाँसे चलकर उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें स्नान किया और तर्पण तथा ब्राह्मणभोजनके द्वारा देवता, ऋषि, पितर और मनुष्योंको तृप्त किया। इसके बाद वे कुछ ब्राह्मणोंके साथ जिधरसे सरस्वती नदी आ रही थी, उधर ही चल पड़े॥ १८॥"},{"id":"10.78.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/19/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृथूदकं बिन्दुसरस्त्रितकूपं सुदर्शनम्।","विशालं ब्रह्मतीर्थं च चक्रं प्राचीं सरस्वतीम्॥ १९"],"iast":["pṛthūdakaṃ bindusarastritakūpaṃ sudarśanam|","viśālaṃ brahmatīrthaṃ ca cakraṃ prācīṃ sarasvatīm|| 19"],"meaning":"वे क्रमशः पृथूदक, बिन्दुसर, त्रितकूप, सुदर्शनतीर्थ, विशालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, चक्रतीर्थ और पूर्ववाहिनी सरस्वती आदि तीर्थोंमें गये॥ १९॥"},{"id":"10.78.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/20/","page":612,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यमुनामनु यान्येव गंगामनु च भारत।","जगाम नैमिषं यत्र ऋषयः सत्रमासते॥ २०"],"iast":["yamunāmanu yānyeva gaṃgāmanu ca bhārata|","jagāma naimiṣaṃ yatra ṛṣayaḥ satramāsate|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! तदनन्तर यमुनातट और गंगातटके प्रधान-प्रधान तीर्थोंमें होते हुए वे नैमिषारण्य क्षेत्रमें गये। उन दिनों नैमिषारण्य क्षेत्रमें बड़े-बड़े ऋषि सत्संगरूप महान् सत्र कर रहे थे॥ २०॥"},{"id":"10.78.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/21/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमागतमभिप्रेत्य मुनयो दीर्घसत्रिणः।","अभिनन्द्य यथान्यायं प्रणम्योत्थाय चार्चयन्॥ २१"],"iast":["tamāgatamabhipretya munayo dīrghasatriṇaḥ|","abhinandya yathānyāyaṃ praṇamyotthāya cārcayan|| 21"],"meaning":"दीर्घकालतक सत्संगसत्रका नियम लेकर बैठे हुए ऋषियोंने बलरामजीको आया देख अपने-अपने आसनोंसे उठकर उनका स्वागत-सत्कार किया और यथायोग्य प्रणाम-आशीर्वाद करके उनकी पूजा की॥ २१॥"},{"id":"10.78.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/22/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽर्चितः सपरीवारः कृतासनपरिग्रहः।","रोमहर्षणमासीनं महर्षेः शिष्यमैक्षत॥ २२"],"iast":["so'rcitaḥ saparīvāraḥ kṛtāsanaparigrahaḥ|","romaharṣaṇamāsīnaṃ maharṣeḥ śiṣyamaikṣata|| 22"],"meaning":"वे अपने साथियोंके साथ आसन ग्रहण करके बैठ गये और उनकी अर्चा-पूजा हो चुकी, तब उन्होंने देखा कि भगवान् व्यासके शिष्य रोमहर्षण व्यासगद्दीपर बैठे हुए हैं॥ २२॥"},{"id":"10.78.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/23/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्वणांजलिम्।","अध्यासीनं च तान् विप्रांश्‍चुकोपोद्वीक्ष्य माधवः॥ २३"],"iast":["apratyutthāyinaṃ sūtamakṛtaprahvaṇāṃjalim|","adhyāsīnaṃ ca tān viprāṃścukopodvīkṣya mādhavaḥ|| 23"],"meaning":"बलरामजीने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जातिमें उत्पन्‍न होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऊँचे आसनपर बैठे हुए हैं और उनके आनेपर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया॥ २३॥"},{"id":"10.78.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/24/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्मादसाविमान् विप्रानध्यास्ते प्रतिलोमजः।","धर्मपालांस्तथैवास्मान् वधमर्हति दुर्मतिः॥ २४"],"iast":["kasmādasāvimān viprānadhyāste pratilomajaḥ|","dharmapālāṃstathaivāsmān vadhamarhati durmatiḥ|| 24"],"meaning":"वे कहने लगे कि ‘यह रोमहर्षण प्रतिलोम जातिका होनेपर भी इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे तथा धर्मके रक्षक हमलोगोंसे ऊपर बैठा हुआ है, इसलिये यह दुर्बुद्धि मृत्युदण्डका पात्र है॥ २४॥"},{"id":"10.78.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/25/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऋषेर्भगवतो भूत्वा शिष्योऽधीत्य बहूनि च।","सेतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः॥ २५"],"iast":["ṛṣerbhagavato bhūtvā śiṣyo'dhītya bahūni ca|","setihāsapurāṇāni dharmaśāstrāṇi sarvaśaḥ|| 25"],"meaning":"भगवान् व्यासदेवका शिष्य होकर इसने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत-से शास्त्रोंका अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मनपर संयम नहीं है। यह विनयी नहीं, उद्दण्ड है। इस अजितात्माने झूठमूठ अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मान रखा है। जैसे नटकी सारी चेष्टाएँ अभिनयमात्र होती हैं, वैसे ही इसका सारा अध्ययन स्वाँगके लिये है। उससे न इसका लाभ है और न किसी दूसरेका॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"10.78.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/26/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अदान्तस्याविनीतस्य वृथा पण्डितमानिनः।","न गुणाय भवन्ति स्म नटस्येवाजितात्मनः॥ २६"],"iast":["adāntasyāvinītasya vṛthā paṇḍitamāninaḥ|","na guṇāya bhavanti sma naṭasyevājitātmanaḥ|| 26"],"meaning":"भगवान् व्यासदेवका शिष्य होकर इसने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत-से शास्त्रोंका अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मनपर संयम नहीं है। यह विनयी नहीं, उद्दण्ड है। इस अजितात्माने झूठमूठ अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मान रखा है। जैसे नटकी सारी चेष्टाएँ अभिनयमात्र होती हैं, वैसे ही इसका सारा अध्ययन स्वाँगके लिये है। उससे न इसका लाभ है और न किसी दूसरेका॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"10.78.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/27/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतदर्थो हि लोकेऽस्मिन्‍नवतारो मया कृतः।","वध्या मे धर्मध्वजिनस्ते हि पातकिनोऽधिकाः॥ २७"],"iast":["etadartho hi loke'sminnavatāro mayā kṛtaḥ|","vadhyā me dharmadhvajinaste hi pātakino'dhikāḥ|| 27"],"meaning":"जो लोग धर्मका चिह्न धारण करते हैं, परन्तु धर्मका पालन नहीं करते, वे अधिक पापी हैं और वे मेरे लिये वध करने योग्य हैं। इस जगत‍्में इसीलिये मैंने अवतार धारण किया है’॥ २७॥"},{"id":"10.78.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/28/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतावदुक्त्वा भगवान् निवृत्तोऽसद्वधादपि।","भावित्वात्तं कुशाग्रेण करस्थेनाहनत् प्रभुः॥ २८"],"iast":["etāvaduktvā bhagavān nivṛtto'sadvadhādapi|","bhāvitvāttaṃ kuśāgreṇa karasthenāhanat prabhuḥ|| 28"],"meaning":"भगवान् बलराम यद्यपि तीर्थयात्राके कारण दुष्टोंके वधसे भी अलग हो गये थे, फिर भी इतना कहकर उन्होंने अपने हाथमें स्थित कुशकी नोकसे उनपर प्रहार कर दिया और वे तुरंत मर गये। होनहार ही ऐसी थी॥ २८॥"},{"id":"10.78.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/29/","page":613,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हाहेति वादिनः सर्वे मुनयः खिन्‍नमानसाः।","ऊचुः संकर्षणं देवमधर्मस्ते कृतः प्रभो॥ २९"],"iast":["hāheti vādinaḥ sarve munayaḥ khinnamānasāḥ|","ūcuḥ saṃkarṣaṇaṃ devamadharmaste kṛtaḥ prabho|| 29"],"meaning":"सूतजीके मरते ही सब ऋषि-मुनि हाय-हाय करने लगे, सबके चित्त खिन्‍न हो गये। उन्होंने देवाधिदेव भगवान् बलरामजीसे कहा—‘प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया॥ २९॥"},{"id":"10.78.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/30/","page":614,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अस्य ब्रह्मासनं दत्तमस्माभिर्यदुनन्दन।","आयुश्‍चात्माक्लमं तावद् यावत् सत्रं समाप्यते॥ ३०"],"iast":["asya brahmāsanaṃ dattamasmābhiryadunandana|","āyuścātmāklamaṃ tāvad yāvat satraṃ samāpyate|| 30"],"meaning":"यदुवंशशिरोमणे! सूतजीको हम लोगोंने ही ब्राह्मणोचित आसनपर बैठाया था और जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तबतकके लिये उन्हें शारीरिक कष्टसे रहित आयु भी दे दी थी॥ ३०॥"},{"id":"10.78.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/31/","page":614,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अजानतैवाचरितस्त्वया ब्रह्मवधो यथा।","योगेश्‍वरस्य भवतो नाम्‍नायोऽपि नियामकः॥ ३१"],"iast":["ajānataivācaritastvayā brahmavadho yathā|","yogeśvarasya bhavato nāmnāyo'pi niyāmakaḥ|| 31"],"meaning":"आपने अनजानमें यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्याके समान है। हमलोग यह मानते हैं कि आप योगेश्‍वर हैं, वेद भी आपपर शासन नहीं कर सकता। फिर भी आपसे यह प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगोंको पवित्र करनेके लिये हुआ है; यदि आप किसीकी प्रेरणाके बिना स्वयं अपनी इच्छासे ही इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त कर लेंगे तो इससे लोगोंको बहुत शिक्षा मिलेगी’॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"10.78.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/32/","page":614,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद्येतद् ब्रह्महत्यायाः पावनं लोकपावन।","चरिष्यति भवाँल्लोकसङ्ग्रहोऽनन्यचोदितः॥ ३२"],"iast":["yadyetad brahmahatyāyāḥ pāvanaṃ lokapāvana|","cariṣyati bhavām̐llokasaṅgraho'nanyacoditaḥ|| 32"],"meaning":"आपने अनजानमें यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्याके समान है। हमलोग यह मानते हैं कि आप योगेश्‍वर हैं, वेद भी आपपर शासन नहीं कर सकता। फिर भी आपसे यह प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगोंको पवित्र करनेके लिये हुआ है; यदि आप किसीकी प्रेरणाके बिना स्वयं अपनी इच्छासे ही इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त कर लेंगे तो इससे लोगोंको बहुत शिक्षा मिलेगी’॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"10.78.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/33/","page":614,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["करिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया।","नियमः प्रथमे कल्पे यावान् स तु विधीयताम्॥ ३३"],"iast":["kariṣye vadhanirveśaṃ lokānugrahakāmyayā|","niyamaḥ prathame kalpe yāvān sa tu vidhīyatām|| 33"],"meaning":"भगवान् बलरामने कहा—मैं लोगोंको शिक्षा देनेके लिये, लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त अवश्य करूँगा, अतः इसके लिये प्रथम श्रेणीका जो प्रायश्‍चित्त हो, आपलोग उसीका विधान कीजिये॥ ३३॥"},{"id":"10.78.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/34/","page":614,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च।","आशासितं यत्तद् ब्रूत साधये योगमायया॥ ३४"],"iast":["dīrghamāyurbataitasya sattvamindriyameva ca|","āśāsitaṃ yattad brūta sādhaye yogamāyayā|| 34"],"meaning":"आपलोग इस सूतको लम्बी आयु, बल, इन्द्रिय-शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे बतला दीजिये; मैं अपने योगबलसे सब कुछ सम्पन्‍न किये देता हूँ॥ ३४॥"},{"id":"10.78.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/35/","page":614,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["अस्त्रस्य तव वीर्यस्य मृत्योरस्माकमेव च।","यथा भवेद् वचः सत्यं तथा राम विधीयताम्॥ ३५"],"iast":["astrasya tava vīryasya mṛtyorasmākameva ca|","yathā bhaved vacaḥ satyaṃ tathā rāma vidhīyatām|| 35"],"meaning":"ऋषियोंने कहा—बलरामजी! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे आपका शस्त्र, पराक्रम और इनकी मृत्यु भी व्यर्थ न हो और हमलोगोंने इन्हें जो वरदान दिया था, वह भी सत्य हो जाय॥ ३५॥"},{"id":"10.78.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/36/","page":614,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मा वै पुत्र उत्पन्‍न इति वेदानुशासनम्।","तस्मादस्य भवेद् वक्ता आयुरिन्द्रियसत्त्ववान्॥ ३६"],"iast":["ātmā vai putra utpanna iti vedānuśāsanam|","tasmādasya bhaved vaktā āyurindriyasattvavān|| 36"],"meaning":"भगवान् बलरामने कहा—ऋषियो! वेदोंका ऐसा कहना है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें उत्पन्‍न होता है। इसलिये रोमहर्षणके स्थानपर उनका पुत्र आपलोगोंको पुराणोंकी कथा सुनायेगा। उसे मैं अपनी शक्तिसे दीर्घायु, इन्द्रियशक्ति और बल दिये देता हूँ॥ ३६॥"},{"id":"10.78.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/37/","page":614,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किं वः कामो मुनिश्रेष्ठा ब्रूताहं करवाण्यथ।","अजानतस्त्वपचितिं यथा मे चिन्त्यतां बुधाः॥ ३७"],"iast":["kiṃ vaḥ kāmo muniśreṣṭhā brūtāhaṃ karavāṇyatha|","ajānatastvapacitiṃ yathā me cintyatāṃ budhāḥ|| 37"],"meaning":"ऋषियो! इसके अतिरिक्त आपलोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये। मैं आपलोगोंकी इच्छा पूर्ण करूँगा। अनजानमें मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्‍चित्त भी आपलोग सोच-विचारकर बतलाइये; क्योंकि आपलोग इस विषयके विद्वान् हैं॥ ३७॥"},{"id":"10.78.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/38/","page":615,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["इल्वलस्य सुतो घोरो बल्वलो नाम दानवः।","स दूषयति नः सत्रमेत्य पर्वणि पर्वणि॥ ३८"],"iast":["ilvalasya suto ghoro balvalo nāma dānavaḥ|","sa dūṣayati naḥ satrametya parvaṇi parvaṇi|| 38"],"meaning":"ऋषियोंने कहा—बलरामजी! इल्वलका पुत्र बल्वल नामका एक भयंकर दानव है। वह प्रत्येक पर्वपर यहाँ आ पहुँचता है और हमारे इस सत्रको दूषित कर देता है॥ ३८॥"},{"id":"10.78.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/39/","page":615,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["तं पापं जहि दाशार्ह तन्‍नः शुश्रूषणं परम्।","पूयशोणितविण्मूत्रसुरामांसाभिवर्षिणम्॥ ३९"],"iast":["taṃ pāpaṃ jahi dāśārha tannaḥ śuśrūṣaṇaṃ param|","pūyaśoṇitaviṇmūtrasurāmāṃsābhivarṣiṇam|| 39"],"meaning":"यदुनन्दन! वह यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा, मूत्र, शराब और मांसकी वर्षा करने लगता है। आप उस पापीको मार डालिये। हमलोगोंकी यह बहुत बड़ी सेवा होगी॥ ३९॥"},{"id":"10.78.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/78/40/","page":615,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["ततश्‍च भारतं वर्षं परीत्य सुसमाहितः।","चरित्वा द्वादश मासांस्तीर्थस्नायी विशुद्ध्यसे॥ ४०"],"iast":["tataśca bhārataṃ varṣaṃ parītya susamāhitaḥ|","caritvā dvādaśa māsāṃstīrthasnāyī viśuddhyase|| 40"],"meaning":"इसके बाद आप एकाग्रचित्तसे तीर्थोंमें स्नान करते हुए बारह महीनोंतक भारतवर्षकी परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिये। इससे आपकी शुद्धि हो जायगी॥ ४०॥"}],"text":[{"b":36406,"kind":"adhyaya_heading","page":610,"text":"अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः"},{"b":36407,"kind":"topic_heading","page":610,"text":"दन्तवक्त्र और विदूरथका उद्धार तथा तीर्थयात्रामें बलरामजीके हाथसे सूतजीका वध"},{"b":36408,"kind":"topic_heading","page":610,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36409,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.78.1"],"text":"शिशुपालस्य शाल्वस्य पौण्ड्रकस्यापि दुर्मतिः।"},{"b":36410,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.78.1"],"text":"परलोकगतानां च कुर्वन् पारोक्ष्यसौहृदम्॥ १"},{"b":36411,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.78.2"],"text":"एकः पदातिः संक्रुद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन्।"},{"b":36412,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.78.2"],"text":"पद‍्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यदृश्यत॥ २"},{"b":36413,"kind":"hindi_commentary","page":610,"explains":["10.78.1","10.78.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका। वह क्रोधके मारे आग-बबूला हो रहा था। शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है॥ १-२॥"},{"b":36414,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.3"],"text":"तं तथाऽऽयान्तमालोक्य गदामादाय सत्वरः।"},{"b":36415,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.3"],"text":"अवप्लुत्य रथात् कृष्णः सिन्धुं वेलेव प्रत्यधात्॥ ३"},{"b":36416,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.4"],"text":"गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मदः।"},{"b":36417,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.4"],"text":"दिष्ट्या दिष्ट्या भवानद्य मम दृष्टिपथं गतः॥ ४"},{"b":36418,"kind":"hindi_commentary","page":611,"explains":["10.78.3","10.78.4"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने जब उसे इस प्रकार आते देखा, तब झटपट हाथमें गदा लेकर वे रथसे कूद पड़े। फिर जैसे समुद्रके तटकी भूमि उसके ज्वार-भाटेको आगे बढ़नेसे रोक देती है, वैसे ही उन्होंने उसे रोक दिया॥ ३॥ घमंडके नशेमें चूर करूषनरेश दन्तवक्त्रने गदा तानकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है कि आज तुम मेरी आँखोंके सामने पड़ गये॥ ४॥"},{"b":36419,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.5"],"text":"त्वं मातुलेयो नः कृष्ण मित्रध्रुङ्मां जिघांससि।"},{"b":36420,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.5"],"text":"अतस्त्वां गदया मन्द हनिष्ये वज्रकल्पया॥ ५"},{"b":36421,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.6"],"text":"तर्ह्यानृण्यमुपैम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सलः।"},{"b":36422,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.6"],"text":"बन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधिं देहचरं यथा॥ ६"},{"b":36423,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.7"],"text":"एवं रूक्षैस्तुदन् वाक्यैः कृष्णं तोत्त्रैरिव द्विपम्।"},{"b":36424,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.7"],"text":"गदयाताडयन्मूर्ध्नि सिंहवद् व्यनदच्च सः॥ ७"},{"b":36425,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.8"],"text":"गदयाभिहतोऽप्याजौ न चचाल यदूद्वहः।"},{"b":36426,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.8"],"text":"कृष्णोऽपि तमहन् गुर्व्या कौमोदक्या स्तनान्तरे॥ ८"},{"b":36427,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.9"],"text":"गदानिर्भिन्‍नहृदय उद्वमन् रुधिरं मुखात्।"},{"b":36428,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.9"],"text":"प्रसार्य केशबाह्वङ्‌घ्रीन् धरण्यां न्यपतद् व्यसुः॥ ९"},{"b":36429,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.10"],"text":"ततः सूक्ष्मतरं ज्योतिः कृष्णमाविशदद्भुतम्।"},{"b":36430,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.10"],"text":"पश्यतां सर्वभूतानां यथा चैद्यवधे नृप॥ १०"},{"b":36431,"kind":"hindi_commentary","page":611,"explains":["10.78.5","10.78.6","10.78.7","10.78.8","10.78.9","10.78.10"],"text":"कृष्ण! तुम मेरे मामाके लड़के हो, इसलिये तुम्हें मारना तो नहीं चाहिये; परन्तु एक तो तुमने मेरे मित्रोंको मार डाला है और दूसरे मुझे भी मारना चाहते हो। इसलिये मतिमन्द! आज मैं तुम्हें अपनी वज्रकर्कश गदासे चूर-चूर कर डालूँगा॥ ५॥ मूर्ख! वैसे तो तुम मेरे सम्बन्धी हो, फिर भी हो शत्रु ही, जैसे अपने ही शरीरमें रहनेवाला कोई रोग हो! मैं अपने मित्रोंसे बड़ा प्रेम करता हूँ, उनका मुझपर ऋण है। अब तुम्हें मारकर ही मैं उनके ऋणसे उऋण हो सकता हूँ॥ ६॥ जैसे महावत अंकुशसे हाथीको घायल करता है, वैसे ही दन्तवक्त्रने अपनी कड़वी बातोंसे श्रीकृष्णको चोट पहुँचानेकी चेष्टा की और फिर वह उनके सिरपर बड़े वेगसे गदा मारकर सिंहके समान गरज उठा॥ ७॥ रणभूमिमें गदाकी चोट खाकर भी भगवान् श्रीकृष्ण टस-से-मस न हुए। उन्होंने अपनी बहुत बड़ी कौमोदकी गदा सँभालकर उससे दन्तवक्त्रके वक्षःस्थलपर प्रहार किया॥ ८॥ गदाकी चोटसे दन्तवक्त्रका कलेजा फट गया। वह मुँहसे खून उगलने लगा। उसके बाल बिखर गये, भुजाएँ और पैर फैल गये। निदान निष्प्राण होकर वह धरतीपर गिर पड़ा॥ ९॥ परीक्षित्! जैसा कि शिशुपालकी मृत्युके समय हुआ था, सब प्राणियोंके सामने ही दन्तवक्त्रके मृत शरीरसे एक अत्यन्त सूक्ष्म ज्योति निकली और वह बड़ी विचित्र रीतिसे भगवान् श्रीकृष्णमें समा गयी॥ १०॥"},{"b":36432,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.11"],"text":"विदूरथस्तु तद‍्भ्राता भ्रातृशोकपरिप्लुतः।"},{"b":36433,"kind":"sanskrit_shloka","page":611,"verses":["10.78.11"],"text":"आगच्छदसिचर्मभ्यामुच्छ्वसंस्तज्जिघांसया॥ ११"},{"b":36434,"kind":"hindi_translation","page":611,"explains":["10.78.11"],"text":"दन्तवक्त्रके भाईका नाम था विदूरथ। वह अपने भाईकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो गया। अब वह क्रोधके मारे लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ हाथमें ढाल-तलवार लेकर भगवान् श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे आया॥ ११॥"},{"b":36435,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.12"],"text":"तस्य चापततः कृष्णश्‍चक्रेण क्षुरनेमिना।"},{"b":36436,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.12"],"text":"शिरो जहार राजेन्द्र सकिरीटं सकुण्डलम्॥ १२"},{"b":36437,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.13"],"text":"एवं सौभं च शाल्वं च दन्तवक्त्रं सहानुजम्।"},{"b":36438,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.13"],"text":"हत्वा दुर्विषहानन्यैरीडितः सुरमानवैः॥ १३"},{"b":36439,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.14"],"text":"मुनिभिः सिद्धगन्धर्वैर्विद्याधरमहोरगैः।"},{"b":36440,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.14"],"text":"अप्सरोभिः पितृगणैर्यक्षैः किन्‍नरचारणैः॥ १४"},{"b":36441,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.15"],"text":"उपगीयमानविजयः कुसुमैरभिवर्षितः।"},{"b":36442,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.15"],"text":"वृतश्‍च वृष्णिप्रवरैर्विवेशालङ्कृतां पुरीम्॥ १५"},{"b":36443,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.16"],"text":"एवं योगेश्‍वरः कृष्णो भगवान् जगदीश्‍वरः।"},{"b":36444,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.16"],"text":"ईयते पशुदृष्टीनां निर्जितो जयतीति सः॥ १६"},{"b":36445,"kind":"hindi_commentary","page":612,"explains":["10.78.12","10.78.13","10.78.14","10.78.15","10.78.16"],"text":"राजेन्द्र! जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि अब वह प्रहार करना ही चाहता है, तब उन्होंने अपने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे किरीट और कुण्डलके साथ उसका सिर धड़से अलग कर दिया॥ १२॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने शाल्व, उसके विमान सौभ, दन्तवक्त्र और विदूरथको, जिन्हें मारना दूसरोंके लिये अशक्य था, मारकर द्वारकापुरीमें प्रवेश किया। उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति कर रहे थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, सिद्ध-गन्धर्व, विद्याधर और वासुकि आदि महानाग, अप्सराएँ, पितर, यक्ष, किन्‍नर तथा चारण उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी विजयके गीत गा रहे थे। भगवान्‌के प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा दी गयी थी और बड़े-बड़े वृष्णिवंशी यादव वीर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ १३—१५॥ योगेश्‍वर एवं जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण इसी प्रकार अनेकों खेल खेलते रहते हैं। जो पशुओंके समान अविवेकी हैं, वे उन्हें कभी हारते भी देखते हैं। परन्तु वास्तवमें तो वे सदा-सर्वदा विजयी ही हैं॥ १६॥"},{"b":36446,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.17"],"text":"श्रुत्वा युद्धोद्यमं रामः कुरूणां सह पाण्डवैः।"},{"b":36447,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.17"],"text":"तीर्थाभिषेकव्याजेन मध्यस्थः प्रययौ किल॥ १७"},{"b":36448,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.18"],"text":"स्नात्वा प्रभासे सन्तर्प्य देवर्षिपितृमानवान्।"},{"b":36449,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.18"],"text":"सरस्वतीं प्रतिस्रोतं ययौ ब्राह्मणसंवृतः॥ १८"},{"b":36450,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.19"],"text":"पृथूदकं बिन्दुसरस्त्रितकूपं सुदर्शनम्।"},{"b":36451,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.19"],"text":"विशालं ब्रह्मतीर्थं च चक्रं प्राचीं सरस्वतीम्॥ १९"},{"b":36452,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.20"],"text":"यमुनामनु यान्येव गंगामनु च भारत।"},{"b":36453,"kind":"sanskrit_shloka","page":612,"verses":["10.78.20"],"text":"जगाम नैमिषं यत्र ऋषयः सत्रमासते॥ २०"},{"b":36454,"kind":"hindi_translation","page":612,"explains":["10.78.17","10.78.18","10.78.19","10.78.20"],"text":"एक बार बलरामजीने सुना कि दुर्योधनादि कौरव पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेकी तैयारी कर रहे हैं। वे मध्यस्थ थे, उन्हें किसीका पक्ष लेकर लड़ना पसंद नहीं था। इसलिये वे तीर्थोंमें स्नान करनेके बहाने द्वारकासे चले गये॥ १७॥ वहाँसे चलकर उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें स्नान किया और तर्पण तथा ब्राह्मणभोजनके द्वारा देवता, ऋषि, पितर और मनुष्योंको तृप्त किया। इसके बाद वे कुछ ब्राह्मणोंके साथ जिधरसे सरस्वती नदी आ रही थी, उधर ही चल पड़े॥ १८॥ वे क्रमशः पृथूदक, बिन्दुसर, त्रितकूप, सुदर्शनतीर्थ, विशालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, चक्रतीर्थ और पूर्ववाहिनी सरस्वती आदि तीर्थोंमें गये॥ १९॥ परीक्षित्! तदनन्तर यमुनातट और गंगातटके प्रधान-प्रधान तीर्थोंमें होते हुए वे नैमिषारण्य क्षेत्रमें गये। उन दिनों नैमिषारण्य क्षेत्रमें बड़े-बड़े ऋषि सत्संगरूप महान् सत्र कर रहे थे॥ २०॥"},{"b":36455,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.21"],"text":"तमागतमभिप्रेत्य मुनयो दीर्घसत्रिणः।"},{"b":36456,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.21"],"text":"अभिनन्द्य यथान्यायं प्रणम्योत्थाय चार्चयन्॥ २१"},{"b":36457,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.22"],"text":"सोऽर्चितः सपरीवारः कृतासनपरिग्रहः।"},{"b":36458,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.22"],"text":"रोमहर्षणमासीनं महर्षेः शिष्यमैक्षत॥ २२"},{"b":36459,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.23"],"text":"अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्वणांजलिम्।"},{"b":36460,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.23"],"text":"अध्यासीनं च तान् विप्रांश्‍चुकोपोद्वीक्ष्य माधवः॥ २३"},{"b":36461,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.24"],"text":"कस्मादसाविमान् विप्रानध्यास्ते प्रतिलोमजः।"},{"b":36462,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.24"],"text":"धर्मपालांस्तथैवास्मान् वधमर्हति दुर्मतिः॥ २४"},{"b":36463,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.25"],"text":"ऋषेर्भगवतो भूत्वा शिष्योऽधीत्य बहूनि च।"},{"b":36464,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.25"],"text":"सेतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः॥ २५"},{"b":36465,"kind":"hindi_translation","page":613,"explains":["10.78.21","10.78.22","10.78.23","10.78.24","10.78.25","10.78.26"],"text":"दीर्घकालतक सत्संगसत्रका नियम लेकर बैठे हुए ऋषियोंने बलरामजीको आया देख अपने-अपने आसनोंसे उठकर उनका स्वागत-सत्कार किया और यथायोग्य प्रणाम-आशीर्वाद करके उनकी पूजा की॥ २१॥ वे अपने साथियोंके साथ आसन ग्रहण करके बैठ गये और उनकी अर्चा-पूजा हो चुकी, तब उन्होंने देखा कि भगवान् व्यासके शिष्य रोमहर्षण व्यासगद्दीपर बैठे हुए हैं॥ २२॥ बलरामजीने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जातिमें उत्पन्‍न होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऊँचे आसनपर बैठे हुए हैं और उनके आनेपर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया॥ २३॥ वे कहने लगे कि ‘यह रोमहर्षण प्रतिलोम जातिका होनेपर भी इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे तथा धर्मके रक्षक हमलोगोंसे ऊपर बैठा हुआ है, इसलिये यह दुर्बुद्धि मृत्युदण्डका पात्र है॥ २४॥ भगवान् व्यासदेवका शिष्य होकर इसने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत-से शास्त्रोंका अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मनपर संयम नहीं है। यह विनयी नहीं, उद्दण्ड है। इस अजितात्माने झूठमूठ अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मान रखा है। जैसे नटकी सारी चेष्टाएँ अभिनयमात्र होती हैं, वैसे ही इसका सारा अध्ययन स्वाँगके लिये है। उससे न इसका लाभ है और न किसी दूसरेका॥ २५-२६॥"},{"b":36466,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.26"],"text":"अदान्तस्याविनीतस्य वृथा पण्डितमानिनः।"},{"b":36467,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.26"],"text":"न गुणाय भवन्ति स्म नटस्येवाजितात्मनः॥ २६"},{"b":36468,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.27"],"text":"एतदर्थो हि लोकेऽस्मिन्‍नवतारो मया कृतः।"},{"b":36469,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.27"],"text":"वध्या मे धर्मध्वजिनस्ते हि पातकिनोऽधिकाः॥ २७"},{"b":36470,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.28"],"text":"एतावदुक्त्वा भगवान् निवृत्तोऽसद्वधादपि।"},{"b":36471,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.28"],"text":"भावित्वात्तं कुशाग्रेण करस्थेनाहनत् प्रभुः॥ २८"},{"b":36472,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.29"],"text":"हाहेति वादिनः सर्वे मुनयः खिन्‍नमानसाः।"},{"b":36473,"kind":"sanskrit_shloka","page":613,"verses":["10.78.29"],"text":"ऊचुः संकर्षणं देवमधर्मस्ते कृतः प्रभो॥ २९"},{"b":36474,"kind":"hindi_translation","page":613,"explains":["10.78.27","10.78.28","10.78.29"],"text":"जो लोग धर्मका चिह्न धारण करते हैं, परन्तु धर्मका पालन नहीं करते, वे अधिक पापी हैं और वे मेरे लिये वध करने योग्य हैं। इस जगत‍्में इसीलिये मैंने अवतार धारण किया है’॥ २७॥ भगवान् बलराम यद्यपि तीर्थयात्राके कारण दुष्टोंके वधसे भी अलग हो गये थे, फिर भी इतना कहकर उन्होंने अपने हाथमें स्थित कुशकी नोकसे उनपर प्रहार कर दिया और वे तुरंत मर गये। होनहार ही ऐसी थी॥ २८॥ सूतजीके मरते ही सब ऋषि-मुनि हाय-हाय करने लगे, सबके चित्त खिन्‍न हो गये। उन्होंने देवाधिदेव भगवान् बलरामजीसे कहा—‘प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया॥ २९॥"},{"b":36475,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.30"],"text":"अस्य ब्रह्मासनं दत्तमस्माभिर्यदुनन्दन।"},{"b":36476,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.30"],"text":"आयुश्‍चात्माक्लमं तावद् यावत् सत्रं समाप्यते॥ ३०"},{"b":36477,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.31"],"text":"अजानतैवाचरितस्त्वया ब्रह्मवधो यथा।"},{"b":36478,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.31"],"text":"योगेश्‍वरस्य भवतो नाम्‍नायोऽपि नियामकः॥ ३१"},{"b":36479,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.32"],"text":"यद्येतद् ब्रह्महत्यायाः पावनं लोकपावन।"},{"b":36480,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.32"],"text":"चरिष्यति भवाँल्लोकसङ्ग्रहोऽनन्यचोदितः॥ ३२"},{"b":36481,"kind":"hindi_translation","page":614,"explains":["10.78.30","10.78.31","10.78.32"],"text":"यदुवंशशिरोमणे! सूतजीको हम लोगोंने ही ब्राह्मणोचित आसनपर बैठाया था और जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तबतकके लिये उन्हें शारीरिक कष्टसे रहित आयु भी दे दी थी॥ ३०॥ आपने अनजानमें यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्याके समान है। हमलोग यह मानते हैं कि आप योगेश्‍वर हैं, वेद भी आपपर शासन नहीं कर सकता। फिर भी आपसे यह प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगोंको पवित्र करनेके लिये हुआ है; यदि आप किसीकी प्रेरणाके बिना स्वयं अपनी इच्छासे ही इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त कर लेंगे तो इससे लोगोंको बहुत शिक्षा मिलेगी’॥ ३१-३२॥"},{"b":36482,"kind":"topic_heading","page":614,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":36483,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.33"],"text":"करिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया।"},{"b":36484,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.33"],"text":"नियमः प्रथमे कल्पे यावान् स तु विधीयताम्॥ ३३"},{"b":36485,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.34"],"text":"दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च।"},{"b":36486,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.34"],"text":"आशासितं यत्तद् ब्रूत साधये योगमायया॥ ३४"},{"b":36487,"kind":"hindi_commentary","page":614,"explains":["10.78.33","10.78.34"],"text":"भगवान् बलरामने कहा—मैं लोगोंको शिक्षा देनेके लिये, लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त अवश्य करूँगा, अतः इसके लिये प्रथम श्रेणीका जो प्रायश्‍चित्त हो, आपलोग उसीका विधान कीजिये॥ ३३॥ आपलोग इस सूतको लम्बी आयु, बल, इन्द्रिय-शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे बतला दीजिये; मैं अपने योगबलसे सब कुछ सम्पन्‍न किये देता हूँ॥ ३४॥"},{"b":36488,"kind":"topic_heading","page":614,"text":"ऋषय ऊचुः"},{"b":36489,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.35"],"text":"अस्त्रस्य तव वीर्यस्य मृत्योरस्माकमेव च।"},{"b":36490,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.35"],"text":"यथा भवेद् वचः सत्यं तथा राम विधीयताम्॥ ३५"},{"b":36491,"kind":"hindi_commentary","page":614,"explains":["10.78.35"],"text":"ऋषियोंने कहा—बलरामजी! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे आपका शस्त्र, पराक्रम और इनकी मृत्यु भी व्यर्थ न हो और हमलोगोंने इन्हें जो वरदान दिया था, वह भी सत्य हो जाय॥ ३५॥"},{"b":36492,"kind":"topic_heading","page":614,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":36493,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.36"],"text":"आत्मा वै पुत्र उत्पन्‍न इति वेदानुशासनम्।"},{"b":36494,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.36"],"text":"तस्मादस्य भवेद् वक्ता आयुरिन्द्रियसत्त्ववान्॥ ३६"},{"b":36495,"kind":"hindi_commentary","page":614,"explains":["10.78.36"],"text":"भगवान् बलरामने कहा—ऋषियो! वेदोंका ऐसा कहना है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें उत्पन्‍न होता है। इसलिये रोमहर्षणके स्थानपर उनका पुत्र आपलोगोंको पुराणोंकी कथा सुनायेगा। उसे मैं अपनी शक्तिसे दीर्घायु, इन्द्रियशक्ति और बल दिये देता हूँ॥ ३६॥"},{"b":36496,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.37"],"text":"किं वः कामो मुनिश्रेष्ठा ब्रूताहं करवाण्यथ।"},{"b":36497,"kind":"sanskrit_shloka","page":614,"verses":["10.78.37"],"text":"अजानतस्त्वपचितिं यथा मे चिन्त्यतां बुधाः॥ ३७"},{"b":36498,"kind":"hindi_translation","page":614,"explains":["10.78.37"],"text":"ऋषियो! इसके अतिरिक्त आपलोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये। मैं आपलोगोंकी इच्छा पूर्ण करूँगा। अनजानमें मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्‍चित्त भी आपलोग सोच-विचारकर बतलाइये; क्योंकि आपलोग इस विषयके विद्वान् हैं॥ ३७॥"},{"b":36499,"kind":"topic_heading","page":614,"text":"ऋषय ऊचुः"},{"b":36500,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.38"],"text":"इल्वलस्य सुतो घोरो बल्वलो नाम दानवः।"},{"b":36501,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.38"],"text":"स दूषयति नः सत्रमेत्य पर्वणि पर्वणि॥ ३८"},{"b":36502,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.39"],"text":"तं पापं जहि दाशार्ह तन्‍नः शुश्रूषणं परम्।"},{"b":36503,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.39"],"text":"पूयशोणितविण्मूत्रसुरामांसाभिवर्षिणम्॥ ३९"},{"b":36504,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.40"],"text":"ततश्‍च भारतं वर्षं परीत्य सुसमाहितः।"},{"b":36505,"kind":"sanskrit_shloka","page":615,"verses":["10.78.40"],"text":"चरित्वा द्वादश मासांस्तीर्थस्नायी विशुद्ध्यसे॥ ४०"},{"b":36506,"kind":"hindi_commentary","page":615,"explains":["10.78.38","10.78.39","10.78.40"],"text":"ऋषियोंने कहा—बलरामजी! इल्वलका पुत्र बल्वल नामका एक भयंकर दानव है। वह प्रत्येक पर्वपर यहाँ आ पहुँचता है और हमारे इस सत्रको दूषित कर देता है॥ ३८॥ यदुनन्दन! वह यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा, मूत्र, शराब और मांसकी वर्षा करने लगता है। आप उस पापीको मार डालिये। हमलोगोंकी यह बहुत बड़ी सेवा होगी॥ ३९॥ इसके बाद आप एकाग्रचित्तसे तीर्थोंमें स्नान करते हुए बारह महीनोंतक भारतवर्षकी परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिये। इससे आपकी शुद्धि हो जायगी॥ ४०॥"},{"b":36507,"kind":"hindi_translation","page":615,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे बलदेवचरित्रे बल्वलवधोपक्रमो नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":0,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}