{"id":"10.81","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 81","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथैकाशीतितमोऽध्यायः","topics":["सुदामाजीको ऐश्‍वर्यकी प्राप्ति"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[624,629]},"verses":[{"id":"10.81.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/1/","page":624,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स इत्थं द्विजमुख्येन सह संकथयन् हरिः।","सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम्॥ १"],"iast":["sa itthaṃ dvijamukhyena saha saṃkathayan hariḥ|","sarvabhūtamano'bhijñaḥ smayamāna uvāca tam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं। वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं। वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे। अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण-देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.81.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/2/","page":625,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान् प्रहसन् प्रियम्।","प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षन् खलु सतां गतिः॥ २"],"iast":["brahmaṇyo brāhmaṇaṃ kṛṣṇo bhagavān prahasan priyam|","premṇā nirīkṣaṇenaiva prekṣan khalu satāṃ gatiḥ|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं। वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं। वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे। अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण-देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.81.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/3/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात्।","अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्।","भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ ३"],"iast":["kimupāyanamānītaṃ brahman me bhavatā gṛhāt|","aṇvapyupāhṛtaṃ bhaktaiḥ premṇā bhūryeva me bhavet|","bhūryapyabhaktopahṛtaṃ na me toṣāya kalpate|| 3"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘ब्रह्मन्! आप अपने घरसे मेरे लिये क्या उपहार लाये हैं? मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेमसे थोड़ी-सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिये बहुत हो जाती है। परन्तु मेरे अभक्त यदि बहुत-सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं तो उससे मैं सन्तुष्ट नहीं होता॥ ३॥"},{"id":"10.81.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/4/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।","तदहं भक्त्युपहृतमश्‍नामि प्रयतात्मनः॥ ४"],"iast":["patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati|","tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ|| 4"],"meaning":"जो पुरुष प्रेम-भक्तिसे फल-फूल अथवा पत्ता-पानीमेंसे कोई भी वस्तु मुझे समर्पित करता है, तो मैं उस शुद्धचित्त भक्तका वह प्रेमोपहार केवल स्वीकार ही नहीं करता, बल्कि तुरंत भोग लगा लेता हूँ’॥ ४॥"},{"id":"10.81.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/5/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्युक्तोऽपि द्विजस्तस्मै व्रीडितः पतये श्रियः।","पृथुकप्रसृतिं राजन् न प्रायच्छदवाङ्मुखः॥ ५"],"iast":["ityukto'pi dvijastasmai vrīḍitaḥ pataye śriyaḥ|","pṛthukaprasṛtiṃ rājan na prāyacchadavāṅmukhaḥ|| 5"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये। उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली। अब वे विचार करने लगे कि ‘एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है। इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्‍नीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है’॥ ५—७॥","meaning_covers":[5,7]},{"id":"10.81.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/6/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्वभूतात्मदृक् साक्षात् तस्यागमनकारणम्।","विज्ञायाचिन्तयन्‍नायं श्रीकामो माभजत्पुरा॥ ६"],"iast":["sarvabhūtātmadṛk sākṣāt tasyāgamanakāraṇam|","vijñāyācintayannāyaṃ śrīkāmo mābhajatpurā|| 6"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये। उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली। अब वे विचार करने लगे कि ‘एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है। इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्‍नीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है’॥ ५—७॥","meaning_covers":[5,7]},{"id":"10.81.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/7/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पत्‍न्याः पतिव्रतायास्तु सखा प्रियचिकीर्षया।","प्राप्तो मामस्य दास्यामि सम्पदोऽमर्त्यदुर्लभाः॥ ७"],"iast":["patnyāḥ pativratāyāstu sakhā priyacikīrṣayā|","prāpto māmasya dāsyāmi sampado'martyadurlabhāḥ|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये। उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली। अब वे विचार करने लगे कि ‘एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है। इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्‍नीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है’॥ ५—७॥","meaning_covers":[5,7]},{"id":"10.81.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/8/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्थं विचिन्त्य वसनाच्चीरबद्धान्द्विजन्मनः।","स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान्॥ ८"],"iast":["itthaṃ vicintya vasanāccīrabaddhāndvijanmanaḥ|","svayaṃ jahāra kimidamiti pṛthukataṇḍulān|| 8"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा विचार करके उनके वस्त्रमेंसे चिथड़ेकी एक पोटलीमें बँधा हुआ चिउड़ा ‘यह क्या है’—ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया॥ ८॥"},{"id":"10.81.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/9/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे।","तर्पयन्त्यंग मां विश्‍वमेते पृथुकतण्डुलाः॥ ९"],"iast":["nanvetadupanītaṃ me paramaprīṇanaṃ sakhe|","tarpayantyaṃga māṃ viśvamete pṛthukataṇḍulāḥ|| 9"],"meaning":"और बड़े आदरसे कहने लगे—‘प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं’॥ ९॥"},{"id":"10.81.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/10/","page":625,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे।","तावच्छ्रीर्जगृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिनः॥ १०"],"iast":["iti muṣṭiṃ sakṛjjagdhvā dvitīyāṃ jagdhumādade|","tāvacchrīrjagṛhe hastaṃ tatparā parameṣṭhinaḥ|| 10"],"meaning":"ऐसा कहकर वे उसमेंसे एक मुट्ठी चिउड़ा खा गये और दूसरी मुट्ठी ज्यों ही भरी, त्यों ही रुक्मिणीके रूपमें स्वयं भगवती लक्ष्मीजीने भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया! क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान्‌के परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं॥ १०॥"},{"id":"10.81.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/11/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतावतालं विश्‍वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये।","अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम्॥ ११"],"iast":["etāvatālaṃ viśvātman sarvasampatsamṛddhaye|","asmim̐lloke'thavāmuṣmin puṃsastvattoṣakāraṇam|| 11"],"meaning":"रुक्मिणीजीने कहा—‘विश्‍वात्मन्! बस, बस। मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्‍नताका हेतु बन जाता है’॥ ११॥"},{"id":"10.81.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/12/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ब्राह्मणस्तां तु रजनीमुषित्वाच्युतमन्दिरे।","भुक्त्वा पीत्वा सुखं मेने आत्मानं स्वर्गतं यथा॥ १२"],"iast":["brāhmaṇastāṃ tu rajanīmuṣitvācyutamandire|","bhuktvā pītvā sukhaṃ mene ātmānaṃ svargataṃ yathā|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! ब्राह्मणदेवता उस रातको भगवान् श्रीकृष्णके महलमें ही रहे। उन्होंने बड़े आरामसे वहाँ खाया-पिया और ऐसा अनुभव किया, मानो मैं वैकुण्ठमें ही पहुँच गया हूँ॥ १२॥"},{"id":"10.81.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/13/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्‍वोभूते विश्‍वभावेन स्वसुखेनाभिवन्दितः।","जगाम स्वालयं तात पथ्यनुव्रज्य नन्दितः॥ १३"],"iast":["śvobhūte viśvabhāvena svasukhenābhivanditaḥ|","jagāma svālayaṃ tāta pathyanuvrajya nanditaḥ|| 13"],"meaning":"परीक्षित्! श्रीकृष्णसे ब्राह्मणको प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिला। फिर भी उन्होंने उनसे कुछ माँगा नहीं! वे अपने चित्तकी करतूतपर कुछ लज्जित-से होकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनजनित आनन्दमें डूबते-उतराते अपने घरकी ओर चल पड़े॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"10.81.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/14/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्‍न तु याचितवान् स्वयम्।","स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः॥ १४"],"iast":["sa cālabdhvā dhanaṃ kṛṣṇānna tu yācitavān svayam|","svagṛhān vrīḍito'gacchanmahaddarśananirvṛtaḥ|| 14"],"meaning":"परीक्षित्! श्रीकृष्णसे ब्राह्मणको प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिला। फिर भी उन्होंने उनसे कुछ माँगा नहीं! वे अपने चित्तकी करतूतपर कुछ लज्जित-से होकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनजनित आनन्दमें डूबते-उतराते अपने घरकी ओर चल पड़े॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"10.81.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/15/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहो ब्रह्मण्यदेवस्य दृष्टा ब्रह्मण्यता मया।","यद् दरिद्रतमो लक्ष्मीमाश्‍लिष्टो बिभ्रतोरसि॥ १५"],"iast":["aho brahmaṇyadevasya dṛṣṭā brahmaṇyatā mayā|","yad daridratamo lakṣmīmāśliṣṭo bibhratorasi|| 15"],"meaning":"वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अहो, कितने आनन्द और आश्‍चर्यकी बात है! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी ब्राह्मणभक्ति आज मैंने अपनी आँखों देख ली। धन्य है! जिनके वक्षःस्थलपर स्वयं लक्ष्मीजी सदा विराजमान रहती हैं, उन्होंने मुझ अत्यन्त दरिद्रको अपने हृदयसे लगा लिया॥ १५॥"},{"id":"10.81.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/16/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः।","ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥ १६"],"iast":["kvāhaṃ daridraḥ pāpīyān kva kṛṣṇaḥ śrīniketanaḥ|","brahmabandhuriti smāhaṃ bāhubhyāṃ parirambhitaḥ|| 16"],"meaning":"कहाँ तो मैं अत्यन्त पापी और दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मीके एकमात्र आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण! परन्तु उन्होंने ‘यह ब्राह्मण है’—ऐसा समझकर मुझे अपनी भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया॥ १६॥"},{"id":"10.81.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/17/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निवासितः प्रियाजुष्टे पर्यंके भ्रातरो यथा।","महिष्या वीजितः श्रान्तो वालव्यजनहस्तया॥ १७"],"iast":["nivāsitaḥ priyājuṣṭe paryaṃke bhrātaro yathā|","mahiṣyā vījitaḥ śrānto vālavyajanahastayā|| 17"],"meaning":"इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे उस पलंगपर सुलाया, जिसपर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी शयन करती हैं। मानो मैं उनका सगा भाई हूँ! कहाँतक कहूँ? मैं थका हुआ था, इसलिये स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजीने अपने हाथों चँवर डुलाकर मेरी सेवा की॥ १७॥"},{"id":"10.81.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/18/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः।","पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत्॥ १८"],"iast":["śuśrūṣayā paramayā pādasaṃvāhanādibhiḥ|","pūjito devadevena vipradevena devavat|| 18"],"meaning":"ओह, देवताओंके आराध्यदेव होकर भी ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले प्रभुने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला-पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा-शुश्रूषा की और देवताके समान मेरी पूजा की॥ १८॥"},{"id":"10.81.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/19/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वर्गापवर्गयोः पुंसां रसायां भुवि सम्पदाम्।","सर्वासामपि सिद्धीनां मूलं तच्चरणार्चनम्॥ १९"],"iast":["svargāpavargayoḥ puṃsāṃ rasāyāṃ bhuvi sampadām|","sarvāsāmapi siddhīnāṃ mūlaṃ taccaraṇārcanam|| 19"],"meaning":"स्वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसातलकी सम्पत्ति तथा समस्त योगसिद्धियोंकी प्राप्तिका मूल उनके चरणोंकी पूजा ही है॥ १९॥"},{"id":"10.81.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/20/","page":626,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अधनोऽयं धनं प्राप्य माद्यन्‍नुच्चैर्न मां स्मरेत्।","इति कारुणिको नूनं धनं मेऽभूरि नाददात्॥ २०"],"iast":["adhano'yaṃ dhanaṃ prāpya mādyannuccairna māṃ smaret|","iti kāruṇiko nūnaṃ dhanaṃ me'bhūri nādadāt|| 20"],"meaning":"फिर भी परमदयालु श्रीकृष्णने यह सोचकर मुझे थोड़ा-सा भी धन नहीं दिया कि कहीं यह दरिद्र धन पाकर बिलकुल मतवाला न हो जाय और मुझे न भूल बैठे’॥ २०॥"},{"id":"10.81.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/21/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति तच्चिन्तयन्‍नन्तः प्राप्तो निजगृहान्तिकम्।","सूर्यानलेन्दुसंकाशैर्विमानैः सर्वतो वृतम्॥ २१"],"iast":["iti taccintayannantaḥ prāpto nijagṛhāntikam|","sūryānalendusaṃkāśairvimānaiḥ sarvato vṛtam|| 21"],"meaning":"इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्‍नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्‍ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्‍वेत, नील और सौगन्धिक—भाँति-भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे—‘मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया’॥ २१—२३॥","meaning_covers":[21,23]},{"id":"10.81.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/22/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विचित्रोपवनोद्यानैः कूजद‍्द्विजकुलाकुलैः।","प्रोत्फुल्लकुमुदाम्भोजकह्लारोत्पलवारिभिः॥ २२"],"iast":["vicitropavanodyānaiḥ kūjaddvijakulākulaiḥ|","protphullakumudāmbhojakahlārotpalavāribhiḥ|| 22"],"meaning":"इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्‍नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्‍ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्‍वेत, नील और सौगन्धिक—भाँति-भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे—‘मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया’॥ २१—२३॥","meaning_covers":[21,23]},{"id":"10.81.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/23/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जुष्टं स्वलंकृतैः पुम्भिः स्त्रीभिश्‍च हरिणाक्षिभिः।","किमिदं कस्य वा स्थानं कथं तदिदमित्यभूत्॥ २३"],"iast":["juṣṭaṃ svalaṃkṛtaiḥ pumbhiḥ strībhiśca hariṇākṣibhiḥ|","kimidaṃ kasya vā sthānaṃ kathaṃ tadidamityabhūt|| 23"],"meaning":"इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्‍नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्‍ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्‍वेत, नील और सौगन्धिक—भाँति-भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे—‘मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया’॥ २१—२३॥","meaning_covers":[21,23]},{"id":"10.81.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/24/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं मीमांसमानं तं नरा नार्योऽमरप्रभाः।","प्रत्यगृह्णन् महाभागं गीतवाद्येन भूयसा॥ २४"],"iast":["evaṃ mīmāṃsamānaṃ taṃ narā nāryo'maraprabhāḥ|","pratyagṛhṇan mahābhāgaṃ gītavādyena bhūyasā|| 24"],"meaning":"इस प्रकार वे सोच ही रहे थे कि देवताओंके समान सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष गाजे-बाजेके साथ मंगलगीत गाते हुए उस महाभाग्यवान् ब्राह्मणकी अगवानी करनेके लिये आये॥ २४॥"},{"id":"10.81.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/25/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पतिमागतमाकर्ण्य पत्‍न्युद्धर्षातिसम्भ्रमा।","निश्‍चक्राम गृहात्तूर्णं रूपिणी श्रीरिवालयात्॥ २५"],"iast":["patimāgatamākarṇya patnyuddharṣātisambhramā|","niścakrāma gṛhāttūrṇaṃ rūpiṇī śrīrivālayāt|| 25"],"meaning":"पतिदेवका शुभागमन सुनकर ब्राह्मणीको अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी घरसे निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवनसे पधारी हों॥ २५॥"},{"id":"10.81.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/26/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा प्रेमोत्कण्ठाश्रुलोचना।","मीलिताक्ष्यनमद् बुद्ध्या मनसा परिषस्वजे॥ २६"],"iast":["pativratā patiṃ dṛṣṭvā premotkaṇṭhāśrulocanā|","mīlitākṣyanamad buddhyā manasā pariṣasvaje|| 26"],"meaning":"पतिदेवको देखते ही पतिव्रता पत्‍नीके नेत्रोंमें प्रेम और उत्कण्ठाके आवेगसे आँसू छलक आये। उसने अपने नेत्र बंद कर लिये। ब्राह्मणीने बड़े प्रेमभावसे उन्हें नमस्कार किया और मन-ही-मन आलिंगन भी॥ २६॥"},{"id":"10.81.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/27/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पत्‍नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव।","दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः॥ २७"],"iast":["patnīṃ vīkṣya visphurantīṃ devīṃ vaimānikīmiva|","dāsīnāṃ niṣkakaṇṭhīnāṃ madhye bhāntīṃ sa vismitaḥ|| 27"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! ब्राह्मणपत्‍नी सोनेका हार पहनी हुई दासियोंके बीचमें विमानस्थित देवांगनाके समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये॥ २७॥"},{"id":"10.81.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/28/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रीतः स्वयं तया युक्तः प्रविष्टो निजमन्दिरम्।","मणिस्तम्भशतोपेतं महेन्द्रभवनं यथा॥ २८"],"iast":["prītaḥ svayaṃ tayā yuktaḥ praviṣṭo nijamandiram|","maṇistambhaśatopetaṃ mahendrabhavanaṃ yathā|| 28"],"meaning":"उन्होंने अपनी पत्‍नीके साथ बड़े प्रेमसे अपने महलमें प्रवेश किया। उनका महल क्या था, मानो देवराज इन्द्रका निवासस्थान। इसमें मणियोंके सैकड़ों खंभे खड़े थे॥ २८॥"},{"id":"10.81.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/29/","page":627,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः।","पर्यंका हेमदण्डानि चामरव्यजनानि च॥ २९"],"iast":["payaḥphenanibhāḥ śayyā dāntā rukmaparicchadāḥ|","paryaṃkā hemadaṇḍāni cāmaravyajanāni ca|| 29"],"meaning":"हाथीके दाँतके बने हुए और सोनेके पातसे मँढ़े हुए पलंगोंपर दूधके फेनकी तरह श्‍वेत और कोमल बिछौने बिछ रहे थे। बहुत-से चँवर वहाँ रखे हुए थे, जिनमें सोनेकी डंडियाँ लगी हुई थीं॥ २९॥"},{"id":"10.81.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/30/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आसनानि च हैमानि मृदूपस्तरणानि च।","मुक्तादामविलम्बीनि वितानानि द्युमन्ति च॥ ३०"],"iast":["āsanāni ca haimāni mṛdūpastaraṇāni ca|","muktādāmavilambīni vitānāni dyumanti ca|| 30"],"meaning":"सोनेके सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिनपर बड़ी कोमल-कोमल गद्दियाँ लगी हुई थीं! ऐसे चँदोवे भी झिलमिला रहे थे जिनमें मोतियोंकी लड़ियाँ लटक रही थीं॥ ३०॥"},{"id":"10.81.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/31/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।","रत्‍नदीपा भ्राजमाना ललनारत्‍नसंयुताः॥ ३१"],"iast":["svacchasphaṭikakuḍyeṣu mahāmārakateṣu ca|","ratnadīpā bhrājamānā lalanāratnasaṃyutāḥ|| 31"],"meaning":"स्फटिकमणिकी स्वच्छ भीतोंपर पन्‍नेकी पच्चीकारी की हुई थी। रत्‍ननिर्मित स्त्रीमूर्तियोंके हाथोंमें रत्‍नोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३१॥"},{"id":"10.81.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/32/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम्।","तर्कयामास निर्व्यग्रः स्वसमृद्धिमहैतुकीम्॥ ३२"],"iast":["vilokya brāhmaṇastatra samṛddhīḥ sarvasampadām|","tarkayāmāsa nirvyagraḥ svasamṛddhimahaitukīm|| 32"],"meaning":"इस प्रकार समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि देखकर और उसका कोई प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरतासे ब्राह्मणदेवता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कहाँसे आ गयी॥ ३२॥"},{"id":"10.81.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/33/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्य शश्‍वद्दरिद्रस्य समृद्धिहेतुः।","महाविभूतेरवलोकतोऽन्यो नैवोपपद्येत यदूत्तमस्य॥ ३३"],"iast":["nūnaṃ bataitanmama durbhagasya śaśvaddaridrasya samṛddhihetuḥ|","mahāvibhūteravalokato'nyo naivopapadyeta yadūttamasya|| 33"],"meaning":"वे मन-ही-मन कहने लगे—‘मैं जन्मसे ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ। फिर मेरी इस सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या है? अवश्य ही परमैश्‍वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके कृपाकटाक्षके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता॥ ३३॥"},{"id":"10.81.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/34/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नन्वब्रुवाणो दिशते समक्षं याचिष्णवे भूर्यपि भूरिभोजः।","पर्जन्यवत्तत् स्वयमीक्षमाणो दाशार्हकाणामृषभः सखा मे॥ ३४"],"iast":["nanvabruvāṇo diśate samakṣaṃ yāciṣṇave bhūryapi bhūribhojaḥ|","parjanyavattat svayamīkṣamāṇo dāśārhakāṇāmṛṣabhaḥ sakhā me|| 34"],"meaning":"यह सब कुछ उनकी करुणाकी ही देन है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम और लक्ष्मीपति होनेके कारण अनन्त भोग-सामग्रियोंसे युक्त हैं। इसलिये वे याचक भक्तको उसके मनका भाव जानकर बहुत कुछ दे देते हैं, परन्तु उसे समझते हैं बहुत थोड़ा; इसलिये सामने कुछ कहते नहीं। मेरे यदुवंशशिरोमणि सखा श्यामसुन्दर सचमुच उस मेघसे भी बढ़कर उदार हैं, जो समुद्रको भर देनेकी शक्ति रखनेपर भी किसानके सामने न बरसकर उसके सो जानेपर रातमें बरसता है और बहुत बरसनेपर भी थोड़ा ही समझता है॥ ३४॥"},{"id":"10.81.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/35/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किंचित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी।","मयोपनीतां पृथुकैकमुष्टिं प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा॥ ३५"],"iast":["kiṃcitkarotyurvapi yat svadattaṃ suhṛtkṛtaṃ phalgvapi bhūrikārī|","mayopanītāṃ pṛthukaikamuṣṭiṃ pratyagrahīt prītiyuto mahātmā|| 35"],"meaning":"मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैं बहुत, पर उसे मानते हैं बहुत थोड़ा! और उनका प्रेमी भक्त यदि उनके लिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको बहुत मान लेते हैं। देखो तो सही! मैंने उन्हें केवल एक मुट्ठी चिउड़ा भेंट किया था, पर उदारशिरोमणि श्रीकृष्णने उसे कितने प्रेमसे स्वीकार किया॥ ३५॥"},{"id":"10.81.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/36/","page":628,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्यैव मे सौहृदसख्यमैत्री दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात्।","महानुभावेन गुणालयेन विषज्जतस्तत्पुरुषप्रसंगः ॥ ३६"],"iast":["tasyaiva me sauhṛdasakhyamaitrī dāsyaṃ punarjanmani janmani syāt|","mahānubhāvena guṇālayena viṣajjatastatpuruṣaprasaṃgaḥ || 36"],"meaning":"मुझे जन्म-जन्म उन्हींका प्रेम, उन्हींकी हितैषिता, उन्हींकी मित्रता और उन्हींकी सेवा प्राप्त हो। मुझे सम्पत्तिकी आवश्यकता नहीं, सदा-सर्वदा उन्हीं गुणोंके एकमात्र निवासस्थान महानुभाव भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग बढ़ता जाय और उन्हींके प्रेमी भक्तोंका सत्संग प्राप्त हो॥ ३६॥"},{"id":"10.81.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/37/","page":629,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भक्ताय चित्रा भगवान् हि सम्पदो","राज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यजः।","अदीर्घबोधाय विचक्षणः स्वयं","पश्यन् निपातं धनिनां मदोद्भवम्॥ ३७"],"iast":["bhaktāya citrā bhagavān hi sampado","rājyaṃ vibhūtīrna samarthayatyajaḥ|","adīrghabodhāya vicakṣaṇaḥ svayaṃ","paśyan nipātaṃ dhanināṃ madodbhavam|| 37"],"meaning":"अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदिके दोष जानते हैं। वे देखते हैं कि बड़े-बड़े धनियोंका धन और ऐश्‍वर्यके मदसे पतन हो जाता है। इसलिये वे अपने अदूरदर्शी भक्तको उसके माँगते रहनेपर भी तरह-तरहकी सम्पत्ति, राज्य और ऐश्‍वर्य आदि नहीं देते। यह उनकी बड़ी कृपा है’॥ ३७॥"},{"id":"10.81.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/38/","page":629,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्थं व्यवसितो बुद्ध्या भक्तोऽतीव जनार्दने।","विषयाञ्जायया त्यक्ष्यन् बुभुजे नातिलम्पटः॥ ३८"],"iast":["itthaṃ vyavasito buddhyā bhakto'tīva janārdane|","viṣayāñjāyayā tyakṣyan bubhuje nātilampaṭaḥ|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे इस प्रकार निश्‍चय करके वे ब्राह्मणदेवता त्यागपूर्वक अनासक्तभावसे अपनी पत्‍नीके साथ भगवत्प्रसादस्वरूप विषयोंको ग्रहण करने लगे और दिनोंदिन उनकी प्रेम-भक्ति बढ़ने लगी॥ ३८॥"},{"id":"10.81.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/39/","page":629,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्य वै देवदेवस्य हरेर्यज्ञपतेः प्रभोः।","ब्राह्मणाः प्रभवो दैवं न तेभ्यो विद्यते परम्॥ ३९"],"iast":["tasya vai devadevasya hareryajñapateḥ prabhoḥ|","brāhmaṇāḥ prabhavo daivaṃ na tebhyo vidyate param|| 39"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! देवताओंके भी आराध्यदेव भक्त-भयहारी यज्ञपति सर्वशक्तिमान् भगवान् स्वयं ब्राह्मणोंको अपना प्रभु, अपना इष्टदेव मानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंसे बढ़कर और कोई भी प्राणी जगत‍्में नहीं है॥ ३९॥"},{"id":"10.81.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/40/","page":629,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदा","दृष्ट्वा स्वभृत्यैरजितं पराजितम्।","तद्ध्यानवेगोद्ग्रथितात्मबन्धन-","स्तद्धाम लेभेऽचिरतः सतां गतिम्॥ ४०"],"iast":["evaṃ sa vipro bhagavatsuhṛttadā","dṛṣṭvā svabhṛtyairajitaṃ parājitam|","taddhyānavegodgrathitātmabandhana-","staddhāma lebhe'cirataḥ satāṃ gatim|| 40"],"meaning":"इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने देखा कि ‘यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकोंके अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं,’ अब वे उन्हींके ध्यानमें तन्मय हो गये। ध्यानके आवेगसे उनकी अविद्याकी गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समयमें भगवान्‌का धाम, जो कि संतोंका एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया॥ ४०॥"},{"id":"10.81.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/41/","page":629,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः।","लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते॥ ४१"],"iast":["etad brahmaṇyadevasya śrutvā brahmaṇyatāṃ naraḥ|","labdhabhāvo bhagavati karmabandhād vimucyate|| 41"],"meaning":"परीक्षित्! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणभक्तिको जो सुनता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥"}],"text":[{"b":36706,"kind":"adhyaya_heading","page":624,"text":"अथैकाशीतितमोऽध्यायः"},{"b":36707,"kind":"topic_heading","page":624,"text":"सुदामाजीको ऐश्‍वर्यकी प्राप्ति"},{"b":36708,"kind":"topic_heading","page":624,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36709,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.81.1"],"text":"स इत्थं द्विजमुख्येन सह संकथयन् हरिः।"},{"b":36710,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.81.1"],"text":"सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम्॥ १"},{"b":36711,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.2"],"text":"ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान् प्रहसन् प्रियम्।"},{"b":36712,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.2"],"text":"प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षन् खलु सतां गतिः॥ २"},{"b":36713,"kind":"hindi_commentary","page":624,"explains":["10.81.1","10.81.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं। वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं। वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे। अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण-देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे॥ १-२॥"},{"b":36714,"kind":"topic_heading","page":625,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":36715,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.3"],"text":"किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात्।"},{"b":36716,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.3"],"text":"अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्।"},{"b":36717,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.3"],"text":"भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ ३"},{"b":36718,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.4"],"text":"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।"},{"b":36719,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.4"],"text":"तदहं भक्त्युपहृतमश्‍नामि प्रयतात्मनः॥ ४"},{"b":36720,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.5"],"text":"इत्युक्तोऽपि द्विजस्तस्मै व्रीडितः पतये श्रियः।"},{"b":36721,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.5"],"text":"पृथुकप्रसृतिं राजन् न प्रायच्छदवाङ्मुखः॥ ५"},{"b":36722,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.6"],"text":"सर्वभूतात्मदृक् साक्षात् तस्यागमनकारणम्।"},{"b":36723,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.6"],"text":"विज्ञायाचिन्तयन्‍नायं श्रीकामो माभजत्पुरा॥ ६"},{"b":36724,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.7"],"text":"पत्‍न्याः पतिव्रतायास्तु सखा प्रियचिकीर्षया।"},{"b":36725,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.7"],"text":"प्राप्तो मामस्य दास्यामि सम्पदोऽमर्त्यदुर्लभाः॥ ७"},{"b":36726,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.8"],"text":"इत्थं विचिन्त्य वसनाच्चीरबद्धान्द्विजन्मनः।"},{"b":36727,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.8"],"text":"स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान्॥ ८"},{"b":36728,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.9"],"text":"नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे।"},{"b":36729,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.9"],"text":"तर्पयन्त्यंग मां विश्‍वमेते पृथुकतण्डुलाः॥ ९"},{"b":36730,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.10"],"text":"इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे।"},{"b":36731,"kind":"sanskrit_shloka","page":625,"verses":["10.81.10"],"text":"तावच्छ्रीर्जगृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिनः॥ १०"},{"b":36732,"kind":"hindi_commentary","page":625,"explains":["10.81.3","10.81.4","10.81.5","10.81.6","10.81.7","10.81.8","10.81.9","10.81.10"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘ब्रह्मन्! आप अपने घरसे मेरे लिये क्या उपहार लाये हैं? मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेमसे थोड़ी-सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिये बहुत हो जाती है। परन्तु मेरे अभक्त यदि बहुत-सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं तो उससे मैं सन्तुष्ट नहीं होता॥ ३॥ जो पुरुष प्रेम-भक्तिसे फल-फूल अथवा पत्ता-पानीमेंसे कोई भी वस्तु मुझे समर्पित करता है, तो मैं उस शुद्धचित्त भक्तका वह प्रेमोपहार केवल स्वीकार ही नहीं करता, बल्कि तुरंत भोग लगा लेता हूँ’॥ ४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये। उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली। अब वे विचार करने लगे कि ‘एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है। इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्‍नीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है’॥ ५—७॥ भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा विचार करके उनके वस्त्रमेंसे चिथड़ेकी एक पोटलीमें बँधा हुआ चिउड़ा ‘यह क्या है’—ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया॥ ८॥ और बड़े आदरसे कहने लगे—‘प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं’॥ ९॥ ऐसा कहकर वे उसमेंसे एक मुट्ठी चिउड़ा खा गये और दूसरी मुट्ठी ज्यों ही भरी, त्यों ही रुक्मिणीके रूपमें स्वयं भगवती लक्ष्मीजीने भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया! क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान्‌के परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं॥ १०॥"},{"b":36733,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.11"],"text":"एतावतालं विश्‍वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये।"},{"b":36734,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.11"],"text":"अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम्॥ ११"},{"b":36735,"kind":"hindi_commentary","page":626,"explains":["10.81.11"],"text":"रुक्मिणीजीने कहा—‘विश्‍वात्मन्! बस, बस। मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्‍नताका हेतु बन जाता है’॥ ११॥"},{"b":36736,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.12"],"text":"ब्राह्मणस्तां तु रजनीमुषित्वाच्युतमन्दिरे।"},{"b":36737,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.12"],"text":"भुक्त्वा पीत्वा सुखं मेने आत्मानं स्वर्गतं यथा॥ १२"},{"b":36738,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.13"],"text":"श्‍वोभूते विश्‍वभावेन स्वसुखेनाभिवन्दितः।"},{"b":36739,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.13"],"text":"जगाम स्वालयं तात पथ्यनुव्रज्य नन्दितः॥ १३"},{"b":36740,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.14"],"text":"स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्‍न तु याचितवान् स्वयम्।"},{"b":36741,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.14"],"text":"स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः॥ १४"},{"b":36742,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.15"],"text":"अहो ब्रह्मण्यदेवस्य दृष्टा ब्रह्मण्यता मया।"},{"b":36743,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.15"],"text":"यद् दरिद्रतमो लक्ष्मीमाश्‍लिष्टो बिभ्रतोरसि॥ १५"},{"b":36744,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.16"],"text":"क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः।"},{"b":36745,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.16"],"text":"ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥ १६"},{"b":36746,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.17"],"text":"निवासितः प्रियाजुष्टे पर्यंके भ्रातरो यथा।"},{"b":36747,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.17"],"text":"महिष्या वीजितः श्रान्तो वालव्यजनहस्तया॥ १७"},{"b":36748,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.18"],"text":"शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः।"},{"b":36749,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.18"],"text":"पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत्॥ १८"},{"b":36750,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.19"],"text":"स्वर्गापवर्गयोः पुंसां रसायां भुवि सम्पदाम्।"},{"b":36751,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.19"],"text":"सर्वासामपि सिद्धीनां मूलं तच्चरणार्चनम्॥ १९"},{"b":36752,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.20"],"text":"अधनोऽयं धनं प्राप्य माद्यन्‍नुच्चैर्न मां स्मरेत्।"},{"b":36753,"kind":"sanskrit_shloka","page":626,"verses":["10.81.20"],"text":"इति कारुणिको नूनं धनं मेऽभूरि नाददात्॥ २०"},{"b":36754,"kind":"hindi_translation","page":626,"explains":["10.81.12","10.81.13","10.81.14","10.81.15","10.81.16","10.81.17","10.81.18","10.81.19","10.81.20"],"text":"परीक्षित्! ब्राह्मणदेवता उस रातको भगवान् श्रीकृष्णके महलमें ही रहे। उन्होंने बड़े आरामसे वहाँ खाया-पिया और ऐसा अनुभव किया, मानो मैं वैकुण्ठमें ही पहुँच गया हूँ॥ १२॥ परीक्षित्! श्रीकृष्णसे ब्राह्मणको प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिला। फिर भी उन्होंने उनसे कुछ माँगा नहीं! वे अपने चित्तकी करतूतपर कुछ लज्जित-से होकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनजनित आनन्दमें डूबते-उतराते अपने घरकी ओर चल पड़े॥ १३-१४॥ वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अहो, कितने आनन्द और आश्‍चर्यकी बात है! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी ब्राह्मणभक्ति आज मैंने अपनी आँखों देख ली। धन्य है! जिनके वक्षःस्थलपर स्वयं लक्ष्मीजी सदा विराजमान रहती हैं, उन्होंने मुझ अत्यन्त दरिद्रको अपने हृदयसे लगा लिया॥ १५॥ कहाँ तो मैं अत्यन्त पापी और दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मीके एकमात्र आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण! परन्तु उन्होंने ‘यह ब्राह्मण है’—ऐसा समझकर मुझे अपनी भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया॥ १६॥ इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे उस पलंगपर सुलाया, जिसपर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी शयन करती हैं। मानो मैं उनका सगा भाई हूँ! कहाँतक कहूँ? मैं थका हुआ था, इसलिये स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजीने अपने हाथों चँवर डुलाकर मेरी सेवा की॥ १७॥ ओह, देवताओंके आराध्यदेव होकर भी ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले प्रभुने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला-पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा-शुश्रूषा की और देवताके समान मेरी पूजा की॥ १८॥ स्वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसातलकी सम्पत्ति तथा समस्त योगसिद्धियोंकी प्राप्तिका मूल उनके चरणोंकी पूजा ही है॥ १९॥ फिर भी परमदयालु श्रीकृष्णने यह सोचकर मुझे थोड़ा-सा भी धन नहीं दिया कि कहीं यह दरिद्र धन पाकर बिलकुल मतवाला न हो जाय और मुझे न भूल बैठे’॥ २०॥"},{"b":36755,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.21"],"text":"इति तच्चिन्तयन्‍नन्तः प्राप्तो निजगृहान्तिकम्।"},{"b":36756,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.21"],"text":"सूर्यानलेन्दुसंकाशैर्विमानैः सर्वतो वृतम्॥ २१"},{"b":36757,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.22"],"text":"विचित्रोपवनोद्यानैः कूजद‍्द्विजकुलाकुलैः।"},{"b":36758,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.22"],"text":"प्रोत्फुल्लकुमुदाम्भोजकह्लारोत्पलवारिभिः॥ २२"},{"b":36759,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.23"],"text":"जुष्टं स्वलंकृतैः पुम्भिः स्त्रीभिश्‍च हरिणाक्षिभिः।"},{"b":36760,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.23"],"text":"किमिदं कस्य वा स्थानं कथं तदिदमित्यभूत्॥ २३"},{"b":36761,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.24"],"text":"एवं मीमांसमानं तं नरा नार्योऽमरप्रभाः।"},{"b":36762,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.24"],"text":"प्रत्यगृह्णन् महाभागं गीतवाद्येन भूयसा॥ २४"},{"b":36763,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.25"],"text":"पतिमागतमाकर्ण्य पत्‍न्युद्धर्षातिसम्भ्रमा।"},{"b":36764,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.25"],"text":"निश्‍चक्राम गृहात्तूर्णं रूपिणी श्रीरिवालयात्॥ २५"},{"b":36765,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.26"],"text":"पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा प्रेमोत्कण्ठाश्रुलोचना।"},{"b":36766,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.26"],"text":"मीलिताक्ष्यनमद् बुद्ध्या मनसा परिषस्वजे॥ २६"},{"b":36767,"kind":"hindi_commentary","page":627,"explains":["10.81.21","10.81.22","10.81.23","10.81.24","10.81.25","10.81.26"],"text":"इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घरके पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्‍नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्‍ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्‍वेत, नील और सौगन्धिक—भाँति-भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे—‘मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया’॥ २१—२३॥ इस प्रकार वे सोच ही रहे थे कि देवताओंके समान सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष गाजे-बाजेके साथ मंगलगीत गाते हुए उस महाभाग्यवान् ब्राह्मणकी अगवानी करनेके लिये आये॥ २४॥ पतिदेवका शुभागमन सुनकर ब्राह्मणीको अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी घरसे निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवनसे पधारी हों॥ २५॥ पतिदेवको देखते ही पतिव्रता पत्‍नीके नेत्रोंमें प्रेम और उत्कण्ठाके आवेगसे आँसू छलक आये। उसने अपने नेत्र बंद कर लिये। ब्राह्मणीने बड़े प्रेमभावसे उन्हें नमस्कार किया और मन-ही-मन आलिंगन भी॥ २६॥"},{"b":36768,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.27"],"text":"पत्‍नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव।"},{"b":36769,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.27"],"text":"दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः॥ २७"},{"b":36770,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.28"],"text":"प्रीतः स्वयं तया युक्तः प्रविष्टो निजमन्दिरम्।"},{"b":36771,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.28"],"text":"मणिस्तम्भशतोपेतं महेन्द्रभवनं यथा॥ २८"},{"b":36772,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.29"],"text":"पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः।"},{"b":36773,"kind":"sanskrit_shloka","page":627,"verses":["10.81.29"],"text":"पर्यंका हेमदण्डानि चामरव्यजनानि च॥ २९"},{"b":36774,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.30"],"text":"आसनानि च हैमानि मृदूपस्तरणानि च।"},{"b":36775,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.30"],"text":"मुक्तादामविलम्बीनि वितानानि द्युमन्ति च॥ ३०"},{"b":36776,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.31"],"text":"स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।"},{"b":36777,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.31"],"text":"रत्‍नदीपा भ्राजमाना ललनारत्‍नसंयुताः॥ ३१"},{"b":36778,"kind":"hindi_commentary","page":627,"explains":["10.81.27","10.81.28","10.81.29","10.81.30","10.81.31"],"text":"प्रिय परीक्षित्! ब्राह्मणपत्‍नी सोनेका हार पहनी हुई दासियोंके बीचमें विमानस्थित देवांगनाके समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये॥ २७॥ उन्होंने अपनी पत्‍नीके साथ बड़े प्रेमसे अपने महलमें प्रवेश किया। उनका महल क्या था, मानो देवराज इन्द्रका निवासस्थान। इसमें मणियोंके सैकड़ों खंभे खड़े थे॥ २८॥ हाथीके दाँतके बने हुए और सोनेके पातसे मँढ़े हुए पलंगोंपर दूधके फेनकी तरह श्‍वेत और कोमल बिछौने बिछ रहे थे। बहुत-से चँवर वहाँ रखे हुए थे, जिनमें सोनेकी डंडियाँ लगी हुई थीं॥ २९॥ सोनेके सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिनपर बड़ी कोमल-कोमल गद्दियाँ लगी हुई थीं! ऐसे चँदोवे भी झिलमिला रहे थे जिनमें मोतियोंकी लड़ियाँ लटक रही थीं॥ ३०॥ स्फटिकमणिकी स्वच्छ भीतोंपर पन्‍नेकी पच्चीकारी की हुई थी। रत्‍ननिर्मित स्त्रीमूर्तियोंके हाथोंमें रत्‍नोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३१॥"},{"b":36779,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.32"],"text":"विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम्।"},{"b":36780,"kind":"sanskrit_shloka","page":628,"verses":["10.81.32"],"text":"तर्कयामास निर्व्यग्रः स्वसमृद्धिमहैतुकीम्॥ ३२"},{"b":36781,"kind":"hindi_commentary","page":628,"verses":["10.81.33"],"text":"नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्य शश्‍वद्दरिद्रस्य समृद्धिहेतुः।"},{"b":36782,"kind":"hindi_translation","page":628,"verses":["10.81.33"],"text":"महाविभूतेरवलोकतोऽन्यो नैवोपपद्येत यदूत्तमस्य॥ ३३"},{"b":36783,"kind":"hindi_commentary","page":628,"verses":["10.81.34"],"text":"नन्वब्रुवाणो दिशते समक्षं याचिष्णवे भूर्यपि भूरिभोजः।"},{"b":36784,"kind":"hindi_translation","page":628,"verses":["10.81.34"],"text":"पर्जन्यवत्तत् स्वयमीक्षमाणो दाशार्हकाणामृषभः सखा मे॥ ३४"},{"b":36785,"kind":"hindi_commentary","page":628,"verses":["10.81.35"],"text":"किंचित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी।"},{"b":36786,"kind":"hindi_translation","page":628,"verses":["10.81.35"],"text":"मयोपनीतां पृथुकैकमुष्टिं प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा॥ ३५"},{"b":36787,"kind":"hindi_commentary","page":628,"verses":["10.81.36"],"text":"तस्यैव मे सौहृदसख्यमैत्री दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात्।"},{"b":36788,"kind":"hindi_translation","page":628,"verses":["10.81.36"],"text":"महानुभावेन गुणालयेन विषज्जतस्तत्पुरुषप्रसंगः ॥ ३६"},{"b":36789,"kind":"hindi_commentary","page":629,"verses":["10.81.37"],"text":"भक्ताय चित्रा भगवान् हि सम्पदो"},{"b":36790,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.37"],"text":"राज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यजः।"},{"b":36791,"kind":"hindi_commentary","page":629,"verses":["10.81.37"],"text":"अदीर्घबोधाय विचक्षणः स्वयं"},{"b":36792,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.37"],"text":"पश्यन् निपातं धनिनां मदोद्भवम्॥ ३७"},{"b":36793,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.38"],"text":"इत्थं व्यवसितो बुद्ध्या भक्तोऽतीव जनार्दने।"},{"b":36794,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.38"],"text":"विषयाञ्जायया त्यक्ष्यन् बुभुजे नातिलम्पटः॥ ३८"},{"b":36795,"kind":"hindi_commentary","page":628,"explains":["10.81.32","10.81.33","10.81.34","10.81.35","10.81.36","10.81.37","10.81.38"],"text":"इस प्रकार समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि देखकर और उसका कोई प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरतासे ब्राह्मणदेवता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कहाँसे आ गयी॥ ३२॥ वे मन-ही-मन कहने लगे—‘मैं जन्मसे ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ। फिर मेरी इस सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या है? अवश्य ही परमैश्‍वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके कृपाकटाक्षके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता॥ ३३॥ यह सब कुछ उनकी करुणाकी ही देन है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम और लक्ष्मीपति होनेके कारण अनन्त भोग-सामग्रियोंसे युक्त हैं। इसलिये वे याचक भक्तको उसके मनका भाव जानकर बहुत कुछ दे देते हैं, परन्तु उसे समझते हैं बहुत थोड़ा; इसलिये सामने कुछ कहते नहीं। मेरे यदुवंशशिरोमणि सखा श्यामसुन्दर सचमुच उस मेघसे भी बढ़कर उदार हैं, जो समुद्रको भर देनेकी शक्ति रखनेपर भी किसानके सामने न बरसकर उसके सो जानेपर रातमें बरसता है और बहुत बरसनेपर भी थोड़ा ही समझता है॥ ३४॥ मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैं बहुत, पर उसे मानते हैं बहुत थोड़ा! और उनका प्रेमी भक्त यदि उनके लिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको बहुत मान लेते हैं। देखो तो सही! मैंने उन्हें केवल एक मुट्ठी चिउड़ा भेंट किया था, पर उदारशिरोमणि श्रीकृष्णने उसे कितने प्रेमसे स्वीकार किया॥ ३५॥ मुझे जन्म-जन्म उन्हींका प्रेम, उन्हींकी हितैषिता, उन्हींकी मित्रता और उन्हींकी सेवा प्राप्त हो। मुझे सम्पत्तिकी आवश्यकता नहीं, सदा-सर्वदा उन्हीं गुणोंके एकमात्र निवासस्थान महानुभाव भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग बढ़ता जाय और उन्हींके प्रेमी भक्तोंका सत्संग प्राप्त हो॥ ३६॥ अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदिके दोष जानते हैं। वे देखते हैं कि बड़े-बड़े धनियोंका धन और ऐश्‍वर्यके मदसे पतन हो जाता है। इसलिये वे अपने अदूरदर्शी भक्तको उसके माँगते रहनेपर भी तरह-तरहकी सम्पत्ति, राज्य और ऐश्‍वर्य आदि नहीं देते। यह उनकी बड़ी कृपा है’॥ ३७॥ परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे इस प्रकार निश्‍चय करके वे ब्राह्मणदेवता त्यागपूर्वक अनासक्तभावसे अपनी पत्‍नीके साथ भगवत्प्रसादस्वरूप विषयोंको ग्रहण करने लगे और दिनोंदिन उनकी प्रेम-भक्ति बढ़ने लगी॥ ३८॥"},{"b":36796,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.39"],"text":"तस्य वै देवदेवस्य हरेर्यज्ञपतेः प्रभोः।"},{"b":36797,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.39"],"text":"ब्राह्मणाः प्रभवो दैवं न तेभ्यो विद्यते परम्॥ ३९"},{"b":36798,"kind":"hindi_commentary","page":629,"verses":["10.81.40"],"text":"एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदा"},{"b":36799,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.40"],"text":"दृष्ट्वा स्वभृत्यैरजितं पराजितम्।"},{"b":36800,"kind":"hindi_commentary","page":629,"verses":["10.81.40"],"text":"तद्ध्यानवेगोद्ग्रथितात्मबन्धन-"},{"b":36801,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.40"],"text":"स्तद्धाम लेभेऽचिरतः सतां गतिम्॥ ४०"},{"b":36802,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.41"],"text":"एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः।"},{"b":36803,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.81.41"],"text":"लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते॥ ४१"},{"b":36804,"kind":"hindi_translation","page":629,"explains":["10.81.39","10.81.40","10.81.41"],"text":"प्रिय परीक्षित्! देवताओंके भी आराध्यदेव भक्त-भयहारी यज्ञपति सर्वशक्तिमान् भगवान् स्वयं ब्राह्मणोंको अपना प्रभु, अपना इष्टदेव मानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंसे बढ़कर और कोई भी प्राणी जगत‍्में नहीं है॥ ३९॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने देखा कि ‘यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकोंके अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं,’ अब वे उन्हींके ध्यानमें तन्मय हो गये। ध्यानके आवेगसे उनकी अविद्याकी गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समयमें भगवान्‌का धाम, जो कि संतोंका एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया॥ ४०॥ परीक्षित्! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणभक्तिको जो सुनता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥"},{"b":36805,"kind":"hindi_translation","page":629,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पृथुकोपाख्यानं नामैकाशीतितमोऽध्यायः॥ ८१॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":0,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}