{"id":"10.87","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 87","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः","topics":["वेदस्तुति"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.87.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[666,687]},"verses":[{"id":"10.87.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/1/","page":667,"speaker":"परीक्षिदुवाच","sanskrit":["ब्रह्मन् ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तयः।","कथं चरन्ति श्रुतयः साक्षात् सदसतः परे॥ १"],"iast":["brahman brahmaṇyanirdeśye nirguṇe guṇavṛttayaḥ|","kathaṃ caranti śrutayaḥ sākṣāt sadasataḥ pare|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! ब्रह्म कार्य और कारणसे सर्वथा परे है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण उसमें हैं ही नहीं। मन और वाणीसे संकेतरूपमें भी उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर समस्त श्रुतियोंका विषय गुण ही है। (वे जिस विषयका वर्णन करती हैं उसके गुण, जाति, क्रिया अथवा रूढिका ही निर्देश करती हैं) ऐसी स्थितिमें श्रुतियाँ निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन किस प्रकार करती हैं? क्योंकि निर्गुण वस्तुका स्वरूप तो उनकी पहुँचके परे है॥ १॥"},{"id":"10.87.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/2/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् जनानामसृजत् प्रभुः।","मात्रार्थं च भवार्थं च आत्मनेऽकल्पनाय च॥ २"],"iast":["buddhīndriyamanaḥprāṇān janānāmasṛjat prabhuḥ|","mātrārthaṃ ca bhavārthaṃ ca ātmane'kalpanāya ca|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (भगवान् सर्वशक्तिमान् और गुणोंके निधान हैं। श्रुतियाँ स्पष्टतः सगुणका ही निरूपण करती हैं, परन्तु विचार करनेपर उनका तात्पर्य निर्गुण ही निकलता है। विचार करनेके लिये ही) भगवान्‌ने जीवोंके लिये बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी सृष्टि की है। इनके द्वारा वे स्वेच्छासे अर्थ, धर्म, काम अथवा मोक्षका अर्जन कर सकते हैं (प्राणोंके द्वारा जीवन-धारण, श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा महावाक्य आदिका श्रवण, मनके द्वारा मनन और बुद्धिके द्वारा निश्‍चय करनेपर श्रुतियोंके तात्पर्य निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार हो सकता है। इसलिये श्रुतियाँ सगुणका प्रतिपादन करनेपर भी वस्तुतः निर्गुणपरक हैं)॥ २॥"},{"id":"10.87.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/3/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सैषा ह्युपनिषद् ब्राह्मी पूर्वेषां पूर्वजैर्धृता।","श्रद्धया धारयेद् यस्तां क्षेमं गच्छेदकिंचनः॥ ३"],"iast":["saiṣā hyupaniṣad brāhmī pūrveṣāṃ pūrvajairdhṛtā|","śraddhayā dhārayed yastāṃ kṣemaṃ gacchedakiṃcanaḥ|| 3"],"meaning":"ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्का यही स्वरूप है। इसे पूर्वजोंके भी पूर्वज सनकादि ऋषियोंने आत्मनिश्‍चयके द्वारा धारण किया है। जो भी मनुष्य इसे श्रद्धापूर्वक धारण करता है, वह बन्धनके कारण समस्त उपाधियों—अनात्मभावोंसे मुक्त होकर अपने परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ ३॥"},{"id":"10.87.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/4/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्र ते वर्णयिष्यामि गाथां नारायणान्विताम्।","नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च॥ ४"],"iast":["atra te varṇayiṣyāmi gāthāṃ nārāyaṇānvitām|","nāradasya ca saṃvādamṛṣernārāyaṇasya ca|| 4"],"meaning":"इस विषयमें मैं तुम्हें एक गाथा सुनाता हूँ। उस गाथाके साथ स्वयं भगवान् नारायणका सम्बन्ध है। वह गाथा देवर्षि नारद और ऋषिश्रेष्ठ नारायणका संवाद है॥ ४॥"},{"id":"10.87.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/5/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकदा नारदो लोकान् पर्यटन् भगवत्प्रियः।","सनातनमृषिं द्रष्टुं ययौ नारायणाश्रमम्॥ ५"],"iast":["ekadā nārado lokān paryaṭan bhagavatpriyaḥ|","sanātanamṛṣiṃ draṣṭuṃ yayau nārāyaṇāśramam|| 5"],"meaning":"एक समयकी बात है, भगवान्‌के प्यारे भक्त देवर्षि नारदजी विभिन्‍न लोकोंमें विचरण करते हुए सनातनऋषि भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रम गये॥ ५॥"},{"id":"10.87.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/6/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यो वै भारतवर्षेऽस्मिन् क्षेमाय स्वस्तये नृणाम्।","धर्मज्ञानशमोपेतमाकल्पादास्थितस्तपः ॥ ६"],"iast":["yo vai bhāratavarṣe'smin kṣemāya svastaye nṛṇām|","dharmajñānaśamopetamākalpādāsthitastapaḥ || 6"],"meaning":"भगवान् नारायण मनुष्योंके अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और परम निःश्रेयस (भगवत्स्वरूप अथवा मोक्षकी प्राप्ति) के लिये इस भारतवर्षमें कल्पके प्रारम्भसे ही धर्म, ज्ञान और संयमके साथ महान् तपस्या कर रहे हैं॥ ६॥"},{"id":"10.87.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/7/","page":668,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रोपविष्टमृषिभिः कलापग्रामवासिभिः।","परीतं प्रणतोऽपृच्छदिदमेव कुरूद्वह॥ ७"],"iast":["tatropaviṣṭamṛṣibhiḥ kalāpagrāmavāsibhiḥ|","parītaṃ praṇato'pṛcchadidameva kurūdvaha|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! एक दिन वे कलापग्रामवासी सिद्ध ऋषियोंके बीचमें बैठे हुए थे। उस समय नारदजीने उन्हें प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यही प्रश्‍न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो॥ ७॥"},{"id":"10.87.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/8/","page":669,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मै ह्यवोचद् भगवानृषीणां शृण्वतामिदम्।","यो ब्रह्मवादः पूर्वेषां जनलोकनिवासिनाम्॥ ८"],"iast":["tasmai hyavocad bhagavānṛṣīṇāṃ śṛṇvatāmidam|","yo brahmavādaḥ pūrveṣāṃ janalokanivāsinām|| 8"],"meaning":"भगवान् नारायणने ऋषियोंकी उस भरी सभामें नारदजीको उनके प्रश्‍नका उत्तर दिया और वह कथा सुनायी, जो पूर्वकालीन जनलोकनिवासियोंमें परस्पर वेदोंके तात्पर्य और ब्रह्मके स्वरूपके सम्बन्धमें विचार करते समय कही गयी थी॥ ८॥"},{"id":"10.87.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/9/","page":669,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा।","तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्॥ ९"],"iast":["svāyambhuva brahmasatraṃ janaloke'bhavat purā|","tatrasthānāṃ mānasānāṃ munīnāmūrdhvaretasām|| 9"],"meaning":"भगवान् नारायणने कहा—नारदजी! प्राचीन कालकी बात है। एक बार जनलोकमें वहाँ रहनेवाले ब्रह्माके मानस पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन, सनातन आदि परमर्षियोंका ब्रह्मसत्र (ब्रह्मविषयक विचार या प्रवचन) हुआ था॥ ९॥"},{"id":"10.87.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/10/","page":669,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्‍वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तदीश्‍वरम्।","ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते।","तत्र हायमभूत् प्रश्‍नस्त्वं मां यमनुपृच्छसि॥ १०"],"iast":["śvetadvīpaṃ gatavati tvayi draṣṭuṃ tadīśvaram|","brahmavādaḥ susaṃvṛttaḥ śrutayo yatra śerate|","tatra hāyamabhūt praśnastvaṃ māṃ yamanupṛcchasi|| 10"],"meaning":"उस समय तुम मेरी श्‍वेतद्वीपाधिपति अनिरुद्ध-मूर्तिका दर्शन करनेके लिये श्‍वेतद्वीप चले गये थे। उस समय वहाँ उस ब्रह्मके सम्बन्धमें बड़ी ही सुन्दर चर्चा हुई थी, जिसके विषयमें श्रुतियाँ भी मौन धारण कर लेती हैं, स्पष्ट वर्णन न करके तात्पर्यरूपसे लक्षित कराती हुई उसीमें सो जाती हैं। उस ब्रह्मसत्रमें यही प्रश्‍न उपस्थित किया गया था, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो॥ १०॥"},{"id":"10.87.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/11/","page":669,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः।","अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे॥ ११"],"iast":["tulyaśrutatapaḥśīlāstulyasvīyārimadhyamāḥ|","api cakruḥ pravacanamekaṃ śuśrūṣavo'pare|| 11"],"meaning":"सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार—ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील-स्वभावमें समान हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक-से हैं। फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये॥ ११॥"},{"id":"10.87.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/12/","page":669,"speaker":"सनन्दन उवाच","sanskrit":["स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः।","तदन्ते बोधयांचक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम्॥ १२"],"iast":["svasṛṣṭamidamāpīya śayānaṃ saha śaktibhiḥ|","tadante bodhayāṃcakrustalliṅgaiḥ śrutayaḥ param|| 12"],"meaning":"सनन्दनजीने कहा—जिस प्रकार प्रातःकाल होनेपर सोते हुए सम्राट्को जगानेके लिये अनुजीवी वंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राट्के पराक्रम तथा सुयशका गान करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परमात्मा अपने बनाये हुए सम्पूर्ण जगत‍्को अपनेमें लीन करके अपनी शक्तियोंके सहित सोये रहते हैं; तब प्रलयके अन्तमें श्रुतियाँ उनका प्रतिपादन करनेवाले वचनोंसे उन्हें इस प्रकार जगाती हैं॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.87.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/13/","page":669,"speaker":"सनन्दन उवाच","sanskrit":["यथा शयानं सम्राजं वन्दिनस्तत्पराक्रमैः।","प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्‍लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः॥ १३"],"iast":["yathā śayānaṃ samrājaṃ vandinastatparākramaiḥ|","pratyūṣe'bhyetya suślokairbodhayantyanujīvinaḥ|| 13"],"meaning":"सनन्दनजीने कहा—जिस प्रकार प्रातःकाल होनेपर सोते हुए सम्राट्को जगानेके लिये अनुजीवी वंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राट्के पराक्रम तथा सुयशका गान करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परमात्मा अपने बनाये हुए सम्पूर्ण जगत‍्को अपनेमें लीन करके अपनी शक्तियोंके सहित सोये रहते हैं; तब प्रलयके अन्तमें श्रुतियाँ उनका प्रतिपादन करनेवाले वचनोंसे उन्हें इस प्रकार जगाती हैं॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.87.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/14/","page":670,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां","त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः।","अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते","क्वचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽनुचरेन्‍निगमः॥ १४"],"iast":["jaya jaya jahyajāmajita doṣagṛbhītaguṇāṃ","tvamasi yadātmanā samavaruddhasamastabhagaḥ|","agajagadokasāmakhilaśaktyavabodhaka te","kvacidajayā''tmanā ca carato'nucarennigamaḥ|| 14"],"meaning":"श्रुतियाँ कहती हैं—अजित! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। आपकी जय हो, जय हो। प्रभो! आप स्वभावसे ही समस्त ऐश्‍वर्योंसे पूर्ण हैं, इसलिये चराचर प्राणियोंको फँसानेवाली मायाका नाश कर दीजिये। प्रभो! इस गुणमयी मायाने दोषके लिये—जीवोंके आनन्दादिमय सहज स्वरूपका आच्छादन करके उन्हें बन्धनमें डालनेके लिये ही सत्त्वादि गुणोंको ग्रहण किया है। जगत‍्में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ हैं, उन सबको जगानेवाले आप ही हैं। इसलिये आपके मिटाये बिना यह माया मिट नहीं सकती। (इस विषयमें यदि प्रमाण पूछा जाय, तो आपकी श्‍वासभूता श्रुतियाँ ही—हम ही प्रमाण हैं।) यद्यपि हम आपका स्वरूपतः वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परन्तु जब कभी आप मायाके द्वारा जगत‍्की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीड़ा करते हैं, तभी हम यत्किंचित् आपका वर्णन करनेमें समर्थ होती हैं॥ १४॥"},{"id":"10.87.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/15/","page":670,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["बृहदुपलब्धमेतदवयन्त्यवशेषतया","यत उदयास्तमयौ विकृतेर्मृदि वाविकृतात्।","अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं","कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्॥ १५"],"iast":["bṛhadupalabdhametadavayantyavaśeṣatayā","yata udayāstamayau vikṛtermṛdi vāvikṛtāt|","ata ṛṣayo dadhustvayi manovacanācaritaṃ","kathamayathā bhavanti bhuvi dattapadāni nṛṇām|| 15"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि हमारे द्वारा इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका भी वर्णन किया जाता है, परन्तु हमारे (श्रुतियोंके) सारे मन्त्र अथवा सभी मन्त्रद्रष्टा ऋषि प्रतीत होनेवाले इस सम्पूर्ण जगत‍्को ब्रह्मस्वरूप ही अनुभव करते हैं। क्योंकि जिस समय यह सारा जगत् नहीं रहता, उस समय भी आप बच रहते हैं। जैसे घट, शराव (मिट्टीका प्याला—कसोरा) आदि सभी विकार मिट्टीसे ही उत्पन्‍न और उसीमें लीन होते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत‍्की उत्पत्ति और प्रलय आपमें ही होती है। तब क्या आप पृथ्वीके समान विकारी हैं? नहीं-नहीं, आप तो एकरस—निर्विकार हैं। इसीसे तो यह जगत् आपमें उत्पन्‍न नहीं, प्रतीत है। इसलिये जैसे घट, शराव आदिका वर्णन भी मिट्टीका ही वर्णन है, वैसे ही इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका वर्णन भी आपका ही वर्णन है। यही कारण है कि विचारशील ऋषि, मनसे जो कुछ सोचा जाता है और वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, उसे आपमें ही स्थित, आपका ही स्वरूप देखते हैं। मनुष्य अपना पैर चाहे कहीं भी रखे—ईंट, पत्थर या काठपर—होगा वह पृथ्वीपर ही; क्योंकि वे सब पृथ्वीस्वरूप ही हैं। इसलिये हम चाहे जिस नाम या जिस रूपका वर्णन करें, वह आपका ही नाम, आपका ही रूप है॥ १५॥"},{"id":"10.87.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/16/","page":671,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["इति तव सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल-","क्षपणकथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः।","किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः","परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम्॥ १६"],"iast":["iti tava sūrayastryadhipate'khilalokamala-","kṣapaṇakathāmṛtābdhimavagāhya tapāṃsi jahuḥ|","kimuta punaḥ svadhāmavidhutāśayakālaguṇāḥ","parama bhajanti ye padamajasrasukhānubhavam|| 16"],"meaning":"भगवन्! लोग सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंकी मायासे बने हुए अच्छे-बुरे भावों या अच्छी-बुरी क्रियाओंमें उलझ जाया करते हैं, परन्तु आप तो उस मायानटीके स्वामी, उसको नचानेवाले हैं। इसीलिये विचारशील पुरुष आपकी लीलाकथाके अमृतसागरमें गोते लगाते रहते हैं और इस प्रकार अपने सारे पाप-तापको धो-बहा देते हैं। क्यों न हो, आपकी लीला-कथा सभी जीवोंके मायामलको नष्ट करनेवाली जो है। पुरुषोत्तम! जिन महापुरुषोंने आत्मज्ञानके द्वारा अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि और शरीरके कालकृत जरा-मरण आदि दोष मिटा दिये हैं और निरन्तर आपके उस स्वरूपकी अनुभूतिमें म‌ग्‍न रहते हैं, जो अखण्ड आनन्दस्वरूप है, उन्होंने अपने पाप-तापोंको सदाके लिये शान्त, भस्म कर दिया है—इसके विषयमें तो कहना ही क्या है॥ १६॥"},{"id":"10.87.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/17/","page":672,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["दृतय इव श्‍वसन्त्यसुभृतो यदि तेऽनुविधा","महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः।","पुरुषविधोऽन्वयोऽत्र चरमोऽन्‍नमयादिषु यः","सदसतः परं त्वमथ यदेष्ववशेषमृतम्॥ १७"],"iast":["dṛtaya iva śvasantyasubhṛto yadi te'nuvidhā","mahadahamādayo'ṇḍamasṛjan yadanugrahataḥ|","puruṣavidho'nvayo'tra caramo'nnamayādiṣu yaḥ","sadasataḥ paraṃ tvamatha yadeṣvavaśeṣamṛtam|| 17"],"meaning":"भगवन्! प्राणधारियोंके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे आपका भजन-सेवन करें, आपकी आज्ञाका पालन करें; यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका जीवन व्यर्थ है और उनके शरीरमें श्‍वासका चलना ठीक वैसा ही है, जैसा लुहारकी धौंकनीमें हवाका आना-जाना। महत्तत्त्व, अहंकार आदिने आपके अनुग्रहसे—आपके उनमें प्रवेश करनेपर ही इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि की है। अन्‍नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—इन पाँचों कोशोंमें पुरुषरूपसे रहनेवाले, उनमें ‘मैं-मैं’ की स्फूर्ति करनेवाले भी आप ही हैं! आपके ही अस्तित्वसे उन कोशोंके अस्तित्वका अनुभव होता है और उनके न रहनेपर भी अन्तिम अवधिरूपसे आप विराजमान रहते हैं। इस प्रकार सबमें अन्वित और सबकी अवधि होनेपर भी आप असंग ही हैं। क्योंकि वास्तवमें जो कुछ वृत्तियोंके द्वारा अस्ति अथवा नास्तिके रूपमें अनुभव होता है, उन समस्त कार्य-कारणोंसे आप परे हैं। ‘नेति-नेति’ के द्वारा इन सबका निषेध हो जानेपर भी आप ही शेष रहते हैं, क्योंकि आप उस निषेधके भी साक्षी हैं और वास्तवमें आप ही एकमात्र सत्य हैं (इसलिये आपके भजनके बिना जीवका जीवन व्यर्थ ही है, क्योंकि वह इस महान् सत्यसे वंचित है)॥ १७॥"},{"id":"10.87.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/18/","page":672,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः","परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम्।","तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं","पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे॥ १८"],"iast":["udaramupāsate ya ṛṣivartmasu kūrpadṛśaḥ","parisarapaddhatiṃ hṛdayamāruṇayo daharam|","tata udagādananta tava dhāma śiraḥ paramaṃ","punariha yat sametya na patanti kṛtāntamukhe|| 18"],"meaning":"ऋषियोंने आपकी प्राप्तिके लिये अनेकों मार्ग माने हैं। उनमें जो स्थूल दृष्टिवाले हैं, वे मणिपूरक चक्रमें अग्‍निरूपसे आपकी उपासना करते हैं। अरुणवंशके ऋषि समस्त नाड़ियोंके निकलनेके स्थान हृदयमें आपके परम सूक्ष्मस्वरूप दहर ब्रह्मकी उपासना करते हैं। प्रभो! हृदयसे ही आपको प्राप्त करनेका श्रेष्ठ मार्ग सुषुम्‍ना नाड़ी ब्रह्मरन्ध्रतक गयी हुई है। जो पुरुष उस ज्योतिर्मय मार्गको प्राप्त कर लेता है और उससे ऊपरकी ओर बढ़ता है, वह फिर जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता॥ १८॥"},{"id":"10.87.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/19/","page":673,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्‍निव हेतुतया","तरतमतश्‍चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः।","अथ वितथास्वमूष्ववितथं तव धाम समं","विरजधियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एकरसम्॥ १९"],"iast":["svakṛtavicitrayoniṣu viśanniva hetutayā","taratamataścakāssyanalavat svakṛtānukṛtiḥ|","atha vitathāsvamūṣvavitathaṃ tava dhāma samaṃ","virajadhiyo'nvayantyabhivipaṇyava ekarasam|| 19"],"meaning":"भगवन्! आपने ही देवता, मनुष्य और पशु-पक्षी आदि योनियाँ बनायी हैं। सदा-सर्वत्र सब रूपोंमें आप हैं ही, इसलिये कारणरूपसे प्रवेश न करनेपर भी आप ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उसमें प्रविष्ट हुए हों। साथ ही विभिन्‍न आकृतियोंका अनुकरण करके कहीं उत्तम, तो कहीं अधमरूपसे प्रतीत होते हैं, जैसे आग छोटी-बड़ी लकड़ियों और कर्मोंके अनुसार प्रचुर अथवा अल्प परिमाणमें या उत्तम-अधमरूपमें प्रतीत होती है। इसलिये संत पुरुष लौकिक-पारलौकिक कर्मोंकी दूकानदारीसे, उनके फलोंसे विरक्त हो जाते हैं और अपनी निर्मल बुद्धिसे सत्य-असत्य, आत्मा-अनात्माको पहचानकर जगत‍्के झूठे रूपोंमें नहीं फँसते; आपके सर्वत्र एकरस, समभावसे स्थित सत्यस्वरूपका साक्षात्कार करते हैं॥ १९॥"},{"id":"10.87.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/20/","page":673,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं","तव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोंऽशकृतम्।","इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनं","भवत उपासतेऽङ्‌घ्रिमभवं भुवि विश्‍वसिताः॥ २०"],"iast":["svakṛtapureṣvamīṣvabahirantarasaṃvaraṇaṃ","tava puruṣaṃ vadantyakhilaśaktidhṛtoṃ'śakṛtam|","iti nṛgatiṃ vivicya kavayo nigamāvapanaṃ","bhavata upāsate'ṅghrimabhavaṃ bhuvi viśvasitāḥ|| 20"],"meaning":"प्रभो! जीव जिन शरीरोंमें रहता है, वे उसके कर्मके द्वारा निर्मित होते हैं और वास्तवमें उन शरीरोंके कार्य-कारणरूप आवरणोंसे वह रहित है, क्योंकि वस्तुतः उन आवरणोंकी सत्ता ही नहीं है। तत्त्वज्ञानी पुरुष ऐसा कहते हैं कि समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले आपका ही वह स्वरूप है। स्वरूप होनेके कारण अंश न होनेपर भी उसे अंश कहते हैं और निर्मित न होनेपर भी निर्मित कहते हैं। इसीसे बुद्धिमान् पुरुष जीवके वास्तविक स्वरूपपर विचार करके परम विश्‍वासके साथ आपके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं। क्योंकि आपके चरण ही समस्त वैदिक कर्मोंके समर्पणस्थान और मोक्षस्वरूप हैं॥ २०॥"},{"id":"10.87.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/21/","page":674,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनो-","श्‍चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः ।","न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्‍वर ते","चरणसरोजहंसकुलसंगविसृष्टगृहाः ॥ २१"],"iast":["duravagamātmatattvanigamāya tavāttatano-","ścaritamahāmṛtābdhiparivartapariśramaṇāḥ |","na parilaṣanti kecidapavargamapīśvara te","caraṇasarojahaṃsakulasaṃgavisṛṣṭagṛhāḥ || 21"],"meaning":"भगवन्! परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। उसीका ज्ञान करानेके लिये आप विविध प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और उनके द्वारा ऐसी लीला करते हैं, जो अमृतके महासागरसे भी मधुर और मादक होती है। जो लोग उसका सेवन करते हैं, उनकी सारी थकावट दूर हो जाती है, वे परमानन्दमें म‌ग्‍न हो जाते हैं। कुछ प्रेमी भक्त तो ऐसे होते हैं, जो आपकी लीला-कथाओंको छोड़कर मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते—स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या है। वे आपके चरणकमलोंके प्रेमी परमहंसोंके सत्संगमें, जहाँ आपकी कथा होती है, इतना सुख मानते हैं कि उसके लिये इस जीवनमें प्राप्त अपनी घर-गृहस्थीका भी परित्याग कर देते हैं॥ २१॥"},{"id":"10.87.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/22/","page":674,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत्प्रियव-","च्चरति तथोन्मुखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च।","न बत रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो","यदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभृतः॥ २२"],"iast":["tvadanupathaṃ kulāyamidamātmasuhṛtpriyava-","ccarati tathonmukhe tvayi hite priya ātmani ca|","na bata ramantyaho asadupāsanayā''tmahano","yadanuśayā bhramantyurubhaye kuśarīrabhṛtaḥ|| 22"],"meaning":"प्रभो! यह शरीर आपकी सेवाका साधन होकर जब आपके पथका अनुरागी हो जाता है, तब आत्मा, हितैषी, सुहृद् और प्रिय व्यक्तिके समान आचरण करता है। आप जीवके सच्चे हितैषी, प्रियतम और आत्मा ही हैं और सदा-सर्वदा जीवको अपनानेके लिये तैयार भी रहते हैं। इतनी सुगमता होनेपर तथा अनुकूल मानव-शरीरको पाकर भी लोग सख्यभाव आदिके द्वारा आपकी उपासना नहीं करते, आपमें नहीं रमते, बल्कि इस विनाशी और असत् शरीर तथा उसके सम्बन्धियोंमें ही रम जाते हैं, उन्हींकी उपासना करने लगते हैं और इस प्रकार अपने आत्माका हनन करते हैं, उसे अधोगतिमें पहुँचाते हैं। भला, यह कितने कष्टकी बात है! इसका फल यह होता है कि उनकी सारी वृत्तियाँ, सारी वासनाएँ शरीर आदिमें ही लग जाती हैं और फिर उनके अनुसार उनको पशु-पक्षी आदिके न जाने कितने बुरे-बुरे शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं और इस प्रकार अत्यन्त भयावह जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है॥ २२॥"},{"id":"10.87.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/23/","page":675,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढयोगयुजो हृदि य-","न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्।","स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियो","वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्‌घ्रिसरोजसुधाः॥ २३"],"iast":["nibhṛtamarunmano'kṣadṛḍhayogayujo hṛdi ya-","nmunaya upāsate tadarayo'pi yayuḥ smaraṇāt|","striya uragendrabhogabhujadaṇḍaviṣaktadhiyo","vayamapi te samāḥ samadṛśo'ṅghrisarojasudhāḥ|| 23"],"meaning":"प्रभो! बड़े-बड़े विचारशील योगी-यति अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंको वशमें करके दृढ़ योगाभ्यासके द्वारा हृदयमें आपकी उपासना करते हैं। परन्तु आश्‍चर्यकी बात तो यह है कि उन्हें जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसीकी प्राप्ति उन शत्रुओंको भी हो जाती है, जो आपसे वैर-भाव रखते हैं। क्योंकि स्मरण तो वे भी करते ही हैं। कहाँतक कहें, भगवन्! वे स्त्रियाँ, जो अज्ञानवश आपको परिच्छिन्‍न मानती हैं और आपकी शेषनागके समान मोटी, लम्बी तथा सुकुमार भुजाओंके प्रति कामभावसे आसक्त रहती हैं, जिस परम पदको प्राप्त करती हैं, वही पद हम श्रुतियोंको भी प्राप्त होता है—यद्यपि हम आपको सदा-सर्वदा एकरस अनुभव करती हैं और आपके चरणारविन्दका मकरन्दरस पान करती रहती हैं। क्यों न हो, आप समदर्शी जो हैं। आपकी दृष्टिमें उपासकके परिच्छिन्‍न या अपरिच्छिन्‍न भावमें कोई अन्तर नहीं है॥ २३॥"},{"id":"10.87.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/24/","page":676,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["क इह नु वेद बतावरजन्मलयोऽग्रसरं","यत उदगादृषिर्यमनु देवगणा उभये।","तर्हि न सन्‍न चासदुभयं न च कालजवः","किमपि न तत्र शास्त्रमवकृष्य शयीत यदा॥ २४"],"iast":["ka iha nu veda batāvarajanmalayo'grasaraṃ","yata udagādṛṣiryamanu devagaṇā ubhaye|","tarhi na sanna cāsadubhayaṃ na ca kālajavaḥ","kimapi na tatra śāstramavakṛṣya śayīta yadā|| 24"],"meaning":"भगवन्! आप अनादि और अनन्त हैं। जिसका जन्म और मृत्यु कालसे सीमित है, वह भला, आपको कैसे जान सकता है। स्वयं ब्रह्माजी, निवृत्तिपरायण सनकादि तथा प्रवृत्तिपरायण मरीचि आदि भी बहुत पीछे आपसे ही उत्पन्‍न हुए हैं। जिस समय आप सबको समेटकर सो जाते हैं, उस समय ऐसा कोई साधन नहीं रह जाता, जिससे उनके साथ ही सोया हुआ जीव आपको जान सके। क्योंकि उस समय न तो आकाशादि स्थूल जगत् रहता है और न तो महत्तत्त्वादि सूक्ष्म जगत्। इन दोनोंसे बने हुए शरीर और उनके निमित्त क्षण-मुहूर्त आदि कालके अंग भी नहीं रहते। उस समय कुछ भी नहीं रहता। यहाँतक कि शास्त्र भी आपमें ही समा जाते हैं (ऐसी अवस्थामें आपको जाननेकी चेष्टा न करके आपका भजन करना ही सर्वोत्तम मार्ग है।)॥ २४॥"},{"id":"10.87.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/25/","page":676,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["जनिमसतः सतो मृतिमुतात्मनि ये च भिदां","विपणमृतं स्मरन्त्युपदिशन्ति त आरुपितैः।","त्रिगुणमयः पुमानिति भिदा यदबोधकृता","त्वयि न ततः परत्र स भवेदवबोधरसे॥ २५"],"iast":["janimasataḥ sato mṛtimutātmani ye ca bhidāṃ","vipaṇamṛtaṃ smarantyupadiśanti ta ārupitaiḥ|","triguṇamayaḥ pumāniti bhidā yadabodhakṛtā","tvayi na tataḥ paratra sa bhavedavabodharase|| 25"],"meaning":"प्रभो! कुछ लोग मानते हैं कि असत् जगत‍्की उत्पत्ति होती है और कुछ लोग कहते हैं कि सत्-रूप दुःखोंका नाश होनेपर मुक्ति मिलती है। दूसरे लोग आत्माको अनेक मानते हैं, तो कई लोग कर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले लोक और परलोकरूप व्यवहारको सत्य मानते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि ये सभी बातें भ्रममूलक हैं और वे आरोप करके ही ऐसा उपदेश करते हैं। पुरुष त्रिगुणमय है—इस प्रकारका भेदभाव केवल अज्ञानसे ही होता है और आप अज्ञानसे सर्वथा परे हैं। इसलिये ज्ञानस्वरूप आपमें किसी प्रकारका भेदभाव नहीं है॥ २५॥"},{"id":"10.87.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/26/","page":677,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["न हि विकृतिं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया","स्वकृतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयावसितम्॥ २६"],"iast":["na hi vikṛtiṃ tyajanti kanakasya tadātmatayā","svakṛtamanupraviṣṭamidamātmatayāvasitam|| 26"],"meaning":"यह त्रिगुणात्मक जगत् मनकी कल्पनामात्र है। केवल यही नहीं, परमात्मा और जगत‍्से पृथक् प्रतीत होनेवाला पुरुष भी कल्पनामात्र ही है। इस प्रकार वास्तवमें असत् होनेपर भी अपने सत्य अधिष्ठान आपकी सत्ताके कारण यह सत्य-सा प्रतीत हो रहा है। इसलिये भोक्ता, भोग्य और दोनोंके सम्बन्धको सिद्ध करनेवाली इन्द्रियाँ आदि जितना भी जगत् है, सबको आत्मज्ञानी पुरुष आत्मरूपसे सत्य ही मानते हैं। सोनेसे बने हुए कड़े, कुण्डल आदि स्वर्णरूप ही तो हैं; इसलिये उनको इस रूपमें जाननेवाला पुरुष उन्हें छोड़ता नहीं, वह समझता है कि यह भी सोना है। इसी प्रकार यह जगत् आत्मामें ही कल्पित, आत्मासे ही व्याप्त है; इसलिये आत्मज्ञानी पुरुष इसे आत्मरूप ही मानते हैं॥ २६॥"},{"id":"10.87.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/27/","page":677,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां-","स्त्वयि कृतसौहृदाः खलु पुनन्ति न ये विमुखाः॥ २७"],"iast":["parivayase paśūniva girā vibudhānapi tāṃ-","stvayi kṛtasauhṛdāḥ khalu punanti na ye vimukhāḥ|| 27"],"meaning":"भगवन्! जो लोग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके अधिष्ठान हैं, सबके आधार हैं और सर्वात्मभावसे आपका भजन-सेवन करते हैं, वे मृत्युको तुच्छ समझकर उसके सिरपर लात मारते हैं अर्थात् उसपर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग आपसे विमुख हैं, वे चाहे जितने बड़े विद्वान् हों, उन्हें आप कर्मोंका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे पशुओंके समान बाँध लेते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने आपके साथ प्रेमका सम्बन्ध जोड़ रखा है, वे न केवल अपनेको बल्कि दूसरोंको भी पवित्र कर देते हैं—जगत‍्के बन्धनसे छुड़ा देते हैं। ऐसा सौभाग्य भला, आपसे विमुख लोगोंको कैसे प्राप्त हो सकता है॥ २७॥"},{"id":"10.87.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/28/","page":678,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["त्वमकरणः स्वराडखिलकारकशक्तिधर-","स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्त्यजयानिमिषाः।","वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्‍वसृजो","विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्‍चकिताः॥ २८"],"iast":["tvamakaraṇaḥ svarāḍakhilakārakaśaktidhara-","stava balimudvahanti samadantyajayānimiṣāḥ|","varṣabhujo'khilakṣitipateriva viśvasṛjo","vidadhati yatra ye tvadhikṛtā bhavataścakitāḥ|| 28"],"meaning":"प्रभो! आप मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदि करणोंसे—चिन्तन, कर्म आदिके साधनोंसे सर्वथा रहित हैं। फिर भी आप समस्त अन्तःकरण और बाह्य करणोंकी शक्तियोंसे सदा-सर्वदा सम्पन्‍न हैं। आप स्वतः सिद्ध ज्ञानवान्, स्वयंप्रकाश हैं; अतः कोई काम करनेके लिये आपको इन्द्रियोंकी आवश्यकता नहीं है। जैसे छोटे-छोटे राजा अपनी-अपनी प्रजासे कर लेकर स्वयं अपने सम्राट्को कर देते हैं, वैसे ही मनुष्योंके पूज्य देवता और देवताओंके पूज्य ब्रह्मा आदि भी अपने अधिकृत प्राणियोंसे पूजा स्वीकार करते हैं और मायाके अधीन होकर आपकी पूजा करते रहते हैं। वे इस प्रकार आपकी पूजा करते हैं कि आपने जहाँ जो कर्म करनेके लिये उन्हें नियुक्त कर दिया है, वे आपसे भयभीत रहकर वहीं वह काम करते रहते हैं॥ २८॥"},{"id":"10.87.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/29/","page":678,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो","विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः।","न हि परमस्य कश्‍चिदपरो न परश्‍च भवेद्","वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः॥ २९"],"iast":["sthiracarajātayaḥ syurajayotthanimittayujo","vihara udīkṣayā yadi parasya vimukta tataḥ|","na hi paramasya kaścidaparo na paraśca bhaved","viyata ivāpadasya tava śūnyatulāṃ dadhataḥ|| 29"],"meaning":"नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे—संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। प्रभो! आप परम दयालु हैं। आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया। वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है। आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं॥ २९॥"},{"id":"10.87.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/30/","page":679,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता-","स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा।","अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत्","सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया॥ ३०"],"iast":["aparimitā dhruvāstanubhṛto yadi sarvagatā-","starhi na śāsyateti niyamo dhruva netarathā|","ajani ca yanmayaṃ tadavimucya niyantṛ bhavet","samamanujānatāṃ yadamataṃ mataduṣṭatayā|| 30"],"meaning":"भगवन्! आप नित्य एकरस हैं। यदि जीव असंख्य हों और सब-के-सब नित्य एवं सर्वव्यापक हों, तब तो वे आपके समान ही हो जायँगे; उस हालतमें वे शासित हैं और आप शासक—यह बात बन ही नहीं सकती, और तब आप उनका नियन्त्रण कर ही नहीं सकते। उनका नियन्त्रण आप तभी कर सकते हैं, जब वे आपसे उत्पन्‍न एवं आपकी अपेक्षा न्यून हों। इसमें सन्देह नहीं कि ये सब-के-सब जीव तथा इनकी एकता या विभिन्‍नता आपसे ही उत्पन्‍न हुई है। इसलिये आप उनमें कारणरूपसे रहते हुए भी उनके नियामक हैं। वास्तवमें आप उनमें समरूपसे स्थित हैं। परन्तु यह जाना नहीं जा सकता कि आपका वह स्वरूप कैसा है। क्योंकि जो लोग ऐसा समझते हैं कि हमने जान लिया, उन्होंने वास्तवमें आपको नहीं जाना; उन्होंने तो केवल अपनी बुद्धिके विषयको जाना है, जिससे आप परे हैं। और साथ ही मतिके द्वारा जितनी वस्तुएँ जानी जाती हैं, वे मतियोंकी भिन्‍नताके कारण भिन्‍न-भिन्‍न होती हैं; इसलिये उनकी दुष्टता, एक मतके साथ दूसरे मतका विरोध प्रत्यक्ष ही है। अतएव आपका स्वरूप समस्त मतोंके परे है॥ ३०॥"},{"id":"10.87.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/31/","page":679,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो-","रुभययुजा भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत्।","त्वयि त इमे ततो विविधनामगुणैः परमे","सरित इवार्णवे मधुनि लिल्युरशेषरसाः॥ ३१"],"iast":["na ghaṭata udbhavaḥ prakṛtipūruṣayorajayo-","rubhayayujā bhavantyasubhṛto jalabudbudavat|","tvayi ta ime tato vividhanāmaguṇaiḥ parame","sarita ivārṇave madhuni lilyuraśeṣarasāḥ|| 31"],"meaning":"स्वामिन्! जीव आपसे उत्पन्‍न होता है, यह कहनेका ऐसा अर्थ नहीं है कि आप परिणामके द्वारा जीव बनते हैं। सिद्धान्त तो यह है कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अजन्मा हैं। अर्थात् उनका वास्तविक स्वरूप—जो आप हैं—कभी वृत्तियोंके अंदर उतरता नहीं, जन्म नहीं लेता। तब प्राणियोंका जन्म कैसे होता है? अज्ञानके कारण प्रकृतिको पुरुष और पुरुषको प्रकृति समझ लेनेसे, एकका दूसरेके साथ संयोग हो जानेसे जैसे ‘बुलबुला’ नामकी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, परन्तु उपादान-कारण जल और निमित्त-कारण वायुके संयोगसे उसकी सृष्टि हो जाती है। प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृतिका अध्यास (एकमें दूसरेकी कल्पना) हो जानेके कारण ही जीवोंके विविध नाम और गुण रख लिये जाते हैं। अन्तमें जैसे समुद्रमें नदियाँ और मधुमें समस्त पुष्पोंके रस समा जाते हैं, वैसे ही वे सब-के-सब उपाधिरहित आपमें समा जाते हैं। (इसलिये जीवोंकी भिन्‍नता और उनका पृथक् अस्तित्व आपके द्वारा नियन्त्रित है। उनकी पृथक् स्वतन्त्रता और सर्व-व्यापकता आदि वास्तविक सत्यको न जाननेके कारण ही मानी जाती है)॥ ३१॥"},{"id":"10.87.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/32/","page":680,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["नृषु तव मायया भ्रमममीष्ववगत्य भृशं त्वयि सुधियोऽभवे दधति भावमनुप्रभवम्।","कथमनुवर्ततां भवभयं तव यद् भ्रुकुटिः सृजति मुहुस्त्रिणेमिरभवच्छरणेषु भयम्॥ ३२"],"iast":["nṛṣu tava māyayā bhramamamīṣvavagatya bhṛśaṃ tvayi sudhiyo'bhave dadhati bhāvamanuprabhavam|","kathamanuvartatāṃ bhavabhayaṃ tava yad bhrukuṭiḥ sṛjati muhustriṇemirabhavaccharaṇeṣu bhayam|| 32"],"meaning":"भगवन्! सभी जीव आपकी मायासे भ्रममें भटक रहे हैं, अपनेको आपसे पृथक् मानकर जन्म-मृत्युका चक्कर काट रहे हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस भ्रमको समझ लेते हैं और सम्पूर्ण भक्तिभावसे आपकी शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि आप जन्म-मृत्युके चक्करसे छुड़ानेवाले हैं। यद्यपि शीत, ग्रीष्म और वर्षा—इन तीन भागोंवाला कालचक्र आपका भ्रूविलासमात्र है, वह सभीको भयभीत करता है, परन्तु वह उन्हींको बार-बार भयभीत करता है, जो आपकी शरण नहीं लेते। जो आपके शरणागत भक्त हैं, उन्हें भला, जन्म-मृत्युरूप संसारका भय कैसे हो सकता है?॥ ३२॥"},{"id":"10.87.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/33/","page":681,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगं","य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिदः।","व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोश्‍चरणं","वणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ॥ ३३"],"iast":["vijitahṛṣīkavāyubhiradāntamanasturagaṃ","ya iha yatanti yantumatilolamupāyakhidaḥ|","vyasanaśatānvitāḥ samavahāya guroścaraṇaṃ","vaṇija ivāja santyakṛtakarṇadharā jaladhau|| 33"],"meaning":"अजन्मा प्रभो! जिन योगियोंने अपनी इन्द्रियों और प्राणोंको वशमें कर लिया है, वे भी, जब गुरुदेवके चरणोंकी शरण न लेकर उच्छृंखल एवं अत्यन्त चंचल मन-तुरंगको अपने वशमें करनेका प्रयत्‍न करते हैं, तब अपने साधनोंमें सफल नहीं होते। उन्हें बार-बार खेद और सैकड़ों विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है, केवल श्रम और दुःख ही उनके हाथ लगता है। उनकी ठीक वही दशा होती है, जैसी समुद्रमें बिना कर्णधारकी नावपर यात्रा करनेवाले व्यापारियोंकी होती है (तात्पर्य यह कि जो मनको वशमें करना चाहते हैं, उनके लिये कर्णधार—गुरुकी अनिवार्य आवश्यकता है)॥ ३३॥"},{"id":"10.87.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/34/","page":681,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["स्वजनसुतात्मदारधनधामधरासुरथै-","स्त्वयि सति किं नृणां श्रयत आत्मनि सर्वरसे।","इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां","सुखयति को न्विह स्वविहते स्वनिरस्तभगे॥ ३४"],"iast":["svajanasutātmadāradhanadhāmadharāsurathai-","stvayi sati kiṃ nṛṇāṃ śrayata ātmani sarvarase|","iti sadajānatāṃ mithunato rataye caratāṃ","sukhayati ko nviha svavihate svanirastabhage|| 34"],"meaning":"भगवन्! आप अखण्ड आनन्दस्वरूप और शरणागतोंके आत्मा हैं। आपके रहते स्वजन, पुत्र, देह, स्त्री, धन, महल, पृथ्वी, प्राण और रथ आदिसे क्या प्रयोजन है? जो लोग इस सत्य सिद्धान्तको न जानकर स्त्री-पुरुषके सम्बन्धसे होनेवाले सुखोंमें ही रम रहे हैं, उन्हें संसारमें भला, ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सुखी कर सके। क्योंकि संसारकी सभी वस्तुएँ स्वभावसे ही विनाशी हैं, एक-न-एक दिन मटियामेट हो जानेवाली हैं। और तो क्या, वे स्वरूपसे ही सारहीन और सत्ताहीन हैं; वे भला, क्या सुख दे सकती हैं॥ ३४॥"},{"id":"10.87.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/35/","page":681,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["भुवि पुरुपुण्यतीर्थसदनान्यृषयो विमदा-","स्त उत भवत्पदाम्बुजहृदोऽघभिदङ्‌घ्रिजलाः।","दधति सकृन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे","न पुनरुपासते पुरुषसारहरावसथान्॥ ३५"],"iast":["bhuvi purupuṇyatīrthasadanānyṛṣayo vimadā-","sta uta bhavatpadāmbujahṛdo'ghabhidaṅghrijalāḥ|","dadhati sakṛnmanastvayi ya ātmani nityasukhe","na punarupāsate puruṣasāraharāvasathān|| 35"],"meaning":"भगवन्! जो ऐश्‍वर्य, लक्ष्मी, विद्या, जाति, तपस्या आदिके घमंडसे रहित हैं, वे संतपुरुष इस पृथ्वीतलपर परम पवित्र और सबको पवित्र करनेवाले पुण्यमय सच्चे तीर्थस्थान हैं। क्योंकि उनके हृदयमें आपके चरणारविन्द सर्वदा विराजमान रहते हैं और यही कारण है कि उन संत पुरुषोंका चरणामृत समस्त पापों और तापोंको सदाके लिये नष्ट कर देनेवाला है। भगवन्! आप नित्य-आनन्दस्वरूप आत्मा ही हैं। जो एक बार भी आपको अपना मन समर्पित कर देते हैं—आपमें मन लगा देते हैं—वे उन देह-गेहोंमें कभी नहीं फँसते जो जीवके विवेक, वैराग्य, धैर्य, क्षमा और शान्ति आदि गुणोंका नाश करनेवाले हैं। वे तो बस, आपमें ही रम जाते हैं॥ ३५॥"},{"id":"10.87.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/36/","page":682,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["सत इदमुत्थितं सदिति चेन्‍ननु तर्कहतं","व्यभिचरति क्व च क्व च मृषा न तथोभययुक्।","व्यवहृतये विकल्प इषितोऽन्धपरम्परया","भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ॥ ३६"],"iast":["sata idamutthitaṃ saditi cennanu tarkahataṃ","vyabhicarati kva ca kva ca mṛṣā na tathobhayayuk|","vyavahṛtaye vikalpa iṣito'ndhaparamparayā","bhramayati bhāratī ta uruvṛttibhirukthajaḍān || 36"],"meaning":"भगवन्! जैसे मिट्टीसे बना हुआ घड़ा मिट्टीरूप ही होता है, वैसे ही सत्से बना हुआ जगत् भी सत् ही है—यह बात युक्तिसंगत नहीं है। क्योंकि कारण और कार्यका निर्देश ही उनके भेदका द्योतक है। यदि केवल भेदका निषेध करनेके लिये ही ऐसा कहा जा रहा हो तो पिता और पुत्रमें, दण्ड और घटनाशमें कार्य-कारण-भाव होनेपर भी वे एक दूसरेसे भिन्‍न हैं। इस प्रकार कार्य-कारणकी एकता सर्वत्र एक-सी नहीं देखी जाती। यदि कारण-शब्दसे निमित्त-कारण न लेकर केवल उपादान-कारण लिया जाय—जैसे कुण्डलका सोना—तो भी कहीं-कहीं कार्यकी असत्यता प्रमाणित होती है; जैसे रस्सीमें साँप। यहाँ उपादान-कारणके सत्य होनेपर भी उसका कार्य सर्प सर्वथा असत्य है। यदि यह कहा जाय कि प्रतीत होनेवाले सर्पका उपादान-कारण केवल रस्सी नहीं है, उसके साथ अविद्याका—भ्रमका मेल भी है, तो यह समझना चाहिये कि अविद्या और सत् वस्तुके संयोगसे ही इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है। इसलिये जैसे रस्सीमें प्रतीत होनेवाला सर्प मिथ्या है, वैसे ही सत् वस्तुमें अविद्याके संयोगसे प्रतीत होनेवाला नाम-रूपात्मक जगत् भी मिथ्या है। यदि केवल व्यवहारकी सिद्धिके लिये ही जगत‍्की सत्ता अभीष्ट हो, तो उसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि वह पारमार्थिक सत्य न होकर केवल व्यावहारिक सत्य है। यह भ्रम व्यावहारिक जगत‍्में माने हुए कालकी दृष्टिसे अनादि है; और अज्ञानीजन बिना विचार किये पूर्व-पूर्वके भ्रमसे प्रेरित होकर अन्धपरम्परासे इसे मानते चले आ रहे हैं। ऐसी स्थितिमें कर्मफलको सत्य बतलानेवाली श्रुतियाँ केवल उन्हीं लोगोंको भ्रममें डालती हैं, जो कर्ममें जड हो रहे हैं और यह नहीं समझते कि इनका तात्पर्य कर्मफलकी नित्यता बतलानेमें नहीं, बल्कि उनकी प्रशंसा करके उन कर्मोंमें लगानेमें है॥ ३६॥"},{"id":"10.87.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/37/","page":683,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे।","अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः॥ ३७"],"iast":["na yadidamagra āsa na bhaviṣyadato nidhanādanumitamantarā tvayi vibhāti mṛṣaikarase|","ata upamīyate draviṇajātivikalpapathairvitathamanovilāsamṛtamityavayantyabudhāḥ|| 37"],"meaning":"भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है। इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत‍्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं। वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है। इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं॥ ३७॥"},{"id":"10.87.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/38/","page":684,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्‍च जुषन्","भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभगः।","त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो","महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभगः॥ ३८"],"iast":["sa yadajayā tvajāmanuśayīta guṇāṃśca juṣan","bhajati sarūpatāṃ tadanu mṛtyumapetabhagaḥ|","tvamuta jahāsi tāmahiriva tvacamāttabhago","mahasi mahīyase'ṣṭaguṇite'parimeyabhagaḥ|| 38"],"meaning":"भगवन्! जब जीव मायासे मोहित होकर अविद्याको अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनन्दादि गुण ढक जाते हैं; वह गुणजन्य वृत्तियों, इन्द्रियों और देहोंमें फँस जाता है तथा उन्हींको अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है। अब उनकी जन्म-मृत्युमें अपनी जन्म-मृत्यु मानकर उनके चक्करमें पड़ जाता है। परन्तु प्रभो! जैसे साँप अपने केंचुलसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड़ देता है—वैसे ही आप माया—अविद्यासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उसे सदा-सर्वदा छोड़े रहते हैं। इसीसे आपके सम्पूर्ण ऐश्‍वर्य, सदा-सर्वदा आपके साथ रहते हैं। अणिमा आदि अष्टसिद्धियोंसे युक्त परमैश्‍वर्यमें आपकी स्थिति है। इसीसे आपका ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य अपरिमित है, अनन्त है; वह देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे आबद्ध नहीं है॥ ३८॥"},{"id":"10.87.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/39/","page":684,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा","दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः।","असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगव-","न्‍ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः॥ ३९"],"iast":["yadi na samuddharanti yatayo hṛdi kāmajaṭā","duradhigamo'satāṃ hṛdi gato'smṛtakaṇṭhamaṇiḥ|","asutṛpayogināmubhayato'pyasukhaṃ bhagava-","nnanapagatāntakādanadhirūḍhapadād bhavataḥ|| 39"],"meaning":"भगवन्! यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदयकी विषय-वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर-उधर। जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त नहीं होते, उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है। क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं। एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म-कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त होनेका भय भी बना ही रहता है॥ ३९॥"},{"id":"10.87.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/40/","page":685,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयो-","र्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः।","अनुयुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया","श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः॥ ४०"],"iast":["tvadavagamī na vetti bhavadutthaśubhāśubhayo-","rguṇaviguṇānvayāṃstarhi dehabhṛtāṃ ca giraḥ|","anuyugamanvahaṃ saguṇa gītaparamparayā","śravaṇabhṛto yatastvamapavargagatirmanujaiḥ|| 40"],"meaning":"भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप-कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है। उस समय विधि-निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं। उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता। जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन-सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप-पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि-निषेधोंसे अतीत हो जाता है। क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं। (परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं)॥ ४०॥"},{"id":"10.87.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/41/","page":685,"speaker":"श्रुतय ऊचुः","sanskrit":["द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया","त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः।","ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय-","स्त्वयि हि फलन्त्यतन्‍निरसनेन भवन्‍निधनाः॥ ४१"],"iast":["dyupataya eva te na yayurantamanantatayā","tvamapi yadantarāṇḍanicayā nanu sāvaraṇāḥ|","kha iva rajāṃsi vānti vayasā saha yacchrutaya-","stvayi hi phalantyatannirasanena bhavannidhanāḥ|| 41"],"meaning":"भगवन्! स्वर्गादि लोकोंके अधिपति इन्द्र, ब्रह्मा प्रभृति भी आपकी थाह—आपका पार न पा सके; और आश्‍चर्यकी बात तो यह है कि आप भी उसे नहीं जानते। क्योंकि जब अन्त है ही नहीं, तब कोई जानेगा कैसे? प्रभो! जैसे आकाशमें हवासे धूलके नन्हें-नन्हें कण उड़ते रहते हैं, वैसे ही आपमें कालके वेगसे अपनेसे उत्तरोत्तर दसगुने सात आवरणोंके सहित असंख्य ब्रह्माण्ड एक साथ ही घूमते रहते हैं। तब भला, आपकी सीमा कैसे मिले। हम श्रुतियाँ भी आपके स्वरूपका साक्षात् वर्णन नहीं कर सकतीं, आपके अतिरिक्त वस्तुओंका निषेध करते-करते अन्तमें अपना भी निषेध कर देती हैं और आपमें ही अपनी सत्ता खोकर सफल हो जाती हैं॥ ४१॥"},{"id":"10.87.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/42/","page":686,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्येतद् ब्रह्मणः पुत्रा आश्रुत्यात्मानुशासनम्।","सनन्दनमथानर्चुः सिद्धा ज्ञात्वाऽऽत्मनो गतिम्॥ ४२"],"iast":["ityetad brahmaṇaḥ putrā āśrutyātmānuśāsanam|","sanandanamathānarcuḥ siddhā jñātvā''tmano gatim|| 42"],"meaning":"भगवान् नारायणने कहा—देवर्षे! इस प्रकार सनकादि ऋषियोंने आत्मा और ब्रह्मकी एकता बतलानेवाला उपदेश सुनकर आत्मस्वरूपको जाना और नित्य सिद्ध होनेपर भी इस उपदेशसे कृतकृत्य-से होकर उन लोगोंने सनन्दनकी पूजा की॥ ४२॥"},{"id":"10.87.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/43/","page":686,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्यशेषसमाम्‍नायपुराणोपनिषद्रसः ।","समुद‍्धृतः पूर्वजातैर्व्योमयानैर्महात्मभिः॥ ४३"],"iast":["ityaśeṣasamāmnāyapurāṇopaniṣadrasaḥ |","samuddhṛtaḥ pūrvajātairvyomayānairmahātmabhiḥ|| 43"],"meaning":"नारद! सनकादि ऋषि सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्‍न हुए थे, अतएव वे सबके पूर्वज हैं। उन आकाशगामी महात्माओंने इस प्रकार समस्त वेद, पुराण और उपनिषदोंका रस निचोड़ लिया है, यह सबका सार-सर्वस्व है॥ ४३॥"},{"id":"10.87.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/44/","page":686,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयाऽऽत्मानुशासनम्।","धारयंश्‍चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम्॥ ४४"],"iast":["tvaṃ caitad brahmadāyāda śraddhayā''tmānuśāsanam|","dhārayaṃścara gāṃ kāmaṃ kāmānāṃ bharjanaṃ nṛṇām|| 44"],"meaning":"देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानसपुत्र हो—उनकी ज्ञान-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो। तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो। यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है॥ ४४॥"},{"id":"10.87.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/45/","page":686,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं स ऋषिणाऽऽदिष्टं गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान्।","पूर्णः श्रुतधरो राजन्‍नाह वीरव्रतो मुनिः॥ ४५"],"iast":["evaṃ sa ṛṣiṇā''diṣṭaṃ gṛhītvā śraddhayā''tmavān|","pūrṇaḥ śrutadharo rājannāha vīravrato muniḥ|| 45"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद बड़े संयमी, ज्ञानी, पूर्णकाम और नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे जो कुछ सुनते हैं, उन्हें उसकी धारणा हो जाती है। भगवान् नारायणने उन्हें जब इस प्रकार उपदेश किया, तब उन्होंने बड़ी श्रद्धासे उसे ग्रहण किया और उनसे यह कहा॥ ४५॥"},{"id":"10.87.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/46/","page":687,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीर्तये।","यो धत्ते सर्वभूतानामभवायोशतीः कलाः॥ ४६"],"iast":["namastasmai bhagavate kṛṣṇāyāmalakīrtaye|","yo dhatte sarvabhūtānāmabhavāyośatīḥ kalāḥ|| 46"],"meaning":"देवर्षि नारदने कहा—भगवन्! आप सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं। आपकी कीर्ति परम पवित्र है। आप समस्त प्राणियोंके परम कल्याण—मोक्षके लिये कमनीय कलावतार धारण किया करते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४६॥"},{"id":"10.87.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/47/","page":687,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["इत्याद्यमृषिमानम्य तच्छिष्यांश्‍च महात्मनः।","ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे॥ ४७"],"iast":["ityādyamṛṣimānamya tacchiṣyāṃśca mahātmanaḥ|","tato'gādāśramaṃ sākṣāt piturdvaipāyanasya me|| 47"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार महात्मा देवर्षि नारद आदि ऋषि भगवान् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णद्वैपायनके आश्रमपर गये॥ ४७॥"},{"id":"10.87.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/48/","page":687,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः।","तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम्॥ ४८"],"iast":["sabhājito bhagavatā kṛtāsanaparigrahaḥ|","tasmai tad varṇayāmāsa nārāyaṇamukhācchrutam|| 48"],"meaning":"भगवान् वेदव्यासने उनका यथोचित सत्कार किया। वे आसन स्वीकार करके बैठ गये, इसके बाद देवर्षि नारदने जो कुछ भगवान् नारायणके मुँहसे सुना था, वह सब कुछ मेरे पिताजीको सुना दिया॥ ४८॥"},{"id":"10.87.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/49/","page":687,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["इत्येतद् वर्णितं राजन् यन्‍नः प्रश्‍नः कृतस्त्वया।","यथा ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणेऽपि मनश्‍चरेत्॥ ४९"],"iast":["ityetad varṇitaṃ rājan yannaḥ praśnaḥ kṛtastvayā|","yathā brahmaṇyanirdeśye nirguṇe'pi manaścaret|| 49"],"meaning":"राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें बतलाया कि मन-वाणीसे अगोचर और समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म परमात्माका वर्णन श्रुतियाँ किस प्रकार करती हैं और उसमें मनका कैसे प्रवेश होता है? यही तो तुम्हारा प्रश्‍न था॥ ४९॥"},{"id":"10.87.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/50/","page":687,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["योऽस्योत्प्रेक्षक आदिमध्यनिधने योऽव्यक्तजीवेश्‍वरो","यः सृष्ट्वेदमनुप्रविश्य ऋषिणा चक्रे पुरः शास्ति ताः।","यं संपद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा","तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम्॥ ५०"],"iast":["yo'syotprekṣaka ādimadhyanidhane yo'vyaktajīveśvaro","yaḥ sṛṣṭvedamanupraviśya ṛṣiṇā cakre puraḥ śāsti tāḥ|","yaṃ saṃpadya jahātyajāmanuśayī suptaḥ kulāyaṃ yathā","taṃ kaivalyanirastayonimabhayaṃ dhyāyedajasraṃ harim|| 50"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् ही इस विश्‍वका संकल्प करते हैं तथा उसके आदि, मध्य और अन्तमें स्थित रहते हैं। वे प्रकृति और जीव दोनोंके स्वामी हैं। उन्होंने ही इसकी सृष्टि करके जीवके साथ इसमें प्रवेश किया है और शरीरोंका निर्माण करके वे ही उनका नियन्त्रण करते हैं। जैसे गाढ़ निद्रा—सुषुप्तिमें म‌ग्‍न पुरुष अपने शरीरका अनुसन्धान छोड़ देता है, वैसे ही भगवान्‌को पाकर यह जीव मायासे मुक्त हो जाता है। भगवान् ऐसे विशुद्ध, केवल चिन्मात्र तत्त्व हैं कि उनमें जगत‍्के कारण माया अथवा प्रकृतिका रत्तीभर भी अस्तित्व नहीं है। वे ही वास्तवमें अभय-स्थान हैं। उनका चिन्तन निरन्तर करते रहना चाहिये॥ ५०॥"}],"text":[{"b":37597,"kind":"adhyaya_heading","page":667,"text":"अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः"},{"b":37598,"kind":"topic_heading","page":667,"text":"वेदस्तुति"},{"b":37599,"kind":"topic_heading","page":667,"text":"परीक्षिदुवाच"},{"b":37600,"kind":"sanskrit_shloka","page":667,"verses":["10.87.1"],"text":"ब्रह्मन् ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तयः।"},{"b":37601,"kind":"sanskrit_shloka","page":667,"verses":["10.87.1"],"text":"कथं चरन्ति श्रुतयः साक्षात् सदसतः परे॥ १"},{"b":37602,"kind":"hindi_commentary","page":667,"explains":["10.87.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! ब्रह्म कार्य और कारणसे सर्वथा परे है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण उसमें हैं ही नहीं। मन और वाणीसे संकेतरूपमें भी उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर समस्त श्रुतियोंका विषय गुण ही है। (वे जिस विषयका वर्णन करती हैं उसके गुण, जाति, क्रिया अथवा रूढिका ही निर्देश करती हैं) ऐसी स्थितिमें श्रुतियाँ निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन किस प्रकार करती हैं? क्योंकि निर्गुण वस्तुका स्वरूप तो उनकी पहुँचके परे है॥ १॥"},{"b":37603,"kind":"topic_heading","page":666,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":37604,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.2"],"text":"बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् जनानामसृजत् प्रभुः।"},{"b":37605,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.2"],"text":"मात्रार्थं च भवार्थं च आत्मनेऽकल्पनाय च॥ २"},{"b":37606,"kind":"hindi_commentary","page":668,"explains":["10.87.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (भगवान् सर्वशक्तिमान् और गुणोंके निधान हैं। श्रुतियाँ स्पष्टतः सगुणका ही निरूपण करती हैं, परन्तु विचार करनेपर उनका तात्पर्य निर्गुण ही निकलता है। विचार करनेके लिये ही) भगवान्‌ने जीवोंके लिये बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी सृष्टि की है। इनके द्वारा वे स्वेच्छासे अर्थ, धर्म, काम अथवा मोक्षका अर्जन कर सकते हैं (प्राणोंके द्वारा जीवन-धारण, श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा महावाक्य आदिका श्रवण, मनके द्वारा मनन और बुद्धिके द्वारा निश्‍चय करनेपर श्रुतियोंके तात्पर्य निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार हो सकता है। इसलिये श्रुतियाँ सगुणका प्रतिपादन करनेपर भी वस्तुतः निर्गुणपरक हैं)॥ २॥"},{"b":37607,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.3"],"text":"सैषा ह्युपनिषद् ब्राह्मी पूर्वेषां पूर्वजैर्धृता।"},{"b":37608,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.3"],"text":"श्रद्धया धारयेद् यस्तां क्षेमं गच्छेदकिंचनः॥ ३"},{"b":37609,"kind":"hindi_commentary","page":668,"explains":["10.87.3"],"text":"ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्का यही स्वरूप है। इसे पूर्वजोंके भी पूर्वज सनकादि ऋषियोंने आत्मनिश्‍चयके द्वारा धारण किया है। जो भी मनुष्य इसे श्रद्धापूर्वक धारण करता है, वह बन्धनके कारण समस्त उपाधियों—अनात्मभावोंसे मुक्त होकर अपने परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ ३॥"},{"b":37610,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.4"],"text":"अत्र ते वर्णयिष्यामि गाथां नारायणान्विताम्।"},{"b":37611,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.4"],"text":"नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च॥ ४"},{"b":37612,"kind":"hindi_commentary","page":668,"explains":["10.87.4"],"text":"इस विषयमें मैं तुम्हें एक गाथा सुनाता हूँ। उस गाथाके साथ स्वयं भगवान् नारायणका सम्बन्ध है। वह गाथा देवर्षि नारद और ऋषिश्रेष्ठ नारायणका संवाद है॥ ४॥"},{"b":37613,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.5"],"text":"एकदा नारदो लोकान् पर्यटन् भगवत्प्रियः।"},{"b":37614,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.5"],"text":"सनातनमृषिं द्रष्टुं ययौ नारायणाश्रमम्॥ ५"},{"b":37615,"kind":"hindi_commentary","page":668,"explains":["10.87.5"],"text":"एक समयकी बात है, भगवान्‌के प्यारे भक्त देवर्षि नारदजी विभिन्‍न लोकोंमें विचरण करते हुए सनातनऋषि भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रम गये॥ ५॥"},{"b":37616,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.6"],"text":"यो वै भारतवर्षेऽस्मिन् क्षेमाय स्वस्तये नृणाम्।"},{"b":37617,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.6"],"text":"धर्मज्ञानशमोपेतमाकल्पादास्थितस्तपः ॥ ६"},{"b":37618,"kind":"hindi_commentary","page":668,"explains":["10.87.6"],"text":"भगवान् नारायण मनुष्योंके अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और परम निःश्रेयस (भगवत्स्वरूप अथवा मोक्षकी प्राप्ति) के लिये इस भारतवर्षमें कल्पके प्रारम्भसे ही धर्म, ज्ञान और संयमके साथ महान् तपस्या कर रहे हैं॥ ६॥"},{"b":37619,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.7"],"text":"तत्रोपविष्टमृषिभिः कलापग्रामवासिभिः।"},{"b":37620,"kind":"sanskrit_shloka","page":668,"verses":["10.87.7"],"text":"परीतं प्रणतोऽपृच्छदिदमेव कुरूद्वह॥ ७"},{"b":37621,"kind":"hindi_translation","page":668,"explains":["10.87.7"],"text":"परीक्षित्! एक दिन वे कलापग्रामवासी सिद्ध ऋषियोंके बीचमें बैठे हुए थे। उस समय नारदजीने उन्हें प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यही प्रश्‍न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो॥ ७॥"},{"b":37622,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.8"],"text":"तस्मै ह्यवोचद् भगवानृषीणां शृण्वतामिदम्।"},{"b":37623,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.8"],"text":"यो ब्रह्मवादः पूर्वेषां जनलोकनिवासिनाम्॥ ८"},{"b":37624,"kind":"hindi_translation","page":669,"explains":["10.87.8"],"text":"भगवान् नारायणने ऋषियोंकी उस भरी सभामें नारदजीको उनके प्रश्‍नका उत्तर दिया और वह कथा सुनायी, जो पूर्वकालीन जनलोकनिवासियोंमें परस्पर वेदोंके तात्पर्य और ब्रह्मके स्वरूपके सम्बन्धमें विचार करते समय कही गयी थी॥ ८॥"},{"b":37625,"kind":"topic_heading","page":669,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":37626,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.9"],"text":"स्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा।"},{"b":37627,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.9"],"text":"तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्॥ ९"},{"b":37628,"kind":"hindi_commentary","page":669,"explains":["10.87.9"],"text":"भगवान् नारायणने कहा—नारदजी! प्राचीन कालकी बात है। एक बार जनलोकमें वहाँ रहनेवाले ब्रह्माके मानस पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन, सनातन आदि परमर्षियोंका ब्रह्मसत्र (ब्रह्मविषयक विचार या प्रवचन) हुआ था॥ ९॥"},{"b":37629,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.10"],"text":"श्‍वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तदीश्‍वरम्।"},{"b":37630,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.10"],"text":"ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते।"},{"b":37631,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.10"],"text":"तत्र हायमभूत् प्रश्‍नस्त्वं मां यमनुपृच्छसि॥ १०"},{"b":37632,"kind":"hindi_translation","page":669,"explains":["10.87.10"],"text":"उस समय तुम मेरी श्‍वेतद्वीपाधिपति अनिरुद्ध-मूर्तिका दर्शन करनेके लिये श्‍वेतद्वीप चले गये थे। उस समय वहाँ उस ब्रह्मके सम्बन्धमें बड़ी ही सुन्दर चर्चा हुई थी, जिसके विषयमें श्रुतियाँ भी मौन धारण कर लेती हैं, स्पष्ट वर्णन न करके तात्पर्यरूपसे लक्षित कराती हुई उसीमें सो जाती हैं। उस ब्रह्मसत्रमें यही प्रश्‍न उपस्थित किया गया था, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो॥ १०॥"},{"b":37633,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.11"],"text":"तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः।"},{"b":37634,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.11"],"text":"अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे॥ ११"},{"b":37635,"kind":"hindi_translation","page":669,"explains":["10.87.11"],"text":"सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार—ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील-स्वभावमें समान हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक-से हैं। फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये॥ ११॥"},{"b":37636,"kind":"topic_heading","page":669,"text":"सनन्दन उवाच"},{"b":37637,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.12"],"text":"स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः।"},{"b":37638,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.12"],"text":"तदन्ते बोधयांचक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम्॥ १२"},{"b":37639,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.13"],"text":"यथा शयानं सम्राजं वन्दिनस्तत्पराक्रमैः।"},{"b":37640,"kind":"sanskrit_shloka","page":669,"verses":["10.87.13"],"text":"प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्‍लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः॥ १३"},{"b":37641,"kind":"hindi_commentary","page":669,"explains":["10.87.12","10.87.13"],"text":"सनन्दनजीने कहा—जिस प्रकार प्रातःकाल होनेपर सोते हुए सम्राट्को जगानेके लिये अनुजीवी वंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राट्के पराक्रम तथा सुयशका गान करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परमात्मा अपने बनाये हुए सम्पूर्ण जगत‍्को अपनेमें लीन करके अपनी शक्तियोंके सहित सोये रहते हैं; तब प्रलयके अन्तमें श्रुतियाँ उनका प्रतिपादन करनेवाले वचनोंसे उन्हें इस प्रकार जगाती हैं॥ १२-१३॥"},{"b":37642,"kind":"topic_heading","page":670,"text":"श्रुतय ऊचुः"},{"b":37643,"kind":"sanskrit_shloka","page":670,"verses":["10.87.14"],"text":"जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां"},{"b":37644,"kind":"sanskrit_shloka","page":670,"verses":["10.87.14"],"text":"त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः।"},{"b":37645,"kind":"sanskrit_shloka","page":670,"verses":["10.87.14"],"text":"अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते"},{"b":37646,"kind":"sanskrit_shloka","page":670,"verses":["10.87.14"],"text":"क्वचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽनुचरेन्‍निगमः॥ १४"},{"b":37647,"kind":"hindi_commentary","page":669,"explains":["10.87.14"],"text":"श्रुतियाँ कहती हैं—अजित! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। आपकी जय हो, जय हो। प्रभो! आप स्वभावसे ही समस्त ऐश्‍वर्योंसे पूर्ण हैं, इसलिये चराचर प्राणियोंको फँसानेवाली मायाका नाश कर दीजिये। प्रभो! इस गुणमयी मायाने दोषके लिये—जीवोंके आनन्दादिमय सहज स्वरूपका आच्छादन करके उन्हें बन्धनमें डालनेके लिये ही सत्त्वादि गुणोंको ग्रहण किया है। जगत‍्में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ हैं, उन सबको जगानेवाले आप ही हैं। इसलिये आपके मिटाये बिना यह माया मिट नहीं सकती। (इस विषयमें यदि प्रमाण पूछा जाय, तो आपकी श्‍वासभूता श्रुतियाँ ही—हम ही प्रमाण हैं।) यद्यपि हम आपका स्वरूपतः वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परन्तु जब कभी आप मायाके द्वारा जगत‍्की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीड़ा करते हैं, तभी हम यत्किंचित् आपका वर्णन करनेमें समर्थ होती हैं॥ १४॥"},{"b":37648,"kind":"hindi_commentary","page":670,"verses":["10.87.15"],"text":"बृहदुपलब्धमेतदवयन्त्यवशेषतया"},{"b":37649,"kind":"sanskrit_shloka","page":670,"verses":["10.87.15"],"text":"यत उदयास्तमयौ विकृतेर्मृदि वाविकृतात्।"},{"b":37650,"kind":"sanskrit_shloka","page":671,"verses":["10.87.15"],"text":"अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं"},{"b":37651,"kind":"sanskrit_shloka","page":671,"verses":["10.87.15"],"text":"कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्॥ १५"},{"b":37652,"kind":"hindi_translation","page":670,"explains":["10.87.15"],"text":"इसमें सन्देह नहीं कि हमारे द्वारा इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका भी वर्णन किया जाता है, परन्तु हमारे (श्रुतियोंके) सारे मन्त्र अथवा सभी मन्त्रद्रष्टा ऋषि प्रतीत होनेवाले इस सम्पूर्ण जगत‍्को ब्रह्मस्वरूप ही अनुभव करते हैं। क्योंकि जिस समय यह सारा जगत् नहीं रहता, उस समय भी आप बच रहते हैं। जैसे घट, शराव (मिट्टीका प्याला—कसोरा) आदि सभी विकार मिट्टीसे ही उत्पन्‍न और उसीमें लीन होते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत‍्की उत्पत्ति और प्रलय आपमें ही होती है। तब क्या आप पृथ्वीके समान विकारी हैं? नहीं-नहीं, आप तो एकरस—निर्विकार हैं। इसीसे तो यह जगत् आपमें उत्पन्‍न नहीं, प्रतीत है। इसलिये जैसे घट, शराव आदिका वर्णन भी मिट्टीका ही वर्णन है, वैसे ही इन्द्र, वरुण आदि देवताओंका वर्णन भी आपका ही वर्णन है। यही कारण है कि विचारशील ऋषि, मनसे जो कुछ सोचा जाता है और वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, उसे आपमें ही स्थित, आपका ही स्वरूप देखते हैं। मनुष्य अपना पैर चाहे कहीं भी रखे—ईंट, पत्थर या काठपर—होगा वह पृथ्वीपर ही; क्योंकि वे सब पृथ्वीस्वरूप ही हैं। इसलिये हम चाहे जिस नाम या जिस रूपका वर्णन करें, वह आपका ही नाम, आपका ही रूप है॥ १५॥"},{"b":37653,"kind":"hindi_commentary","page":671,"verses":["10.87.16"],"text":"इति तव सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल-"},{"b":37654,"kind":"sanskrit_shloka","page":671,"verses":["10.87.16"],"text":"क्षपणकथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः।"},{"b":37655,"kind":"sanskrit_shloka","page":671,"verses":["10.87.16"],"text":"किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः"},{"b":37656,"kind":"sanskrit_shloka","page":671,"verses":["10.87.16"],"text":"परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम्॥ १६"},{"b":37657,"kind":"hindi_translation","page":671,"explains":["10.87.16"],"text":"भगवन्! लोग सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंकी मायासे बने हुए अच्छे-बुरे भावों या अच्छी-बुरी क्रियाओंमें उलझ जाया करते हैं, परन्तु आप तो उस मायानटीके स्वामी, उसको नचानेवाले हैं। इसीलिये विचारशील पुरुष आपकी लीलाकथाके अमृतसागरमें गोते लगाते रहते हैं और इस प्रकार अपने सारे पाप-तापको धो-बहा देते हैं। क्यों न हो, आपकी लीला-कथा सभी जीवोंके मायामलको नष्ट करनेवाली जो है। पुरुषोत्तम! जिन महापुरुषोंने आत्मज्ञानके द्वारा अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि और शरीरके कालकृत जरा-मरण आदि दोष मिटा दिये हैं और निरन्तर आपके उस स्वरूपकी अनुभूतिमें म‌ग्‍न रहते हैं, जो अखण्ड आनन्दस्वरूप है, उन्होंने अपने पाप-तापोंको सदाके लिये शान्त, भस्म कर दिया है—इसके विषयमें तो कहना ही क्या है॥ १६॥"},{"b":37658,"kind":"sanskrit_shloka","page":672,"verses":["10.87.17"],"text":"दृतय इव श्‍वसन्त्यसुभृतो यदि तेऽनुविधा"},{"b":37659,"kind":"sanskrit_shloka","page":672,"verses":["10.87.17"],"text":"महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः।"},{"b":37660,"kind":"sanskrit_shloka","page":672,"verses":["10.87.17"],"text":"पुरुषविधोऽन्वयोऽत्र चरमोऽन्‍नमयादिषु यः"},{"b":37661,"kind":"sanskrit_shloka","page":672,"verses":["10.87.17"],"text":"सदसतः परं त्वमथ यदेष्ववशेषमृतम्॥ १७"},{"b":37662,"kind":"hindi_translation","page":671,"explains":["10.87.17"],"text":"भगवन्! प्राणधारियोंके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे आपका भजन-सेवन करें, आपकी आज्ञाका पालन करें; यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका जीवन व्यर्थ है और उनके शरीरमें श्‍वासका चलना ठीक वैसा ही है, जैसा लुहारकी धौंकनीमें हवाका आना-जाना। महत्तत्त्व, अहंकार आदिने आपके अनुग्रहसे—आपके उनमें प्रवेश करनेपर ही इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि की है। अन्‍नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—इन पाँचों कोशोंमें पुरुषरूपसे रहनेवाले, उनमें ‘मैं-मैं’ की स्फूर्ति करनेवाले भी आप ही हैं! आपके ही अस्तित्वसे उन कोशोंके अस्तित्वका अनुभव होता है और उनके न रहनेपर भी अन्तिम अवधिरूपसे आप विराजमान रहते हैं। इस प्रकार सबमें अन्वित और सबकी अवधि होनेपर भी आप असंग ही हैं। क्योंकि वास्तवमें जो कुछ वृत्तियोंके द्वारा अस्ति अथवा नास्तिके रूपमें अनुभव होता है, उन समस्त कार्य-कारणोंसे आप परे हैं। ‘नेति-नेति’ के द्वारा इन सबका निषेध हो जानेपर भी आप ही शेष रहते हैं, क्योंकि आप उस निषेधके भी साक्षी हैं और वास्तवमें आप ही एकमात्र सत्य हैं (इसलिये आपके भजनके बिना जीवका जीवन व्यर्थ ही है, क्योंकि वह इस महान् सत्यसे वंचित है)॥ १७॥"},{"b":37663,"kind":"hindi_commentary","page":672,"verses":["10.87.18"],"text":"उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः"},{"b":37664,"kind":"sanskrit_shloka","page":672,"verses":["10.87.18"],"text":"परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम्।"},{"b":37665,"kind":"hindi_commentary","page":673,"verses":["10.87.18"],"text":"तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं"},{"b":37666,"kind":"sanskrit_shloka","page":673,"verses":["10.87.18"],"text":"पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे॥ १८"},{"b":37667,"kind":"hindi_commentary","page":673,"verses":["10.87.19"],"text":"स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्‍निव हेतुतया"},{"b":37668,"kind":"sanskrit_shloka","page":673,"verses":["10.87.19"],"text":"तरतमतश्‍चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः।"},{"b":37669,"kind":"hindi_commentary","page":673,"verses":["10.87.19"],"text":"अथ वितथास्वमूष्ववितथं तव धाम समं"},{"b":37670,"kind":"sanskrit_shloka","page":673,"verses":["10.87.19"],"text":"विरजधियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एकरसम्॥ १९"},{"b":37671,"kind":"hindi_translation","page":672,"explains":["10.87.18","10.87.19"],"text":"ऋषियोंने आपकी प्राप्तिके लिये अनेकों मार्ग माने हैं। उनमें जो स्थूल दृष्टिवाले हैं, वे मणिपूरक चक्रमें अग्‍निरूपसे आपकी उपासना करते हैं। अरुणवंशके ऋषि समस्त नाड़ियोंके निकलनेके स्थान हृदयमें आपके परम सूक्ष्मस्वरूप दहर ब्रह्मकी उपासना करते हैं। प्रभो! हृदयसे ही आपको प्राप्त करनेका श्रेष्ठ मार्ग सुषुम्‍ना नाड़ी ब्रह्मरन्ध्रतक गयी हुई है। जो पुरुष उस ज्योतिर्मय मार्गको प्राप्त कर लेता है और उससे ऊपरकी ओर बढ़ता है, वह फिर जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता॥ १८॥ भगवन्! आपने ही देवता, मनुष्य और पशु-पक्षी आदि योनियाँ बनायी हैं। सदा-सर्वत्र सब रूपोंमें आप हैं ही, इसलिये कारणरूपसे प्रवेश न करनेपर भी आप ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उसमें प्रविष्ट हुए हों। साथ ही विभिन्‍न आकृतियोंका अनुकरण करके कहीं उत्तम, तो कहीं अधमरूपसे प्रतीत होते हैं, जैसे आग छोटी-बड़ी लकड़ियों और कर्मोंके अनुसार प्रचुर अथवा अल्प परिमाणमें या उत्तम-अधमरूपमें प्रतीत होती है। इसलिये संत पुरुष लौकिक-पारलौकिक कर्मोंकी दूकानदारीसे, उनके फलोंसे विरक्त हो जाते हैं और अपनी निर्मल बुद्धिसे सत्य-असत्य, आत्मा-अनात्माको पहचानकर जगत‍्के झूठे रूपोंमें नहीं फँसते; आपके सर्वत्र एकरस, समभावसे स्थित सत्यस्वरूपका साक्षात्कार करते हैं॥ १९॥"},{"b":37672,"kind":"hindi_commentary","page":673,"verses":["10.87.20"],"text":"स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं"},{"b":37673,"kind":"sanskrit_shloka","page":673,"verses":["10.87.20"],"text":"तव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोंऽशकृतम्।"},{"b":37674,"kind":"hindi_commentary","page":674,"verses":["10.87.20"],"text":"इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनं"},{"b":37675,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.20"],"text":"भवत उपासतेऽङ्‌घ्रिमभवं भुवि विश्‍वसिताः॥ २०"},{"b":37676,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.21"],"text":"दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनो-"},{"b":37677,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.21"],"text":"श्‍चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः ।"},{"b":37678,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.21"],"text":"न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्‍वर ते"},{"b":37679,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.21"],"text":"चरणसरोजहंसकुलसंगविसृष्टगृहाः ॥ २१"},{"b":37680,"kind":"hindi_translation","page":673,"explains":["10.87.20","10.87.21"],"text":"प्रभो! जीव जिन शरीरोंमें रहता है, वे उसके कर्मके द्वारा निर्मित होते हैं और वास्तवमें उन शरीरोंके कार्य-कारणरूप आवरणोंसे वह रहित है, क्योंकि वस्तुतः उन आवरणोंकी सत्ता ही नहीं है। तत्त्वज्ञानी पुरुष ऐसा कहते हैं कि समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले आपका ही वह स्वरूप है। स्वरूप होनेके कारण अंश न होनेपर भी उसे अंश कहते हैं और निर्मित न होनेपर भी निर्मित कहते हैं। इसीसे बुद्धिमान् पुरुष जीवके वास्तविक स्वरूपपर विचार करके परम विश्‍वासके साथ आपके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं। क्योंकि आपके चरण ही समस्त वैदिक कर्मोंके समर्पणस्थान और मोक्षस्वरूप हैं॥ २०॥ भगवन्! परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। उसीका ज्ञान करानेके लिये आप विविध प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और उनके द्वारा ऐसी लीला करते हैं, जो अमृतके महासागरसे भी मधुर और मादक होती है। जो लोग उसका सेवन करते हैं, उनकी सारी थकावट दूर हो जाती है, वे परमानन्दमें म‌ग्‍न हो जाते हैं। कुछ प्रेमी भक्त तो ऐसे होते हैं, जो आपकी लीला-कथाओंको छोड़कर मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते—स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या है। वे आपके चरणकमलोंके प्रेमी परमहंसोंके सत्संगमें, जहाँ आपकी कथा होती है, इतना सुख मानते हैं कि उसके लिये इस जीवनमें प्राप्त अपनी घर-गृहस्थीका भी परित्याग कर देते हैं॥ २१॥"},{"b":37681,"kind":"hindi_commentary","page":674,"verses":["10.87.22"],"text":"त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत्प्रियव-"},{"b":37682,"kind":"sanskrit_shloka","page":674,"verses":["10.87.22"],"text":"च्चरति तथोन्मुखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च।"},{"b":37683,"kind":"hindi_commentary","page":675,"verses":["10.87.22"],"text":"न बत रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो"},{"b":37684,"kind":"sanskrit_shloka","page":675,"verses":["10.87.22"],"text":"यदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभृतः॥ २२"},{"b":37685,"kind":"hindi_translation","page":674,"explains":["10.87.22"],"text":"प्रभो! यह शरीर आपकी सेवाका साधन होकर जब आपके पथका अनुरागी हो जाता है, तब आत्मा, हितैषी, सुहृद् और प्रिय व्यक्तिके समान आचरण करता है। आप जीवके सच्चे हितैषी, प्रियतम और आत्मा ही हैं और सदा-सर्वदा जीवको अपनानेके लिये तैयार भी रहते हैं। इतनी सुगमता होनेपर तथा अनुकूल मानव-शरीरको पाकर भी लोग सख्यभाव आदिके द्वारा आपकी उपासना नहीं करते, आपमें नहीं रमते, बल्कि इस विनाशी और असत् शरीर तथा उसके सम्बन्धियोंमें ही रम जाते हैं, उन्हींकी उपासना करने लगते हैं और इस प्रकार अपने आत्माका हनन करते हैं, उसे अधोगतिमें पहुँचाते हैं। भला, यह कितने कष्टकी बात है! इसका फल यह होता है कि उनकी सारी वृत्तियाँ, सारी वासनाएँ शरीर आदिमें ही लग जाती हैं और फिर उनके अनुसार उनको पशु-पक्षी आदिके न जाने कितने बुरे-बुरे शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं और इस प्रकार अत्यन्त भयावह जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है॥ २२॥"},{"b":37686,"kind":"hindi_commentary","page":675,"verses":["10.87.23"],"text":"निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढयोगयुजो हृदि य-"},{"b":37687,"kind":"sanskrit_shloka","page":675,"verses":["10.87.23"],"text":"न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्।"},{"b":37688,"kind":"hindi_translation","page":675,"verses":["10.87.23"],"text":"स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्‌घ्रिसरोजसुधाः॥ २३"},{"b":37689,"kind":"hindi_translation","page":675,"explains":["10.87.23"],"text":"प्रभो! बड़े-बड़े विचारशील योगी-यति अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंको वशमें करके दृढ़ योगाभ्यासके द्वारा हृदयमें आपकी उपासना करते हैं। परन्तु आश्‍चर्यकी बात तो यह है कि उन्हें जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसीकी प्राप्ति उन शत्रुओंको भी हो जाती है, जो आपसे वैर-भाव रखते हैं। क्योंकि स्मरण तो वे भी करते ही हैं। कहाँतक कहें, भगवन्! वे स्त्रियाँ, जो अज्ञानवश आपको परिच्छिन्‍न मानती हैं और आपकी शेषनागके समान मोटी, लम्बी तथा सुकुमार भुजाओंके प्रति कामभावसे आसक्त रहती हैं, जिस परम पदको प्राप्त करती हैं, वही पद हम श्रुतियोंको भी प्राप्त होता है—यद्यपि हम आपको सदा-सर्वदा एकरस अनुभव करती हैं और आपके चरणारविन्दका मकरन्दरस पान करती रहती हैं। क्यों न हो, आप समदर्शी जो हैं। आपकी दृष्टिमें उपासकके परिच्छिन्‍न या अपरिच्छिन्‍न भावमें कोई अन्तर नहीं है॥ २३॥"},{"b":37690,"kind":"hindi_commentary","page":676,"verses":["10.87.24"],"text":"क इह नु वेद बतावरजन्मलयोऽग्रसरं"},{"b":37691,"kind":"sanskrit_shloka","page":676,"verses":["10.87.24"],"text":"यत उदगादृषिर्यमनु देवगणा उभये।"},{"b":37692,"kind":"hindi_commentary","page":676,"verses":["10.87.24"],"text":"तर्हि न सन्‍न चासदुभयं न च कालजवः"},{"b":37693,"kind":"sanskrit_shloka","page":676,"verses":["10.87.24"],"text":"किमपि न तत्र शास्त्रमवकृष्य शयीत यदा॥ २४"},{"b":37694,"kind":"hindi_commentary","page":676,"verses":["10.87.25"],"text":"जनिमसतः सतो मृतिमुतात्मनि ये च भिदां"},{"b":37695,"kind":"sanskrit_shloka","page":676,"verses":["10.87.25"],"text":"विपणमृतं स्मरन्त्युपदिशन्ति त आरुपितैः।"},{"b":37696,"kind":"hindi_commentary","page":676,"verses":["10.87.25"],"text":"त्रिगुणमयः पुमानिति भिदा यदबोधकृता"},{"b":37697,"kind":"sanskrit_shloka","page":676,"verses":["10.87.25"],"text":"त्वयि न ततः परत्र स भवेदवबोधरसे॥ २५"},{"b":37698,"kind":"hindi_translation","page":676,"explains":["10.87.24","10.87.25"],"text":"भगवन्! आप अनादि और अनन्त हैं। जिसका जन्म और मृत्यु कालसे सीमित है, वह भला, आपको कैसे जान सकता है। स्वयं ब्रह्माजी, निवृत्तिपरायण सनकादि तथा प्रवृत्तिपरायण मरीचि आदि भी बहुत पीछे आपसे ही उत्पन्‍न हुए हैं। जिस समय आप सबको समेटकर सो जाते हैं, उस समय ऐसा कोई साधन नहीं रह जाता, जिससे उनके साथ ही सोया हुआ जीव आपको जान सके। क्योंकि उस समय न तो आकाशादि स्थूल जगत् रहता है और न तो महत्तत्त्वादि सूक्ष्म जगत्। इन दोनोंसे बने हुए शरीर और उनके निमित्त क्षण-मुहूर्त आदि कालके अंग भी नहीं रहते। उस समय कुछ भी नहीं रहता। यहाँतक कि शास्त्र भी आपमें ही समा जाते हैं (ऐसी अवस्थामें आपको जाननेकी चेष्टा न करके आपका भजन करना ही सर्वोत्तम मार्ग है।)॥ २४॥ प्रभो! कुछ लोग मानते हैं कि असत् जगत‍्की उत्पत्ति होती है और कुछ लोग कहते हैं कि सत्-रूप दुःखोंका नाश होनेपर मुक्ति मिलती है। दूसरे लोग आत्माको अनेक मानते हैं, तो कई लोग कर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले लोक और परलोकरूप व्यवहारको सत्य मानते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि ये सभी बातें भ्रममूलक हैं और वे आरोप करके ही ऐसा उपदेश करते हैं। पुरुष त्रिगुणमय है—इस प्रकारका भेदभाव केवल अज्ञानसे ही होता है और आप अज्ञानसे सर्वथा परे हैं। इसलिये ज्ञानस्वरूप आपमें किसी प्रकारका भेदभाव नहीं है॥ २५॥"},{"b":37699,"kind":"hindi_commentary","page":677,"text":"सदिव मनस्त्रिवृत्त्वयि विभात्यसदामनुजात्"},{"b":37700,"kind":"topic_heading","page":677,"text":"सदभिमृशन्त्यशेषमिदमात्मतयाऽऽत्मविदः।"},{"b":37701,"kind":"hindi_commentary","page":677,"verses":["10.87.26"],"text":"न हि विकृतिं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया"},{"b":37702,"kind":"topic_heading","page":677,"verses":["10.87.26"],"text":"स्वकृतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयावसितम्॥ २६"},{"b":37703,"kind":"hindi_commentary","page":677,"text":"तव परि ये चरन्त्यखिलसत्त्वनिकेततया"},{"b":37704,"kind":"topic_heading","page":677,"text":"त उत पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः।"},{"b":37705,"kind":"hindi_commentary","page":677,"verses":["10.87.27"],"text":"परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां-"},{"b":37706,"kind":"topic_heading","page":677,"verses":["10.87.27"],"text":"स्त्वयि कृतसौहृदाः खलु पुनन्ति न ये विमुखाः॥ २७"},{"b":37707,"kind":"hindi_commentary","page":677,"explains":["10.87.26","10.87.27"],"text":"यह त्रिगुणात्मक जगत् मनकी कल्पनामात्र है। केवल यही नहीं, परमात्मा और जगत‍्से पृथक् प्रतीत होनेवाला पुरुष भी कल्पनामात्र ही है। इस प्रकार वास्तवमें असत् होनेपर भी अपने सत्य अधिष्ठान आपकी सत्ताके कारण यह सत्य-सा प्रतीत हो रहा है। इसलिये भोक्ता, भोग्य और दोनोंके सम्बन्धको सिद्ध करनेवाली इन्द्रियाँ आदि जितना भी जगत् है, सबको आत्मज्ञानी पुरुष आत्मरूपसे सत्य ही मानते हैं। सोनेसे बने हुए कड़े, कुण्डल आदि स्वर्णरूप ही तो हैं; इसलिये उनको इस रूपमें जाननेवाला पुरुष उन्हें छोड़ता नहीं, वह समझता है कि यह भी सोना है। इसी प्रकार यह जगत् आत्मामें ही कल्पित, आत्मासे ही व्याप्त है; इसलिये आत्मज्ञानी पुरुष इसे आत्मरूप ही मानते हैं॥ २६॥ भगवन्! जो लोग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके अधिष्ठान हैं, सबके आधार हैं और सर्वात्मभावसे आपका भजन-सेवन करते हैं, वे मृत्युको तुच्छ समझकर उसके सिरपर लात मारते हैं अर्थात् उसपर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग आपसे विमुख हैं, वे चाहे जितने बड़े विद्वान् हों, उन्हें आप कर्मोंका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे पशुओंके समान बाँध लेते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने आपके साथ प्रेमका सम्बन्ध जोड़ रखा है, वे न केवल अपनेको बल्कि दूसरोंको भी पवित्र कर देते हैं—जगत‍्के बन्धनसे छुड़ा देते हैं। ऐसा सौभाग्य भला, आपसे विमुख लोगोंको कैसे प्राप्त हो सकता है॥ २७॥"},{"b":37708,"kind":"hindi_commentary","page":678,"verses":["10.87.28"],"text":"त्वमकरणः स्वराडखिलकारकशक्तिधर-"},{"b":37709,"kind":"sanskrit_shloka","page":678,"verses":["10.87.28"],"text":"स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्त्यजयानिमिषाः।"},{"b":37710,"kind":"hindi_commentary","page":678,"verses":["10.87.28"],"text":"वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्‍वसृजो"},{"b":37711,"kind":"sanskrit_shloka","page":678,"verses":["10.87.28"],"text":"विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्‍चकिताः॥ २८"},{"b":37712,"kind":"hindi_translation","page":678,"explains":["10.87.28"],"text":"प्रभो! आप मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदि करणोंसे—चिन्तन, कर्म आदिके साधनोंसे सर्वथा रहित हैं। फिर भी आप समस्त अन्तःकरण और बाह्य करणोंकी शक्तियोंसे सदा-सर्वदा सम्पन्‍न हैं। आप स्वतः सिद्ध ज्ञानवान्, स्वयंप्रकाश हैं; अतः कोई काम करनेके लिये आपको इन्द्रियोंकी आवश्यकता नहीं है। जैसे छोटे-छोटे राजा अपनी-अपनी प्रजासे कर लेकर स्वयं अपने सम्राट्को कर देते हैं, वैसे ही मनुष्योंके पूज्य देवता और देवताओंके पूज्य ब्रह्मा आदि भी अपने अधिकृत प्राणियोंसे पूजा स्वीकार करते हैं और मायाके अधीन होकर आपकी पूजा करते रहते हैं। वे इस प्रकार आपकी पूजा करते हैं कि आपने जहाँ जो कर्म करनेके लिये उन्हें नियुक्त कर दिया है, वे आपसे भयभीत रहकर वहीं वह काम करते रहते हैं॥ २८॥"},{"b":37713,"kind":"hindi_commentary","page":678,"verses":["10.87.29"],"text":"स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो"},{"b":37714,"kind":"sanskrit_shloka","page":678,"verses":["10.87.29"],"text":"विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः।"},{"b":37715,"kind":"hindi_commentary","page":678,"verses":["10.87.29"],"text":"न हि परमस्य कश्‍चिदपरो न परश्‍च भवेद्"},{"b":37716,"kind":"sanskrit_shloka","page":678,"verses":["10.87.29"],"text":"वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः॥ २९"},{"b":37717,"kind":"hindi_translation","page":678,"explains":["10.87.29"],"text":"नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे—संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। प्रभो! आप परम दयालु हैं। आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया। वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है। आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं॥ २९॥"},{"b":37718,"kind":"hindi_commentary","page":679,"verses":["10.87.30"],"text":"अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता-"},{"b":37719,"kind":"sanskrit_shloka","page":679,"verses":["10.87.30"],"text":"स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा।"},{"b":37720,"kind":"hindi_commentary","page":679,"verses":["10.87.30"],"text":"अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत्"},{"b":37721,"kind":"sanskrit_shloka","page":679,"verses":["10.87.30"],"text":"सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया॥ ३०"},{"b":37722,"kind":"hindi_translation","page":679,"explains":["10.87.30"],"text":"भगवन्! आप नित्य एकरस हैं। यदि जीव असंख्य हों और सब-के-सब नित्य एवं सर्वव्यापक हों, तब तो वे आपके समान ही हो जायँगे; उस हालतमें वे शासित हैं और आप शासक—यह बात बन ही नहीं सकती, और तब आप उनका नियन्त्रण कर ही नहीं सकते। उनका नियन्त्रण आप तभी कर सकते हैं, जब वे आपसे उत्पन्‍न एवं आपकी अपेक्षा न्यून हों। इसमें सन्देह नहीं कि ये सब-के-सब जीव तथा इनकी एकता या विभिन्‍नता आपसे ही उत्पन्‍न हुई है। इसलिये आप उनमें कारणरूपसे रहते हुए भी उनके नियामक हैं। वास्तवमें आप उनमें समरूपसे स्थित हैं। परन्तु यह जाना नहीं जा सकता कि आपका वह स्वरूप कैसा है। क्योंकि जो लोग ऐसा समझते हैं कि हमने जान लिया, उन्होंने वास्तवमें आपको नहीं जाना; उन्होंने तो केवल अपनी बुद्धिके विषयको जाना है, जिससे आप परे हैं। और साथ ही मतिके द्वारा जितनी वस्तुएँ जानी जाती हैं, वे मतियोंकी भिन्‍नताके कारण भिन्‍न-भिन्‍न होती हैं; इसलिये उनकी दुष्टता, एक मतके साथ दूसरे मतका विरोध प्रत्यक्ष ही है। अतएव आपका स्वरूप समस्त मतोंके परे है॥ ३०॥"},{"b":37723,"kind":"hindi_commentary","page":679,"verses":["10.87.31"],"text":"न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो-"},{"b":37724,"kind":"sanskrit_shloka","page":679,"verses":["10.87.31"],"text":"रुभययुजा भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत्।"},{"b":37725,"kind":"hindi_commentary","page":680,"verses":["10.87.31"],"text":"त्वयि त इमे ततो विविधनामगुणैः परमे"},{"b":37726,"kind":"sanskrit_shloka","page":680,"verses":["10.87.31"],"text":"सरित इवार्णवे मधुनि लिल्युरशेषरसाः॥ ३१"},{"b":37727,"kind":"hindi_translation","page":679,"explains":["10.87.31"],"text":"स्वामिन्! जीव आपसे उत्पन्‍न होता है, यह कहनेका ऐसा अर्थ नहीं है कि आप परिणामके द्वारा जीव बनते हैं। सिद्धान्त तो यह है कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अजन्मा हैं। अर्थात् उनका वास्तविक स्वरूप—जो आप हैं—कभी वृत्तियोंके अंदर उतरता नहीं, जन्म नहीं लेता। तब प्राणियोंका जन्म कैसे होता है? अज्ञानके कारण प्रकृतिको पुरुष और पुरुषको प्रकृति समझ लेनेसे, एकका दूसरेके साथ संयोग हो जानेसे जैसे ‘बुलबुला’ नामकी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, परन्तु उपादान-कारण जल और निमित्त-कारण वायुके संयोगसे उसकी सृष्टि हो जाती है। प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृतिका अध्यास (एकमें दूसरेकी कल्पना) हो जानेके कारण ही जीवोंके विविध नाम और गुण रख लिये जाते हैं। अन्तमें जैसे समुद्रमें नदियाँ और मधुमें समस्त पुष्पोंके रस समा जाते हैं, वैसे ही वे सब-के-सब उपाधिरहित आपमें समा जाते हैं। (इसलिये जीवोंकी भिन्‍नता और उनका पृथक् अस्तित्व आपके द्वारा नियन्त्रित है। उनकी पृथक् स्वतन्त्रता और सर्व-व्यापकता आदि वास्तविक सत्यको न जाननेके कारण ही मानी जाती है)॥ ३१॥"},{"b":37728,"kind":"hindi_commentary","page":680,"verses":["10.87.32"],"text":"नृषु तव मायया भ्रमममीष्ववगत्य भृशं त्वयि सुधियोऽभवे दधति भावमनुप्रभवम्।"},{"b":37729,"kind":"hindi_translation","page":680,"verses":["10.87.32"],"text":"कथमनुवर्ततां भवभयं तव यद् भ्रुकुटिः सृजति मुहुस्त्रिणेमिरभवच्छरणेषु भयम्॥ ३२"},{"b":37730,"kind":"hindi_translation","page":680,"explains":["10.87.32"],"text":"भगवन्! सभी जीव आपकी मायासे भ्रममें भटक रहे हैं, अपनेको आपसे पृथक् मानकर जन्म-मृत्युका चक्कर काट रहे हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस भ्रमको समझ लेते हैं और सम्पूर्ण भक्तिभावसे आपकी शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि आप जन्म-मृत्युके चक्करसे छुड़ानेवाले हैं। यद्यपि शीत, ग्रीष्म और वर्षा—इन तीन भागोंवाला कालचक्र आपका भ्रूविलासमात्र है, वह सभीको भयभीत करता है, परन्तु वह उन्हींको बार-बार भयभीत करता है, जो आपकी शरण नहीं लेते। जो आपके शरणागत भक्त हैं, उन्हें भला, जन्म-मृत्युरूप संसारका भय कैसे हो सकता है?॥ ३२॥"},{"b":37731,"kind":"hindi_commentary","page":681,"verses":["10.87.33"],"text":"विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगं"},{"b":37732,"kind":"sanskrit_shloka","page":681,"verses":["10.87.33"],"text":"य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिदः।"},{"b":37733,"kind":"hindi_commentary","page":681,"verses":["10.87.33"],"text":"व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोश्‍चरणं"},{"b":37734,"kind":"sanskrit_shloka","page":681,"verses":["10.87.33"],"text":"वणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ॥ ३३"},{"b":37735,"kind":"hindi_translation","page":680,"explains":["10.87.33"],"text":"अजन्मा प्रभो! जिन योगियोंने अपनी इन्द्रियों और प्राणोंको वशमें कर लिया है, वे भी, जब गुरुदेवके चरणोंकी शरण न लेकर उच्छृंखल एवं अत्यन्त चंचल मन-तुरंगको अपने वशमें करनेका प्रयत्‍न करते हैं, तब अपने साधनोंमें सफल नहीं होते। उन्हें बार-बार खेद और सैकड़ों विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है, केवल श्रम और दुःख ही उनके हाथ लगता है। उनकी ठीक वही दशा होती है, जैसी समुद्रमें बिना कर्णधारकी नावपर यात्रा करनेवाले व्यापारियोंकी होती है (तात्पर्य यह कि जो मनको वशमें करना चाहते हैं, उनके लिये कर्णधार—गुरुकी अनिवार्य आवश्यकता है)॥ ३३॥"},{"b":37736,"kind":"hindi_commentary","page":681,"verses":["10.87.34"],"text":"स्वजनसुतात्मदारधनधामधरासुरथै-"},{"b":37737,"kind":"sanskrit_shloka","page":681,"verses":["10.87.34"],"text":"स्त्वयि सति किं नृणां श्रयत आत्मनि सर्वरसे।"},{"b":37738,"kind":"hindi_commentary","page":681,"verses":["10.87.34"],"text":"इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां"},{"b":37739,"kind":"sanskrit_shloka","page":681,"verses":["10.87.34"],"text":"सुखयति को न्विह स्वविहते स्वनिरस्तभगे॥ ३४"},{"b":37740,"kind":"hindi_commentary","page":681,"verses":["10.87.35"],"text":"भुवि पुरुपुण्यतीर्थसदनान्यृषयो विमदा-"},{"b":37741,"kind":"sanskrit_shloka","page":681,"verses":["10.87.35"],"text":"स्त उत भवत्पदाम्बुजहृदोऽघभिदङ्‌घ्रिजलाः।"},{"b":37742,"kind":"hindi_commentary","page":682,"verses":["10.87.35"],"text":"दधति सकृन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे"},{"b":37743,"kind":"sanskrit_shloka","page":682,"verses":["10.87.35"],"text":"न पुनरुपासते पुरुषसारहरावसथान्॥ ३५"},{"b":37744,"kind":"hindi_translation","page":681,"explains":["10.87.34","10.87.35"],"text":"भगवन्! आप अखण्ड आनन्दस्वरूप और शरणागतोंके आत्मा हैं। आपके रहते स्वजन, पुत्र, देह, स्त्री, धन, महल, पृथ्वी, प्राण और रथ आदिसे क्या प्रयोजन है? जो लोग इस सत्य सिद्धान्तको न जानकर स्त्री-पुरुषके सम्बन्धसे होनेवाले सुखोंमें ही रम रहे हैं, उन्हें संसारमें भला, ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सुखी कर सके। क्योंकि संसारकी सभी वस्तुएँ स्वभावसे ही विनाशी हैं, एक-न-एक दिन मटियामेट हो जानेवाली हैं। और तो क्या, वे स्वरूपसे ही सारहीन और सत्ताहीन हैं; वे भला, क्या सुख दे सकती हैं॥ ३४॥ भगवन्! जो ऐश्‍वर्य, लक्ष्मी, विद्या, जाति, तपस्या आदिके घमंडसे रहित हैं, वे संतपुरुष इस पृथ्वीतलपर परम पवित्र और सबको पवित्र करनेवाले पुण्यमय सच्चे तीर्थस्थान हैं। क्योंकि उनके हृदयमें आपके चरणारविन्द सर्वदा विराजमान रहते हैं और यही कारण है कि उन संत पुरुषोंका चरणामृत समस्त पापों और तापोंको सदाके लिये नष्ट कर देनेवाला है। भगवन्! आप नित्य-आनन्दस्वरूप आत्मा ही हैं। जो एक बार भी आपको अपना मन समर्पित कर देते हैं—आपमें मन लगा देते हैं—वे उन देह-गेहोंमें कभी नहीं फँसते जो जीवके विवेक, वैराग्य, धैर्य, क्षमा और शान्ति आदि गुणोंका नाश करनेवाले हैं। वे तो बस, आपमें ही रम जाते हैं॥ ३५॥"},{"b":37745,"kind":"hindi_commentary","page":682,"verses":["10.87.36"],"text":"सत इदमुत्थितं सदिति चेन्‍ननु तर्कहतं"},{"b":37746,"kind":"hindi_commentary","page":682,"verses":["10.87.36"],"text":"व्यभिचरति क्व च क्व च मृषा न तथोभययुक्।"},{"b":37747,"kind":"hindi_commentary","page":683,"verses":["10.87.36"],"text":"व्यवहृतये विकल्प इषितोऽन्धपरम्परया"},{"b":37748,"kind":"sanskrit_shloka","page":683,"verses":["10.87.36"],"text":"भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ॥ ३६"},{"b":37749,"kind":"hindi_translation","page":682,"explains":["10.87.36"],"text":"भगवन्! जैसे मिट्टीसे बना हुआ घड़ा मिट्टीरूप ही होता है, वैसे ही सत्से बना हुआ जगत् भी सत् ही है—यह बात युक्तिसंगत नहीं है। क्योंकि कारण और कार्यका निर्देश ही उनके भेदका द्योतक है। यदि केवल भेदका निषेध करनेके लिये ही ऐसा कहा जा रहा हो तो पिता और पुत्रमें, दण्ड और घटनाशमें कार्य-कारण-भाव होनेपर भी वे एक दूसरेसे भिन्‍न हैं। इस प्रकार कार्य-कारणकी एकता सर्वत्र एक-सी नहीं देखी जाती। यदि कारण-शब्दसे निमित्त-कारण न लेकर केवल उपादान-कारण लिया जाय—जैसे कुण्डलका सोना—तो भी कहीं-कहीं कार्यकी असत्यता प्रमाणित होती है; जैसे रस्सीमें साँप। यहाँ उपादान-कारणके सत्य होनेपर भी उसका कार्य सर्प सर्वथा असत्य है। यदि यह कहा जाय कि प्रतीत होनेवाले सर्पका उपादान-कारण केवल रस्सी नहीं है, उसके साथ अविद्याका—भ्रमका मेल भी है, तो यह समझना चाहिये कि अविद्या और सत् वस्तुके संयोगसे ही इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है। इसलिये जैसे रस्सीमें प्रतीत होनेवाला सर्प मिथ्या है, वैसे ही सत् वस्तुमें अविद्याके संयोगसे प्रतीत होनेवाला नाम-रूपात्मक जगत् भी मिथ्या है। यदि केवल व्यवहारकी सिद्धिके लिये ही जगत‍्की सत्ता अभीष्ट हो, तो उसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि वह पारमार्थिक सत्य न होकर केवल व्यावहारिक सत्य है। यह भ्रम व्यावहारिक जगत‍्में माने हुए कालकी दृष्टिसे अनादि है; और अज्ञानीजन बिना विचार किये पूर्व-पूर्वके भ्रमसे प्रेरित होकर अन्धपरम्परासे इसे मानते चले आ रहे हैं। ऐसी स्थितिमें कर्मफलको सत्य बतलानेवाली श्रुतियाँ केवल उन्हीं लोगोंको भ्रममें डालती हैं, जो कर्ममें जड हो रहे हैं और यह नहीं समझते कि इनका तात्पर्य कर्मफलकी नित्यता बतलानेमें नहीं, बल्कि उनकी प्रशंसा करके उन कर्मोंमें लगानेमें है॥ ३६॥"},{"b":37750,"kind":"hindi_commentary","page":683,"verses":["10.87.37"],"text":"न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे।"},{"b":37751,"kind":"hindi_translation","page":683,"verses":["10.87.37"],"text":"अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः॥ ३७"},{"b":37752,"kind":"hindi_translation","page":683,"explains":["10.87.37"],"text":"भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है। इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत‍्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं। वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है। इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं॥ ३७॥"},{"b":37753,"kind":"hindi_commentary","page":684,"verses":["10.87.38"],"text":"स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्‍च जुषन्"},{"b":37754,"kind":"sanskrit_shloka","page":684,"verses":["10.87.38"],"text":"भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभगः।"},{"b":37755,"kind":"hindi_commentary","page":684,"verses":["10.87.38"],"text":"त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो"},{"b":37756,"kind":"sanskrit_shloka","page":684,"verses":["10.87.38"],"text":"महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभगः॥ ३८"},{"b":37757,"kind":"hindi_translation","page":683,"explains":["10.87.38"],"text":"भगवन्! जब जीव मायासे मोहित होकर अविद्याको अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनन्दादि गुण ढक जाते हैं; वह गुणजन्य वृत्तियों, इन्द्रियों और देहोंमें फँस जाता है तथा उन्हींको अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है। अब उनकी जन्म-मृत्युमें अपनी जन्म-मृत्यु मानकर उनके चक्करमें पड़ जाता है। परन्तु प्रभो! जैसे साँप अपने केंचुलसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड़ देता है—वैसे ही आप माया—अविद्यासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उसे सदा-सर्वदा छोड़े रहते हैं। इसीसे आपके सम्पूर्ण ऐश्‍वर्य, सदा-सर्वदा आपके साथ रहते हैं। अणिमा आदि अष्टसिद्धियोंसे युक्त परमैश्‍वर्यमें आपकी स्थिति है। इसीसे आपका ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य अपरिमित है, अनन्त है; वह देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे आबद्ध नहीं है॥ ३८॥"},{"b":37758,"kind":"hindi_commentary","page":684,"verses":["10.87.39"],"text":"यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा"},{"b":37759,"kind":"sanskrit_shloka","page":684,"verses":["10.87.39"],"text":"दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः।"},{"b":37760,"kind":"sanskrit_shloka","page":684,"verses":["10.87.39"],"text":"असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगव-"},{"b":37761,"kind":"sanskrit_shloka","page":684,"verses":["10.87.39"],"text":"न्‍ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः॥ ३९"},{"b":37762,"kind":"hindi_translation","page":684,"explains":["10.87.39"],"text":"भगवन्! यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदयकी विषय-वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर-उधर। जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त नहीं होते, उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है। क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं। एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म-कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त होनेका भय भी बना ही रहता है॥ ३९॥"},{"b":37763,"kind":"hindi_commentary","page":685,"verses":["10.87.40"],"text":"त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयो-"},{"b":37764,"kind":"sanskrit_shloka","page":685,"verses":["10.87.40"],"text":"र्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः।"},{"b":37765,"kind":"hindi_commentary","page":685,"verses":["10.87.40"],"text":"अनुयुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया"},{"b":37766,"kind":"sanskrit_shloka","page":685,"verses":["10.87.40"],"text":"श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः॥ ४०"},{"b":37767,"kind":"hindi_translation","page":685,"explains":["10.87.40"],"text":"भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप-कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है। उस समय विधि-निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं। उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता। जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन-सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप-पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि-निषेधोंसे अतीत हो जाता है। क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं। (परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं)॥ ४०॥"},{"b":37768,"kind":"sanskrit_shloka","page":685,"verses":["10.87.41"],"text":"द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया"},{"b":37769,"kind":"sanskrit_shloka","page":685,"verses":["10.87.41"],"text":"त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः।"},{"b":37770,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.41"],"text":"ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय-"},{"b":37771,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.41"],"text":"स्त्वयि हि फलन्त्यतन्‍निरसनेन भवन्‍निधनाः॥ ४१"},{"b":37772,"kind":"hindi_translation","page":685,"explains":["10.87.41"],"text":"भगवन्! स्वर्गादि लोकोंके अधिपति इन्द्र, ब्रह्मा प्रभृति भी आपकी थाह—आपका पार न पा सके; और आश्‍चर्यकी बात तो यह है कि आप भी उसे नहीं जानते। क्योंकि जब अन्त है ही नहीं, तब कोई जानेगा कैसे? प्रभो! जैसे आकाशमें हवासे धूलके नन्हें-नन्हें कण उड़ते रहते हैं, वैसे ही आपमें कालके वेगसे अपनेसे उत्तरोत्तर दसगुने सात आवरणोंके सहित असंख्य ब्रह्माण्ड एक साथ ही घूमते रहते हैं। तब भला, आपकी सीमा कैसे मिले। हम श्रुतियाँ भी आपके स्वरूपका साक्षात् वर्णन नहीं कर सकतीं, आपके अतिरिक्त वस्तुओंका निषेध करते-करते अन्तमें अपना भी निषेध कर देती हैं और आपमें ही अपनी सत्ता खोकर सफल हो जाती हैं॥ ४१॥"},{"b":37773,"kind":"topic_heading","page":686,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":37774,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.42"],"text":"इत्येतद् ब्रह्मणः पुत्रा आश्रुत्यात्मानुशासनम्।"},{"b":37775,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.42"],"text":"सनन्दनमथानर्चुः सिद्धा ज्ञात्वाऽऽत्मनो गतिम्॥ ४२"},{"b":37776,"kind":"hindi_commentary","page":686,"explains":["10.87.42"],"text":"भगवान् नारायणने कहा—देवर्षे! इस प्रकार सनकादि ऋषियोंने आत्मा और ब्रह्मकी एकता बतलानेवाला उपदेश सुनकर आत्मस्वरूपको जाना और नित्य सिद्ध होनेपर भी इस उपदेशसे कृतकृत्य-से होकर उन लोगोंने सनन्दनकी पूजा की॥ ४२॥"},{"b":37777,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.43"],"text":"इत्यशेषसमाम्‍नायपुराणोपनिषद्रसः ।"},{"b":37778,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.43"],"text":"समुद‍्धृतः पूर्वजातैर्व्योमयानैर्महात्मभिः॥ ४३"},{"b":37779,"kind":"hindi_translation","page":686,"explains":["10.87.43"],"text":"नारद! सनकादि ऋषि सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्‍न हुए थे, अतएव वे सबके पूर्वज हैं। उन आकाशगामी महात्माओंने इस प्रकार समस्त वेद, पुराण और उपनिषदोंका रस निचोड़ लिया है, यह सबका सार-सर्वस्व है॥ ४३॥"},{"b":37780,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.44"],"text":"त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयाऽऽत्मानुशासनम्।"},{"b":37781,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.44"],"text":"धारयंश्‍चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम्॥ ४४"},{"b":37782,"kind":"hindi_translation","page":686,"explains":["10.87.44"],"text":"देवर्षे! तुम भी उन्हींके समान ब्रह्माके मानसपुत्र हो—उनकी ज्ञान-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हो। तुम भी श्रद्धाके साथ इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और स्वच्छन्दभावसे पृथ्वीमें विचरण करो। यह विद्या मनुष्योंकी समस्त वासनाओंको भस्म कर देनेवाली है॥ ४४॥"},{"b":37783,"kind":"topic_heading","page":686,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":37784,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.45"],"text":"एवं स ऋषिणाऽऽदिष्टं गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान्।"},{"b":37785,"kind":"sanskrit_shloka","page":686,"verses":["10.87.45"],"text":"पूर्णः श्रुतधरो राजन्‍नाह वीरव्रतो मुनिः॥ ४५"},{"b":37786,"kind":"hindi_commentary","page":686,"explains":["10.87.45"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद बड़े संयमी, ज्ञानी, पूर्णकाम और नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे जो कुछ सुनते हैं, उन्हें उसकी धारणा हो जाती है। भगवान् नारायणने उन्हें जब इस प्रकार उपदेश किया, तब उन्होंने बड़ी श्रद्धासे उसे ग्रहण किया और उनसे यह कहा॥ ४५॥"},{"b":37787,"kind":"topic_heading","page":687,"text":"नारद उवाच"},{"b":37788,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.46"],"text":"नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीर्तये।"},{"b":37789,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.46"],"text":"यो धत्ते सर्वभूतानामभवायोशतीः कलाः॥ ४६"},{"b":37790,"kind":"hindi_commentary","page":687,"explains":["10.87.46"],"text":"देवर्षि नारदने कहा—भगवन्! आप सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं। आपकी कीर्ति परम पवित्र है। आप समस्त प्राणियोंके परम कल्याण—मोक्षके लिये कमनीय कलावतार धारण किया करते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४६॥"},{"b":37791,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.47"],"text":"इत्याद्यमृषिमानम्य तच्छिष्यांश्‍च महात्मनः।"},{"b":37792,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.47"],"text":"ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे॥ ४७"},{"b":37793,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.48"],"text":"सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः।"},{"b":37794,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.48"],"text":"तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम्॥ ४८"},{"b":37795,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.49"],"text":"इत्येतद् वर्णितं राजन् यन्‍नः प्रश्‍नः कृतस्त्वया।"},{"b":37796,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.49"],"text":"यथा ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणेऽपि मनश्‍चरेत्॥ ४९"},{"b":37797,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.50"],"text":"योऽस्योत्प्रेक्षक आदिमध्यनिधने योऽव्यक्तजीवेश्‍वरो"},{"b":37798,"kind":"hindi_commentary","page":687,"verses":["10.87.50"],"text":"यः सृष्ट्वेदमनुप्रविश्य ऋषिणा चक्रे पुरः शास्ति ताः।"},{"b":37799,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.50"],"text":"यं संपद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा"},{"b":37800,"kind":"sanskrit_shloka","page":687,"verses":["10.87.50"],"text":"तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम्॥ ५०"},{"b":37801,"kind":"hindi_translation","page":687,"explains":["10.87.47","10.87.48","10.87.49","10.87.50"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार महात्मा देवर्षि नारद आदि ऋषि भगवान् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णद्वैपायनके आश्रमपर गये॥ ४७॥ भगवान् वेदव्यासने उनका यथोचित सत्कार किया। वे आसन स्वीकार करके बैठ गये, इसके बाद देवर्षि नारदने जो कुछ भगवान् नारायणके मुँहसे सुना था, वह सब कुछ मेरे पिताजीको सुना दिया॥ ४८॥ राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें बतलाया कि मन-वाणीसे अगोचर और समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म परमात्माका वर्णन श्रुतियाँ किस प्रकार करती हैं और उसमें मनका कैसे प्रवेश होता है? यही तो तुम्हारा प्रश्‍न था॥ ४९॥ परीक्षित्! भगवान् ही इस विश्‍वका संकल्प करते हैं तथा उसके आदि, मध्य और अन्तमें स्थित रहते हैं। वे प्रकृति और जीव दोनोंके स्वामी हैं। उन्होंने ही इसकी सृष्टि करके जीवके साथ इसमें प्रवेश किया है और शरीरोंका निर्माण करके वे ही उनका नियन्त्रण करते हैं। जैसे गाढ़ निद्रा—सुषुप्तिमें म‌ग्‍न पुरुष अपने शरीरका अनुसन्धान छोड़ देता है, वैसे ही भगवान्‌को पाकर यह जीव मायासे मुक्त हो जाता है। भगवान् ऐसे विशुद्ध, केवल चिन्मात्र तत्त्व हैं कि उनमें जगत‍्के कारण माया अथवा प्रकृतिका रत्तीभर भी अस्तित्व नहीं है। वे ही वास्तवमें अभय-स्थान हैं। उनका चिन्तन निरन्तर करते रहना चाहिये॥ ५०॥"},{"b":37802,"kind":"hindi_translation","page":687,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे नारदनारायणसंवादे वेदस्तुतिर्नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥"}],"notes":[{"id":"v2:339","mark":"*","page":670,"after_verse":"10.87.14","text":"इन श्‍लोकोंपर श्रीश्रीधरस्वामीने बहुत सुन्दर श्‍लोक लिखे हैं, वे अर्थसहित यहाँ दिये जाते हैं— जय जयाजित जह्यगजंगमावृतिमजामुपनीतमृषागुणाम्। न हि भवन्तमृते प्रभवन्त्यमी निगमगीतगुणार्णवता तव॥ १॥ अजित! आपकी जय हो, जय हो! झूठे गुण धारण करके चराचर जीवको आच्छादित करनेवाली इस मायाको नष्ट कर दीजिये। आपके बिना बेचारे जीव इसको नहीं मार सकेंगे—नहीं पार कर सकेंगे। वेद इस बातका गान करते रहते हैं कि आप सकल सद्गुणोंके समुद्र हैं॥ १॥"},{"id":"v2:340","mark":"*","page":671,"after_verse":"10.87.15","text":"द्रुहिणवह्निरवीन्द्रमुखामरा जगदिदं न भवेत्पृथगुत्थितम्। बहुमुखैरपि मन्‍त्रगणैरजस्‍त्वमुरुमू‌र्तिरतो विनिगद्यसे॥ २॥ ब्रह्मा, अग्‍नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् प्रतीत होनेपर भी आपसे पृथक् नहीं है। इसलिये अनेक देवताओंका प्रतिपादन करनेवाले वेद-मन्त्र उन देवताओंके नामसे पृथक्-पृथक् आपकी ही विभिन्‍न मूर्तियोंका वर्णन करते हैं। वस्तुतः आप अजन्मा हैं; उन मूर्तियोंके रूपमें भी आपका जन्म नहीं होता॥ २॥"},{"id":"v2:341","mark":"†","page":671,"after_verse":"10.87.16","text":"सकलवेदगणेरितसद्गुणस्त्वमिति सर्वमनीषिजना रताः। त्वयि सुभद्रगुणश्रवणादिभिस्तव पदस्मरणेन गतक्लमाः॥ ३॥ सारे वेद आपके सद्गुणोंका वर्णन करते हैं। इसलिये संसारके सभी विद्वान् आपके मंगलमय कल्याणकारी गुणोंके श्रवण, स्मरण आदिके द्वारा आपसे ही प्रेम करते हैं और आपके चरणोंका स्मरण करके सम्पूर्ण क्लेशोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ३॥"},{"id":"v2:342","mark":"*","page":672,"after_verse":"10.87.17","text":"नरवपुः प्रतिपद्य यदि त्वयि श्रवणवर्णनसंस्मरणादिभिः। नरहरे! न भजन्ति नृणामिदं दृतिवदुच्छ्वसितं विफलं ततः॥ ४॥ नरहरे! मनुष्य-शरीर प्राप्त करके यदि जीव आपके श्रवण, वर्णन और संस्मरण आदिके द्वारा आपका भजन नहीं करते तो जीवोंका श्‍वास लेना धौंकनीके समान ही सर्वथा व्यर्थ है॥ ४॥"},{"id":"v2:343","mark":"*","page":673,"after_verse":"10.87.19","text":"उदरादिषु यः पुंसां चिन्तितो मुनिवर्त्मभिः। हन्ति मृत्युभयं देवो हृद्गतं तमुपास्महे॥ ५॥ मनुष्य ऋषि-मुनियोंके द्वारा बतलायी हुई पद्धतियोंसे उदर आदि स्थानोंमें जिनका चिन्तन करते हैं और जो प्रभु उनके चिन्तन करनेपर मृत्यु-भयका नाश कर देते हैं, उन हृदयदेशमें विराजमान प्रभुकी हम उपासना करते हैं॥ ५॥"},{"id":"v2:344","mark":"†","page":673,"after_verse":"10.87.19","text":"स्वनिर्मितेषु कार्येषु तारतम्यविवर्जितम्। सर्वानुस्यूतसन्मात्रं भगवन्तं भजामहे ॥ ६॥ अपने द्वारा निर्मित सम्पूर्ण कार्योंमें जो न्यूनाधिक श्रेष्ठ-कनिष्ठके भावसे रहित एवं सबमें भरपूर हैं, इस रूपमें अनुभवमें आनेवाली निर्विशेष सत्ताके रूपमें स्थित हैं, उन भगवान्‌का हम भजन करते हैं ॥ ६॥"},{"id":"v2:345","mark":"*","page":674,"after_verse":"10.87.21","text":"त्वदंशस्य ममेशान त्वन्मायाकृतबन्धनम्। त्वदङ्‌घ्रिसेवामादिश्य परानन्द निवर्तय॥ ७॥ मेरे परमानन्दस्वरूप स्वामी! मैं आपका अंश हूँ। अपने चरणोंकी सेवाका आदेश देकर अपनी मायाके द्वारा निर्मित मेरे बन्धनको निवृत्त कर दो॥ ७॥"},{"id":"v2:346","mark":"†","page":674,"after_verse":"10.87.21","text":"त्वत्कथामृतपाथोघौ विहरन्तो महामुदः। कुर्वन्ति कृतिनः केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥ ८॥ कोई-कोई विरले शुद्धान्तःकरण महापुरुष आपके अमृतमय कथा-समुद्रमें विहार करते हुए परमानन्दमें म‌ग्‍न रहते हैं और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको तृणके समान तुच्छ बना देते हैं।"},{"id":"v2:347","mark":"*","page":675,"after_verse":"10.87.22","text":"त्वय्यात्मनि जगन्‍नाथे मन्मनो रमतामिह। कदा ममेदृशं जन्म मानुषं सम्भविष्यति॥ ९॥ आप जगत‍्के स्वामी हैं और अपनी आत्मा ही हैं। इस जीवनमें ही मेरा मन आपमें रम जाय। मेरे स्वामी! मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा, जब मुझे इस प्रकारका मनुष्यजन्म प्राप्त होगा?"},{"id":"v2:348","mark":"†","page":675,"after_verse":"10.87.23","text":"चरणस्मरणं प्रेम्णा तव देव सुदुर्लभम्। यथाकथञ्चिन्‍नृहरे मम भूयादहर्निशम्॥ १०॥ देव! आपके चरणोंका प्रेमपूर्वक स्मरण अत्यन्त दुर्लभ है। चाहे जैसे-कैसे भी हो, नृसिंह! मुझे तो आपके चरणोंका स्मरण दिन-रात बना रहे।"},{"id":"v2:349","mark":"*","page":676,"after_verse":"10.87.25","text":"क्वाहं बुद्ध्यादिसंरुद्धः क्व च भूमन्महस्तव। दीनबन्धो दयासिन्‍ध‍ो भक्तिं मे नृहरे दिश॥ ११॥ अनन्त! कहाँ बुद्धि आदि परिच्छिन्‍न उपाधियोंसे घिरा हुआ मैं और कहाँ आपका मन, वाणी आदिके अगोचर स्वरूप! (आपका ज्ञान तो बहुत ही कठिन है) इसलिये दीनबन्धु, दयासिन्धु! नरहरि देव! मुझे तो अपनी भक्ति ही दीजिये।"},{"id":"v2:350","mark":"†","page":676,"after_verse":"10.87.25","text":"मिथ्यातर्कसुकर्कशेरितमहावादान्धकारान्तर- भ्राम्यन्मन्दमतेरमन्दमहिमंस्त्वज्ज्ञानवर्त्मास्फुटम्। श्रीमन्माधव वामन त्रिनयन श्रीशंकर श्रीपते गोविन्देति मुदा वदन् मधुपते मुक्तः कदा स्‍यामहम्॥ १२॥ अनन्त महिमाशाली प्रभो! जो मन्दमति पुरुष झूठे तर्कोंके द्वारा प्रेरित अत्यन्त कर्कश वाद-विवादके घोर अन्धकारमें भटक रहे हैं, उनके लिये आपके ज्ञानका मार्ग स्पष्ट सूझना सम्भव नहीं है। इसलिये मेरे जीवनमें ऐसी सौभाग्यकी घड़ी कब आवेगी कि मैं श्रीमन्माधव, वामन, त्रिलोचन, श्रीशंकर, श्रीपते, गोविन्द, मधुपते—इस प्रकार आपको आनन्दमें भरकर पुकारता हुआ मुक्त हो जाऊँगा।"},{"id":"v2:351","mark":"*","page":677,"after_verse":"10.87.27","text":"यत्सत्त्वतः सदाभाति जगदेतदसत् स्वतः। सदाभासमसत्यस्मिन् भगवन्तं भजाम तम्॥ १३॥ यह जगत् अपने स्वरूप, नाम और आकृतिके रूपमें असत् है, फिर भी जिस अधिष्ठान-सत्ताकी सत्यतासे यह सत्य जान पड़ता है तथा जो इस असत्य प्रपंचमें सत्यके रूपसे सदा प्रकाशमान रहता है, उस भगवान्‌का हम भजन करते हैं।"},{"id":"v2:352","mark":"†","page":677,"after_verse":"10.87.27","text":"तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतादटन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान्। यजन्तु यागैर्विवदन्‍तु वादैर्हरिं विना नैव मृतिं तरन्ति॥ १४॥ लोग पंचाग्‍नि आदि तापोंसे तप्त हों, पर्वतसे गिरकर आत्मघात कर लें, तीर्थोंका पर्यटन करें, वेदोंका पाठ करें, यज्ञोंके द्वारा यजन करें अथवा भिन्‍न-भिन्‍न मतवादोंके द्वारा आपसमें विवाद करें, परन्तु भगवान्‌के बिना इस मृत्युमय संसार-सागरसे पार नहीं जाते।"},{"id":"v2:353","mark":"*","page":678,"after_verse":"10.87.28","text":"अनिन्द्रियोऽपि यो देवः सर्वकारकशक्तिधृक्। सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वसेव्यं नमामि तम्॥ १५॥ जो प्रभु इन्द्रियरहित होनेपर भी समस्त बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियकी शक्तिको धारण करता है और सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है, उस सबके सेवनीय प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ।"},{"id":"v2:354","mark":"†","page":678,"after_verse":"10.87.29","text":"त्वदीक्षणवशक्षोभमायाबोधितकर्मभिः । जातान् संसरतः खिन्‍नान्‍नृहरे पाहि नः पितः॥ १६॥ नृसिंह! आपके सृष्टि-संकल्पसे क्षुब्ध होकर मायाने कर्मोंको जाग्रत् कर दिया है। उन्हींके कारण हम लोगोंका जन्म हुआ और अब आवागमनके चक्करमें भटककर हम दुःखी हो रहे हैं। पिताजी! आप हमारी रक्षा कीजिये।"},{"id":"v2:355","mark":"*","page":679,"after_verse":"10.87.30","text":"अन्तर्यन्ता सर्वलोकस्य गीतः श्रुत्या युक्त्या चैवमेवावसेयः। यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्नृसिंहः श्रीमन्तं तं चेतसैवावलम्बे॥ १७॥ श्रुतिने समस्त दृश्यप्रपंचके अन्तर्यामीके रूपमें जिनका गान किया है, और युक्तिसे भी वैसा ही निश्‍चय होता है। जो सर्वज्ञ, सर्वशक्ति और नृसिंह—पुरुषोत्तम हैं, उन्हीं सर्वसौन्दर्य-माधुर्यनिधि प्रभुका मैं मन-ही-मन आश्रय ग्रहण करता हूँ।"},{"id":"v2:356","mark":"*","page":680,"after_verse":"10.87.31","text":"यस्मिन्‍नुद्यद् विलयमपि यद् भाति विश्‍वं लयादौ जीवोपेतं गुरुकरुणया केवलात्मावबोधे। अत्यन्तान्तं व्रजति सहसा सिन्‍ध‍ुवत्सिन्‍धुमध्ये मध्येचित्तं त्रिभ‍ुवनगुरुं भावये तं नृसिंहम्॥ १८॥ जीवोंके सहित यह सम्पूर्ण विश्‍व जिनमें उदय होता है और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें विलयको प्राप्त होता है तथा भान होता है, गुरुदेवकी करुणा प्राप्त होनेपर जब शुद्ध आत्माका ज्ञान होता है, तब समुद्रमें नदीके समान सहसा यह जिनमें आत्यन्तिक प्रलयको प्राप्त हो जाता है, उन्हीं त्रिभुवनगुरु नृसिंहभगवान्‌की मैं अपने हृदयमें भावना करता हूँ।"},{"id":"v2:357","mark":"†","page":680,"after_verse":"10.87.32","text":"संसारचक्रक्रकचैर्विदीर्णमुदीर्णनानाभवतापतप्तम् । कथंचिदापन्‍नमिह प्रपन्‍नं त्‍वमुद्धर श्रीनृहरे नृलोकम् ॥ १९॥ नृसिंह! यह जीव संसार-चक्रके आरेसे टुकड़े-टुकड़े हो रहा है और नाना प्रकारके सांसारिक तापोंकी धधकती हुई लपटोंसे झुलस रहा है। यह आपत्तिग्रस्त जीव किसी प्रकार आपकी कृपासे आपकी शरणमें आया है। आप इसका उद्धार कीजिये।"},{"id":"v2:358","mark":"*","page":681,"after_verse":"10.87.33","text":"यदा परानन्दगुरो भवत्पदे पदं मनो मे भगवँल्लभेत। तदा निरस्ताखिलसाधनश्रमः श्रयेय सौख्यं भवतः कृपातः॥ २०॥ परमानन्दमय गुरुदेव! भगवन्! जब मेरा मन आपके चरणोंमें स्थान प्राप्त कर लेगा, तब मैं आपकी कृपासे समस्त साधनोंके परिश्रमसे छुटकारा पाकर परमानन्द प्राप्त करूँगा।"},{"id":"v2:359","mark":"†","page":681,"after_verse":"10.87.35","text":"भजतो हि भवान् साक्षात्परमानन्दचिद्घनः। आत्मैव किमतः कृत्यं तुच्छदारसुतादिभिः॥ २१॥ जो आपका भजन करते हैं, उनके लिये आप स्वयं साक्षात् परमानन्दचिद्घन आत्मा ही हैं। इसलिये उन्हें तुच्छ स्त्री, पुत्र, धन आदिसे क्या प्रयोजन है?"},{"id":"v2:360","mark":"*","page":682,"after_verse":"10.87.35","text":"मुंचन्‍नंगतदंगसंगमनिशं त्वामेव संचिन्तयन् सन्तः सन्ति यतो यतो गतमदास्तानाश्रमानावसन्। नित्यं तन्मुखपंकजाद्विगलितत्वत्पुण्यगाथामृत- स्रोतःसम्‍प्लवसंप्लुतो नरहरे न स्यामहं देहभृत्॥ २२॥ मैं शरीर और उसके सम्बन्धियोंकी आसक्ति छोड़कर रात-दिन आपका ही चिन्तन करूँगा और जहाँ-जहाँ निरभिमान सन्त निवास करते हैं, उन्हीं-उन्हीं आश्रमोंमें रहूँगा। उन सत्पुरुषोंके मुख-कमलसे निःसृत आपकी पुण्यमयी कथा-सुधाकी नदियोंकी धारामें प्रतिदिन स्नान करूँगा और नृसिंह! फिर मैं कभी देहके बन्धनमें नहीं पड़ूँगा।"},{"id":"v2:361","mark":"*","page":683,"after_verse":"10.87.36","text":"उद्भूतं भवतः सतोऽपि भुवनं सन्‍नैव सर्पः स्रजः कुर्वत् कार्यमपीह कूटकनकं वेदोऽपि नैवंपरः। अद्वैतं तव सत्परं तु परमानन्‍दं पदं तन्मुदा वन्दे सुन्दरमिन्दिरानुत हरे मा मुंच मामानतम्॥ २३॥ मालामें प्रतीयमान सर्पके समान सत्यस्वरूप आपसे उदय होनेपर भी यह त्रिभुवन सत्य नहीं है। झूठा सोना बाजारमें चल जानेपर भी सत्य नहीं हो जाता। वेदोंका तात्पर्य भी जगत‍्की सत्यतामें नहीं है। इसलिये आपका जो परम सत्य परमानन्दस्वरूप अद्वैत सुन्दर पद है, हे इन्दिरावन्दित श्रीहरे! मैं उसीकी वन्दना करता हूँ। मुझ शरणागतको मत छोड़िये।"},{"id":"v2:362","mark":"†","page":683,"after_verse":"10.87.37","text":"मुकुटकुण्डलकंकणकिंकिणीपरिणतं कनकं परमार्थतः। महदहङ्कृतिखप्रमुखं तथा नरहरे न परं परमार्थतः॥ २४॥ सोना मुकुट, कुण्डल, कंकण और किंकिणीके रूपमें परिणत होनेपर भी वस्तुतः सोना ही है। इसी प्रकार नृसिंह! महत्तत्त्व, अहंकार और आकाश, वायु आदिके रूपमें उपलब्ध होनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः आपसे भिन्‍न नहीं है।"},{"id":"v2:363","mark":"*","page":684,"after_verse":"10.87.38","text":"नृत्यन्ती तव वीक्षणांगणगता कालस्वभावादिभि- र्भावान् सत्त्वरजस्तमोगुणमयानुन्मीलयन्ती बहून्। मामाक्रम्य पदा शिरस्यतिभरं सम्मर्दयन्‍त्यातुरं माया ते शरणं गतोऽस्मि नृहरे त्वामेव तां वारय॥ २५॥ प्रभो! आपकी यह माया आपकी दृष्टिके आँगनमें आकर नाच रही है और काल, स्वभाव आदिके द्वारा सत्त्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी अनेकानेक भावोंका प्रदर्शन कर रही है। साथ ही यह मेरे सिरपर सवार होकर मुझ आतुरको बलपूर्वक रौंद रही है। नृसिंह! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप ही इसे रोक दीजिये।"},{"id":"v2:364","mark":"†","page":684,"after_verse":"10.87.39","text":"दम्भन्यासमिषेण वंचितजनं भोगैकचिन्तातुरं सम्मुह्यन्तमहर्निशं विरचितोद्योगक्लमैराकुलम्। आज्ञालंघिनमज्ञमज्ञजनतासम्माननासन्मदं दीनानाथ दयानिधान परमानन्द प्रभो पाहि माम्॥ २६॥ प्रभो! मैं दम्भपूर्ण संन्यासके बहाने लोगोंको ठग रहा हूँ। एकमात्र भोगकी चिन्तासे ही आतुर हूँ तथा रात-दिन नाना प्रकारके उद्योगोंकी रचनाकी थकावटसे व्याकुल तथा बेसुध हो रहा हूँ। मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन करता हूँ, अज्ञानी हूँ और अज्ञानी लोगोंके द्वारा प्राप्त सम्मानसे ‘मैं सन्त हूँ’ ऐसा घमण्ड कर बैठा हूँ। दीनानाथ, दयानिधान, परमानन्द! मेरी रक्षा कीजिये।"},{"id":"v2:365","mark":"*","page":685,"after_verse":"10.87.40","text":"अवगमं तव मे दिशि माधव स्फुरति यन्‍न सुखासुखसंगमः। श्रवणवर्णनभावमथापि वा न हि भवामि यथा विधिकिंकरः॥ २७॥ माधव! आप मुझे अपने स्वरूपका अनुभव कराइये, जिससे फिर सुख-दुःखके संयोगकी स्फूर्ति नहीं होती। अथवा मुझे अपने गुणोंके श्रवण और वर्णनका प्रेम ही दीजिये, जिससे कि मैं विधि-निषेधका किंकर न होऊँ।"},{"id":"v2:366","mark":"*","page":686,"after_verse":"10.87.41","text":"द्युपतयो विदुरन्तमनन्त ते न च भवान्‍न गिरः श्रुतिमौलयः। त्वयि फलन्ति यतो नम इत्यतो जय जयेति भजे तव तत्पदम्॥ २८॥ हे अनन्त! ब्रह्मा आदि देवता आपका अन्त नहीं जानते, न आप ही जानते और न तो वेदोंकी मुकुटमणि उपनिषदें ही जानती हैं; क्योंकि आप अनन्त हैं। उपनिषदें ‘नमो नमः’, ‘जय हो, जय हो’ यह कहकर आपमें चरितार्थ होती हैं। इसलिये मैं भी ‘नमो नमः’, ‘जय हो’, ‘जय हो’ यही कहकर आपके चरण-कमलकी उपासना करता हूँ।"}],"corrections":{"count":9,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}