{"id":"11.21","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 21","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथैकविंशोऽध्यायः","topics":["गुण-दोष-व्यवस्थाका स्वरूप और रहस्य"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[838,845]},"verses":[{"id":"11.21.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/1/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्।","क्षुद्रान् कामांश्‍चलैः प्राणैर्जुषन्तः संसरन्ति ते॥ १"],"iast":["ya etān matpatho hitvā bhaktijñānakriyātmakān|","kṣudrān kāmāṃścalaiḥ prāṇairjuṣantaḥ saṃsaranti te|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं—भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १॥"},{"id":"11.21.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/2/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।","विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्‍चयः॥ २"],"iast":["sve sve'dhikāre yā niṣṭhā sa guṇaḥ parikīrtitaḥ|","viparyayastu doṣaḥ syādubhayoreṣa niścayaḥ|| 2"],"meaning":"अपने-अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है। तात्पर्य यह कि गुण और दोष दोनोंकी व्यवस्था अधिकारके अनुसार की जाती है, किसी वस्तुके अनुसार नहीं॥ २॥"},{"id":"11.21.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/3/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।","द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ॥ ३"],"iast":["śuddhyaśuddhī vidhīyete samāneṣvapi vastuṣu|","dravyasya vicikitsārthaṃ guṇadoṣau śubhāśubhau|| 3"],"meaning":"वस्तुओंके समान होनेपर भी शुद्धि-अशुद्धि, गुण-दोष और शुभ-अशुभ आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय यह है कि पदार्थका ठीक-ठीक निरीक्षण-परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उत्पन्‍न करके ही यह योग्य है कि अयोग्य, स्वाभाविक प्रवृत्तिको नियन्त्रित—संकुचित किया जा सके॥ ३॥"},{"id":"11.21.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/4/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।","दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम्॥ ४"],"iast":["dharmārthaṃ vyavahārārthaṃ yātrārthamiti cānagha|","darśito'yaṃ mayā''cāro dharmamudvahatāṃ dhuram|| 4"],"meaning":"उनके द्वारा धर्म-सम्पादन कर सके, समाजका व्यवहार ठीक-ठीक चला सके और अपने व्यक्तिगत जीवनके निर्वाहमें भी सुविधा हो। इससे यह लाभ भी है कि मनुष्य अपनी वासनामूलक सहज प्रवृत्तियोंके द्वारा इनके जालमें न फँसकर शास्त्रानुसार अपने जीवनको नियन्त्रित और मनको वशीभूत कर लेता है। निष्पाप उद्धव! यह आचार मैंने ही मनु आदिका रूप धारण करके धर्मका भार ढोनेवाले कर्म जडोंके लिये उपदेश किया है॥ ४॥"},{"id":"11.21.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/5/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भूम्यम्ब्व‌ग्‍न्यनिलाकाशा भूतानां पंच धातवः।","आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुताः॥ ५"],"iast":["bhūmyambvagnyanilākāśā bhūtānāṃ paṃca dhātavaḥ|","ābrahmasthāvarādīnāṃ śārīrā ātmasaṃyutāḥ|| 5"],"meaning":"पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचभूत ही ब्रह्मासे लेकर पर्वत-वृक्षपर्यन्त सभी प्राणियोंके शरीरोंके मूलकारण हैं। इस तरह वे सब शरीरकी दृष्टिसे तो समान हैं ही, सबका आत्मा भी एक ही है॥ ५॥"},{"id":"11.21.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/6/","page":839,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि।","धातुषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये॥ ६"],"iast":["vedena nāmarūpāṇi viṣamāṇi sameṣvapi|","dhātuṣūddhava kalpyante eteṣāṃ svārthasiddhaye|| 6"],"meaning":"प्रिय उद्धव! यद्यपि सबके शरीरोंके पंचभूत समान हैं, फिर भी वेदोंने इनके वर्णाश्रम आदि अलग-अलग नाम और रूप इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी वासना-मूलक प्रवृत्तियोंको संकुचित करके—नियन्त्रित करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको सिद्ध कर सकें॥ ६॥"},{"id":"11.21.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/7/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।","गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम्॥ ७"],"iast":["deśakālādibhāvānāṃ vastūnāṃ mama sattama|","guṇadoṣau vidhīyete niyamārthaṃ hi karmaṇām|| 7"],"meaning":"साधुश्रेष्ठ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषोंका विधान भी मेरे द्वारा इसीलिये किया गया है कि कर्मोंमें लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्ति न हो, मर्यादाका भंग न होने पावे॥ ७॥"},{"id":"11.21.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/8/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत्।","कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम्॥ ८"],"iast":["akṛṣṇasāro deśānāmabrahmaṇyo'śucirbhavet|","kṛṣṇasāro'pyasauvīrakīkaṭāsaṃskṛteriṇam|| 8"],"meaning":"देशोंमें वह देश अपवित्र है, जिसमें कृष्णसार मृग न हों और जिसके निवासी ब्राह्मण-भक्त न हों। कृष्णसार मृगके होनेपर भी, केवल उन प्रदेशोंको छोड़कर जहाँ संत पुरुष रहते हैं, कीकट देश अपवित्र ही है। संस्काररहित और ऊसर आदि स्थान भी अपवित्र ही होते हैं॥ ८॥"},{"id":"11.21.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/9/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।","यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः॥ ९"],"iast":["karmaṇyo guṇavān kālo dravyataḥ svata eva vā|","yato nivartate karma sa doṣo'karmakaḥ smṛtaḥ|| 9"],"meaning":"समय वही पवित्र है, जिसमें कर्म करनेयोग्य सामग्री मिल सके तथा कर्म भी हो सके। जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न मिले, आगन्तुक दोषोंसे अथवा स्वाभाविक दोषके कारण जिसमें कर्म ही न हो सके, वह समय अशुद्ध है॥ ९॥"},{"id":"11.21.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/10/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येण वचनेन च।","संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा॥ १०"],"iast":["dravyasya śuddhyaśuddhī ca dravyeṇa vacanena ca|","saṃskāreṇātha kālena mahattvālpatayāthavā|| 10"],"meaning":"पदार्थोंकी शुद्धि और अशुद्धि द्रव्य, वचन, संस्कार, काल, महत्त्व अथवा अल्पत्वसे भी होती है। (जैसे कोई पात्र जलसे शुद्ध और मूत्रादिसे अशुद्ध हो जाता है। किसी वस्तुकी शुद्धि अथवा अशुद्धिमें शंका होनेपर ब्राह्मणोंके वचनसे वह शुद्ध हो जाती है अन्यथा अशुद्ध रहती है। पुष्पादि जल छिड़कनेसे शुद्ध और सूँघनेसे अशुद्ध माने जाते हैं। तत्कालका पकाया हुआ अन्‍न शुद्ध और बासी अशुद्ध माना जाता है। बड़े सरोवर और नदी आदिका जल शुद्ध और छोटे गड्ढोंका अशुद्ध माना जाता है। इस प्रकार क्रमसे समझ लेना चाहिये।)॥ १०॥"},{"id":"11.21.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/11/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।","अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः॥ ११"],"iast":["śaktyāśaktyāthavā buddhyā samṛddhyā ca yadātmane|","aghaṃ kurvanti hi yathā deśāvasthānusārataḥ|| 11"],"meaning":"शक्ति, अशक्ति, बुद्धि और वैभवके अनुसार भी पवित्रता और अपवित्रताकी व्यवस्था होती है। उसमें भी स्थान और उपयोग करनेवालेकी आयुका विचार करते हुए ही अशुद्ध वस्तुओंके व्यवहारका दोष ठीक तरहसे आँका जाता है। (जैसे धनी-दरिद्र, बलवान्-निर्बल, बुद्धिमान्-मूर्ख, उपद्रवपूर्ण और सुखद देश तथा तरुण एवं वृद्धावस्थाके भेदसे शुद्धि और अशुद्धिकी व्यवस्थामें अन्तर पड़ जाता है।)॥ ११॥"},{"id":"11.21.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/12/","page":840,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।","कालवाय्वग्‍निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥ १२"],"iast":["dhānyadārvasthitantūnāṃ rasataijasacarmaṇām|","kālavāyvagnimṛttoyaiḥ pārthivānāṃ yutāyutaiḥ|| 12"],"meaning":"अनाज, लकड़ी, हाथीदाँत आदि हड्डी, सूत, मधु, नमक, तेल, घी आदि रस, सोना-पारा आदि तैजस पदार्थ, चाम और घड़ा आदि मिट्टीके बने पदार्थ समयपर अपने-आप हवा लगनेसे, आगमें जलानेसे, मिट्टी लगानेसे अथवा जलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते हैं। देश, काल और अवस्थाके अनुसार कहीं जल-मिट्टी आदि शोधक सामग्रीके संयोगसे शुद्धि करनी पड़ती है तो कहीं-कहीं एक-एकसे भी शुद्धि हो जाती है॥ १२॥"},{"id":"11.21.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/13/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।","भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते॥ १३"],"iast":["amedhyaliptaṃ yad yena gandhaṃ lepaṃ vyapohati|","bhajate prakṛtiṃ tasya tacchaucaṃ tāvadiṣyate|| 13"],"meaning":"यदि किसी वस्तुमें कोई अशुद्ध पदार्थ लग गया हो तो छीलनेसे या मिट्टी आदि मलनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध और लेप न रहे और वह वस्तु अपने पूर्वरूपमें आ जाय, तब उसको शुद्ध समझना चाहिये॥ १३॥"},{"id":"11.21.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/14/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।","मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः॥ १४"],"iast":["snānadānatapo'vasthāvīryasaṃskārakarmabhiḥ|","matsmṛtyā cātmanaḥ śaucaṃ śuddhaḥ karmācared dvijaḥ|| 14"],"meaning":"स्नान, दान, तपस्या, वय, सामर्थ्य, संस्कार, कर्म और मेरे स्मरणसे चित्तकी शुद्धि होती है। इनके द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको विहित कर्मोंका आचरण करना चाहिये॥ १४॥"},{"id":"11.21.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/15/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम्।","धर्मः सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५"],"iast":["mantrasya ca parijñānaṃ karmaśuddhirmadarpaṇam|","dharmaḥ sampadyate ṣaḍbhiradharmastu viparyayaḥ|| 15"],"meaning":"गुरुमुखसे सुनकर भलीभाँति हृदयंगम कर लेनेसे मन्त्रकी और मुझे समर्पित कर देनेसे कर्मकी शुद्धि होती है। उद्धवजी! इस प्रकार देश, काल, पदार्थ, कर्ता, मन्त्र और कर्म—इन छहोंके शुद्ध होनेसे धर्म और अशुद्ध होनेसे अधर्म होता है॥ १५॥"},{"id":"11.21.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/16/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।","गुणदोषार्थनियमस्तद्भिदामेव बाधते॥ १६"],"iast":["kvacid guṇo'pi doṣaḥ syād doṣo'pi vidhinā guṇaḥ|","guṇadoṣārthaniyamastadbhidāmeva bādhate|| 16"],"meaning":"कहीं-कहीं शास्त्रविधिसे गुण दोष हो जाता है और दोष गुण। (जैसे ब्राह्मणके लिये सन्ध्या-वन्दन, गायत्री-जप आदि गुण हैं; परन्तु शूद्रके लिये दोष हैं। और दूध आदिका व्यापार वैश्यके लिये विहित है; परन्तु ब्राह्मणके लिये अत्यन्त निषिद्ध है।) एक ही वस्तुके विषयमें किसीके लिये गुण और किसीके लिये दोषका विधान गुण और दोषोंकी वास्तविकताका खण्डन कर देता है और इससे यह निश्‍चय होता है कि गुण-दोषका यह भेद कल्पित है॥ १६॥"},{"id":"11.21.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/17/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।","औत्पत्तिको गुणः संगो न शयानः पतत्यधः॥ १७"],"iast":["samānakarmācaraṇaṃ patitānāṃ na pātakam|","autpattiko guṇaḥ saṃgo na śayānaḥ patatyadhaḥ|| 17"],"meaning":"जो लोग पतित हैं, वे पतितोंका-सा आचरण करते हैं तो उन्हें पाप नहीं लगता, जब कि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये वह सर्वथा त्याज्य होता है। जैसे गृहस्थोंके लिये स्वाभाविक होनेके कारण अपनी पत्‍नीका संग पाप नहीं है; परन्तु संन्यासीके लिये घोर पाप है। उद्धवजी! बात तो यह है कि जो नीचे सोया हुआ है, वह गिरेगा कहाँ? वैसे ही जो पहलेसे ही पतित हैं, उनका अब और पतन क्या होगा?॥ १७॥"},{"id":"11.21.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/18/","page":841,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।","एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥ १८"],"iast":["yato yato nivarteta vimucyeta tatastataḥ|","eṣa dharmo nṛṇāṃ kṣemaḥ śokamohabhayāpahaḥ|| 18"],"meaning":"जिन-जिन दोषों और गुणोंसे मनुष्यका चित्त उपरत हो जाता है, उन्हीं वस्तुओंके बन्धनसे वह मुक्त हो जाता है। मनुष्योंके लिये यह निवृत्तिरूप धर्म ही परम कल्याणका साधन है; क्योंकि यही शोक, मोह और भयको मिटानेवाला है॥ १८॥"},{"id":"11.21.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/19/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः संगस्ततो भवेत्।","संगात्तत्र भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम्॥ १९"],"iast":["viṣayeṣu guṇādhyāsāt puṃsaḥ saṃgastato bhavet|","saṃgāttatra bhavet kāmaḥ kāmādeva kalirnṛṇām|| 19"],"meaning":"उद्धवजी! विषयोंमें कहीं भी गुणोंका आरोप करनेसे उस वस्तुके प्रति आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होनेसे उसे अपने पास रखनेकी कामना हो जाती है और इस कामनाकी पूर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा पड़नेपर लोगोंमें परस्पर कलह होने लगता है॥ १९॥"},{"id":"11.21.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/20/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।","तमसा ग्रस्यते पुंसश्‍चेतना व्यापिनी द्रुतम्॥ २०"],"iast":["kalerdurviṣahaḥ krodhastamastamanuvartate|","tamasā grasyate puṃsaścetanā vyāpinī drutam|| 20"],"meaning":"कलहसे असह्य क्रोधकी उत्पत्ति होती है और क्रोधके समय अपने हित-अहितका बोध नहीं रहता, अज्ञान छा जाता है। इस अज्ञानसे शीघ्र ही मनुष्यकी कार्याकार्यका निर्णय करनेवाली व्यापक चेतनाशक्ति लुप्त हो जाती है॥ २०॥"},{"id":"11.21.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/21/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।","ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१"],"iast":["tayā virahitaḥ sādho jantuḥ śūnyāya kalpate|","tato'sya svārthavibhraṃśo mūrcchitasya mṛtasya ca|| 21"],"meaning":"साधो! चेतनाशक्ति अर्थात् स्मृतिके लुप्त हो जानेपर मनुष्यमें मनुष्यता नहीं रह जाती, पशुता आ जाती है और वह शून्यके समान अस्तित्वहीन हो जाता है। अब उसकी अवस्था वैसी ही हो जाती है, जैसे कोई मूर्च्छित या मुर्दा हो। ऐसी स्थितिमें न तो उसका स्वार्थ बनता है और न तो परमार्थ॥ २१॥"},{"id":"11.21.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/22/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।","वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्‍वसन्॥ २२"],"iast":["viṣayābhiniveśena nātmānaṃ veda nāparam|","vṛkṣajīvikayā jīvan vyarthaṃ bhastreva yaḥ śvasan|| 22"],"meaning":"विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्‍वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥"},{"id":"11.21.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/23/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["फलश्रुतिरियं नॄणां न श्रेयो रोचनं परम्।","श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३"],"iast":["phalaśrutiriyaṃ nṝṇāṃ na śreyo rocanaṃ param|","śreyovivakṣayā proktaṃ yathā bhaiṣajyarocanam|| 23"],"meaning":"उद्धवजी! यह स्वर्गादिरूप फलका वर्णन करनेवाली श्रुति मनुष्योंके लिये उन-उन लोकोंको परम पुरुषार्थ नहीं बतलाती; परन्तु बहिर्मुख पुरुषोंके लिये अन्तःकरणशुद्धिके द्वारा परम कल्याणमय मोक्षकी विवक्षासे ही कर्मोंमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये वैसा वर्णन करती है। जैसे बच्चोंसे ओषधिमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये रोचक वाक्य कहे जाते हैं। (बेटा! प्रेमसे गिलोयका काढ़ा पी लो तो तुम्हारी चोटी बढ़ जायगी)॥ २३॥"},{"id":"11.21.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/24/","page":842,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।","आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु॥ २४"],"iast":["utpattyaiva hi kāmeṣu prāṇeṣu svajaneṣu ca|","āsaktamanaso martyā ātmano'narthahetuṣu|| 24"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि संसारके विषय-भोगोंमें, प्राणोंमें और सगे-सम्बन्धियोंमें सभी मनुष्य जन्मसे ही आसक्त हैं और उन वस्तुओंकी आसक्ति उनकी आत्मोन्‍नतिमें बाधक एवं अनर्थका कारण है॥ २४॥"},{"id":"11.21.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/25/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।","कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः॥ २५"],"iast":["na tānaviduṣaḥ svārthaṃ bhrāmyato vṛjinādhvani|","kathaṃ yuñjyāt punasteṣu tāṃstamo viśato budhaḥ|| 25"],"meaning":"वे अपने परम पुरुषार्थको नहीं जानते, इसलिये स्वर्गादिका जो वर्णन मिलता है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है—ऐसा विश्‍वास करके देवादि योनियोंमें भटकते रहते हैं और फिर वृक्ष आदि योनियोंके घोर अन्धकारमें आ पड़ते हैं। ऐसी अवस्थामें कोई भी विद्वान् अथवा वेद फिरसे उन्हें उन्हीं विषयोंमें क्यों प्रवृत्त करेगा?॥ २५॥"},{"id":"11.21.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/26/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।","फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि॥ २६"],"iast":["evaṃ vyavasitaṃ kecidavijñāya kubuddhayaḥ|","phalaśrutiṃ kusumitāṃ na vedajñā vadanti hi|| 26"],"meaning":"दुर्बुद्धिलोग (कर्मवादी) वेदोंका यह अभिप्राय न समझकर कर्मासक्तिवश पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंका वर्णन देखते हैं और उन्हींको परम फल मानकर भटक जाते हैं। परन्तु वेदवेत्ता लोग श्रुतियोंका ऐसा तात्पर्य नहीं बतलाते॥ २६॥"},{"id":"11.21.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/27/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः।","अग्‍निमुग्धा धूमतान्ताः स्वं लोकं न विदन्ति ते॥ २७"],"iast":["kāminaḥ kṛpaṇā lubdhāḥ puṣpeṣu phalabuddhayaḥ|","agnimugdhā dhūmatāntāḥ svaṃ lokaṃ na vidanti te|| 27"],"meaning":"विषय-वासनाओंमें फँसे हुए दीन-हीन, लोभी पुरुष रंग-बिरंगे पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंको ही सब कुछ समझ बैठते हैं, अग्‍निके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञ-यागादि कर्मोंमें ही मुग्ध हो जाते हैं। उन्हें अन्तमें देवलोक, पितृलोक आदिकी ही प्राप्ति होती है। दूसरी ओर भटक जानेके कारण उन्हें अपने निजधाम आत्मपदका पता नहीं लगता॥ २७॥"},{"id":"11.21.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/28/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न ते मामंग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।","उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८"],"iast":["na te māmaṃga jānanti hṛdisthaṃ ya idaṃ yataḥ|","ukthaśastrā hyasutṛpo yathā nīhāracakṣuṣaḥ|| 28"],"meaning":"प्यारे उद्धव! उनके पास साधना है तो केवल कर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी तृप्ति। उनकी आँखें धुँधली हो गयी हैं; इसीसे वे यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं इस जगत‍्के रूपमें है, वह परमात्मा मैं उनके हृदयमें ही हूँ॥ २८॥"},{"id":"11.21.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/29/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।","हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९"],"iast":["te me matamavijñāya parokṣaṃ viṣayātmakāḥ|","hiṃsāyāṃ yadi rāgaḥ syād yajña eva na codanā|| 29"],"meaning":"यदि हिंसा और उसके फल मांस-भक्षणमें राग ही हो, उसका त्याग न किया जा सकता हो, तो यज्ञमें ही करे—यह परिसंख्या विधि है, स्वाभाविक प्रवृत्तिका संकोच है, सन्ध्यावन्दनादिके समान अपूर्व विधि नहीं है। इस प्रकार मेरे परोक्ष अभिप्रायको न जानकर विषयलोलुप पुरुष हिंसाका खिलवाड़ खेलते हैं और दुष्टतावश अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये वध किये हुए पशुओंके मांससे यज्ञ करके देवता, पितर तथा भूतपतियोंके यजनका ढोंग करते हैं॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"11.21.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/30/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।","यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः॥ ३०"],"iast":["hiṃsāvihārā hyālabdhaiḥ paśubhiḥ svasukhecchayā|","yajante devatā yajñaiḥ pitṛbhūtapatīn khalāḥ|| 30"],"meaning":"यदि हिंसा और उसके फल मांस-भक्षणमें राग ही हो, उसका त्याग न किया जा सकता हो, तो यज्ञमें ही करे—यह परिसंख्या विधि है, स्वाभाविक प्रवृत्तिका संकोच है, सन्ध्यावन्दनादिके समान अपूर्व विधि नहीं है। इस प्रकार मेरे परोक्ष अभिप्रायको न जानकर विषयलोलुप पुरुष हिंसाका खिलवाड़ खेलते हैं और दुष्टतावश अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये वध किये हुए पशुओंके मांससे यज्ञ करके देवता, पितर तथा भूतपतियोंके यजनका ढोंग करते हैं॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"11.21.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/31/","page":843,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।","आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक्॥ ३१"],"iast":["svapnopamamamuṃ lokamasantaṃ śravaṇapriyam|","āśiṣo hṛdi saṃkalpya tyajantyarthān yathā vaṇik|| 31"],"meaning":"उद्धवजी! स्वर्गादि परलोक स्वप्नके दृश्योंके समान हैं, वास्तवमें वे असत् हैं, केवल उनकी बातें सुननेमें बहुत मीठी लगती हैं। सकाम पुरुष वहाँके भोगोंके लिये मन-ही-मन अनेकों प्रकारके संकल्प कर लेते हैं और जैसे व्यापारी अधिक लाभकी आशासे मूलधनको भी खो बैठता है, वैसे ही वे सकाम यज्ञोंद्वारा अपने धनका नाश करते हैं॥ ३१॥"},{"id":"11.21.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/32/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः।","उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम्॥ ३२"],"iast":["rajaḥsattvatamoniṣṭhā rajaḥsattvatamojuṣaḥ|","upāsata indramukhyān devādīn na tathaiva mām|| 32"],"meaning":"वे स्वयं रजोगुण, सत्त्वगुण या तमोगुणमें स्थित रहते हैं और रजोगुणी, सत्त्वगुणी अथवा तमोगुणी इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। वे उन्हीं सामग्रियोंसे उतने ही परिश्रमसे मेरी पूजा नहीं करते॥ ३२॥"},{"id":"11.21.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/33/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रंस्यामहे दिवि।","तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः॥ ३३"],"iast":["iṣṭveha devatā yajñairgatvā raṃsyāmahe divi|","tasyānta iha bhūyāsma mahāśālā mahākulāḥ|| 33"],"meaning":"वे जब इस प्रकारकी पुष्पिता वाणी—रंग-बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि ‘हमलोग इस लोकमें यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करके स्वर्गमें जायँगे और वहाँ दिव्य आनन्द भोगेंगे, उसके बाद जब फिर हमारा जन्म होगा, तब हम बड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब बहुत सुखी और बहुत बड़ा होगा’ तब उनका चित्त क्षुब्ध हो जाता है और उन हेकड़ी जतानेवाले घमंडियोंको मेरे सम्बन्धकी बातचीत भी अच्छी नहीं लगती॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"11.21.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/34/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।","मानिनां चातिस्तब्धानां मद्वार्तापि न रोचते॥ ३४"],"iast":["evaṃ puṣpitayā vācā vyākṣiptamanasāṃ nṛṇām|","mānināṃ cātistabdhānāṃ madvārtāpi na rocate|| 34"],"meaning":"वे जब इस प्रकारकी पुष्पिता वाणी—रंग-बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि ‘हमलोग इस लोकमें यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करके स्वर्गमें जायँगे और वहाँ दिव्य आनन्द भोगेंगे, उसके बाद जब फिर हमारा जन्म होगा, तब हम बड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब बहुत सुखी और बहुत बड़ा होगा’ तब उनका चित्त क्षुब्ध हो जाता है और उन हेकड़ी जतानेवाले घमंडियोंको मेरे सम्बन्धकी बातचीत भी अच्छी नहीं लगती॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"11.21.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/35/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।","परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम्॥ ३५"],"iast":["vedā brahmātmaviṣayāstrikāṇḍaviṣayā ime|","parokṣavādā ṛṣayaḥ parokṣaṃ mama ca priyam|| 35"],"meaning":"उद्धवजी! वेदोंमें तीन काण्ड हैं—कर्म, उपासना और ज्ञान। इन तीनों काण्डोंके द्वारा प्रतिपादित विषय है ब्रह्म और आत्माकी एकता, सभी मन्त्र और मन्त्रद्रष्टा ऋषि इस विषयको खोलकर नहीं, गुप्तभावसे बतलाते हैं और मुझे भी इस बातको गुप्तरूपसे कहना ही अभीष्ट है॥ ३५॥"},{"id":"11.21.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/36/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।","अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६"],"iast":["śabdabrahma sudurbodhaṃ prāṇendriyamanomayam|","anantapāraṃ gambhīraṃ durvigāhyaṃ samudravat|| 36"],"meaning":"वेदोंका नाम है शब्दब्रह्म। वे मेरी मूर्ति हैं, इसीसे उनका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन है। वह शब्दब्रह्म परा, पश्यन्ती और मध्यमा वाणीके रूपमें प्राण, मन और इन्द्रियमय है। समुद्रके समान सीमारहित और गहरा है। उसकी थाह लगाना अत्यन्त कठिन है। (इसीसे जैमिनि आदि बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके तात्पर्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाते)॥ ३६॥"},{"id":"11.21.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/37/","page":844,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मयोपबृंहितं भूम्‍ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।","भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७"],"iast":["mayopabṛṃhitaṃ bhūmnā brahmaṇānantaśaktinā|","bhūteṣu ghoṣarūpeṇa biseṣūrṇeva lakṣyate|| 37"],"meaning":"उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्‍न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥"},{"id":"11.21.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/38/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।","आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा॥ ३८"],"iast":["yathorṇanābhirhṛdayādūrṇāmudvamate mukhāt|","ākāśād ghoṣavān prāṇo manasā sparśarūpiṇā|| 38"],"meaning":"भगवान् हिरण्यगर्भ स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं। उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्दके द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है। जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है, वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णोंका संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारणके द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं। वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकारके द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श (‘क’ से लेकर ‘म’ तक-२५), स्वर ( ‘अ’ से ‘औ’ तक-९), ऊष्मा (श, ष, स, ह) और अन्तःस्थ (य, र, ल, व)—इन वर्णोंसे विभूषित है। उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोत्तर चार-चार वर्ण बढ़ते जाते हैं और उनके द्वारा विचित्र भाषाके रूपमें वह विस्तृत हुई है॥ ३८—४०॥","meaning_covers":[38,40]},{"id":"11.21.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/39/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।","ओंकाराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तःस्थभूषिताम्॥ ३९"],"iast":["chandomayo'mṛtamayaḥ sahasrapadavīṃ prabhuḥ|","oṃkārād vyañjitasparśasvaroṣmāntaḥsthabhūṣitām|| 39"],"meaning":"भगवान् हिरण्यगर्भ स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं। उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्दके द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है। जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है, वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णोंका संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारणके द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं। वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकारके द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श (‘क’ से लेकर ‘म’ तक-२५), स्वर ( ‘अ’ से ‘औ’ तक-९), ऊष्मा (श, ष, स, ह) और अन्तःस्थ (य, र, ल, व)—इन वर्णोंसे विभूषित है। उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोत्तर चार-चार वर्ण बढ़ते जाते हैं और उनके द्वारा विचित्र भाषाके रूपमें वह विस्तृत हुई है॥ ३८—४०॥","meaning_covers":[38,40]},{"id":"11.21.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/40/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्‍चतुरुत्तरैः।","अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४०"],"iast":["vicitrabhāṣāvitatāṃ chandobhiścaturuttaraiḥ|","anantapārāṃ bṛhatīṃ sṛjatyākṣipate svayam|| 40"],"meaning":"भगवान् हिरण्यगर्भ स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं। उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्दके द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है। जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है, वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णोंका संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारणके द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं। वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकारके द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श (‘क’ से लेकर ‘म’ तक-२५), स्वर ( ‘अ’ से ‘औ’ तक-९), ऊष्मा (श, ष, स, ह) और अन्तःस्थ (य, र, ल, व)—इन वर्णोंसे विभूषित है। उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोत्तर चार-चार वर्ण बढ़ते जाते हैं और उनके द्वारा विचित्र भाषाके रूपमें वह विस्तृत हुई है॥ ३८—४०॥","meaning_covers":[38,40]},{"id":"11.21.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/41/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।","त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद् विराट्॥ ४१"],"iast":["gāyatryuṣṇiganuṣṭup ca bṛhatī paṅktireva ca|","triṣṭubjagatyaticchando hyatyaṣṭyatijagad virāṭ|| 41"],"meaning":"(चार-चार अधिक वर्णोंवाले छन्दोंमेंसे कुछ ये हैं—) गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिच्छन्द, अत्यष्टि, अतिजगती और विराट्॥ ४१॥"},{"id":"11.21.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/42/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।","इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद् वेद कश्‍चन॥ ४२"],"iast":["kiṃ vidhatte kimācaṣṭe kimanūdya vikalpayet|","ityasyā hṛdayaṃ loke nānyo mad veda kaścana|| 42"],"meaning":"वह वेदवाणी कर्मकाण्डमें क्या विधान करती है, उपासनाकाण्डमें किन देवताओंका वर्णन करती है और ज्ञानकाण्डमें किन प्रतीतियोंका अनुवाद करके उनमें अनेकों प्रकारके विकल्प करती है—इन बातोंको इस सम्बन्धमें श्रुतिके रहस्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता॥ ४२॥"},{"id":"11.21.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/43/","page":845,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।","एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।","मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३"],"iast":["māṃ vidhatte'bhidhatte māṃ vikalpyāpohyate tvaham|","etāvān sarvavedārthaḥ śabda āsthāya māṃ bhidām|","māyāmātramanūdyānte pratiṣidhya prasīdati|| 43"],"meaning":"मैं तुम्हें स्पष्ट बतला देता हूँ, सभी श्रुतियाँ कर्मकाण्डमें मेरा ही विधान करती हैं, उपासनाकाण्डमें उपास्य देवताओंके रूपमें वे मेरा ही वर्णन करती हैं और ज्ञानकाण्डमें आकाशादिरूपसे मुझमें ही अन्य वस्तुओंका आरोप करके उनका निषेध कर देती हैं। सम्पूर्ण श्रुतियोंका बस, इतना ही तात्पर्य है कि वे मेरा आश्रय लेकर मुझमें भेदका आरोप करती हैं, मायामात्र कहकर उसका अनुवाद करती हैं और अन्तमें सबका निषेध करके मुझमें ही शान्त हो जाती हैं और केवल अधिष्ठानरूपसे मैं ही शेष रह जाता हूँ॥ ४३॥"}],"text":[{"b":40689,"kind":"adhyaya_heading","page":839,"text":"अथैकविंशोऽध्यायः"},{"b":40690,"kind":"topic_heading","page":839,"text":"गुण-दोष-व्यवस्थाका स्वरूप और रहस्य"},{"b":40691,"kind":"topic_heading","page":839,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40692,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.1"],"text":"य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्।"},{"b":40693,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.1"],"text":"क्षुद्रान् कामांश्‍चलैः प्राणैर्जुषन्तः संसरन्ति ते॥ १"},{"b":40694,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.2"],"text":"स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।"},{"b":40695,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.2"],"text":"विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्‍चयः॥ २"},{"b":40696,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.3"],"text":"शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।"},{"b":40697,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.3"],"text":"द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ॥ ३"},{"b":40698,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.4"],"text":"धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।"},{"b":40699,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.4"],"text":"दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम्॥ ४"},{"b":40700,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.5"],"text":"भूम्यम्ब्व‌ग्‍न्यनिलाकाशा भूतानां पंच धातवः।"},{"b":40701,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.5"],"text":"आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुताः॥ ५"},{"b":40702,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.6"],"text":"वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि।"},{"b":40703,"kind":"sanskrit_shloka","page":839,"verses":["11.21.6"],"text":"धातुषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये॥ ६"},{"b":40704,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.7"],"text":"देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।"},{"b":40705,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.7"],"text":"गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम्॥ ७"},{"b":40706,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.8"],"text":"अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत्।"},{"b":40707,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.8"],"text":"कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम्॥ ८"},{"b":40708,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.9"],"text":"कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।"},{"b":40709,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.9"],"text":"यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः॥ ९"},{"b":40710,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.10"],"text":"द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येण वचनेन च।"},{"b":40711,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.10"],"text":"संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा॥ १०"},{"b":40712,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.11"],"text":"शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।"},{"b":40713,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.11"],"text":"अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः॥ ११"},{"b":40714,"kind":"hindi_commentary","page":838,"explains":["11.21.1","11.21.2","11.21.3","11.21.4","11.21.5","11.21.6","11.21.7","11.21.8","11.21.9","11.21.10","11.21.11"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं—भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १॥ अपने-अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है। तात्पर्य यह कि गुण और दोष दोनोंकी व्यवस्था अधिकारके अनुसार की जाती है, किसी वस्तुके अनुसार नहीं॥ २॥ वस्तुओंके समान होनेपर भी शुद्धि-अशुद्धि, गुण-दोष और शुभ-अशुभ आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय यह है कि पदार्थका ठीक-ठीक निरीक्षण-परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उत्पन्‍न करके ही यह योग्य है कि अयोग्य, स्वाभाविक प्रवृत्तिको नियन्त्रित—संकुचित किया जा सके॥ ३॥ उनके द्वारा धर्म-सम्पादन कर सके, समाजका व्यवहार ठीक-ठीक चला सके और अपने व्यक्तिगत जीवनके निर्वाहमें भी सुविधा हो। इससे यह लाभ भी है कि मनुष्य अपनी वासनामूलक सहज प्रवृत्तियोंके द्वारा इनके जालमें न फँसकर शास्त्रानुसार अपने जीवनको नियन्त्रित और मनको वशीभूत कर लेता है। निष्पाप उद्धव! यह आचार मैंने ही मनु आदिका रूप धारण करके धर्मका भार ढोनेवाले कर्म जडोंके लिये उपदेश किया है॥ ४॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचभूत ही ब्रह्मासे लेकर पर्वत-वृक्षपर्यन्त सभी प्राणियोंके शरीरोंके मूलकारण हैं। इस तरह वे सब शरीरकी दृष्टिसे तो समान हैं ही, सबका आत्मा भी एक ही है॥ ५॥ प्रिय उद्धव! यद्यपि सबके शरीरोंके पंचभूत समान हैं, फिर भी वेदोंने इनके वर्णाश्रम आदि अलग-अलग नाम और रूप इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी वासना-मूलक प्रवृत्तियोंको संकुचित करके—नियन्त्रित करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको सिद्ध कर सकें॥ ६॥ साधुश्रेष्ठ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषोंका विधान भी मेरे द्वारा इसीलिये किया गया है कि कर्मोंमें लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्ति न हो, मर्यादाका भंग न होने पावे॥ ७॥ देशोंमें वह देश अपवित्र है, जिसमें कृष्णसार मृग न हों और जिसके निवासी ब्राह्मण-भक्त न हों। कृष्णसार मृगके होनेपर भी, केवल उन प्रदेशोंको छोड़कर जहाँ संत पुरुष रहते हैं, कीकट देश अपवित्र ही है। संस्काररहित और ऊसर आदि स्थान भी अपवित्र ही होते हैं॥ ८॥ समय वही पवित्र है, जिसमें कर्म करनेयोग्य सामग्री मिल सके तथा कर्म भी हो सके। जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न मिले, आगन्तुक दोषोंसे अथवा स्वाभाविक दोषके कारण जिसमें कर्म ही न हो सके, वह समय अशुद्ध है॥ ९॥ पदार्थोंकी शुद्धि और अशुद्धि द्रव्य, वचन, संस्कार, काल, महत्त्व अथवा अल्पत्वसे भी होती है। (जैसे कोई पात्र जलसे शुद्ध और मूत्रादिसे अशुद्ध हो जाता है। किसी वस्तुकी शुद्धि अथवा अशुद्धिमें शंका होनेपर ब्राह्मणोंके वचनसे वह शुद्ध हो जाती है अन्यथा अशुद्ध रहती है। पुष्पादि जल छिड़कनेसे शुद्ध और सूँघनेसे अशुद्ध माने जाते हैं। तत्कालका पकाया हुआ अन्‍न शुद्ध और बासी अशुद्ध माना जाता है। बड़े सरोवर और नदी आदिका जल शुद्ध और छोटे गड्ढोंका अशुद्ध माना जाता है। इस प्रकार क्रमसे समझ लेना चाहिये।)॥ १०॥ शक्ति, अशक्ति, बुद्धि और वैभवके अनुसार भी पवित्रता और अपवित्रताकी व्यवस्था होती है। उसमें भी स्थान और उपयोग करनेवालेकी आयुका विचार करते हुए ही अशुद्ध वस्तुओंके व्यवहारका दोष ठीक तरहसे आँका जाता है। (जैसे धनी-दरिद्र, बलवान्-निर्बल, बुद्धिमान्-मूर्ख, उपद्रवपूर्ण और सुखद देश तथा तरुण एवं वृद्धावस्थाके भेदसे शुद्धि और अशुद्धिकी व्यवस्थामें अन्तर पड़ जाता है।)॥ ११॥"},{"b":40715,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.12"],"text":"धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।"},{"b":40716,"kind":"sanskrit_shloka","page":840,"verses":["11.21.12"],"text":"कालवाय्वग्‍निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥ १२"},{"b":40717,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.13"],"text":"अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।"},{"b":40718,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.13"],"text":"भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते॥ १३"},{"b":40719,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.14"],"text":"स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।"},{"b":40720,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.14"],"text":"मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः॥ १४"},{"b":40721,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.15"],"text":"मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम्।"},{"b":40722,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.15"],"text":"धर्मः सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५"},{"b":40723,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.16"],"text":"क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।"},{"b":40724,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.16"],"text":"गुणदोषार्थनियमस्तद्भिदामेव बाधते॥ १६"},{"b":40725,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.17"],"text":"समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।"},{"b":40726,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.17"],"text":"औत्पत्तिको गुणः संगो न शयानः पतत्यधः॥ १७"},{"b":40727,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.18"],"text":"यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।"},{"b":40728,"kind":"sanskrit_shloka","page":841,"verses":["11.21.18"],"text":"एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥ १८"},{"b":40729,"kind":"hindi_commentary","page":840,"explains":["11.21.12","11.21.13","11.21.14","11.21.15","11.21.16","11.21.17","11.21.18"],"text":"अनाज, लकड़ी, हाथीदाँत आदि हड्डी, सूत, मधु, नमक, तेल, घी आदि रस, सोना-पारा आदि तैजस पदार्थ, चाम और घड़ा आदि मिट्टीके बने पदार्थ समयपर अपने-आप हवा लगनेसे, आगमें जलानेसे, मिट्टी लगानेसे अथवा जलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते हैं। देश, काल और अवस्थाके अनुसार कहीं जल-मिट्टी आदि शोधक सामग्रीके संयोगसे शुद्धि करनी पड़ती है तो कहीं-कहीं एक-एकसे भी शुद्धि हो जाती है॥ १२॥ यदि किसी वस्तुमें कोई अशुद्ध पदार्थ लग गया हो तो छीलनेसे या मिट्टी आदि मलनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध और लेप न रहे और वह वस्तु अपने पूर्वरूपमें आ जाय, तब उसको शुद्ध समझना चाहिये॥ १३॥ स्नान, दान, तपस्या, वय, सामर्थ्य, संस्कार, कर्म और मेरे स्मरणसे चित्तकी शुद्धि होती है। इनके द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको विहित कर्मोंका आचरण करना चाहिये॥ १४॥ गुरुमुखसे सुनकर भलीभाँति हृदयंगम कर लेनेसे मन्त्रकी और मुझे समर्पित कर देनेसे कर्मकी शुद्धि होती है। उद्धवजी! इस प्रकार देश, काल, पदार्थ, कर्ता, मन्त्र और कर्म—इन छहोंके शुद्ध होनेसे धर्म और अशुद्ध होनेसे अधर्म होता है॥ १५॥ कहीं-कहीं शास्त्रविधिसे गुण दोष हो जाता है और दोष गुण। (जैसे ब्राह्मणके लिये सन्ध्या-वन्दन, गायत्री-जप आदि गुण हैं; परन्तु शूद्रके लिये दोष हैं। और दूध आदिका व्यापार वैश्यके लिये विहित है; परन्तु ब्राह्मणके लिये अत्यन्त निषिद्ध है।) एक ही वस्तुके विषयमें किसीके लिये गुण और किसीके लिये दोषका विधान गुण और दोषोंकी वास्तविकताका खण्डन कर देता है और इससे यह निश्‍चय होता है कि गुण-दोषका यह भेद कल्पित है॥ १६॥ जो लोग पतित हैं, वे पतितोंका-सा आचरण करते हैं तो उन्हें पाप नहीं लगता, जब कि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये वह सर्वथा त्याज्य होता है। जैसे गृहस्थोंके लिये स्वाभाविक होनेके कारण अपनी पत्‍नीका संग पाप नहीं है; परन्तु संन्यासीके लिये घोर पाप है। उद्धवजी! बात तो यह है कि जो नीचे सोया हुआ है, वह गिरेगा कहाँ? वैसे ही जो पहलेसे ही पतित हैं, उनका अब और पतन क्या होगा?॥ १७॥ जिन-जिन दोषों और गुणोंसे मनुष्यका चित्त उपरत हो जाता है, उन्हीं वस्तुओंके बन्धनसे वह मुक्त हो जाता है। मनुष्योंके लिये यह निवृत्तिरूप धर्म ही परम कल्याणका साधन है; क्योंकि यही शोक, मोह और भयको मिटानेवाला है॥ १८॥"},{"b":40730,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.19"],"text":"विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः संगस्ततो भवेत्।"},{"b":40731,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.19"],"text":"संगात्तत्र भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम्॥ १९"},{"b":40732,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.20"],"text":"कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।"},{"b":40733,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.20"],"text":"तमसा ग्रस्यते पुंसश्‍चेतना व्यापिनी द्रुतम्॥ २०"},{"b":40734,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.21"],"text":"तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।"},{"b":40735,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.21"],"text":"ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१"},{"b":40736,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.22"],"text":"विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।"},{"b":40737,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.22"],"text":"वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्‍वसन्॥ २२"},{"b":40738,"kind":"hindi_commentary","page":841,"explains":["11.21.19","11.21.20","11.21.21","11.21.22"],"text":"उद्धवजी! विषयोंमें कहीं भी गुणोंका आरोप करनेसे उस वस्तुके प्रति आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होनेसे उसे अपने पास रखनेकी कामना हो जाती है और इस कामनाकी पूर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा पड़नेपर लोगोंमें परस्पर कलह होने लगता है॥ १९॥ कलहसे असह्य क्रोधकी उत्पत्ति होती है और क्रोधके समय अपने हित-अहितका बोध नहीं रहता, अज्ञान छा जाता है। इस अज्ञानसे शीघ्र ही मनुष्यकी कार्याकार्यका निर्णय करनेवाली व्यापक चेतनाशक्ति लुप्त हो जाती है॥ २०॥ साधो! चेतनाशक्ति अर्थात् स्मृतिके लुप्त हो जानेपर मनुष्यमें मनुष्यता नहीं रह जाती, पशुता आ जाती है और वह शून्यके समान अस्तित्वहीन हो जाता है। अब उसकी अवस्था वैसी ही हो जाती है, जैसे कोई मूर्च्छित या मुर्दा हो। ऐसी स्थितिमें न तो उसका स्वार्थ बनता है और न तो परमार्थ॥ २१॥ विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्‍वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥"},{"b":40739,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.23"],"text":"फलश्रुतिरियं नॄणां न श्रेयो रोचनं परम्।"},{"b":40740,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.23"],"text":"श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३"},{"b":40741,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.24"],"text":"उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।"},{"b":40742,"kind":"sanskrit_shloka","page":842,"verses":["11.21.24"],"text":"आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु॥ २४"},{"b":40743,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.25"],"text":"न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।"},{"b":40744,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.25"],"text":"कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः॥ २५"},{"b":40745,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.26"],"text":"एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।"},{"b":40746,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.26"],"text":"फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि॥ २६"},{"b":40747,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.27"],"text":"कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः।"},{"b":40748,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.27"],"text":"अग्‍निमुग्धा धूमतान्ताः स्वं लोकं न विदन्ति ते॥ २७"},{"b":40749,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.28"],"text":"न ते मामंग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।"},{"b":40750,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.28"],"text":"उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८"},{"b":40751,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.29"],"text":"ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।"},{"b":40752,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.29"],"text":"हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९"},{"b":40753,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.30"],"text":"हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।"},{"b":40754,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.30"],"text":"यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः॥ ३०"},{"b":40755,"kind":"hindi_translation","page":842,"explains":["11.21.23","11.21.24","11.21.25","11.21.26","11.21.27","11.21.28","11.21.29","11.21.30"],"text":"उद्धवजी! यह स्वर्गादिरूप फलका वर्णन करनेवाली श्रुति मनुष्योंके लिये उन-उन लोकोंको परम पुरुषार्थ नहीं बतलाती; परन्तु बहिर्मुख पुरुषोंके लिये अन्तःकरणशुद्धिके द्वारा परम कल्याणमय मोक्षकी विवक्षासे ही कर्मोंमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये वैसा वर्णन करती है। जैसे बच्चोंसे ओषधिमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये रोचक वाक्य कहे जाते हैं। (बेटा! प्रेमसे गिलोयका काढ़ा पी लो तो तुम्हारी चोटी बढ़ जायगी)॥ २३॥ इसमें सन्देह नहीं कि संसारके विषय-भोगोंमें, प्राणोंमें और सगे-सम्बन्धियोंमें सभी मनुष्य जन्मसे ही आसक्त हैं और उन वस्तुओंकी आसक्ति उनकी आत्मोन्‍नतिमें बाधक एवं अनर्थका कारण है॥ २४॥ वे अपने परम पुरुषार्थको नहीं जानते, इसलिये स्वर्गादिका जो वर्णन मिलता है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है—ऐसा विश्‍वास करके देवादि योनियोंमें भटकते रहते हैं और फिर वृक्ष आदि योनियोंके घोर अन्धकारमें आ पड़ते हैं। ऐसी अवस्थामें कोई भी विद्वान् अथवा वेद फिरसे उन्हें उन्हीं विषयोंमें क्यों प्रवृत्त करेगा?॥ २५॥ दुर्बुद्धिलोग (कर्मवादी) वेदोंका यह अभिप्राय न समझकर कर्मासक्तिवश पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंका वर्णन देखते हैं और उन्हींको परम फल मानकर भटक जाते हैं। परन्तु वेदवेत्ता लोग श्रुतियोंका ऐसा तात्पर्य नहीं बतलाते॥ २६॥ विषय-वासनाओंमें फँसे हुए दीन-हीन, लोभी पुरुष रंग-बिरंगे पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंको ही सब कुछ समझ बैठते हैं, अग्‍निके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञ-यागादि कर्मोंमें ही मुग्ध हो जाते हैं। उन्हें अन्तमें देवलोक, पितृलोक आदिकी ही प्राप्ति होती है। दूसरी ओर भटक जानेके कारण उन्हें अपने निजधाम आत्मपदका पता नहीं लगता॥ २७॥ प्यारे उद्धव! उनके पास साधना है तो केवल कर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी तृप्ति। उनकी आँखें धुँधली हो गयी हैं; इसीसे वे यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं इस जगत‍्के रूपमें है, वह परमात्मा मैं उनके हृदयमें ही हूँ॥ २८॥ यदि हिंसा और उसके फल मांस-भक्षणमें राग ही हो, उसका त्याग न किया जा सकता हो, तो यज्ञमें ही करे—यह परिसंख्या विधि है, स्वाभाविक प्रवृत्तिका संकोच है, सन्ध्यावन्दनादिके समान अपूर्व विधि नहीं है। इस प्रकार मेरे परोक्ष अभिप्रायको न जानकर विषयलोलुप पुरुष हिंसाका खिलवाड़ खेलते हैं और दुष्टतावश अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये वध किये हुए पशुओंके मांससे यज्ञ करके देवता, पितर तथा भूतपतियोंके यजनका ढोंग करते हैं॥ २९-३०॥"},{"b":40756,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.31"],"text":"स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।"},{"b":40757,"kind":"sanskrit_shloka","page":843,"verses":["11.21.31"],"text":"आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक्॥ ३१"},{"b":40758,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.32"],"text":"रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः।"},{"b":40759,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.32"],"text":"उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम्॥ ३२"},{"b":40760,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.33"],"text":"इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रंस्यामहे दिवि।"},{"b":40761,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.33"],"text":"तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः॥ ३३"},{"b":40762,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.34"],"text":"एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।"},{"b":40763,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.34"],"text":"मानिनां चातिस्तब्धानां मद्वार्तापि न रोचते॥ ३४"},{"b":40764,"kind":"hindi_translation","page":843,"explains":["11.21.31","11.21.32","11.21.33","11.21.34"],"text":"उद्धवजी! स्वर्गादि परलोक स्वप्नके दृश्योंके समान हैं, वास्तवमें वे असत् हैं, केवल उनकी बातें सुननेमें बहुत मीठी लगती हैं। सकाम पुरुष वहाँके भोगोंके लिये मन-ही-मन अनेकों प्रकारके संकल्प कर लेते हैं और जैसे व्यापारी अधिक लाभकी आशासे मूलधनको भी खो बैठता है, वैसे ही वे सकाम यज्ञोंद्वारा अपने धनका नाश करते हैं॥ ३१॥ वे स्वयं रजोगुण, सत्त्वगुण या तमोगुणमें स्थित रहते हैं और रजोगुणी, सत्त्वगुणी अथवा तमोगुणी इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। वे उन्हीं सामग्रियोंसे उतने ही परिश्रमसे मेरी पूजा नहीं करते॥ ३२॥ वे जब इस प्रकारकी पुष्पिता वाणी—रंग-बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि ‘हमलोग इस लोकमें यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करके स्वर्गमें जायँगे और वहाँ दिव्य आनन्द भोगेंगे, उसके बाद जब फिर हमारा जन्म होगा, तब हम बड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब बहुत सुखी और बहुत बड़ा होगा’ तब उनका चित्त क्षुब्ध हो जाता है और उन हेकड़ी जतानेवाले घमंडियोंको मेरे सम्बन्धकी बातचीत भी अच्छी नहीं लगती॥ ३३-३४॥"},{"b":40765,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.35"],"text":"वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।"},{"b":40766,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.35"],"text":"परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम्॥ ३५"},{"b":40767,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.36"],"text":"शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।"},{"b":40768,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.36"],"text":"अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६"},{"b":40769,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.37"],"text":"मयोपबृंहितं भूम्‍ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।"},{"b":40770,"kind":"sanskrit_shloka","page":844,"verses":["11.21.37"],"text":"भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७"},{"b":40771,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.38"],"text":"यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।"},{"b":40772,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.38"],"text":"आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा॥ ३८"},{"b":40773,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.39"],"text":"छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।"},{"b":40774,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.39"],"text":"ओंकाराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तःस्थभूषिताम्॥ ३९"},{"b":40775,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.40"],"text":"विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्‍चतुरुत्तरैः।"},{"b":40776,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.40"],"text":"अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४०"},{"b":40777,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.41"],"text":"गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।"},{"b":40778,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.41"],"text":"त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद् विराट्॥ ४१"},{"b":40779,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.42"],"text":"किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।"},{"b":40780,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.42"],"text":"इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद् वेद कश्‍चन॥ ४२"},{"b":40781,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.43"],"text":"मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।"},{"b":40782,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.43"],"text":"एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।"},{"b":40783,"kind":"sanskrit_shloka","page":845,"verses":["11.21.43"],"text":"मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३"},{"b":40784,"kind":"hindi_translation","page":844,"explains":["11.21.35","11.21.36","11.21.37","11.21.38","11.21.39","11.21.40","11.21.41","11.21.42","11.21.43"],"text":"उद्धवजी! वेदोंमें तीन काण्ड हैं—कर्म, उपासना और ज्ञान। इन तीनों काण्डोंके द्वारा प्रतिपादित विषय है ब्रह्म और आत्माकी एकता, सभी मन्त्र और मन्त्रद्रष्टा ऋषि इस विषयको खोलकर नहीं, गुप्तभावसे बतलाते हैं और मुझे भी इस बातको गुप्तरूपसे कहना ही अभीष्ट है॥ ३५॥ वेदोंका नाम है शब्दब्रह्म। वे मेरी मूर्ति हैं, इसीसे उनका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन है। वह शब्दब्रह्म परा, पश्यन्ती और मध्यमा वाणीके रूपमें प्राण, मन और इन्द्रियमय है। समुद्रके समान सीमारहित और गहरा है। उसकी थाह लगाना अत्यन्त कठिन है। (इसीसे जैमिनि आदि बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके तात्पर्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाते)॥ ३६॥ उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्‍न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥ भगवान् हिरण्यगर्भ स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं। उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्दके द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है। जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है, वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णोंका संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारणके द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं। वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकारके द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श (‘क’ से लेकर ‘म’ तक-२५), स्वर ( ‘अ’ से ‘औ’ तक-९), ऊष्मा (श, ष, स, ह) और अन्तःस्थ (य, र, ल, व)—इन वर्णोंसे विभूषित है। उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोत्तर चार-चार वर्ण बढ़ते जाते हैं और उनके द्वारा विचित्र भाषाके रूपमें वह विस्तृत हुई है॥ ३८—४०॥ (चार-चार अधिक वर्णोंवाले छन्दोंमेंसे कुछ ये हैं—) गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिच्छन्द, अत्यष्टि, अतिजगती और विराट्॥ ४१॥ वह वेदवाणी कर्मकाण्डमें क्या विधान करती है, उपासनाकाण्डमें किन देवताओंका वर्णन करती है और ज्ञानकाण्डमें किन प्रतीतियोंका अनुवाद करके उनमें अनेकों प्रकारके विकल्प करती है—इन बातोंको इस सम्बन्धमें श्रुतिके रहस्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता॥ ४२॥ मैं तुम्हें स्पष्ट बतला देता हूँ, सभी श्रुतियाँ कर्मकाण्डमें मेरा ही विधान करती हैं, उपासनाकाण्डमें उपास्य देवताओंके रूपमें वे मेरा ही वर्णन करती हैं और ज्ञानकाण्डमें आकाशादिरूपसे मुझमें ही अन्य वस्तुओंका आरोप करके उनका निषेध कर देती हैं। सम्पूर्ण श्रुतियोंका बस, इतना ही तात्पर्य है कि वे मेरा आश्रय लेकर मुझमें भेदका आरोप करती हैं, मायामात्र कहकर उसका अनुवाद करती हैं और अन्तमें सबका निषेध करके मुझमें ही शान्त हो जाती हैं और केवल अधिष्ठानरूपसे मैं ही शेष रह जाता हूँ॥ ४३॥"},{"b":40785,"kind":"hindi_commentary","page":845,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः"},{"b":40786,"kind":"hindi_translation","page":845,"text":"॥ २१॥"}],"notes":[{"id":"v2:418","mark":"*","page":844,"after_verse":"11.21.43","text":"क्योंकि सब लोग इसके अधिकारी नहीं हैं, अन्तःकरण शुद्ध होनेपर ही यह बात समझमें आती है।"}],"corrections":{"count":10,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}