{"id":"11.22","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 22","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ द्वाविंशोऽध्यायः","topics":["तत्त्वोंकी संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[846,854]},"verses":[{"id":"11.22.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/1/","page":846,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["कति तत्त्वानि विश्‍वेश संख्यातान्यृषिभिः प्रभो।","नवैकादश पंच त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम॥ १"],"iast":["kati tattvāni viśveśa saṃkhyātānyṛṣibhiḥ prabho|","navaikādaśa paṃca trīṇyāttha tvamiha śuśruma|| 1"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—प्रभो! विश्‍वेश्‍वर! ऋषियोंने तत्त्वोंकी संख्या कितनी बतलायी है? आपने तो अभी (उन्‍नीसवें अध्यायमें) नौ, ग्यारह, पाँच और तीन अर्थात् कुल अट्ठाईस तत्त्व गिनाये हैं। यह तो हम सुन चुके हैं॥ १॥"},{"id":"11.22.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/2/","page":846,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["केचित् षड्विंशतिं प्राहुरपरे पंचविंशतिम्।","सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे॥ २"],"iast":["kecit ṣaḍviṃśatiṃ prāhurapare paṃcaviṃśatim|","saptaike nava ṣaṭ keciccatvāryekādaśāpare|| 2"],"meaning":"किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥"},{"id":"11.22.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/3/","page":846,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश।","एतावत्त्वं हि संख्यानामृषयो यद्विवक्षया।","गायन्ति पृथगायुष्मन्‍निदं नो वक्तुमर्हसि॥ ३"],"iast":["kecit saptadaśa prāhuḥ ṣoḍaśaike trayodaśa|","etāvattvaṃ hi saṃkhyānāmṛṣayo yadvivakṣayā|","gāyanti pṛthagāyuṣmannidaṃ no vaktumarhasi|| 3"],"meaning":"इसी प्रकार किन्हीं-किन्हीं ऋषि-मुनियोंके मतमें उनकी संख्या सत्रह है, कोई सोलह और कोई तेरह बतलाते हैं। सनातन श्रीकृष्ण! ऋषि-मुनि इतनी भिन्‍न संख्याएँ किस अभिप्रायसे बतलाते हैं? आप कृपा करके हमें बतलाइये ॥ ३॥"},{"id":"11.22.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/4/","page":846,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।","मायां मदीयामुद‍्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥ ४"],"iast":["yuktaṃ ca santi sarvatra bhāṣante brāhmaṇā yathā|","māyāṃ madīyāmudgṛhya vadatāṃ kiṃ nu durghaṭam|| 4"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! वेदज्ञ ब्राह्मण इस विषयमें जो कुछ कहते हैं, वह सभी ठीक है; क्योंकि सभी तत्त्व सबमें अन्तर्भूत हैं। मेरी मायाको स्वीकार करके क्या कहना असम्भव है?॥ ४॥"},{"id":"11.22.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/5/","page":846,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।","एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्ययाः॥ ५"],"iast":["naitadevaṃ yathā''ttha tvaṃ yadahaṃ vacmi tattathā|","evaṃ vivadatāṃ hetuṃ śaktayo me duratyayāḥ|| 5"],"meaning":"‘जैसा तुम कहते हो, वह ठीक नहीं है, जो मैं कहता हूँ, वही यथार्थ है’—इस प्रकार जगत‍्के कारणके सम्बन्धमें विवाद इसलिये होता है कि मेरी शक्तियों—सत्त्व, रज आदि गुणों और उनकी वृत्तियोंका रहस्य लोग समझ नहीं पाते; इसलिये वे अपनी-अपनी मनोवृत्तिपर ही आग्रह कर बैठते हैं॥ ५॥"},{"id":"11.22.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/6/","page":846,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम्।","प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनुशाम्यति॥ ६"],"iast":["yāsāṃ vyatikarādāsīd vikalpo vadatāṃ padam|","prāpte śamadame'pyeti vādastamanuśāmyati|| 6"],"meaning":"सत्त्व आदि गुणोंके क्षोभसे ही यह विविध कल्पनारूप प्रपंच—जो वस्तु नहीं केवल नाम है—उठ खड़ा हुआ है। यही वाद-विवाद करनेवालोंके विवादका विषय है। जब इन्द्रियाँ अपने वशमें हो जाती हैं तथा चित्त शान्त हो जाता है, तब यह प्रपंच भी निवृत्त हो जाता है और इसकी निवृत्तिके साथ ही सारे वाद-विवाद भी मिट जाते हैं॥ ६॥"},{"id":"11.22.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/7/","page":846,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।","पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम्॥ ७"],"iast":["parasparānupraveśāt tattvānāṃ puruṣarṣabha|","paurvāparyaprasaṃkhyānaṃ yathā vakturvivakṣitam|| 7"],"meaning":"पुरुषशिरोमणे! तत्त्वोंका एक-दूसरेमें अनुप्रवेश है, इसलिये वक्ता तत्त्वोंकी जितनी संख्या बतलाना चाहता है, उसके अनुसार कारणको कार्यमें अथवा कार्यको कारणमें मिलाकर अपनी इच्छित संख्या सिद्ध कर लेता है॥ ७॥"},{"id":"11.22.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/8/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एकस्मिन्‍नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च।","पूर्वस्मिन् वा परस्मिन् वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वशः॥ ८"],"iast":["ekasminnapi dṛśyante praviṣṭānītarāṇi ca|","pūrvasmin vā parasmin vā tattve tattvāni sarvaśaḥ|| 8"],"meaning":"ऐसा देखा जाता है कि एक ही तत्त्वमें बहुत-से दूसरे तत्त्वोंका अन्तर्भाव हो गया है। इसका कोई बन्धन नहीं है कि किसका किसमें अन्तर्भाव हो। कभी घट-पट आदि कार्य वस्तुओंका उनके कारण मिट्टी-सूत आदिमें, तो कभी मिट्टी-सूत आदिका घट-पट आदि कार्योंमें अन्तर्भाव हो जाता है॥ ८॥"},{"id":"11.22.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/9/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पौर्वापर्यमतोऽमीषां प्रसंख्यानमभीप्सताम्।","यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात्॥ ९"],"iast":["paurvāparyamato'mīṣāṃ prasaṃkhyānamabhīpsatām|","yathā viviktaṃ yadvaktraṃ gṛhṇīmo yuktisambhavāt|| 9"],"meaning":"इसलिये वादी-प्रतिवादियोंमेंसे जिसकी वाणीने जिस कार्यको जिस कारणमें अथवा जिस कारणको जिस कार्यमें अन्तर्भूत करके तत्त्वोंकी जितनी संख्या स्वीकार की है, वह हम निश्‍चय ही स्वीकार करते हैं; क्योंकि उनका वह उपपादन युक्तिसंगत ही है॥ ९॥"},{"id":"11.22.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/10/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।","स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०"],"iast":["anādyavidyāyuktasya puruṣasyātmavedanam|","svato na sambhavādanyastattvajño jñānado bhavet|| 10"],"meaning":"उद्धवजी! जिन लोगोंने छब्बीस संख्या स्वीकार की है, वे ऐसा कहते हैं कि जीव अनादि कालसे अविद्यासे ग्रस्त हो रहा है। वह स्वयं अपने-आपको नहीं जान सकता। उसे आत्मज्ञान करानेके लिये किसी अन्य सर्वज्ञकी आवश्यकता है। (इसलिये प्रकृतिके कार्यकारणरूप चौबीस तत्त्व, पचीसवाँ पुरुष और छब्बीसवाँ ईश्‍वर—इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व स्वीकार करने चाहिये)॥ १०॥"},{"id":"11.22.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/11/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुरुषेश्‍वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि।","तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः॥ ११"],"iast":["puruṣeśvarayoratra na vailakṣaṇyamaṇvapi|","tadanyakalpanāpārthā jñānaṃ ca prakṛterguṇaḥ|| 11"],"meaning":"पचीस तत्त्व माननेवाले कहते हैं कि इस शरीरमें जीव और ईश्‍वरका अणुमात्र भी अन्तर या भेद नहीं है, इसलिये उनमें भेदकी कल्पना व्यर्थ है। रही ज्ञानकी बात, सो तो सत्त्वात्मिका प्रकृतिका गुण है॥ ११॥"},{"id":"11.22.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/12/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।","सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः॥ १२"],"iast":["prakṛtirguṇasāmyaṃ vai prakṛternātmano guṇāḥ|","sattvaṃ rajastama iti sthityutpattyantahetavaḥ|| 12"],"meaning":"तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है; इसलिये सत्त्व, रज आदि गुण आत्माके नहीं, प्रकृतिके ही हैं। इन्हींके द्वारा जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय हुआ करते हैं। इसलिये ज्ञान आत्माका गुण नहीं, प्रकृतिका ही गुण सिद्ध होता है॥ १२॥"},{"id":"11.22.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/13/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते।","गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च॥ १३"],"iast":["sattvaṃ jñānaṃ rajaḥ karma tamo'jñānamihocyate|","guṇavyatikaraḥ kālaḥ svabhāvaḥ sūtrameva ca|| 13"],"meaning":"इस प्रसंगमें सत्त्वगुण ही ज्ञान है, रजोगुण ही कर्म है और तमोगुण ही अज्ञान कहा गया है। और गुणोंमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला ईश्‍वर ही काल है और सूत्र अर्थात् महत्तत्त्व ही स्वभाव है। (इसलिये पचीस और छब्बीस तत्त्वोंकी—दोनों ही संख्या युक्तिसंगत है)॥ १३॥"},{"id":"11.22.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/14/","page":847,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहंकारो नभोऽनिलः।","ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४"],"iast":["puruṣaḥ prakṛtirvyaktamahaṃkāro nabho'nilaḥ|","jyotirāpaḥ kṣitiriti tattvānyuktāni me nava|| 14"],"meaning":"उद्धवजी! (यदि तीनों गुणोंको प्रकृतिसे अलग मान लिया जाय, जैसा कि उनकी उत्पत्ति और प्रलयको देखते हुए मानना चाहिये, तो तत्त्वोंकी संख्या स्वयं ही अट्ठाईस हो जाती है। उन तीनोंके अतिरिक्त पचीस ये हैं—) पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये नौ तत्त्व मैं पहले ही गिना चुका हूँ॥ १४॥"},{"id":"11.22.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/15/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्रोत्रं त्वग्दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः।","वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्‌घ्रिकर्माण्यंगोभयं मनः॥ १५"],"iast":["śrotraṃ tvagdarśanaṃ ghrāṇo jihveti jñānaśaktayaḥ|","vākpāṇyupasthapāyvaṅghrikarmāṇyaṃgobhayaṃ manaḥ|| 15"],"meaning":"श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, नासिका और रसना—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ; तथा मन, जो कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दोनों ही हैं। इस प्रकार कुल ग्यारह इन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय। इस प्रकार तीन, नौ, ग्यारह और पाँच—सब मिलाकर अट्ठाईस तत्त्व होते हैं। कर्मेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले पाँच कर्म—चलना, बोलना, मल त्यागना, पेशाब करना और काम करना—इनके द्वारा तत्त्वोंकी संख्या नहीं बढ़ती। इन्हें कर्मेन्द्रियस्वरूप ही मानना चाहिये॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"11.22.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/16/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः।","गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः॥ १६"],"iast":["śabdaḥ sparśo raso gandho rūpaṃ cetyarthajātayaḥ|","gatyuktyutsargaśilpāni karmāyatanasiddhayaḥ|| 16"],"meaning":"श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, नासिका और रसना—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ; तथा मन, जो कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दोनों ही हैं। इस प्रकार कुल ग्यारह इन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय। इस प्रकार तीन, नौ, ग्यारह और पाँच—सब मिलाकर अट्ठाईस तत्त्व होते हैं। कर्मेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले पाँच कर्म—चलना, बोलना, मल त्यागना, पेशाब करना और काम करना—इनके द्वारा तत्त्वोंकी संख्या नहीं बढ़ती। इन्हें कर्मेन्द्रियस्वरूप ही मानना चाहिये॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"11.22.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/17/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी।","सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते॥ १७"],"iast":["sargādau prakṛtirhyasya kāryakāraṇarūpiṇī|","sattvādibhirguṇairdhatte puruṣo'vyakta īkṣate|| 17"],"meaning":"सृष्टिके आरम्भमें कार्य (ग्यारह इन्द्रिय और पंचभूत) और कारण (महत्तत्त्व आदि) के रूपमें प्रकृति ही रहती है। वही सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी सहायतासे जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारसम्बन्धी अवस्थाएँ धारण करती है। अव्यक्त पुरुष तो प्रकृति और उसकी अवस्थाओंका केवल साक्षीमात्र बना रहता है॥ १७॥"},{"id":"11.22.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/18/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया।","लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात्॥ १८"],"iast":["vyaktādayo vikurvāṇā dhātavaḥ puruṣekṣayā|","labdhavīryāḥ sṛjantyaṇḍaṃ saṃhatāḥ prakṛterbalāt|| 18"],"meaning":"महत्तत्त्व आदि कारण धातुएँ विकारको प्राप्त होते हुए पुरुषके ईक्षणसे शक्ति प्राप्त करके परस्पर मिल जाते हैं और प्रकृतिका आश्रय लेकर उसीके बलसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं॥ १८॥"},{"id":"11.22.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/19/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सप्तैव धातव इति तत्रार्थाः पंच खादयः।","ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः॥ १९"],"iast":["saptaiva dhātava iti tatrārthāḥ paṃca khādayaḥ|","jñānamātmobhayādhārastato dehendriyāsavaḥ|| 19"],"meaning":"उद्धवजी! जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सात स्वीकार करते हैं, उनके विचारसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच भूत, छठा जीव और सातवाँ परमात्मा—जो साक्षी जीव और साक्ष्य जगत् दोनोंका अधिष्ठान है—ये ही तत्त्व हैं। देह, इन्द्रिय और प्राणादिकी उत्पत्ति तो पंचभूतोंसे ही हुई है [इसलिये वे इन्हें अलग नहीं गिनते]॥ १९॥"},{"id":"11.22.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/20/","page":848,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["षडित्यत्रापि भूतानि पंच षष्ठः परः पुमान्।","तैर्युक्त आत्मसम्भूतैः सृष्ट्वेदं समुपाविशत्॥ २०"],"iast":["ṣaḍityatrāpi bhūtāni paṃca ṣaṣṭhaḥ paraḥ pumān|","tairyukta ātmasambhūtaiḥ sṛṣṭvedaṃ samupāviśat|| 20"],"meaning":"जो लोग केवल छः तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि पाँच भूत हैं और छठा है परमपुरुष परमात्मा। वह परमात्मा अपने बनाये हुए पंचभूतोंसे युक्त होकर देह आदिकी सृष्टि करता है और उनमें जीवरूपसे प्रवेश करता है (इस मतके अनुसार जीवका परमात्मामें और शरीर आदिका पंचभूतोंमें समावेश हो जाता है)॥ २०॥"},{"id":"11.22.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/21/","page":849,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्‍नमात्मनः।","जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु॥ २१"],"iast":["catvāryeveti tatrāpi teja āpo'nnamātmanaḥ|","jātāni tairidaṃ jātaṃ janmāvayavinaḥ khalu|| 21"],"meaning":"जो लोग कारणके रूपमें चार ही तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि आत्मासे तेज, जल और पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है और जगत‍्में जितने पदार्थ हैं, सब इन्हींसे उत्पन्‍न होते हैं। वे सभी कार्योंका इन्हींमें समावेश कर लेते हैं॥ २१॥"},{"id":"11.22.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/22/","page":849,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।","पंच पंचैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः॥ २२"],"iast":["saṃkhyāne saptadaśake bhūtamātrendriyāṇi ca|","paṃca paṃcaikamanasā ātmā saptadaśaḥ smṛtaḥ|| 22"],"meaning":"जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सत्रह बतलाते हैं, वे इस प्रकार गणना करते हैं—पाँच भूत, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, एक मन और एक आत्मा॥ २२॥"},{"id":"11.22.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/23/","page":849,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।","भूतेन्द्रियाणि पंचैव मन आत्मा त्रयोदश॥ २३"],"iast":["tadvat ṣoḍaśasaṃkhyāne ātmaiva mana ucyate|","bhūtendriyāṇi paṃcaiva mana ātmā trayodaśa|| 23"],"meaning":"जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सोलह बतलाते हैं, उनकी गणना भी इसी प्रकार है। अन्तर केवल इतना ही है कि वे आत्मामें मनका भी समावेश कर लेते हैं और इस प्रकार उनकी तत्त्वसंख्या सोलह रह जाती है। जो लोग तेरह तत्त्व मानते हैं, वे कहते हैं कि आकाशादि पाँच भूत, श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, एक मन, एक जीवात्मा और परमात्मा—ये तेरह तत्त्व हैं॥ २३॥"},{"id":"11.22.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/24/","page":849,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।","अष्टौ प्रकृतयश्‍चैव पुरुषश्‍च नवेत्यथ॥ २४"],"iast":["ekādaśatva ātmāsau mahābhūtendriyāṇi ca|","aṣṭau prakṛtayaścaiva puruṣaśca navetyatha|| 24"],"meaning":"ग्यारह संख्या माननेवालोंने पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और इनके अतिरिक्त एक आत्माका अस्तित्व स्वीकार किया है। जो लोग नौ तत्त्व मानते हैं, वे आकाशादि पाँच भूत और मन, बुद्धि, अहंकार—ये आठ प्रकृतियाँ और नवाँ पुरुष—इन्हींको तत्त्व मानते हैं॥ २४॥"},{"id":"11.22.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/25/","page":849,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानामृषिभिः कृतम्।","सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५"],"iast":["iti nānāprasaṃkhyānaṃ tattvānāmṛṣibhiḥ kṛtam|","sarvaṃ nyāyyaṃ yuktimattvād viduṣāṃ kimaśobhanam|| 25"],"meaning":"उद्धवजी! इस प्रकार ऋषि-मुनियोंने भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे तत्त्वोंकी गणना की है। सबका कहना उचित ही है, क्योंकि सबकी संख्या युक्तियुक्त है। जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं, उन्हें किसी भी मतमें बुराई नहीं दीखती। उनके लिये तो सब कुछ ठीक ही है॥ २५॥"},{"id":"11.22.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/26/","page":849,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["प्रकृतिः पुरुषश्‍चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।","अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः॥ २६"],"iast":["prakṛtiḥ puruṣaścobhau yadyapyātmavilakṣaṇau|","anyonyāpāśrayāt kṛṣṇa dṛśyate na bhidā tayoḥ|| 26"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—श्यामसुन्दर! यद्यपि स्वरूपतः प्रकृति और पुरुष—दोनों एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्‍न हैं, तथापि वे आपसमें इतने घुल-मिल गये हैं कि साधारणतः उनका भेद नहीं जान पड़ता। प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृति अभिन्‍न-से प्रतीत होते हैं। इनकी भिन्‍नता स्पष्ट कैसे हो?॥ २६॥"},{"id":"11.22.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/27/","page":849,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्‍च तथाऽऽत्मनि।","एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।","छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः॥ २७"],"iast":["prakṛtau lakṣyate hyātmā prakṛtiśca tathā''tmani|","evaṃ me puṇḍarīkākṣa mahāntaṃ saṃśayaṃ hṛdi|","chettumarhasi sarvajña vacobhirnayanaipuṇaiḥ|| 27"],"meaning":"कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे हृदयमें इनकी भिन्नता और अभिन्नताको लेकर बहुत बड़ा सन्देह है। आप तो सर्वज्ञ हैं, अपनी युक्तियुक्त वाणीसे मेरे सन्देहका निवारण कर दीजिये ॥ २७॥"},{"id":"11.22.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/28/","page":850,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः।","त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः॥ २८"],"iast":["tvatto jñānaṃ hi jīvānāṃ pramoṣaste'tra śaktitaḥ|","tvameva hyātmamāyāyā gatiṃ vettha na cāparaḥ|| 28"],"meaning":"भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥"},{"id":"11.22.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/29/","page":850,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रकृतिः पुरुषश्‍चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।","एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः॥ २९"],"iast":["prakṛtiḥ puruṣaśceti vikalpaḥ puruṣarṣabha|","eṣa vaikārikaḥ sargo guṇavyatikarātmakaḥ|| 29"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा—इन दोनोंमें अत्यन्त भेद है। इस प्राकृत जगत‍्में जन्म-मरण एवं वृद्धि-ह्रास आदि विकार लगे ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि यह गुणोंके क्षोभसे ही बना है॥ २९॥"},{"id":"11.22.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/30/","page":850,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा","विकल्पबुद्धीश्‍च गुणैर्विधत्ते।","वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेक-","मथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३०"],"iast":["mamāṅga māyā guṇamayyanekadhā","vikalpabuddhīśca guṇairvidhatte|","vaikārikastrividho'dhyātmameka-","mathādhidaivamadhibhūtamanyat || 30"],"meaning":"प्रिय मित्र! मेरी माया त्रिगुणात्मिका है। वही अपने सत्त्व, रज आदि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेदवृत्तियाँ पैदा कर देती है। यद्यपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस विकारात्मक सृष्टिको तीन भागोंमें बाँट सकते हैं। वे तीन भाग हैं—अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत॥ ३०॥"},{"id":"11.22.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/31/","page":850,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दृग् रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे","परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।","आत्मा यदेषामपरो य आद्यः","स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ।","एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु-","र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्॥ ३१"],"iast":["dṛg rūpamārkaṃ vapuratra randhre","parasparaṃ sidhyati yaḥ svataḥ khe|","ātmā yadeṣāmaparo ya ādyaḥ","svayānubhūtyākhilasiddhasiddhiḥ |","evaṃ tvagādi śravaṇādi cakṣu-","rjihvādi nāsādi ca cittayuktam|| 31"],"meaning":"उदाहरणार्थ—नेत्रेन्द्रिय अध्यात्म है, उसका विषय रूप अधिभूत है और नेत्र-गोलकमें स्थित सूर्यदेवताका अंश अधिदैव है। ये तीनों परस्पर एक-दूसरेके आश्रयसे सिद्ध होते हैं। और इसलिये अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत—ये तीनों ही परस्पर सापेक्ष हैं। परन्तु आकाशमें स्थित सूर्यमण्डल इन तीनोंकी अपेक्षासे मुक्त है, क्योंकि वह स्वतःसिद्ध है। इसी प्रकार आत्मा भी उपर्युक्त तीनों भेदोंका मूलकारण, उनका साक्षी और उनसे परे है। वही अपने स्वयंसिद्ध प्रकाशसे समस्त सिद्ध पदार्थोंकी मूलसिद्धि है। उसीके द्वारा सबका प्रकाश होता है। जिस प्रकार चक्षुके तीन भेद बताये गये, उसी प्रकार त्वचा, श्रोत्र, जिह्वा, नासिका और चित्त आदिके भी तीन-तीन भेद हैं॥ ३१॥"},{"id":"11.22.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/32/","page":850,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः","प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः।","अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु-","र्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्‍च॥ ३२"],"iast":["yo'sau guṇakṣobhakṛto vikāraḥ","pradhānamūlānmahataḥ prasūtaḥ|","ahaṃ trivṛnmohavikalpahetu-","rvaikārikastāmasa aindriyaśca|| 32"],"meaning":"प्रकृतिसे महत्तत्त्व बनता है और महत्तत्त्वसे अहंकार। इस प्रकार यह अहंकार गुणोंके क्षोभसे उत्पन्‍न हुआ प्रकृतिका ही एक विकार है। अहंकारके तीन भेद हैं—सात्त्विक, तामस और राजस। यह अहंकार ही अज्ञान और सृष्टिकी विविधताका मूलकारण है॥ ३२॥"},{"id":"11.22.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/33/","page":851,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मा परिज्ञानमयो विवादो","ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।","व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां","मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३"],"iast":["ātmā parijñānamayo vivādo","hyastīti nāstīti bhidārthaniṣṭhaḥ|","vyartho'pi naivoparameta puṃsāṃ","mattaḥ parāvṛttadhiyāṃ svalokāt|| 33"],"meaning":"आत्मा ज्ञानस्वरूप है; उसका इन पदार्थोंसे न तो कोई सम्बन्ध है और न उसमें कोई विवादकी ही बात है! अस्ति-नास्ति (है-नहीं), सगुण-निर्गुण, भाव-अभाव, सत्य-मिथ्या आदि रूपसे जितने भी वाद-विवाद हैं, सबका मूलकारण भेददृष्टि ही है। इसमें सन्देह नहीं कि इस विवादका कोई प्रयोजन नहीं है; यह सर्वथा व्यर्थ है तथापि जो लोग मुझसे—अपने वास्तविक स्वरूपसे विमुख हैं, वे इस विवादसे मुक्त नहीं हो सकते॥ ३३॥"},{"id":"11.22.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/34/","page":851,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।","उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च॥ ३४"],"iast":["tvattaḥ parāvṛttadhiyaḥ svakṛtaiḥ karmabhiḥ prabho|","uccāvacān yathā dehān gṛhṇanti visṛjanti ca|| 34"],"meaning":"उद्धवजीने पूछा—भगवन्! आपसे विमुख जीव अपने किये हुए पुण्य-पापोंके फलस्वरूप ऊँची-नीची योनियोंमें जाते-आते रहते हैं। अब प्रश्‍न यह है कि व्यापक आत्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाना, अकर्ताका कर्म करना और नित्य-वस्तुका जन्म-मरण कैसे सम्भव है?॥ ३४॥"},{"id":"11.22.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/35/","page":851,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः।","न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वंचिताः॥ ३५"],"iast":["tanmamākhyāhi govinda durvibhāvyamanātmabhiḥ|","na hyetat prāyaśo loke vidvāṃsaḥ santi vaṃcitāḥ|| 35"],"meaning":"गोविन्द! जो लोग आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे तो इस विषयको ठीक-ठीक सोच भी नहीं सकते। और इस विषयके विद्वान् संसारमें प्रायः मिलते नहीं, क्योंकि सभी लोग आपकी मायाकी भूल-भुलैयामें पड़े हुए हैं। इसलिये आप ही कृपा करके मुझे इसका रहस्य समझाइये॥ ३५॥"},{"id":"11.22.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/36/","page":851,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मनः कर्ममयं नॄणामिन्द्रियैः पंचभिर्युतम्।","लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते॥ ३६"],"iast":["manaḥ karmamayaṃ nṝṇāmindriyaiḥ paṃcabhiryutam|","lokāllokaṃ prayātyanya ātmā tadanuvartate|| 36"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मनुष्योंका मन कर्म-संस्कारोंका पुंज है। उन संस्कारोंके अनुसार भोग प्राप्त करनेके लिये उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई हैं। इसीका नाम है लिंगशरीर। वही कर्मोंके अनुसार एक शरीरसे दूसरे शरीरमें, एक लोकसे दूसरे लोकमें आता-जाता रहता है। आत्मा इस लिंगशरीरसे सर्वथा पृथक् है। उसका आना-जाना नहीं होता; परन्तु जब वह अपनेको लिंगशरीर ही समझ बैठता है, उसीमें अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना जाना-आना प्रतीत होने लगता है॥ ३६॥"},{"id":"11.22.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/37/","page":851,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ध्यायन् मनोऽनु विषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ।","उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनु शाम्यति॥ ३७"],"iast":["dhyāyan mano'nu viṣayān dṛṣṭān vānuśrutānatha|","udyat sīdat karmatantraṃ smṛtistadanu śāmyati|| 37"],"meaning":"मन कर्मोंके अधीन है। वह देखे हुए या सुने हुए विषयोंका चिन्तन करने लगता है और क्षणभरमें ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्वचिन्तित विषयोंमें लीन हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी स्मृति, पूर्वापरका अनुसन्धान भी नष्ट हो जाता है॥ ३७॥"},{"id":"11.22.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/38/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः।","जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः॥ ३८"],"iast":["viṣayābhiniveśena nātmānaṃ yat smaret punaḥ|","jantorvai kasyaciddhetormṛtyuratyantavismṛtiḥ|| 38"],"meaning":"उन देवादि शरीरोंमें इसका इतना अभिनिवेश, इतनी तल्लीनता हो जाती है कि जीवको अपने पूर्व शरीरका स्मरण भी नहीं रहता। किसी भी कारणसे शरीरको सर्वथा भूल जाना ही मृत्यु है॥ ३८॥"},{"id":"11.22.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/39/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद।","विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः॥ ३९"],"iast":["janma tvātmatayā puṃsaḥ sarvabhāvena bhūrida|","viṣayasvīkṛtiṃ prāhuryathā svapnamanorathaḥ|| 39"],"meaning":"उदार उद्धव! जब यह जीव किसी भी शरीरको अभेद-भावसे ‘मैं’ के रूपमें स्वीकार कर लेता है, तब उसे ही जन्म कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्नकालीन और मनोरथकालीन शरीरमें अभिमान करना ही स्वप्न और मनोरथ कहा जाता है॥ ३९॥"},{"id":"11.22.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/40/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वप्नं मनोरथं चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।","तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्वं चानुपश्यति॥ ४०"],"iast":["svapnaṃ manorathaṃ cetthaṃ prāktanaṃ na smaratyasau|","tatra pūrvamivātmānamapūrvaṃ cānupaśyati|| 40"],"meaning":"यह वर्तमान देहमें स्थित जीव जैसे पूर्व देहका स्मरण नहीं करता, वैसे ही स्वप्न या मनोरथमें स्थित जीव भी पहलेके स्वप्न और मनोरथको स्मरण नहीं करता, प्रत्युत उस वर्तमान स्वप्न और मनोरथमें पूर्व सिद्ध होनेपर भी अपनेको नवीन-सा ही समझता है॥ ४०॥"},{"id":"11.22.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/41/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।","बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा॥ ४१"],"iast":["indriyāyanasṛṣṭyedaṃ traividhyaṃ bhāti vastuni|","bahirantarbhidāheturjano'sajjanakṛd yathā|| 41"],"meaning":"इन्द्रियोंके आश्रय मन या शरीरकी सृष्टिसे आत्मवस्तुमें यह उत्तम, मध्यम और अधमकी त्रिविधता भासती है। उनमें अभिमान करनेसे ही आत्मा बाह्य और आभ्यन्तर भेदोंका हेतु मालूम पड़ने लगता है, जैसे दुष्ट पुत्रको उत्पन्‍न करनेवाला पिता पुत्रके शत्रु-मित्र आदिके लिये भेदका हेतु हो जाता है॥ ४१॥"},{"id":"11.22.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/42/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नित्यदा ह्यंग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।","कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्‍न दृश्यते॥ ४२"],"iast":["nityadā hyaṃga bhūtāni bhavanti na bhavanti ca|","kālenālakṣyavegena sūkṣmatvāttanna dṛśyate|| 42"],"meaning":"प्यारे उद्धव! कालकी गति सूक्ष्म है। उसे साधारणतः देखा नहीं जा सकता। उसके द्वारा प्रतिक्षण ही शरीरोंकी उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं। सूक्ष्म होनेके कारण ही प्रतिक्षण होनेवाले जन्म-मरण नहीं दीख पड़ते॥ ४२॥"},{"id":"11.22.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/43/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः।","तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः॥ ४३"],"iast":["yathārciṣāṃ srotasāṃ ca phalānāṃ vā vanaspateḥ|","tathaiva sarvabhūtānāṃ vayo'vasthādayaḥ kṛtāḥ|| 43"],"meaning":"जैसे कालके प्रभावसे दियेकी लौ, नदियोंके प्रवाह अथवा वृक्षके फलोंकी विशेष-विशेष अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, वैसे ही समस्त प्राणियोंके शरीरोंकी आयु, अवस्था आदि भी बदलती रहती है॥ ४३॥"},{"id":"11.22.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/44/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत्स्रोतसां तदिदं जलम्।","सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ ४४"],"iast":["so'yaṃ dīpo'rciṣāṃ yadvatsrotasāṃ tadidaṃ jalam|","so'yaṃ pumāniti nṛṇāṃ mṛṣā gīrdhīrmṛṣāyuṣām|| 44"],"meaning":"जैसे यह उन्हीं ज्योतियोंका वही दीपक है, प्रवाहका यह वही जल है—ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय-चिन्तनमें व्यर्थ आयु बितानेवाले अविवेकी पुरुषोंका ऐसा कहना और समझना कि यह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है॥ ४४॥"},{"id":"11.22.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/45/","page":852,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।","म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्‍निर्दारुसंयुतः॥ ४५"],"iast":["mā svasya karmabījena jāyate so'pyayaṃ pumān|","mriyate vāmaro bhrāntyā yathāgnirdārusaṃyutaḥ|| 45"],"meaning":"यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मोंके बीजद्वारा न पैदा होता है और न तो मरता ही है; वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी भ्रान्तिसे वह उत्पन्‍न होता है और मरता-सा भी है, जैसे कि काष्ठसे युक्त अग्‍नि पैदा होता और नष्ट होता दिखायी पड़ता है॥ ४५॥"},{"id":"11.22.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/46/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।","वयोमध्यं जरा मृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव॥ ४६"],"iast":["niṣekagarbhajanmāni bālyakaumārayauvanam|","vayomadhyaṃ jarā mṛtyurityavasthāstanornava|| 46"],"meaning":"उद्धवजी! गर्भाधान, गर्भवृद्धि, जन्म, बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी, अधेड़ अवस्था, बुढ़ापा और मृत्यु—ये नौ अवस्थाएँ शरीरकी ही हैं॥ ४६॥"},{"id":"11.22.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/47/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः।","गुणसंगादुपादत्ते क्‍वचित् कश्‍चिज्जहाति च॥ ४७"],"iast":["etā manorathamayīrhyanyasyoccāvacāstanūḥ|","guṇasaṃgādupādatte kvacit kaścijjahāti ca|| 47"],"meaning":"यह शरीर जीवसे भिन्‍न है और ये ऊँची-नीची अवस्थाएँ उसके मनोरथके अनुसार ही हैं; परन्तु वह अज्ञानवश गुणोंके संगसे इन्हें अपनी मानकर भटकने लगता है और कभी-कभी विवेक हो जानेपर इन्हें छोड़ भी देता है॥ ४७॥"},{"id":"11.22.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/48/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।","न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः॥ ४८"],"iast":["ātmanaḥ pitṛputrābhyāmanumeyau bhavāpyayau|","na bhavāpyayavastūnāmabhijño dvayalakṣaṇaḥ|| 48"],"meaning":"पिताको पुत्रके जन्मसे और पुत्रको पिताकी मृत्युसे अपने-अपने जन्म-मरणका अनुमान कर लेना चाहिये। जन्म-मृत्युसे युक्त देहोंका द्रष्टा जन्म और मृत्युसे युक्त शरीर नहीं है॥ ४८॥"},{"id":"11.22.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/49/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वांजन्मसंयमौ।","तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक्॥ ४९"],"iast":["tarorbījavipākābhyāṃ yo vidvāṃjanmasaṃyamau|","tarorvilakṣaṇo draṣṭā evaṃ draṣṭā tanoḥ pṛthak|| 49"],"meaning":"जैसे जौ-गेहूँ आदिकी फसल बोनेपर उग आती है और पक जानेपर काट दी जाती है, किन्तु जो पुरुष उनके उगने और काटनेका जाननेवाला साक्षी है, वह उनसे सर्वथा पृथक् है; वैसे ही जो शरीर और उसकी अवस्थाओंका साक्षी है, वह शरीरसे सर्वथा पृथक् है॥ ४९॥"},{"id":"11.22.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/50/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुधः पुमान्।","तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥ ५०"],"iast":["prakṛterevamātmānamavivicyābudhaḥ pumān|","tattvena sparśasammūḍhaḥ saṃsāraṃ pratipadyate|| 50"],"meaning":"अज्ञानी पुरुष इस प्रकार प्रकृति और शरीरसे आत्माका विवेचन नहीं करते। वे उसे उनसे तत्त्वतः अलग अनुभव नहीं करते और विषयभोगमें सच्चा सुख मानने लगते हैं तथा उसीमें मोहित हो जाते हैं। इसीसे उन्हें जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है॥ ५०॥"},{"id":"11.22.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/51/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वसंगादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।","तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥ ५१"],"iast":["sattvasaṃgādṛṣīn devān rajasāsuramānuṣān|","tamasā bhūtatiryaktvaṃ bhrāmito yāti karmabhiḥ|| 51"],"meaning":"जब अविवेकी जीव अपने कर्मोंके अनुसार जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकने लगता है, तब सात्त्विक कर्मोंकी आसक्तिसे वह ऋषिलोक और देवलोकमें राजसिक कर्मोंकी आसक्तिसे मनुष्य और असुरयोनियोंमें तथा तामसी कर्मोंकी आसक्तिसे भूत-प्रेत एवं पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जाता है॥ ५१॥"},{"id":"11.22.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/52/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान्।","एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्‍ननीहोऽप्यनुकार्यते॥ ५२"],"iast":["nṛtyato gāyataḥ paśyan yathaivānukaroti tān|","evaṃ buddhiguṇān paśyannanīho'pyanukāryate|| 52"],"meaning":"जब मनुष्य किसीको नाचते-गाते देखता है, तब वह स्वयं भी उसका अनुकरण करने—तान तोड़ने लगता है। वैसे ही जब जीव बुद्धिके गुणोंको देखता है, तब स्वयं निष्क्रिय होनेपर भी उसका अनुकरण करनेके लिये बाध्य हो जाता है॥ ५२॥"},{"id":"11.22.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/53/","page":853,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।","चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥ ५३"],"iast":["yathāmbhasā pracalatā taravo'pi calā iva|","cakṣuṣā bhrāmyamāṇena dṛśyate bhramatīva bhūḥ|| 53"],"meaning":"जैसे नदी-तालाब आदिके जलके हिलने या चंचल होनेपर उसमें प्रतिबिम्बित तटके वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते-से जान पड़ते हैं, जैसे घुमाये जानेवाले नेत्रके साथ-साथ पृथ्वी भी घूमती हुई-सी दिखायी देती है, जैसे मनके द्वारा सोचे गये तथा स्वप्नमें देखे गये भोग पदार्थ सर्वथा अलीक ही होते हैं, वैसे ही हे दाशार्ह! आत्माका विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ही है॥ ५३-५४॥","meaning_covers":[53,54]},{"id":"11.22.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/54/","page":854,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।","स्वप्नदृष्टाश्‍च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः॥ ५४"],"iast":["yathā manorathadhiyo viṣayānubhavo mṛṣā|","svapnadṛṣṭāśca dāśārha tathā saṃsāra ātmanaḥ|| 54"],"meaning":"जैसे नदी-तालाब आदिके जलके हिलने या चंचल होनेपर उसमें प्रतिबिम्बित तटके वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते-से जान पड़ते हैं, जैसे घुमाये जानेवाले नेत्रके साथ-साथ पृथ्वी भी घूमती हुई-सी दिखायी देती है, जैसे मनके द्वारा सोचे गये तथा स्वप्नमें देखे गये भोग पदार्थ सर्वथा अलीक ही होते हैं, वैसे ही हे दाशार्ह! आत्माका विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ही है॥ ५३-५४॥","meaning_covers":[53,54]},{"id":"11.22.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/55/","page":854,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।","ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ ५५"],"iast":["arthe hyavidyamāne'pi saṃsṛtirna nivartate|","dhyāyato viṣayānasya svapne'narthāgamo yathā|| 55"],"meaning":"विषयोंके सत्य न होनेपर भी जो जीव विषयोंका ही चिन्तन करता रहता है, उसका यह जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता, जैसे स्वप्नमें प्राप्त अनर्थ-परम्परा जागे बिना निवृत्त नहीं होती॥ ५५॥"},{"id":"11.22.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/56/","page":854,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः।","आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ ५६"],"iast":["tasmāduddhava mā bhuṅkṣva viṣayānasadindriyaiḥ|","ātmāgrahaṇanirbhātaṃ paśya vaikalpikaṃ bhramam|| 56"],"meaning":"प्रिय उद्धव! इसलिये इन दुष्ट (कभी तृप्त न होनेवाली) इन्द्रियोंसे विषयोंको मत भोगो। आत्मविषयक अज्ञानसे प्रतीत होनेवाला सांसारिक भेद-भाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो॥ ५६॥"},{"id":"11.22.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/57/","page":854,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा।","ताडितः सन्‍निबद्धो वा वृत्त्या वा परिहापितः॥ ५७"],"iast":["kṣipto'vamānito'sadbhiḥ pralabdho'sūyito'thavā|","tāḍitaḥ sannibaddho vā vṛttyā vā parihāpitaḥ|| 57"],"meaning":"असाधु पुरुष गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दें, वाणीद्वारा अपमान करें, उपहास करें, निन्दा करें, मारें-पीटें, बाँधें, आजीविका छीन लें, ऊपर थूक दें, मूत दें अथवा तरह-तरहसे विचलित करें, निष्ठासे डिगानेकी चेष्टा करें; उनके किसी भी उपद्रवसे क्षुब्ध न होना चाहिये; क्योंकि वे तो बेचारे अज्ञानी हैं, उन्हें परमार्थका तो पता ही नहीं है। अतः जो अपने कल्याणका इच्छुक है, उसे सभी कठिनाइयोंसे अपनी विवेक-बुद्धिद्वारा ही—किसी बाह्य साधनसे नहीं—अपनेको बचा लेना चाहिये। वस्तुतः आत्म-दृष्टि ही समस्त विपत्तियोंसे बचनेका एकमात्र साधन है॥ ५७-५८॥","meaning_covers":[57,58]},{"id":"11.22.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/58/","page":854,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पितः।","श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत्॥ ५८"],"iast":["niṣṭhito mūtrito vājñairbahudhaivaṃ prakampitaḥ|","śreyaskāmaḥ kṛcchragata ātmanā''tmānamuddharet|| 58"],"meaning":"असाधु पुरुष गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दें, वाणीद्वारा अपमान करें, उपहास करें, निन्दा करें, मारें-पीटें, बाँधें, आजीविका छीन लें, ऊपर थूक दें, मूत दें अथवा तरह-तरहसे विचलित करें, निष्ठासे डिगानेकी चेष्टा करें; उनके किसी भी उपद्रवसे क्षुब्ध न होना चाहिये; क्योंकि वे तो बेचारे अज्ञानी हैं, उन्हें परमार्थका तो पता ही नहीं है। अतः जो अपने कल्याणका इच्छुक है, उसे सभी कठिनाइयोंसे अपनी विवेक-बुद्धिद्वारा ही—किसी बाह्य साधनसे नहीं—अपनेको बचा लेना चाहिये। वस्तुतः आत्म-दृष्टि ही समस्त विपत्तियोंसे बचनेका एकमात्र साधन है॥ ५७-५८॥","meaning_covers":[57,58]},{"id":"11.22.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/59/","page":854,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["यथैवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर।","सुदुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥ ५९"],"iast":["yathaivamanubudhyeyaṃ vada no vadatāṃ vara|","suduḥsahamimaṃ manye ātmanyasadatikramam|| 59"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—भगवन्! आप समस्त वक्ताओंके शिरोमणि हैं। मैं इस दुर्जनोंसे किये गये तिरस्कारको अपने मनमें अत्यन्त असह्य समझता हूँ। अतः जैसे मैं इसको समझ सकूँ, आपका उपदेश जीवनमें धारण कर सकूँ, वैसे हमें बतलाइये॥ ५९॥"},{"id":"11.22.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/60/","page":854,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["विदुषामपि विश्‍वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।","ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥ ६०"],"iast":["viduṣāmapi viśvātman prakṛtirhi balīyasī|","ṛte tvaddharmaniratān śāntāṃste caraṇālayān|| 60"],"meaning":"विश्‍वात्मन्! जो आपके भागवतधर्मके आचरणमें प्रेम-पूर्वक संल‌ग्‍न हैं, जिन्होंने आपके चरणकमलोंका ही आश्रय ले लिया है, उन शान्त पुरुषोंके अतिरिक्त बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी दुष्टोंके द्वारा किया हुआ तिरस्कार सह लेना अत्यन्त कठिन है; क्योंकि प्रकृति अत्यन्त बलवती है॥ ६०॥"}],"text":[{"b":40788,"kind":"adhyaya_heading","page":846,"text":"अथ द्वाविंशोऽध्यायः"},{"b":40789,"kind":"topic_heading","page":846,"text":"तत्त्वोंकी संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक"},{"b":40790,"kind":"hindi_commentary","page":846,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":40791,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.1"],"text":"कति तत्त्वानि विश्‍वेश संख्यातान्यृषिभिः प्रभो।"},{"b":40792,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.1"],"text":"नवैकादश पंच त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम॥ १"},{"b":40793,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.2"],"text":"केचित् षड्विंशतिं प्राहुरपरे पंचविंशतिम्।"},{"b":40794,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.2"],"text":"सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे॥ २"},{"b":40795,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.3"],"text":"केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश।"},{"b":40796,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.3"],"text":"एतावत्त्वं हि संख्यानामृषयो यद्विवक्षया।"},{"b":40797,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.3"],"text":"गायन्ति पृथगायुष्मन्‍निदं नो वक्तुमर्हसि॥ ३"},{"b":40798,"kind":"hindi_translation","page":846,"explains":["11.22.1","11.22.2","11.22.3"],"text":"उद्धवजीने कहा—प्रभो! विश्‍वेश्‍वर! ऋषियोंने तत्त्वोंकी संख्या कितनी बतलायी है? आपने तो अभी (उन्‍नीसवें अध्यायमें) नौ, ग्यारह, पाँच और तीन अर्थात् कुल अट्ठाईस तत्त्व गिनाये हैं। यह तो हम सुन चुके हैं॥ १॥ किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥ इसी प्रकार किन्हीं-किन्हीं ऋषि-मुनियोंके मतमें उनकी संख्या सत्रह है, कोई सोलह और कोई तेरह बतलाते हैं। सनातन श्रीकृष्ण! ऋषि-मुनि इतनी भिन्‍न संख्याएँ किस अभिप्रायसे बतलाते हैं? आप कृपा करके हमें बतलाइये ॥ ३॥"},{"b":40799,"kind":"topic_heading","page":846,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40800,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.4"],"text":"युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।"},{"b":40801,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.4"],"text":"मायां मदीयामुद‍्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥ ४"},{"b":40802,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.5"],"text":"नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।"},{"b":40803,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.5"],"text":"एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्ययाः॥ ५"},{"b":40804,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.6"],"text":"यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम्।"},{"b":40805,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.6"],"text":"प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनुशाम्यति॥ ६"},{"b":40806,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.7"],"text":"परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।"},{"b":40807,"kind":"sanskrit_shloka","page":846,"verses":["11.22.7"],"text":"पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम्॥ ७"},{"b":40808,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.8"],"text":"एकस्मिन्‍नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च।"},{"b":40809,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.8"],"text":"पूर्वस्मिन् वा परस्मिन् वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वशः॥ ८"},{"b":40810,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.9"],"text":"पौर्वापर्यमतोऽमीषां प्रसंख्यानमभीप्सताम्।"},{"b":40811,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.9"],"text":"यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात्॥ ९"},{"b":40812,"kind":"hindi_commentary","page":846,"explains":["11.22.4","11.22.5","11.22.6","11.22.7","11.22.8","11.22.9"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! वेदज्ञ ब्राह्मण इस विषयमें जो कुछ कहते हैं, वह सभी ठीक है; क्योंकि सभी तत्त्व सबमें अन्तर्भूत हैं। मेरी मायाको स्वीकार करके क्या कहना असम्भव है?॥ ४॥ ‘जैसा तुम कहते हो, वह ठीक नहीं है, जो मैं कहता हूँ, वही यथार्थ है’—इस प्रकार जगत‍्के कारणके सम्बन्धमें विवाद इसलिये होता है कि मेरी शक्तियों—सत्त्व, रज आदि गुणों और उनकी वृत्तियोंका रहस्य लोग समझ नहीं पाते; इसलिये वे अपनी-अपनी मनोवृत्तिपर ही आग्रह कर बैठते हैं॥ ५॥ सत्त्व आदि गुणोंके क्षोभसे ही यह विविध कल्पनारूप प्रपंच—जो वस्तु नहीं केवल नाम है—उठ खड़ा हुआ है। यही वाद-विवाद करनेवालोंके विवादका विषय है। जब इन्द्रियाँ अपने वशमें हो जाती हैं तथा चित्त शान्त हो जाता है, तब यह प्रपंच भी निवृत्त हो जाता है और इसकी निवृत्तिके साथ ही सारे वाद-विवाद भी मिट जाते हैं॥ ६॥ पुरुषशिरोमणे! तत्त्वोंका एक-दूसरेमें अनुप्रवेश है, इसलिये वक्ता तत्त्वोंकी जितनी संख्या बतलाना चाहता है, उसके अनुसार कारणको कार्यमें अथवा कार्यको कारणमें मिलाकर अपनी इच्छित संख्या सिद्ध कर लेता है॥ ७॥ ऐसा देखा जाता है कि एक ही तत्त्वमें बहुत-से दूसरे तत्त्वोंका अन्तर्भाव हो गया है। इसका कोई बन्धन नहीं है कि किसका किसमें अन्तर्भाव हो। कभी घट-पट आदि कार्य वस्तुओंका उनके कारण मिट्टी-सूत आदिमें, तो कभी मिट्टी-सूत आदिका घट-पट आदि कार्योंमें अन्तर्भाव हो जाता है॥ ८॥ इसलिये वादी-प्रतिवादियोंमेंसे जिसकी वाणीने जिस कार्यको जिस कारणमें अथवा जिस कारणको जिस कार्यमें अन्तर्भूत करके तत्त्वोंकी जितनी संख्या स्वीकार की है, वह हम निश्‍चय ही स्वीकार करते हैं; क्योंकि उनका वह उपपादन युक्तिसंगत ही है॥ ९॥"},{"b":40813,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.10"],"text":"अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।"},{"b":40814,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.10"],"text":"स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०"},{"b":40815,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.11"],"text":"पुरुषेश्‍वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि।"},{"b":40816,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.11"],"text":"तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः॥ ११"},{"b":40817,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.12"],"text":"प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।"},{"b":40818,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.12"],"text":"सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः॥ १२"},{"b":40819,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.13"],"text":"सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते।"},{"b":40820,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.13"],"text":"गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च॥ १३"},{"b":40821,"kind":"hindi_translation","page":847,"explains":["11.22.10","11.22.11","11.22.12","11.22.13"],"text":"उद्धवजी! जिन लोगोंने छब्बीस संख्या स्वीकार की है, वे ऐसा कहते हैं कि जीव अनादि कालसे अविद्यासे ग्रस्त हो रहा है। वह स्वयं अपने-आपको नहीं जान सकता। उसे आत्मज्ञान करानेके लिये किसी अन्य सर्वज्ञकी आवश्यकता है। (इसलिये प्रकृतिके कार्यकारणरूप चौबीस तत्त्व, पचीसवाँ पुरुष और छब्बीसवाँ ईश्‍वर—इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व स्वीकार करने चाहिये)॥ १०॥ पचीस तत्त्व माननेवाले कहते हैं कि इस शरीरमें जीव और ईश्‍वरका अणुमात्र भी अन्तर या भेद नहीं है, इसलिये उनमें भेदकी कल्पना व्यर्थ है। रही ज्ञानकी बात, सो तो सत्त्वात्मिका प्रकृतिका गुण है॥ ११॥ तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है; इसलिये सत्त्व, रज आदि गुण आत्माके नहीं, प्रकृतिके ही हैं। इन्हींके द्वारा जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय हुआ करते हैं। इसलिये ज्ञान आत्माका गुण नहीं, प्रकृतिका ही गुण सिद्ध होता है॥ १२॥ इस प्रसंगमें सत्त्वगुण ही ज्ञान है, रजोगुण ही कर्म है और तमोगुण ही अज्ञान कहा गया है। और गुणोंमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला ईश्‍वर ही काल है और सूत्र अर्थात् महत्तत्त्व ही स्वभाव है। (इसलिये पचीस और छब्बीस तत्त्वोंकी—दोनों ही संख्या युक्तिसंगत है)॥ १३॥"},{"b":40822,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.14"],"text":"पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहंकारो नभोऽनिलः।"},{"b":40823,"kind":"sanskrit_shloka","page":847,"verses":["11.22.14"],"text":"ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४"},{"b":40824,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.15"],"text":"श्रोत्रं त्वग्दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः।"},{"b":40825,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.15"],"text":"वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्‌घ्रिकर्माण्यंगोभयं मनः॥ १५"},{"b":40826,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.16"],"text":"शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः।"},{"b":40827,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.16"],"text":"गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः॥ १६"},{"b":40828,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.17"],"text":"सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी।"},{"b":40829,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.17"],"text":"सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते॥ १७"},{"b":40830,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.18"],"text":"व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया।"},{"b":40831,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.18"],"text":"लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात्॥ १८"},{"b":40832,"kind":"hindi_translation","page":847,"explains":["11.22.14","11.22.15","11.22.16","11.22.17","11.22.18"],"text":"उद्धवजी! (यदि तीनों गुणोंको प्रकृतिसे अलग मान लिया जाय, जैसा कि उनकी उत्पत्ति और प्रलयको देखते हुए मानना चाहिये, तो तत्त्वोंकी संख्या स्वयं ही अट्ठाईस हो जाती है। उन तीनोंके अतिरिक्त पचीस ये हैं—) पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये नौ तत्त्व मैं पहले ही गिना चुका हूँ॥ १४॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, नासिका और रसना—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ; तथा मन, जो कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दोनों ही हैं। इस प्रकार कुल ग्यारह इन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय। इस प्रकार तीन, नौ, ग्यारह और पाँच—सब मिलाकर अट्ठाईस तत्त्व होते हैं। कर्मेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले पाँच कर्म—चलना, बोलना, मल त्यागना, पेशाब करना और काम करना—इनके द्वारा तत्त्वोंकी संख्या नहीं बढ़ती। इन्हें कर्मेन्द्रियस्वरूप ही मानना चाहिये॥ १५-१६॥ सृष्टिके आरम्भमें कार्य (ग्यारह इन्द्रिय और पंचभूत) और कारण (महत्तत्त्व आदि) के रूपमें प्रकृति ही रहती है। वही सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी सहायतासे जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारसम्बन्धी अवस्थाएँ धारण करती है। अव्यक्त पुरुष तो प्रकृति और उसकी अवस्थाओंका केवल साक्षीमात्र बना रहता है॥ १७॥ महत्तत्त्व आदि कारण धातुएँ विकारको प्राप्त होते हुए पुरुषके ईक्षणसे शक्ति प्राप्त करके परस्पर मिल जाते हैं और प्रकृतिका आश्रय लेकर उसीके बलसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं॥ १८॥"},{"b":40833,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.19"],"text":"सप्तैव धातव इति तत्रार्थाः पंच खादयः।"},{"b":40834,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.19"],"text":"ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः॥ १९"},{"b":40835,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.20"],"text":"षडित्यत्रापि भूतानि पंच षष्ठः परः पुमान्।"},{"b":40836,"kind":"sanskrit_shloka","page":848,"verses":["11.22.20"],"text":"तैर्युक्त आत्मसम्भूतैः सृष्ट्वेदं समुपाविशत्॥ २०"},{"b":40837,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.21"],"text":"चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्‍नमात्मनः।"},{"b":40838,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.21"],"text":"जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु॥ २१"},{"b":40839,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.22"],"text":"संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।"},{"b":40840,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.22"],"text":"पंच पंचैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः॥ २२"},{"b":40841,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.23"],"text":"तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।"},{"b":40842,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.23"],"text":"भूतेन्द्रियाणि पंचैव मन आत्मा त्रयोदश॥ २३"},{"b":40843,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.24"],"text":"एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।"},{"b":40844,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.24"],"text":"अष्टौ प्रकृतयश्‍चैव पुरुषश्‍च नवेत्यथ॥ २४"},{"b":40845,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.25"],"text":"इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानामृषिभिः कृतम्।"},{"b":40846,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.25"],"text":"सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५"},{"b":40847,"kind":"hindi_translation","page":848,"explains":["11.22.19","11.22.20","11.22.21","11.22.22","11.22.23","11.22.24","11.22.25"],"text":"उद्धवजी! जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सात स्वीकार करते हैं, उनके विचारसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच भूत, छठा जीव और सातवाँ परमात्मा—जो साक्षी जीव और साक्ष्य जगत् दोनोंका अधिष्ठान है—ये ही तत्त्व हैं। देह, इन्द्रिय और प्राणादिकी उत्पत्ति तो पंचभूतोंसे ही हुई है [इसलिये वे इन्हें अलग नहीं गिनते]॥ १९॥ जो लोग केवल छः तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि पाँच भूत हैं और छठा है परमपुरुष परमात्मा। वह परमात्मा अपने बनाये हुए पंचभूतोंसे युक्त होकर देह आदिकी सृष्टि करता है और उनमें जीवरूपसे प्रवेश करता है (इस मतके अनुसार जीवका परमात्मामें और शरीर आदिका पंचभूतोंमें समावेश हो जाता है)॥ २०॥ जो लोग कारणके रूपमें चार ही तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि आत्मासे तेज, जल और पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है और जगत‍्में जितने पदार्थ हैं, सब इन्हींसे उत्पन्‍न होते हैं। वे सभी कार्योंका इन्हींमें समावेश कर लेते हैं॥ २१॥ जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सत्रह बतलाते हैं, वे इस प्रकार गणना करते हैं—पाँच भूत, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, एक मन और एक आत्मा॥ २२॥ जो लोग तत्त्वोंकी संख्या सोलह बतलाते हैं, उनकी गणना भी इसी प्रकार है। अन्तर केवल इतना ही है कि वे आत्मामें मनका भी समावेश कर लेते हैं और इस प्रकार उनकी तत्त्वसंख्या सोलह रह जाती है। जो लोग तेरह तत्त्व मानते हैं, वे कहते हैं कि आकाशादि पाँच भूत, श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, एक मन, एक जीवात्मा और परमात्मा—ये तेरह तत्त्व हैं॥ २३॥ ग्यारह संख्या माननेवालोंने पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और इनके अतिरिक्त एक आत्माका अस्तित्व स्वीकार किया है। जो लोग नौ तत्त्व मानते हैं, वे आकाशादि पाँच भूत और मन, बुद्धि, अहंकार—ये आठ प्रकृतियाँ और नवाँ पुरुष—इन्हींको तत्त्व मानते हैं॥ २४॥ उद्धवजी! इस प्रकार ऋषि-मुनियोंने भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे तत्त्वोंकी गणना की है। सबका कहना उचित ही है, क्योंकि सबकी संख्या युक्तियुक्त है। जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं, उन्हें किसी भी मतमें बुराई नहीं दीखती। उनके लिये तो सब कुछ ठीक ही है॥ २५॥"},{"b":40848,"kind":"topic_heading","page":849,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":40849,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.26"],"text":"प्रकृतिः पुरुषश्‍चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।"},{"b":40850,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.26"],"text":"अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः॥ २६"},{"b":40851,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"explains":["11.22.26"],"text":"उद्धवजीने कहा—श्यामसुन्दर! यद्यपि स्वरूपतः प्रकृति और पुरुष—दोनों एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्‍न हैं, तथापि वे आपसमें इतने घुल-मिल गये हैं कि साधारणतः उनका भेद नहीं जान पड़ता। प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृति अभिन्‍न-से प्रतीत होते हैं। इनकी भिन्‍नता स्पष्ट कैसे हो?॥ २६॥"},{"b":40852,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.27"],"text":"प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्‍च तथाऽऽत्मनि।"},{"b":40853,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.27"],"text":"एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।"},{"b":40854,"kind":"sanskrit_shloka","page":849,"verses":["11.22.27"],"text":"छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः॥ २७"},{"b":40855,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.28"],"text":"त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः।"},{"b":40856,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.28"],"text":"त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः॥ २८"},{"b":40857,"kind":"hindi_translation","page":849,"explains":["11.22.27","11.22.28"],"text":"कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे हृदयमें इनकी भिन्नता और अभिन्नताको लेकर बहुत बड़ा सन्देह है। आप तो सर्वज्ञ हैं, अपनी युक्तियुक्त वाणीसे मेरे सन्देहका निवारण कर दीजिये ॥ २७॥ भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥"},{"b":40858,"kind":"topic_heading","page":850,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40859,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.29"],"text":"प्रकृतिः पुरुषश्‍चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।"},{"b":40860,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.29"],"text":"एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः॥ २९"},{"b":40861,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.30"],"text":"ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा"},{"b":40862,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.30"],"text":"विकल्पबुद्धीश्‍च गुणैर्विधत्ते।"},{"b":40863,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.30"],"text":"वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेक-"},{"b":40864,"kind":"topic_heading","page":850,"verses":["11.22.30"],"text":"मथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३०"},{"b":40865,"kind":"hindi_commentary","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"दृग् रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे"},{"b":40866,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।"},{"b":40867,"kind":"hindi_commentary","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"आत्मा यदेषामपरो य आद्यः"},{"b":40868,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ।"},{"b":40869,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु-"},{"b":40870,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.31"],"text":"र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्॥ ३१"},{"b":40871,"kind":"hindi_commentary","page":850,"verses":["11.22.32"],"text":"योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः"},{"b":40872,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.32"],"text":"प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः।"},{"b":40873,"kind":"hindi_commentary","page":850,"verses":["11.22.32"],"text":"अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु-"},{"b":40874,"kind":"sanskrit_shloka","page":850,"verses":["11.22.32"],"text":"र्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्‍च॥ ३२"},{"b":40875,"kind":"hindi_commentary","page":850,"explains":["11.22.29","11.22.30","11.22.31","11.22.32"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा—इन दोनोंमें अत्यन्त भेद है। इस प्राकृत जगत‍्में जन्म-मरण एवं वृद्धि-ह्रास आदि विकार लगे ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि यह गुणोंके क्षोभसे ही बना है॥ २९॥ प्रिय मित्र! मेरी माया त्रिगुणात्मिका है। वही अपने सत्त्व, रज आदि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेदवृत्तियाँ पैदा कर देती है। यद्यपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस विकारात्मक सृष्टिको तीन भागोंमें बाँट सकते हैं। वे तीन भाग हैं—अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत॥ ३०॥ उदाहरणार्थ—नेत्रेन्द्रिय अध्यात्म है, उसका विषय रूप अधिभूत है और नेत्र-गोलकमें स्थित सूर्यदेवताका अंश अधिदैव है। ये तीनों परस्पर एक-दूसरेके आश्रयसे सिद्ध होते हैं। और इसलिये अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत—ये तीनों ही परस्पर सापेक्ष हैं। परन्तु आकाशमें स्थित सूर्यमण्डल इन तीनोंकी अपेक्षासे मुक्त है, क्योंकि वह स्वतःसिद्ध है। इसी प्रकार आत्मा भी उपर्युक्त तीनों भेदोंका मूलकारण, उनका साक्षी और उनसे परे है। वही अपने स्वयंसिद्ध प्रकाशसे समस्त सिद्ध पदार्थोंकी मूलसिद्धि है। उसीके द्वारा सबका प्रकाश होता है। जिस प्रकार चक्षुके तीन भेद बताये गये, उसी प्रकार त्वचा, श्रोत्र, जिह्वा, नासिका और चित्त आदिके भी तीन-तीन भेद हैं॥ ३१॥ प्रकृतिसे महत्तत्त्व बनता है और महत्तत्त्वसे अहंकार। इस प्रकार यह अहंकार गुणोंके क्षोभसे उत्पन्‍न हुआ प्रकृतिका ही एक विकार है। अहंकारके तीन भेद हैं—सात्त्विक, तामस और राजस। यह अहंकार ही अज्ञान और सृष्टिकी विविधताका मूलकारण है॥ ३२॥"},{"b":40876,"kind":"hindi_commentary","page":851,"verses":["11.22.33"],"text":"आत्मा परिज्ञानमयो विवादो"},{"b":40877,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.33"],"text":"ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।"},{"b":40878,"kind":"hindi_commentary","page":851,"verses":["11.22.33"],"text":"व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां"},{"b":40879,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.33"],"text":"मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३"},{"b":40880,"kind":"hindi_translation","page":851,"explains":["11.22.33"],"text":"आत्मा ज्ञानस्वरूप है; उसका इन पदार्थोंसे न तो कोई सम्बन्ध है और न उसमें कोई विवादकी ही बात है! अस्ति-नास्ति (है-नहीं), सगुण-निर्गुण, भाव-अभाव, सत्य-मिथ्या आदि रूपसे जितने भी वाद-विवाद हैं, सबका मूलकारण भेददृष्टि ही है। इसमें सन्देह नहीं कि इस विवादका कोई प्रयोजन नहीं है; यह सर्वथा व्यर्थ है तथापि जो लोग मुझसे—अपने वास्तविक स्वरूपसे विमुख हैं, वे इस विवादसे मुक्त नहीं हो सकते॥ ३३॥"},{"b":40881,"kind":"topic_heading","page":851,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":40882,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.34"],"text":"त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।"},{"b":40883,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.34"],"text":"उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च॥ ३४"},{"b":40884,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.35"],"text":"तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः।"},{"b":40885,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.35"],"text":"न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वंचिताः॥ ३५"},{"b":40886,"kind":"hindi_translation","page":851,"explains":["11.22.34","11.22.35"],"text":"उद्धवजीने पूछा—भगवन्! आपसे विमुख जीव अपने किये हुए पुण्य-पापोंके फलस्वरूप ऊँची-नीची योनियोंमें जाते-आते रहते हैं। अब प्रश्‍न यह है कि व्यापक आत्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाना, अकर्ताका कर्म करना और नित्य-वस्तुका जन्म-मरण कैसे सम्भव है?॥ ३४॥ गोविन्द! जो लोग आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे तो इस विषयको ठीक-ठीक सोच भी नहीं सकते। और इस विषयके विद्वान् संसारमें प्रायः मिलते नहीं, क्योंकि सभी लोग आपकी मायाकी भूल-भुलैयामें पड़े हुए हैं। इसलिये आप ही कृपा करके मुझे इसका रहस्य समझाइये॥ ३५॥"},{"b":40887,"kind":"topic_heading","page":851,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40888,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.36"],"text":"मनः कर्ममयं नॄणामिन्द्रियैः पंचभिर्युतम्।"},{"b":40889,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.36"],"text":"लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते॥ ३६"},{"b":40890,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.37"],"text":"ध्यायन् मनोऽनु विषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ।"},{"b":40891,"kind":"sanskrit_shloka","page":851,"verses":["11.22.37"],"text":"उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनु शाम्यति॥ ३७"},{"b":40892,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.38"],"text":"विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः।"},{"b":40893,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.38"],"text":"जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः॥ ३८"},{"b":40894,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.39"],"text":"जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद।"},{"b":40895,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.39"],"text":"विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः॥ ३९"},{"b":40896,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.40"],"text":"स्वप्नं मनोरथं चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।"},{"b":40897,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.40"],"text":"तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्वं चानुपश्यति॥ ४०"},{"b":40898,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.41"],"text":"इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।"},{"b":40899,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.41"],"text":"बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा॥ ४१"},{"b":40900,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.42"],"text":"नित्यदा ह्यंग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।"},{"b":40901,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.42"],"text":"कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्‍न दृश्यते॥ ४२"},{"b":40902,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.43"],"text":"यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः।"},{"b":40903,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.43"],"text":"तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः॥ ४३"},{"b":40904,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.44"],"text":"सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत्स्रोतसां तदिदं जलम्।"},{"b":40905,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.44"],"text":"सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ ४४"},{"b":40906,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.45"],"text":"मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।"},{"b":40907,"kind":"sanskrit_shloka","page":852,"verses":["11.22.45"],"text":"म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्‍निर्दारुसंयुतः॥ ४५"},{"b":40908,"kind":"hindi_commentary","page":851,"explains":["11.22.36","11.22.37","11.22.38","11.22.39","11.22.40","11.22.41","11.22.42","11.22.43","11.22.44","11.22.45"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मनुष्योंका मन कर्म-संस्कारोंका पुंज है। उन संस्कारोंके अनुसार भोग प्राप्त करनेके लिये उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई हैं। इसीका नाम है लिंगशरीर। वही कर्मोंके अनुसार एक शरीरसे दूसरे शरीरमें, एक लोकसे दूसरे लोकमें आता-जाता रहता है। आत्मा इस लिंगशरीरसे सर्वथा पृथक् है। उसका आना-जाना नहीं होता; परन्तु जब वह अपनेको लिंगशरीर ही समझ बैठता है, उसीमें अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना जाना-आना प्रतीत होने लगता है॥ ३६॥ मन कर्मोंके अधीन है। वह देखे हुए या सुने हुए विषयोंका चिन्तन करने लगता है और क्षणभरमें ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्वचिन्तित विषयोंमें लीन हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी स्मृति, पूर्वापरका अनुसन्धान भी नष्ट हो जाता है॥ ३७॥ उन देवादि शरीरोंमें इसका इतना अभिनिवेश, इतनी तल्लीनता हो जाती है कि जीवको अपने पूर्व शरीरका स्मरण भी नहीं रहता। किसी भी कारणसे शरीरको सर्वथा भूल जाना ही मृत्यु है॥ ३८॥ उदार उद्धव! जब यह जीव किसी भी शरीरको अभेद-भावसे ‘मैं’ के रूपमें स्वीकार कर लेता है, तब उसे ही जन्म कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्नकालीन और मनोरथकालीन शरीरमें अभिमान करना ही स्वप्न और मनोरथ कहा जाता है॥ ३९॥ यह वर्तमान देहमें स्थित जीव जैसे पूर्व देहका स्मरण नहीं करता, वैसे ही स्वप्न या मनोरथमें स्थित जीव भी पहलेके स्वप्न और मनोरथको स्मरण नहीं करता, प्रत्युत उस वर्तमान स्वप्न और मनोरथमें पूर्व सिद्ध होनेपर भी अपनेको नवीन-सा ही समझता है॥ ४०॥ इन्द्रियोंके आश्रय मन या शरीरकी सृष्टिसे आत्मवस्तुमें यह उत्तम, मध्यम और अधमकी त्रिविधता भासती है। उनमें अभिमान करनेसे ही आत्मा बाह्य और आभ्यन्तर भेदोंका हेतु मालूम पड़ने लगता है, जैसे दुष्ट पुत्रको उत्पन्‍न करनेवाला पिता पुत्रके शत्रु-मित्र आदिके लिये भेदका हेतु हो जाता है॥ ४१॥ प्यारे उद्धव! कालकी गति सूक्ष्म है। उसे साधारणतः देखा नहीं जा सकता। उसके द्वारा प्रतिक्षण ही शरीरोंकी उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं। सूक्ष्म होनेके कारण ही प्रतिक्षण होनेवाले जन्म-मरण नहीं दीख पड़ते॥ ४२॥ जैसे कालके प्रभावसे दियेकी लौ, नदियोंके प्रवाह अथवा वृक्षके फलोंकी विशेष-विशेष अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, वैसे ही समस्त प्राणियोंके शरीरोंकी आयु, अवस्था आदि भी बदलती रहती है॥ ४३॥ जैसे यह उन्हीं ज्योतियोंका वही दीपक है, प्रवाहका यह वही जल है—ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय-चिन्तनमें व्यर्थ आयु बितानेवाले अविवेकी पुरुषोंका ऐसा कहना और समझना कि यह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है॥ ४४॥ यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मोंके बीजद्वारा न पैदा होता है और न तो मरता ही है; वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी भ्रान्तिसे वह उत्पन्‍न होता है और मरता-सा भी है, जैसे कि काष्ठसे युक्त अग्‍नि पैदा होता और नष्ट होता दिखायी पड़ता है॥ ४५॥"},{"b":40909,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.46"],"text":"निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।"},{"b":40910,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.46"],"text":"वयोमध्यं जरा मृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव॥ ४६"},{"b":40911,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.47"],"text":"एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः।"},{"b":40912,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.47"],"text":"गुणसंगादुपादत्ते क्‍वचित् कश्‍चिज्जहाति च॥ ४७"},{"b":40913,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.48"],"text":"आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।"},{"b":40914,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.48"],"text":"न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः॥ ४८"},{"b":40915,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.49"],"text":"तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वांजन्मसंयमौ।"},{"b":40916,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.49"],"text":"तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक्॥ ४९"},{"b":40917,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.50"],"text":"प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुधः पुमान्।"},{"b":40918,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.50"],"text":"तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥ ५०"},{"b":40919,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.51"],"text":"सत्त्वसंगादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।"},{"b":40920,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.51"],"text":"तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥ ५१"},{"b":40921,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.52"],"text":"नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान्।"},{"b":40922,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.52"],"text":"एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्‍ननीहोऽप्यनुकार्यते॥ ५२"},{"b":40923,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.53"],"text":"यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।"},{"b":40924,"kind":"sanskrit_shloka","page":853,"verses":["11.22.53"],"text":"चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥ ५३"},{"b":40925,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.54"],"text":"यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।"},{"b":40926,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.54"],"text":"स्वप्नदृष्टाश्‍च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः॥ ५४"},{"b":40927,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.55"],"text":"अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।"},{"b":40928,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.55"],"text":"ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ ५५"},{"b":40929,"kind":"hindi_commentary","page":853,"explains":["11.22.46","11.22.47","11.22.48","11.22.49","11.22.50","11.22.51","11.22.52","11.22.53","11.22.54","11.22.55"],"text":"उद्धवजी! गर्भाधान, गर्भवृद्धि, जन्म, बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी, अधेड़ अवस्था, बुढ़ापा और मृत्यु—ये नौ अवस्थाएँ शरीरकी ही हैं॥ ४६॥ यह शरीर जीवसे भिन्‍न है और ये ऊँची-नीची अवस्थाएँ उसके मनोरथके अनुसार ही हैं; परन्तु वह अज्ञानवश गुणोंके संगसे इन्हें अपनी मानकर भटकने लगता है और कभी-कभी विवेक हो जानेपर इन्हें छोड़ भी देता है॥ ४७॥ पिताको पुत्रके जन्मसे और पुत्रको पिताकी मृत्युसे अपने-अपने जन्म-मरणका अनुमान कर लेना चाहिये। जन्म-मृत्युसे युक्त देहोंका द्रष्टा जन्म और मृत्युसे युक्त शरीर नहीं है॥ ४८॥ जैसे जौ-गेहूँ आदिकी फसल बोनेपर उग आती है और पक जानेपर काट दी जाती है, किन्तु जो पुरुष उनके उगने और काटनेका जाननेवाला साक्षी है, वह उनसे सर्वथा पृथक् है; वैसे ही जो शरीर और उसकी अवस्थाओंका साक्षी है, वह शरीरसे सर्वथा पृथक् है॥ ४९॥ अज्ञानी पुरुष इस प्रकार प्रकृति और शरीरसे आत्माका विवेचन नहीं करते। वे उसे उनसे तत्त्वतः अलग अनुभव नहीं करते और विषयभोगमें सच्चा सुख मानने लगते हैं तथा उसीमें मोहित हो जाते हैं। इसीसे उन्हें जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है॥ ५०॥ जब अविवेकी जीव अपने कर्मोंके अनुसार जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकने लगता है, तब सात्त्विक कर्मोंकी आसक्तिसे वह ऋषिलोक और देवलोकमें राजसिक कर्मोंकी आसक्तिसे मनुष्य और असुरयोनियोंमें तथा तामसी कर्मोंकी आसक्तिसे भूत-प्रेत एवं पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जाता है॥ ५१॥ जब मनुष्य किसीको नाचते-गाते देखता है, तब वह स्वयं भी उसका अनुकरण करने—तान तोड़ने लगता है। वैसे ही जब जीव बुद्धिके गुणोंको देखता है, तब स्वयं निष्क्रिय होनेपर भी उसका अनुकरण करनेके लिये बाध्य हो जाता है॥ ५२॥ जैसे नदी-तालाब आदिके जलके हिलने या चंचल होनेपर उसमें प्रतिबिम्बित तटके वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते-से जान पड़ते हैं, जैसे घुमाये जानेवाले नेत्रके साथ-साथ पृथ्वी भी घूमती हुई-सी दिखायी देती है, जैसे मनके द्वारा सोचे गये तथा स्वप्नमें देखे गये भोग पदार्थ सर्वथा अलीक ही होते हैं, वैसे ही हे दाशार्ह! आत्माका विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ही है॥ ५३-५४॥ विषयोंके सत्य न होनेपर भी जो जीव विषयोंका ही चिन्तन करता रहता है, उसका यह जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता, जैसे स्वप्नमें प्राप्त अनर्थ-परम्परा जागे बिना निवृत्त नहीं होती॥ ५५॥"},{"b":40930,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.56"],"text":"तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः।"},{"b":40931,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.56"],"text":"आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ ५६"},{"b":40932,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.57"],"text":"क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा।"},{"b":40933,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.57"],"text":"ताडितः सन्‍निबद्धो वा वृत्त्या वा परिहापितः॥ ५७"},{"b":40934,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.58"],"text":"निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पितः।"},{"b":40935,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.58"],"text":"श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत्॥ ५८"},{"b":40936,"kind":"hindi_translation","page":854,"explains":["11.22.56","11.22.57","11.22.58"],"text":"प्रिय उद्धव! इसलिये इन दुष्ट (कभी तृप्त न होनेवाली) इन्द्रियोंसे विषयोंको मत भोगो। आत्मविषयक अज्ञानसे प्रतीत होनेवाला सांसारिक भेद-भाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो॥ ५६॥ असाधु पुरुष गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दें, वाणीद्वारा अपमान करें, उपहास करें, निन्दा करें, मारें-पीटें, बाँधें, आजीविका छीन लें, ऊपर थूक दें, मूत दें अथवा तरह-तरहसे विचलित करें, निष्ठासे डिगानेकी चेष्टा करें; उनके किसी भी उपद्रवसे क्षुब्ध न होना चाहिये; क्योंकि वे तो बेचारे अज्ञानी हैं, उन्हें परमार्थका तो पता ही नहीं है। अतः जो अपने कल्याणका इच्छुक है, उसे सभी कठिनाइयोंसे अपनी विवेक-बुद्धिद्वारा ही—किसी बाह्य साधनसे नहीं—अपनेको बचा लेना चाहिये। वस्तुतः आत्म-दृष्टि ही समस्त विपत्तियोंसे बचनेका एकमात्र साधन है॥ ५७-५८॥"},{"b":40937,"kind":"topic_heading","page":854,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":40938,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.59"],"text":"यथैवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर।"},{"b":40939,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.59"],"text":"सुदुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥ ५९"},{"b":40940,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.60"],"text":"विदुषामपि विश्‍वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।"},{"b":40941,"kind":"sanskrit_shloka","page":854,"verses":["11.22.60"],"text":"ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥ ६०"},{"b":40942,"kind":"hindi_commentary","page":854,"explains":["11.22.59","11.22.60"],"text":"उद्धवजीने कहा—भगवन्! आप समस्त वक्ताओंके शिरोमणि हैं। मैं इस दुर्जनोंसे किये गये तिरस्कारको अपने मनमें अत्यन्त असह्य समझता हूँ। अतः जैसे मैं इसको समझ सकूँ, आपका उपदेश जीवनमें धारण कर सकूँ, वैसे हमें बतलाइये॥ ५९॥ विश्‍वात्मन्! जो आपके भागवतधर्मके आचरणमें प्रेम-पूर्वक संल‌ग्‍न हैं, जिन्होंने आपके चरणकमलोंका ही आश्रय ले लिया है, उन शान्त पुरुषोंके अतिरिक्त बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी दुष्टोंके द्वारा किया हुआ तिरस्कार सह लेना अत्यन्त कठिन है; क्योंकि प्रकृति अत्यन्त बलवती है॥ ६०॥"},{"b":40943,"kind":"hindi_commentary","page":854,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः"},{"b":40944,"kind":"hindi_translation","page":854,"text":"॥ २२॥"}],"notes":[{"id":"v2:419","mark":"*","page":850,"after_verse":"11.22.32","text":"यथा—त्वचा, स्पर्श और वायु; श्रवण, शब्द और दिशा; जिह्वा, रस और वरुण; नासिका, गन्ध और अश्‍विनीकुमार; चित्त, चिन्तनका विषय और वासुदेव; मन, मनका विषय और चन्द्रमा; अहंकार, अहंकारका विषय और रुद्र; बुद्धि, समझनेका विषय और ब्रह्मा—इन सभी त्रिविध तत्त्वोंसे आत्माका कोई सम्बन्ध नहीं है।"}],"corrections":{"count":9,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}