{"id":"11.31","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 31","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथैकत्रिंशोऽध्यायः","topics":["श्रीभगवान्‌का स्वधामगमन"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.31.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[903,906]},"verses":[{"id":"11.31.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/1/","page":903,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः।","महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्‍वराः॥ १"],"iast":["atha tatrāgamad brahmā bhavānyā ca samaṃ bhavaḥ|","mahendrapramukhā devā munayaḥ saprajeśvarāḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥","meaning_covers":[1,4]},{"id":"11.31.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/2/","page":903,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः।","चारणा यक्षरक्षांसि किन्‍नराप्सरसो द्विजाः॥ २"],"iast":["pitaraḥ siddhagandharvā vidyādharamahoragāḥ|","cāraṇā yakṣarakṣāṃsi kinnarāpsaraso dvijāḥ|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥","meaning_covers":[1,4]},{"id":"11.31.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/3/","page":903,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः।","गायन्तश्‍च गृणन्तश्‍च शौरेः कर्माणि जन्म च॥ ३"],"iast":["draṣṭukāmā bhagavato niryāṇaṃ paramotsukāḥ|","gāyantaśca gṛṇantaśca śaureḥ karmāṇi janma ca|| 3"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥","meaning_covers":[1,4]},{"id":"11.31.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/4/","page":903,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः।","कुर्वन्तः संकुलं राजन् भक्त्या परमया युताः॥ ४"],"iast":["vavṛṣuḥ puṣpavarṣāṇi vimānāvalibhirnabhaḥ|","kurvantaḥ saṃkulaṃ rājan bhaktyā paramayā yutāḥ|| 4"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥","meaning_covers":[1,4]},{"id":"11.31.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/5/","page":903,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभुः।","संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत्॥ ५"],"iast":["bhagavān pitāmahaṃ vīkṣya vibhūtīrātmano vibhuḥ|","saṃyojyātmani cātmānaṃ padmanetre nyamīlayat|| 5"],"meaning":"सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजी और अपने विभूतिस्वरूप देवताओंको देखकर अपने आत्माको स्वरूपमें स्थित किया और कमलके समान नेत्र बंद कर लिये॥ ५॥"},{"id":"11.31.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/6/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमंगलम्।","योगधारणयाऽऽ‌ग्‍नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६"],"iast":["lokābhirāmāṃ svatanuṃ dhāraṇādhyānamaṃgalam|","yogadhāraṇayā''gneyyādagdhvā dhāmāviśat svakam|| 6"],"meaning":"भगवान्‌का श्रीविग्रह उपासकोंके ध्यान और धारणाका मंगलमय आधार और समस्त लोकोंके लिये परम रमणीय आश्रय है; इसलिये उन्होंने (योगियोंके समान) अग्‍निदेवतासम्बन्धी योगधारणाके द्वारा उसको जलाया नहीं, सशरीर अपने धाममें चले गये॥ ६॥"},{"id":"11.31.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/7/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिवि दुन्दुभयो नेदुः पेतुः सुमनसश्‍च खात्।","सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्‍चानु तं ययुः॥ ७"],"iast":["divi dundubhayo neduḥ petuḥ sumanasaśca khāt|","satyaṃ dharmo dhṛtirbhūmeḥ kīrtiḥ śrīścānu taṃ yayuḥ|| 7"],"meaning":"उस समय स्वर्गमें नगारे बजने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे इस लोकसे सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गयीं॥ ७॥"},{"id":"11.31.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/8/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।","अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्‍चातिविस्मिताः॥ ८"],"iast":["devādayo brahmamukhyā na viśantaṃ svadhāmani|","avijñātagatiṃ kṛṣṇaṃ dadṛśuścātivismitāḥ|| 8"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी गति मन और वाणीके परे है; तभी तो जब भगवान् अपने धाममें प्रवेश करने लगे, तब ब्रह्मादि देवता भी उन्हें न देख सके। इस घटनासे उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ॥ ८॥"},{"id":"11.31.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/9/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम्।","गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतैः॥ ९"],"iast":["saudāmanyā yathā''kāśe yāntyā hitvābhramaṇḍalam|","gatirna lakṣyate martyaistathā kṛṣṇasya daivataiḥ|| 9"],"meaning":"जैसे बिजली मेघमण्डलको छोड़कर जब आकाशमें प्रवेश करती है, तब मनुष्य उसकी चाल नहीं देख पाते, वैसे ही बड़े-बड़े देवता भी श्रीकृष्णकी गतिके सम्बन्धमें कुछ न जान सके॥ ९॥"},{"id":"11.31.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/10/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।","विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा॥ १०"],"iast":["brahmarudrādayaste tu dṛṣṭvā yogagatiṃ hareḥ|","vismitāstāṃ praśaṃsantaḥ svaṃ svaṃ lokaṃ yayustadā|| 10"],"meaning":"ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्‌की यह परमयोगमयी गति देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने लोकमें चले गये॥ १०॥"},{"id":"11.31.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/11/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा","मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।","सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते","संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते॥ ११"],"iast":["rājan parasya tanubhṛjjananāpyayehā","māyāviḍambanamavehi yathā naṭasya|","sṛṣṭvā''tmanedamanuviśya vihṛtya cānte","saṃhṛtya cātmamahimoparataḥ sa āste|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! जैसे नट अनेकों प्रकारके स्वाँग बनाता है, परन्तु रहता है उन सबसे निर्लेप; वैसे ही भगवान्‌का मनुष्योंके समान जन्म लेना, लीला करना और फिर उसे संवरण कर लेना उनकी मायाका विलासमात्र है—अभिनयमात्र है। वे स्वयं ही इस जगत‍्की सृष्टि करके इसमें प्रवेश करके विहार करते हैं और अन्तमें संहार-लीला करके अपने अनन्त महिमामय स्वरूपमें ही स्थित हो जाते हैं॥ ११॥"},{"id":"11.31.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/12/","page":904,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं","त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।","जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः","किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२"],"iast":["martyena yo gurusutaṃ yamalokanītaṃ","tvāṃ cānayaccharaṇadaḥ paramāstradagdham|","jigye'ntakāntakamapīśamasāvanīśaḥ","kiṃ svāvane svaranayanmṛgayuṃ sadeham|| 12"],"meaning":"सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी चला गया था, परन्तु उसे वे मनुष्य-शरीरके साथ लौटा लाये। तुम्हारा ही शरीर ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था; परन्तु उन्होंने तुम्हें जीवित कर दिया। वास्तवमें उनकी शरणागतवत्सलता ऐसी ही है। और तो क्या कहूँ, उन्होंने कालोंके महाकाल भगवान् शंकरको भी युद्धमें जीत लिया और अत्यन्त अपराधी—अपने शरीरपर ही प्रहार करनेवाले व्याधको भी सदेह स्वर्ग भेज दिया। प्रिय परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें क्या वे अपने शरीरको सदाके लिये यहाँ नहीं रख सकते थे? अवश्य ही रख सकते थे॥ १२॥"},{"id":"11.31.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/13/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये-","ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् ।","नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं","मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३"],"iast":["tathāpyaśeṣasthitisambhavāpyaye-","ṣvananyaheturyadaśeṣaśaktidhṛk |","naicchat praṇetuṃ vapuratra śeṣitaṃ","martyena kiṃ svasthagatiṃ pradarśayan|| 13"],"meaning":"यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारके निरपेक्ष कारण हैं और सम्पूर्ण शक्तियोंके धारण करनेवाले हैं तथापि उन्होंने अपने शरीरको इस संसारमें बचा रखनेकी इच्छा नहीं की। इससे उन्होंने यह दिखाया कि इस मनुष्य-शरीरसे मुझे क्या प्रयोजन है? आत्मनिष्ठ पुरुषोंके लिये यही आदर्श है कि वे शरीर रखनेकी चेष्टा न करें॥ १३॥"},{"id":"11.31.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/14/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।","प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४"],"iast":["ya etāṃ prātarutthāya kṛṣṇasya padavīṃ parām|","prayataḥ kīrtayed bhaktyā tāmevāpnotyanuttamām|| 14"],"meaning":"जो पुरुष प्रातःकाल उठकर भगवान् श्रीकृष्णके परमधामगमनकी इस कथाका एकाग्रता और भक्तिके साथ कीर्तन करेगा, उसे भगवान्‌का वही सर्वश्रेष्ठ परमपद प्राप्त होगा॥ १४॥"},{"id":"11.31.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/15/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।","पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिंचत् कृष्णविच्युतः॥ १५"],"iast":["dāruko dvārakāmetya vasudevograsenayoḥ|","patitvā caraṇāvasrairnyaṣiṃcat kṛṣṇavicyutaḥ|| 15"],"meaning":"इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर-गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा॥ १५॥"},{"id":"11.31.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/16/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।","तच्छ्रुत्वोद्वि‌ग्‍नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः॥ १६"],"iast":["kathayāmāsa nidhanaṃ vṛṣṇīnāṃ kṛtsnaśo nṛpa|","tacchrutvodvignahṛdayā janāḥ śokavimūrcchitāḥ|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! उसने अपनेको सँभालकर यदुवंशियोंके विनाशका पूरा-पूरा विवरण कह सुनाया। उसे सुनकर लोग बहुत ही दुःखी हुए और मारे शोकके मूर्च्छित हो गये॥ १६॥"},{"id":"11.31.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/17/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्‍लेषविह्वलाः।","व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम्॥ १७"],"iast":["tatra sma tvaritā jagmuḥ kṛṣṇaviśleṣavihvalāḥ|","vyasavaḥ śerate yatra jñātayo ghnanta ānanam|| 17"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे विह्वल होकर वे लोग सिर पीटते हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धु निष्प्राण होकर पड़े हुए थे॥ १७॥"},{"id":"11.31.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/18/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ।","कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम्॥ १८"],"iast":["devakī rohiṇī caiva vasudevastathā sutau|","kṛṣṇarāmāvapaśyantaḥ śokārtā vijahuḥ smṛtim|| 18"],"meaning":"देवकी, रोहिणी और वसुदेवजी अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलरामको न देखकर शोककी पीड़ासे बेहोश हो गये॥ १८॥"},{"id":"11.31.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/19/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राणांश्‍च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः।","उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः॥ १९"],"iast":["prāṇāṃśca vijahustatra bhagavadvirahāturāḥ|","upaguhya patīṃstāta citāmāruruhuḥ striyaḥ|| 19"],"meaning":"उन्होंने भगवद्विरहसे व्याकुल होकर वहीं अपने प्राण छोड़ दिये। स्त्रियोंने अपने-अपने पतियोंके शव पहचानकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और उनके साथ चितापर बैठकर भस्म हो गयीं॥ १९॥"},{"id":"11.31.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/20/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रामपत्‍न्यश्‍च तद्देहमुपगुह्याग्‍निमाविशन्।","वसुदेवपत्‍न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्‍नादीन् हरेः स्नुषाः।","कृष्णपत्‍न्योऽविशन्‍नग्‍निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः॥ २०"],"iast":["rāmapatnyaśca taddehamupaguhyāgnimāviśan|","vasudevapatnyastadgātraṃ pradyumnādīn hareḥ snuṣāḥ|","kṛṣṇapatnyo'viśannagniṃ rukmiṇyādyāstadātmikāḥ|| 20"],"meaning":"बलरामजीकी पत्‍नियाँ उनके शरीरको, वसुदेवजीकी पत्‍नियाँ उनके शवको और भगवान्‌की पुत्रवधुएँ अपने पतियोंकी लाशोंको लेकर अग्‍निमें प्रवेश कर गयीं। भगवान् श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि पटरानियाँ उनके ध्यानमें म‌ग्‍न होकर अग्‍निमें प्रविष्ट हो गयीं॥ २०॥"},{"id":"11.31.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/21/","page":905,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः।","आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः॥ २१"],"iast":["arjunaḥ preyasaḥ sakhyuḥ kṛṣṇasya virahāturaḥ|","ātmānaṃ sāntvayāmāsa kṛṣṇagītaiḥ saduktibhiḥ|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! अर्जुन अपने प्रियतम और सखा भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे पहले तो अत्यन्त व्याकुल हो गये; फिर उन्होंने उन्हींके गीतोक्त सदु-पदेशोंका स्मरण करके अपने मनको सँभाला॥ २१॥"},{"id":"11.31.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/22/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम्।","हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः॥ २२"],"iast":["bandhūnāṃ naṣṭagotrāṇāmarjunaḥ sāmparāyikam|","hatānāṃ kārayāmāsa yathāvadanupūrvaśaḥ|| 22"],"meaning":"यदुवंशके मृत व्यक्तियोंमें जिनको कोई पिण्ड देनेवाला न था, उनका श्राद्ध अर्जुनने क्रमशः विधिपूर्वक करवाया॥ २२॥"},{"id":"11.31.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/23/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।","वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम्॥ २३"],"iast":["dvārakāṃ hariṇā tyaktāṃ samudro'plāvayat kṣaṇāt|","varjayitvā mahārāja śrīmadbhagavadālayam|| 23"],"meaning":"महाराज! भगवान्‌के न रहनेपर समुद्रने एकमात्र भगवान् श्रीकृष्णका निवासस्थान छोड़कर एक ही क्षणमें सारी द्वारका डुबो दी॥ २३॥"},{"id":"11.31.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/24/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नित्यं सन्‍निहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः।","स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमंगलमंगलम्॥ २४"],"iast":["nityaṃ sannihitastatra bhagavān madhusūdanaḥ|","smṛtyāśeṣāśubhaharaṃ sarvamaṃgalamaṃgalam|| 24"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ अब भी सदा-सर्वदा निवास करते हैं। वह स्थान स्मरणमात्रसे ही सारे पाप-तापोंका नाश करनेवाला और सर्वमंगलोंको भी मंगल बनानेवाला है॥ २४॥"},{"id":"11.31.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/25/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः।","इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत्॥ २५"],"iast":["strībālavṛddhānādāya hataśeṣān dhanaṃjayaḥ|","indraprasthaṃ samāveśya vajraṃ tatrābhyaṣecayat|| 25"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! पिण्डदानके अनन्तर बची-खुची स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँ सबको यथायोग्य बसाकर अनिरुद्धके पुत्र वज्रका राज्याभिषेक कर दिया॥ २५॥"},{"id":"11.31.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/26/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्‍नर्जुनात्ते पितामहाः।","त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम्॥ २६"],"iast":["śrutvā suhṛdvadhaṃ rājannarjunātte pitāmahāḥ|","tvāṃ tu vaṃśadharaṃ kṛtvā jagmuḥ sarve mahāpatham|| 26"],"meaning":"राजन्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंको अर्जुनसे ही यह बात मालूम हुई कि यदुवंशियोंका संहार हो गया है। तब उन्होंने अपने वंशधर तुम्हें राज्यपदपर अभिषिक्त करके हिमालयकी वीरयात्रा की॥ २६॥"},{"id":"11.31.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/27/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।","कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७"],"iast":["ya etad devadevasya viṣṇoḥ karmāṇi janma ca|","kīrtayecchraddhayā martyaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate|| 27"],"meaning":"मैंने तुम्हें देवताओंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णकी जन्मलीला और कर्मलीला सुनायी। जो मनुष्य श्रद्धाके साथ इसका कीर्तन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २७॥"},{"id":"11.31.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/28/","page":906,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-","वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि।","अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो","भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत॥ २८"],"iast":["itthaṃ harerbhagavato rucirāvatāra-","vīryāṇi bālacaritāni ca śantamāni|","anyatra ceha ca śrutāni gṛṇan manuṣyo","bhaktiṃ parāṃ paramahaṃsagatau labheta|| 28"],"meaning":"परीक्षित्! जो मनुष्य इस प्रकार भक्तभयहारी निखिल सौन्दर्य-माधुर्यनिधि श्रीकृष्णचन्द्रके अवतार-सम्बन्धी रुचिर पराक्रम और इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें तथा दूसरे पुराणोंमें वर्णित परमानन्दमयी बाललीला, कैशोरलीला आदिका संकीर्तन करता है, वह परमहंस मुनीन्द्रोंके अन्तिम प्राप्तव्य श्रीकृष्णके चरणोंमें पराभक्ति प्राप्त करता है॥ २८॥"}],"text":[{"b":41919,"kind":"adhyaya_heading","page":903,"text":"अथैकत्रिंशोऽध्यायः"},{"b":41920,"kind":"topic_heading","page":903,"text":"श्रीभगवान्‌का स्वधामगमन"},{"b":41921,"kind":"topic_heading","page":903,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":41922,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.1"],"text":"अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः।"},{"b":41923,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.1"],"text":"महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्‍वराः॥ १"},{"b":41924,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.2"],"text":"पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः।"},{"b":41925,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.2"],"text":"चारणा यक्षरक्षांसि किन्‍नराप्सरसो द्विजाः॥ २"},{"b":41926,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.3"],"text":"द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः।"},{"b":41927,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.3"],"text":"गायन्तश्‍च गृणन्तश्‍च शौरेः कर्माणि जन्म च॥ ३"},{"b":41928,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.4"],"text":"ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः।"},{"b":41929,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.4"],"text":"कुर्वन्तः संकुलं राजन् भक्त्या परमया युताः॥ ४"},{"b":41930,"kind":"hindi_commentary","page":903,"explains":["11.31.1","11.31.2","11.31.3","11.31.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥"},{"b":41931,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.5"],"text":"भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभुः।"},{"b":41932,"kind":"sanskrit_shloka","page":903,"verses":["11.31.5"],"text":"संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत्॥ ५"},{"b":41933,"kind":"hindi_commentary","page":903,"explains":["11.31.5"],"text":"सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजी और अपने विभूतिस्वरूप देवताओंको देखकर अपने आत्माको स्वरूपमें स्थित किया और कमलके समान नेत्र बंद कर लिये॥ ५॥"},{"b":41934,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.6"],"text":"लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमंगलम्।"},{"b":41935,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.6"],"text":"योगधारणयाऽऽ‌ग्‍नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६"},{"b":41936,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.7"],"text":"दिवि दुन्दुभयो नेदुः पेतुः सुमनसश्‍च खात्।"},{"b":41937,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.7"],"text":"सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्‍चानु तं ययुः॥ ७"},{"b":41938,"kind":"hindi_translation","page":904,"explains":["11.31.6","11.31.7"],"text":"भगवान्‌का श्रीविग्रह उपासकोंके ध्यान और धारणाका मंगलमय आधार और समस्त लोकोंके लिये परम रमणीय आश्रय है; इसलिये उन्होंने (योगियोंके समान) अग्‍निदेवतासम्बन्धी योगधारणाके द्वारा उसको जलाया नहीं, सशरीर अपने धाममें चले गये॥ ६॥ उस समय स्वर्गमें नगारे बजने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे इस लोकसे सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गयीं॥ ७॥"},{"b":41939,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.8"],"text":"देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।"},{"b":41940,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.8"],"text":"अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्‍चातिविस्मिताः॥ ८"},{"b":41941,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.9"],"text":"सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम्।"},{"b":41942,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.9"],"text":"गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतैः॥ ९"},{"b":41943,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.10"],"text":"ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।"},{"b":41944,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.10"],"text":"विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा॥ १०"},{"b":41945,"kind":"hindi_translation","page":904,"explains":["11.31.8","11.31.9","11.31.10"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णकी गति मन और वाणीके परे है; तभी तो जब भगवान् अपने धाममें प्रवेश करने लगे, तब ब्रह्मादि देवता भी उन्हें न देख सके। इस घटनासे उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ॥ ८॥ जैसे बिजली मेघमण्डलको छोड़कर जब आकाशमें प्रवेश करती है, तब मनुष्य उसकी चाल नहीं देख पाते, वैसे ही बड़े-बड़े देवता भी श्रीकृष्णकी गतिके सम्बन्धमें कुछ न जान सके॥ ९॥ ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्‌की यह परमयोगमयी गति देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने लोकमें चले गये॥ १०॥"},{"b":41946,"kind":"hindi_commentary","page":904,"verses":["11.31.11"],"text":"राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा"},{"b":41947,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.11"],"text":"मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।"},{"b":41948,"kind":"hindi_commentary","page":904,"verses":["11.31.11"],"text":"सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते"},{"b":41949,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.11"],"text":"संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते॥ ११"},{"b":41950,"kind":"hindi_commentary","page":904,"verses":["11.31.12"],"text":"मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं"},{"b":41951,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.12"],"text":"त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।"},{"b":41952,"kind":"hindi_commentary","page":904,"verses":["11.31.12"],"text":"जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः"},{"b":41953,"kind":"sanskrit_shloka","page":904,"verses":["11.31.12"],"text":"किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२"},{"b":41954,"kind":"hindi_commentary","page":905,"verses":["11.31.13"],"text":"तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये-"},{"b":41955,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.13"],"text":"ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् ।"},{"b":41956,"kind":"hindi_commentary","page":905,"verses":["11.31.13"],"text":"नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं"},{"b":41957,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.13"],"text":"मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३"},{"b":41958,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.14"],"text":"य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।"},{"b":41959,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.14"],"text":"प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४"},{"b":41960,"kind":"hindi_commentary","page":904,"explains":["11.31.11","11.31.12","11.31.13","11.31.14"],"text":"परीक्षित्! जैसे नट अनेकों प्रकारके स्वाँग बनाता है, परन्तु रहता है उन सबसे निर्लेप; वैसे ही भगवान्‌का मनुष्योंके समान जन्म लेना, लीला करना और फिर उसे संवरण कर लेना उनकी मायाका विलासमात्र है—अभिनयमात्र है। वे स्वयं ही इस जगत‍्की सृष्टि करके इसमें प्रवेश करके विहार करते हैं और अन्तमें संहार-लीला करके अपने अनन्त महिमामय स्वरूपमें ही स्थित हो जाते हैं॥ ११॥ सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी चला गया था, परन्तु उसे वे मनुष्य-शरीरके साथ लौटा लाये। तुम्हारा ही शरीर ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था; परन्तु उन्होंने तुम्हें जीवित कर दिया। वास्तवमें उनकी शरणागतवत्सलता ऐसी ही है। और तो क्या कहूँ, उन्होंने कालोंके महाकाल भगवान् शंकरको भी युद्धमें जीत लिया और अत्यन्त अपराधी—अपने शरीरपर ही प्रहार करनेवाले व्याधको भी सदेह स्वर्ग भेज दिया। प्रिय परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें क्या वे अपने शरीरको सदाके लिये यहाँ नहीं रख सकते थे? अवश्य ही रख सकते थे॥ १२॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारके निरपेक्ष कारण हैं और सम्पूर्ण शक्तियोंके धारण करनेवाले हैं तथापि उन्होंने अपने शरीरको इस संसारमें बचा रखनेकी इच्छा नहीं की। इससे उन्होंने यह दिखाया कि इस मनुष्य-शरीरसे मुझे क्या प्रयोजन है? आत्मनिष्ठ पुरुषोंके लिये यही आदर्श है कि वे शरीर रखनेकी चेष्टा न करें॥ १३॥ जो पुरुष प्रातःकाल उठकर भगवान् श्रीकृष्णके परमधामगमनकी इस कथाका एकाग्रता और भक्तिके साथ कीर्तन करेगा, उसे भगवान्‌का वही सर्वश्रेष्ठ परमपद प्राप्त होगा॥ १४॥"},{"b":41961,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.15"],"text":"दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।"},{"b":41962,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.15"],"text":"पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिंचत् कृष्णविच्युतः॥ १५"},{"b":41963,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.16"],"text":"कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।"},{"b":41964,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.16"],"text":"तच्छ्रुत्वोद्वि‌ग्‍नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः॥ १६"},{"b":41965,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.17"],"text":"तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्‍लेषविह्वलाः।"},{"b":41966,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.17"],"text":"व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम्॥ १७"},{"b":41967,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.18"],"text":"देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ।"},{"b":41968,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.18"],"text":"कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम्॥ १८"},{"b":41969,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.19"],"text":"प्राणांश्‍च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः।"},{"b":41970,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.19"],"text":"उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः॥ १९"},{"b":41971,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.20"],"text":"रामपत्‍न्यश्‍च तद्देहमुपगुह्याग्‍निमाविशन्।"},{"b":41972,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.20"],"text":"वसुदेवपत्‍न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्‍नादीन् हरेः स्नुषाः।"},{"b":41973,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.20"],"text":"कृष्णपत्‍न्योऽविशन्‍नग्‍निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः॥ २०"},{"b":41974,"kind":"hindi_commentary","page":905,"explains":["11.31.15","11.31.16","11.31.17","11.31.18","11.31.19","11.31.20"],"text":"इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर-गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा॥ १५॥ परीक्षित्! उसने अपनेको सँभालकर यदुवंशियोंके विनाशका पूरा-पूरा विवरण कह सुनाया। उसे सुनकर लोग बहुत ही दुःखी हुए और मारे शोकके मूर्च्छित हो गये॥ १६॥ भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे विह्वल होकर वे लोग सिर पीटते हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धु निष्प्राण होकर पड़े हुए थे॥ १७॥ देवकी, रोहिणी और वसुदेवजी अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलरामको न देखकर शोककी पीड़ासे बेहोश हो गये॥ १८॥ उन्होंने भगवद्विरहसे व्याकुल होकर वहीं अपने प्राण छोड़ दिये। स्त्रियोंने अपने-अपने पतियोंके शव पहचानकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और उनके साथ चितापर बैठकर भस्म हो गयीं॥ १९॥ बलरामजीकी पत्‍नियाँ उनके शरीरको, वसुदेवजीकी पत्‍नियाँ उनके शवको और भगवान्‌की पुत्रवधुएँ अपने पतियोंकी लाशोंको लेकर अग्‍निमें प्रवेश कर गयीं। भगवान् श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि पटरानियाँ उनके ध्यानमें म‌ग्‍न होकर अग्‍निमें प्रविष्ट हो गयीं॥ २०॥"},{"b":41975,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.21"],"text":"अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः।"},{"b":41976,"kind":"sanskrit_shloka","page":905,"verses":["11.31.21"],"text":"आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः॥ २१"},{"b":41977,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.22"],"text":"बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम्।"},{"b":41978,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.22"],"text":"हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः॥ २२"},{"b":41979,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.23"],"text":"द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।"},{"b":41980,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.23"],"text":"वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम्॥ २३"},{"b":41981,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.24"],"text":"नित्यं सन्‍निहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः।"},{"b":41982,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.24"],"text":"स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमंगलमंगलम्॥ २४"},{"b":41983,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.25"],"text":"स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः।"},{"b":41984,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.25"],"text":"इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत्॥ २५"},{"b":41985,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.26"],"text":"श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्‍नर्जुनात्ते पितामहाः।"},{"b":41986,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.26"],"text":"त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम्॥ २६"},{"b":41987,"kind":"hindi_commentary","page":905,"explains":["11.31.21","11.31.22","11.31.23","11.31.24","11.31.25","11.31.26"],"text":"परीक्षित्! अर्जुन अपने प्रियतम और सखा भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे पहले तो अत्यन्त व्याकुल हो गये; फिर उन्होंने उन्हींके गीतोक्त सदु-पदेशोंका स्मरण करके अपने मनको सँभाला॥ २१॥ यदुवंशके मृत व्यक्तियोंमें जिनको कोई पिण्ड देनेवाला न था, उनका श्राद्ध अर्जुनने क्रमशः विधिपूर्वक करवाया॥ २२॥ महाराज! भगवान्‌के न रहनेपर समुद्रने एकमात्र भगवान् श्रीकृष्णका निवासस्थान छोड़कर एक ही क्षणमें सारी द्वारका डुबो दी॥ २३॥ भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ अब भी सदा-सर्वदा निवास करते हैं। वह स्थान स्मरणमात्रसे ही सारे पाप-तापोंका नाश करनेवाला और सर्वमंगलोंको भी मंगल बनानेवाला है॥ २४॥ प्रिय परीक्षित्! पिण्डदानके अनन्तर बची-खुची स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ोंको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँ सबको यथायोग्य बसाकर अनिरुद्धके पुत्र वज्रका राज्याभिषेक कर दिया॥ २५॥ राजन्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंको अर्जुनसे ही यह बात मालूम हुई कि यदुवंशियोंका संहार हो गया है। तब उन्होंने अपने वंशधर तुम्हें राज्यपदपर अभिषिक्त करके हिमालयकी वीरयात्रा की॥ २६॥"},{"b":41988,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.27"],"text":"य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।"},{"b":41989,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.27"],"text":"कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७"},{"b":41990,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.28"],"text":"इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-"},{"b":41991,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.28"],"text":"वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि।"},{"b":41992,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.28"],"text":"अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो"},{"b":41993,"kind":"sanskrit_shloka","page":906,"verses":["11.31.28"],"text":"भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत॥ २८"},{"b":41994,"kind":"hindi_translation","page":906,"explains":["11.31.27","11.31.28"],"text":"मैंने तुम्हें देवताओंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णकी जन्मलीला और कर्मलीला सुनायी। जो मनुष्य श्रद्धाके साथ इसका कीर्तन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २७॥ परीक्षित्! जो मनुष्य इस प्रकार भक्तभयहारी निखिल सौन्दर्य-माधुर्यनिधि श्रीकृष्णचन्द्रके अवतार-सम्बन्धी रुचिर पराक्रम और इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें तथा दूसरे पुराणोंमें वर्णित परमानन्दमयी बाललीला, कैशोरलीला आदिका संकीर्तन करता है, वह परमहंस मुनीन्द्रोंके अन्तिम प्राप्तव्य श्रीकृष्णके चरणोंमें पराभक्ति प्राप्त करता है॥ २८॥"},{"b":41995,"kind":"hindi_translation","page":906,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥"},{"b":41996,"kind":"hindi_commentary","page":906,"text":"॥ इत्येकादशः स्कन्धः समाप्तः॥"},{"b":41997,"kind":"hindi_commentary","page":906,"text":"॥ हरिः ॐ तत्सत्॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":4,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}