{"id":"12.1","title":"द्वादश स्कन्ध · अध्याय 1","part":"द्वादश स्कन्ध","heading":"अथ प्रथमोऽध्यायः","topics":["कलियुगके राजवंशोंका वर्णन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 12.1.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[907,911]},"verses":[{"id":"12.1.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/1/","page":907,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["स्वधामानुगते कृष्णे यदुवंशविभूषणे।","कस्य वंशोऽभवत् पृथ्व्यामेतदाचक्ष्व मे मुने॥ १"],"iast":["svadhāmānugate kṛṣṇe yaduvaṃśavibhūṣaṇe|","kasya vaṃśo'bhavat pṛthvyāmetadācakṣva me mune|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब अपने परमधाम पधार गये, तब पृथ्वीपर किस वंशका राज्य हुआ? तथा अब किसका राज्य होगा? आप कृपा करके मुझे यह बतलाइये॥ १॥"},{"id":"12.1.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/2/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योऽन्त्यः पुरंजयो नाम भाव्यो बार्हद्रथो नृप।","तस्यामात्यस्तु शुनको हत्वा स्वामिनमात्मजम्॥ २"],"iast":["yo'ntyaḥ puraṃjayo nāma bhāvyo bārhadratho nṛpa|","tasyāmātyastu śunako hatvā svāminamātmajam|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—प्रिय परीक्षित्! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय। उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी ‘प्रद्योतन’। ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २—४॥","meaning_covers":[2,4]},{"id":"12.1.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/3/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रद्योतसंज्ञं राजानं कर्ता यत् पालकः सुतः।","विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः॥ ३"],"iast":["pradyotasaṃjñaṃ rājānaṃ kartā yat pālakaḥ sutaḥ|","viśākhayūpastatputro bhavitā rājakastataḥ|| 3"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—प्रिय परीक्षित्! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय। उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी ‘प्रद्योतन’। ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २—४॥","meaning_covers":[2,4]},{"id":"12.1.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/4/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दिवर्धनस्तत्पुत्रः पंच प्रद्योतना इमे।","अष्टत्रिंशोत्तरशतं भोक्ष्यन्ति पृथिवीं नृपाः॥ ४"],"iast":["nandivardhanastatputraḥ paṃca pradyotanā ime|","aṣṭatriṃśottaraśataṃ bhokṣyanti pṛthivīṃ nṛpāḥ|| 4"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—प्रिय परीक्षित्! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय। उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी ‘प्रद्योतन’। ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २—४॥","meaning_covers":[2,4]},{"id":"12.1.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/5/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिशुनागस्ततो भाव्यः काकवर्णस्तु तत्सुतः।","क्षेमधर्मा तस्य सुतः क्षेत्रज्ञः क्षेमधर्मजः॥ ५"],"iast":["śiśunāgastato bhāvyaḥ kākavarṇastu tatsutaḥ|","kṣemadharmā tasya sutaḥ kṣetrajñaḥ kṣemadharmajaḥ|| 5"],"meaning":"इसके पश्‍चात् शिशुनाग नामका राजा होगा। शिशुनागका काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्माका पुत्र होगा क्षेत्रज्ञ॥ ५॥"},{"id":"12.1.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/6/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विधिसारः सुतस्तस्याजातशत्रुर्भविष्यति।","दर्भकस्तत्सुतो भावी दर्भकस्याजयः स्मृतः॥ ६"],"iast":["vidhisāraḥ sutastasyājātaśatrurbhaviṣyati|","darbhakastatsuto bhāvī darbhakasyājayaḥ smṛtaḥ|| 6"],"meaning":"क्षेत्रज्ञका विधिसार, उसका अजातशत्रु, फिर दर्भक और दर्भकका पुत्र अजय होगा॥ ६॥"},{"id":"12.1.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/7/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दिवर्धन आजेयो महानन्दिः सुतस्ततः।","शिशुनागा दशैवैते षष्ठ्युत्तरशतत्रयम्॥ ७"],"iast":["nandivardhana ājeyo mahānandiḥ sutastataḥ|","śiśunāgā daśaivaite ṣaṣṭhyuttaraśatatrayam|| 7"],"meaning":"अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा। शिशुनाग-वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे। प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्‍नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा। वह बड़ा बलवान् होगा। महानन्दि ‘महापद्म’ नामक निधिका अधिपति होगा। इसीलिये लोग उसे ‘महापद्म’ भी कहेंगे। वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा। तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे॥ ७—९॥","meaning_covers":[7,9]},{"id":"12.1.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/8/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कुरुश्रेष्ठ कलौ नृपाः।","महानन्दिसुतो राजन् शूद्रीगर्भोद्भवो बली॥ ८"],"iast":["samā bhokṣyanti pṛthivīṃ kuruśreṣṭha kalau nṛpāḥ|","mahānandisuto rājan śūdrīgarbhodbhavo balī|| 8"],"meaning":"अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा। शिशुनाग-वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे। प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्‍नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा। वह बड़ा बलवान् होगा। महानन्दि ‘महापद्म’ नामक निधिका अधिपति होगा। इसीलिये लोग उसे ‘महापद्म’ भी कहेंगे। वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा। तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे॥ ७—९॥","meaning_covers":[7,9]},{"id":"12.1.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/9/","page":907,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महापद्मपतिः कश्‍चिन्‍नन्दः क्षत्रविनाशकृत्।","ततो नृपा भविष्यन्ति शूद्रप्रायास्त्वधार्मिकाः॥ ९"],"iast":["mahāpadmapatiḥ kaścinnandaḥ kṣatravināśakṛt|","tato nṛpā bhaviṣyanti śūdraprāyāstvadhārmikāḥ|| 9"],"meaning":"अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा। शिशुनाग-वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे। प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्‍नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा। वह बड़ा बलवान् होगा। महानन्दि ‘महापद्म’ नामक निधिका अधिपति होगा। इसीलिये लोग उसे ‘महापद्म’ भी कहेंगे। वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा। तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे॥ ७—९॥","meaning_covers":[7,9]},{"id":"12.1.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/10/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एकच्छत्रां पृथिवीमनुल्लंघितशासनः।","शासिष्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गवः॥ १०"],"iast":["sa ekacchatrāṃ pṛthivīmanullaṃghitaśāsanaḥ|","śāsiṣyati mahāpadmo dvitīya iva bhārgavaḥ|| 10"],"meaning":"महापद्म पृथ्वीका एकच्छत्र शासक होगा। उसके शासनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकेगा। क्षत्रियोंके विनाशमें हेतु होनेकी दृष्टिसे तो उसे दूसरा परशुराम ही समझना चाहिये॥ १०॥"},{"id":"12.1.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/11/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य चाष्टौ भविष्यन्ति सुमाल्यप्रमुखाः सुताः।","य इमां भोक्ष्यन्ति महीं राजानः स्म शतं समाः॥ ११"],"iast":["tasya cāṣṭau bhaviṣyanti sumālyapramukhāḥ sutāḥ|","ya imāṃ bhokṣyanti mahīṃ rājānaḥ sma śataṃ samāḥ|| 11"],"meaning":"उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे। वे सभी राजा होंगे और सौ वर्षतक इस पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ ११॥"},{"id":"12.1.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/12/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नव नन्दान् द्विजः कश्‍चित् प्रपन्‍नानुद्धरिष्यति।","तेषामभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ॥ १२"],"iast":["nava nandān dvijaḥ kaścit prapannānuddhariṣyati|","teṣāmabhāve jagatīṃ mauryā bhokṣyanti vai kalau|| 12"],"meaning":"कौटिल्य, वात्स्यायन तथा चाणक्यके नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण विश्‍वविख्यात नन्द और उनके सुमाल्य आदि आठ पुत्रोंका नाश कर डालेगा। उनका नाश हो जानेपर कलियुगमें मौर्यवंशी नरपति पृथ्वीका राज्य करेंगे॥ १२॥"},{"id":"12.1.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/13/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एव चन्द्रगुप्तं वै द्विजो राज्येऽभिषेक्ष्यति।","तत्सुतो वारिसारस्तु ततश्‍चाशोकवर्धनः॥ १३"],"iast":["sa eva candraguptaṃ vai dvijo rājye'bhiṣekṣyati|","tatsuto vārisārastu tataścāśokavardhanaḥ|| 13"],"meaning":"वही ब्राह्मण पहले-पहल चन्द्रगुप्त मौर्यको राजाके पदपर अभिषिक्त करेगा। चन्द्रगुप्तका पुत्र होगा वारिसार और वारिसारका अशोकवर्द्धन॥ १३॥"},{"id":"12.1.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/14/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुयशा भविता तस्य संगतः सुयशःसुतः।","शालिशूकस्ततस्तस्य सोमशर्मा भविष्यति॥ १४"],"iast":["suyaśā bhavitā tasya saṃgataḥ suyaśaḥsutaḥ|","śāliśūkastatastasya somaśarmā bhaviṣyati|| 14"],"meaning":"अशोकवर्द्धनका पुत्र होगा सुयश। सुयशका संगत, संगतका शालिशूक और शालिशूकका सोमशर्मा॥ १४॥"},{"id":"12.1.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/15/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शतधन्वा ततस्तस्य भविता तद् बृहद्रथः।","मौर्या ह्येते दश नृपाः सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम्।","समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्वह॥ १५"],"iast":["śatadhanvā tatastasya bhavitā tad bṛhadrathaḥ|","mauryā hyete daśa nṛpāḥ saptatriṃśacchatottaram|","samā bhokṣyanti pṛthivīṃ kalau kurukulodvaha|| 15"],"meaning":"सोमशर्माका शतधन्वा और शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग। वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्‍निमित्र और अग्‍निमित्रका सुज्येष्ठ होगा॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"12.1.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/16/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हत्वा बृहद्रथं मौर्यं तस्य सेनापतिः कलौ।","पुष्यमित्रस्तु शुंगाह्वः स्वयं राज्यं करिष्यति।","अग्‍निमित्रस्ततस्तस्मात् सुज्येष्ठोऽथ भविष्यति॥ १६"],"iast":["hatvā bṛhadrathaṃ mauryaṃ tasya senāpatiḥ kalau|","puṣyamitrastu śuṃgāhvaḥ svayaṃ rājyaṃ kariṣyati|","agnimitrastatastasmāt sujyeṣṭho'tha bhaviṣyati|| 16"],"meaning":"सोमशर्माका शतधन्वा और शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग। वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्‍निमित्र और अग्‍निमित्रका सुज्येष्ठ होगा॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"12.1.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/17/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुमित्रो भद्रकश्‍च पुलिन्दो भविता ततः।","ततो घोषः सुतस्तस्माद् वज्रमित्रो भविष्यति॥ १७"],"iast":["vasumitro bhadrakaśca pulindo bhavitā tataḥ|","tato ghoṣaḥ sutastasmād vajramitro bhaviṣyati|| 17"],"meaning":"सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका भद्रक और भद्रकका पुलिन्द, पुलिन्दका घोष और घोषका पुत्र होगा वज्रमित्र॥ १७॥"},{"id":"12.1.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/18/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो भागवतस्तस्माद् देवभूतिरिति श्रुतः।","शुंगा दशैते भोक्ष्यन्ति भूमिं वर्षशताधिकम्॥ १८"],"iast":["tato bhāgavatastasmād devabhūtiriti śrutaḥ|","śuṃgā daśaite bhokṣyanti bhūmiṃ varṣaśatādhikam|| 18"],"meaning":"वज्रमित्रका भागवत और भागवतका पुत्र होगा देवभूति। शुंगवंशके ये दस नरपति एक सौ बारह वर्षतक पृथ्वीका पालन करेंगे॥ १८॥"},{"id":"12.1.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/19/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कण्वानियं भूमिर्यास्यत्यल्पगुणान् नृप।","शुंगं हत्वा देवभूतिं कण्वोऽमात्यस्तु कामिनम्॥ १९"],"iast":["tataḥ kaṇvāniyaṃ bhūmiryāsyatyalpaguṇān nṛpa|","śuṃgaṃ hatvā devabhūtiṃ kaṇvo'mātyastu kāminam|| 19"],"meaning":"परीक्षित्! शुंगवंशी नरपतियोंका राज्यकाल समाप्त होनेपर यह पृथ्वी कण्ववंशी नरपतियोंके हाथमें चली जायगी। कण्ववंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओंकी अपेक्षा कम गुणवाले होंगे। शुंगवंशका अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा। उसे उसका मन्त्री कण्ववंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबलसे स्वयं राज्य करेगा। वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्रका नारायण और नारायणका सुशर्मा। सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा॥ १९-२०॥","meaning_covers":[19,20]},{"id":"12.1.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/20/","page":908,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वयं करिष्यते राज्यं वसुदेवो महामतिः।","तस्य पुत्रस्तु भूमित्रस्तस्य नारायणः सुतः।","नारायणस्य भविता सुशर्मा नाम विश्रुतः॥ २०"],"iast":["svayaṃ kariṣyate rājyaṃ vasudevo mahāmatiḥ|","tasya putrastu bhūmitrastasya nārāyaṇaḥ sutaḥ|","nārāyaṇasya bhavitā suśarmā nāma viśrutaḥ|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! शुंगवंशी नरपतियोंका राज्यकाल समाप्त होनेपर यह पृथ्वी कण्ववंशी नरपतियोंके हाथमें चली जायगी। कण्ववंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओंकी अपेक्षा कम गुणवाले होंगे। शुंगवंशका अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा। उसे उसका मन्त्री कण्ववंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबलसे स्वयं राज्य करेगा। वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्रका नारायण और नारायणका सुशर्मा। सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा॥ १९-२०॥","meaning_covers":[19,20]},{"id":"12.1.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/21/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काण्वायना इमे भूमिं चत्वारिंशच्च पंच च।","शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ति वर्षाणां च कलौ युगे॥ २१"],"iast":["kāṇvāyanā ime bhūmiṃ catvāriṃśacca paṃca ca|","śatāni trīṇi bhokṣyanti varṣāṇāṃ ca kalau yuge|| 21"],"meaning":"कण्ववंशके ये चार नरपति काण्वायन कहलायेंगे और कलियुगमें तीन सौ पैंतालीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २१॥"},{"id":"12.1.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/22/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हत्वा काण्वं सुशर्माणं तद‍्भृत्यो वृषलो बली।","गां भोक्ष्यत्यन्ध्रजातीयः कंचित् कालमसत्तमः॥ २२"],"iast":["hatvā kāṇvaṃ suśarmāṇaṃ tadbhṛtyo vṛṣalo balī|","gāṃ bhokṣyatyandhrajātīyaḥ kaṃcit kālamasattamaḥ|| 22"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! कण्ववंशी सुशर्माका एक शूद्र सेवक होगा—बली। वह अन्ध्रजातिका एवं बड़ा दुष्ट होगा। वह सुशर्माको मारकर कुछ समयतक स्वयं पृथ्वीका राज्य करेगा॥ २२॥"},{"id":"12.1.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/23/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णनामाथ तद‍्भ्राता भविता पृथिवीपतिः।","श्रीशान्तकर्णस्तत्पुत्रः पौर्णमासस्तु तत्सुतः॥ २३"],"iast":["kṛṣṇanāmātha tadbhrātā bhavitā pṛthivīpatiḥ|","śrīśāntakarṇastatputraḥ paurṇamāsastu tatsutaḥ|| 23"],"meaning":"इसके बाद उसका भाई कृष्ण राजा होगा। कृष्णका पुत्र श्रीशान्तकर्ण और उसका पौर्णमास होगा॥ २३॥"},{"id":"12.1.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/24/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लम्बोदरस्तु तत्पुत्रस्तस्माच्चिबिलको नृपः।","मेघस्वातिश्‍चिबिलकादटमानस्तु तस्य च॥ २४"],"iast":["lambodarastu tatputrastasmāccibilako nṛpaḥ|","meghasvātiścibilakādaṭamānastu tasya ca|| 24"],"meaning":"पौर्णमासका लम्बोदर और लम्बोदरका पुत्र चिबिलक होगा। चिबिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिका अटमान, अटमानका अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्माका हालेय, हालेयका तलक, तलकका पुरीषभीरु और पुरीषभीरुका पुत्र होगा राजा सुनन्दन॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"12.1.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/25/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनिष्टकर्मा हालेयस्तलकस्तस्य चात्मजः।","पुरीषभीरुस्तत्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः॥ २५"],"iast":["aniṣṭakarmā hāleyastalakastasya cātmajaḥ|","purīṣabhīrustatputrastato rājā sunandanaḥ|| 25"],"meaning":"पौर्णमासका लम्बोदर और लम्बोदरका पुत्र चिबिलक होगा। चिबिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिका अटमान, अटमानका अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्माका हालेय, हालेयका तलक, तलकका पुरीषभीरु और पुरीषभीरुका पुत्र होगा राजा सुनन्दन॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"12.1.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/26/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चकोरो बहवो यत्र शिवस्वातिररिन्दमः।","तस्यापि गोमतीपुत्रः पुरीमान् भविता ततः॥ २६"],"iast":["cakoro bahavo yatra śivasvātirarindamaḥ|","tasyāpi gomatīputraḥ purīmān bhavitā tataḥ|| 26"],"meaning":"परीक्षित्! सुनन्दनका पुत्र होगा चकोर; चकोरके आठ पुत्र होंगे, जो सभी ‘बहु’ कहलायेंगे। इनमें सबसे छोटेका नाम होगा शिवस्वाति। वह बड़ा वीर होगा और शत्रुओंका दमन करेगा। शिवस्वातिका गोमतीपुत्र और उसका पुत्र होगा पुरीमान्॥ २६॥"},{"id":"12.1.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/27/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मेदःशिराः शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः।","विजयस्तत्सुतो भाव्यश्‍चन्द्रविज्ञः सलोमधिः॥ २७"],"iast":["medaḥśirāḥ śivaskando yajñaśrīstatsutastataḥ|","vijayastatsuto bhāvyaścandravijñaḥ salomadhiḥ|| 27"],"meaning":"पुरीमान्का मेदःशिरा, मेदःशिराका शिवस्कन्द, शिवस्कन्दका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका विजय और विजयके दो पुत्र होंगे—चन्द्रविज्ञ और लोमधि॥ २७॥"},{"id":"12.1.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/28/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एते त्रिंशन्‍नृपतयश्‍चत्वार्यब्दशतानि च।","षट्पंचाशच्च पृथिवीं भोक्ष्यन्ति कुरुनन्दन॥ २८"],"iast":["ete triṃśannṛpatayaścatvāryabdaśatāni ca|","ṣaṭpaṃcāśacca pṛthivīṃ bhokṣyanti kurunandana|| 28"],"meaning":"परीक्षित्! ये तीस राजा चार सौ छप्पन वर्षतक पृथ्वीका राज्य भोगेंगे॥ २८॥"},{"id":"12.1.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/29/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सप्ताभीरा आवभृत्या दश गर्दभिनो नृपाः।","कंकाः षोडश भूपाला भविष्यन्त्यतिलोलुपाः॥ २९"],"iast":["saptābhīrā āvabhṛtyā daśa gardabhino nṛpāḥ|","kaṃkāḥ ṣoḍaśa bhūpālā bhaviṣyantyatilolupāḥ|| 29"],"meaning":"परीक्षित्! इसके पश्‍चात् अवभृति-नगरीके सात आभीर, दस गर्दभी और सोलह कंक पृथ्वीका राज्य करेंगे। ये सब-के-सब बड़े लोभी होंगे॥ २९॥"},{"id":"12.1.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/30/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽष्टौ यवना भाव्याश्‍चतुर्दश तुरुष्ककाः।","भूयो दश गुरुण्डाश्‍च मौना एकादशैव तु॥ ३०"],"iast":["tato'ṣṭau yavanā bhāvyāścaturdaśa turuṣkakāḥ|","bhūyo daśa guruṇḍāśca maunā ekādaśaiva tu|| 30"],"meaning":"इनके बाद आठ यवन और चौदह तुर्क राज्य करेंगे। इसके बाद दस गुरुण्ड और ग्यारह मौन नरपति होंगे॥ ३०॥"},{"id":"12.1.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/31/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एते भोक्ष्यन्ति पृथिवीं दशवर्षशतानि च।","नवाधिकां च नवतिं मौना एकादश क्षितिम्॥ ३१"],"iast":["ete bhokṣyanti pṛthivīṃ daśavarṣaśatāni ca|","navādhikāṃ ca navatiṃ maunā ekādaśa kṣitim|| 31"],"meaning":"मौनोंके अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे। जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा। भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक—ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"12.1.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/32/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भोक्ष्यन्त्यब्दशतान्यंग त्रीणि तैः संस्थिते ततः।","किलिकिलायां नृपतयो भूतनन्दोऽथ वंगिरिः॥ ३२"],"iast":["bhokṣyantyabdaśatānyaṃga trīṇi taiḥ saṃsthite tataḥ|","kilikilāyāṃ nṛpatayo bhūtanando'tha vaṃgiriḥ|| 32"],"meaning":"मौनोंके अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे। जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा। भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक—ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"12.1.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/33/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिशुनन्दिश्‍च तद‍्भ्राता यशोनन्दिः प्रवीरकः।","इत्येते वै वर्षशतं भविष्यन्त्यधिकानि षट्॥ ३३"],"iast":["śiśunandiśca tadbhrātā yaśonandiḥ pravīrakaḥ|","ityete vai varṣaśataṃ bhaviṣyantyadhikāni ṣaṭ|| 33"],"meaning":"मौनोंके अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे। जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा। भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक—ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"12.1.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/34/","page":909,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेषां त्रयोदश सुता भवितारश्‍च बाह्लिकाः।","पुष्पमित्रोऽथ राजन्यो दुर्मित्रोऽस्य तथैव च॥ ३४"],"iast":["teṣāṃ trayodaśa sutā bhavitāraśca bāhlikāḥ|","puṣpamitro'tha rājanyo durmitro'sya tathaiva ca|| 34"],"meaning":"इनके तेरह पुत्र होंगे और वे सब-के-सब बाह्लिक कहलायेंगे। उनके पश्‍चात् पुष्पमित्र नामक क्षत्रिय और उसके पुत्र दुर्मित्रका राज्य होगा॥ ३४॥"},{"id":"12.1.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/35/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एककाला इमे भूपाः सप्तान्ध्राः सप्त कोसलाः।","विदूरपतयो भाव्या निषधास्तत एव हि॥ ३५"],"iast":["ekakālā ime bhūpāḥ saptāndhrāḥ sapta kosalāḥ|","vidūrapatayo bhāvyā niṣadhāstata eva hi|| 35"],"meaning":"परीक्षित्! बाह्लिकवंशी नरपति एक साथ ही विभिन्‍न प्रदेशोंमें राज्य करेंगे। उनमें सात अन्ध्रदेशके तथा सात ही कोसलदेशके अधिपति होंगे, कुछ विदूर-भूमिके शासक और कुछ निषधदेशके स्वामी होंगे॥ ३५॥"},{"id":"12.1.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/36/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["करिष्यत्यपरो वर्णान् पुलिन्दयदुमद्रकान्॥ ३६"],"iast":["kariṣyatyaparo varṇān pulindayadumadrakān|| 36"],"meaning":"इनके बाद मगध देशका राजा होगा विश्‍व-स्फूर्जि। यह पूर्वोक्त पुरंजयके अतिरिक्त द्वितीय पुरंजय कहलायेगा। यह ब्राह्मणादि उच्च वर्णोंको पुलिन्द, यदु और मद्र आदि म्लेच्छप्राय जातियोंके रूपमें परिणत कर देगा॥ ३६॥"},{"id":"12.1.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/37/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रजाश्‍चाब्रह्मभूयिष्ठाः स्थापयिष्यति दुर्मतिः।","वीर्यवान् क्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि।","अनुगंगामाप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम्॥ ३७"],"iast":["prajāścābrahmabhūyiṣṭhāḥ sthāpayiṣyati durmatiḥ|","vīryavān kṣatramutsādya padmavatyāṃ sa vai puri|","anugaṃgāmāprayāgaṃ guptāṃ bhokṣyati medinīm|| 37"],"meaning":"इसकी बुद्धि इतनी दुष्ट होगी कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाश करके शूद्रप्राय जनताकी रक्षा करेगा। यह अपने बल-वीर्यसे क्षत्रियोंको उजाड़ देगा और पद्मवती पुरीको राजधानी बनाकर हरिद्वारसे लेकर प्रयागपर्यन्त सुरक्षित पृथ्वीका राज्य करेगा॥ ३७॥"},{"id":"12.1.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/38/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौराष्ट्रावन्त्याभीराश्‍च शूरा अर्बुदमालवाः।","व्रात्या द्विजा भविष्यन्ति शूद्रप्राया जनाधिपाः॥ ३८"],"iast":["saurāṣṭrāvantyābhīrāśca śūrā arbudamālavāḥ|","vrātyā dvijā bhaviṣyanti śūdraprāyā janādhipāḥ|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों सौराष्ट्र अवन्ती, आभीर, शूर, अर्बुद और मालव देशके ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जायँगे तथा राजालोग भी शूद्रतुल्य हो जायँगे॥ ३८॥"},{"id":"12.1.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/39/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सिन्धोस्तटं चन्द्रभागां कौन्तीं काश्मीरमण्डलम्।","भोक्ष्यन्ति शूद्रा व्रात्याद्या म्लेच्छाश्‍चाब्रह्मवर्चसः॥ ३९"],"iast":["sindhostaṭaṃ candrabhāgāṃ kauntīṃ kāśmīramaṇḍalam|","bhokṣyanti śūdrā vrātyādyā mlecchāścābrahmavarcasaḥ|| 39"],"meaning":"सिन्धुतट, चन्द्रभागाका तटवर्ती प्रदेश, कौन्तीपुरी और काश्मीर-मण्डलपर प्रायः शूद्रोंका, संस्कार एवं ब्रह्मतेजसे हीन नाममात्रके द्विजोंका और म्लेच्छोंका राज्य होगा॥ ३९॥"},{"id":"12.1.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/40/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तुल्यकाला इमे राजन् म्लेच्छप्रायाश्‍च भूभृतः।","एतेऽधर्मानृतपराः फल्गुदास्तीव्रमन्यवः॥ ४०"],"iast":["tulyakālā ime rājan mlecchaprāyāśca bhūbhṛtaḥ|","ete'dharmānṛtaparāḥ phalgudāstīvramanyavaḥ|| 40"],"meaning":"परीक्षित्! ये सब-के-सब राजा आचार-विचारमें म्लेच्छप्राय होंगे। ये सब एक ही समय भिन्‍न-भिन्‍न प्रान्तोंमें राज्य करेंगे। ये सब-के-सब परले सिरेके झूठे, अधार्मिक और स्वल्प दान करनेवाले होंगे। छोटी-छोटी बातोंको लेकर ही ये क्रोधके मारे आगबबूला हो जाया करेंगे॥ ४०॥"},{"id":"12.1.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/41/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रीबालगोद्विजघ्नाश्‍च परदारधनादृताः।","उदितास्तमितप्राया अल्पसत्त्वाल्पकायुषः॥ ४१"],"iast":["strībālagodvijaghnāśca paradāradhanādṛtāḥ|","uditāstamitaprāyā alpasattvālpakāyuṣaḥ|| 41"],"meaning":"ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं, ब्राह्मणोंको मारनेमें भी नहीं हिचकेंगे। दूसरेकी स्त्री और धन हथिया लेनेके लिये ये सर्वदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर लगेगी और न तो घटते। क्षणमें रुष्ट तो क्षणमें तुष्ट। इनकी शक्ति और आयु थोड़ी होगी॥ ४१॥"},{"id":"12.1.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/42/","page":910,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["असंस्कृताः क्रियाहीना रजसा तमसाऽऽवृताः।","प्रजास्ते भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छा राजन्यरूपिणः॥ ४२"],"iast":["asaṃskṛtāḥ kriyāhīnā rajasā tamasā''vṛtāḥ|","prajāste bhakṣayiṣyanti mlecchā rājanyarūpiṇaḥ|| 42"],"meaning":"इनमें परम्परागत संस्कार नहीं होंगे। ये अपने कर्तव्य-कर्मका पालन नहीं करेंगे। रजोगुण और तमोगुणसे अंधे बने रहेंगे। राजाके वेषमें वे म्लेच्छ ही होंगे। वे लूट-खसोटकर अपनी प्रजाका खून चूसेंगे॥ ४२॥"},{"id":"12.1.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/1/43/","page":911,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्‍नाथास्ते जनपदास्तच्छीलाचारवादिनः।","अन्योन्यतो राजभिश्‍च क्षयं यास्यन्ति पीडिताः॥ ४३"],"iast":["tannāthāste janapadāstacchīlācāravādinaḥ|","anyonyato rājabhiśca kṣayaṃ yāsyanti pīḍitāḥ|| 43"],"meaning":"जब ऐसे लोगोंका शासन होगा, तो देशकी प्रजामें भी वैसे ही स्वभाव, आचरण और भाषणकी वृद्धि हो जायगी। राजालोग तो उनका शोषण करेंगे ही, वे आपसमें भी एक-दूसरेको उत्पीड़ित करेंगे और अन्ततः सब-के-सब नष्ट हो जायँगे॥ ४३॥"}],"text":[{"b":42008,"kind":"adhyaya_heading","page":907,"text":"अथ प्रथमोऽध्यायः"},{"b":42009,"kind":"topic_heading","page":907,"text":"कलियुगके राजवंशोंका वर्णन"},{"b":42010,"kind":"topic_heading","page":907,"text":"राजोवाच"},{"b":42011,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.1"],"text":"स्वधामानुगते कृष्णे यदुवंशविभूषणे।"},{"b":42012,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.1"],"text":"कस्य वंशोऽभवत् पृथ्व्यामेतदाचक्ष्व मे मुने॥ १"},{"b":42013,"kind":"hindi_commentary","page":907,"explains":["12.1.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब अपने परमधाम पधार गये, तब पृथ्वीपर किस वंशका राज्य हुआ? तथा अब किसका राज्य होगा? आप कृपा करके मुझे यह बतलाइये॥ १॥"},{"b":42014,"kind":"topic_heading","page":907,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":42015,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.2"],"text":"योऽन्त्यः पुरंजयो नाम भाव्यो बार्हद्रथो नृप।"},{"b":42016,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.2"],"text":"तस्यामात्यस्तु शुनको हत्वा स्वामिनमात्मजम्॥ २"},{"b":42017,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.3"],"text":"प्रद्योतसंज्ञं राजानं कर्ता यत् पालकः सुतः।"},{"b":42018,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.3"],"text":"विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः॥ ३"},{"b":42019,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.4"],"text":"नन्दिवर्धनस्तत्पुत्रः पंच प्रद्योतना इमे।"},{"b":42020,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.4"],"text":"अष्टत्रिंशोत्तरशतं भोक्ष्यन्ति पृथिवीं नृपाः॥ ४"},{"b":42021,"kind":"hindi_commentary","page":907,"explains":["12.1.2","12.1.3","12.1.4"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—प्रिय परीक्षित्! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय। उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी ‘प्रद्योतन’। ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २—४॥"},{"b":42022,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.5"],"text":"शिशुनागस्ततो भाव्यः काकवर्णस्तु तत्सुतः।"},{"b":42023,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.5"],"text":"क्षेमधर्मा तस्य सुतः क्षेत्रज्ञः क्षेमधर्मजः॥ ५"},{"b":42024,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.6"],"text":"विधिसारः सुतस्तस्याजातशत्रुर्भविष्यति।"},{"b":42025,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.6"],"text":"दर्भकस्तत्सुतो भावी दर्भकस्याजयः स्मृतः॥ ६"},{"b":42026,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.7"],"text":"नन्दिवर्धन आजेयो महानन्दिः सुतस्ततः।"},{"b":42027,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.7"],"text":"शिशुनागा दशैवैते षष्ठ्युत्तरशतत्रयम्॥ ७"},{"b":42028,"kind":"hindi_translation","page":907,"explains":["12.1.5","12.1.6","12.1.7","12.1.8","12.1.9"],"text":"इसके पश्‍चात् शिशुनाग नामका राजा होगा। शिशुनागका काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्माका पुत्र होगा क्षेत्रज्ञ॥ ५॥ क्षेत्रज्ञका विधिसार, उसका अजातशत्रु, फिर दर्भक और दर्भकका पुत्र अजय होगा॥ ६॥ अजयसे नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दिका जन्म होगा। शिशुनाग-वंशमें ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे। प्रिय परीक्षित्! महानन्दिकी शूद्रा पत्‍नीके गर्भसे नन्द नामका पुत्र होगा। वह बड़ा बलवान् होगा। महानन्दि ‘महापद्म’ नामक निधिका अधिपति होगा। इसीलिये लोग उसे ‘महापद्म’ भी कहेंगे। वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा। तभीसे राजालोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे॥ ७—९॥"},{"b":42029,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.8"],"text":"समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कुरुश्रेष्ठ कलौ नृपाः।"},{"b":42030,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.8"],"text":"महानन्दिसुतो राजन् शूद्रीगर्भोद्भवो बली॥ ८"},{"b":42031,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.9"],"text":"महापद्मपतिः कश्‍चिन्‍नन्दः क्षत्रविनाशकृत्।"},{"b":42032,"kind":"sanskrit_shloka","page":907,"verses":["12.1.9"],"text":"ततो नृपा भविष्यन्ति शूद्रप्रायास्त्वधार्मिकाः॥ ९"},{"b":42033,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.10"],"text":"स एकच्छत्रां पृथिवीमनुल्लंघितशासनः।"},{"b":42034,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.10"],"text":"शासिष्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गवः॥ १०"},{"b":42035,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.11"],"text":"तस्य चाष्टौ भविष्यन्ति सुमाल्यप्रमुखाः सुताः।"},{"b":42036,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.11"],"text":"य इमां भोक्ष्यन्ति महीं राजानः स्म शतं समाः॥ ११"},{"b":42037,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.12"],"text":"नव नन्दान् द्विजः कश्‍चित् प्रपन्‍नानुद्धरिष्यति।"},{"b":42038,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.12"],"text":"तेषामभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ॥ १२"},{"b":42039,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.13"],"text":"स एव चन्द्रगुप्तं वै द्विजो राज्येऽभिषेक्ष्यति।"},{"b":42040,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.13"],"text":"तत्सुतो वारिसारस्तु ततश्‍चाशोकवर्धनः॥ १३"},{"b":42041,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.14"],"text":"सुयशा भविता तस्य संगतः सुयशःसुतः।"},{"b":42042,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.14"],"text":"शालिशूकस्ततस्तस्य सोमशर्मा भविष्यति॥ १४"},{"b":42043,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.15"],"text":"शतधन्वा ततस्तस्य भविता तद् बृहद्रथः।"},{"b":42044,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.15"],"text":"मौर्या ह्येते दश नृपाः सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम्।"},{"b":42045,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.15"],"text":"समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्वह॥ १५"},{"b":42046,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.16"],"text":"हत्वा बृहद्रथं मौर्यं तस्य सेनापतिः कलौ।"},{"b":42047,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.16"],"text":"पुष्यमित्रस्तु शुंगाह्वः स्वयं राज्यं करिष्यति।"},{"b":42048,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.16"],"text":"अग्‍निमित्रस्ततस्तस्मात् सुज्येष्ठोऽथ भविष्यति॥ १६"},{"b":42049,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.17"],"text":"वसुमित्रो भद्रकश्‍च पुलिन्दो भविता ततः।"},{"b":42050,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.17"],"text":"ततो घोषः सुतस्तस्माद् वज्रमित्रो भविष्यति॥ १७"},{"b":42051,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.18"],"text":"ततो भागवतस्तस्माद् देवभूतिरिति श्रुतः।"},{"b":42052,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.18"],"text":"शुंगा दशैते भोक्ष्यन्ति भूमिं वर्षशताधिकम्॥ १८"},{"b":42053,"kind":"hindi_translation","page":908,"explains":["12.1.10","12.1.11","12.1.12","12.1.13","12.1.14","12.1.15","12.1.16","12.1.17","12.1.18"],"text":"महापद्म पृथ्वीका एकच्छत्र शासक होगा। उसके शासनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकेगा। क्षत्रियोंके विनाशमें हेतु होनेकी दृष्टिसे तो उसे दूसरा परशुराम ही समझना चाहिये॥ १०॥ उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे। वे सभी राजा होंगे और सौ वर्षतक इस पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ ११॥ कौटिल्य, वात्स्यायन तथा चाणक्यके नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण विश्‍वविख्यात नन्द और उनके सुमाल्य आदि आठ पुत्रोंका नाश कर डालेगा। उनका नाश हो जानेपर कलियुगमें मौर्यवंशी नरपति पृथ्वीका राज्य करेंगे॥ १२॥ वही ब्राह्मण पहले-पहल चन्द्रगुप्त मौर्यको राजाके पदपर अभिषिक्त करेगा। चन्द्रगुप्तका पुत्र होगा वारिसार और वारिसारका अशोकवर्द्धन॥ १३॥ अशोकवर्द्धनका पुत्र होगा सुयश। सुयशका संगत, संगतका शालिशूक और शालिशूकका सोमशर्मा॥ १४॥ सोमशर्माका शतधन्वा और शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग। वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्‍निमित्र और अग्‍निमित्रका सुज्येष्ठ होगा॥ १५-१६॥ सुज्येष्ठका वसुमित्र, वसुमित्रका भद्रक और भद्रकका पुलिन्द, पुलिन्दका घोष और घोषका पुत्र होगा वज्रमित्र॥ १७॥ वज्रमित्रका भागवत और भागवतका पुत्र होगा देवभूति। शुंगवंशके ये दस नरपति एक सौ बारह वर्षतक पृथ्वीका पालन करेंगे॥ १८॥"},{"b":42054,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.19"],"text":"ततः कण्वानियं भूमिर्यास्यत्यल्पगुणान् नृप।"},{"b":42055,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.19"],"text":"शुंगं हत्वा देवभूतिं कण्वोऽमात्यस्तु कामिनम्॥ १९"},{"b":42056,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.20"],"text":"स्वयं करिष्यते राज्यं वसुदेवो महामतिः।"},{"b":42057,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.20"],"text":"तस्य पुत्रस्तु भूमित्रस्तस्य नारायणः सुतः।"},{"b":42058,"kind":"sanskrit_shloka","page":908,"verses":["12.1.20"],"text":"नारायणस्य भविता सुशर्मा नाम विश्रुतः॥ २०"},{"b":42059,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.21"],"text":"काण्वायना इमे भूमिं चत्वारिंशच्च पंच च।"},{"b":42060,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.21"],"text":"शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ति वर्षाणां च कलौ युगे॥ २१"},{"b":42061,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.22"],"text":"हत्वा काण्वं सुशर्माणं तद‍्भृत्यो वृषलो बली।"},{"b":42062,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.22"],"text":"गां भोक्ष्यत्यन्ध्रजातीयः कंचित् कालमसत्तमः॥ २२"},{"b":42063,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.23"],"text":"कृष्णनामाथ तद‍्भ्राता भविता पृथिवीपतिः।"},{"b":42064,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.23"],"text":"श्रीशान्तकर्णस्तत्पुत्रः पौर्णमासस्तु तत्सुतः॥ २३"},{"b":42065,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.24"],"text":"लम्बोदरस्तु तत्पुत्रस्तस्माच्चिबिलको नृपः।"},{"b":42066,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.24"],"text":"मेघस्वातिश्‍चिबिलकादटमानस्तु तस्य च॥ २४"},{"b":42067,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.25"],"text":"अनिष्टकर्मा हालेयस्तलकस्तस्य चात्मजः।"},{"b":42068,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.25"],"text":"पुरीषभीरुस्तत्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः॥ २५"},{"b":42069,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.26"],"text":"चकोरो बहवो यत्र शिवस्वातिररिन्दमः।"},{"b":42070,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.26"],"text":"तस्यापि गोमतीपुत्रः पुरीमान् भविता ततः॥ २६"},{"b":42071,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.27"],"text":"मेदःशिराः शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः।"},{"b":42072,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.27"],"text":"विजयस्तत्सुतो भाव्यश्‍चन्द्रविज्ञः सलोमधिः॥ २७"},{"b":42073,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.28"],"text":"एते त्रिंशन्‍नृपतयश्‍चत्वार्यब्दशतानि च।"},{"b":42074,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.28"],"text":"षट्पंचाशच्च पृथिवीं भोक्ष्यन्ति कुरुनन्दन॥ २८"},{"b":42075,"kind":"hindi_translation","page":908,"explains":["12.1.19","12.1.20","12.1.21","12.1.22","12.1.23","12.1.24","12.1.25","12.1.26","12.1.27","12.1.28"],"text":"परीक्षित्! शुंगवंशी नरपतियोंका राज्यकाल समाप्त होनेपर यह पृथ्वी कण्ववंशी नरपतियोंके हाथमें चली जायगी। कण्ववंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओंकी अपेक्षा कम गुणवाले होंगे। शुंगवंशका अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा। उसे उसका मन्त्री कण्ववंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबलसे स्वयं राज्य करेगा। वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्रका नारायण और नारायणका सुशर्मा। सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा॥ १९-२०॥ कण्ववंशके ये चार नरपति काण्वायन कहलायेंगे और कलियुगमें तीन सौ पैंतालीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २१॥ प्रिय परीक्षित्! कण्ववंशी सुशर्माका एक शूद्र सेवक होगा—बली। वह अन्ध्रजातिका एवं बड़ा दुष्ट होगा। वह सुशर्माको मारकर कुछ समयतक स्वयं पृथ्वीका राज्य करेगा॥ २२॥ इसके बाद उसका भाई कृष्ण राजा होगा। कृष्णका पुत्र श्रीशान्तकर्ण और उसका पौर्णमास होगा॥ २३॥ पौर्णमासका लम्बोदर और लम्बोदरका पुत्र चिबिलक होगा। चिबिलकका मेघस्वाति, मेघस्वातिका अटमान, अटमानका अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्माका हालेय, हालेयका तलक, तलकका पुरीषभीरु और पुरीषभीरुका पुत्र होगा राजा सुनन्दन॥ २४-२५॥ परीक्षित्! सुनन्दनका पुत्र होगा चकोर; चकोरके आठ पुत्र होंगे, जो सभी ‘बहु’ कहलायेंगे। इनमें सबसे छोटेका नाम होगा शिवस्वाति। वह बड़ा वीर होगा और शत्रुओंका दमन करेगा। शिवस्वातिका गोमतीपुत्र और उसका पुत्र होगा पुरीमान्॥ २६॥ पुरीमान्का मेदःशिरा, मेदःशिराका शिवस्कन्द, शिवस्कन्दका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका विजय और विजयके दो पुत्र होंगे—चन्द्रविज्ञ और लोमधि॥ २७॥ परीक्षित्! ये तीस राजा चार सौ छप्पन वर्षतक पृथ्वीका राज्य भोगेंगे॥ २८॥"},{"b":42076,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.29"],"text":"सप्ताभीरा आवभृत्या दश गर्दभिनो नृपाः।"},{"b":42077,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.29"],"text":"कंकाः षोडश भूपाला भविष्यन्त्यतिलोलुपाः॥ २९"},{"b":42078,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.30"],"text":"ततोऽष्टौ यवना भाव्याश्‍चतुर्दश तुरुष्ककाः।"},{"b":42079,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.30"],"text":"भूयो दश गुरुण्डाश्‍च मौना एकादशैव तु॥ ३०"},{"b":42080,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.31"],"text":"एते भोक्ष्यन्ति पृथिवीं दशवर्षशतानि च।"},{"b":42081,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.31"],"text":"नवाधिकां च नवतिं मौना एकादश क्षितिम्॥ ३१"},{"b":42082,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.32"],"text":"भोक्ष्यन्त्यब्दशतान्यंग त्रीणि तैः संस्थिते ततः।"},{"b":42083,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.32"],"text":"किलिकिलायां नृपतयो भूतनन्दोऽथ वंगिरिः॥ ३२"},{"b":42084,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.33"],"text":"शिशुनन्दिश्‍च तद‍्भ्राता यशोनन्दिः प्रवीरकः।"},{"b":42085,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.33"],"text":"इत्येते वै वर्षशतं भविष्यन्त्यधिकानि षट्॥ ३३"},{"b":42086,"kind":"hindi_commentary","page":909,"explains":["12.1.29","12.1.30","12.1.31","12.1.32","12.1.33"],"text":"परीक्षित्! इसके पश्‍चात् अवभृति-नगरीके सात आभीर, दस गर्दभी और सोलह कंक पृथ्वीका राज्य करेंगे। ये सब-के-सब बड़े लोभी होंगे॥ २९॥ इनके बाद आठ यवन और चौदह तुर्क राज्य करेंगे। इसके बाद दस गुरुण्ड और ग्यारह मौन नरपति होंगे॥ ३०॥ मौनोंके अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे। जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरीमें भूतनन्द नामका राजा होगा। भूतनन्दका वंगिरि, वंगिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक—ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे॥ ३१—३३॥"},{"b":42087,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.34"],"text":"तेषां त्रयोदश सुता भवितारश्‍च बाह्लिकाः।"},{"b":42088,"kind":"sanskrit_shloka","page":909,"verses":["12.1.34"],"text":"पुष्पमित्रोऽथ राजन्यो दुर्मित्रोऽस्य तथैव च॥ ३४"},{"b":42089,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.35"],"text":"एककाला इमे भूपाः सप्तान्ध्राः सप्त कोसलाः।"},{"b":42090,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.35"],"text":"विदूरपतयो भाव्या निषधास्तत एव हि॥ ३५"},{"b":42091,"kind":"hindi_commentary","page":909,"explains":["12.1.34","12.1.35"],"text":"इनके तेरह पुत्र होंगे और वे सब-के-सब बाह्लिक कहलायेंगे। उनके पश्‍चात् पुष्पमित्र नामक क्षत्रिय और उसके पुत्र दुर्मित्रका राज्य होगा॥ ३४॥ परीक्षित्! बाह्लिकवंशी नरपति एक साथ ही विभिन्‍न प्रदेशोंमें राज्य करेंगे। उनमें सात अन्ध्रदेशके तथा सात ही कोसलदेशके अधिपति होंगे, कुछ विदूर-भूमिके शासक और कुछ निषधदेशके स्वामी होंगे॥ ३५॥"},{"b":42092,"kind":"topic_heading","page":910,"text":"मागधानां तु भविता विश्‍वस्फूर्जिः पुरंजयः।"},{"b":42093,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.36"],"text":"करिष्यत्यपरो वर्णान् पुलिन्दयदुमद्रकान्॥ ३६"},{"b":42094,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.37"],"text":"प्रजाश्‍चाब्रह्मभूयिष्ठाः स्थापयिष्यति दुर्मतिः।"},{"b":42095,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.37"],"text":"वीर्यवान् क्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि।"},{"b":42096,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.37"],"text":"अनुगंगामाप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम्॥ ३७"},{"b":42097,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.38"],"text":"सौराष्ट्रावन्त्याभीराश्‍च शूरा अर्बुदमालवाः।"},{"b":42098,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.38"],"text":"व्रात्या द्विजा भविष्यन्ति शूद्रप्राया जनाधिपाः॥ ३८"},{"b":42099,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.39"],"text":"सिन्धोस्तटं चन्द्रभागां कौन्तीं काश्मीरमण्डलम्।"},{"b":42100,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.39"],"text":"भोक्ष्यन्ति शूद्रा व्रात्याद्या म्लेच्छाश्‍चाब्रह्मवर्चसः॥ ३९"},{"b":42101,"kind":"hindi_commentary","page":910,"explains":["12.1.36","12.1.37","12.1.38","12.1.39"],"text":"इनके बाद मगध देशका राजा होगा विश्‍व-स्फूर्जि। यह पूर्वोक्त पुरंजयके अतिरिक्त द्वितीय पुरंजय कहलायेगा। यह ब्राह्मणादि उच्च वर्णोंको पुलिन्द, यदु और मद्र आदि म्लेच्छप्राय जातियोंके रूपमें परिणत कर देगा॥ ३६॥ इसकी बुद्धि इतनी दुष्ट होगी कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाश करके शूद्रप्राय जनताकी रक्षा करेगा। यह अपने बल-वीर्यसे क्षत्रियोंको उजाड़ देगा और पद्मवती पुरीको राजधानी बनाकर हरिद्वारसे लेकर प्रयागपर्यन्त सुरक्षित पृथ्वीका राज्य करेगा॥ ३७॥ परीक्षित्! ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों सौराष्ट्र अवन्ती, आभीर, शूर, अर्बुद और मालव देशके ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जायँगे तथा राजालोग भी शूद्रतुल्य हो जायँगे॥ ३८॥ सिन्धुतट, चन्द्रभागाका तटवर्ती प्रदेश, कौन्तीपुरी और काश्मीर-मण्डलपर प्रायः शूद्रोंका, संस्कार एवं ब्रह्मतेजसे हीन नाममात्रके द्विजोंका और म्लेच्छोंका राज्य होगा॥ ३९॥"},{"b":42102,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.40"],"text":"तुल्यकाला इमे राजन् म्लेच्छप्रायाश्‍च भूभृतः।"},{"b":42103,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.40"],"text":"एतेऽधर्मानृतपराः फल्गुदास्तीव्रमन्यवः॥ ४०"},{"b":42104,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.41"],"text":"स्त्रीबालगोद्विजघ्नाश्‍च परदारधनादृताः।"},{"b":42105,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.41"],"text":"उदितास्तमितप्राया अल्पसत्त्वाल्पकायुषः॥ ४१"},{"b":42106,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.42"],"text":"असंस्कृताः क्रियाहीना रजसा तमसाऽऽवृताः।"},{"b":42107,"kind":"sanskrit_shloka","page":910,"verses":["12.1.42"],"text":"प्रजास्ते भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छा राजन्यरूपिणः॥ ४२"},{"b":42108,"kind":"hindi_commentary","page":910,"explains":["12.1.40","12.1.41","12.1.42"],"text":"परीक्षित्! ये सब-के-सब राजा आचार-विचारमें म्लेच्छप्राय होंगे। ये सब एक ही समय भिन्‍न-भिन्‍न प्रान्तोंमें राज्य करेंगे। ये सब-के-सब परले सिरेके झूठे, अधार्मिक और स्वल्प दान करनेवाले होंगे। छोटी-छोटी बातोंको लेकर ही ये क्रोधके मारे आगबबूला हो जाया करेंगे॥ ४०॥ ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं, ब्राह्मणोंको मारनेमें भी नहीं हिचकेंगे। दूसरेकी स्त्री और धन हथिया लेनेके लिये ये सर्वदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर लगेगी और न तो घटते। क्षणमें रुष्ट तो क्षणमें तुष्ट। इनकी शक्ति और आयु थोड़ी होगी॥ ४१॥ इनमें परम्परागत संस्कार नहीं होंगे। ये अपने कर्तव्य-कर्मका पालन नहीं करेंगे। रजोगुण और तमोगुणसे अंधे बने रहेंगे। राजाके वेषमें वे म्लेच्छ ही होंगे। वे लूट-खसोटकर अपनी प्रजाका खून चूसेंगे॥ ४२॥"},{"b":42109,"kind":"sanskrit_shloka","page":911,"verses":["12.1.43"],"text":"तन्‍नाथास्ते जनपदास्तच्छीलाचारवादिनः।"},{"b":42110,"kind":"sanskrit_shloka","page":911,"verses":["12.1.43"],"text":"अन्योन्यतो राजभिश्‍च क्षयं यास्यन्ति पीडिताः॥ ४३"},{"b":42111,"kind":"hindi_translation","page":911,"explains":["12.1.43"],"text":"जब ऐसे लोगोंका शासन होगा, तो देशकी प्रजामें भी वैसे ही स्वभाव, आचरण और भाषणकी वृद्धि हो जायगी। राजालोग तो उनका शोषण करेंगे ही, वे आपसमें भी एक-दूसरेको उत्पीड़ित करेंगे और अन्ततः सब-के-सब नष्ट हो जायँगे॥ ४३॥"},{"b":42112,"kind":"hindi_translation","page":911,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥"}],"notes":[{"id":"v2:424","mark":"*","page":908,"after_verse":"12.1.18","text":"मौर्योंकी संख्या चन्द्रगुप्तको मिलाकर नौ ही होती है। विष्णुपुराणादिमें चन्द्रगुप्तसे पाँचवें दशरथ नामके एक और मौर्यवंशी राजाका उल्लेख मिलता है। उसीको लेकर यहाँ दस संख्या समझनी चाहिये।"}],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}