{"id":"12.4","title":"द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4","part":"द्वादश स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्थोऽध्यायः","topics":["चार प्रकारके प्रलय"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[924,930]},"verses":[{"id":"12.4.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/1/","page":924,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालस्ते परमाण्वादिर्द्विपरार्धावधिर्नृप।","कथितो युगमानं च शृणु कल्पलयावपि॥ १"],"iast":["kālaste paramāṇvādirdviparārdhāvadhirnṛpa|","kathito yugamānaṃ ca śṛṇu kalpalayāvapi|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (तीसरे स्कन्धमें) परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त कालका स्वरूप और एक-एक युग कितने-कितने वर्षोंका होता है, यह मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। अब तुम कल्पकी स्थिति और उसके प्रलयका वर्णन भी सुनो॥ १॥"},{"id":"12.4.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/2/","page":924,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चतुर्युगसहस्रं च ब्रह्मणो दिनमुच्यते।","स कल्पो यत्र मनवश्‍चतुर्दश विशांपते॥ २"],"iast":["caturyugasahasraṃ ca brahmaṇo dinamucyate|","sa kalpo yatra manavaścaturdaśa viśāṃpate|| 2"],"meaning":"राजन्! एक हजार चतुर्युगीका ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्माके इस दिनको ही कल्प भी कहते हैं। एक कल्पमें चौदह मनु होते हैं॥ २॥"},{"id":"12.4.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/3/","page":924,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदन्ते प्रलयस्तावान् ब्राह्मी रात्रिरुदाहृता।","त्रयो लोका इमे तत्र कल्पन्ते प्रलयाय हि॥ ३"],"iast":["tadante pralayastāvān brāhmī rātrirudāhṛtā|","trayo lokā ime tatra kalpante pralayāya hi|| 3"],"meaning":"कल्पके अन्तमें उतने ही समयतक प्रलय भी रहता है। प्रलयको ही ब्रह्माकी रात भी कहते हैं। उस समय ये तीनों लोक लीन हो जाते हैं, उनका प्रलय हो जाता है॥ ३॥"},{"id":"12.4.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/4/","page":924,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष नैमित्तिकः प्रोक्तः प्रलयो यत्र विश्‍वसृक्।","शेतेऽनन्तासनो विश्‍वमात्मसात्कृत्य चात्मभूः॥ ४"],"iast":["eṣa naimittikaḥ proktaḥ pralayo yatra viśvasṛk|","śete'nantāsano viśvamātmasātkṛtya cātmabhūḥ|| 4"],"meaning":"इसका नाम नैमित्तिक प्रलय है। इस प्रलयके अवसरपर सारे विश्‍वको अपने अंदर समेटकर—लीन कर ब्रह्मा और तत्पश्‍चात् शेषशायी भगवान् नारायण भी शयन कर जाते हैं॥ ४॥"},{"id":"12.4.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/5/","page":924,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्विपरार्धे त्वतिक्रान्ते ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।","तदा प्रकृतयः सप्त कल्पन्ते प्रलयाय वै॥ ५"],"iast":["dviparārdhe tvatikrānte brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ|","tadā prakṛtayaḥ sapta kalpante pralayāya vai|| 5"],"meaning":"इस प्रकार रातके बाद दिन और दिनके बाद रात होते-होते जब ब्रह्माजीकी अपने मानसे सौ वर्षकी और मनुष्योंकी दृष्टिमें दो परार्द्धकी आयु समाप्त हो जाती है, तब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा—ये सातों प्रकृतियाँ अपने कारण मूल प्रकृतिमें लीन हो जाती हैं॥ ५॥"},{"id":"12.4.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/6/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष प्राकृतिको राजन् प्रलयो यत्र लीयते।","आण्डकोशस्तु संघातो विघात उपसादिते॥ ६"],"iast":["eṣa prākṛtiko rājan pralayo yatra līyate|","āṇḍakośastu saṃghāto vighāta upasādite|| 6"],"meaning":"राजन्! इसीका नाम प्राकृतिक प्रलय है। इस प्रलयमें प्रलयका कारण उपस्थित होनेपर पंचभूतोंके मिश्रणसे बना हुआ ब्रह्माण्ड अपना स्थूलरूप छोड़कर कारणरूपमें स्थित हो जाता है, घुल-मिल जाता है॥ ६॥"},{"id":"12.4.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/7/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पर्जन्यः शतवर्षाणि भूमौ राजन् न वर्षति।","तदा निरन्‍ने ह्यन्योन्यं भक्षमाणाः क्षुधार्दिताः॥ ७"],"iast":["parjanyaḥ śatavarṣāṇi bhūmau rājan na varṣati|","tadā niranne hyanyonyaṃ bhakṣamāṇāḥ kṣudhārditāḥ|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! प्रलयका समय आनेपर सौ वर्षतक मेघ पृथ्वीपर वर्षा नहीं करते। किसीको अन्‍न नहीं मिलता। उस समय प्रजा भूख-प्याससे व्याकुल होकर एक-दूसरेको खाने लगती है॥ ७॥"},{"id":"12.4.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/8/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षयं यास्यन्ति शनकैः कालेनोपद्रुताः प्रजाः।","सामुद्रं दैहिकं भौमं रसं सांवर्तको रविः॥ ८"],"iast":["kṣayaṃ yāsyanti śanakaiḥ kālenopadrutāḥ prajāḥ|","sāmudraṃ daihikaṃ bhaumaṃ rasaṃ sāṃvartako raviḥ|| 8"],"meaning":"इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्‌के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्‍नि प्रकट होती है॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"12.4.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/9/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रश्मिभिः पिबते घोरैः सर्वं नैव विमुंचति।","ततः संवर्तको वह्निः संकर्षणमुखोत्थितः॥ ९"],"iast":["raśmibhiḥ pibate ghoraiḥ sarvaṃ naiva vimuṃcati|","tataḥ saṃvartako vahniḥ saṃkarṣaṇamukhotthitaḥ|| 9"],"meaning":"इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्‌के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्‍नि प्रकट होती है॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"12.4.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/10/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दहत्यनिलवेगोत्थः शून्यान् भूविवरानथ।","उपर्यधः समन्ताच्च शिखाभिर्वह्निसूर्ययोः॥ १०"],"iast":["dahatyanilavegotthaḥ śūnyān bhūvivarānatha|","uparyadhaḥ samantācca śikhābhirvahnisūryayoḥ|| 10"],"meaning":"वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥","meaning_covers":[10,13]},{"id":"12.4.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/11/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दह्यमानं विभात्यण्डं दग्धगोमयपिण्डवत्।","ततः प्रचण्डपवनो वर्षाणामधिकं शतम्॥ ११"],"iast":["dahyamānaṃ vibhātyaṇḍaṃ dagdhagomayapiṇḍavat|","tataḥ pracaṇḍapavano varṣāṇāmadhikaṃ śatam|| 11"],"meaning":"वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥","meaning_covers":[10,13]},{"id":"12.4.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/12/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["परः सांवर्तको वाति धूम्रं खं रजसाऽऽवृतम्।","ततो मेघकुलान्यंग चित्रवर्णान्यनेकशः॥ १२"],"iast":["paraḥ sāṃvartako vāti dhūmraṃ khaṃ rajasā''vṛtam|","tato meghakulānyaṃga citravarṇānyanekaśaḥ|| 12"],"meaning":"वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥","meaning_covers":[10,13]},{"id":"12.4.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/13/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शतं वर्षाणि वर्षन्ति नदन्ति रभसस्वनैः।","तत एकोदकं विश्‍वं ब्रह्माण्डविवरान्तरम्॥ १३"],"iast":["śataṃ varṣāṇi varṣanti nadanti rabhasasvanaiḥ|","tata ekodakaṃ viśvaṃ brahmāṇḍavivarāntaram|| 13"],"meaning":"वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥","meaning_covers":[10,13]},{"id":"12.4.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/14/","page":925,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदा भूमेर्गन्धगुणं ग्रसन्त्याप उदप्लवे।","ग्रस्तगन्धा तु पृथिवी प्रलयत्वाय कल्पते॥ १४"],"iast":["tadā bhūmergandhaguṇaṃ grasantyāpa udaplave|","grastagandhā tu pṛthivī pralayatvāya kalpate|| 14"],"meaning":"इस प्रकार जब जल-प्रलय हो जाता है, तब जल पृथ्वीके विशेष गुण गन्धको ग्रस लेता है—अपनेमें लीन कर लेता है। गन्ध गुणके जलमें लीन हो जानेपर पृथ्वीका प्रलय हो जाता है, वह जलमें घुल-मिलकर जलरूप बन जाती है॥ १४॥"},{"id":"12.4.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/15/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपां रसमथो तेजस्ता लीयन्तेऽथ नीरसाः।","ग्रसते तेजसो रूपं वायुस्तद्रहितं तदा॥ १५"],"iast":["apāṃ rasamatho tejastā līyante'tha nīrasāḥ|","grasate tejaso rūpaṃ vāyustadrahitaṃ tadā|| 15"],"meaning":"राजन्! इसके बाद जलके गुण रसको तेजस्तत्त्व ग्रस लेता है और जल नीरस होकर तेजमें समा जाता है। तदनन्तर वायु तेजके गुण रूपको ग्रस लेता है और तेज रूपरहित होकर वायुमें लीन हो जाता है। अब आकाश वायुके गुण स्पर्शको अपनेमें मिला लेता है और वायु स्पर्शहीन होकर आकाशमें शान्त हो जाता है। इसके बाद तामस अहंकार आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है और आकाश शब्दहीन होकर तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इसी प्रकार तैजस अहंकार इन्द्रियोंको और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इन्द्रियवृत्तियोंको अपनेमें लीन कर लेता है॥ १५—१७॥","meaning_covers":[15,17]},{"id":"12.4.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/16/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लीयते चानिले तेजो वायोः खं ग्रसते गुणम्।","स वै विशति खं राजंस्ततश्‍च नभसो गुणम्॥ १६"],"iast":["līyate cānile tejo vāyoḥ khaṃ grasate guṇam|","sa vai viśati khaṃ rājaṃstataśca nabhaso guṇam|| 16"],"meaning":"राजन्! इसके बाद जलके गुण रसको तेजस्तत्त्व ग्रस लेता है और जल नीरस होकर तेजमें समा जाता है। तदनन्तर वायु तेजके गुण रूपको ग्रस लेता है और तेज रूपरहित होकर वायुमें लीन हो जाता है। अब आकाश वायुके गुण स्पर्शको अपनेमें मिला लेता है और वायु स्पर्शहीन होकर आकाशमें शान्त हो जाता है। इसके बाद तामस अहंकार आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है और आकाश शब्दहीन होकर तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इसी प्रकार तैजस अहंकार इन्द्रियोंको और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इन्द्रियवृत्तियोंको अपनेमें लीन कर लेता है॥ १५—१७॥","meaning_covers":[15,17]},{"id":"12.4.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/17/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शब्दं ग्रसति भूतादिर्नभस्तमनुलीयते।","तैजसश्‍चेन्द्रियाण्यङ्ग देवान् वैकारिको गुणैः॥ १७"],"iast":["śabdaṃ grasati bhūtādirnabhastamanulīyate|","taijasaścendriyāṇyaṅga devān vaikāriko guṇaiḥ|| 17"],"meaning":"राजन्! इसके बाद जलके गुण रसको तेजस्तत्त्व ग्रस लेता है और जल नीरस होकर तेजमें समा जाता है। तदनन्तर वायु तेजके गुण रूपको ग्रस लेता है और तेज रूपरहित होकर वायुमें लीन हो जाता है। अब आकाश वायुके गुण स्पर्शको अपनेमें मिला लेता है और वायु स्पर्शहीन होकर आकाशमें शान्त हो जाता है। इसके बाद तामस अहंकार आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है और आकाश शब्दहीन होकर तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इसी प्रकार तैजस अहंकार इन्द्रियोंको और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इन्द्रियवृत्तियोंको अपनेमें लीन कर लेता है॥ १५—१७॥","meaning_covers":[15,17]},{"id":"12.4.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/18/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महान् ग्रसत्यहंकारं गुणाः सत्त्वादयश्‍च तम्।","ग्रसतेऽव्याकृतं राजन् गुणान् कालेन चोदितम्॥ १८"],"iast":["mahān grasatyahaṃkāraṃ guṇāḥ sattvādayaśca tam|","grasate'vyākṛtaṃ rājan guṇān kālena coditam|| 18"],"meaning":"तत्पश्‍चात् महत्तत्त्व अहंकारको और सत्त्व आदि गुण महत्तत्त्वको ग्रस लेते हैं। परीक्षित्! यह सब कालकी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे अव्यक्त प्रकृति गुणोंको ग्रस लेती है और तब केवल प्रकृति-ही-प्रकृति शेष रह जाती है॥ १८॥"},{"id":"12.4.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/19/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न तस्य कालावयवैः परिणामादयो गुणाः।","अनाद्यनन्तमव्यक्तं नित्यं कारणमव्ययम्॥ १९"],"iast":["na tasya kālāvayavaiḥ pariṇāmādayo guṇāḥ|","anādyanantamavyaktaṃ nityaṃ kāraṇamavyayam|| 19"],"meaning":"वही चराचर जगत‍्का मूल कारण है। वह अव्यक्त, अनादि, अनन्त, नित्य और अविनाशी है। जब वह अपने कार्योंको लीन करके प्रलयके समय साम्यावस्थाको प्राप्त हो जाती है, तब कालके अवयव वर्ष, मास, दिन-रात क्षण आदिके कारण उसमें परिणाम, क्षय, वृद्धि आदि किसी प्रकारके विकार नहीं होते॥ १९॥"},{"id":"12.4.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/20/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं","तमो रजो वा महदादयोऽमी।","न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा","न सन्‍निवेशः खलु लोककल्पः॥ २०"],"iast":["na yatra vāco na mano na sattvaṃ","tamo rajo vā mahadādayo'mī|","na prāṇabuddhīndriyadevatā vā","na sanniveśaḥ khalu lokakalpaḥ|| 20"],"meaning":"उस समय प्रकृतिमें स्थूल अथवा सूक्ष्मरूपसे वाणी, मन, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, महत्तत्त्व आदि विकार, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और उनके देवता आदि कुछ नहीं रहते। सृष्टिके समय रहनेवाले लोकोंकी कल्पना और उनकी स्थिति भी नहीं रहती॥ २०॥"},{"id":"12.4.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/21/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न स्वप्नजाग्रन्‍न च तत् सुषुप्तं","न खं जलं भूरनिलोऽग्‍निरर्कः।","संसुप्तवच्छून्यवदप्रतर्क्यं","तन्मूलभूतं पदमामनन्ति॥ २१"],"iast":["na svapnajāgranna ca tat suṣuptaṃ","na khaṃ jalaṃ bhūranilo'gnirarkaḥ|","saṃsuptavacchūnyavadapratarkyaṃ","tanmūlabhūtaṃ padamāmananti|| 21"],"meaning":"उस समय स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति—ये तीन अवस्थाएँ नहीं रहतीं। आकाश, जल, पृथ्वी, वायु, अग्‍नि और सूर्य भी नहीं रहते। सब कुछ सोये हुएके समान शून्य-सा रहता है। उस अवस्थाका तर्कके द्वारा अनुमान करना भी असम्भव है। उस अव्यक्तको ही जगत‍्का मूलभूत तत्त्व कहते हैं॥ २१॥"},{"id":"12.4.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/22/","page":926,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लयः प्राकृतिको ह्येष पुरुषाव्यक्तयोर्यदा।","शक्तयः सम्प्रलीयन्ते विवशाः कालविद्रुताः॥ २२"],"iast":["layaḥ prākṛtiko hyeṣa puruṣāvyaktayoryadā|","śaktayaḥ sampralīyante vivaśāḥ kālavidrutāḥ|| 22"],"meaning":"इसी अवस्थाका नाम ‘प्राकृत प्रलय’ है। उस समय पुरुष और प्रकृति दोनोंकी शक्तियाँ कालके प्रभावसे क्षीण हो जाती हैं और विवश होकर अपने मूल-स्वरूपमें लीन हो जाती हैं॥ २२॥"},{"id":"12.4.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/23/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बुद्धीन्द्रियार्थरूपेण ज्ञानं भाति तदाश्रयम्।","दृश्यत्वाव्यतिरेकाभ्यामाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २३"],"iast":["buddhīndriyārtharūpeṇa jñānaṃ bhāti tadāśrayam|","dṛśyatvāvyatirekābhyāmādyantavadavastu yat|| 23"],"meaning":"परीक्षित्! (अब आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका स्वरूप बतलाया जाता है।) बुद्धि, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें उनका अधिष्ठान, ज्ञानस्वरूप वस्तु ही भासित हो रही है। उन सबका तो आदि भी है और अन्त भी। इसलिये वे सब सत्य नहीं हैं। वे दृश्य हैं और अपने अधिष्ठानसे भिन्‍न उनकी सत्ता भी नहीं है। इसलिये वे सर्वथा मिथ्या—मायामात्र हैं॥ २३॥"},{"id":"12.4.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/24/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दीपश्‍चक्षुश्‍च रूपं च ज्योतिषो न पृथग् भवेत्।","एवं धीः खानि मात्राश्‍च न स्युरन्यतमादृतात्॥ २४"],"iast":["dīpaścakṣuśca rūpaṃ ca jyotiṣo na pṛthag bhavet|","evaṃ dhīḥ khāni mātrāśca na syuranyatamādṛtāt|| 24"],"meaning":"जैसे दीपक, नेत्र और रूप—ये तीनों तेजसे भिन्‍न नहीं हैं, वैसे ही बुद्धि इन्द्रिय और इनके विषय तन्मात्राएँ भी अपने अधिष्ठान स्वरूप ब्रह्मसे भिन्‍न नहीं हैं यद्यपि वह इनसे सर्वथा भिन्‍न है; (जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानमें अध्यस्त सर्प अपने अधिष्ठानसे पृथक् नहीं है, परन्तु अध्यस्त सर्पसे अधिष्ठानका कोई सम्बन्ध नहीं है)॥ २४॥"},{"id":"12.4.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/25/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति चोच्यते।","मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि॥ २५"],"iast":["buddherjāgaraṇaṃ svapnaḥ suṣuptiriti cocyate|","māyāmātramidaṃ rājan nānātvaṃ pratyagātmani|| 25"],"meaning":"परीक्षित्! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धिकी ही हैं। अतः इनके कारण अन्तरात्मामें जो विश्‍व, तैजस और प्राज्ञरूप नानात्वकी प्रतीति होती है, वह केवल मायामात्र है। बुद्धिगत नानात्वका एकमात्र सत्य आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है॥ २५॥"},{"id":"12.4.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/26/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा जलधरा व्योम्‍नि भवन्ति न भवन्ति च।","ब्रह्मणीदं तथा विश्‍वमवयव्युदयाप्ययात्॥ २६"],"iast":["yathā jaladharā vyomni bhavanti na bhavanti ca|","brahmaṇīdaṃ tathā viśvamavayavyudayāpyayāt|| 26"],"meaning":"यह विश्‍व उत्पत्ति और प्रलयसे ग्रस्त है, इसलिये अनेक अवयवोंका समूह अवयवी है। अतः यह कभी ब्रह्ममें होता है और कभी नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें मेघमाला कभी होती है और कभी नहीं होती॥ २६॥"},{"id":"12.4.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/27/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्यं ह्यवयवः प्रोक्तः सर्वावयविनामिह।","विनार्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवांग तन्तवः॥ २७"],"iast":["satyaṃ hyavayavaḥ proktaḥ sarvāvayavināmiha|","vinārthena pratīyeran paṭasyevāṃga tantavaḥ|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! जगत‍्के व्यवहारमें जितने भी अवयवी पदार्थ होते हैं, उनके न होनेपर भी उनके भिन्‍न-भिन्‍न अवयव सत्य माने जाते हैं। क्योंकि वे उनके कारण हैं। जैसे वस्त्ररूप अवयवीके न होनेपर भी उसके कारणरूप सूतका अस्तित्व माना ही जाता है, उसी प्रकार कार्यरूप जगत‍्के अभावमें भी इस जगत‍्के कारणरूप अवयवकी स्थिति हो सकती है॥ २७॥"},{"id":"12.4.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/28/","page":927,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत् सामान्यविशेषाभ्यामुपलभ्येत स भ्रमः।","अन्योन्यापाश्रयात् सर्वमाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २८"],"iast":["yat sāmānyaviśeṣābhyāmupalabhyeta sa bhramaḥ|","anyonyāpāśrayāt sarvamādyantavadavastu yat|| 28"],"meaning":"परन्तु ब्रह्ममें यह कार्य-कारणभाव भी वास्तविक नहीं है। क्योंकि देखो, कारण तो सामान्य वस्तु है और कार्य विशेष वस्तु। इस प्रकारका जो भेद दिखायी देता है, वह केवल भ्रम ही है। इसका हेतु यह है कि सामान्य और विशेष भाव आपेक्षिक हैं, अन्योन्याश्रित हैं। विशेषके बिना सामान्य और सामान्यके बिना विशेषकी स्थिति नहीं हो सकती। कार्य और कारणभावका आदि और अन्त दोनों ही मिलते हैं, इसलिये भी वह स्वाप्निक भेद-भावके समान सर्वथा अवस्तु है॥ २८॥"},{"id":"12.4.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/29/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विकारः ख्यायमानोऽपि प्रत्यगात्मानमन्तरा।","न निरूप्योऽस्त्यणुरपि स्याच्चेच्चित्सम आत्मवत्॥ २९"],"iast":["vikāraḥ khyāyamāno'pi pratyagātmānamantarā|","na nirūpyo'styaṇurapi syācceccitsama ātmavat|| 29"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि यह प्रपंचरूप विकार स्वाप्निक विकारके समान ही प्रतीत हो रहा है, तो भी यह अपने अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूप आत्मासे भिन्‍न नहीं है। कोई चाहे भी तो आत्मासे भिन्‍न रूपमें अणुमात्र भी इसका निरूपण नहीं कर सकता। यदि आत्मासे पृथक् इसकी सत्ता मानी भी जाय तो यह भी चिद्रूप आत्माके समान स्वयंप्रकाश होगा, और ऐसी स्थितिमें वह आत्माकी भाँति ही एकरूप सिद्ध होगा॥ २९॥"},{"id":"12.4.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/30/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नहि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते।","नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वातयोरिव॥ ३०"],"iast":["nahi satyasya nānātvamavidvān yadi manyate|","nānātvaṃ chidrayoryadvajjyotiṣorvātayoriva|| 30"],"meaning":"परन्तु इतना तो सर्वथा निश्‍चित है कि परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व नहीं है। यदि कोई अज्ञानी परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व स्वीकार करता है, तो उसका वह मानना वैसा ही है, जैसा महाकाश और घटाकाशका, आकाशस्थित सूर्य और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यका तथा बाह्य वायु और आन्तर वायुका भेद मानना॥ ३०॥"},{"id":"12.4.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/31/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा हिरण्यं बहुधा समीयते","नृभिः क्रियाभिर्व्यवहारवर्त्मसु।","एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजो","व्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जनैः॥ ३१"],"iast":["yathā hiraṇyaṃ bahudhā samīyate","nṛbhiḥ kriyābhirvyavahāravartmasu|","evaṃ vacobhirbhagavānadhokṣajo","vyākhyāyate laukikavaidikairjanaiḥ|| 31"],"meaning":"जैसे व्यवहारमें मनुष्य एक ही सोनेको अनेकों रूपोंमें गढ़-गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन, कुण्डल, कड़ा आदि अनेकों रूपोंमें मिलता है; इसी प्रकार व्यवहारमें निपुण विद्वान् लौकिक और वैदिक वाणीके द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवान्‌का भी अनेकों रूपोंमें वर्णन करते हैं॥ ३१॥"},{"id":"12.4.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/32/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा घनोऽर्कप्रभवोऽर्कदर्शितो","ह्यर्कांशभूतस्य च चक्षुषस्तमः।","एवं त्वहं ब्रह्मगुणस्तदीक्षितो","ब्रह्मांशकस्यात्मन आत्मबन्धनः॥ ३२"],"iast":["yathā ghano'rkaprabhavo'rkadarśito","hyarkāṃśabhūtasya ca cakṣuṣastamaḥ|","evaṃ tvahaṃ brahmaguṇastadīkṣito","brahmāṃśakasyātmana ātmabandhanaḥ|| 32"],"meaning":"देखो न, बादल सूर्यसे उत्पन्‍न होता है और सूर्यसे ही प्रकाशित। फिर भी वह सूर्यके ही अंश नेत्रोंके लिये सूर्यका दर्शन होनेमें बाधक बन बैठता है। इसी प्रकार अहंकार भी ब्रह्मसे ही उत्पन्‍न होता, ब्रह्मसे ही प्रकाशित होता और ब्रह्मके अंश जीवके लिये ब्रह्मस्वरूपके साक्षात्कारमें बाधक बन बैठता है॥ ३२॥"},{"id":"12.4.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/33/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["घनो यदार्कप्रभवो विदीर्यते","चक्षुः स्वरूपं रविमीक्षते तदा।","यदा ह्यहंकार उपाधिरात्मनो","जिज्ञासया नश्यति तर्ह्यनुस्मरेत्॥ ३३"],"iast":["ghano yadārkaprabhavo vidīryate","cakṣuḥ svarūpaṃ ravimīkṣate tadā|","yadā hyahaṃkāra upādhirātmano","jijñāsayā naśyati tarhyanusmaret|| 33"],"meaning":"जब सूर्यसे प्रकट होनेवाला बादल तितर-बितर हो जाता है, तब नेत्र अपने स्वरूप सूर्यका दर्शन करनेमें समर्थ होते हैं। ठीक वैसे ही, जब जीवके हृदयमें जिज्ञासा जगती है, तब आत्माकी उपाधि अहंकार नष्ट हो जाता है और उसे अपने स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है॥ ३३॥"},{"id":"12.4.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/34/","page":928,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यदैवमेतेन विवेकहेतिना","मायामयाहंकरणात्मबन्धनम् ।","छित्त्वाच्युतात्मानुभवोऽवतिष्ठते","तमाहुरात्यन्तिकमंग सम्प्लवम्॥ ३४"],"iast":["yadaivametena vivekahetinā","māyāmayāhaṃkaraṇātmabandhanam |","chittvācyutātmānubhavo'vatiṣṭhate","tamāhurātyantikamaṃga samplavam|| 34"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! जब जीव विवेकके खड्गसे मायामय अहंकारका बन्धन काट देता है, तब यह अपने एकरस आत्मस्वरूपके साक्षात्कारमें स्थित हो जाता है। आत्माकी यह मायामुक्त वास्तविक स्थिति ही आत्यन्तिक प्रलय कही जाती है॥ ३४॥"},{"id":"12.4.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/35/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नित्यदा सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां परंतप।","उत्पत्तिप्रलयावेके सूक्ष्मज्ञाः सम्प्रचक्षते॥ ३५"],"iast":["nityadā sarvabhūtānāṃ brahmādīnāṃ paraṃtapa|","utpattipralayāveke sūkṣmajñāḥ sampracakṣate|| 35"],"meaning":"हे शत्रुदमन! तत्त्वदर्शी लोग कहते हैं कि ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक जितने प्राणी या पदार्थ हैं, सभी हर समय पैदा होते और मरते रहते हैं। अर्थात् नित्यरूपसे उत्पत्ति और प्रलय होता ही रहता है॥ ३५॥"},{"id":"12.4.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/36/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालस्रोतोजवेनाशु ह्रियमाणस्य नित्यदा।","परिणामिनामवस्थास्ता जन्मप्रलयहेतवः॥ ३६"],"iast":["kālasrotojavenāśu hriyamāṇasya nityadā|","pariṇāmināmavasthāstā janmapralayahetavaḥ|| 36"],"meaning":"संसारके परिणामी पदार्थ नदी-प्रवाह और दीप-शिखा आदि क्षण-क्षण बदलते रहते हैं। उनकी बदलती हुई अवस्थाओंको देखकर यह निश्‍चय होता है कि देह आदि भी कालरूप सोतेके वेगमें बहते-बदलते जा रहे हैं। इसलिये क्षण-क्षणमें उनकी उत्पत्ति और प्रलय हो रहा है॥ ३६॥"},{"id":"12.4.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/37/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनाद्यन्तवतानेन कालेनेश्‍वरमूर्तिना।","अवस्था नैव दृश्यन्ते वियति ज्योतिषामिव॥ ३७"],"iast":["anādyantavatānena kāleneśvaramūrtinā|","avasthā naiva dṛśyante viyati jyotiṣāmiva|| 37"],"meaning":"जैसे आकाशमें तारे हर समय चलते ही रहते हैं, परन्तु उनकी गति स्पष्टरूपसे नहीं दिखायी पड़ती, वैसे ही भगवान्‌के स्वरूपभूत अनादि-अनन्त कालके कारण प्राणियोंकी प्रतिक्षण होनेवाली उत्पत्ति और प्रलयका भी पता नहीं चलता॥ ३७॥"},{"id":"12.4.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/38/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नित्यो नैमित्तिकश्‍चैव तथा प्राकृतिको लयः।","आत्यन्तिकश्‍च कथितः कालस्य गतिरीदृशी॥ ३८"],"iast":["nityo naimittikaścaiva tathā prākṛtiko layaḥ|","ātyantikaśca kathitaḥ kālasya gatirīdṛśī|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! मैंने तुमसे चार प्रकारके प्रलयका वर्णन किया; उनके नाम हैं—नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृतिक प्रलय और आत्यन्तिक प्रलय। वास्तवमें कालकी सूक्ष्म गति ऐसी ही है॥ ३८॥"},{"id":"12.4.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/39/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एताः कुरुश्रेष्ठ जगद्विधातु-","र्नारायणस्याखिलसत्त्वधाम्‍नः ।","लीलाकथास्ते कथिताः समासतः","कार्त्स्न्येन नाजोऽप्यभिधातुमीशः॥ ३९"],"iast":["etāḥ kuruśreṣṭha jagadvidhātu-","rnārāyaṇasyākhilasattvadhāmnaḥ |","līlākathāste kathitāḥ samāsataḥ","kārtsnyena nājo'pyabhidhātumīśaḥ|| 39"],"meaning":"हे कुरुश्रेष्ठ! विश्‍वविधाता भगवान् नारायण ही समस्त प्राणियों और शक्तियोंके आश्रय हैं। जो कुछ मैंने संक्षेपसे कहा है, वह सब उन्हींकी लीला-कथा है। भगवान्‌की लीलाओंका पूर्ण वर्णन तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते॥ ३९॥"},{"id":"12.4.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/40/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संसारसिन्धुमतिदुस्तरमुत्तितीर्षो-","र्नान्यः प्लवो भगवतः पुरुषोत्तमस्य।","लीलाकथारसनिषेवणमन्तरेण","पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य॥ ४०"],"iast":["saṃsārasindhumatidustaramuttitīrṣo-","rnānyaḥ plavo bhagavataḥ puruṣottamasya|","līlākathārasaniṣevaṇamantareṇa","puṃso bhaved vividhaduḥkhadavārditasya|| 40"],"meaning":"जो लोग अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरसे पार जाना चाहते हैं अथवा जो लोग अनेकों प्रकारके दुःख-दावानलसे दग्ध हो रहे हैं, उनके लिये पुषोत्तमभगवान्‌की लीला-कथारूप रसके सेवनके अतिरिक्त और कोई साधन, कोई नौका नहीं है। ये केवल लीला-रसायनका सेवन करके ही अपना मनोरथ सिद्ध कर सकते हैं॥ ४०॥"},{"id":"12.4.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/41/","page":929,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुराणसंहितामेतामृषिर्नारायणोऽव्ययः ।","नारदाय पुरा प्राह कृष्णद्वैपायनाय सः॥ ४१"],"iast":["purāṇasaṃhitāmetāmṛṣirnārāyaṇo'vyayaḥ |","nāradāya purā prāha kṛṣṇadvaipāyanāya saḥ|| 41"],"meaning":"जो कुछ मैंने तुम्हें सुनाया है, यही श्रीमद्भागवतपुराण है। इसे सनातन ऋषि नर-नारायणने पहले देवर्षि नारदको सुनाया था और उन्होंने मेरे पिता महर्षि कृष्णद्वैपायनको॥ ४१॥"},{"id":"12.4.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/42/","page":930,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स वै मह्यं महाराज भगवान् बादरायणः।","इमां भागवतीं प्रीतः संहितां वेदसम्मिताम्॥ ४२"],"iast":["sa vai mahyaṃ mahārāja bhagavān bādarāyaṇaḥ|","imāṃ bhāgavatīṃ prītaḥ saṃhitāṃ vedasammitām|| 42"],"meaning":"महाराज! उन्हीं बदरीवनविहारी भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने प्रसन्‍न होकर मुझे इस वेदतुल्य श्रीभागवतसंहिताका उपदेश किया॥ ४२॥"},{"id":"12.4.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/4/43/","page":930,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतां वक्ष्यत्यसौ सूत ऋषिभ्यो नैमिषालये।","दीर्घसत्रे कुरुश्रेष्ठ सम्पृष्टः शौनकादिभिः॥ ४३"],"iast":["etāṃ vakṣyatyasau sūta ṛṣibhyo naimiṣālaye|","dīrghasatre kuruśreṣṭha sampṛṣṭaḥ śaunakādibhiḥ|| 43"],"meaning":"कुरुश्रेष्ठ! आगे चलकर जब शौनकादि ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रमें बहुत बड़ा सत्र करेंगे, तब उनके प्रश्‍न करनेपर पौराणिक वक्ता श्रीसूतजी उन लोगोंको इस संहिताका श्रवण करायेंगे॥ ४३॥"}],"text":[{"b":42357,"kind":"adhyaya_heading","page":924,"text":"अथ चतुर्थोऽध्यायः"},{"b":42358,"kind":"topic_heading","page":924,"text":"चार प्रकारके प्रलय"},{"b":42359,"kind":"topic_heading","page":924,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":42360,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.1"],"text":"कालस्ते परमाण्वादिर्द्विपरार्धावधिर्नृप।"},{"b":42361,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.1"],"text":"कथितो युगमानं च शृणु कल्पलयावपि॥ १"},{"b":42362,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.2"],"text":"चतुर्युगसहस्रं च ब्रह्मणो दिनमुच्यते।"},{"b":42363,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.2"],"text":"स कल्पो यत्र मनवश्‍चतुर्दश विशांपते॥ २"},{"b":42364,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.3"],"text":"तदन्ते प्रलयस्तावान् ब्राह्मी रात्रिरुदाहृता।"},{"b":42365,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.3"],"text":"त्रयो लोका इमे तत्र कल्पन्ते प्रलयाय हि॥ ३"},{"b":42366,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.4"],"text":"एष नैमित्तिकः प्रोक्तः प्रलयो यत्र विश्‍वसृक्।"},{"b":42367,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.4"],"text":"शेतेऽनन्तासनो विश्‍वमात्मसात्कृत्य चात्मभूः॥ ४"},{"b":42368,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.5"],"text":"द्विपरार्धे त्वतिक्रान्ते ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।"},{"b":42369,"kind":"sanskrit_shloka","page":924,"verses":["12.4.5"],"text":"तदा प्रकृतयः सप्त कल्पन्ते प्रलयाय वै॥ ५"},{"b":42370,"kind":"hindi_commentary","page":924,"explains":["12.4.1","12.4.2","12.4.3","12.4.4","12.4.5"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! (तीसरे स्कन्धमें) परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त कालका स्वरूप और एक-एक युग कितने-कितने वर्षोंका होता है, यह मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। अब तुम कल्पकी स्थिति और उसके प्रलयका वर्णन भी सुनो॥ १॥ राजन्! एक हजार चतुर्युगीका ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्माके इस दिनको ही कल्प भी कहते हैं। एक कल्पमें चौदह मनु होते हैं॥ २॥ कल्पके अन्तमें उतने ही समयतक प्रलय भी रहता है। प्रलयको ही ब्रह्माकी रात भी कहते हैं। उस समय ये तीनों लोक लीन हो जाते हैं, उनका प्रलय हो जाता है॥ ३॥ इसका नाम नैमित्तिक प्रलय है। इस प्रलयके अवसरपर सारे विश्‍वको अपने अंदर समेटकर—लीन कर ब्रह्मा और तत्पश्‍चात् शेषशायी भगवान् नारायण भी शयन कर जाते हैं॥ ४॥ इस प्रकार रातके बाद दिन और दिनके बाद रात होते-होते जब ब्रह्माजीकी अपने मानसे सौ वर्षकी और मनुष्योंकी दृष्टिमें दो परार्द्धकी आयु समाप्त हो जाती है, तब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा—ये सातों प्रकृतियाँ अपने कारण मूल प्रकृतिमें लीन हो जाती हैं॥ ५॥"},{"b":42371,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.6"],"text":"एष प्राकृतिको राजन् प्रलयो यत्र लीयते।"},{"b":42372,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.6"],"text":"आण्डकोशस्तु संघातो विघात उपसादिते॥ ६"},{"b":42373,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.7"],"text":"पर्जन्यः शतवर्षाणि भूमौ राजन् न वर्षति।"},{"b":42374,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.7"],"text":"तदा निरन्‍ने ह्यन्योन्यं भक्षमाणाः क्षुधार्दिताः॥ ७"},{"b":42375,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.8"],"text":"क्षयं यास्यन्ति शनकैः कालेनोपद्रुताः प्रजाः।"},{"b":42376,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.8"],"text":"सामुद्रं दैहिकं भौमं रसं सांवर्तको रविः॥ ८"},{"b":42377,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.9"],"text":"रश्मिभिः पिबते घोरैः सर्वं नैव विमुंचति।"},{"b":42378,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.9"],"text":"ततः संवर्तको वह्निः संकर्षणमुखोत्थितः॥ ९"},{"b":42379,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.10"],"text":"दहत्यनिलवेगोत्थः शून्यान् भूविवरानथ।"},{"b":42380,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.10"],"text":"उपर्यधः समन्ताच्च शिखाभिर्वह्निसूर्ययोः॥ १०"},{"b":42381,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.11"],"text":"दह्यमानं विभात्यण्डं दग्धगोमयपिण्डवत्।"},{"b":42382,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.11"],"text":"ततः प्रचण्डपवनो वर्षाणामधिकं शतम्॥ ११"},{"b":42383,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.12"],"text":"परः सांवर्तको वाति धूम्रं खं रजसाऽऽवृतम्।"},{"b":42384,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.12"],"text":"ततो मेघकुलान्यंग चित्रवर्णान्यनेकशः॥ १२"},{"b":42385,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.13"],"text":"शतं वर्षाणि वर्षन्ति नदन्ति रभसस्वनैः।"},{"b":42386,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.13"],"text":"तत एकोदकं विश्‍वं ब्रह्माण्डविवरान्तरम्॥ १३"},{"b":42387,"kind":"hindi_translation","page":925,"explains":["12.4.6","12.4.7","12.4.8","12.4.9","12.4.10","12.4.11","12.4.12","12.4.13"],"text":"राजन्! इसीका नाम प्राकृतिक प्रलय है। इस प्रलयमें प्रलयका कारण उपस्थित होनेपर पंचभूतोंके मिश्रणसे बना हुआ ब्रह्माण्ड अपना स्थूलरूप छोड़कर कारणरूपमें स्थित हो जाता है, घुल-मिल जाता है॥ ६॥ परीक्षित्! प्रलयका समय आनेपर सौ वर्षतक मेघ पृथ्वीपर वर्षा नहीं करते। किसीको अन्‍न नहीं मिलता। उस समय प्रजा भूख-प्याससे व्याकुल होकर एक-दूसरेको खाने लगती है॥ ७॥ इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्‌के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्‍नि प्रकट होती है॥ ८-९॥ वायुके वेगसे वह और भी बढ़ जाती है और तल-अतल आदि सातों नीचेके लोकोंको भस्म कर देती है। वहाँके प्राणी तो पहले ही मर चुके होते हैं नीचेसे आगकी करारी लपटें और ऊपरसे सूर्यकी प्रचण्ड गरमी! उस समय ऊपर-नीचे, चारों ओर यह ब्रह्माण्ड जलने लगता है और ऐसा जान पड़ता है, मानो गोबरका उपला जलकर अंगारेके रूपमें दहक रहा हो। इसके बाद प्रलयकालीन अत्यन्त प्रचण्ड सांवर्तक वायु सैकड़ों वर्षोंतक चलती रहती है। उस समयका आकाश धूएँ और धूलसे तो भरा ही रहता है, उसके बाद असंख्यों रंग-बिरंगे बादल आकाशमें मँडराने लगते हैं और बड़ी भयंकरताके साथ गरज-गरजकर सैकड़ों वर्षोंतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय ब्रह्माण्डके भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जलम‌ग्‍न हो जाता है॥ १०—१३॥"},{"b":42388,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.14"],"text":"तदा भूमेर्गन्धगुणं ग्रसन्त्याप उदप्लवे।"},{"b":42389,"kind":"sanskrit_shloka","page":925,"verses":["12.4.14"],"text":"ग्रस्तगन्धा तु पृथिवी प्रलयत्वाय कल्पते॥ १४"},{"b":42390,"kind":"hindi_translation","page":925,"explains":["12.4.14"],"text":"इस प्रकार जब जल-प्रलय हो जाता है, तब जल पृथ्वीके विशेष गुण गन्धको ग्रस लेता है—अपनेमें लीन कर लेता है। गन्ध गुणके जलमें लीन हो जानेपर पृथ्वीका प्रलय हो जाता है, वह जलमें घुल-मिलकर जलरूप बन जाती है॥ १४॥"},{"b":42391,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.15"],"text":"अपां रसमथो तेजस्ता लीयन्तेऽथ नीरसाः।"},{"b":42392,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.15"],"text":"ग्रसते तेजसो रूपं वायुस्तद्रहितं तदा॥ १५"},{"b":42393,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.16"],"text":"लीयते चानिले तेजो वायोः खं ग्रसते गुणम्।"},{"b":42394,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.16"],"text":"स वै विशति खं राजंस्ततश्‍च नभसो गुणम्॥ १६"},{"b":42395,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.17"],"text":"शब्दं ग्रसति भूतादिर्नभस्तमनुलीयते।"},{"b":42396,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.17"],"text":"तैजसश्‍चेन्द्रियाण्यङ्ग देवान् वैकारिको गुणैः॥ १७"},{"b":42397,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.18"],"text":"महान् ग्रसत्यहंकारं गुणाः सत्त्वादयश्‍च तम्।"},{"b":42398,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.18"],"text":"ग्रसतेऽव्याकृतं राजन् गुणान् कालेन चोदितम्॥ १८"},{"b":42399,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.19"],"text":"न तस्य कालावयवैः परिणामादयो गुणाः।"},{"b":42400,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.19"],"text":"अनाद्यनन्तमव्यक्तं नित्यं कारणमव्ययम्॥ १९"},{"b":42401,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.20"],"text":"न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं"},{"b":42402,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.20"],"text":"तमो रजो वा महदादयोऽमी।"},{"b":42403,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.20"],"text":"न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा"},{"b":42404,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.20"],"text":"न सन्‍निवेशः खलु लोककल्पः॥ २०"},{"b":42405,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.21"],"text":"न स्वप्नजाग्रन्‍न च तत् सुषुप्तं"},{"b":42406,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.21"],"text":"न खं जलं भूरनिलोऽग्‍निरर्कः।"},{"b":42407,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.21"],"text":"संसुप्तवच्छून्यवदप्रतर्क्यं"},{"b":42408,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.21"],"text":"तन्मूलभूतं पदमामनन्ति॥ २१"},{"b":42409,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.22"],"text":"लयः प्राकृतिको ह्येष पुरुषाव्यक्तयोर्यदा।"},{"b":42410,"kind":"sanskrit_shloka","page":926,"verses":["12.4.22"],"text":"शक्तयः सम्प्रलीयन्ते विवशाः कालविद्रुताः॥ २२"},{"b":42411,"kind":"hindi_translation","page":926,"explains":["12.4.15","12.4.16","12.4.17","12.4.18","12.4.19","12.4.20","12.4.21","12.4.22"],"text":"राजन्! इसके बाद जलके गुण रसको तेजस्तत्त्व ग्रस लेता है और जल नीरस होकर तेजमें समा जाता है। तदनन्तर वायु तेजके गुण रूपको ग्रस लेता है और तेज रूपरहित होकर वायुमें लीन हो जाता है। अब आकाश वायुके गुण स्पर्शको अपनेमें मिला लेता है और वायु स्पर्शहीन होकर आकाशमें शान्त हो जाता है। इसके बाद तामस अहंकार आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है और आकाश शब्दहीन होकर तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इसी प्रकार तैजस अहंकार इन्द्रियोंको और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इन्द्रियवृत्तियोंको अपनेमें लीन कर लेता है॥ १५—१७॥ तत्पश्‍चात् महत्तत्त्व अहंकारको और सत्त्व आदि गुण महत्तत्त्वको ग्रस लेते हैं। परीक्षित्! यह सब कालकी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे अव्यक्त प्रकृति गुणोंको ग्रस लेती है और तब केवल प्रकृति-ही-प्रकृति शेष रह जाती है॥ १८॥ वही चराचर जगत‍्का मूल कारण है। वह अव्यक्त, अनादि, अनन्त, नित्य और अविनाशी है। जब वह अपने कार्योंको लीन करके प्रलयके समय साम्यावस्थाको प्राप्त हो जाती है, तब कालके अवयव वर्ष, मास, दिन-रात क्षण आदिके कारण उसमें परिणाम, क्षय, वृद्धि आदि किसी प्रकारके विकार नहीं होते॥ १९॥ उस समय प्रकृतिमें स्थूल अथवा सूक्ष्मरूपसे वाणी, मन, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, महत्तत्त्व आदि विकार, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और उनके देवता आदि कुछ नहीं रहते। सृष्टिके समय रहनेवाले लोकोंकी कल्पना और उनकी स्थिति भी नहीं रहती॥ २०॥ उस समय स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति—ये तीन अवस्थाएँ नहीं रहतीं। आकाश, जल, पृथ्वी, वायु, अग्‍नि और सूर्य भी नहीं रहते। सब कुछ सोये हुएके समान शून्य-सा रहता है। उस अवस्थाका तर्कके द्वारा अनुमान करना भी असम्भव है। उस अव्यक्तको ही जगत‍्का मूलभूत तत्त्व कहते हैं॥ २१॥ इसी अवस्थाका नाम ‘प्राकृत प्रलय’ है। उस समय पुरुष और प्रकृति दोनोंकी शक्तियाँ कालके प्रभावसे क्षीण हो जाती हैं और विवश होकर अपने मूल-स्वरूपमें लीन हो जाती हैं॥ २२॥"},{"b":42412,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.23"],"text":"बुद्धीन्द्रियार्थरूपेण ज्ञानं भाति तदाश्रयम्।"},{"b":42413,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.23"],"text":"दृश्यत्वाव्यतिरेकाभ्यामाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २३"},{"b":42414,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.24"],"text":"दीपश्‍चक्षुश्‍च रूपं च ज्योतिषो न पृथग् भवेत्।"},{"b":42415,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.24"],"text":"एवं धीः खानि मात्राश्‍च न स्युरन्यतमादृतात्॥ २४"},{"b":42416,"kind":"hindi_translation","page":927,"explains":["12.4.23","12.4.24"],"text":"परीक्षित्! (अब आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका स्वरूप बतलाया जाता है।) बुद्धि, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें उनका अधिष्ठान, ज्ञानस्वरूप वस्तु ही भासित हो रही है। उन सबका तो आदि भी है और अन्त भी। इसलिये वे सब सत्य नहीं हैं। वे दृश्य हैं और अपने अधिष्ठानसे भिन्‍न उनकी सत्ता भी नहीं है। इसलिये वे सर्वथा मिथ्या—मायामात्र हैं॥ २३॥ जैसे दीपक, नेत्र और रूप—ये तीनों तेजसे भिन्‍न नहीं हैं, वैसे ही बुद्धि इन्द्रिय और इनके विषय तन्मात्राएँ भी अपने अधिष्ठान स्वरूप ब्रह्मसे भिन्‍न नहीं हैं यद्यपि वह इनसे सर्वथा भिन्‍न है; (जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानमें अध्यस्त सर्प अपने अधिष्ठानसे पृथक् नहीं है, परन्तु अध्यस्त सर्पसे अधिष्ठानका कोई सम्बन्ध नहीं है)॥ २४॥"},{"b":42417,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.25"],"text":"बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति चोच्यते।"},{"b":42418,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.25"],"text":"मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि॥ २५"},{"b":42419,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.26"],"text":"यथा जलधरा व्योम्‍नि भवन्ति न भवन्ति च।"},{"b":42420,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.26"],"text":"ब्रह्मणीदं तथा विश्‍वमवयव्युदयाप्ययात्॥ २६"},{"b":42421,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.27"],"text":"सत्यं ह्यवयवः प्रोक्तः सर्वावयविनामिह।"},{"b":42422,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.27"],"text":"विनार्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवांग तन्तवः॥ २७"},{"b":42423,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.28"],"text":"यत् सामान्यविशेषाभ्यामुपलभ्येत स भ्रमः।"},{"b":42424,"kind":"sanskrit_shloka","page":927,"verses":["12.4.28"],"text":"अन्योन्यापाश्रयात् सर्वमाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २८"},{"b":42425,"kind":"hindi_translation","page":927,"explains":["12.4.25","12.4.26","12.4.27","12.4.28"],"text":"परीक्षित्! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धिकी ही हैं। अतः इनके कारण अन्तरात्मामें जो विश्‍व, तैजस और प्राज्ञरूप नानात्वकी प्रतीति होती है, वह केवल मायामात्र है। बुद्धिगत नानात्वका एकमात्र सत्य आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है॥ २५॥ यह विश्‍व उत्पत्ति और प्रलयसे ग्रस्त है, इसलिये अनेक अवयवोंका समूह अवयवी है। अतः यह कभी ब्रह्ममें होता है और कभी नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें मेघमाला कभी होती है और कभी नहीं होती॥ २६॥ परीक्षित्! जगत‍्के व्यवहारमें जितने भी अवयवी पदार्थ होते हैं, उनके न होनेपर भी उनके भिन्‍न-भिन्‍न अवयव सत्य माने जाते हैं। क्योंकि वे उनके कारण हैं। जैसे वस्त्ररूप अवयवीके न होनेपर भी उसके कारणरूप सूतका अस्तित्व माना ही जाता है, उसी प्रकार कार्यरूप जगत‍्के अभावमें भी इस जगत‍्के कारणरूप अवयवकी स्थिति हो सकती है॥ २७॥ परन्तु ब्रह्ममें यह कार्य-कारणभाव भी वास्तविक नहीं है। क्योंकि देखो, कारण तो सामान्य वस्तु है और कार्य विशेष वस्तु। इस प्रकारका जो भेद दिखायी देता है, वह केवल भ्रम ही है। इसका हेतु यह है कि सामान्य और विशेष भाव आपेक्षिक हैं, अन्योन्याश्रित हैं। विशेषके बिना सामान्य और सामान्यके बिना विशेषकी स्थिति नहीं हो सकती। कार्य और कारणभावका आदि और अन्त दोनों ही मिलते हैं, इसलिये भी वह स्वाप्निक भेद-भावके समान सर्वथा अवस्तु है॥ २८॥"},{"b":42426,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.29"],"text":"विकारः ख्यायमानोऽपि प्रत्यगात्मानमन्तरा।"},{"b":42427,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.29"],"text":"न निरूप्योऽस्त्यणुरपि स्याच्चेच्चित्सम आत्मवत्॥ २९"},{"b":42428,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.30"],"text":"नहि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते।"},{"b":42429,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.30"],"text":"नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वातयोरिव॥ ३०"},{"b":42430,"kind":"hindi_translation","page":928,"explains":["12.4.29","12.4.30"],"text":"इसमें सन्देह नहीं कि यह प्रपंचरूप विकार स्वाप्निक विकारके समान ही प्रतीत हो रहा है, तो भी यह अपने अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूप आत्मासे भिन्‍न नहीं है। कोई चाहे भी तो आत्मासे भिन्‍न रूपमें अणुमात्र भी इसका निरूपण नहीं कर सकता। यदि आत्मासे पृथक् इसकी सत्ता मानी भी जाय तो यह भी चिद्रूप आत्माके समान स्वयंप्रकाश होगा, और ऐसी स्थितिमें वह आत्माकी भाँति ही एकरूप सिद्ध होगा॥ २९॥ परन्तु इतना तो सर्वथा निश्‍चित है कि परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व नहीं है। यदि कोई अज्ञानी परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व स्वीकार करता है, तो उसका वह मानना वैसा ही है, जैसा महाकाश और घटाकाशका, आकाशस्थित सूर्य और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यका तथा बाह्य वायु और आन्तर वायुका भेद मानना॥ ३०॥"},{"b":42431,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.31"],"text":"यथा हिरण्यं बहुधा समीयते"},{"b":42432,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.31"],"text":"नृभिः क्रियाभिर्व्यवहारवर्त्मसु।"},{"b":42433,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.31"],"text":"एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजो"},{"b":42434,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.31"],"text":"व्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जनैः॥ ३१"},{"b":42435,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.32"],"text":"यथा घनोऽर्कप्रभवोऽर्कदर्शितो"},{"b":42436,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.32"],"text":"ह्यर्कांशभूतस्य च चक्षुषस्तमः।"},{"b":42437,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.32"],"text":"एवं त्वहं ब्रह्मगुणस्तदीक्षितो"},{"b":42438,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.32"],"text":"ब्रह्मांशकस्यात्मन आत्मबन्धनः॥ ३२"},{"b":42439,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.33"],"text":"घनो यदार्कप्रभवो विदीर्यते"},{"b":42440,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.33"],"text":"चक्षुः स्वरूपं रविमीक्षते तदा।"},{"b":42441,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.33"],"text":"यदा ह्यहंकार उपाधिरात्मनो"},{"b":42442,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.33"],"text":"जिज्ञासया नश्यति तर्ह्यनुस्मरेत्॥ ३३"},{"b":42443,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.34"],"text":"यदैवमेतेन विवेकहेतिना"},{"b":42444,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.34"],"text":"मायामयाहंकरणात्मबन्धनम् ।"},{"b":42445,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.34"],"text":"छित्त्वाच्युतात्मानुभवोऽवतिष्ठते"},{"b":42446,"kind":"sanskrit_shloka","page":928,"verses":["12.4.34"],"text":"तमाहुरात्यन्तिकमंग सम्प्लवम्॥ ३४"},{"b":42447,"kind":"hindi_translation","page":928,"explains":["12.4.31","12.4.32","12.4.33","12.4.34"],"text":"जैसे व्यवहारमें मनुष्य एक ही सोनेको अनेकों रूपोंमें गढ़-गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन, कुण्डल, कड़ा आदि अनेकों रूपोंमें मिलता है; इसी प्रकार व्यवहारमें निपुण विद्वान् लौकिक और वैदिक वाणीके द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवान्‌का भी अनेकों रूपोंमें वर्णन करते हैं॥ ३१॥ देखो न, बादल सूर्यसे उत्पन्‍न होता है और सूर्यसे ही प्रकाशित। फिर भी वह सूर्यके ही अंश नेत्रोंके लिये सूर्यका दर्शन होनेमें बाधक बन बैठता है। इसी प्रकार अहंकार भी ब्रह्मसे ही उत्पन्‍न होता, ब्रह्मसे ही प्रकाशित होता और ब्रह्मके अंश जीवके लिये ब्रह्मस्वरूपके साक्षात्कारमें बाधक बन बैठता है॥ ३२॥ जब सूर्यसे प्रकट होनेवाला बादल तितर-बितर हो जाता है, तब नेत्र अपने स्वरूप सूर्यका दर्शन करनेमें समर्थ होते हैं। ठीक वैसे ही, जब जीवके हृदयमें जिज्ञासा जगती है, तब आत्माकी उपाधि अहंकार नष्ट हो जाता है और उसे अपने स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है॥ ३३॥ प्रिय परीक्षित्! जब जीव विवेकके खड्गसे मायामय अहंकारका बन्धन काट देता है, तब यह अपने एकरस आत्मस्वरूपके साक्षात्कारमें स्थित हो जाता है। आत्माकी यह मायामुक्त वास्तविक स्थिति ही आत्यन्तिक प्रलय कही जाती है॥ ३४॥"},{"b":42448,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.35"],"text":"नित्यदा सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां परंतप।"},{"b":42449,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.35"],"text":"उत्पत्तिप्रलयावेके सूक्ष्मज्ञाः सम्प्रचक्षते॥ ३५"},{"b":42450,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.36"],"text":"कालस्रोतोजवेनाशु ह्रियमाणस्य नित्यदा।"},{"b":42451,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.36"],"text":"परिणामिनामवस्थास्ता जन्मप्रलयहेतवः॥ ३६"},{"b":42452,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.37"],"text":"अनाद्यन्तवतानेन कालेनेश्‍वरमूर्तिना।"},{"b":42453,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.37"],"text":"अवस्था नैव दृश्यन्ते वियति ज्योतिषामिव॥ ३७"},{"b":42454,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.38"],"text":"नित्यो नैमित्तिकश्‍चैव तथा प्राकृतिको लयः।"},{"b":42455,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.38"],"text":"आत्यन्तिकश्‍च कथितः कालस्य गतिरीदृशी॥ ३८"},{"b":42456,"kind":"hindi_translation","page":929,"explains":["12.4.35","12.4.36","12.4.37","12.4.38"],"text":"हे शत्रुदमन! तत्त्वदर्शी लोग कहते हैं कि ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक जितने प्राणी या पदार्थ हैं, सभी हर समय पैदा होते और मरते रहते हैं। अर्थात् नित्यरूपसे उत्पत्ति और प्रलय होता ही रहता है॥ ३५॥ संसारके परिणामी पदार्थ नदी-प्रवाह और दीप-शिखा आदि क्षण-क्षण बदलते रहते हैं। उनकी बदलती हुई अवस्थाओंको देखकर यह निश्‍चय होता है कि देह आदि भी कालरूप सोतेके वेगमें बहते-बदलते जा रहे हैं। इसलिये क्षण-क्षणमें उनकी उत्पत्ति और प्रलय हो रहा है॥ ३६॥ जैसे आकाशमें तारे हर समय चलते ही रहते हैं, परन्तु उनकी गति स्पष्टरूपसे नहीं दिखायी पड़ती, वैसे ही भगवान्‌के स्वरूपभूत अनादि-अनन्त कालके कारण प्राणियोंकी प्रतिक्षण होनेवाली उत्पत्ति और प्रलयका भी पता नहीं चलता॥ ३७॥ परीक्षित्! मैंने तुमसे चार प्रकारके प्रलयका वर्णन किया; उनके नाम हैं—नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृतिक प्रलय और आत्यन्तिक प्रलय। वास्तवमें कालकी सूक्ष्म गति ऐसी ही है॥ ३८॥"},{"b":42457,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.39"],"text":"एताः कुरुश्रेष्ठ जगद्विधातु-"},{"b":42458,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.39"],"text":"र्नारायणस्याखिलसत्त्वधाम्‍नः ।"},{"b":42459,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.39"],"text":"लीलाकथास्ते कथिताः समासतः"},{"b":42460,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.39"],"text":"कार्त्स्न्येन नाजोऽप्यभिधातुमीशः॥ ३९"},{"b":42461,"kind":"hindi_translation","page":929,"explains":["12.4.39"],"text":"हे कुरुश्रेष्ठ! विश्‍वविधाता भगवान् नारायण ही समस्त प्राणियों और शक्तियोंके आश्रय हैं। जो कुछ मैंने संक्षेपसे कहा है, वह सब उन्हींकी लीला-कथा है। भगवान्‌की लीलाओंका पूर्ण वर्णन तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते॥ ३९॥"},{"b":42462,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.40"],"text":"संसारसिन्धुमतिदुस्तरमुत्तितीर्षो-"},{"b":42463,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.40"],"text":"र्नान्यः प्लवो भगवतः पुरुषोत्तमस्य।"},{"b":42464,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.40"],"text":"लीलाकथारसनिषेवणमन्तरेण"},{"b":42465,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.40"],"text":"पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य॥ ४०"},{"b":42466,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.41"],"text":"पुराणसंहितामेतामृषिर्नारायणोऽव्ययः ।"},{"b":42467,"kind":"sanskrit_shloka","page":929,"verses":["12.4.41"],"text":"नारदाय पुरा प्राह कृष्णद्वैपायनाय सः॥ ४१"},{"b":42468,"kind":"sanskrit_shloka","page":930,"verses":["12.4.42"],"text":"स वै मह्यं महाराज भगवान् बादरायणः।"},{"b":42469,"kind":"sanskrit_shloka","page":930,"verses":["12.4.42"],"text":"इमां भागवतीं प्रीतः संहितां वेदसम्मिताम्॥ ४२"},{"b":42470,"kind":"sanskrit_shloka","page":930,"verses":["12.4.43"],"text":"एतां वक्ष्यत्यसौ सूत ऋषिभ्यो नैमिषालये।"},{"b":42471,"kind":"sanskrit_shloka","page":930,"verses":["12.4.43"],"text":"दीर्घसत्रे कुरुश्रेष्ठ सम्पृष्टः शौनकादिभिः॥ ४३"},{"b":42472,"kind":"hindi_translation","page":929,"explains":["12.4.40","12.4.41","12.4.42","12.4.43"],"text":"जो लोग अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरसे पार जाना चाहते हैं अथवा जो लोग अनेकों प्रकारके दुःख-दावानलसे दग्ध हो रहे हैं, उनके लिये पुषोत्तमभगवान्‌की लीला-कथारूप रसके सेवनके अतिरिक्त और कोई साधन, कोई नौका नहीं है। ये केवल लीला-रसायनका सेवन करके ही अपना मनोरथ सिद्ध कर सकते हैं॥ ४०॥ जो कुछ मैंने तुम्हें सुनाया है, यही श्रीमद्भागवतपुराण है। इसे सनातन ऋषि नर-नारायणने पहले देवर्षि नारदको सुनाया था और उन्होंने मेरे पिता महर्षि कृष्णद्वैपायनको॥ ४१॥ महाराज! उन्हीं बदरीवनविहारी भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने प्रसन्‍न होकर मुझे इस वेदतुल्य श्रीभागवतसंहिताका उपदेश किया॥ ४२॥ कुरुश्रेष्ठ! आगे चलकर जब शौनकादि ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रमें बहुत बड़ा सत्र करेंगे, तब उनके प्रश्‍न करनेपर पौराणिक वक्ता श्रीसूतजी उन लोगोंको इस संहिताका श्रवण करायेंगे॥ ४३॥"},{"b":42473,"kind":"hindi_translation","page":930,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥"}],"notes":[{"id":"v2:431","mark":"१","page":928,"after_verse":"12.4.31","text":"प्रतीयते।"}],"corrections":{"count":0,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}