{"id":"12.7","title":"द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7","part":"द्वादश स्कन्ध","heading":"अथ सप्तमोऽध्यायः","topics":["अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 12.7.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[942,945]},"verses":[{"id":"12.7.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/1/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अथर्ववित् सुमन्तुश्‍च शिष्यमध्यापयत् स्वकाम्।","संहितां सोऽपि पथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान्॥ १"],"iast":["atharvavit sumantuśca śiṣyamadhyāpayat svakām|","saṃhitāṃ so'pi pathyāya vedadarśāya coktavān|| 1"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! मैं कह चुका हूँ कि अथर्ववेदके ज्ञाता सुमन्तुमुनि थे। उन्होंने अपनी संहिता अपने प्रिय शिष्य कबन्धको पढ़ायी। कबन्धने उस संहिताके दो भाग करके पथ्य और वेद-दर्शको उसका अध्ययन कराया॥ १॥"},{"id":"12.7.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/2/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["शौक्लायनिर्ब्रह्मबलिर्मोदोषः पिप्पलायनिः।","वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो शृणु॥ २"],"iast":["śauklāyanirbrahmabalirmodoṣaḥ pippalāyaniḥ|","vedadarśasya śiṣyāste pathyaśiṣyānatho śṛṇu|| 2"],"meaning":"वेददर्शके चार शिष्य हुए—शौक्लायनि, ब्रह्मबलि, मोदोष और पिप्पलायनि। अब पथ्यके शिष्योंके नाम सुनो॥ २॥"},{"id":"12.7.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/3/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्‍चाप्यथर्ववित्।","बभ्रुः शिष्योऽथांगिरसः सैन्धवायन एव च।","अधीयेतां संहिते द्वे सावर्ण्याद्यास्तथापरे॥ ३"],"iast":["kumudaḥ śunako brahman jājaliścāpyatharvavit|","babhruḥ śiṣyo'thāṃgirasaḥ saindhavāyana eva ca|","adhīyetāṃ saṃhite dve sāvarṇyādyāstathāpare|| 3"],"meaning":"शौनकजी! पथ्यके तीन शिष्य थे—कुमुद, शुनक और अथर्ववेत्ता जाजलि। अंगिरा-गोत्रोत्पन्‍न शुनकके दो शिष्य थे—बभ्रु और सैन्धवायन। उन लोगोंने दो संहिताओंका अध्ययन किया। अथर्ववेदके आचार्योंमें इनके अतिरिक्त सैन्धवायनादिके शिष्य सावर्ण्य आदि तथा नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आंगिरस आदि कई विद्वान् और भी हुए। अब मैं तुम्हें पौराणिकोंके सम्बन्धमें सुनाता हूँ॥ ३-४॥","meaning_covers":[3,4]},{"id":"12.7.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/4/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नक्षत्रकल्पः शान्तिश्‍च कश्यपांगिरसादयः।","एते आथर्वणाचार्याः शृणु पौराणिकान् मुने॥ ४"],"iast":["nakṣatrakalpaḥ śāntiśca kaśyapāṃgirasādayaḥ|","ete ātharvaṇācāryāḥ śṛṇu paurāṇikān mune|| 4"],"meaning":"शौनकजी! पथ्यके तीन शिष्य थे—कुमुद, शुनक और अथर्ववेत्ता जाजलि। अंगिरा-गोत्रोत्पन्‍न शुनकके दो शिष्य थे—बभ्रु और सैन्धवायन। उन लोगोंने दो संहिताओंका अध्ययन किया। अथर्ववेदके आचार्योंमें इनके अतिरिक्त सैन्धवायनादिके शिष्य सावर्ण्य आदि तथा नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आंगिरस आदि कई विद्वान् और भी हुए। अब मैं तुम्हें पौराणिकोंके सम्बन्धमें सुनाता हूँ॥ ३-४॥","meaning_covers":[3,4]},{"id":"12.7.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/5/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["त्रय्यारुणिः कश्यपश्‍च सावर्णिरकृतव्रणः।","वैशम्पायन हारीतौ षड् वै पौराणिका इमे॥ ५"],"iast":["trayyāruṇiḥ kaśyapaśca sāvarṇirakṛtavraṇaḥ|","vaiśampāyana hārītau ṣaḍ vai paurāṇikā ime|| 5"],"meaning":"शौनकजी! पुराणोंके छः आचार्य प्रसिद्ध हैं—त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, वैशम्पायन और हारीत॥ ५॥"},{"id":"12.7.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/6/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अधीयन्त व्यासशिष्यात् संहितां मत्पितुर्मुखात्।","एकैकामहमेतेषां शिष्यः सर्वाः समध्यगाम्॥ ६"],"iast":["adhīyanta vyāsaśiṣyāt saṃhitāṃ matpiturmukhāt|","ekaikāmahameteṣāṃ śiṣyaḥ sarvāḥ samadhyagām|| 6"],"meaning":"इन लोगोंने मेरे पिताजीसे एक-एक पुराणसंहिता पढ़ी थी और मेरे पिताजीने स्वयं भगवान् व्याससे उन संहिताओंका अध्ययन किया था। मैंने उन छहों आचार्योंसे सभी संहिताओंका अध्ययन किया था॥ ६॥"},{"id":"12.7.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/7/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["कश्यपोऽहं च सावर्णी रामशिष्योऽकृतव्रणः।","अधीमहि व्यासशिष्याच्चतस्रो मूलसंहिताः॥ ७"],"iast":["kaśyapo'haṃ ca sāvarṇī rāmaśiṣyo'kṛtavraṇaḥ|","adhīmahi vyāsaśiṣyāccatasro mūlasaṃhitāḥ|| 7"],"meaning":"उन छः संहिताओंके अतिरिक्त और भी चार मूल संहिताएँ थीं। उन्हें भी कश्यप, सावर्णि, परशुरामजीके शिष्य अकृतव्रण और उन सबके साथ मैंने व्यासजीके शिष्य श्रीरोमहर्षणजीसे, जो मेरे पिता थे, अध्ययन किया था॥ ७॥"},{"id":"12.7.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/8/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["पुराणलक्षणं ब्रह्मन् ब्रह्मर्षिभिर्निरूपितम्।","शृणुष्व बुद्धिमाश्रित्य वेदशास्त्रानुसारतः॥ ८"],"iast":["purāṇalakṣaṇaṃ brahman brahmarṣibhirnirūpitam|","śṛṇuṣva buddhimāśritya vedaśāstrānusārataḥ|| 8"],"meaning":"शौनकजी! महर्षियोंने वेद और शास्त्रोंके अनुसार पुराणोंके लक्षण बतलाये हैं। अब तुम स्वस्थ होकर सावधानीसे उनका वर्णन सुनो॥ ८॥"},{"id":"12.7.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/9/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["सर्गोऽस्याथ विसर्गश्‍च वृत्ती रक्षान्तराणि च।","वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः॥ ९"],"iast":["sargo'syātha visargaśca vṛttī rakṣāntarāṇi ca|","vaṃśo vaṃśānucaritaṃ saṃsthā heturapāśrayaḥ|| 9"],"meaning":"शौनकजी! पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं—विश्‍वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय। कोई-कोई आचार्य पुराणोंके पाँच ही लक्षण मानते हैं। दोनों ही बातें ठीक हैं, क्योंकि महापुराणोंमें दस लक्षण होते हैं और छोटे पुराणोंमें पाँच। विस्तार करके दस बतलाते हैं और संक्षेप करके पाँच॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"12.7.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/10/","page":943,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः।","केचित् पंचविधं ब्रह्मन् महदल्पव्यवस्थया॥ १०"],"iast":["daśabhirlakṣaṇairyuktaṃ purāṇaṃ tadvido viduḥ|","kecit paṃcavidhaṃ brahman mahadalpavyavasthayā|| 10"],"meaning":"शौनकजी! पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं—विश्‍वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय। कोई-कोई आचार्य पुराणोंके पाँच ही लक्षण मानते हैं। दोनों ही बातें ठीक हैं, क्योंकि महापुराणोंमें दस लक्षण होते हैं और छोटे पुराणोंमें पाँच। विस्तार करके दस बतलाते हैं और संक्षेप करके पाँच॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"12.7.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/11/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अव्याकृतगुणक्षोभान्महतस्त्रिवृतोऽहमः।","भूतमात्रेन्द्रियार्थानां सम्भवः सर्ग उच्यते॥ ११"],"iast":["avyākṛtaguṇakṣobhānmahatastrivṛto'hamaḥ|","bhūtamātrendriyārthānāṃ sambhavaḥ sarga ucyate|| 11"],"meaning":"(अब इनके लक्षण सुनो) जब मूल प्रकृतिमें लीन गुण क्षुब्ध होते हैं, तब महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे तामस, राजस और वैकारिक (सात्त्विक)—तीन प्रकारके अहंकार बनते हैं। त्रिविध अहंकारसे ही पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और विषयोंकी उत्पत्ति होती है। इसी उत्पत्तिक्रमका नाम ‘सर्ग’ है॥ ११॥"},{"id":"12.7.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/12/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["पुरुषानुगृहीतानामेतेषां वासनामयः।","विसर्गोऽयं समाहारो बीजाद् बीजं चराचरम्॥ १२"],"iast":["puruṣānugṛhītānāmeteṣāṃ vāsanāmayaḥ|","visargo'yaṃ samāhāro bījād bījaṃ carācaram|| 12"],"meaning":"परमेश्‍वरके अनुग्रहसे सृष्टिका सामर्थ्य प्राप्त करके महत्तत्त्व आदि पूर्वकर्मोंके अनुसार अच्छी और बुरी वासनाओंकी प्रधानतासे जो यह चराचर शरीरात्मक जीवकी उपाधिकी सृष्टि करते हैं, एक बीजसे दूसरे बीजके समान, इसीको विसर्ग कहते हैं॥ १२॥"},{"id":"12.7.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/13/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च।","कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्चोदनयापि वा॥ १३"],"iast":["vṛttirbhūtāni bhūtānāṃ carāṇāmacarāṇi ca|","kṛtā svena nṛṇāṃ tatra kāmāccodanayāpi vā|| 13"],"meaning":"चर प्राणियोंकी अचर-पदार्थ ‘वृत्ति’ अर्थात् जीवन-निर्वाहकी सामग्री है। चर प्राणियोंके दुग्ध आदि भी इनमेंसे मनुष्योंने कुछ तो स्वभाववश कामनाके अनुसार निश्‍चित कर ली है और कुछने शास्त्रके आज्ञानुसार॥ १३॥"},{"id":"12.7.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/14/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["रक्षाच्युतावतारेहा विश्‍वस्यानु युगे युगे।","तिर्यङ्मर्त्यर्षिदेवेषु हन्यन्ते यैस्त्रयीद्विषः॥ १४"],"iast":["rakṣācyutāvatārehā viśvasyānu yuge yuge|","tiryaṅmartyarṣideveṣu hanyante yaistrayīdviṣaḥ|| 14"],"meaning":"भगवान् युग-युगमें पशु-पक्षी, मनुष्य, ऋषि, देवता आदिके रूपमें अवतार ग्रहण करके अनेकों लीलाएँ करते हैं। इन्हीं अवतारोंमें वे वेदधर्मके विरोधियोंका संहार भी करते हैं। उनकी यह अवतार-लीला विश्‍वकी रक्षाके लिये ही होती है, इसीलिये उसका नाम ‘रक्षा’ है॥ १४॥"},{"id":"12.7.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/15/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["मन्वन्तरं मनुर्देवा मनुपुत्राः सुरेश्‍वरः।","ऋषयोंऽशावतारश्‍च हरेः षड्विधमुच्यते॥ १५"],"iast":["manvantaraṃ manurdevā manuputrāḥ sureśvaraḥ|","ṛṣayoṃ'śāvatāraśca hareḥ ṣaḍvidhamucyate|| 15"],"meaning":"मनु, देवता, मनुपुत्र, इन्द्र, सप्तर्षि और भगवान्‌के अंशावतार—इन्हीं छः बातोंकी विशेषतासे युक्त समयको ‘मन्वन्तर’ कहते हैं॥ १५॥"},{"id":"12.7.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/16/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["राज्ञां ब्रह्मप्रसूतानां वंशस्त्रैकालिकोऽन्वयः।","वंशानुचरितं तेषां वृत्तं वंशधराश्‍च ये॥ १६"],"iast":["rājñāṃ brahmaprasūtānāṃ vaṃśastraikāliko'nvayaḥ|","vaṃśānucaritaṃ teṣāṃ vṛttaṃ vaṃśadharāśca ye|| 16"],"meaning":"ब्रह्माजीसे जितने राजाओंकी सृष्टि हुई है, उनकी भूत, भविष्य और वर्तमानकालीन सन्तान-परम्पराको ‘वंश’ कहते हैं। उन राजाओंके तथा उनके वंशधरोंके चरित्रका नाम ‘वंशानुचरित’ है॥ १६॥"},{"id":"12.7.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/17/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लयः।","संस्थेति कविभिः प्रोक्ता चतुर्धास्य स्वभावतः॥ १७"],"iast":["naimittikaḥ prākṛtiko nitya ātyantiko layaḥ|","saṃstheti kavibhiḥ proktā caturdhāsya svabhāvataḥ|| 17"],"meaning":"इस विश्‍वब्रह्माण्डका स्वभावसे ही प्रलय हो जाता है। उसके चार भेद हैं—नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यन्तिक। तत्त्वज्ञ विद्वानोंने इन्हींको ‘संस्था’ कहा है॥ १७॥"},{"id":"12.7.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/18/","page":944,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः।","यं चानुशयिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे॥ १८"],"iast":["heturjīvo'sya sargāderavidyākarmakārakaḥ|","yaṃ cānuśayinaṃ prāhuravyākṛtamutāpare|| 18"],"meaning":"पुराणोंके लक्षणमें ‘हेतु’ नामसे जिसका व्यवहार होता है, वह जीव ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग-विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेकों प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गया है। जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं; और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप कहते हैं॥ १८॥"},{"id":"12.7.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/19/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["व्यतिरेकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु।","मायामयेषु तद् ब्रह्म जीववृत्तिष्वपाश्रयः॥ १९"],"iast":["vyatirekānvayo yasya jāgratsvapnasuṣuptiṣu|","māyāmayeṣu tad brahma jīvavṛttiṣvapāśrayaḥ|| 19"],"meaning":"जीवकी वृत्तियोंके तीन विभाग हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। जो इन अवस्थाओंमें इनके अभिमानी विश्‍व, तैजस और प्राज्ञके मायामय रूपोंमें प्रतीत होता है और इन अवस्थाओंसे परे तुरीयतत्त्वके रूपमें भी लक्षित होता है, वही ब्रह्म है; उसीको यहाँ ‘अपाश्रय’ शब्दसे कहा गया है॥ १९॥"},{"id":"12.7.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/20/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["पदार्थेषु यथा द्रव्यं सन्मात्रं रूपनामसु।","बीजादिपंचतान्तासु ह्यवस्थासु युतायुतम्॥ २०"],"iast":["padārtheṣu yathā dravyaṃ sanmātraṃ rūpanāmasu|","bījādipaṃcatāntāsu hyavasthāsu yutāyutam|| 20"],"meaning":"नामविशेष और रूपविशेषसे युक्त पदार्थोंपर विचार करें तो वे सत्तामात्र वस्तुके रूपमें सिद्ध होते हैं। उनकी विशेषताएँ लुप्त हो जाती हैं। असलमें वह सत्ता ही उन विशेषताओंके रूपमें प्रतीत भी हो रही है और उनसे पृथक् भी है। ठीक इसी न्यायसे शरीर और विश्‍वब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे लेकर मृत्यु और महाप्रलयपर्यन्त जितनी भी विशेष अवस्थाएँ हैं, उनके रूपमें परम सत्यस्वरूप ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है और वह उनसे सर्वथा पृथक् भी है। यही वाक्य-भेदसे अधिष्ठान और साक्षीके रूपमें ब्रह्म ही पुराणोक्त आश्रयतत्त्व है॥ २०॥"},{"id":"12.7.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/21/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम्।","योगेन वा तदाऽऽत्मानं वेदेहाया निवर्तते॥ २१"],"iast":["virameta yadā cittaṃ hitvā vṛttitrayaṃ svayam|","yogena vā tadā''tmānaṃ vedehāyā nivartate|| 21"],"meaning":"जब चित्त स्वयं आत्मविचार अथवा योगाभ्यासके द्वारा सत्त्वगुण-रजोगुण-तमोगुण-सम्बन्धी व्यावहारिक वृत्तियों और जाग्रत्-स्वप्न आदि स्वाभाविक वृत्तियोंका त्याग करके उपराम हो जाता है, तब शान्तवृत्तिमें ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके द्वारा आत्मज्ञानका उदय होता है। उस समय आत्मवेत्ता पुरुष अविद्याजनित कर्म-वासना और कर्मप्रवृत्तिसे निवृत्त हो जाता है॥ २१॥"},{"id":"12.7.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/22/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["एवंलक्षणलक्ष्याणि पुराणानि पुराविदः।","मुनयोऽष्टादश प्राहुः क्षुल्लकानि महान्ति च॥ २२"],"iast":["evaṃlakṣaṇalakṣyāṇi purāṇāni purāvidaḥ|","munayo'ṣṭādaśa prāhuḥ kṣullakāni mahānti ca|| 22"],"meaning":"शौनकादि ऋषियो! पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानोंने इन्हीं लक्षणोंके द्वारा पुराणोंकी यह पहचान बतलायी है। ऐसे लक्षणोंसे युक्त छोटे-बड़े अठारह पुराण हैं॥ २२॥"},{"id":"12.7.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/23/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं लैंगं सगारुडम्।","नारदीयं भागवतमा‌ग्‍नेयं स्कान्दसंज्ञितम्॥ २३"],"iast":["brāhmaṃ pādmaṃ vaiṣṇavaṃ ca śaivaṃ laiṃgaṃ sagāruḍam|","nāradīyaṃ bhāgavatamāgneyaṃ skāndasaṃjñitam|| 23"],"meaning":"उनके नाम ये हैं —ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, गरुडपुराण, नारदपुराण, भागवतपुराण, अग्‍निपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वामनपुराण, वराहपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और ब्रह्माण्डपुराण यह अठारह हैं॥ २३-२४॥","meaning_covers":[23,24]},{"id":"12.7.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/24/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं सवामनम्।","वाराहं मात्स्यं कौर्मं च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट्॥ २४"],"iast":["bhaviṣyaṃ brahmavaivartaṃ mārkaṇḍeyaṃ savāmanam|","vārāhaṃ mātsyaṃ kaurmaṃ ca brahmāṇḍākhyamiti triṣaṭ|| 24"],"meaning":"उनके नाम ये हैं —ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, गरुडपुराण, नारदपुराण, भागवतपुराण, अग्‍निपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वामनपुराण, वराहपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और ब्रह्माण्डपुराण यह अठारह हैं॥ २३-२४॥","meaning_covers":[23,24]},{"id":"12.7.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/7/25/","page":945,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["ब्रह्मन्‍निदं समाख्यातं शाखाप्रणयनं मुनेः।","शिष्यशिष्यप्रशिष्याणां ब्रह्मतेजोविवर्धनम्॥ २५"],"iast":["brahmannidaṃ samākhyātaṃ śākhāpraṇayanaṃ muneḥ|","śiṣyaśiṣyapraśiṣyāṇāṃ brahmatejovivardhanam|| 25"],"meaning":"शौनकजी! व्यासजीकी शिष्य-परम्पराने जिस प्रकार वेदसंहिता और पुराणसंहिताओंका अध्ययन-अध्यापन, विभाजन आदि किया वह मैंने तुम्हें सुना दिया। यह प्रसंग सुनने और पढ़नेवालोंके ब्रह्मतेजकी अभिवृद्धि करता है॥ २५॥"}],"text":[{"b":42705,"kind":"adhyaya_heading","page":943,"text":"अथ सप्तमोऽध्यायः"},{"b":42706,"kind":"topic_heading","page":943,"text":"अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण"},{"b":42707,"kind":"topic_heading","page":942,"text":"सूत उवाच"},{"b":42708,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.1"],"text":"अथर्ववित् सुमन्तुश्‍च शिष्यमध्यापयत् स्वकाम्।"},{"b":42709,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.1"],"text":"संहितां सोऽपि पथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान्॥ १"},{"b":42710,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.2"],"text":"शौक्लायनिर्ब्रह्मबलिर्मोदोषः पिप्पलायनिः।"},{"b":42711,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.2"],"text":"वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो शृणु॥ २"},{"b":42712,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.3"],"text":"कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्‍चाप्यथर्ववित्।"},{"b":42713,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.3"],"text":"बभ्रुः शिष्योऽथांगिरसः सैन्धवायन एव च।"},{"b":42714,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.3"],"text":"अधीयेतां संहिते द्वे सावर्ण्याद्यास्तथापरे॥ ३"},{"b":42715,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.4"],"text":"नक्षत्रकल्पः शान्तिश्‍च कश्यपांगिरसादयः।"},{"b":42716,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.4"],"text":"एते आथर्वणाचार्याः शृणु पौराणिकान् मुने॥ ४"},{"b":42717,"kind":"hindi_commentary","page":943,"explains":["12.7.1","12.7.2","12.7.3","12.7.4"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! मैं कह चुका हूँ कि अथर्ववेदके ज्ञाता सुमन्तुमुनि थे। उन्होंने अपनी संहिता अपने प्रिय शिष्य कबन्धको पढ़ायी। कबन्धने उस संहिताके दो भाग करके पथ्य और वेद-दर्शको उसका अध्ययन कराया॥ १॥ वेददर्शके चार शिष्य हुए—शौक्लायनि, ब्रह्मबलि, मोदोष और पिप्पलायनि। अब पथ्यके शिष्योंके नाम सुनो॥ २॥ शौनकजी! पथ्यके तीन शिष्य थे—कुमुद, शुनक और अथर्ववेत्ता जाजलि। अंगिरा-गोत्रोत्पन्‍न शुनकके दो शिष्य थे—बभ्रु और सैन्धवायन। उन लोगोंने दो संहिताओंका अध्ययन किया। अथर्ववेदके आचार्योंमें इनके अतिरिक्त सैन्धवायनादिके शिष्य सावर्ण्य आदि तथा नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आंगिरस आदि कई विद्वान् और भी हुए। अब मैं तुम्हें पौराणिकोंके सम्बन्धमें सुनाता हूँ॥ ३-४॥"},{"b":42718,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.5"],"text":"त्रय्यारुणिः कश्यपश्‍च सावर्णिरकृतव्रणः।"},{"b":42719,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.5"],"text":"वैशम्पायन हारीतौ षड् वै पौराणिका इमे॥ ५"},{"b":42720,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.6"],"text":"अधीयन्त व्यासशिष्यात् संहितां मत्पितुर्मुखात्।"},{"b":42721,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.6"],"text":"एकैकामहमेतेषां शिष्यः सर्वाः समध्यगाम्॥ ६"},{"b":42722,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.7"],"text":"कश्यपोऽहं च सावर्णी रामशिष्योऽकृतव्रणः।"},{"b":42723,"kind":"topic_heading","page":943,"verses":["12.7.7"],"text":"अधीमहि व्यासशिष्याच्चतस्रो मूलसंहिताः॥ ७"},{"b":42724,"kind":"hindi_translation","page":943,"explains":["12.7.5","12.7.6","12.7.7"],"text":"शौनकजी! पुराणोंके छः आचार्य प्रसिद्ध हैं—त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, वैशम्पायन और हारीत॥ ५॥ इन लोगोंने मेरे पिताजीसे एक-एक पुराणसंहिता पढ़ी थी और मेरे पिताजीने स्वयं भगवान् व्याससे उन संहिताओंका अध्ययन किया था। मैंने उन छहों आचार्योंसे सभी संहिताओंका अध्ययन किया था॥ ६॥ उन छः संहिताओंके अतिरिक्त और भी चार मूल संहिताएँ थीं। उन्हें भी कश्यप, सावर्णि, परशुरामजीके शिष्य अकृतव्रण और उन सबके साथ मैंने व्यासजीके शिष्य श्रीरोमहर्षणजीसे, जो मेरे पिता थे, अध्ययन किया था॥ ७॥"},{"b":42725,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.8"],"text":"पुराणलक्षणं ब्रह्मन् ब्रह्मर्षिभिर्निरूपितम्।"},{"b":42726,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.8"],"text":"शृणुष्व बुद्धिमाश्रित्य वेदशास्त्रानुसारतः॥ ८"},{"b":42727,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.9"],"text":"सर्गोऽस्याथ विसर्गश्‍च वृत्ती रक्षान्तराणि च।"},{"b":42728,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.9"],"text":"वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः॥ ९"},{"b":42729,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.10"],"text":"दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः।"},{"b":42730,"kind":"sanskrit_shloka","page":943,"verses":["12.7.10"],"text":"केचित् पंचविधं ब्रह्मन् महदल्पव्यवस्थया॥ १०"},{"b":42731,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.11"],"text":"अव्याकृतगुणक्षोभान्महतस्त्रिवृतोऽहमः।"},{"b":42732,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.11"],"text":"भूतमात्रेन्द्रियार्थानां सम्भवः सर्ग उच्यते॥ ११"},{"b":42733,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.12"],"text":"पुरुषानुगृहीतानामेतेषां वासनामयः।"},{"b":42734,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.12"],"text":"विसर्गोऽयं समाहारो बीजाद् बीजं चराचरम्॥ १२"},{"b":42735,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.13"],"text":"वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च।"},{"b":42736,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.13"],"text":"कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्चोदनयापि वा॥ १३"},{"b":42737,"kind":"hindi_translation","page":943,"explains":["12.7.8","12.7.9","12.7.10","12.7.11","12.7.12","12.7.13"],"text":"शौनकजी! महर्षियोंने वेद और शास्त्रोंके अनुसार पुराणोंके लक्षण बतलाये हैं। अब तुम स्वस्थ होकर सावधानीसे उनका वर्णन सुनो॥ ८॥ शौनकजी! पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं—विश्‍वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय। कोई-कोई आचार्य पुराणोंके पाँच ही लक्षण मानते हैं। दोनों ही बातें ठीक हैं, क्योंकि महापुराणोंमें दस लक्षण होते हैं और छोटे पुराणोंमें पाँच। विस्तार करके दस बतलाते हैं और संक्षेप करके पाँच॥ ९-१०॥ (अब इनके लक्षण सुनो) जब मूल प्रकृतिमें लीन गुण क्षुब्ध होते हैं, तब महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे तामस, राजस और वैकारिक (सात्त्विक)—तीन प्रकारके अहंकार बनते हैं। त्रिविध अहंकारसे ही पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और विषयोंकी उत्पत्ति होती है। इसी उत्पत्तिक्रमका नाम ‘सर्ग’ है॥ ११॥ परमेश्‍वरके अनुग्रहसे सृष्टिका सामर्थ्य प्राप्त करके महत्तत्त्व आदि पूर्वकर्मोंके अनुसार अच्छी और बुरी वासनाओंकी प्रधानतासे जो यह चराचर शरीरात्मक जीवकी उपाधिकी सृष्टि करते हैं, एक बीजसे दूसरे बीजके समान, इसीको विसर्ग कहते हैं॥ १२॥ चर प्राणियोंकी अचर-पदार्थ ‘वृत्ति’ अर्थात् जीवन-निर्वाहकी सामग्री है। चर प्राणियोंके दुग्ध आदि भी इनमेंसे मनुष्योंने कुछ तो स्वभाववश कामनाके अनुसार निश्‍चित कर ली है और कुछने शास्त्रके आज्ञानुसार॥ १३॥"},{"b":42738,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.14"],"text":"रक्षाच्युतावतारेहा विश्‍वस्यानु युगे युगे।"},{"b":42739,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.14"],"text":"तिर्यङ्मर्त्यर्षिदेवेषु हन्यन्ते यैस्त्रयीद्विषः॥ १४"},{"b":42740,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.15"],"text":"मन्वन्तरं मनुर्देवा मनुपुत्राः सुरेश्‍वरः।"},{"b":42741,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.15"],"text":"ऋषयोंऽशावतारश्‍च हरेः षड्विधमुच्यते॥ १५"},{"b":42742,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.16"],"text":"राज्ञां ब्रह्मप्रसूतानां वंशस्त्रैकालिकोऽन्वयः।"},{"b":42743,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.16"],"text":"वंशानुचरितं तेषां वृत्तं वंशधराश्‍च ये॥ १६"},{"b":42744,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.17"],"text":"नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लयः।"},{"b":42745,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.17"],"text":"संस्थेति कविभिः प्रोक्ता चतुर्धास्य स्वभावतः॥ १७"},{"b":42746,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.18"],"text":"हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः।"},{"b":42747,"kind":"sanskrit_shloka","page":944,"verses":["12.7.18"],"text":"यं चानुशयिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे॥ १८"},{"b":42748,"kind":"hindi_translation","page":944,"explains":["12.7.14","12.7.15","12.7.16","12.7.17","12.7.18"],"text":"भगवान् युग-युगमें पशु-पक्षी, मनुष्य, ऋषि, देवता आदिके रूपमें अवतार ग्रहण करके अनेकों लीलाएँ करते हैं। इन्हीं अवतारोंमें वे वेदधर्मके विरोधियोंका संहार भी करते हैं। उनकी यह अवतार-लीला विश्‍वकी रक्षाके लिये ही होती है, इसीलिये उसका नाम ‘रक्षा’ है॥ १४॥ मनु, देवता, मनुपुत्र, इन्द्र, सप्तर्षि और भगवान्‌के अंशावतार—इन्हीं छः बातोंकी विशेषतासे युक्त समयको ‘मन्वन्तर’ कहते हैं॥ १५॥ ब्रह्माजीसे जितने राजाओंकी सृष्टि हुई है, उनकी भूत, भविष्य और वर्तमानकालीन सन्तान-परम्पराको ‘वंश’ कहते हैं। उन राजाओंके तथा उनके वंशधरोंके चरित्रका नाम ‘वंशानुचरित’ है॥ १६॥ इस विश्‍वब्रह्माण्डका स्वभावसे ही प्रलय हो जाता है। उसके चार भेद हैं—नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यन्तिक। तत्त्वज्ञ विद्वानोंने इन्हींको ‘संस्था’ कहा है॥ १७॥ पुराणोंके लक्षणमें ‘हेतु’ नामसे जिसका व्यवहार होता है, वह जीव ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग-विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेकों प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गया है। जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं; और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप कहते हैं॥ १८॥"},{"b":42749,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.19"],"text":"व्यतिरेकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु।"},{"b":42750,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.19"],"text":"मायामयेषु तद् ब्रह्म जीववृत्तिष्वपाश्रयः॥ १९"},{"b":42751,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.20"],"text":"पदार्थेषु यथा द्रव्यं सन्मात्रं रूपनामसु।"},{"b":42752,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.20"],"text":"बीजादिपंचतान्तासु ह्यवस्थासु युतायुतम्॥ २०"},{"b":42753,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.21"],"text":"विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम्।"},{"b":42754,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.21"],"text":"योगेन वा तदाऽऽत्मानं वेदेहाया निवर्तते॥ २१"},{"b":42755,"kind":"hindi_translation","page":945,"explains":["12.7.19","12.7.20","12.7.21"],"text":"जीवकी वृत्तियोंके तीन विभाग हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। जो इन अवस्थाओंमें इनके अभिमानी विश्‍व, तैजस और प्राज्ञके मायामय रूपोंमें प्रतीत होता है और इन अवस्थाओंसे परे तुरीयतत्त्वके रूपमें भी लक्षित होता है, वही ब्रह्म है; उसीको यहाँ ‘अपाश्रय’ शब्दसे कहा गया है॥ १९॥ नामविशेष और रूपविशेषसे युक्त पदार्थोंपर विचार करें तो वे सत्तामात्र वस्तुके रूपमें सिद्ध होते हैं। उनकी विशेषताएँ लुप्त हो जाती हैं। असलमें वह सत्ता ही उन विशेषताओंके रूपमें प्रतीत भी हो रही है और उनसे पृथक् भी है। ठीक इसी न्यायसे शरीर और विश्‍वब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे लेकर मृत्यु और महाप्रलयपर्यन्त जितनी भी विशेष अवस्थाएँ हैं, उनके रूपमें परम सत्यस्वरूप ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है और वह उनसे सर्वथा पृथक् भी है। यही वाक्य-भेदसे अधिष्ठान और साक्षीके रूपमें ब्रह्म ही पुराणोक्त आश्रयतत्त्व है॥ २०॥ जब चित्त स्वयं आत्मविचार अथवा योगाभ्यासके द्वारा सत्त्वगुण-रजोगुण-तमोगुण-सम्बन्धी व्यावहारिक वृत्तियों और जाग्रत्-स्वप्न आदि स्वाभाविक वृत्तियोंका त्याग करके उपराम हो जाता है, तब शान्तवृत्तिमें ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके द्वारा आत्मज्ञानका उदय होता है। उस समय आत्मवेत्ता पुरुष अविद्याजनित कर्म-वासना और कर्मप्रवृत्तिसे निवृत्त हो जाता है॥ २१॥"},{"b":42756,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.22"],"text":"एवंलक्षणलक्ष्याणि पुराणानि पुराविदः।"},{"b":42757,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.22"],"text":"मुनयोऽष्टादश प्राहुः क्षुल्लकानि महान्ति च॥ २२"},{"b":42758,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.23"],"text":"ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं लैंगं सगारुडम्।"},{"b":42759,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.23"],"text":"नारदीयं भागवतमा‌ग्‍नेयं स्कान्दसंज्ञितम्॥ २३"},{"b":42760,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.24"],"text":"भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं सवामनम्।"},{"b":42761,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.24"],"text":"वाराहं मात्स्यं कौर्मं च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट्॥ २४"},{"b":42762,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.25"],"text":"ब्रह्मन्‍निदं समाख्यातं शाखाप्रणयनं मुनेः।"},{"b":42763,"kind":"sanskrit_shloka","page":945,"verses":["12.7.25"],"text":"शिष्यशिष्यप्रशिष्याणां ब्रह्मतेजोविवर्धनम्॥ २५"},{"b":42764,"kind":"hindi_translation","page":945,"explains":["12.7.22","12.7.23","12.7.24","12.7.25"],"text":"शौनकादि ऋषियो! पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानोंने इन्हीं लक्षणोंके द्वारा पुराणोंकी यह पहचान बतलायी है। ऐसे लक्षणोंसे युक्त छोटे-बड़े अठारह पुराण हैं॥ २२॥ उनके नाम ये हैं —ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, गरुडपुराण, नारदपुराण, भागवतपुराण, अग्‍निपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वामनपुराण, वराहपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और ब्रह्माण्डपुराण यह अठारह हैं॥ २३-२४॥ शौनकजी! व्यासजीकी शिष्य-परम्पराने जिस प्रकार वेदसंहिता और पुराणसंहिताओंका अध्ययन-अध्यापन, विभाजन आदि किया वह मैंने तुम्हें सुना दिया। यह प्रसंग सुनने और पढ़नेवालोंके ब्रह्मतेजकी अभिवृद्धि करता है॥ २५॥"},{"b":42765,"kind":"hindi_translation","page":945,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}