{"id":"3.22","title":"तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22","part":"तृतीय स्कन्ध","heading":"अथ द्वाविंशोऽध्यायः","topics":["देवहूतिके साथ कर्दम प्रजापतिका विवाह"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[341,345]},"verses":[{"id":"3.22.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/1/","page":341,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम्।","सव्रीड इव तं सम्राडुपारतमुवाच ह॥ १"],"iast":["evamāviṣkṛtāśeṣaguṇakarmodayo munim|","savrīḍa iva taṃ samrāḍupāratamuvāca ha|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार जब कर्दमजीने मनुजीके सम्पूर्ण गुणों और कर्मोंकी श्रेष्ठताका वर्णन किया तो उन्होंने उन निवृत्तिपरायण मुनिसे कुछ सकुचाकर कहा॥ १॥"},{"id":"3.22.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/2/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया।","छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥ २"],"iast":["brahmāsṛjatsvamukhato yuṣmānātmaparīpsayā|","chandomayastapovidyāyogayuktānalampaṭān || 2"],"meaning":"मनुजीने कहा—मुने! वेदमूर्ति भगवान् ब्रह्माने अपने वेदमय विग्रहकी रक्षाके लिये तप, विद्या और योगसे सम्पन्‍न तथा विषयोंमें अनासक्त आप ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणोंवाले विराट् पुरुषने आपलोगोंकी रक्षाके लिये ही अपनी सहस्रों भुजाओंसे हम क्षत्रियोंको उत्पन्‍न किया है। इस प्रकार ब्राह्मण उनके हृदय और क्षत्रिय शरीर कहलाते हैं॥ २-३॥","meaning_covers":[2,3]},{"id":"3.22.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/3/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["तत्त्राणायासृजच्चास्मान्दोःसहस्रात्सहस्रपात् ।","हृदयं तस्य हि ब्रह्म क्षत्रमंगं प्रचक्षते॥ ३"],"iast":["tattrāṇāyāsṛjaccāsmāndoḥsahasrātsahasrapāt |","hṛdayaṃ tasya hi brahma kṣatramaṃgaṃ pracakṣate|| 3"],"meaning":"मनुजीने कहा—मुने! वेदमूर्ति भगवान् ब्रह्माने अपने वेदमय विग्रहकी रक्षाके लिये तप, विद्या और योगसे सम्पन्‍न तथा विषयोंमें अनासक्त आप ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणोंवाले विराट् पुरुषने आपलोगोंकी रक्षाके लिये ही अपनी सहस्रों भुजाओंसे हम क्षत्रियोंको उत्पन्‍न किया है। इस प्रकार ब्राह्मण उनके हृदय और क्षत्रिय शरीर कहलाते हैं॥ २-३॥","meaning_covers":[2,3]},{"id":"3.22.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/4/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["अतो ह्यन्योन्यमात्मानं ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः।","रक्षति स्माव्ययो देवः स यः सदसदात्मकः॥ ४"],"iast":["ato hyanyonyamātmānaṃ brahma kṣatraṃ ca rakṣataḥ|","rakṣati smāvyayo devaḥ sa yaḥ sadasadātmakaḥ|| 4"],"meaning":"अतः एक ही शरीरसे सम्बद्ध होनेके कारण अपनी-अपनी और एक-दूसरेकी रक्षा करनेवाले उन ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी वास्तवमें श्रीहरि ही रक्षा करते हैं जो समस्त कार्यकारणरूप होकर भी वास्तवमें निर्विकार हैं॥ ४॥"},{"id":"3.22.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/5/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["तव सन्दर्शनादेव च्छिन्‍ना मे सर्वसंशयाः।","यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः॥ ५"],"iast":["tava sandarśanādeva cchinnā me sarvasaṃśayāḥ|","yatsvayaṃ bhagavān prītyā dharmamāha rirakṣiṣoḥ|| 5"],"meaning":"आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है॥ ५॥"},{"id":"3.22.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/6/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम्।","दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम्॥ ६"],"iast":["diṣṭyā me bhagavān dṛṣṭo durdarśo yo'kṛtātmanām|","diṣṭyā pādarajaḥ spṛṣṭaṃ śīrṣṇā me bhavataḥ śivam|| 6"],"meaning":"आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका॥ ६॥"},{"id":"3.22.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/7/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["दिष्ट्या त्वयानुशिष्टोऽहं कृतश्चानुग्रहो महान्।","अपावृतैः कर्णरन्ध्रैर्जुष्टा दिष्ट्योशतीर्गिरः॥ ७"],"iast":["diṣṭyā tvayānuśiṣṭo'haṃ kṛtaścānugraho mahān|","apāvṛtaiḥ karṇarandhrairjuṣṭā diṣṭyośatīrgiraḥ|| 7"],"meaning":"मेरे भाग्योदयसे ही आपने मुझे राजधर्मोंकी शिक्षा देकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है और मैंने भी शुभ प्रारब्धका उदय होनेसे ही आपकी पवित्र वाणी कान खोलकर सुनी है॥ ७॥"},{"id":"3.22.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/8/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["स भवान्दुहितृस्नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम।","श्रोतुमर्हसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने॥ ८"],"iast":["sa bhavānduhitṛsnehaparikliṣṭātmano mama|","śrotumarhasi dīnasya śrāvitaṃ kṛpayā mune|| 8"],"meaning":"मुने! इस कन्याके स्नेहवश मेरा चित्त बहुत चिन्ताग्रस्त हो रहा है; अतः मुझ दीनकी यह प्रार्थना आप कृपापूर्वक सुनें॥ ८॥"},{"id":"3.22.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/9/","page":341,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम।","अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः॥ ९"],"iast":["priyavratottānapadoḥ svaseyaṃ duhitā mama|","anvicchati patiṃ yuktaṃ vayaḥ śīlaguṇādibhiḥ|| 9"],"meaning":"यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है॥ ९॥"},{"id":"3.22.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/10/","page":342,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान्।","अशृणोन्‍नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्‍चया॥ १०"],"iast":["yadā tu bhavataḥ śīlaśrutarūpavayoguṇān|","aśṛṇonnāradādeṣā tvayyāsītkṛtaniścayā|| 10"],"meaning":"जबसे इसने नारदजीके मुखसे आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणोंका वर्णन सुना है तभीसे यह आपको अपना पति बनानेका निश्‍चय कर चुकी है॥ १०॥"},{"id":"3.22.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/11/","page":342,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया।","सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु॥ ११"],"iast":["tatpratīccha dvijāgryemāṃ śraddhayopahṛtāṃ mayā|","sarvātmanānurūpāṃ te gṛhamedhiṣu karmasu|| 11"],"meaning":"द्विजवर! मैं बड़ी श्रद्धासे आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये। यह गृहस्थोचित कार्योंके लिये सब प्रकार आपके योग्य है॥ ११॥"},{"id":"3.22.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/12/","page":342,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते।","अपि निर्मुक्तसंगस्य कामरक्तस्य किं पुनः॥ १२"],"iast":["udyatasya hi kāmasya prativādo na śasyate|","api nirmuktasaṃgasya kāmaraktasya kiṃ punaḥ|| 12"],"meaning":"जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है॥ १२॥"},{"id":"3.22.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/13/","page":342,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते।","क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः॥ १३"],"iast":["ya udyatamanādṛtya kīnāśamabhiyācate|","kṣīyate tadyaśaḥ sphītaṃ mānaścāvajñayā hataḥ|| 13"],"meaning":"जो पुरुष स्वयं प्राप्त हुए भोगका निरादर कर फिर किसी कृपणके आगे हाथ पसारता है उसका बहुत फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है और दूसरोंके तिरस्कारसे मानभंग भी होता है॥ १३॥"},{"id":"3.22.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/14/","page":342,"speaker":"मनुरुवाच","sanskrit":["अहं त्वाशृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम्।","अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे॥ १४"],"iast":["ahaṃ tvāśṛṇavaṃ vidvan vivāhārthaṃ samudyatam|","atastvamupakurvāṇaḥ prattāṃ pratigṛhāṇa me|| 14"],"meaning":"विद्वन्! मैंने सुना है, आप विवाह करनेके लिये उद्यत हैं। आपका ब्रह्मचर्य एक सीमातक है, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो हैं नहीं। इसलिये अब आप इस कन्याको स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ॥ १४॥"},{"id":"3.22.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/15/","page":342,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा।","आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधिः॥ १५"],"iast":["bāḍhamudvoḍhukāmo'hamaprattā ca tavātmajā|","āvayoranurūpo'sāvādyo vaivāhiko vidhiḥ|| 15"],"meaning":"श्रीकर्दम मुनिने कहा—ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्याका अभी किसीके साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिये हम दोनोंका सर्वश्रेष्ठ ब्राह्म विधिसे विवाह होना उचित ही होगा॥ १५॥"},{"id":"3.22.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/16/","page":342,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["कामः स भूयान्‍नरदेव तेऽस्याः","पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः।","क एव ते तनयां नाद्रियेत","स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम्॥ १६"],"iast":["kāmaḥ sa bhūyānnaradeva te'syāḥ","putryāḥ samāmnāyavidhau pratītaḥ|","ka eva te tanayāṃ nādriyeta","svayaiva kāntyā kṣipatīmiva śriyam|| 16"],"meaning":"राजन्! वेदोक्त विवाह-विधिमें प्रसिद्ध जो ‘गृभ्णामि ते’ इत्यादि मन्त्रोंमें बताया हुआ काम (संतानोत्पादनरूप मनोरथ) है, वह आपकी इस कन्याके साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे सफल होगा। भला, जो अपनी अंगकान्तिसे आभूषणादिकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्याका कौन आदर न करेगा?॥ १६॥"},{"id":"3.22.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/17/","page":342,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["यां हर्म्यपृष्ठे क्‍वणदङ्‌घ्रिशोभां","विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम्।","विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना-","द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः॥ १७"],"iast":["yāṃ harmyapṛṣṭhe kvaṇadaṅghriśobhāṃ","vikrīḍatīṃ kandukavihvalākṣīm|","viśvāvasurnyapatatsvādvimānā-","dvilokya sammohavimūḍhacetāḥ|| 17"],"meaning":"एक बार यह अपने महलकी छतपर गेंद खेल रही थी। गेंदके पीछे इधर-उधर दौड़नेके कारण इसके नेत्र चंचल हो रहे थे तथा पैरोंके पायजेब मधुर झनकार करते जाते थे। उस समय इसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अचेत होकर अपने विमानसे गिर पड़ा था॥ १७॥"},{"id":"3.22.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/18/","page":343,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम-","मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् ।","वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं","को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम्॥ १८"],"iast":["tāṃ prārthayantīṃ lalanālalāma-","masevitaśrīcaraṇairadṛṣṭām |","vatsāṃ manoruccapadaḥ svasāraṃ","ko nānumanyeta budho'bhiyātām|| 18"],"meaning":"वही इस समय यहाँ स्वयं आकर प्रार्थना कर रही है; ऐसी अवस्थामें कौन समझदार पुरुष इसे स्वीकार न करेगा? यह तो साक्षात् आप महाराज श्रीस्वायम्भुवमनुकी दुलारी कन्या और उत्तानपादकी प्यारी बहिन है; तथा यह रमणियोंमें रत्नके समान है। जिन लोगोंने कभी श्रीलक्ष्मीजीके चरणोंकी उपासना नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता॥ १८॥"},{"id":"3.22.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/19/","page":343,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं","यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे।","अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान्","शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान्॥ १९"],"iast":["ato bhajiṣye samayena sādhvīṃ","yāvattejo bibhṛyādātmano me|","ato dharmān pāramahaṃsyamukhyān","śuklaproktān bahu manye'vihiṃsrān|| 19"],"meaning":"अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्याको अवश्य स्वीकार करूँगा, किन्तु एक शर्तके साथ। जबतक इसके संतान न हो जायगी, तबतक मैं गृहस्थ-धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। उसके बाद भगवान्‌के बताये हुए संन्यासप्रधान हिंसारहित शम-दमादि धर्मोंको ही अधिक महत्त्व दूँगा॥ १९॥"},{"id":"3.22.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/20/","page":343,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["यतोऽभवद्विश्‍वमिदं विचित्रं","संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते।","प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं","परं प्रमाणं भगवाननन्तः॥ २०"],"iast":["yato'bhavadviśvamidaṃ vicitraṃ","saṃsthāsyate yatra ca vāvatiṣṭhate|","prajāpatīnāṃ patireṣa mahyaṃ","paraṃ pramāṇaṃ bhagavānanantaḥ|| 20"],"meaning":"जिनसे इस विचित्र जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जिनमें यह लीन हो जाता है और जिनके आश्रयसे यह स्थित है—मुझे तो वे प्रजापतियोंके भी पति भगवान् श्रीअनन्त ही सबसे अधिक मान्य हैं॥ २०॥"},{"id":"3.22.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/21/","page":343,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स उग्रधन्वन्‍नियदेवाबभाषे","आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम्।","धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन","मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्याः॥ २१"],"iast":["sa ugradhanvanniyadevābabhāṣe","āsīcca tūṣṇīmaravindanābham|","dhiyopagṛhṇan smitaśobhitena","mukhena ceto lulubhe devahūtyāḥ|| 21"],"meaning":"मैत्रेयजी कहते हैं—प्रचण्ड धनुर्धर विदुर! कर्दमजी केवल इतना ही कह सके, फिर वे हृदयमें भगवान् कमलनाभका ध्यान करते हुए मौन हो गये। उस समय उनके मन्द हास्ययुक्त मुखकमलको देखकर देवहूतिका चित्त लुभा गया॥ २१॥"},{"id":"3.22.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/22/","page":343,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सोऽनु ज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम्।","तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षितः॥ २२"],"iast":["so'nu jñātvā vyavasitaṃ mahiṣyā duhituḥ sphuṭam|","tasmai guṇagaṇāḍhyāya dadau tulyāṃ praharṣitaḥ|| 22"],"meaning":"मनुजीने देखा कि इस सम्बन्धमें महारानी शतरूपा और राजकुमारीकी स्पष्ट अनुमति है, अतः उन्होंने अनेक गुणोंसे सम्पन्‍न कर्दमजीको उन्हींके समान गुणवती कन्याका प्रसन्‍नतापूर्वक दान कर दिया॥ २२॥"},{"id":"3.22.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/23/","page":343,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हान्महाधनान्।","दम्पत्योः पर्यदात्प्रीत्या भूषावासः परिच्छदान्॥ २३"],"iast":["śatarūpā mahārājñī pāribarhānmahādhanān|","dampatyoḥ paryadātprītyā bhūṣāvāsaḥ paricchadān|| 23"],"meaning":"महारानी शतरूपाने भी बेटी और दामादको बड़े प्रेमपूर्वक बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेजमें दिये॥ २३॥"},{"id":"3.22.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/24/","page":343,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथः।","उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशयः॥ २४"],"iast":["prattāṃ duhitaraṃ samrāṭ sadṛkṣāya gatavyathaḥ|","upaguhya ca bāhubhyāmautkaṇṭhyonmathitāśayaḥ|| 24"],"meaning":"इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"3.22.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/25/","page":343,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अशक्नुवंस्तद्विरहं मुंचन् बाष्पकलां मुहुः।","आसिंचदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः॥ २५"],"iast":["aśaknuvaṃstadvirahaṃ muṃcan bāṣpakalāṃ muhuḥ|","āsiṃcadamba vatseti netrodairduhituḥ śikhāḥ|| 25"],"meaning":"इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥","meaning_covers":[24,25]},{"id":"3.22.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/26/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["आमन्त्र्य तं मुनिवरमनुज्ञातः सहानुगः।","प्रतस्थे रथमारुह्य सभार्यः स्वपुरं नृपः॥ २६"],"iast":["āmantrya taṃ munivaramanujñātaḥ sahānugaḥ|","pratasthe rathamāruhya sabhāryaḥ svapuraṃ nṛpaḥ|| 26"],"meaning":"फिर वे मुनिवर कर्दमसे पूछकर, उनकी आज्ञा ले रानीके सहित रथपर सवार हुए और अपने सेवकोंसहित ऋषिकुलसेवित सरस्वती नदीके दोनों तीरोंपर मुनियोंके आश्रमोंकी शोभा देखते हुए अपनी राजधानीमें चले आये॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"3.22.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/27/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["उभयोर्ऋषिकुल्यायाः सरस्वत्याः सुरोधसोः।","ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्‍नाश्रमसम्पदः॥ २७"],"iast":["ubhayor:ṛṣikulyāyāḥ sarasvatyāḥ surodhasoḥ|","ṛṣīṇāmupaśāntānāṃ paśyannāśramasampadaḥ|| 27"],"meaning":"फिर वे मुनिवर कर्दमसे पूछकर, उनकी आज्ञा ले रानीके सहित रथपर सवार हुए और अपने सेवकोंसहित ऋषिकुलसेवित सरस्वती नदीके दोनों तीरोंपर मुनियोंके आश्रमोंकी शोभा देखते हुए अपनी राजधानीमें चले आये॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"3.22.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/28/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजाः पतिम्।","गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयुः प्रहर्षिताः॥ २८"],"iast":["tamāyāntamabhipretya brahmāvartātprajāḥ patim|","gītasaṃstutivāditraiḥ pratyudīyuḥ praharṣitāḥ|| 28"],"meaning":"जब ब्रह्मावर्तकी प्रजाको यह समाचार मिला कि उसके स्वामी आ रहे हैं तब वह अत्यन्त आनन्दित होकर स्तुति, गीत एवं बाजे-गाजेके साथ अगवानी करनेके लिये ब्रह्मावर्तकी राजधानीसे बाहर आयी॥ २८॥"},{"id":"3.22.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/29/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता।","न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्यांगं विधुन्वतः॥ २९"],"iast":["barhiṣmatī nāma purī sarvasampatsamanvitā|","nyapatan yatra romāṇi yajñasyāṃgaṃ vidhunvataḥ|| 29"],"meaning":"सब प्रकारकी सम्पदाओंसे युक्त बर्हिष्मती नगरी मनुजीकी राजधानी थी, जहाँ पृथ्वीको रसातलसे ले आनेके पश्चात् शरीर कँपाते समय श्रीवराहभगवान्‌के रोम झड़कर गिरे थे॥ २९॥"},{"id":"3.22.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/30/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["कुशाः काशास्त एवासन् शश्‍वद्धरितवर्चसः।","ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे॥ ३०"],"iast":["kuśāḥ kāśāsta evāsan śaśvaddharitavarcasaḥ|","ṛṣayo yaiḥ parābhāvya yajñaghnān yajñamījire|| 30"],"meaning":"वे रोम ही निरन्तर हरे-भरे रहनेवाले कुश और कास हुए, जिनके द्वारा मुनियोंने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंका तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुषकी यज्ञोंद्वारा आराधना की है॥ ३०॥"},{"id":"3.22.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/31/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनुः।","अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम्॥ ३१"],"iast":["kuśakāśamayaṃ barhirāstīrya bhagavānmanuḥ|","ayajadyajñapuruṣaṃ labdhā sthānaṃ yato bhuvam|| 31"],"meaning":"महाराज मनुने भी श्रीवराहभगवान्‌से भूमिरूप निवासस्थान प्राप्त होनेपर इसी स्थानमें कुश और कासकी बर्हि (चटाई) बिछाकर श्रीयज्ञभगवान्‌की पूजा की थी॥ ३१॥"},{"id":"3.22.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/32/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत्।","तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम्॥ ३२"],"iast":["barhiṣmatīṃ nāma vibhuryāṃ nirviśya samāvasat|","tasyāṃ praviṣṭo bhavanaṃ tāpatrayavināśanam|| 32"],"meaning":"जिस बर्हिष्मती पुरीमें मनुजी निवास करते थे, उसमें पहुँचकर उन्होंने अपने त्रितापनाशक भवनमें प्रवेश किया॥ ३२॥"},{"id":"3.22.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/33/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः।","संगीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः।","प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा शृण्वन् हरेः कथाः॥ ३३"],"iast":["sabhāryaḥ saprajaḥ kāmān bubhuje'nyāvirodhataḥ|","saṃgīyamānasatkīrtiḥ sastrībhiḥ suragāyakaiḥ|","pratyūṣeṣvanubaddhena hṛdā śṛṇvan hareḥ kathāḥ|| 33"],"meaning":"वहाँ अपनी भार्या और सन्ततिके सहित वे धर्म, अर्थ और मोक्षके अनुकूल भोगोंको भोगने लगे। प्रातःकाल होनेपर गन्धर्वगण अपनी स्त्रियोंके सहित उनका गुणगान करते थे; किन्तु मनुजी उसमें आसक्त न होकर प्रेमपूर्ण हृदयसे श्रीहरिकी कथाएँ ही सुना करते थे॥ ३३॥"},{"id":"3.22.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/34/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम्।","यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम्॥ ३४"],"iast":["niṣṇātaṃ yogamāyāsu muniṃ svāyambhuvaṃ manum|","yadā bhraṃśayituṃ bhogā na śekurbhagavatparam|| 34"],"meaning":"वे इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे॥ ३४॥"},{"id":"3.22.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/35/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः।","शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः॥ ३५"],"iast":["ayātayāmāstasyāsan yāmāḥ svāntarayāpanāḥ|","śṛṇvato dhyāyato viṣṇoḥ kurvato bruvataḥ kathāḥ|| 35"],"meaning":"भगवान् विष्णुकी कथाओंका श्रवण, ध्यान, रचना और निरूपण करते रहनेके कारण उनके मन्वन्तरको व्यतीत करनेवाले क्षण कभी व्यर्थ नहीं जाते थे॥ ३५॥"},{"id":"3.22.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/36/","page":344,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम्।","वासुदेवप्रसंगेन परिभूतगतित्रयः॥ ३६"],"iast":["sa evaṃ svāntaraṃ ninye yugānāmekasaptatim|","vāsudevaprasaṃgena paribhūtagatitrayaḥ|| 36"],"meaning":"इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये॥ ३६॥"},{"id":"3.22.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/37/","page":345,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः।","भौतिकाश्‍च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम्॥ ३७"],"iast":["śārīrā mānasā divyā vaiyāse ye ca mānuṣāḥ|","bhautikāśca kathaṃ kleśā bādhante harisaṃśrayam|| 37"],"meaning":"व्यासनन्दन विदुरजी! जो पुरुष श्रीहरिके आश्रित रहता है उसे शारीरिक, मानसिक, दैविक, मानुषिक अथवा भौतिक दुःख किस प्रकार कष्ट पहुँचा सकते हैं॥ ३७॥"},{"id":"3.22.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/38/","page":345,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्‍नानाविधाञ्छुभान्।","नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा॥ ३८"],"iast":["yaḥ pṛṣṭo munibhiḥ prāha dharmānnānāvidhāñchubhān|","nṛṇāṃ varṇāśramāṇāṃ ca sarvabhūtahitaḥ sadā|| 38"],"meaning":"मनुजी निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे। मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया (जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है)॥ ३८॥"},{"id":"3.22.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/39/","page":345,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एतत्त आदिराजस्य मनोश्‍चरितमद्भुतम्।","वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं शृणु॥ ३९"],"iast":["etatta ādirājasya manoścaritamadbhutam|","varṇitaṃ varṇanīyasya tadapatyodayaṃ śṛṇu|| 39"],"meaning":"जगत‍्के सर्वप्रथम सम्राट् महाराज मनु वास्तवमें कीर्तनके योग्य थे। यह मैंने उनके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया, अब उनकी कन्या देवहूतिका प्रभाव सुनो॥ ३९॥"}],"text":[{"b":8150,"kind":"adhyaya_heading","page":341,"text":"अथ द्वाविंशोऽध्यायः"},{"b":8151,"kind":"topic_heading","page":341,"text":"देवहूतिके साथ कर्दम प्रजापतिका विवाह"},{"b":8152,"kind":"topic_heading","page":341,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":8153,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.1"],"text":"एवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम्।"},{"b":8154,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.1"],"text":"सव्रीड इव तं सम्राडुपारतमुवाच ह॥ १"},{"b":8155,"kind":"hindi_commentary","page":341,"explains":["3.22.1"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार जब कर्दमजीने मनुजीके सम्पूर्ण गुणों और कर्मोंकी श्रेष्ठताका वर्णन किया तो उन्होंने उन निवृत्तिपरायण मुनिसे कुछ सकुचाकर कहा॥ १॥"},{"b":8156,"kind":"topic_heading","page":341,"text":"मनुरुवाच"},{"b":8157,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.2"],"text":"ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया।"},{"b":8158,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.2"],"text":"छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥ २"},{"b":8159,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.3"],"text":"तत्त्राणायासृजच्चास्मान्दोःसहस्रात्सहस्रपात् ।"},{"b":8160,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.3"],"text":"हृदयं तस्य हि ब्रह्म क्षत्रमंगं प्रचक्षते॥ ३"},{"b":8161,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.4"],"text":"अतो ह्यन्योन्यमात्मानं ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः।"},{"b":8162,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.4"],"text":"रक्षति स्माव्ययो देवः स यः सदसदात्मकः॥ ४"},{"b":8163,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.5"],"text":"तव सन्दर्शनादेव च्छिन्‍ना मे सर्वसंशयाः।"},{"b":8164,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.5"],"text":"यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः॥ ५"},{"b":8165,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.6"],"text":"दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम्।"},{"b":8166,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.6"],"text":"दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम्॥ ६"},{"b":8167,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.7"],"text":"दिष्ट्या त्वयानुशिष्टोऽहं कृतश्चानुग्रहो महान्।"},{"b":8168,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.7"],"text":"अपावृतैः कर्णरन्ध्रैर्जुष्टा दिष्ट्योशतीर्गिरः॥ ७"},{"b":8169,"kind":"hindi_commentary","page":341,"explains":["3.22.2","3.22.3","3.22.4","3.22.5","3.22.6","3.22.7"],"text":"मनुजीने कहा—मुने! वेदमूर्ति भगवान् ब्रह्माने अपने वेदमय विग्रहकी रक्षाके लिये तप, विद्या और योगसे सम्पन्‍न तथा विषयोंमें अनासक्त आप ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणोंवाले विराट् पुरुषने आपलोगोंकी रक्षाके लिये ही अपनी सहस्रों भुजाओंसे हम क्षत्रियोंको उत्पन्‍न किया है। इस प्रकार ब्राह्मण उनके हृदय और क्षत्रिय शरीर कहलाते हैं॥ २-३॥ अतः एक ही शरीरसे सम्बद्ध होनेके कारण अपनी-अपनी और एक-दूसरेकी रक्षा करनेवाले उन ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी वास्तवमें श्रीहरि ही रक्षा करते हैं जो समस्त कार्यकारणरूप होकर भी वास्तवमें निर्विकार हैं॥ ४॥ आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है॥ ५॥ आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका॥ ६॥ मेरे भाग्योदयसे ही आपने मुझे राजधर्मोंकी शिक्षा देकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है और मैंने भी शुभ प्रारब्धका उदय होनेसे ही आपकी पवित्र वाणी कान खोलकर सुनी है॥ ७॥"},{"b":8170,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.8"],"text":"स भवान्दुहितृस्नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम।"},{"b":8171,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.8"],"text":"श्रोतुमर्हसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने॥ ८"},{"b":8172,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.9"],"text":"प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम।"},{"b":8173,"kind":"sanskrit_shloka","page":341,"verses":["3.22.9"],"text":"अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः॥ ९"},{"b":8174,"kind":"hindi_commentary","page":341,"explains":["3.22.8","3.22.9"],"text":"मुने! इस कन्याके स्नेहवश मेरा चित्त बहुत चिन्ताग्रस्त हो रहा है; अतः मुझ दीनकी यह प्रार्थना आप कृपापूर्वक सुनें॥ ८॥ यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है॥ ९॥"},{"b":8175,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.10"],"text":"यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान्।"},{"b":8176,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.10"],"text":"अशृणोन्‍नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्‍चया॥ १०"},{"b":8177,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.11"],"text":"तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया।"},{"b":8178,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.11"],"text":"सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु॥ ११"},{"b":8179,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.12"],"text":"उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते।"},{"b":8180,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.12"],"text":"अपि निर्मुक्तसंगस्य कामरक्तस्य किं पुनः॥ १२"},{"b":8181,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.13"],"text":"य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते।"},{"b":8182,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.13"],"text":"क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः॥ १३"},{"b":8183,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.14"],"text":"अहं त्वाशृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम्।"},{"b":8184,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.14"],"text":"अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे॥ १४"},{"b":8185,"kind":"hindi_commentary","page":342,"explains":["3.22.10","3.22.11","3.22.12","3.22.13","3.22.14"],"text":"जबसे इसने नारदजीके मुखसे आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणोंका वर्णन सुना है तभीसे यह आपको अपना पति बनानेका निश्‍चय कर चुकी है॥ १०॥ द्विजवर! मैं बड़ी श्रद्धासे आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये। यह गृहस्थोचित कार्योंके लिये सब प्रकार आपके योग्य है॥ ११॥ जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है॥ १२॥ जो पुरुष स्वयं प्राप्त हुए भोगका निरादर कर फिर किसी कृपणके आगे हाथ पसारता है उसका बहुत फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है और दूसरोंके तिरस्कारसे मानभंग भी होता है॥ १३॥ विद्वन्! मैंने सुना है, आप विवाह करनेके लिये उद्यत हैं। आपका ब्रह्मचर्य एक सीमातक है, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो हैं नहीं। इसलिये अब आप इस कन्याको स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ॥ १४॥"},{"b":8186,"kind":"hindi_commentary","page":342,"text":"ऋषिरुवाच"},{"b":8187,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.15"],"text":"बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा।"},{"b":8188,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.15"],"text":"आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधिः॥ १५"},{"b":8189,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.16"],"text":"कामः स भूयान्‍नरदेव तेऽस्याः"},{"b":8190,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.16"],"text":"पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः।"},{"b":8191,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.16"],"text":"क एव ते तनयां नाद्रियेत"},{"b":8192,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.16"],"text":"स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम्॥ १६"},{"b":8193,"kind":"hindi_commentary","page":342,"explains":["3.22.15","3.22.16"],"text":"श्रीकर्दम मुनिने कहा—ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्याका अभी किसीके साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिये हम दोनोंका सर्वश्रेष्ठ ब्राह्म विधिसे विवाह होना उचित ही होगा॥ १५॥ राजन्! वेदोक्त विवाह-विधिमें प्रसिद्ध जो ‘गृभ्णामि ते’ इत्यादि मन्त्रोंमें बताया हुआ काम (संतानोत्पादनरूप मनोरथ) है, वह आपकी इस कन्याके साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे सफल होगा। भला, जो अपनी अंगकान्तिसे आभूषणादिकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्याका कौन आदर न करेगा?॥ १६॥"},{"b":8194,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.17"],"text":"यां हर्म्यपृष्ठे क्‍वणदङ्‌घ्रिशोभां"},{"b":8195,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.17"],"text":"विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम्।"},{"b":8196,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.17"],"text":"विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना-"},{"b":8197,"kind":"sanskrit_shloka","page":342,"verses":["3.22.17"],"text":"द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः॥ १७"},{"b":8198,"kind":"hindi_commentary","page":342,"explains":["3.22.17"],"text":"एक बार यह अपने महलकी छतपर गेंद खेल रही थी। गेंदके पीछे इधर-उधर दौड़नेके कारण इसके नेत्र चंचल हो रहे थे तथा पैरोंके पायजेब मधुर झनकार करते जाते थे। उस समय इसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अचेत होकर अपने विमानसे गिर पड़ा था॥ १७॥"},{"b":8199,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.18"],"text":"तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम-"},{"b":8200,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.18"],"text":"मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् ।"},{"b":8201,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.18"],"text":"वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं"},{"b":8202,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.18"],"text":"को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम्॥ १८"},{"b":8203,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.19"],"text":"अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं"},{"b":8204,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.19"],"text":"यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे।"},{"b":8205,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.19"],"text":"अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान्"},{"b":8206,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.19"],"text":"शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान्॥ १९"},{"b":8207,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.20"],"text":"यतोऽभवद्विश्‍वमिदं विचित्रं"},{"b":8208,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.20"],"text":"संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते।"},{"b":8209,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.20"],"text":"प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं"},{"b":8210,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.20"],"text":"परं प्रमाणं भगवाननन्तः॥ २०"},{"b":8211,"kind":"hindi_commentary","page":343,"explains":["3.22.18","3.22.19","3.22.20"],"text":"वही इस समय यहाँ स्वयं आकर प्रार्थना कर रही है; ऐसी अवस्थामें कौन समझदार पुरुष इसे स्वीकार न करेगा? यह तो साक्षात् आप महाराज श्रीस्वायम्भुवमनुकी दुलारी कन्या और उत्तानपादकी प्यारी बहिन है; तथा यह रमणियोंमें रत्नके समान है। जिन लोगोंने कभी श्रीलक्ष्मीजीके चरणोंकी उपासना नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता॥ १८॥ अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्याको अवश्य स्वीकार करूँगा, किन्तु एक शर्तके साथ। जबतक इसके संतान न हो जायगी, तबतक मैं गृहस्थ-धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। उसके बाद भगवान्‌के बताये हुए संन्यासप्रधान हिंसारहित शम-दमादि धर्मोंको ही अधिक महत्त्व दूँगा॥ १९॥ जिनसे इस विचित्र जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जिनमें यह लीन हो जाता है और जिनके आश्रयसे यह स्थित है—मुझे तो वे प्रजापतियोंके भी पति भगवान् श्रीअनन्त ही सबसे अधिक मान्य हैं॥ २०॥"},{"b":8212,"kind":"topic_heading","page":343,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":8213,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.21"],"text":"स उग्रधन्वन्‍नियदेवाबभाषे"},{"b":8214,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.21"],"text":"आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम्।"},{"b":8215,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.21"],"text":"धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन"},{"b":8216,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.21"],"text":"मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्याः॥ २१"},{"b":8217,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.22"],"text":"सोऽनु ज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम्।"},{"b":8218,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.22"],"text":"तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षितः॥ २२"},{"b":8219,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.23"],"text":"शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हान्महाधनान्।"},{"b":8220,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.23"],"text":"दम्पत्योः पर्यदात्प्रीत्या भूषावासः परिच्छदान्॥ २३"},{"b":8221,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.24"],"text":"प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथः।"},{"b":8222,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.24"],"text":"उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशयः॥ २४"},{"b":8223,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.25"],"text":"अशक्नुवंस्तद्विरहं मुंचन् बाष्पकलां मुहुः।"},{"b":8224,"kind":"sanskrit_shloka","page":343,"verses":["3.22.25"],"text":"आसिंचदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः॥ २५"},{"b":8225,"kind":"hindi_commentary","page":343,"explains":["3.22.21","3.22.22","3.22.23","3.22.24","3.22.25"],"text":"मैत्रेयजी कहते हैं—प्रचण्ड धनुर्धर विदुर! कर्दमजी केवल इतना ही कह सके, फिर वे हृदयमें भगवान् कमलनाभका ध्यान करते हुए मौन हो गये। उस समय उनके मन्द हास्ययुक्त मुखकमलको देखकर देवहूतिका चित्त लुभा गया॥ २१॥ मनुजीने देखा कि इस सम्बन्धमें महारानी शतरूपा और राजकुमारीकी स्पष्ट अनुमति है, अतः उन्होंने अनेक गुणोंसे सम्पन्‍न कर्दमजीको उन्हींके समान गुणवती कन्याका प्रसन्‍नतापूर्वक दान कर दिया॥ २२॥ महारानी शतरूपाने भी बेटी और दामादको बड़े प्रेमपूर्वक बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेजमें दिये॥ २३॥ इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥"},{"b":8226,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.26"],"text":"आमन्त्र्य तं मुनिवरमनुज्ञातः सहानुगः।"},{"b":8227,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.26"],"text":"प्रतस्थे रथमारुह्य सभार्यः स्वपुरं नृपः॥ २६"},{"b":8228,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.27"],"text":"उभयोर्ऋषिकुल्यायाः सरस्वत्याः सुरोधसोः।"},{"b":8229,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.27"],"text":"ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्‍नाश्रमसम्पदः॥ २७"},{"b":8230,"kind":"hindi_commentary","page":344,"explains":["3.22.26","3.22.27"],"text":"फिर वे मुनिवर कर्दमसे पूछकर, उनकी आज्ञा ले रानीके सहित रथपर सवार हुए और अपने सेवकोंसहित ऋषिकुलसेवित सरस्वती नदीके दोनों तीरोंपर मुनियोंके आश्रमोंकी शोभा देखते हुए अपनी राजधानीमें चले आये॥ २६-२७॥"},{"b":8231,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.28"],"text":"तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजाः पतिम्।"},{"b":8232,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.28"],"text":"गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयुः प्रहर्षिताः॥ २८"},{"b":8233,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.29"],"text":"बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता।"},{"b":8234,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.29"],"text":"न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्यांगं विधुन्वतः॥ २९"},{"b":8235,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.30"],"text":"कुशाः काशास्त एवासन् शश्‍वद्धरितवर्चसः।"},{"b":8236,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.30"],"text":"ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे॥ ३०"},{"b":8237,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.31"],"text":"कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनुः।"},{"b":8238,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.31"],"text":"अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम्॥ ३१"},{"b":8239,"kind":"hindi_commentary","page":344,"explains":["3.22.28","3.22.29","3.22.30","3.22.31"],"text":"जब ब्रह्मावर्तकी प्रजाको यह समाचार मिला कि उसके स्वामी आ रहे हैं तब वह अत्यन्त आनन्दित होकर स्तुति, गीत एवं बाजे-गाजेके साथ अगवानी करनेके लिये ब्रह्मावर्तकी राजधानीसे बाहर आयी॥ २८॥ सब प्रकारकी सम्पदाओंसे युक्त बर्हिष्मती नगरी मनुजीकी राजधानी थी, जहाँ पृथ्वीको रसातलसे ले आनेके पश्चात् शरीर कँपाते समय श्रीवराहभगवान्‌के रोम झड़कर गिरे थे॥ २९॥ वे रोम ही निरन्तर हरे-भरे रहनेवाले कुश और कास हुए, जिनके द्वारा मुनियोंने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंका तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुषकी यज्ञोंद्वारा आराधना की है॥ ३०॥ महाराज मनुने भी श्रीवराहभगवान्‌से भूमिरूप निवासस्थान प्राप्त होनेपर इसी स्थानमें कुश और कासकी बर्हि (चटाई) बिछाकर श्रीयज्ञभगवान्‌की पूजा की थी॥ ३१॥"},{"b":8240,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.32"],"text":"बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत्।"},{"b":8241,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.32"],"text":"तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम्॥ ३२"},{"b":8242,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.33"],"text":"सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः।"},{"b":8243,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.33"],"text":"संगीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः।"},{"b":8244,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.33"],"text":"प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा शृण्वन् हरेः कथाः॥ ३३"},{"b":8245,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.34"],"text":"निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम्।"},{"b":8246,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.34"],"text":"यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम्॥ ३४"},{"b":8247,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.35"],"text":"अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः।"},{"b":8248,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.35"],"text":"शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः॥ ३५"},{"b":8249,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.36"],"text":"स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम्।"},{"b":8250,"kind":"sanskrit_shloka","page":344,"verses":["3.22.36"],"text":"वासुदेवप्रसंगेन परिभूतगतित्रयः॥ ३६"},{"b":8251,"kind":"hindi_commentary","page":344,"explains":["3.22.32","3.22.33","3.22.34","3.22.35","3.22.36"],"text":"जिस बर्हिष्मती पुरीमें मनुजी निवास करते थे, उसमें पहुँचकर उन्होंने अपने त्रितापनाशक भवनमें प्रवेश किया॥ ३२॥ वहाँ अपनी भार्या और सन्ततिके सहित वे धर्म, अर्थ और मोक्षके अनुकूल भोगोंको भोगने लगे। प्रातःकाल होनेपर गन्धर्वगण अपनी स्त्रियोंके सहित उनका गुणगान करते थे; किन्तु मनुजी उसमें आसक्त न होकर प्रेमपूर्ण हृदयसे श्रीहरिकी कथाएँ ही सुना करते थे॥ ३३॥ वे इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे॥ ३४॥ भगवान् विष्णुकी कथाओंका श्रवण, ध्यान, रचना और निरूपण करते रहनेके कारण उनके मन्वन्तरको व्यतीत करनेवाले क्षण कभी व्यर्थ नहीं जाते थे॥ ३५॥ इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये॥ ३६॥"},{"b":8252,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.37"],"text":"शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः।"},{"b":8253,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.37"],"text":"भौतिकाश्‍च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम्॥ ३७"},{"b":8254,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.38"],"text":"यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्‍नानाविधाञ्छुभान्।"},{"b":8255,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.38"],"text":"नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा॥ ३८"},{"b":8256,"kind":"hindi_commentary","page":345,"explains":["3.22.37","3.22.38"],"text":"व्यासनन्दन विदुरजी! जो पुरुष श्रीहरिके आश्रित रहता है उसे शारीरिक, मानसिक, दैविक, मानुषिक अथवा भौतिक दुःख किस प्रकार कष्ट पहुँचा सकते हैं॥ ३७॥ मनुजी निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे। मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया (जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है)॥ ३८॥"},{"b":8257,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.39"],"text":"एतत्त आदिराजस्य मनोश्‍चरितमद्भुतम्।"},{"b":8258,"kind":"sanskrit_shloka","page":345,"verses":["3.22.39"],"text":"वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं शृणु॥ ३९"},{"b":8259,"kind":"hindi_commentary","page":345,"explains":["3.22.39"],"text":"जगत‍्के सर्वप्रथम सम्राट् महाराज मनु वास्तवमें कीर्तनके योग्य थे। यह मैंने उनके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया, अब उनकी कन्या देवहूतिका प्रभाव सुनो॥ ३९॥"},{"b":8260,"kind":"hindi_translation","page":345,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥"}],"notes":[{"id":"v1:380","mark":"१","page":341,"after_verse":"3.22.3","text":"प्रा० पा०—ब्रह्मन्‍नुत्तमांगं प्र०।"},{"id":"v1:381","mark":"*","page":342,"after_verse":"3.22.16","text":"मनुस्मृतिमें आठ प्रकारके विवाहोंका उल्लेख पाया जाता है—(१) ब्राह्म, (२) दैव, (३) आर्ष, (४) प्राजापत्य, (५) आसुर, (६) गान्धर्व, (७) राक्षस और (८) पैशाच। इनके लक्षण वहीं तीसरे अध्यायमें देखने चाहिये। इनमें पहला सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसमें पिता योग्य वरको कन्याका दान करता है।"},{"id":"v1:382","mark":"१","page":343,"after_verse":"3.22.19","text":"प्रा० पा०—वरिष्ये।"},{"id":"v1:383","mark":"२","page":343,"after_verse":"3.22.21","text":"प्रा पा—धन्वन्‍नृप आबभा।"},{"id":"v1:384","mark":"३","page":343,"after_verse":"3.22.23","text":"प्रा० पा०—पारिहार्यं महाधनम्।"},{"id":"v1:385","mark":"४","page":343,"after_verse":"3.22.24","text":"प्रा० पा०—पिता।"},{"id":"v1:386","mark":"५","page":343,"after_verse":"3.22.25","text":"प्रा० पा०—आसिंचन्‍निव चात्मेति 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