{"id":"3.29","title":"तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29","part":"तृतीय स्कन्ध","heading":"अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः","topics":["भक्तिका मर्म और कालकी महिमा"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[380,384]},"verses":[{"id":"3.29.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/1/","page":380,"speaker":"देवहूतिरुवाच","sanskrit":["लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च।","स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम्॥ १"],"iast":["lakṣaṇaṃ mahadādīnāṃ prakṛteḥ puruṣasya ca|","svarūpaṃ lakṣyate'mīṣāṃ yena tatpāramārthikam|| 1"],"meaning":"देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"3.29.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/2/","page":380,"speaker":"देवहूतिरुवाच","sanskrit":["यथा सांख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते।","भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो॥ २"],"iast":["yathā sāṃkhyeṣu kathitaṃ yanmūlaṃ tatpracakṣate|","bhaktiyogasya me mārgaṃ brūhi vistaraśaḥ prabho|| 2"],"meaning":"देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"3.29.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/3/","page":380,"speaker":"देवहूतिरुवाच","sanskrit":["विरागो येन पुरुषो भगवन् सर्वतो भवेत्।","आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृतीः॥ ३"],"iast":["virāgo yena puruṣo bhagavan sarvato bhavet|","ācakṣva jīvalokasya vividhā mama saṃsṛtīḥ|| 3"],"meaning":"इसके सिवा जीवोंकी जन्म-मरणरूपा अनेक प्रकारकी गतियोंका भी वर्णन कीजिये; जिनके सुननेसे जीवको सब प्रकारकी वस्तुओंसे वैराग्य होता है॥ ३॥"},{"id":"3.29.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/4/","page":380,"speaker":"देवहूतिरुवाच","sanskrit":["कालस्येश्‍वररूपस्य परेषां च परस्य ते।","स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः॥ ४"],"iast":["kālasyeśvararūpasya pareṣāṃ ca parasya te|","svarūpaṃ bata kurvanti yaddhetoḥ kuśalaṃ janāḥ|| 4"],"meaning":"जिसके भयसे लोग शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं और जो ब्रह्मादिका भी शासन करनेवाला है, उस सर्वसमर्थ कालका स्वरूप भी आप मुझसे कहिये॥ ४॥"},{"id":"3.29.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/5/","page":380,"speaker":"देवहूतिरुवाच","sanskrit":["लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष-","श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये।","श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया","त्वमाविरासीः किल योगभास्करः॥ ५"],"iast":["lokasya mithyābhimateracakṣuṣa-","ściraṃ prasuptasya tamasyanāśraye|","śrāntasya karmasvanuviddhayā dhiyā","tvamāvirāsīḥ kila yogabhāskaraḥ|| 5"],"meaning":"ज्ञानदृष्टिके लुप्त हो जानेके कारण देहादि मिथ्या वस्तुओंमें जिन्हें आत्माभिमान हो गया है तथा बुद्धिके कर्मासक्त रहनेके कारण अत्यन्त श्रमित होकर जो चिरकालसे अपार अन्धकारमय संसारमें सोये पड़े हैं, उन्हें जगानेके लिये आप योगप्रकाशक सूर्य ही प्रकट हुए हैं॥ ५॥"},{"id":"3.29.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/6/","page":380,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः।","आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः॥ ६"],"iast":["iti māturvacaḥ ślakṣṇaṃ pratinandya mahāmuniḥ|","ābabhāṣe kuruśreṣṭha prītastāṃ karuṇārditaḥ|| 6"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! माताके ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिलजीने उनकी प्रशंसा की और जीवोंके प्रति दयासे द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्‍नताके साथ उनसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥"},{"id":"3.29.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/7/","page":380,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते।","स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते॥ ७"],"iast":["bhaktiyogo bahuvidho mārgairbhāmini bhāvyate|","svabhāvaguṇamārgeṇa puṃsāṃ bhāvo vibhidyate|| 7"],"meaning":"श्रीभगवान्‌ने कहा—माताजी! साधकोंके भावके अनुसार भक्तियोगका अनेक प्रकारसे प्रकाश होता है, क्योंकि स्वभाव और गुणोंके भेदसे मनुष्योंके भावमें भी विभिन्‍नता आ जाती है॥ ७॥"},{"id":"3.29.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/8/","page":380,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा।","संरम्भी भिन्‍नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः॥ ८"],"iast":["abhisandhāya yo hiṃsāṃ dambhaṃ mātsaryameva vā|","saṃrambhī bhinnadṛgbhāvaṃ mayi kuryātsa tāmasaḥ|| 8"],"meaning":"जो भेददर्शी क्रोधी पुरुष हृदयमें हिंसा, दम्भ अथवा मात्सर्यका भाव रखकर मुझसे प्रेम करता है, वह मेरा तामस भक्त है॥ ८॥"},{"id":"3.29.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/9/","page":380,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विषयानभिसन्धाय यश ऐश्‍वर्यमेव वा।","अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः॥ ९"],"iast":["viṣayānabhisandhāya yaśa aiśvaryameva vā|","arcādāvarcayedyo māṃ pṛthagbhāvaḥ sa rājasaḥ|| 9"],"meaning":"जो पुरुष विषय, यश और ऐश्‍वर्यकी कामनासे प्रतिमादिमें मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह राजस भक्त है॥ ९॥"},{"id":"3.29.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/10/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम्।","यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः॥ १०"],"iast":["karmanirhāramuddiśya parasmin vā tadarpaṇam|","yajedyaṣṭavyamiti vā pṛthagbhāvaḥ sa sāttvikaḥ|| 10"],"meaning":"जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है—इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है॥ १०॥"},{"id":"3.29.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/11/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मद‍्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।","मनोगतिरविच्छिन्‍ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ ११"],"iast":["madguṇaśrutimātreṇa mayi sarvaguhāśaye|","manogatiravicchinnā yathā gaṅgāmbhaso'mbudhau|| 11"],"meaning":"जिस प्रकार गंगाका प्रवाह अखण्डरूपसे समुद्रकी ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे मनकी गतिका तैलधारावत् अविच्छिन्‍नरूपसे मुझ सर्वान्तर्यामीके प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तममें निष्काम और अनन्य प्रेम होना—यह निर्गुण भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"3.29.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/12/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्।","अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥ १२"],"iast":["lakṣaṇaṃ bhaktiyogasya nirguṇasya hyudāhṛtam|","ahaitukyavyavahitā yā bhaktiḥ puruṣottame|| 12"],"meaning":"जिस प्रकार गंगाका प्रवाह अखण्डरूपसे समुद्रकी ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे मनकी गतिका तैलधारावत् अविच्छिन्‍नरूपसे मुझ सर्वान्तर्यामीके प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तममें निष्काम और अनन्य प्रेम होना—यह निर्गुण भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"3.29.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/13/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।","दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः॥ १३"],"iast":["sālokyasārṣṭisāmīpyasārūpyaikatvamapyuta|","dīyamānaṃ na gṛhṇanti vinā matsevanaṃ janāḥ|| 13"],"meaning":"ऐसे निष्काम भक्त, दिये जानेपर भी, मेरी सेवाको छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य मोक्षतक नहीं लेते—॥ १३॥"},{"id":"3.29.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/14/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः।","येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते॥ १४"],"iast":["sa eva bhaktiyogākhya ātyantika udāhṛtaḥ|","yenātivrajya triguṇaṃ madbhāvāyopapadyate|| 14"],"meaning":"भगवत् सेवाके लिये मुक्तिका तिरस्कार करनेवाला यह भक्तियोग ही परम पुरुषार्थ अथवा साध्य कहा गया है। इसके द्वारा पुरुष तीनों गुणोंको लाँघकर मेरे भावको—मेरे प्रेमरूप अप्राकृत स्वरूपको प्राप्त हो जाता है॥ १४॥"},{"id":"3.29.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/15/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा।","क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यशः॥ १५"],"iast":["niṣevitenānimittena svadharmeṇa mahīyasā|","kriyāyogena śastena nātihiṃsreṇa nityaśaḥ|| 15"],"meaning":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥","meaning_covers":[15,19]},{"id":"3.29.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/16/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनैः।","भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासङ्गमेन च॥ १६"],"iast":["maddhiṣṇyadarśanasparśapūjāstutyabhivandanaiḥ|","bhūteṣu madbhāvanayā sattvenāsaṅgamena ca|| 16"],"meaning":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥","meaning_covers":[15,19]},{"id":"3.29.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/17/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["महता बहुमानेन दीनानामनुकम्पया।","मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च॥ १७"],"iast":["mahatā bahumānena dīnānāmanukampayā|","maitryā caivātmatulyeṣu yamena niyamena ca|| 17"],"meaning":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥","meaning_covers":[15,19]},{"id":"3.29.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/18/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आध्यात्मिकानुश्रवणान्‍नामसङ्कीर्तनाच्च मे।","आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहंक्रियया तथा॥ १८"],"iast":["ādhyātmikānuśravaṇānnāmasaṅkīrtanācca me|","ārjavenāryasaṅgena nirahaṃkriyayā tathā|| 18"],"meaning":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥","meaning_covers":[15,19]},{"id":"3.29.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/19/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मद्धर्मणो गुणैरेतैः परिसंशुद्ध आशयः।","पुरुषस्याञ्जसाभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम्॥ १९"],"iast":["maddharmaṇo guṇairetaiḥ parisaṃśuddha āśayaḥ|","puruṣasyāñjasābhyeti śrutamātraguṇaṃ hi mām|| 19"],"meaning":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥","meaning_covers":[15,19]},{"id":"3.29.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/20/","page":381,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात्।","एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत्॥ २०"],"iast":["yathā vātaratho ghrāṇamāvṛṅkte gandha āśayāt|","evaṃ yogarataṃ ceta ātmānamavikāri yat|| 20"],"meaning":"जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥"},{"id":"3.29.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/21/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा।","तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम्॥ २१"],"iast":["ahaṃ sarveṣu bhūteṣu bhūtātmāvasthitaḥ sadā|","tamavajñāya māṃ martyaḥ kurute'rcāviḍambanam|| 21"],"meaning":"मैं आत्मारूपसे सदा सभी जीवोंमें स्थित हूँ; इसलिये जो लोग मुझ सर्वभूतस्थित परमात्माका अनादर करके केवल प्रतिमामें ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वाँगमात्र है॥ २१॥"},{"id":"3.29.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/22/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्‍वरम्।","हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भस्मन्येव जुहोति सः॥ २२"],"iast":["yo māṃ sarveṣu bhūteṣu santamātmānamīśvaram|","hitvārcāṃ bhajate mauḍhyādbhasmanyeva juhoti saḥ|| 22"],"meaning":"मैं सबका आत्मा, परमेश्‍वर सभी भूतोंमें स्थित हूँ; ऐसी दशामें जो मोहवश मेरी उपेक्षा करके केवल प्रतिमाके पूजनमें ही लगा रहता है, वह तो मानो भस्ममें ही हवन करता है॥ २२॥"},{"id":"3.29.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/23/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्‍नदर्शिनः।","भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति॥ २३"],"iast":["dviṣataḥ parakāye māṃ mānino bhinnadarśinaḥ|","bhūteṣu baddhavairasya na manaḥ śāntimṛcchati|| 23"],"meaning":"जो भेददर्शी और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवोंके साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरोंमें विद्यमान मुझ आत्मासे ही द्वेष करता है, उसके मनको कभी शान्ति नहीं मिल सकती॥ २३॥"},{"id":"3.29.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/24/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्‍नयानघे।","नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः॥ २४"],"iast":["ahamuccāvacairdravyaiḥ kriyayotpannayānaghe|","naiva tuṣye'rcito'rcāyāṃ bhūtagrāmāvamāninaḥ|| 24"],"meaning":"माताजी! जो दूसरे जीवोंका अपमान करता है, वह बहुत-सी घटिया-बढ़िया सामग्रियोंसे अनेक प्रकारके विधि-विधानके साथ मेरी मूर्तिका पूजन भी करे तो भी मैं उससे प्रसन्‍न नहीं हो सकता॥ २४॥"},{"id":"3.29.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/25/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्चादावर्चयेत्तावदीश्‍वरं मां स्वकर्मकृत्।","यावन्‍न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम्॥ २५"],"iast":["arcādāvarcayettāvadīśvaraṃ māṃ svakarmakṛt|","yāvanna veda svahṛdi sarvabhūteṣvavasthitam|| 25"],"meaning":"मनुष्य अपने धर्मका अनुष्ठान करता हुआ तबतक मुझ ईश्‍वरकी प्रतिमा आदिमें पूजा करता रहे, जबतक उसे अपने हृदयमें एवं सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित परमात्माका अनुभव न हो जाय॥ २५॥"},{"id":"3.29.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/26/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मनश्‍च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम्।","तस्य भिन्‍नदृशो मृत्युर्विदधे भयमुल्बणम्॥ २६"],"iast":["ātmanaśca parasyāpi yaḥ karotyantarodaram|","tasya bhinnadṛśo mṛtyurvidadhe bhayamulbaṇam|| 26"],"meaning":"जो व्यक्ति आत्मा और परमात्माके बीचमें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है, उस भेददर्शीको मैं मृत्युरूपसे महान् भय उपस्थित करता हूँ॥ २६॥"},{"id":"3.29.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/27/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम्।","अर्हयेद्दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्‍नेन चक्षुषा॥ २७"],"iast":["atha māṃ sarvabhūteṣu bhūtātmānaṃ kṛtālayam|","arhayeddānamānābhyāṃ maitryābhinnena cakṣuṣā|| 27"],"meaning":"अतः सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर घर बनाकर उन प्राणियोंके ही रूपमें स्थित मुझ परमात्माका यथायोग्य दान, मान, मित्रताके व्यवहार तथा समदृष्टिके द्वारा पूजन करना चाहिये॥ २७॥"},{"id":"3.29.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/28/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जीवाःश्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे।","ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः॥ २८"],"iast":["jīvāḥśreṣṭhā hyajīvānāṃ tataḥ prāṇabhṛtaḥ śubhe|","tataḥ sacittāḥ pravarāstataścendriyavṛttayaḥ|| 28"],"meaning":"माताजी! पाषाणादि अचेतनोंकी अपेक्षा वृक्षादि जीव श्रेष्ठ हैं, उनसे साँस लेनेवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनमें भी मनवाले प्राणी उत्तम और उनसे इन्द्रियकी वृत्तियोंसे युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं। सेन्द्रिय प्राणियोंमें भी केवल स्पर्शका अनुभव करनेवालोंकी अपेक्षा रसका ग्रहण कर सकनेवाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं तथा रसवेत्ताओंकी अपेक्षा गन्धका अनुभव करनेवाले (भ्रमरादि) और गन्धका ग्रहण करनेवालोंसे भी शब्दका ग्रहण करनेवाले (सर्पादि) श्रेष्ठ हैं॥ २८-२९॥","meaning_covers":[28,29]},{"id":"3.29.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/29/","page":382,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः।","तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः॥ २९"],"iast":["tatrāpi sparśavedibhyaḥ pravarā rasavedinaḥ|","tebhyo gandhavidaḥ śreṣṭhāstataḥ śabdavido varāḥ|| 29"],"meaning":"माताजी! पाषाणादि अचेतनोंकी अपेक्षा वृक्षादि जीव श्रेष्ठ हैं, उनसे साँस लेनेवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनमें भी मनवाले प्राणी उत्तम और उनसे इन्द्रियकी वृत्तियोंसे युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं। सेन्द्रिय प्राणियोंमें भी केवल स्पर्शका अनुभव करनेवालोंकी अपेक्षा रसका ग्रहण कर सकनेवाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं तथा रसवेत्ताओंकी अपेक्षा गन्धका अनुभव करनेवाले (भ्रमरादि) और गन्धका ग्रहण करनेवालोंसे भी शब्दका ग्रहण करनेवाले (सर्पादि) श्रेष्ठ हैं॥ २८-२९॥","meaning_covers":[28,29]},{"id":"3.29.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/30/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः।","तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्‍चतुष्पादस्ततो द्विपात्॥ ३०"],"iast":["rūpabhedavidastatra tataścobhayatodataḥ|","teṣāṃ bahupadāḥ śreṣṭhāścatuṣpādastato dvipāt|| 30"],"meaning":"उनसे भी रूपका अनुभव करनेवाले (काकादि) उत्तम हैं और उनकी अपेक्षा जिनके ऊपर-नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, वे जीव श्रेष्ठ हैं। उनमें भी बिना पैरवालोंसे बहुत-से चरणोंवाले श्रेष्ठ हैं तथा बहुत चरणोंवालोंसे चार चरणवाले और चार चरणवालोंसे भी दो चरणवाले मनुष्य श्रेष्ठ हैं॥ ३०॥"},{"id":"3.29.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/31/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ततो वर्णाश्‍च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः।","ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः॥ ३१"],"iast":["tato varṇāśca catvārasteṣāṃ brāhmaṇa uttamaḥ|","brāhmaṇeṣvapi vedajño hyarthajño'bhyadhikastataḥ|| 31"],"meaning":"मनुष्योंमें भी चार वर्ण श्रेष्ठ हैं; उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मणोंमें वेदको जाननेवाले उत्तम हैं और वेदज्ञोंमें भी वेदका तात्पर्य जाननेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३१॥"},{"id":"3.29.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/32/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वकर्मकृत्।","मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः॥ ३२"],"iast":["arthajñātsaṃśayacchettā tataḥ śreyān svakarmakṛt|","muktasaṅgastato bhūyānadogdhā dharmamātmanaḥ|| 32"],"meaning":"तात्पर्य जाननेवालोंसे संशय निवारण करनेवाले, उनसे भी अपने वर्णाश्रमोचित धर्मका पालन करनेवाले तथा उनसे भी आसक्तिका त्याग और अपने धर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३२॥"},{"id":"3.29.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/33/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरः।","मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि संन्यस्तकर्मणः।","न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात्॥ ३३"],"iast":["tasmānmayyarpitāśeṣakriyārthātmā nirantaraḥ|","mayyarpitātmanaḥ puṃso mayi saṃnyastakarmaṇaḥ|","na paśyāmi paraṃ bhūtamakartuḥ samadarśanāt|| 33"],"meaning":"उनकी अपेक्षा भी जो लोग अपने सम्पूर्ण कर्म, उनके फल तथा अपने शरीरको भी मुझे ही अर्पण करके भेदभाव छोड़कर मेरी उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार मुझे ही चित्त और कर्म समर्पण करनेवाले अकर्त्ता और समदर्शी पुरुषसे बढ़कर मुझे कोई अन्य प्राणी नहीं दीखता॥ ३३॥"},{"id":"3.29.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/34/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहु मानयन्।","ईश्‍वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति॥ ३४"],"iast":["manasaitāni bhūtāni praṇamedbahu mānayan|","īśvaro jīvakalayā praviṣṭo bhagavāniti|| 34"],"meaning":"अतः यह मानकर कि जीवरूप अपने अंशसे साक्षात् भगवान् ही सबमें अनुगत हैं, इन समस्त प्राणियोंको बड़े आदरके साथ मनसे प्रणाम करे॥ ३४॥"},{"id":"3.29.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/35/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भक्तियोगश्‍च योगश्‍च मया मानव्युदीरितः।","ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत्॥ ३५"],"iast":["bhaktiyogaśca yogaśca mayā mānavyudīritaḥ|","yayorekatareṇaiva puruṣaḥ puruṣaṃ vrajet|| 35"],"meaning":"माताजी! इस प्रकार मैंने तुम्हारे लिये भक्तियोग और अष्टांगयोगका वर्णन किया। इनमेंसे एकका भी साधन करनेसे जीव परमपुरुष भगवान्‌को प्राप्त कर सकता है॥ ३५॥"},{"id":"3.29.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/36/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः।","परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम्॥ ३६"],"iast":["etadbhagavato rūpaṃ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|","paraṃ pradhānaṃ puruṣaṃ daivaṃ karmaviceṣṭitam|| 36"],"meaning":"भगवान् परमात्मा परब्रह्मका अद्भुत प्रभावसम्पन्‍न तथा जागतिक पदार्थोंके नानाविध वैचित्र्यका हेतुभूत स्वरूपविशेष ही ‘काल’ नामसे विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसीके रूप हैं तथा इनसे यह पृथक् भी है। नाना प्रकारके कर्मोंका मूल अदृष्ट भी यही है तथा इसीसे महत्तत्त्वादिके अभिमानी भेददर्शी प्राणियोंको सदा भय लगा रहता है॥ ३६-३७॥","meaning_covers":[36,37]},{"id":"3.29.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/37/","page":383,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते।","भूतानां महदादीनां यतो भिन्‍नदृशां भयम्॥ ३७"],"iast":["rūpabhedāspadaṃ divyaṃ kāla ityabhidhīyate|","bhūtānāṃ mahadādīnāṃ yato bhinnadṛśāṃ bhayam|| 37"],"meaning":"भगवान् परमात्मा परब्रह्मका अद्भुत प्रभावसम्पन्‍न तथा जागतिक पदार्थोंके नानाविध वैचित्र्यका हेतुभूत स्वरूपविशेष ही ‘काल’ नामसे विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसीके रूप हैं तथा इनसे यह पृथक् भी है। नाना प्रकारके कर्मोंका मूल अदृष्ट भी यही है तथा इसीसे महत्तत्त्वादिके अभिमानी भेददर्शी प्राणियोंको सदा भय लगा रहता है॥ ३६-३७॥","meaning_covers":[36,37]},{"id":"3.29.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/38/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः।","स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः॥ ३८"],"iast":["yo'ntaḥ praviśya bhūtāni bhūtairattyakhilāśrayaḥ|","sa viṣṇvākhyo'dhiyajño'sau kālaḥ kalayatāṃ prabhuḥ|| 38"],"meaning":"जो सबका आश्रय होनेके कारण समस्त प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर भूतोंद्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत‍्का शासन करनेवाले ब्रह्मादिका भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञोंका फल देनेवाला विष्णु है॥ ३८॥"},{"id":"3.29.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/39/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः।","आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत्॥ ३९"],"iast":["na cāsya kaściddayito na dveṣyo na ca bāndhavaḥ|","āviśatyapramatto'sau pramattaṃ janamantakṛt|| 39"],"meaning":"इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान्‌को भूलकर भोगरूप प्रमादमें पड़े हुए प्राणियोंपर आक्रमण करके उनका संहार करता है॥ ३९॥"},{"id":"3.29.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/40/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात्।","यद्भयाद्वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात्॥ ४०"],"iast":["yadbhayādvāti vāto'yaṃ sūryastapati yadbhayāt|","yadbhayādvarṣate devo bhagaṇo bhāti yadbhayāt|| 40"],"meaning":"इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र वर्षा करते हैं और इसीके भयसे तारे चमकते हैं॥ ४०॥"},{"id":"3.29.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/41/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह।","स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च॥ ४१"],"iast":["yadvanaspatayo bhītā latāścauṣadhibhiḥ saha|","sve sve kāle'bhigṛhṇanti puṣpāṇi ca phalāni ca|| 41"],"meaning":"इसीसे भयभीत होकर ओषधियोंके सहित लताएँ और सारी वनस्पतियाँ समय-समयपर फल-फूल धारण करती हैं॥ ४१॥"},{"id":"3.29.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/42/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः।","अग्‍निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मज्जति यद्भयात्॥ ४२"],"iast":["sravanti sarito bhītā notsarpatyudadhiryataḥ|","agnirindhe sagiribhirbhūrna majjati yadbhayāt|| 42"],"meaning":"इसीके डरसे नदियाँ बहती हैं और समुद्र अपनी मर्यादासे बाहर नहीं जाता। इसीके भयसे अग्‍नि प्रज्वलित होती है और पर्वतोंके सहित पृथ्वी जलमें नहीं डूबती॥ ४२॥"},{"id":"3.29.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/43/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नभो ददाति श्‍वसतां पदं यन्‍नियमाददः।","लोकं स्वदेहं तनुते महान् सप्तभिरावृतम्॥ ४३"],"iast":["nabho dadāti śvasatāṃ padaṃ yanniyamādadaḥ|","lokaṃ svadehaṃ tanute mahān saptabhirāvṛtam|| 43"],"meaning":"इसीके शासनसे यह आकाश जीवित प्राणियोंको श्वास-प्रश्वासके लिये अवकाश देता है और महत्तत्त्व अहंकाररूप शरीरका सात आवरणोंसे युक्त ब्रह्माण्डके रूपमें विस्तार करता है॥ ४३॥"},{"id":"3.29.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/44/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गुणाभिमानिनो देवाः सर्गादिष्वस्य यद्भयात्।","वर्तन्तेऽनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम्॥ ४४"],"iast":["guṇābhimānino devāḥ sargādiṣvasya yadbhayāt|","vartante'nuyugaṃ yeṣāṃ vaśa etaccarācaram|| 44"],"meaning":"इस कालके ही भयसे सत्त्वादि गुणोंके नियामक विष्णु आदि देवगण, जिनके अधीन यह सारा चराचर जगत् है, अपने जगत्-रचना आदि कार्योंमें युगक्रमसे तत्पर रहते हैं॥ ४४॥"},{"id":"3.29.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/45/","page":384,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः।","जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम्॥ ४५"],"iast":["so'nanto'ntakaraḥ kālo'nādirādikṛdavyayaḥ|","janaṃ janena janayanmārayanmṛtyunāntakam|| 45"],"meaning":"यह अविनाशी काल स्वयं अनादि किन्तु दूसरोंका आदिकर्ता (उत्पादक) है तथा स्वयं अनन्त होकर भी दूसरोंका अन्त करनेवाला है। यह पितासे पुत्रकी उत्पत्ति कराता हुआ सारे जगत‍्की रचना करता है और अपनी संहारशक्ति मृत्युके द्वारा यमराजको भी मरवाकर इसका अन्त कर देता है॥ ४५॥"}],"text":[{"b":9090,"kind":"adhyaya_heading","page":380,"text":"अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः"},{"b":9091,"kind":"topic_heading","page":380,"text":"भक्तिका मर्म और कालकी महिमा"},{"b":9092,"kind":"topic_heading","page":380,"text":"देवहूतिरुवाच"},{"b":9093,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.1"],"text":"लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च।"},{"b":9094,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.1"],"text":"स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम्॥ १"},{"b":9095,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.2"],"text":"यथा सांख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते।"},{"b":9096,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.2"],"text":"भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो॥ २"},{"b":9097,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.3"],"text":"विरागो येन पुरुषो भगवन् सर्वतो भवेत्।"},{"b":9098,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.3"],"text":"आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृतीः॥ ३"},{"b":9099,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.4"],"text":"कालस्येश्‍वररूपस्य परेषां च परस्य ते।"},{"b":9100,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.4"],"text":"स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः॥ ४"},{"b":9101,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.5"],"text":"लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष-"},{"b":9102,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.5"],"text":"श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये।"},{"b":9103,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.5"],"text":"श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया"},{"b":9104,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.5"],"text":"त्वमाविरासीः किल योगभास्करः॥ ५"},{"b":9105,"kind":"hindi_commentary","page":380,"explains":["3.29.1","3.29.2","3.29.3","3.29.4","3.29.5"],"text":"देवहूतिने पूछा—प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादिका जैसा लक्षण सांख्यशास्त्रमें कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोगको ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोगका मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥ इसके सिवा जीवोंकी जन्म-मरणरूपा अनेक प्रकारकी गतियोंका भी वर्णन कीजिये; जिनके सुननेसे जीवको सब प्रकारकी वस्तुओंसे वैराग्य होता है॥ ३॥ जिसके भयसे लोग शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं और जो ब्रह्मादिका भी शासन करनेवाला है, उस सर्वसमर्थ कालका स्वरूप भी आप मुझसे कहिये॥ ४॥ ज्ञानदृष्टिके लुप्त हो जानेके कारण देहादि मिथ्या वस्तुओंमें जिन्हें आत्माभिमान हो गया है तथा बुद्धिके कर्मासक्त रहनेके कारण अत्यन्त श्रमित होकर जो चिरकालसे अपार अन्धकारमय संसारमें सोये पड़े हैं, उन्हें जगानेके लिये आप योगप्रकाशक सूर्य ही प्रकट हुए हैं॥ ५॥"},{"b":9106,"kind":"topic_heading","page":380,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":9107,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.6"],"text":"इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः।"},{"b":9108,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.6"],"text":"आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः॥ ६"},{"b":9109,"kind":"hindi_commentary","page":380,"explains":["3.29.6"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! माताके ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिलजीने उनकी प्रशंसा की और जीवोंके प्रति दयासे द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्‍नताके साथ उनसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥"},{"b":9110,"kind":"topic_heading","page":380,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":9111,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.7"],"text":"भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते।"},{"b":9112,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.7"],"text":"स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते॥ ७"},{"b":9113,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.8"],"text":"अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा।"},{"b":9114,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.8"],"text":"संरम्भी भिन्‍नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः॥ ८"},{"b":9115,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.9"],"text":"विषयानभिसन्धाय यश ऐश्‍वर्यमेव वा।"},{"b":9116,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["3.29.9"],"text":"अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः॥ ९"},{"b":9117,"kind":"hindi_commentary","page":380,"explains":["3.29.7","3.29.8","3.29.9"],"text":"श्रीभगवान्‌ने कहा—माताजी! साधकोंके भावके अनुसार भक्तियोगका अनेक प्रकारसे प्रकाश होता है, क्योंकि स्वभाव और गुणोंके भेदसे मनुष्योंके भावमें भी विभिन्‍नता आ जाती है॥ ७॥ जो भेददर्शी क्रोधी पुरुष हृदयमें हिंसा, दम्भ अथवा मात्सर्यका भाव रखकर मुझसे प्रेम करता है, वह मेरा तामस भक्त है॥ ८॥ जो पुरुष विषय, यश और ऐश्‍वर्यकी कामनासे प्रतिमादिमें मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह राजस भक्त है॥ ९॥"},{"b":9118,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.10"],"text":"कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम्।"},{"b":9119,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.10"],"text":"यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः॥ १०"},{"b":9120,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.11"],"text":"मद‍्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।"},{"b":9121,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.11"],"text":"मनोगतिरविच्छिन्‍ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ ११"},{"b":9122,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.12"],"text":"लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्।"},{"b":9123,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.12"],"text":"अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥ १२"},{"b":9124,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.13"],"text":"सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।"},{"b":9125,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.13"],"text":"दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः॥ १३"},{"b":9126,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.14"],"text":"स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः।"},{"b":9127,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.14"],"text":"येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते॥ १४"},{"b":9128,"kind":"hindi_commentary","page":381,"explains":["3.29.10","3.29.11","3.29.12","3.29.13","3.29.14"],"text":"जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है—इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है॥ १०॥ जिस प्रकार गंगाका प्रवाह अखण्डरूपसे समुद्रकी ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे मनकी गतिका तैलधारावत् अविच्छिन्‍नरूपसे मुझ सर्वान्तर्यामीके प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तममें निष्काम और अनन्य प्रेम होना—यह निर्गुण भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥ ११-१२॥ ऐसे निष्काम भक्त, दिये जानेपर भी, मेरी सेवाको छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य मोक्षतक नहीं लेते—॥ १३॥ भगवत् सेवाके लिये मुक्तिका तिरस्कार करनेवाला यह भक्तियोग ही परम पुरुषार्थ अथवा साध्य कहा गया है। इसके द्वारा पुरुष तीनों गुणोंको लाँघकर मेरे भावको—मेरे प्रेमरूप अप्राकृत स्वरूपको प्राप्त हो जाता है॥ १४॥"},{"b":9129,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.15"],"text":"निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा।"},{"b":9130,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.15"],"text":"क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यशः॥ १५"},{"b":9131,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.16"],"text":"मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनैः।"},{"b":9132,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.16"],"text":"भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासङ्गमेन च॥ १६"},{"b":9133,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.17"],"text":"महता बहुमानेन दीनानामनुकम्पया।"},{"b":9134,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.17"],"text":"मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च॥ १७"},{"b":9135,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.18"],"text":"आध्यात्मिकानुश्रवणान्‍नामसङ्कीर्तनाच्च मे।"},{"b":9136,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.18"],"text":"आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहंक्रियया तथा॥ १८"},{"b":9137,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.19"],"text":"मद्धर्मणो गुणैरेतैः परिसंशुद्ध आशयः।"},{"b":9138,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.19"],"text":"पुरुषस्याञ्जसाभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम्॥ १९"},{"b":9139,"kind":"hindi_commentary","page":381,"explains":["3.29.15","3.29.16","3.29.17","3.29.18","3.29.19"],"text":"निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥"},{"b":9140,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.20"],"text":"यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात्।"},{"b":9141,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["3.29.20"],"text":"एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत्॥ २०"},{"b":9142,"kind":"hindi_commentary","page":381,"explains":["3.29.20"],"text":"जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥"},{"b":9143,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.21"],"text":"अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा।"},{"b":9144,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.21"],"text":"तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम्॥ २१"},{"b":9145,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.22"],"text":"यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्‍वरम्।"},{"b":9146,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.22"],"text":"हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भस्मन्येव जुहोति सः॥ २२"},{"b":9147,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.23"],"text":"द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्‍नदर्शिनः।"},{"b":9148,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.23"],"text":"भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति॥ २३"},{"b":9149,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.24"],"text":"अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्‍नयानघे।"},{"b":9150,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.24"],"text":"नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः॥ २४"},{"b":9151,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.25"],"text":"अर्चादावर्चयेत्तावदीश्‍वरं मां स्वकर्मकृत्।"},{"b":9152,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.25"],"text":"यावन्‍न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम्॥ २५"},{"b":9153,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.26"],"text":"आत्मनश्‍च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम्।"},{"b":9154,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.26"],"text":"तस्य भिन्‍नदृशो मृत्युर्विदधे भयमुल्बणम्॥ २६"},{"b":9155,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.27"],"text":"अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम्।"},{"b":9156,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.27"],"text":"अर्हयेद्दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्‍नेन चक्षुषा॥ २७"},{"b":9157,"kind":"hindi_commentary","page":382,"explains":["3.29.21","3.29.22","3.29.23","3.29.24","3.29.25","3.29.26","3.29.27"],"text":"मैं आत्मारूपसे सदा सभी जीवोंमें स्थित हूँ; इसलिये जो लोग मुझ सर्वभूतस्थित परमात्माका अनादर करके केवल प्रतिमामें ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वाँगमात्र है॥ २१॥ मैं सबका आत्मा, परमेश्‍वर सभी भूतोंमें स्थित हूँ; ऐसी दशामें जो मोहवश मेरी उपेक्षा करके केवल प्रतिमाके पूजनमें ही लगा रहता है, वह तो मानो भस्ममें ही हवन करता है॥ २२॥ जो भेददर्शी और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवोंके साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरोंमें विद्यमान मुझ आत्मासे ही द्वेष करता है, उसके मनको कभी शान्ति नहीं मिल सकती॥ २३॥ माताजी! जो दूसरे जीवोंका अपमान करता है, वह बहुत-सी घटिया-बढ़िया सामग्रियोंसे अनेक प्रकारके विधि-विधानके साथ मेरी मूर्तिका पूजन भी करे तो भी मैं उससे प्रसन्‍न नहीं हो सकता॥ २४॥ मनुष्य अपने धर्मका अनुष्ठान करता हुआ तबतक मुझ ईश्‍वरकी प्रतिमा आदिमें पूजा करता रहे, जबतक उसे अपने हृदयमें एवं सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित परमात्माका अनुभव न हो जाय॥ २५॥ जो व्यक्ति आत्मा और परमात्माके बीचमें थोड़ा-सा भी अन्तर करता है, उस भेददर्शीको मैं मृत्युरूपसे महान् भय उपस्थित करता हूँ॥ २६॥ अतः सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर घर बनाकर उन प्राणियोंके ही रूपमें स्थित मुझ परमात्माका यथायोग्य दान, मान, मित्रताके व्यवहार तथा समदृष्टिके द्वारा पूजन करना चाहिये॥ २७॥"},{"b":9158,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.28"],"text":"जीवाःश्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे।"},{"b":9159,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.28"],"text":"ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः॥ २८"},{"b":9160,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.29"],"text":"तत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः।"},{"b":9161,"kind":"sanskrit_shloka","page":382,"verses":["3.29.29"],"text":"तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः॥ २९"},{"b":9162,"kind":"hindi_translation","page":382,"explains":["3.29.28","3.29.29"],"text":"माताजी! पाषाणादि अचेतनोंकी अपेक्षा वृक्षादि जीव श्रेष्ठ हैं, उनसे साँस लेनेवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनमें भी मनवाले प्राणी उत्तम और उनसे इन्द्रियकी वृत्तियोंसे युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं। सेन्द्रिय प्राणियोंमें भी केवल स्पर्शका अनुभव करनेवालोंकी अपेक्षा रसका ग्रहण कर सकनेवाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं तथा रसवेत्ताओंकी अपेक्षा गन्धका अनुभव करनेवाले (भ्रमरादि) और गन्धका ग्रहण करनेवालोंसे भी शब्दका ग्रहण करनेवाले (सर्पादि) श्रेष्ठ हैं॥ २८-२९॥"},{"b":9163,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.30"],"text":"रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः।"},{"b":9164,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.30"],"text":"तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्‍चतुष्पादस्ततो द्विपात्॥ ३०"},{"b":9165,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.31"],"text":"ततो वर्णाश्‍च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः।"},{"b":9166,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.31"],"text":"ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः॥ ३१"},{"b":9167,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.32"],"text":"अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वकर्मकृत्।"},{"b":9168,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.32"],"text":"मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः॥ ३२"},{"b":9169,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.33"],"text":"तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरः।"},{"b":9170,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.33"],"text":"मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि संन्यस्तकर्मणः।"},{"b":9171,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.33"],"text":"न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात्॥ ३३"},{"b":9172,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.34"],"text":"मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहु मानयन्।"},{"b":9173,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.34"],"text":"ईश्‍वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति॥ ३४"},{"b":9174,"kind":"hindi_translation","page":383,"explains":["3.29.30","3.29.31","3.29.32","3.29.33","3.29.34"],"text":"उनसे भी रूपका अनुभव करनेवाले (काकादि) उत्तम हैं और उनकी अपेक्षा जिनके ऊपर-नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, वे जीव श्रेष्ठ हैं। उनमें भी बिना पैरवालोंसे बहुत-से चरणोंवाले श्रेष्ठ हैं तथा बहुत चरणोंवालोंसे चार चरणवाले और चार चरणवालोंसे भी दो चरणवाले मनुष्य श्रेष्ठ हैं॥ ३०॥ मनुष्योंमें भी चार वर्ण श्रेष्ठ हैं; उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मणोंमें वेदको जाननेवाले उत्तम हैं और वेदज्ञोंमें भी वेदका तात्पर्य जाननेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३१॥ तात्पर्य जाननेवालोंसे संशय निवारण करनेवाले, उनसे भी अपने वर्णाश्रमोचित धर्मका पालन करनेवाले तथा उनसे भी आसक्तिका त्याग और अपने धर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३२॥ उनकी अपेक्षा भी जो लोग अपने सम्पूर्ण कर्म, उनके फल तथा अपने शरीरको भी मुझे ही अर्पण करके भेदभाव छोड़कर मेरी उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार मुझे ही चित्त और कर्म समर्पण करनेवाले अकर्त्ता और समदर्शी पुरुषसे बढ़कर मुझे कोई अन्य प्राणी नहीं दीखता॥ ३३॥ अतः यह मानकर कि जीवरूप अपने अंशसे साक्षात् भगवान् ही सबमें अनुगत हैं, इन समस्त प्राणियोंको बड़े आदरके साथ मनसे प्रणाम करे॥ ३४॥"},{"b":9175,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.35"],"text":"भक्तियोगश्‍च योगश्‍च मया मानव्युदीरितः।"},{"b":9176,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.35"],"text":"ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत्॥ ३५"},{"b":9177,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.36"],"text":"एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः।"},{"b":9178,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.36"],"text":"परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम्॥ ३६"},{"b":9179,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.37"],"text":"रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते।"},{"b":9180,"kind":"sanskrit_shloka","page":383,"verses":["3.29.37"],"text":"भूतानां महदादीनां यतो भिन्‍नदृशां भयम्॥ ३७"},{"b":9181,"kind":"hindi_translation","page":383,"explains":["3.29.35","3.29.36","3.29.37"],"text":"माताजी! इस प्रकार मैंने तुम्हारे लिये भक्तियोग और अष्टांगयोगका वर्णन किया। इनमेंसे एकका भी साधन करनेसे जीव परमपुरुष भगवान्‌को प्राप्त कर सकता है॥ ३५॥ भगवान् परमात्मा परब्रह्मका अद्भुत प्रभावसम्पन्‍न तथा जागतिक पदार्थोंके नानाविध वैचित्र्यका हेतुभूत स्वरूपविशेष ही ‘काल’ नामसे विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसीके रूप हैं तथा इनसे यह पृथक् भी है। नाना प्रकारके कर्मोंका मूल अदृष्ट भी यही है तथा इसीसे महत्तत्त्वादिके अभिमानी भेददर्शी प्राणियोंको सदा भय लगा रहता है॥ ३६-३७॥"},{"b":9182,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.38"],"text":"योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः।"},{"b":9183,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.38"],"text":"स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः॥ ३८"},{"b":9184,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.39"],"text":"न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः।"},{"b":9185,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.39"],"text":"आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत्॥ ३९"},{"b":9186,"kind":"hindi_translation","page":384,"explains":["3.29.38","3.29.39"],"text":"जो सबका आश्रय होनेके कारण समस्त प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर भूतोंद्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत‍्का शासन करनेवाले ब्रह्मादिका भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञोंका फल देनेवाला विष्णु है॥ ३८॥ इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान्‌को भूलकर भोगरूप प्रमादमें पड़े हुए प्राणियोंपर आक्रमण करके उनका संहार करता है॥ ३९॥"},{"b":9187,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.40"],"text":"यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात्।"},{"b":9188,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.40"],"text":"यद्भयाद्वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात्॥ ४०"},{"b":9189,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.41"],"text":"यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह।"},{"b":9190,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.41"],"text":"स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च॥ ४१"},{"b":9191,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.42"],"text":"स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः।"},{"b":9192,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.42"],"text":"अग्‍निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मज्जति यद्भयात्॥ ४२"},{"b":9193,"kind":"hindi_translation","page":384,"explains":["3.29.40","3.29.41","3.29.42"],"text":"इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र वर्षा करते हैं और इसीके भयसे तारे चमकते हैं॥ ४०॥ इसीसे भयभीत होकर ओषधियोंके सहित लताएँ और सारी वनस्पतियाँ समय-समयपर फल-फूल धारण करती हैं॥ ४१॥ इसीके डरसे नदियाँ बहती हैं और समुद्र अपनी मर्यादासे बाहर नहीं जाता। इसीके भयसे अग्‍नि प्रज्वलित होती है और पर्वतोंके सहित पृथ्वी जलमें नहीं डूबती॥ ४२॥"},{"b":9194,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.43"],"text":"नभो ददाति श्‍वसतां पदं यन्‍नियमाददः।"},{"b":9195,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.43"],"text":"लोकं स्वदेहं तनुते महान् सप्तभिरावृतम्॥ ४३"},{"b":9196,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.44"],"text":"गुणाभिमानिनो देवाः सर्गादिष्वस्य यद्भयात्।"},{"b":9197,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.44"],"text":"वर्तन्तेऽनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम्॥ ४४"},{"b":9198,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.45"],"text":"सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः।"},{"b":9199,"kind":"sanskrit_shloka","page":384,"verses":["3.29.45"],"text":"जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम्॥ ४५"},{"b":9200,"kind":"hindi_commentary","page":384,"explains":["3.29.43","3.29.44","3.29.45"],"text":"इसीके शासनसे यह आकाश जीवित प्राणियोंको श्वास-प्रश्वासके लिये अवकाश देता है और महत्तत्त्व अहंकाररूप शरीरका सात आवरणोंसे युक्त ब्रह्माण्डके रूपमें विस्तार करता है॥ ४३॥ इस कालके ही भयसे सत्त्वादि गुणोंके नियामक विष्णु आदि देवगण, जिनके अधीन यह सारा चराचर जगत् है, अपने जगत्-रचना आदि कार्योंमें युगक्रमसे तत्पर रहते हैं॥ ४४॥ यह अविनाशी काल स्वयं अनादि किन्तु दूसरोंका आदिकर्ता (उत्पादक) है तथा स्वयं अनन्त होकर भी दूसरोंका अन्त करनेवाला है। यह पितासे पुत्रकी उत्पत्ति कराता हुआ सारे जगत‍्की रचना करता है और अपनी संहारशक्ति मृत्युके द्वारा यमराजको भी मरवाकर इसका अन्त कर देता है॥ ४५॥"},{"b":9201,"kind":"hindi_translation","page":384,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे ‘कापिलेयोपाख्याने’ एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥"}],"notes":[{"id":"v1:421","mark":"१","page":380,"after_verse":"3.29.2","text":"प्रा० पा०—रतः।"},{"id":"v1:422","mark":"२","page":380,"after_verse":"3.29.8","text":"प्रा० पा०—च।"},{"id":"v1:423","mark":"१","page":381,"after_verse":"3.29.14","text":"भगवान्‌के नित्यधाममें निवास,"},{"id":"v1:424","mark":"२","page":381,"after_verse":"3.29.14","text":"भगवान्‌के समान ऐश्‍वर्यभोग,"},{"id":"v1:425","mark":"३","page":381,"after_verse":"3.29.14","text":"भगवान्‌की नित्यसमीपता,"},{"id":"v1:426","mark":"४","page":381,"after_verse":"3.29.14","text":"भगवान्‌का-सा रूप और"},{"id":"v1:427","mark":"५","page":381,"after_verse":"3.29.14","text":"भगवान्‌के विग्रहमें समा जाना, उनसे एक हो जाना या ब्रह्मरूप प्राप्त कर लेना।"},{"id":"v1:428","mark":"१","page":383,"after_verse":"3.29.30","text":"प्रा० पा०—विदस्तेभ्यस्ततश्‍चोभयवेदिनः।"},{"id":"v1:429","mark":"२","page":383,"after_verse":"3.29.30","text":"प्रा० पा०—पादास्ततो।"}],"corrections":{"count":5,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}