{"id":"5.14","title":"पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14","part":"पञ्चम स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्दशोऽध्यायः","topics":["भवाटवीका स्पष्टीकरण"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[630,638]},"verses":[{"id":"5.14.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/1/","page":630,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["य एष देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुणविशेषविकल्पितकुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविधदेहावलिभिर्वियोगसंयोगाद्यनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन्दुर्गाध्ववदसुगमेऽध्वन्यापतित ईश्‍वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपशमनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवीमवरुन्धे यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते॥ १॥"],"iast":["ya eṣa dehātmamānināṃ sattvādiguṇaviśeṣavikalpitakuśalākuśalasamavahāravinirmitavividhadehāvalibhirviyogasaṃyogādyanādisaṃsārānubhavasya dvārabhūtena ṣaḍindriyavargeṇa tasmindurgādhvavadasugame'dhvanyāpatita īśvarasya bhagavato viṣṇorvaśavartinyā māyayā jīvaloko'yaṃ yathā vaṇiksārtho'rthaparaḥ svadehaniṣpāditakarmānubhavaḥ śmaśānavadaśivatamāyāṃ saṃsārāṭavyāṃ gato nādyāpi viphalabahupratiyogehastattāpopaśamanīṃ harigurucaraṇāravindamadhukarānupadavīmavarundhe yasyāmu ha vā ete ṣaḍindriyanāmānaḥ karmaṇā dasyava eva te|| 1||"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! देहाभिमानी जीवोंके द्वारा सत्त्वादि गुणोंके भेदसे शुभ, अशुभ और मिश्र—तीन प्रकारके कर्म होते रहते हैं। उन कर्मोंके द्वारा ही निर्मित नाना प्रकारके शरीरोंके साथ होनेवाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीवको प्राप्त होता है, उसके अनुभवके छः द्वार हैं—मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनसे विवश होकर यह जीवसमूह मार्ग भूलकर भयंकर वनमें भटकते हुए धनके लोभी बनिजारोंके समान परमसमर्थ भगवान् विष्णुके आश्रित रहनेवाली मायाकी प्रेरणासे बीहड़ वनके समान दुर्गम मार्गमें पड़कर संसार-वनमें जा पहुँचता है। यह वन श्मशानके समान अत्यन्त अशुभ है। इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीरसे किये हुए कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेकों विघ्नोंके कारण उसे अपने व्यापारमें सफलता भी नहीं मिलती; तो भी यह उसके श्रमको शान्त करनेवाले श्रीहरि एवं गुरुदेवके चरणारविन्द-मकरन्द-मधुके रसिक भक्त-भ्रमरोंके मार्गका अनुसरण नहीं करता। इस संसार-वनमें मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मोंकी दृष्टिसे डाकुओंके समान हैं॥ १॥"},{"id":"5.14.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/2/","page":631,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति। तद्धर्म्यं धनं दर्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य विलुम्पन्ति॥ २॥"],"iast":["tadyathā puruṣasya dhanaṃ yatkiñciddharmaupayikaṃ bahukṛcchrādhigataṃ sākṣātparamapuruṣārādhanalakṣaṇo yo'sau dharmastaṃ tu sāmparāya udāharanti| taddharmyaṃ dhanaṃ darśanasparśanaśravaṇāsvādanāvaghrāṇasaṅkalpavyavasāyagṛhagrāmyopabhogena kunāthasya ajitātmano yathā sārthasya vilumpanti|| 2||"],"meaning":"पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्ममें होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुषकी आराधनाके रूपमें होता है तो उसे परलोकमें निःश्रेयसका हेतु बतलाया गया है। किन्तु जिस मनुष्यका बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वशमें नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धनको ये मनसहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्प-विकल्प करना और निश्‍चय करना—इन वृत्तियोंके द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगोंमें फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखियाका अनुगमन करनेवाले एवं असावधान बनिजारोंके दलका धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं॥ २॥"},{"id":"5.14.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/3/","page":631,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि हरन्ति॥ ३॥"],"iast":["atha ca yatra kauṭumbikā dārāpatyādayo nāmnā karmaṇā vṛkasṛgālā evānicchato'pi kadaryasya kuṭumbina uraṇakavatsaṃrakṣyamāṇaṃ miṣato'pi haranti|| 3||"],"meaning":"ये ही नहीं, उस संसार-वनमें रहनेवाले उसके कुटुम्बी भी—जो नामसे तो स्त्री-पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ोंके समान होते हैं—उस अर्थलोलुप कुटुम्बीके धनको उसकी इच्छा न रहनेपर भी उसके देखते-देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियोंसे सुरक्षित भेड़ोंको उठा ले जाते हैं॥ ३॥"},{"id":"5.14.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/4/","page":631,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्‍न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः॥ ४॥"],"iast":["yathā hyanuvatsaraṃ kṛṣyamāṇamapyadagdhabījaṃ kṣetraṃ punarevāvapanakāle gulmatṛṇavīrudbhirgahvaramiva bhavatyevameva gṛhāśramaḥ karmakṣetraṃ yasminna hi karmāṇyutsīdanti yadayaṃ kāmakaraṇḍa eṣa āvasathaḥ|| 4||"],"meaning":"जिस प्रकार यदि किसी खेतके बीजोंको अग्‍निद्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतनेपर भी खेतीका समय आनेपर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण आदिसे गहन हो जाता है—उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मोंका सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओंकी पिटारी है॥ ४॥"},{"id":"5.14.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/5/","page":631,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["तत्र गतो दंशमशकसमापसदैर्मनुजैः शलभशकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरुध्यमानबहिःप्राणः क्‍वचित् परिवर्तमानोऽस्मिन्‍नध्वन्यविद्याकामकर्मभिरुपरक्तमनसानुपपन्‍नार्थं नरलोकं गन्धर्वनगरमुपपन्‍नमिति मिथ्यादृष्टिरनुपश्यति॥ ५॥"],"iast":["tatra gato daṃśamaśakasamāpasadairmanujaiḥ śalabhaśakuntataskaramūṣakādibhiruparudhyamānabahiḥprāṇaḥ kvacit parivartamāno'sminnadhvanyavidyākāmakarmabhiruparaktamanasānupapannārthaṃ naralokaṃ gandharvanagaramupapannamiti mithyādṛṣṭiranupaśyati|| 5||"],"meaning":"उस गृहस्थाश्रममें आसक्त हुए व्यक्तिके धनरूप बाहरी प्राणोंको डाँस और मच्छरोंके समान नीच पुरुषोंसे तथा टिड्डी, पक्षी, चोर और चूहे आदिसे क्षति पहुँचती रहती है। कभी इस मार्गमें भटकते-भटकते यह अविद्या, कामना और कर्मोंसे कलुषित हुए अपने चित्तसे दृष्टिदोषके कारण इस मर्त्यलोकको, जो गन्धर्वनगरके समान असत् है, सत्य समझने लगता है॥ ५॥"},{"id":"5.14.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/6/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["तत्र च क्‍वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुपः॥ ६॥"],"iast":["tatra ca kvacidātapodakanibhān viṣayānupadhāvati pānabhojanavyavāyādivyasanalolupaḥ|| 6||"],"meaning":"फिर खान-पान और स्त्री-प्रसंगादि व्यसनोंमें फँसकर मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ने लगता है॥ ६॥"},{"id":"5.14.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/7/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्सत्यग्‍निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम्॥ ७॥"],"iast":["kvaciccāśeṣadoṣaniṣadanaṃ purīṣaviśeṣaṃ tadvarṇaguṇanirmitamatiḥ suvarṇamupāditsatyagnikāmakātara ivolmukapiśācam|| 7||"],"meaning":"कभी बुद्धिके रजोगुणसे प्रभावित होनेपर सारे अनर्थोंकी जड़ अग्‍निके मलरूप सोनेको ही सुखका साधन समझकर उसे पानेके लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़-धूप करने लगता है, जैसे वनमें जाड़ेसे ठिठुरता हुआ पुरुष अग्‍निके लिये व्याकुल होकर उल्मुक पिशाचकी (अगियाबेतालकी) ओर उसे आग समझकर दौड़े॥ ७॥"},{"id":"5.14.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/8/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["अथ कदाचिन्‍निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति॥ ८॥"],"iast":["atha kadācinnivāsapānīyadraviṇādyanekātmopajīvanābhiniveśa etasyāṃ saṃsārāṭavyāmitastataḥ paridhāvati|| 8||"],"meaning":"कभी इस शरीरको जीवित रखनेवाले घर, अन्‍न-जल और धन आदिमें अभिनिवेश करके इस संसारारण्यमें इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है॥ ८॥"},{"id":"5.14.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/9/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादोरजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति॥ ९॥"],"iast":["kvacicca vātyaupamyayā pramadayā''rohamāropitastatkālarajasā rajanībhūta ivāsādhumaryādorajasvalākṣo'pi digdevatā atirajasvalamatirna vijānāti|| 9||"],"meaning":"कभी बवंडरके समान आँखोंमें धूल झोंक देनेवाली स्त्री गोदमें बैठा लेती है, तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषोंकी मर्यादाका भी विचार नहीं करता। उस समय नेत्रोंमें रजोगुणकी धूल भर जानेसे बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मोंके साक्षी दिशाओंके देवताओंको भी भुला देता है॥ ९॥"},{"id":"5.14.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/10/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति॥ १०॥"],"iast":["kvacitsakṛdavagataviṣayavaitathyaḥ svayaṃ parābhidhyānena vibhraṃśitasmṛtistayaiva marīcitoyaprāyāṃstānevābhidhāvati|| 10||"],"meaning":"कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयोंका मिथ्यात्व जान लेनेपर भी अनादिकालसे देहमें आत्मबुद्धि रहनेसे विवेक-बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण उन मरुमरीचिकातुल्य विषयोंकी ओर ही फिर दौड़ने लगता है॥ १०॥"},{"id":"5.14.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/11/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचि दुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेनातिव्यथितकर्णमूलहृदयः॥ ११॥"],"iast":["kvaci dulūkajhillīsvanavadatiparuṣarabhasāṭopaṃ pratyakṣaṃ parokṣaṃ vā ripurājakulanirbhartsitenātivyathitakarṇamūlahṛdayaḥ|| 11||"],"meaning":"कभी प्रत्यक्ष शब्द करनेवाले उल्लूके समान शत्रुओंकी और परोक्षरूपसे बोलनेवाले झींगुरोंके समान राजाकी अति कठोर एवं दिलको दहला देनेवाली डरावनी डाँट-डपटसे इसके कान और मनको बड़ी व्यथा होती है॥ ११॥"},{"id":"5.14.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/12/","page":632,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदा कारस्करकाकतुण्डाद्यपुण्यद्रुमलताविषोदपानवदुभयार्थशून्यद्रविणाञ्जीवन्मृतान् स्वयं जीवन्म्रियमाण उपधावति॥ १२॥"],"iast":["sa yadā dugdhapūrvasukṛtastadā kāraskarakākatuṇḍādyapuṇyadrumalatāviṣodapānavadubhayārthaśūnyadraviṇāñjīvanmṛtān svayaṃ jīvanmriyamāṇa upadhāvati|| 12||"],"meaning":"पूर्वपुण्य क्षीण हो जानेपर यह जीवित ही मुर्देके समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलोंवाले पापवृक्षों, इसी प्रकारकी दूषित लताओं और विषैले कुओंके समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनोंके ही काममें नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्देके समान हैं—उन कृपण पुरुषोंका आश्रय लेता है॥ १२॥"},{"id":"5.14.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/13/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["एकदासत्प्रसङ्गान्‍निकृतमतिर्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति॥ १३॥"],"iast":["ekadāsatprasaṅgānnikṛtamatirvyudakasrotaḥskhalanavadubhayato'pi duḥkhadaṃ pākhaṇḍamabhiyāti|| 13||"],"meaning":"कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है॥ १३॥"},{"id":"5.14.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/14/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति॥ १४॥"],"iast":["yadā tu parabādhayāndha ātmane nopanamati tadā hi pitṛputrabarhiṣmataḥ pitṛputrān vā sa khalu bhakṣayati|| 14||"],"meaning":"जब दूसरोंको सतानेसे उसे अन्‍न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता-पुत्रोंको अथवा पिता या पुत्र आदिका एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खानेके लिये तैयार हो जाता है॥ १४॥"},{"id":"5.14.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/15/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं शोकाग्‍निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५॥"],"iast":["kvacidāsādya gṛhaṃ dāvavatpriyārthavidhuramasukhodarkaṃ śokāgninā dahyamāno bhṛśaṃ nirvedamupagacchati || 15||"],"meaning":"कभी दावानलके समान प्रिय विषयोंसे शून्य एवं परिणाममें दुःखमय घरमें पहुँचता है, तो वहाँ इष्टजनोंके वियोगादिसे उसके शोककी आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्‍न होने लगता है॥ १५॥"},{"id":"5.14.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/16/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसाऽपहृतप्रियतमधनासुःप्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते॥ १६॥"],"iast":["kvacitkālaviṣamitarājakularakṣasā'pahṛtapriyatamadhanāsuḥpramṛtaka iva vigatajīvalakṣaṇa āste|| 16||"],"meaning":"कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणोंको हर लेता है, तो यह मरे हुएके समान निर्जीव हो जाता है॥ १६॥"},{"id":"5.14.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/17/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥"],"iast":["kadācinmanorathopagatapitṛpitāmahādyasatsaditi svapnanirvṛtilakṣaṇamanubhavati|| 17||"],"meaning":"कभी मनोरथके पदार्थोंके समान अत्यन्त असत् पिता-पितामह आदि सम्बन्धोंको सत्य समझकर उनके सहवाससे स्वप्नके समान क्षणिक सुखका अनुभव करता है॥ १७॥"},{"id":"5.14.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/18/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्‍निव सीदति॥ १८॥"],"iast":["kvacid gṛhāśramakarmacodanātibharagirimārurukṣamāṇo lokavyasanakarṣitamanāḥ kaṇṭakaśarkarākṣetraṃ praviśanniva sīdati|| 18||"],"meaning":"गृहस्थाश्रमके लिये जिस कर्मविधिका महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वतकी कड़ी चढ़ाईके समान ही है। लोगोंको उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करनेका प्रयत्न करता है, तब तरह-तरहकी कठिनाइयोंसे क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ोंसे भरी भूमिमें पहुँचे हुए व्यक्तिके समान दुःखी हो जाता है॥ १८॥"},{"id":"5.14.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/19/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥"],"iast":["kvaciccaduḥsahena kāyābhyantaravahninā gṛhītasāraḥ svakuṭumbāya krudhyati|| 19||"],"meaning":"कभी पेटकी असह्य ज्वालासे अधीर होकर अपने कुटुम्बपर ही बिगड़ने लगता है॥ १९॥"},{"id":"5.14.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/20/","page":633,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥"],"iast":["sa eva punarnidrājagaragṛhīto'ndhe tamasi magnaḥ śūnyāraṇya iva śete nānyat kiñcana veda śava ivāpaviddhaḥ|| 20||"],"meaning":"फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है। उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती॥ २०॥"},{"id":"5.14.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/21/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["कदाचिद् भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकैरलब्धनिद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानुक्षीयमाणविज्ञानोऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति॥ २१॥"],"iast":["kadācid bhagnamānadaṃṣṭro durjanadandaśūkairalabdhanidrākṣaṇo vyathitahṛdayenānukṣīyamāṇavijñāno'ndhakūpe'ndhavatpatati|| 21||"],"meaning":"कभी दुर्जनरूप काटनेवाले जीव इतना काटते—तिरस्कार करते हैं कि इसके गर्वरूप दाँत, जिनसे यह दूसरोंको काटता था, टूट जाते हैं। तब इसे अशान्तिके कारण नींद भी नहीं आती तथा मर्मवेदनाके कारण क्षण-क्षणमें विवेक-शक्ति क्षीण होते रहनेसे अन्तमें अंधेकी भाँति यह नरकरूप अंधे कुएँमें जा गिरता है॥ २१॥"},{"id":"5.14.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/22/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["कर्हि स्म चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये॥ २२॥"],"iast":["karhi sma citkāmamadhulavān vicinvan yadā paradāraparadravyāṇyavarundhāno rājñā svāmibhirvā nihataḥ patatyapāre niraye|| 22||"],"meaning":"कभी विषयसुखरूप मधुकणोंको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब यह लुक-छिपकर परस्त्री या परधनको उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजाके हाथसे मारा जाकर ऐसे नरकमें जा गिरता है जिसका ओर-छोर नहीं है॥ २२॥"},{"id":"5.14.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/23/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्‍नात्मनः संसारावपनमुदाहरन्ति॥ २३॥"],"iast":["atha ca tasmādubhayathāpi hi karmāsminnātmanaḥ saṃsārāvapanamudāharanti|| 23||"],"meaning":"इसीसे ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्तिमार्गमें रहकर किये हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकारके कर्म जीवको संसारकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं॥ २३॥"},{"id":"5.14.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/24/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थितिः॥ २४॥"],"iast":["muktastato yadi bandhāddevadatta upācchinatti tasmādapi viṣṇumitra ityanavasthitiḥ|| 24||"],"meaning":"यदि किसी प्रकार राजा आदिके बन्धनसे छूट भी गया, तो अन्यायसे अपहरण किये हुए उन स्त्री और धनको देवदत्त नामका कोई दूसरा व्यक्ति छीन लेता है और उससे विष्णुमित्र नामका कोई तीसरा व्यक्ति झटक लेता है। इस प्रकार वे भोग एक पुरुषसे दूसरे पुरुषके पास जाते रहते हैं, एक स्थानपर नहीं ठहरते॥ २४॥"},{"id":"5.14.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/25/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविकभौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते॥ २५॥"],"iast":["kvacicca śītavātādyanekādhidaivikabhautikātmīyānāṃ daśānāṃ pratinivāraṇe'kalpo durantacintayā viṣaṇṇa āste|| 25||"],"meaning":"कभी-कभी शीत और वायु आदि अनेकों आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखकी स्थितियोंके निवारण करनेमें समर्थ न होनेसे यह अपार चिन्ताओंके कारण उदास हो जाता है॥ २५॥"},{"id":"5.14.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/26/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमन्येभ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात्॥ २६॥"],"iast":["kvacinmitho vyavaharan yatkiñciddhanamanyebhyo vā kākiṇikāmātramapyapaharan yatkiñcidvā vidveṣameti vittaśāṭhyāt|| 26||"],"meaning":"कभी परस्पर लेन-देनका व्यवहार करते समय किसी दूसरेका थोड़ा सा—दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानीके कारण उससे वैर ठन जाता है॥ २६॥"},{"id":"5.14.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/27/","page":634,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["अध्वन्यमुष्मिन्‍निम उपसर्गास्तथा सुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभमात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादयः ॥ २७॥"],"iast":["adhvanyamuṣminnima upasargāstathā sukhaduḥkharāgadveṣabhayābhimānapramādonmādaśokamohalobhamātsaryerṣyāvamānakṣutpipāsādhivyādhijanmajarāmaraṇādayaḥ || 27||"],"meaning":"राजन्! इस मार्गमें पूर्वोक्त विघ्नोंके अतिरिक्त सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा-पिपासा, आधि-व्याधि, जन्म, जरा और मृत्यु आदि और भी अनेकों विघ्न हैं॥ २७॥"},{"id":"5.14.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/28/","page":635,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्‍नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुलहृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्माऽपारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति॥ २८॥"],"iast":["kvāpi devamāyayā striyā bhujalatopagūḍhaḥ praskannavivekavijñāno yadvihāragṛhārambhākulahṛdayastadāśrayāvasaktasutaduhitṛkalatrabhāṣitāvalokaviceṣṭitāpahṛtahṛdaya ātmānamajitātmā'pāre'ndhe tamasi prahiṇoti|| 28||"],"meaning":"(इस विघ्नबहुल मार्गमें इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्रीके बाहुपाशमें पड़कर विवेकहीन हो जाता है। तब उसीके लिये विहारभवन आदि बनवानेकी चिन्तामें ग्रस्त रहता है तथा उसीके आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियोंके मीठे-मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओंमें आसक्त होकर, उन्हींमें चित्त फँस जानेसे वह इन्द्रियोंका दास अपार अन्धकारमय नरकोंमें गिरता है॥ २८॥"},{"id":"5.14.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/29/","page":635,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["कदाचिदीश्‍वरस्य भगवतो विष्णोश्‍चक्रात्परमाण्वादिद्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्‍वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते॥ २९॥"],"iast":["kadācidīśvarasya bhagavato viṣṇoścakrātparamāṇvādidviparārdhāpavargakālopalakṣaṇātparivartitena vayasā raṃhasā harata ābrahmatṛṇastambādīnāṃ bhūtānāmanimiṣato miṣatāṃ vitrastahṛdayastameveśvaraṃ kālacakranijāyudhaṃ sākṣādbhagavantaṃ yajñapuruṣamanādṛtya pākhaṇḍadevatāḥ kaṅkagṛdhrabakavaṭaprāyā āryasamayaparihṛtāḥ sāṅketyenābhidhatte|| 29||"],"meaning":"कालचक्र साक्षात् भगवान् विष्णुका आयुध है। वह परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त क्षण-घटी आदि अवयवोंसे युक्त है। वह निरन्तर सावधान रहकर घूमता रहता है, जल्दी-जल्दी बदलनेवाली बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ ही उसका वेग हैं। उसके द्वारा वह ब्रह्मासे लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी भूतोंका निरन्तर संहार करता रहता है। कोई भी उसकी गतिमें बाधा नहीं डाल सकता। उससे भय मानकर भी जिनका यह कालचक्र निज आयुध है, उन साक्षात् भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना छोड़कर यह मन्दमति मनुष्य पाखण्डियोंके चक्करमें पड़कर उनके कंक, गिद्ध, बगुला और बटेरके समान आर्यशास्त्रबहिष्कृत देवताओंका आश्रय लेता है—जिनका केवल वेदबाह्य अप्रामाणिक आगमोंने ही उल्लेख किया है॥ २९॥"},{"id":"5.14.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/30/","page":635,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरु वञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथावानर जातेः॥ ३०॥"],"iast":["yadā pākhaṇḍibhirātmavañcitaistairuru vañcito brahmakulaṃ samāvasaṃsteṣāṃ śīlamupanayanādiśrautasmārtakarmānuṣṭhānena bhagavato yajñapuruṣasyārādhanameva tadarocayan śūdrakulaṃ bhajate nigamācāre'śuddhito yasya mithunībhāvaḥ kuṭumbabharaṇaṃ yathāvānara jāteḥ|| 30||"],"meaning":"ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखेमें हैं; जब यह भी उनकी ठगाईमें आकर दुःखी होता है, तब ब्राह्मणोंकी शरण लेता है। किन्तु उपनयन-संस्कारके अनन्तर श्रौत-स्मार्तकर्मोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचारके अनुकूल अपनेमें शुद्धि न होनेके कारण यह कर्मशून्य शूद्रकुलमें प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरोंके समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है॥ ३०॥"},{"id":"5.14.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/31/","page":635,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["तत्रापि निरवरोधः स्वैरेण विहरन्‍नतिकृपणबुद्धिरन्योन्यमुखनिरीक्षणादिना ग्राम्यकर्मणैव विस्मृतकालावधिः॥ ३१॥"],"iast":["tatrāpi niravarodhaḥ svaireṇa viharannatikṛpaṇabuddhiranyonyamukhanirīkṣaṇādinā grāmyakarmaṇaiva vismṛtakālāvadhiḥ|| 31||"],"meaning":"वहाँ बिना रोक-टोक स्वच्छन्द विहार करनेसे इसकी बुद्धि अत्यन्त दीन हो जाती है और एक-दूसरेका मुख देखना आदि विषय-भोगोंमें फँसकर इसे अपने मृत्युकालका भी स्मरण नहीं होता॥ ३१॥"},{"id":"5.14.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/32/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिद् द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः॥ ३२॥"],"iast":["kvacid drumavadaihikārtheṣu gṛheṣu raṃsyan yathā vānaraḥ sutadāravatsalo vyavāyakṣaṇaḥ|| 32||"],"meaning":"वृक्षोंके समान जिनका लौकिक सुख ही फल है—उन घरोंमें ही सुख मानकर वानरोंकी भाँति स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगोंमें ही बिता देता है॥ ३२॥"},{"id":"5.14.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/33/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये॥ ३३॥"],"iast":["evamadhvanyavarundhāno mṛtyugajabhayāttamasi girikandaraprāye|| 33||"],"meaning":"इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गमें पड़कर सुख-दुःख भोगता हुआ यह जीव रोगरूपी गिरि-गुहामें फँसकर उसमें रहनेवाले मृत्युरूप हाथीसे डरता रहता है॥ ३३॥"},{"id":"5.14.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/34/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते॥ ३४॥"],"iast":["kvacicchītavātādyanekadaivikabhautikātmīyānāṃ duḥkhānāṃ pratinivāraṇe'kalpo durantaviṣayaviṣaṇṇa āste|| 34||"],"meaning":"कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकारके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखोंकी निवृत्ति करनेमें जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयोंकी चिन्तासे यह खिन्‍न हो उठता है॥ ३४॥"},{"id":"5.14.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/35/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥ ३५॥"],"iast":["kvacinmitho vyavaharan yatkiñciddhanamupayāti vittaśāṭhyena || 35||"],"meaning":"कभी आपसमें क्रय-विक्रय आदि व्यापार करनेपर बहुत कंजूसी करनेसे इसे थोड़ा-सा धन हाथ लग जाता है॥ ३५॥"},{"id":"5.14.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/36/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["क्‍वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोगविहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादानेऽवसितमतिस्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥ ३६॥"],"iast":["kvacitkṣīṇadhanaḥ śayyāsanāśanādyupabhogavihīno yāvadapratilabdhamanorathopagatādāne'vasitamatistatastato'vamānādīni janādabhilabhate || 36||"],"meaning":"कभी धन नष्ट हो जानेसे जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदिकी भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलनेसे यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायोंसे पानेका निश्‍चय करता है। इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरोंके हाथसे बहुत अपमानित होना पड़ता है॥ ३६॥"},{"id":"5.14.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/37/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति॥ ३७॥"],"iast":["evaṃ vittavyatiṣaṅgavivṛddhavairānubandho'pi pūrvavāsanayā mitha udvahatyathāpavahati|| 37||"],"meaning":"इस प्रकार धनकी आसक्तिसे परस्पर वैरभाव बढ़ जानेपर भी यह अपनी पूर्ववासनाओंसे विवश होकर आपसमें विवाहादि सम्बन्ध करता और छोड़ता रहता है॥ ३७॥"},{"id":"5.14.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/38/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्‍नविपन्‍नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन् बिभ्यद्विवदन् क्रन्दन् संहृष्यन्गायन्‍नह्यमानः साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वनः पारमुपदिशन्ति ॥ ३८॥"],"iast":["etasmin saṃsārādhvani nānākleśopasargabādhita āpannavipanno yatra yastamu ha vāvetarastatra visṛjya jātaṃ jātamupādāya śocanmuhyan bibhyadvivadan krandan saṃhṛṣyangāyannahyamānaḥ sādhuvarjito naivāvartate'dyāpi yata ārabdha eṣa naralokasārtho yamadhvanaḥ pāramupadiśanti || 38||"],"meaning":"इस संसारमार्गमें चलनेवाला यह जीव अनेक प्रकारके क्लेश और विघ्न-बाधाओंसे बाधित होनेपर भी मार्गमें जिसपर जहाँ आपत्ति आती है अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है; तथा नये जन्मे हुओंको साथ लगाता है, कभी किसीके लिये शोक करता है, किसीका दुःख देखकर मूर्च्छित हो जाता है, किसीके वियोग होनेकी आशंकासे भयभीत हो उठता है, किसीसे झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती है तो रोने-चिल्लाने लगता है, कहीं कोई मनके अनुकूल बात हो गयी तो प्रसन्‍नताके मारे फूला नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हींके लिये बँधनेमें भी नहीं हिचकता। साधुजन इसके पास कभी नहीं आते, यह साधुसंगसे सदा वंचित रहता है। इस प्रकार यह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है। जहाँसे इसकी यात्रा आरम्भ हुई है और जिसे इस मार्गकी अन्तिम अवधि कहते हैं, उस परमात्माके पास यह अभीतक नहीं लौटा है॥ ३८॥"},{"id":"5.14.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/39/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्‍न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपरतात्मानः समवगच्छन्ति ॥ ३९॥"],"iast":["yadidaṃ yogānuśāsanaṃ na vā etadavarundhate yannyastadaṇḍā munaya upaśamaśīlā uparatātmānaḥ samavagacchanti || 39||"],"meaning":"परमात्मातक तो योगशास्त्रकी भी गति नहीं है; जिन्होंने सब प्रकारके दण्ड (शासन)-का त्याग कर दिया है, वे निवृत्तिपरायण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं॥ ३९॥"},{"id":"5.14.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/40/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षयः किं तु परं मृधे शयीरन्‍नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धा यां विसृज्य स्वयमुपसंहृताः॥ ४०॥"],"iast":["yadapi digibhajayino yajvino ye vai rājarṣayaḥ kiṃ tu paraṃ mṛdhe śayīrannasyāmeva mameyamiti kṛtavairānubandhā yāṃ visṛjya svayamupasaṃhṛtāḥ|| 40||"],"meaning":"जो दिग्गजोंको जीतनेवाले और बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले राजर्षि हैं उनकी भी वहाँतक गति नहीं है। वे संग्रामभूमिमें शत्रुओंका सामना करके केवल प्राणपरित्याग ही करते हैं तथा जिसमें ‘यह मेरी है’, ऐसा अभिमान करके वैर ठाना था—उस पृथ्वीमें ही अपना शरीर छोड़कर स्वयं परलोकको चले जाते हैं। इस संसारसे वे भी पार नहीं होते॥ ४०॥"},{"id":"5.14.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/41/","page":636,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चिन्‍नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरि गतोऽपि॥ ४१॥"],"iast":["karmavallīmavalambya tata āpadaḥ kathañcinnarakādvimuktaḥ punarapyevaṃ saṃsārādhvani vartamāno naralokasārthamupayāti evamupari gato'pi|| 41||"],"meaning":"अपने पुण्यकर्मरूप लताका आश्रय लेकर यदि किसी प्रकार यह जीव इन आपत्तियोंसे अथवा नरकसे छुटकारा पा भी जाता है, तो फिर इसी प्रकार संसारमार्गमें भटकता हुआ इस जनसमुदायमें मिल जाता है। यही दशा स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवालोंकी भी है॥ ४१॥"},{"id":"5.14.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/42/","page":637,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["तस्येदमुपगायन्ति—","आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मनः।","नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः॥ ४२"],"iast":["tasyedamupagāyanti—","ārṣabhasyeha rājarṣermanasāpi mahātmanaḥ|","nānuvartmārhati nṛpo makṣikeva garutmataḥ|| 42"],"meaning":"राजन्! राजर्षि भरतके विषयमें पण्डितजन ऐसा कहते हैं—‘जैसे गरुडजीकी होड़ कोई मक्खी नहीं कर सकती, उसी प्रकार राजर्षि महात्मा भरतके मार्गका कोई अन्य राजा मनसे भी अनुसरण नहीं कर सकता॥ ४२॥"},{"id":"5.14.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/43/","page":637,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यो दुस्त्यजान्दारसुतान् सुहृद‍्राज्यं हृदिस्पृशः।","जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः॥ ४३"],"iast":["yo dustyajāndārasutān suhṛdrājyaṃ hṛdispṛśaḥ|","jahau yuvaiva malavaduttamaślokalālasaḥ|| 43"],"meaning":"उन्होंने पुण्यकीर्ति श्रीहरिमें अनुरक्त होकर अति मनोरम स्त्री, पुत्र, मित्र और राज्यादिको युवावस्थामें ही विष्ठाके समान त्याग दिया था; दूसरोंके लिये तो इन्हें त्यागना बहुत ही कठिन है॥ ४३॥"},{"id":"5.14.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/44/","page":638,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान्","प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्।","नैच्छन्‍नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट्-","सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः॥ ४४"],"iast":["yo dustyajān kṣitisutasvajanārthadārān","prārthyāṃ śriyaṃ suravaraiḥ sadayāvalokām|","naicchannṛpastaducitaṃ mahatāṃ madhudviṭ-","sevānuraktamanasāmabhavo'pi phalguḥ|| 44"],"meaning":"उन्होंने अति दुस्त्यज पृथ्वी, पुत्र, स्वजन, सम्पत्ति और स्त्रीकी तथा जिसके लिये बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं किन्तु जो स्वयं उनकी दयादृष्टिके लिये उनपर दृष्टिपात करती रहती थी—उस लक्ष्मीकी भी, लेशमात्र इच्छा नहीं की। यह सब उनके लिये उचित ही था; क्योंकि जिन महानुभावोंका चित्त भगवान् मधुसूदनकी सेवामें अनुरक्त हो गया है, उनकी दृष्टिमें मोक्षपद भी अत्यन्त तुच्छ है॥ ४४॥"},{"id":"5.14.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/45/","page":638,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय","योगाय सांख्यशिरसे प्रकृतीश्‍वराय।","नारायणाय हरये नम इत्युदारं","हास्यन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार॥ ४५"],"iast":["yajñāya dharmapataye vidhinaipuṇāya","yogāya sāṃkhyaśirase prakṛtīśvarāya|","nārāyaṇāya haraye nama ityudāraṃ","hāsyanmṛgatvamapi yaḥ samudājahāra|| 45"],"meaning":"उन्होंने मृगशरीर छोड़नेकी इच्छा होनेपर उच्चस्वरसे कहा था कि धर्मकी रक्षा करनेवाले, धर्मानुष्ठानमें निपुण, योगगम्य, सांख्यके प्रतिपाद्य, प्रकृतिके अधीश्‍वर यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरिको नमस्कार है।’॥ ४५॥"},{"id":"5.14.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/46/","page":638,"speaker":"स होवाच","sanskrit":["य इदं भागवतसभाजितावदातगुणकर्मणो राजर्षेर्भरतस्यानुचरितं स्वस्त्ययनमायुष्यं धन्यं यशस्यं स्वर्ग्यापवर्ग्यं वानुशृणोति आख्यास्यति अभिनन्दति च सर्वा एवाशिष आत्मन आशास्ते न काञ्चन परत इति॥ ४६॥"],"iast":["ya idaṃ bhāgavatasabhājitāvadātaguṇakarmaṇo rājarṣerbharatasyānucaritaṃ svastyayanamāyuṣyaṃ dhanyaṃ yaśasyaṃ svargyāpavargyaṃ vānuśṛṇoti ākhyāsyati abhinandati ca sarvā evāśiṣa ātmana āśāste na kāñcana parata iti|| 46||"],"meaning":"राजन्! राजर्षि भरतके पवित्र गुण और कर्मोंकी भक्तजन भी प्रशंसा करते हैं। उनका यह चरित्र बड़ा कल्याणकारी, आयु और धनकी वृद्धि करनेवाला, लोकमें सुयश बढ़ानेवाला और अन्तमें स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जो पुरुष इसे सुनता या सुनाता है और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी सारी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं; दूसरोंसे उसे कुछ भी नहीं माँगना पड़ता॥ ४६॥"}],"text":[{"b":14831,"kind":"adhyaya_heading","page":630,"text":"अथ चतुर्दशोऽध्यायः"},{"b":14832,"kind":"topic_heading","page":630,"text":"भवाटवीका स्पष्टीकरण"},{"b":14833,"kind":"topic_heading","page":630,"text":"स होवाच"},{"b":14834,"kind":"hindi_translation","page":630,"verses":["5.14.1"],"text":"य एष देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुणविशेषविकल्पितकुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविधदेहावलिभिर्वियोगसंयोगाद्यनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन्दुर्गाध्ववदसुगमेऽध्वन्यापतित ईश्‍वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपशमनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवीमवरुन्धे यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते॥ १॥"},{"b":14835,"kind":"hindi_commentary","page":630,"explains":["5.14.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! देहाभिमानी जीवोंके द्वारा सत्त्वादि गुणोंके भेदसे शुभ, अशुभ और मिश्र—तीन प्रकारके कर्म होते रहते हैं। उन कर्मोंके द्वारा ही निर्मित नाना प्रकारके शरीरोंके साथ होनेवाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीवको प्राप्त होता है, उसके अनुभवके छः द्वार हैं—मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनसे विवश होकर यह जीवसमूह मार्ग भूलकर भयंकर वनमें भटकते हुए धनके लोभी बनिजारोंके समान परमसमर्थ भगवान् विष्णुके आश्रित रहनेवाली मायाकी प्रेरणासे बीहड़ वनके समान दुर्गम मार्गमें पड़कर संसार-वनमें जा पहुँचता है। यह वन श्मशानके समान अत्यन्त अशुभ है। इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीरसे किये हुए कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेकों विघ्नोंके कारण उसे अपने व्यापारमें सफलता भी नहीं मिलती; तो भी यह उसके श्रमको शान्त करनेवाले श्रीहरि एवं गुरुदेवके चरणारविन्द-मकरन्द-मधुके रसिक भक्त-भ्रमरोंके मार्गका अनुसरण नहीं करता। इस संसार-वनमें मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मोंकी दृष्टिसे डाकुओंके समान हैं॥ १॥"},{"b":14836,"kind":"hindi_translation","page":631,"verses":["5.14.2","5.14.3","5.14.4"],"text":"तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति। तद्धर्म्यं धनं दर्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य विलुम्पन्ति॥ २॥ अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि हरन्ति॥ ३॥ यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्‍न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः॥ ४॥"},{"b":14837,"kind":"hindi_commentary","page":631,"explains":["5.14.2","5.14.3","5.14.4"],"text":"पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्ममें होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुषकी आराधनाके रूपमें होता है तो उसे परलोकमें निःश्रेयसका हेतु बतलाया गया है। किन्तु जिस मनुष्यका बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वशमें नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धनको ये मनसहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्प-विकल्प करना और निश्‍चय करना—इन वृत्तियोंके द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगोंमें फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखियाका अनुगमन करनेवाले एवं असावधान बनिजारोंके दलका धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं॥ २॥ ये ही नहीं, उस संसार-वनमें रहनेवाले उसके कुटुम्बी भी—जो नामसे तो स्त्री-पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ोंके समान होते हैं—उस अर्थलोलुप कुटुम्बीके धनको उसकी इच्छा न रहनेपर भी उसके देखते-देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियोंसे सुरक्षित भेड़ोंको उठा ले जाते हैं॥ ३॥ जिस प्रकार यदि किसी खेतके बीजोंको अग्‍निद्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतनेपर भी खेतीका समय आनेपर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण आदिसे गहन हो जाता है—उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मोंका सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओंकी पिटारी है॥ ४॥"},{"b":14838,"kind":"hindi_translation","page":631,"verses":["5.14.5"],"text":"तत्र गतो दंशमशकसमापसदैर्मनुजैः शलभशकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरुध्यमानबहिःप्राणः क्‍वचित् परिवर्तमानोऽस्मिन्‍नध्वन्यविद्याकामकर्मभिरुपरक्तमनसानुपपन्‍नार्थं नरलोकं गन्धर्वनगरमुपपन्‍नमिति मिथ्यादृष्टिरनुपश्यति॥ ५॥"},{"b":14839,"kind":"hindi_commentary","page":631,"explains":["5.14.5"],"text":"उस गृहस्थाश्रममें आसक्त हुए व्यक्तिके धनरूप बाहरी प्राणोंको डाँस और मच्छरोंके समान नीच पुरुषोंसे तथा टिड्डी, पक्षी, चोर और चूहे आदिसे क्षति पहुँचती रहती है। कभी इस मार्गमें भटकते-भटकते यह अविद्या, कामना और कर्मोंसे कलुषित हुए अपने चित्तसे दृष्टिदोषके कारण इस मर्त्यलोकको, जो गन्धर्वनगरके समान असत् है, सत्य समझने लगता है॥ ५॥"},{"b":14840,"kind":"hindi_translation","page":632,"verses":["5.14.6","5.14.7","5.14.8","5.14.9","5.14.10","5.14.11"],"text":"तत्र च क्‍वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुपः॥ ६॥ क्‍वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्सत्यग्‍निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम्॥ ७॥ अथ कदाचिन्‍निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति॥ ८॥ क्‍वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादोरजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति॥ ९॥ क्‍वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति॥ १०॥ क्‍वचि दुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेनातिव्यथितकर्णमूलहृदयः॥ ११॥"},{"b":14841,"kind":"hindi_commentary","page":632,"explains":["5.14.6","5.14.7","5.14.8","5.14.9","5.14.10","5.14.11"],"text":"फिर खान-पान और स्त्री-प्रसंगादि व्यसनोंमें फँसकर मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ने लगता है॥ ६॥ कभी बुद्धिके रजोगुणसे प्रभावित होनेपर सारे अनर्थोंकी जड़ अग्‍निके मलरूप सोनेको ही सुखका साधन समझकर उसे पानेके लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़-धूप करने लगता है, जैसे वनमें जाड़ेसे ठिठुरता हुआ पुरुष अग्‍निके लिये व्याकुल होकर उल्मुक पिशाचकी (अगियाबेतालकी) ओर उसे आग समझकर दौड़े॥ ७॥ कभी इस शरीरको जीवित रखनेवाले घर, अन्‍न-जल और धन आदिमें अभिनिवेश करके इस संसारारण्यमें इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है॥ ८॥ कभी बवंडरके समान आँखोंमें धूल झोंक देनेवाली स्त्री गोदमें बैठा लेती है, तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषोंकी मर्यादाका भी विचार नहीं करता। उस समय नेत्रोंमें रजोगुणकी धूल भर जानेसे बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मोंके साक्षी दिशाओंके देवताओंको भी भुला देता है॥ ९॥ कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयोंका मिथ्यात्व जान लेनेपर भी अनादिकालसे देहमें आत्मबुद्धि रहनेसे विवेक-बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण उन मरुमरीचिकातुल्य विषयोंकी ओर ही फिर दौड़ने लगता है॥ १०॥ कभी प्रत्यक्ष शब्द करनेवाले उल्लूके समान शत्रुओंकी और परोक्षरूपसे बोलनेवाले झींगुरोंके समान राजाकी अति कठोर एवं दिलको दहला देनेवाली डरावनी डाँट-डपटसे इसके कान और मनको बड़ी व्यथा होती है॥ ११॥"},{"b":14842,"kind":"hindi_translation","page":632,"verses":["5.14.12"],"text":"स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदा कारस्करकाकतुण्डाद्यपुण्यद्रुमलताविषोदपानवदुभयार्थशून्यद्रविणाञ्जीवन्मृतान् स्वयं जीवन्म्रियमाण उपधावति॥ १२॥"},{"b":14843,"kind":"hindi_commentary","page":632,"explains":["5.14.12"],"text":"पूर्वपुण्य क्षीण हो जानेपर यह जीवित ही मुर्देके समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलोंवाले पापवृक्षों, इसी प्रकारकी दूषित लताओं और विषैले कुओंके समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनोंके ही काममें नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्देके समान हैं—उन कृपण पुरुषोंका आश्रय लेता है॥ १२॥"},{"b":14844,"kind":"hindi_translation","page":633,"verses":["5.14.13","5.14.14","5.14.15","5.14.16"],"text":"एकदासत्प्रसङ्गान्‍निकृतमतिर्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति॥ १३॥ यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति॥ १४॥ क्‍वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं शोकाग्‍निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५॥ क्‍वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसाऽपहृतप्रियतमधनासुःप्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते॥ १६॥"},{"b":14845,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.13"],"text":"कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है॥ १३॥"},{"b":14846,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.14"],"text":"जब दूसरोंको सतानेसे उसे अन्‍न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता-पुत्रोंको अथवा पिता या पुत्र आदिका एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खानेके लिये तैयार हो जाता है॥ १४॥"},{"b":14847,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.15"],"text":"कभी दावानलके समान प्रिय विषयोंसे शून्य एवं परिणाममें दुःखमय घरमें पहुँचता है, तो वहाँ इष्टजनोंके वियोगादिसे उसके शोककी आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्‍न होने लगता है॥ १५॥"},{"b":14848,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.16"],"text":"कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणोंको हर लेता है, तो यह मरे हुएके समान निर्जीव हो जाता है॥ १६॥"},{"b":14849,"kind":"hindi_translation","page":633,"verses":["5.14.17","5.14.18","5.14.19","5.14.20"],"text":"कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥ क्‍वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्‍निव सीदति॥ १८॥ क्‍वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥ स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥"},{"b":14850,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.17"],"text":"कभी मनोरथके पदार्थोंके समान अत्यन्त असत् पिता-पितामह आदि सम्बन्धोंको सत्य समझकर उनके सहवाससे स्वप्नके समान क्षणिक सुखका अनुभव करता है॥ १७॥"},{"b":14851,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.18"],"text":"गृहस्थाश्रमके लिये जिस कर्मविधिका महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वतकी कड़ी चढ़ाईके समान ही है। लोगोंको उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करनेका प्रयत्न करता है, तब तरह-तरहकी कठिनाइयोंसे क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ोंसे भरी भूमिमें पहुँचे हुए व्यक्तिके समान दुःखी हो जाता है॥ १८॥"},{"b":14852,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["5.14.19","5.14.20"],"text":"कभी पेटकी असह्य ज्वालासे अधीर होकर अपने कुटुम्बपर ही बिगड़ने लगता है॥ १९॥ फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है। उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती॥ २०॥"},{"b":14853,"kind":"hindi_translation","page":634,"verses":["5.14.21","5.14.22","5.14.23","5.14.24","5.14.25"],"text":"कदाचिद् भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकैरलब्धनिद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानुक्षीयमाणविज्ञानोऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति॥ २१॥ कर्हि स्म चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये॥ २२॥ अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्‍नात्मनः संसारावपनमुदाहरन्ति॥ २३॥ मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थितिः॥ २४॥ क्‍वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविकभौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते॥ २५॥"},{"b":14854,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.21"],"text":"कभी दुर्जनरूप काटनेवाले जीव इतना काटते—तिरस्कार करते हैं कि इसके गर्वरूप दाँत, जिनसे यह दूसरोंको काटता था, टूट जाते हैं। तब इसे अशान्तिके कारण नींद भी नहीं आती तथा मर्मवेदनाके कारण क्षण-क्षणमें विवेक-शक्ति क्षीण होते रहनेसे अन्तमें अंधेकी भाँति यह नरकरूप अंधे कुएँमें जा गिरता है॥ २१॥"},{"b":14855,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.22"],"text":"कभी विषयसुखरूप मधुकणोंको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब यह लुक-छिपकर परस्त्री या परधनको उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजाके हाथसे मारा जाकर ऐसे नरकमें जा गिरता है जिसका ओर-छोर नहीं है॥ २२॥"},{"b":14856,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.23"],"text":"इसीसे ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्तिमार्गमें रहकर किये हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकारके कर्म जीवको संसारकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं॥ २३॥"},{"b":14857,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.24"],"text":"यदि किसी प्रकार राजा आदिके बन्धनसे छूट भी गया, तो अन्यायसे अपहरण किये हुए उन स्त्री और धनको देवदत्त नामका कोई दूसरा व्यक्ति छीन लेता है और उससे विष्णुमित्र नामका कोई तीसरा व्यक्ति झटक लेता है। इस प्रकार वे भोग एक पुरुषसे दूसरे पुरुषके पास जाते रहते हैं, एक स्थानपर नहीं ठहरते॥ २४॥"},{"b":14858,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.25"],"text":"कभी-कभी शीत और वायु आदि अनेकों आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखकी स्थितियोंके निवारण करनेमें समर्थ न होनेसे यह अपार चिन्ताओंके कारण उदास हो जाता है॥ २५॥"},{"b":14859,"kind":"hindi_translation","page":634,"verses":["5.14.26"],"text":"क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमन्येभ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात्॥ २६॥"},{"b":14860,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.26"],"text":"कभी परस्पर लेन-देनका व्यवहार करते समय किसी दूसरेका थोड़ा सा—दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानीके कारण उससे वैर ठन जाता है॥ २६॥"},{"b":14861,"kind":"hindi_translation","page":634,"verses":["5.14.27"],"text":"अध्वन्यमुष्मिन्‍निम उपसर्गास्तथा सुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभमात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादयः ॥ २७॥"},{"b":14862,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["5.14.27"],"text":"राजन्! इस मार्गमें पूर्वोक्त विघ्नोंके अतिरिक्त सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा-पिपासा, आधि-व्याधि, जन्म, जरा और मृत्यु आदि और भी अनेकों विघ्न हैं॥ २७॥"},{"b":14863,"kind":"hindi_translation","page":635,"verses":["5.14.28"],"text":"क्‍वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्‍नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुलहृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्माऽपारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति॥ २८॥"},{"b":14864,"kind":"hindi_commentary","page":635,"explains":["5.14.28"],"text":"(इस विघ्नबहुल मार्गमें इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्रीके बाहुपाशमें पड़कर विवेकहीन हो जाता है। तब उसीके लिये विहारभवन आदि बनवानेकी चिन्तामें ग्रस्त रहता है तथा उसीके आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियोंके मीठे-मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओंमें आसक्त होकर, उन्हींमें चित्त फँस जानेसे वह इन्द्रियोंका दास अपार अन्धकारमय नरकोंमें गिरता है॥ २८॥"},{"b":14865,"kind":"hindi_translation","page":635,"verses":["5.14.29","5.14.30","5.14.31"],"text":"कदाचिदीश्‍वरस्य भगवतो विष्णोश्‍चक्रात्परमाण्वादिद्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्‍वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते॥ २९॥ यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरु वञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथावानर जातेः॥ ३०॥ तत्रापि निरवरोधः स्वैरेण विहरन्‍नतिकृपणबुद्धिरन्योन्यमुखनिरीक्षणादिना ग्राम्यकर्मणैव विस्मृतकालावधिः॥ ३१॥"},{"b":14866,"kind":"hindi_commentary","page":635,"explains":["5.14.29","5.14.30","5.14.31"],"text":"कालचक्र साक्षात् भगवान् विष्णुका आयुध है। वह परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त क्षण-घटी आदि अवयवोंसे युक्त है। वह निरन्तर सावधान रहकर घूमता रहता है, जल्दी-जल्दी बदलनेवाली बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ ही उसका वेग हैं। उसके द्वारा वह ब्रह्मासे लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी भूतोंका निरन्तर संहार करता रहता है। कोई भी उसकी गतिमें बाधा नहीं डाल सकता। उससे भय मानकर भी जिनका यह कालचक्र निज आयुध है, उन साक्षात् भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना छोड़कर यह मन्दमति मनुष्य पाखण्डियोंके चक्करमें पड़कर उनके कंक, गिद्ध, बगुला और बटेरके समान आर्यशास्त्रबहिष्कृत देवताओंका आश्रय लेता है—जिनका केवल वेदबाह्य अप्रामाणिक आगमोंने ही उल्लेख किया है॥ २९॥ ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखेमें हैं; जब यह भी उनकी ठगाईमें आकर दुःखी होता है, तब ब्राह्मणोंकी शरण लेता है। किन्तु उपनयन-संस्कारके अनन्तर श्रौत-स्मार्तकर्मोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचारके अनुकूल अपनेमें शुद्धि न होनेके कारण यह कर्मशून्य शूद्रकुलमें प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरोंके समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है॥ ३०॥ वहाँ बिना रोक-टोक स्वच्छन्द विहार करनेसे इसकी बुद्धि अत्यन्त दीन हो जाती है और एक-दूसरेका मुख देखना आदि विषय-भोगोंमें फँसकर इसे अपने मृत्युकालका भी स्मरण नहीं होता॥ ३१॥"},{"b":14867,"kind":"hindi_translation","page":636,"verses":["5.14.32"],"text":"क्‍वचिद् द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः॥ ३२॥"},{"b":14868,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.32"],"text":"वृक्षोंके समान जिनका लौकिक सुख ही फल है—उन घरोंमें ही सुख मानकर वानरोंकी भाँति स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगोंमें ही बिता देता है॥ ३२॥"},{"b":14869,"kind":"hindi_translation","page":636,"verses":["5.14.33","5.14.34","5.14.35"],"text":"एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये॥ ३३॥ क्‍वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते॥ ३४॥ क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥ ३५॥"},{"b":14870,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.33"],"text":"इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गमें पड़कर सुख-दुःख भोगता हुआ यह जीव रोगरूपी गिरि-गुहामें फँसकर उसमें रहनेवाले मृत्युरूप हाथीसे डरता रहता है॥ ३३॥"},{"b":14871,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.34"],"text":"कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकारके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखोंकी निवृत्ति करनेमें जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयोंकी चिन्तासे यह खिन्‍न हो उठता है॥ ३४॥"},{"b":14872,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.35"],"text":"कभी आपसमें क्रय-विक्रय आदि व्यापार करनेपर बहुत कंजूसी करनेसे इसे थोड़ा-सा धन हाथ लग जाता है॥ ३५॥"},{"b":14873,"kind":"hindi_translation","page":636,"verses":["5.14.36"],"text":"क्‍वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोगविहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादानेऽवसितमतिस्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥ ३६॥"},{"b":14874,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.36"],"text":"कभी धन नष्ट हो जानेसे जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदिकी भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलनेसे यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायोंसे पानेका निश्‍चय करता है। इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरोंके हाथसे बहुत अपमानित होना पड़ता है॥ ३६॥"},{"b":14875,"kind":"hindi_translation","page":636,"verses":["5.14.37","5.14.38","5.14.39","5.14.40","5.14.41"],"text":"एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति॥ ३७॥ एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्‍नविपन्‍नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन् बिभ्यद्विवदन् क्रन्दन् संहृष्यन्गायन्‍नह्यमानः साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वनः पारमुपदिशन्ति ॥ ३८॥ यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्‍न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपरतात्मानः समवगच्छन्ति ॥ ३९॥ यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षयः किं तु परं मृधे शयीरन्‍नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धा यां विसृज्य स्वयमुपसंहृताः॥ ४०॥ कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चिन्‍नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरि गतोऽपि॥ ४१॥"},{"b":14876,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.37"],"text":"इस प्रकार धनकी आसक्तिसे परस्पर वैरभाव बढ़ जानेपर भी यह अपनी पूर्ववासनाओंसे विवश होकर आपसमें विवाहादि सम्बन्ध करता और छोड़ता रहता है॥ ३७॥"},{"b":14877,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["5.14.38"],"text":"इस संसारमार्गमें चलनेवाला यह जीव अनेक प्रकारके क्लेश और विघ्न-बाधाओंसे बाधित होनेपर भी मार्गमें जिसपर जहाँ आपत्ति आती है अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है; तथा नये जन्मे हुओंको साथ लगाता है, कभी किसीके लिये शोक करता है, किसीका दुःख देखकर मूर्च्छित हो जाता है, किसीके वियोग होनेकी आशंकासे भयभीत हो उठता है, किसीसे झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती है तो रोने-चिल्लाने लगता है, कहीं कोई मनके अनुकूल बात हो गयी तो प्रसन्‍नताके मारे फूला नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हींके लिये बँधनेमें भी नहीं हिचकता। साधुजन इसके पास कभी नहीं आते, यह साधुसंगसे सदा वंचित रहता है। इस प्रकार यह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है। जहाँसे इसकी यात्रा आरम्भ हुई है और जिसे इस मार्गकी अन्तिम अवधि कहते हैं, उस परमात्माके पास यह अभीतक नहीं लौटा है॥ ३८॥"},{"b":14878,"kind":"hindi_commentary","page":637,"explains":["5.14.39"],"text":"परमात्मातक तो योगशास्त्रकी भी गति नहीं है; जिन्होंने सब प्रकारके दण्ड (शासन)-का त्याग कर दिया है, वे निवृत्तिपरायण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं॥ ३९॥"},{"b":14879,"kind":"hindi_commentary","page":637,"explains":["5.14.40"],"text":"जो दिग्गजोंको जीतनेवाले और बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले राजर्षि हैं उनकी भी वहाँतक गति नहीं है। वे संग्रामभूमिमें शत्रुओंका सामना करके केवल प्राणपरित्याग ही करते हैं तथा जिसमें ‘यह मेरी है’, ऐसा अभिमान करके वैर ठाना था—उस पृथ्वीमें ही अपना शरीर छोड़कर स्वयं परलोकको चले जाते हैं। इस संसारसे वे भी पार नहीं होते॥ ४०॥"},{"b":14880,"kind":"hindi_commentary","page":637,"explains":["5.14.41"],"text":"अपने पुण्यकर्मरूप लताका आश्रय लेकर यदि किसी प्रकार यह जीव इन आपत्तियोंसे अथवा नरकसे छुटकारा पा भी जाता है, तो फिर इसी प्रकार संसारमार्गमें भटकता हुआ इस जनसमुदायमें मिल जाता है। यही दशा स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवालोंकी भी है॥ ४१॥"},{"b":14881,"kind":"hindi_commentary","page":637,"verses":["5.14.42"],"text":"तस्येदमुपगायन्ति—"},{"b":14882,"kind":"sanskrit_shloka","page":637,"verses":["5.14.42"],"text":"आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मनः।"},{"b":14883,"kind":"sanskrit_shloka","page":637,"verses":["5.14.42"],"text":"नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः॥ ४२"},{"b":14884,"kind":"hindi_commentary","page":637,"explains":["5.14.42"],"text":"राजन्! राजर्षि भरतके विषयमें पण्डितजन ऐसा कहते हैं—‘जैसे गरुडजीकी होड़ कोई मक्खी नहीं कर सकती, उसी प्रकार राजर्षि महात्मा भरतके मार्गका कोई अन्य राजा मनसे भी अनुसरण नहीं कर सकता॥ ४२॥"},{"b":14885,"kind":"sanskrit_shloka","page":637,"verses":["5.14.43"],"text":"यो दुस्त्यजान्दारसुतान् सुहृद‍्राज्यं हृदिस्पृशः।"},{"b":14886,"kind":"sanskrit_shloka","page":637,"verses":["5.14.43"],"text":"जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः॥ ४३"},{"b":14887,"kind":"hindi_commentary","page":637,"explains":["5.14.43"],"text":"उन्होंने पुण्यकीर्ति श्रीहरिमें अनुरक्त होकर अति मनोरम स्त्री, पुत्र, मित्र और राज्यादिको युवावस्थामें ही विष्ठाके समान त्याग दिया था; दूसरोंके लिये तो इन्हें त्यागना बहुत ही कठिन है॥ ४३॥"},{"b":14888,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.44"],"text":"यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान्"},{"b":14889,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.44"],"text":"प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्।"},{"b":14890,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.44"],"text":"नैच्छन्‍नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट्-"},{"b":14891,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.44"],"text":"सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः॥ ४४"},{"b":14892,"kind":"hindi_translation","page":638,"explains":["5.14.44"],"text":"उन्होंने अति दुस्त्यज पृथ्वी, पुत्र, स्वजन, सम्पत्ति और स्त्रीकी तथा जिसके लिये बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं किन्तु जो स्वयं उनकी दयादृष्टिके लिये उनपर दृष्टिपात करती रहती थी—उस लक्ष्मीकी भी, लेशमात्र इच्छा नहीं की। यह सब उनके लिये उचित ही था; क्योंकि जिन महानुभावोंका चित्त भगवान् मधुसूदनकी सेवामें अनुरक्त हो गया है, उनकी दृष्टिमें मोक्षपद भी अत्यन्त तुच्छ है॥ ४४॥"},{"b":14893,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.45"],"text":"यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय"},{"b":14894,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.45"],"text":"योगाय सांख्यशिरसे प्रकृतीश्‍वराय।"},{"b":14895,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.45"],"text":"नारायणाय हरये नम इत्युदारं"},{"b":14896,"kind":"sanskrit_shloka","page":638,"verses":["5.14.45"],"text":"हास्यन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार॥ ४५"},{"b":14897,"kind":"hindi_translation","page":638,"explains":["5.14.45"],"text":"उन्होंने मृगशरीर छोड़नेकी इच्छा होनेपर उच्चस्वरसे कहा था कि धर्मकी रक्षा करनेवाले, धर्मानुष्ठानमें निपुण, योगगम्य, सांख्यके प्रतिपाद्य, प्रकृतिके अधीश्‍वर यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरिको नमस्कार है।’॥ ४५॥"},{"b":14898,"kind":"hindi_translation","page":638,"verses":["5.14.46"],"text":"य इदं भागवतसभाजितावदातगुणकर्मणो राजर्षेर्भरतस्यानुचरितं स्वस्त्ययनमायुष्यं धन्यं यशस्यं स्वर्ग्यापवर्ग्यं वानुशृणोति आख्यास्यति अभिनन्दति च सर्वा एवाशिष आत्मन आशास्ते न काञ्चन परत इति॥ ४६॥"},{"b":14899,"kind":"hindi_commentary","page":638,"explains":["5.14.46"],"text":"राजन्! राजर्षि भरतके पवित्र गुण और कर्मोंकी भक्तजन भी प्रशंसा करते हैं। उनका यह चरित्र बड़ा कल्याणकारी, आयु और धनकी वृद्धि करनेवाला, लोकमें सुयश बढ़ानेवाला और अन्तमें स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जो पुरुष इसे सुनता या सुनाता है और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी सारी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं; दूसरोंसे उसे कुछ भी नहीं माँगना पड़ता॥ ४६॥"},{"b":14900,"kind":"hindi_translation","page":638,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतोपाख्याने पारोक्ष्यविवरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥"}],"notes":[{"id":"v1:699","mark":"१","page":630,"after_verse":"5.14.1","text":"प्रा० पा०—पोपशमनां।"},{"id":"v1:700","mark":"१","page":631,"after_verse":"5.14.4","text":"प्रा० पा०—यत्किंचित्साक्षाद्धर्मौप।"},{"id":"v1:701","mark":"२","page":631,"after_verse":"5.14.4","text":"प्रा० पा०—यत् परमपुरुषा०।"},{"id":"v1:702","mark":"३","page":631,"after_verse":"5.14.4","text":"प्रा० पा०—दर्शनस्वादनावघ्राणसङ्कल्प-संव्यवसाय०।"},{"id":"v1:703","mark":"४","page":631,"after_verse":"5.14.4","text":"प्रा० पा०—यथा सार्थिकस्य त०।"},{"id":"v1:704","mark":"५","page":631,"after_verse":"5.14.4","text":"प्रा० पा०—निमिषतो०।"},{"id":"v1:705","mark":"६","page":631,"after_verse":"5.14.5","text":"प्रा० पा०—रतो दंशमशकापसदै०।"},{"id":"v1:706","mark":"१","page":632,"after_verse":"5.14.11","text":"प्रा० पा०—परुषसंरभसाटोपं प्रत्यक्षं वा रिपुराज०।"},{"id":"v1:707","mark":"१","page":633,"after_verse":"5.14.16","text":"प्रा० पा०—मतिर्विदिक्स्रोतःस्वनेन स्खलन०।"},{"id":"v1:708","mark":"२","page":633,"after_verse":"5.14.16","text":"प्रा० पा०—मृत इव।"},{"id":"v1:709","mark":"३","page":633,"after_verse":"5.14.20","text":"प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।"}],"corrections":{"count":9,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}