{"id":"5.19","title":"पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19","part":"पञ्चम स्कन्ध","heading":"अथैकोनविंशोऽध्यायः","topics":["किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 5.19.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[656,661]},"verses":[{"id":"5.19.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/1/","page":656,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसंनिकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैः अविरतभक्तिरुपास्ते॥ १॥"],"iast":["kimpuruṣe varṣe bhagavantamādipuruṣaṃ lakṣmaṇāgrajaṃ sītābhirāmaṃ rāmaṃ taccaraṇasaṃnikarṣābhirataḥ paramabhāgavato hanumān saha kimpuruṣaiḥ aviratabhaktirupāste|| 1||"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! किम्पुरुषवर्षमें श्रीलक्ष्मणजीके बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीरामके चरणोंकी सन्‍निधिके रसिक परम भागवत श्रीहनुमान्जी अन्य किन्‍नरोंके सहित अविचल भक्तिभावसे उनकी उपासना करते हैं॥ १॥"},{"id":"5.19.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/2/","page":656,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आर्ष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति॥ २॥"],"iast":["ārṣṭiṣeṇena saha gandharvairanugīyamānāṃ paramakalyāṇīṃ bhartṛbhagavatkathāṃ samupaśṛṇoti svayaṃ cedaṃ gāyati|| 2||"],"meaning":"वहाँ अन्य गन्धर्वोंके सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् रामकी परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान्जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्रका जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं॥ २॥"},{"id":"5.19.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/3/","page":656,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति॥ ३॥"],"iast":["oṃ namo bhagavate uttamaślokāya nama āryalakṣaṇaśīlavratāya nama upaśikṣitātmana upāsitalokāya namaḥ sādhuvādanikaṣaṇāya namo brahmaṇyadevāya mahāpuruṣāya mahārājāya nama iti|| 3||"],"meaning":"‘हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीरामको नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषोंके लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुताकी परीक्षाके लिये कसौटीके समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज रामको हमारा पुनः-पुनः प्रणाम है’॥ ३॥"},{"id":"5.19.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/4/","page":656,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं","स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम्।","प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं","ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये॥ ४"],"iast":["yattadviśuddhānubhavamātramekaṃ","svatejasā dhvastaguṇavyavastham|","pratyak praśāntaṃ sudhiyopalambhanaṃ","hyanāmarūpaṃ nirahaṃ prapadye|| 4"],"meaning":"‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूपके प्रकाशसे गुणोंके कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओंका निरास करनेवाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धिसे ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूपसे रहित और अहंकारशून्य हैं; मैं आपकी शरणमें हूँ॥ ४॥"},{"id":"5.19.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/5/","page":656,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं","रक्षोवधायैव न केवलं विभोः।","कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः","सीताकृतानि व्यसनानीश्‍वरस्य॥ ५"],"iast":["martyāvatārastviha martyaśikṣaṇaṃ","rakṣovadhāyaiva na kevalaṃ vibhoḥ|","kuto'nyathā syādramataḥ sva ātmanaḥ","sītākṛtāni vyasanānīśvarasya|| 5"],"meaning":"प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसोंके वधके लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्योंको शिक्षा देना है! अन्यथा, अपने स्वरूपमें ही रमण करनेवाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्‍वरको सीताजीके वियोगमें इतना दुःख कैसे हो सकता था॥ ५॥"},{"id":"5.19.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/6/","page":657,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः","सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः।","न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत","न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति॥ ६"],"iast":["na vai sa ātmā''tmavatāṃ suhṛttamaḥ","saktastrilokyāṃ bhagavān vāsudevaḥ|","na strīkṛtaṃ kaśmalamaśnuvīta","na lakṣmaṇaṃ cāpi vihātumarhati|| 6"],"meaning":"आप धीर पुरुषोंके आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकीकी किसी भी वस्तुमें आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजीके लिये मोहको ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजीका त्याग ही कर सकते हैं॥ ६॥"},{"id":"5.19.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/7/","page":657,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न जन्म नूनं महतो न सौभगं","न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः।","तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस-","श्‍चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः॥ ७"],"iast":["na janma nūnaṃ mahato na saubhagaṃ","na vāṅ na buddhirnākṛtistoṣahetuḥ|","tairyadvisṛṣṭānapi no vanaukasa-","ścakāra sakhye bata lakṣmaṇāgrajaḥ|| 7"],"meaning":"आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षाके लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुलमें जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि—इनमेंसे कोई भी गुण आपकी प्रसन्‍नताका कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखानेके लिये ही आपने इन सब गुणोंसे रहित हम वनवासी वानरोंसे मित्रता की है॥ ७॥"},{"id":"5.19.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/8/","page":657,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः","सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम्।","भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं","य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति॥ ८"],"iast":["suro'suro vāpyatha vānaro naraḥ","sarvātmanā yaḥ sukṛtajñamuttamam|","bhajeta rāmaṃ manujākṛtiṃ hariṃ","ya uttarānanayatkosalāndivamiti|| 8"],"meaning":"देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य—कोई भी हो, उसे सब प्रकारसे श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूपमें साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े कियेको भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधामको सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसलवासियोंको भी अपने साथ ही ले गये थे’॥ ८॥"},{"id":"5.19.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/9/","page":657,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भारतेऽपि वर्षे भगवान्‍नरनारायणाख्यआकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्‍वर्योपशमो परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्‍चरति॥ ९॥"],"iast":["bhārate'pi varṣe bhagavānnaranārāyaṇākhyaākalpāntamupacitadharmajñānavairāgyaiśvaryopaśamo paramātmopalambhanamanugrahāyātmavatāmanukampayā tapo'vyaktagatiścarati|| 9||"],"meaning":"भारतवर्षमें भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये अव्यक्तरूपसे कल्पके अन्ततक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, शान्ति और उपरतिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्तमें आत्मस्वरूपकी उपलब्धि हो सकती है॥ ९॥"},{"id":"5.19.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/10/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं भगवान्‍नारदो वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्यां सांख्ययोगाभ्यां भगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्यमाणः परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति॥ १०॥"],"iast":["taṃ bhagavānnārado varṇāśramavatībhirbhāratībhiḥ prajābhirbhagavatproktābhyāṃ sāṃkhyayogābhyāṃ bhagavadanubhāvopavarṇanaṃ sāvarṇerupadekṣyamāṇaḥ paramabhaktibhāvenopasarati idaṃ cābhigṛṇāti|| 10||"],"meaning":"वहाँ भगवान् नारदजी स्वयं श्रीभगवान्‌के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्रके सहित भगवन्महिमाको प्रकट करनेवाले पांचरात्रदर्शनका सावर्णि मुनिको उपदेश करनेके लिये भारतवर्षकी वर्णाश्रम-धर्मावलम्बिनी प्रजाके सहित अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान् श्रीनर-नारायणकी उपासना करते और इस मन्त्रका जप तथा स्तोत्रको गाकर उनकी स्तुति करते हैं॥ १०॥"},{"id":"5.19.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/11/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ॐ नमो भगवते उपशमशीलाय उपरतानात्म्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति॥ ११॥"],"iast":["oṃ namo bhagavate upaśamaśīlāya uparatānātmyāya namo'kiñcanavittāya ṛṣiṛṣabhāya naranārāyaṇāya paramahaṃsaparamagurave ātmārāmādhipataye namo nama iti|| 11||"],"meaning":"—‘ओंकारस्वरूप, अहंकारसे रहित, निर्धनोंके धन, शान्तस्वभाव ऋषिप्रवर भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है। वे परमहंसोंके परम गुरु और आत्मारामोंके अधीश्‍वर हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है॥ ११॥"},{"id":"5.19.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/12/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते","न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः।","द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते","तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे॥ १२"],"iast":["kartāsya sargādiṣu yo na badhyate","na hanyate dehagato'pi daihikaiḥ|","draṣṭurna dṛgyasya guṇairvidūṣyate","tasmai namo'saktaviviktasākṣiṇe|| 12"],"meaning":"‘जो विश्‍वकी उत्पत्ति आदिमें उनके कर्ता होकर भी कर्तृत्वके अभिमानसे नहीं बँधते, शरीरमें रहते हुए भी उसके धर्म भूख-प्यास आदिके वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होनेपर भी जिनकी दृष्टि दृश्यके गुण-दोषोंसे दूषित नहीं होती—उन असंग एवं विशुद्ध साक्षिस्वरूप भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है॥ १२॥"},{"id":"5.19.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/13/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इदं हि योगेश्‍वर योगनैपुणं","हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत्।","यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो","भक्‍त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः॥ १३"],"iast":["idaṃ hi yogeśvara yoganaipuṇaṃ","hiraṇyagarbho bhagavāñjagāda yat|","yadantakāle tvayi nirguṇe mano","bhaktyā dadhītojjhitaduṣkalevaraḥ|| 13"],"meaning":"योगेश्‍वर! हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजीने योगसाधनकी सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकालमें देहाभिमानको छोड़कर भक्तिपूर्वक आपके प्राकृत गुणरहित स्वरूपमें अपना मन लगावे॥ १३॥"},{"id":"5.19.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/14/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः","सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्।","शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद्","यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम्॥ १४"],"iast":["yathaihikāmuṣmikakāmalampaṭaḥ","suteṣu dāreṣu dhaneṣu cintayan|","śaṅketa vidvān kukalevarātyayād","yastasya yatnaḥ śrama eva kevalam|| 14"],"meaning":"लौकिक और पारलौकिक भोगोंके लालची मूढ पुरुष जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करके मौतसे डरते हैं—उसी प्रकार यदि विद्वान्को भी इस निन्दनीय शरीरके छूटनेका भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है॥ १४॥"},{"id":"5.19.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/15/","page":658,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्‍नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां","त्वन्माययाहंममतामधोक्षज ।","भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां","विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति॥ १५"],"iast":["tannaḥ prabho tvaṃ kukalevarārpitāṃ","tvanmāyayāhaṃmamatāmadhokṣaja |","bhindyāma yenāśu vayaṃ sudurbhidāṃ","vidhehi yogaṃ tvayi naḥ svabhāvamiti|| 15"],"meaning":"अतः अधोक्षज! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे कि प्रभो! इस निन्दनीय शरीरमें आपकी मायाके कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता-ममताको हम तुरन्त काट डालें’॥ १५॥"},{"id":"5.19.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/16/","page":659,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भारतेऽप्यस्मिन् वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवो मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभः कूटकः कोल्लकः सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो वेङ्कटो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्‍च सन्त्यसङ्ख्याताः॥ १६॥"],"iast":["bhārate'pyasmin varṣe saricchailāḥ santi bahavo malayo maṅgalaprastho mainākastrikūṭa ṛṣabhaḥ kūṭakaḥ kollakaḥ sahyo devagirir:ṛṣyamūkaḥ śrīśailo veṅkaṭo mahendro vāridhāro vindhyaḥ śuktimānṛkṣagiriḥ pāriyātro droṇaścitrakūṭo govardhano raivatakaḥ kakubho nīlo gokāmukha indrakīlaḥ kāmagiririti cānye ca śatasahasraśaḥ śailāsteṣāṃ nitambaprabhavā nadā nadyaśca santyasaṅkhyātāḥ|| 16||"],"meaning":"राजन्! इस भारतवर्षमें भी बहुत-से पर्वत और नदियाँ हैं—जैसे मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, कोल्लक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, शुक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि आदि। इसी प्रकार और भी सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं। उनके तटप्रान्तोंसे निकलनेवाले नद और नदियाँ भी अगणित हैं॥ १६॥"},{"id":"5.19.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/17/","page":659,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति॥ १७॥"],"iast":["etāsāmapo bhāratyaḥ prajā nāmabhireva punantīnāmātmanā copaspṛśanti|| 17||"],"meaning":"ये नदियाँ अपने नामोंसे ही जीवको पवित्र कर देती हैं और भारतीय प्रजा इन्हींके जलमें स्नानादि करती है॥ १७॥"},{"id":"5.19.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/18/","page":659,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्‍च नदौ महानदी वेदस्मृतिर्ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रूश्‍चन्द्रभागा मरुद‍्वृधा वितस्ता असिक्‍नी विश्वेति महानद्यः॥ १८॥"],"iast":["candravasā tāmraparṇī avaṭodā kṛtamālā vaihāyasī kāverī veṇī payasvinī śarkarāvartā tuṅgabhadrā kṛṣṇā veṇyā bhīmarathī godāvarī nirvindhyā payoṣṇī tāpī revā surasā narmadā carmaṇvatī sindhurandhaḥ śoṇaśca nadau mahānadī vedasmṛtir:ṛṣikulyā trisāmā kauśikī mandākinī yamunā sarasvatī dṛṣadvatī gomatī sarayū rodhasvatī saptavatī suṣomā śatadrūścandrabhāgā marudvṛdhā vitastā asiknī viśveti mahānadyaḥ|| 18||"],"meaning":"उनमेंसे मुख्य-मुख्य नदियाँ ये हैं—चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावर्ता, तुंगभद्रा, कृष्णा, वेण्या, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, पयोष्णी, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती, सिन्धु, अन्ध और शोण नामके नद, महानदी, वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद‍्वृधा, वितस्ता, असिक्‍नी और विश्वा॥ १८॥"},{"id":"5.19.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/19/","page":659,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अस्मिन्‍नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्व्य आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति॥ १९॥"],"iast":["asminneva varṣe puruṣairlabdhajanmabhiḥ śuklalohitakṛṣṇavarṇena svārabdhena karmaṇā divyamānuṣanārakagatayo bahvya ātmana ānupūrvyeṇa sarvā hyeva sarveṣāṃ vidhīyante yathāvarṇavidhānamapavargaścāpi bhavati|| 19||"],"meaning":"इस वर्षमें जन्म लेनेवाले पुरुषोंको ही अपने किये हुए सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके अनुसार क्रमशः नाना प्रकारकी दिव्य, मानुष और नारकी योनियाँ प्राप्त होती हैं; क्योंकि कर्मानुसार सब जीवोंको सभी योनियाँ प्राप्त हो सकती हैं। इसी वर्षमें अपने-अपने वर्णके लिये नियत किये हुए धर्मोंका विधिवत् अनुष्ठान करनेसे मोक्षतककी प्राप्ति हो सकती है॥ १९॥"},{"id":"5.19.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/20/","page":659,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योऽसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने परमात्मनि वासुदेवेऽनन्यनिमित्तभक्तियोगलक्षणो नानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धनद्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसङ्गः॥ २०॥"],"iast":["yo'sau bhagavati sarvabhūtātmanyanātmye'nirukte'nilayane paramātmani vāsudeve'nanyanimittabhaktiyogalakṣaṇo nānāgatinimittāvidyāgranthirandhanadvāreṇa yadā hi mahāpuruṣapuruṣaprasaṅgaḥ|| 20||"],"meaning":"परीक्षित्! सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, रागादि दोषोंसे रहित, अनिर्वचनीय, निराधार परमात्मा भगवान् वासुदेवमें अनन्य एवं अहैतुक भक्तिभाव ही यह मोक्षपद है। यह भक्तिभाव तभी प्राप्त होता है, जब अनेक प्रकारकी गतियोंको प्रकट करनेवाली अविद्यारूप हृदयकी ग्रन्थि कट जानेपर भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका संग मिलता है॥ २०॥"},{"id":"5.19.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/21/","page":660,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतदेव हि देवा गायन्ति—","अहो अमीषां किमकारि शोभनं","प्रसन्‍न एषां स्विदुत स्वयं हरिः।","यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे","मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः॥ २१"],"iast":["etadeva hi devā gāyanti—","aho amīṣāṃ kimakāri śobhanaṃ","prasanna eṣāṃ sviduta svayaṃ hariḥ|","yairjanma labdhaṃ nṛṣu bhāratājire","mukundasevaupayikaṃ spṛhā hi naḥ|| 21"],"meaning":"देवता भी भारतवर्षमें उत्पन्‍न हुए मनुष्योंकी इस प्रकार महिमा गाते हैं—‘अहा! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्‌की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्‍न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो निरन्तर हम भी तरसते रहते हैं॥ २१॥"},{"id":"5.19.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/22/","page":660,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै-","र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना।","न यत्र नारायणपादपङ्कज-","स्मृतिः प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात्॥ २२"],"iast":["kiṃ duṣkarairnaḥ kratubhistapovratai-","rdānādibhirvā dyujayena phalgunā|","na yatra nārāyaṇapādapaṅkaja-","smṛtiḥ pramuṣṭātiśayendriyotsavāt|| 22"],"meaning":"हमें बड़े कठोर यज्ञ, तप, व्रत और दानादि करके जो यह तुच्छ स्वर्गका अधिकार प्राप्त हुआ है—इससे क्या लाभ है? यहाँ तो इन्द्रियोंके भोगोंकी अधिकताके कारण स्मृतिशक्ति छिन जाती है, अतः कभी श्रीनारायणके चरणकमलोंकी स्मृति होती ही नहीं॥ २२॥"},{"id":"5.19.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/23/","page":660,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात्","क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्।","क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः","संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः॥ २३"],"iast":["kalpāyuṣāṃ sthānajayātpunarbhavāt","kṣaṇāyuṣāṃ bhāratabhūjayo varam|","kṣaṇena martyena kṛtaṃ manasvinaḥ","saṃnyasya saṃyāntyabhayaṃ padaṃ hareḥ|| 23"],"meaning":"यह स्वर्ग तो क्या—जहाँके निवासियोंकी एक-एक कल्पकी आयु होती है किन्तु जहाँसे फिर संसारचक्रमें लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादिकी अपेक्षा भी भारतभूमिमें थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्यशरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान्‌को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है॥ २३॥"},{"id":"5.19.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/24/","page":660,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा","न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः।","न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः","सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम्॥ २४"],"iast":["na yatra vaikuṇṭhakathāsudhāpagā","na sādhavo bhāgavatāstadāśrayāḥ|","na yatra yajñeśamakhā mahotsavāḥ","sureśaloko'pi na vai sa sevyatām|| 24"],"meaning":"जहाँ भगवत्कथाकी अमृतमयी सरिता नहीं बहती, जहाँ उसके उद्गमस्थान भगवद्भक्त साधुजन निवास नहीं करते और जहाँ नृत्य-गीतादिके साथ बड़े समारोहसे भगवान् यज्ञपुरुषकी पूजा-अर्चा नहीं की जाती—वह चाहे ब्रह्मलोक ही क्यों न हो, उसका सेवन नहीं करना चाहिये॥ २४॥"},{"id":"5.19.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/25/","page":660,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो","ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।","न वै यतेरन्‍नपुनर्भवाय ते","भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम्॥ २५"],"iast":["prāptā nṛjātiṃ tviha ye ca jantavo","jñānakriyādravyakalāpasambhṛtām |","na vai yaterannapunarbhavāya te","bhūyo vanaukā iva yānti bandhanam|| 25"],"meaning":"जिन जीवोंने इस भारतवर्षमें ज्ञान (विवेकबुद्धि), तदनुकूल कर्म तथा उस कर्मके उपयोगी द्रव्यादि सामग्रीसे सम्पन्‍न मनुष्यजन्म पाया है, वे यदि आवागमनके चक्रसे निकलनेका प्रयत्न नहीं करते, तो व्याधकी फाँसीसे छूटकर भी फलादिके लोभसे उसी वृक्षपर विहार करनेवाले वनवासी पक्षियोंके समान फिर बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ २५॥"},{"id":"5.19.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/26/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यैः श्रद्धया बर्हिषि भागशो हवि-","र्निरुप्तमिष्टं विधिमन्त्रवस्तुतः।","एकः पृथङ्नामभिराहुतो मुदा","गृह्णाति पूर्णः स्वयमाशिषां प्रभुः॥ २६"],"iast":["yaiḥ śraddhayā barhiṣi bhāgaśo havi-","rniruptamiṣṭaṃ vidhimantravastutaḥ|","ekaḥ pṛthaṅnāmabhirāhuto mudā","gṛhṇāti pūrṇaḥ svayamāśiṣāṃ prabhuḥ|| 26"],"meaning":"अहो! इन भारतवासियोंका कैसा सौभाग्य है! जब ये यज्ञमें भिन्‍न-भिन्‍न देवताओंके उद्देश्यसे अलग-अलग भाग रखकर विधि, मन्त्र और द्रव्यादिके योगसे श्रद्धापूर्वक उन्हें हवि प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार इन्द्रादि भिन्‍न-भिन्‍न नामोंसे पुकारे जानेपर सम्पूर्ण कामनाओंके पूर्ण करनेवाले स्वयं पूर्णकाम श्रीहरि ही प्रसन्‍न होकर उस हविको ग्रहण करते हैं॥ २६॥"},{"id":"5.19.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/27/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां","नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः।","स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता-","मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्॥ २७"],"iast":["satyaṃ diśatyarthitamarthito nṛṇāṃ","naivārthado yatpunararthitā yataḥ|","svayaṃ vidhatte bhajatāmanicchatā-","micchāpidhānaṃ nijapādapallavam|| 27"],"meaning":"यह ठीक है कि भगवान् सकाम पुरुषोंके माँगनेपर उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते हैं, किन्तु यह भगवान्का वास्तविक दान नहीं है; क्योंकि उन वस्तुओंको पा लेनेपर भी मनुष्यके मनमें पुनः कामनाएँ होती ही रहती हैं। इसके विपरीत जो उनका निष्कामभावसे भजन करते हैं, उन्हें तो वे साक्षात् अपने चरणकमल ही दे देते हैं—जो अन्य समस्त इच्छाओंको समाप्त कर देनेवाले हैं॥ २७॥"},{"id":"5.19.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/28/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं","स्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम्।","तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्याद्","वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति॥ २८"],"iast":["yadyatra naḥ svargasukhāvaśeṣitaṃ","sviṣṭasya sūktasya kṛtasya śobhanam|","tenājanābhe smṛtimajjanma naḥ syād","varṣe hariryadbhajatāṃ śaṃ tanoti|| 28"],"meaning":"अतः अबतक स्वर्गसुख भोग लेनेके बाद हमारे पूर्वकृत यज्ञ, प्रवचन और शुभ कर्मोंसे यदि कुछ भी पुण्य बचा हो, तो उसके प्रभावसे हमें इस भारतवर्षमें भगवान्‌की स्मृतिसे युक्त मनुष्यजन्म मिले; क्योंकि श्रीहरि अपना भजन करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण करते हैं’॥ २८॥"},{"id":"5.19.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/29/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जम्बूद्वीपस्य च राजन्‍नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भिरुपकल्पितान्॥ २९॥"],"iast":["jambūdvīpasya ca rājannupadvīpānaṣṭau haika upadiśanti sagarātmajairaśvānveṣaṇa imāṃ mahīṃ parito nikhanadbhirupakalpitān|| 29||"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! राजा सगरके पुत्रोंने अपने यज्ञके घोड़ेको ढूँढ़ते हुए इस पृथ्वीको चारों ओरसे खोदा था। उससे जम्बूद्वीपके अन्तर्गत ही आठ उपद्वीप और बन गये, ऐसा कुछ लोगोंका कथन है॥ २९॥"},{"id":"5.19.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/30/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्‍चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणः पाञ्चजन्यः सिंहलो लङ्केति॥ ३०॥"],"iast":["tadyathā svarṇaprasthaścandraśukla āvartano ramaṇako mandarahariṇaḥ pāñcajanyaḥ siṃhalo laṅketi|| 30||"],"meaning":"वे स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण, पांचजन्य, सिंहल और लंका हैं॥ ३०॥"},{"id":"5.19.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/19/31/","page":661,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं तव भारतोत्तम जम्बूद्वीपवर्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति॥ ३१॥"],"iast":["evaṃ tava bhāratottama jambūdvīpavarṣavibhāgo yathopadeśamupavarṇita iti|| 31||"],"meaning":"भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना था, ठीक वैसा ही तुम्हें यह जम्बूद्वीपके वर्षोंका विभाग सुना दिया॥ ३१॥"}],"text":[{"b":15160,"kind":"adhyaya_heading","page":656,"text":"अथैकोनविंशोऽध्यायः"},{"b":15161,"kind":"topic_heading","page":656,"text":"किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन"},{"b":15162,"kind":"hindi_commentary","page":656,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":15163,"kind":"hindi_translation","page":656,"verses":["5.19.1"],"text":"किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसंनिकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैः अविरतभक्तिरुपास्ते॥ १॥"},{"b":15164,"kind":"hindi_commentary","page":656,"explains":["5.19.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! किम्पुरुषवर्षमें श्रीलक्ष्मणजीके बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीरामके चरणोंकी सन्‍निधिके रसिक परम भागवत श्रीहनुमान्जी अन्य किन्‍नरोंके सहित अविचल भक्तिभावसे उनकी उपासना करते हैं॥ १॥"},{"b":15165,"kind":"hindi_translation","page":656,"verses":["5.19.2"],"text":"आर्ष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति॥ २॥"},{"b":15166,"kind":"hindi_commentary","page":656,"explains":["5.19.2"],"text":"वहाँ अन्य गन्धर्वोंके सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् रामकी परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान्जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्रका जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं॥ २॥"},{"b":15167,"kind":"hindi_translation","page":656,"verses":["5.19.3"],"text":"ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति॥ ३॥"},{"b":15168,"kind":"hindi_commentary","page":656,"explains":["5.19.3"],"text":"‘हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीरामको नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषोंके लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुताकी परीक्षाके लिये कसौटीके समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज रामको हमारा पुनः-पुनः प्रणाम है’॥ ३॥"},{"b":15169,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.4"],"text":"यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं"},{"b":15170,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.4"],"text":"स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम्।"},{"b":15171,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.4"],"text":"प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं"},{"b":15172,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.4"],"text":"ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये॥ ४"},{"b":15173,"kind":"hindi_commentary","page":656,"explains":["5.19.4"],"text":"‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूपके प्रकाशसे गुणोंके कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओंका निरास करनेवाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धिसे ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूपसे रहित और अहंकारशून्य हैं; मैं आपकी शरणमें हूँ॥ ४॥"},{"b":15174,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.5"],"text":"मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं"},{"b":15175,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.5"],"text":"रक्षोवधायैव न केवलं विभोः।"},{"b":15176,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.5"],"text":"कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः"},{"b":15177,"kind":"sanskrit_shloka","page":656,"verses":["5.19.5"],"text":"सीताकृतानि व्यसनानीश्‍वरस्य॥ ५"},{"b":15178,"kind":"hindi_commentary","page":656,"explains":["5.19.5"],"text":"प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसोंके वधके लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्योंको शिक्षा देना है! अन्यथा, अपने स्वरूपमें ही रमण करनेवाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्‍वरको सीताजीके वियोगमें इतना दुःख कैसे हो सकता था॥ ५॥"},{"b":15179,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.6"],"text":"न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः"},{"b":15180,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.6"],"text":"सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः।"},{"b":15181,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.6"],"text":"न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत"},{"b":15182,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.6"],"text":"न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति॥ ६"},{"b":15183,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.7"],"text":"न जन्म नूनं महतो न सौभगं"},{"b":15184,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.7"],"text":"न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः।"},{"b":15185,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.7"],"text":"तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस-"},{"b":15186,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.7"],"text":"श्‍चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः॥ ७"},{"b":15187,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.8"],"text":"सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः"},{"b":15188,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.8"],"text":"सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम्।"},{"b":15189,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.8"],"text":"भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं"},{"b":15190,"kind":"sanskrit_shloka","page":657,"verses":["5.19.8"],"text":"य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति॥ ८"},{"b":15191,"kind":"hindi_commentary","page":657,"explains":["5.19.6","5.19.7","5.19.8"],"text":"आप धीर पुरुषोंके आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकीकी किसी भी वस्तुमें आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजीके लिये मोहको ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजीका त्याग ही कर सकते हैं॥ ६॥ आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षाके लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुलमें जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि—इनमेंसे कोई भी गुण आपकी प्रसन्‍नताका कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखानेके लिये ही आपने इन सब गुणोंसे रहित हम वनवासी वानरोंसे मित्रता की है॥ ७॥ देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य—कोई भी हो, उसे सब प्रकारसे श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूपमें साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े कियेको भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधामको सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसलवासियोंको भी अपने साथ ही ले गये थे’॥ ८॥"},{"b":15192,"kind":"hindi_translation","page":657,"verses":["5.19.9"],"text":"भारतेऽपि वर्षे भगवान्‍नरनारायणाख्यआकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्‍वर्योपशमो परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्‍चरति॥ ९॥"},{"b":15193,"kind":"hindi_commentary","page":657,"explains":["5.19.9"],"text":"भारतवर्षमें भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये अव्यक्तरूपसे कल्पके अन्ततक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, शान्ति और उपरतिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्तमें आत्मस्वरूपकी उपलब्धि हो सकती है॥ ९॥"},{"b":15194,"kind":"hindi_translation","page":658,"verses":["5.19.10"],"text":"तं भगवान्‍नारदो वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्यां सांख्ययोगाभ्यां भगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्यमाणः परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति॥ १०॥"},{"b":15195,"kind":"hindi_translation","page":658,"verses":["5.19.11"],"text":"ॐ नमो भगवते उपशमशीलाय उपरतानात्म्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति॥ ११॥"},{"b":15196,"kind":"hindi_commentary","page":658,"text":"गायति चेदम्—"},{"b":15197,"kind":"hindi_commentary","page":658,"explains":["5.19.10","5.19.11"],"text":"वहाँ भगवान् नारदजी स्वयं श्रीभगवान्‌के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्रके सहित भगवन्महिमाको प्रकट करनेवाले पांचरात्रदर्शनका सावर्णि मुनिको उपदेश करनेके लिये भारतवर्षकी वर्णाश्रम-धर्मावलम्बिनी प्रजाके सहित अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान् श्रीनर-नारायणकी उपासना करते और इस मन्त्रका जप तथा स्तोत्रको गाकर उनकी स्तुति करते हैं॥ १०॥—‘ओंकारस्वरूप, अहंकारसे रहित, निर्धनोंके धन, शान्तस्वभाव ऋषिप्रवर भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है। वे परमहंसोंके परम गुरु और आत्मारामोंके अधीश्‍वर हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है॥ ११॥"},{"b":15198,"kind":"hindi_commentary","page":658,"explains":["5.19.11"],"text":"यह गाते हैं—"},{"b":15199,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.12"],"text":"कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते"},{"b":15200,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.12"],"text":"न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः।"},{"b":15201,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.12"],"text":"द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते"},{"b":15202,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.12"],"text":"तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे॥ १२"},{"b":15203,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.13"],"text":"इदं हि योगेश्‍वर योगनैपुणं"},{"b":15204,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.13"],"text":"हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत्।"},{"b":15205,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.13"],"text":"यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो"},{"b":15206,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.13"],"text":"भक्‍त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः॥ १३"},{"b":15207,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.14"],"text":"यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः"},{"b":15208,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.14"],"text":"सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्।"},{"b":15209,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.14"],"text":"शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद्"},{"b":15210,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.14"],"text":"यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम्॥ १४"},{"b":15211,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.15"],"text":"तन्‍नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां"},{"b":15212,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.15"],"text":"त्वन्माययाहंममतामधोक्षज ।"},{"b":15213,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.15"],"text":"भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां"},{"b":15214,"kind":"sanskrit_shloka","page":658,"verses":["5.19.15"],"text":"विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति॥ १५"},{"b":15215,"kind":"hindi_commentary","page":658,"explains":["5.19.12","5.19.13","5.19.14","5.19.15"],"text":"‘जो विश्‍वकी उत्पत्ति आदिमें उनके कर्ता होकर भी कर्तृत्वके अभिमानसे नहीं बँधते, शरीरमें रहते हुए भी उसके धर्म भूख-प्यास आदिके वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होनेपर भी जिनकी दृष्टि दृश्यके गुण-दोषोंसे दूषित नहीं होती—उन असंग एवं विशुद्ध साक्षिस्वरूप भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है॥ १२॥ योगेश्‍वर! हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजीने योगसाधनकी सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकालमें देहाभिमानको छोड़कर भक्तिपूर्वक आपके प्राकृत गुणरहित स्वरूपमें अपना मन लगावे॥ १३॥ लौकिक और पारलौकिक भोगोंके लालची मूढ पुरुष जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करके मौतसे डरते हैं—उसी प्रकार यदि विद्वान्को भी इस निन्दनीय शरीरके छूटनेका भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है॥ १४॥ अतः अधोक्षज! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे कि प्रभो! इस निन्दनीय शरीरमें आपकी मायाके कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता-ममताको हम तुरन्त काट डालें’॥ १५॥"},{"b":15216,"kind":"hindi_translation","page":659,"verses":["5.19.16"],"text":"भारतेऽप्यस्मिन् वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवो मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभः कूटकः कोल्लकः सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो वेङ्कटो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्‍च सन्त्यसङ्ख्याताः॥ १६॥"},{"b":15217,"kind":"hindi_commentary","page":659,"explains":["5.19.16"],"text":"राजन्! इस भारतवर्षमें भी बहुत-से पर्वत और नदियाँ हैं—जैसे मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, कोल्लक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, शुक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि आदि। इसी प्रकार और भी सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं। उनके तटप्रान्तोंसे निकलनेवाले नद और नदियाँ भी अगणित हैं॥ १६॥"},{"b":15218,"kind":"hindi_translation","page":659,"verses":["5.19.17","5.19.18","5.19.19","5.19.20"],"text":"एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति॥ १७॥ चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्‍च नदौ महानदी वेदस्मृतिर्ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रूश्‍चन्द्रभागा मरुद‍्वृधा वितस्ता असिक्‍नी विश्वेति महानद्यः॥ १८॥ अस्मिन्‍नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्व्य आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति॥ १९॥ योऽसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने परमात्मनि वासुदेवेऽनन्यनिमित्तभक्तियोगलक्षणो नानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धनद्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसङ्गः॥ २०॥"},{"b":15219,"kind":"hindi_commentary","page":659,"explains":["5.19.17","5.19.18","5.19.19","5.19.20"],"text":"ये नदियाँ अपने नामोंसे ही जीवको पवित्र कर देती हैं और भारतीय प्रजा इन्हींके जलमें स्नानादि करती है॥ १७॥ उनमेंसे मुख्य-मुख्य नदियाँ ये हैं—चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावर्ता, तुंगभद्रा, कृष्णा, वेण्या, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, पयोष्णी, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती, सिन्धु, अन्ध और शोण नामके नद, महानदी, वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद‍्वृधा, वितस्ता, असिक्‍नी और विश्वा॥ १८॥ इस वर्षमें जन्म लेनेवाले पुरुषोंको ही अपने किये हुए सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके अनुसार क्रमशः नाना प्रकारकी दिव्य, मानुष और नारकी योनियाँ प्राप्त होती हैं; क्योंकि कर्मानुसार सब जीवोंको सभी योनियाँ प्राप्त हो सकती हैं। इसी वर्षमें अपने-अपने वर्णके लिये नियत किये हुए धर्मोंका विधिवत् अनुष्ठान करनेसे मोक्षतककी प्राप्ति हो सकती है॥ १९॥ परीक्षित्! सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, रागादि दोषोंसे रहित, अनिर्वचनीय, निराधार परमात्मा भगवान् वासुदेवमें अनन्य एवं अहैतुक भक्तिभाव ही यह मोक्षपद है। यह भक्तिभाव तभी प्राप्त होता है, जब अनेक प्रकारकी गतियोंको प्रकट करनेवाली अविद्यारूप हृदयकी ग्रन्थि कट जानेपर भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका संग मिलता है॥ २०॥"},{"b":15220,"kind":"hindi_commentary","page":660,"verses":["5.19.21"],"text":"एतदेव हि देवा गायन्ति—"},{"b":15221,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.21"],"text":"अहो अमीषां किमकारि शोभनं"},{"b":15222,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.21"],"text":"प्रसन्‍न एषां स्विदुत स्वयं हरिः।"},{"b":15223,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.21"],"text":"यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे"},{"b":15224,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.21"],"text":"मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः॥ २१"},{"b":15225,"kind":"hindi_commentary","page":660,"explains":["5.19.21"],"text":"देवता भी भारतवर्षमें उत्पन्‍न हुए मनुष्योंकी इस प्रकार महिमा गाते हैं—‘अहा! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्‌की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्‍न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो निरन्तर हम भी तरसते रहते हैं॥ २१॥"},{"b":15226,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.22"],"text":"किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै-"},{"b":15227,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.22"],"text":"र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना।"},{"b":15228,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.22"],"text":"न यत्र नारायणपादपङ्कज-"},{"b":15229,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.22"],"text":"स्मृतिः प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात्॥ २२"},{"b":15230,"kind":"hindi_commentary","page":660,"explains":["5.19.22"],"text":"हमें बड़े कठोर यज्ञ, तप, व्रत और दानादि करके जो यह तुच्छ स्वर्गका अधिकार प्राप्त हुआ है—इससे क्या लाभ है? यहाँ तो इन्द्रियोंके भोगोंकी अधिकताके कारण स्मृतिशक्ति छिन जाती है, अतः कभी श्रीनारायणके चरणकमलोंकी स्मृति होती ही नहीं॥ २२॥"},{"b":15231,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.23"],"text":"कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात्"},{"b":15232,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.23"],"text":"क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्।"},{"b":15233,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.23"],"text":"क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः"},{"b":15234,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.23"],"text":"संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः॥ २३"},{"b":15235,"kind":"hindi_commentary","page":660,"explains":["5.19.23"],"text":"यह स्वर्ग तो क्या—जहाँके निवासियोंकी एक-एक कल्पकी आयु होती है किन्तु जहाँसे फिर संसारचक्रमें लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादिकी अपेक्षा भी भारतभूमिमें थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्यशरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान्‌को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है॥ २३॥"},{"b":15236,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.24"],"text":"न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा"},{"b":15237,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.24"],"text":"न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः।"},{"b":15238,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.24"],"text":"न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः"},{"b":15239,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.24"],"text":"सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम्॥ २४"},{"b":15240,"kind":"hindi_commentary","page":660,"explains":["5.19.24"],"text":"जहाँ भगवत्कथाकी अमृतमयी सरिता नहीं बहती, जहाँ उसके उद्गमस्थान भगवद्भक्त साधुजन निवास नहीं करते और जहाँ नृत्य-गीतादिके साथ बड़े समारोहसे भगवान् यज्ञपुरुषकी पूजा-अर्चा नहीं की जाती—वह चाहे ब्रह्मलोक ही क्यों न हो, उसका सेवन नहीं करना चाहिये॥ २४॥"},{"b":15241,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.25"],"text":"प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो"},{"b":15242,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.25"],"text":"ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।"},{"b":15243,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.25"],"text":"न वै यतेरन्‍नपुनर्भवाय ते"},{"b":15244,"kind":"sanskrit_shloka","page":660,"verses":["5.19.25"],"text":"भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम्॥ २५"},{"b":15245,"kind":"hindi_commentary","page":660,"explains":["5.19.25"],"text":"जिन जीवोंने इस भारतवर्षमें ज्ञान (विवेकबुद्धि), तदनुकूल कर्म तथा उस कर्मके उपयोगी द्रव्यादि सामग्रीसे सम्पन्‍न मनुष्यजन्म पाया है, वे यदि आवागमनके चक्रसे निकलनेका प्रयत्न नहीं करते, तो व्याधकी फाँसीसे छूटकर भी फलादिके लोभसे उसी वृक्षपर विहार करनेवाले वनवासी पक्षियोंके समान फिर बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ २५॥"},{"b":15246,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.26"],"text":"यैः श्रद्धया बर्हिषि भागशो हवि-"},{"b":15247,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.26"],"text":"र्निरुप्तमिष्टं विधिमन्त्रवस्तुतः।"},{"b":15248,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.26"],"text":"एकः पृथङ्नामभिराहुतो मुदा"},{"b":15249,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.26"],"text":"गृह्णाति पूर्णः स्वयमाशिषां प्रभुः॥ २६"},{"b":15250,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.27"],"text":"सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां"},{"b":15251,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.27"],"text":"नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः।"},{"b":15252,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.27"],"text":"स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता-"},{"b":15253,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.27"],"text":"मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्॥ २७"},{"b":15254,"kind":"hindi_commentary","page":661,"explains":["5.19.26","5.19.27"],"text":"अहो! इन भारतवासियोंका कैसा सौभाग्य है! जब ये यज्ञमें भिन्‍न-भिन्‍न देवताओंके उद्देश्यसे अलग-अलग भाग रखकर विधि, मन्त्र और द्रव्यादिके योगसे श्रद्धापूर्वक उन्हें हवि प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार इन्द्रादि भिन्‍न-भिन्‍न नामोंसे पुकारे जानेपर सम्पूर्ण कामनाओंके पूर्ण करनेवाले स्वयं पूर्णकाम श्रीहरि ही प्रसन्‍न होकर उस हविको ग्रहण करते हैं॥ २६॥ यह ठीक है कि भगवान् सकाम पुरुषोंके माँगनेपर उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते हैं, किन्तु यह भगवान्का वास्तविक दान नहीं है; क्योंकि उन वस्तुओंको पा लेनेपर भी मनुष्यके मनमें पुनः कामनाएँ होती ही रहती हैं। इसके विपरीत जो उनका निष्कामभावसे भजन करते हैं, उन्हें तो वे साक्षात् अपने चरणकमल ही दे देते हैं—जो अन्य समस्त इच्छाओंको समाप्त कर देनेवाले हैं॥ २७॥"},{"b":15255,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.28"],"text":"यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं"},{"b":15256,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.28"],"text":"स्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम्।"},{"b":15257,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.28"],"text":"तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्याद्"},{"b":15258,"kind":"sanskrit_shloka","page":661,"verses":["5.19.28"],"text":"वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति॥ २८"},{"b":15259,"kind":"hindi_commentary","page":661,"explains":["5.19.28"],"text":"अतः अबतक स्वर्गसुख भोग लेनेके बाद हमारे पूर्वकृत यज्ञ, प्रवचन और शुभ कर्मोंसे यदि कुछ भी पुण्य बचा हो, तो उसके प्रभावसे हमें इस भारतवर्षमें भगवान्‌की स्मृतिसे युक्त मनुष्यजन्म मिले; क्योंकि श्रीहरि अपना भजन करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण करते हैं’॥ २८॥"},{"b":15260,"kind":"topic_heading","page":661,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":15261,"kind":"hindi_translation","page":661,"verses":["5.19.29","5.19.30","5.19.31"],"text":"जम्बूद्वीपस्य च राजन्‍नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भिरुपकल्पितान्॥ २९॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्‍चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणः पाञ्चजन्यः सिंहलो लङ्केति॥ ३०॥ एवं तव भारतोत्तम जम्बूद्वीपवर्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति॥ ३१॥"},{"b":15262,"kind":"hindi_commentary","page":661,"explains":["5.19.29","5.19.30","5.19.31"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! राजा सगरके पुत्रोंने अपने यज्ञके घोड़ेको ढूँढ़ते हुए इस पृथ्वीको चारों ओरसे खोदा था। उससे जम्बूद्वीपके अन्तर्गत ही आठ उपद्वीप और बन गये, ऐसा कुछ लोगोंका कथन है॥ २९॥ वे स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण, पांचजन्य, सिंहल और लंका हैं॥ ३०॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना था, ठीक वैसा ही तुम्हें यह जम्बूद्वीपके वर्षोंका विभाग सुना दिया॥ ३१॥"},{"b":15263,"kind":"hindi_translation","page":661,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥"}],"notes":[{"id":"v1:721","mark":"१","page":656,"after_verse":"5.19.3","text":"प्रा० पा०—वादधिषणाय।"},{"id":"v1:722","mark":"१","page":657,"after_verse":"5.19.7","text":"प्रा० पा०—सृष्टान्विपिने।"},{"id":"v1:723","mark":"*","page":657,"after_verse":"5.19.8","text":"यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभीके आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् (धीर) पुरुषोंके ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूपसे अनुभव करते हैं—अन्य पुरुष नहीं। श्रुतिमें जहाँ-कहीं आत्मसाक्षात्कारकी बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ताके लिये ‘धीर’ शब्दका प्रयोग किया है। जैसे ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत’ इति ‘नः शुश्रुम धीराणाम्’ इत्यादि। इसीलिये यहाँ भी भगवान्‌को आत्मवान् या धीर पुरुषका आत्मा बताया है।"},{"id":"v1:724","mark":"†","page":657,"after_verse":"5.19.8","text":"एक बार भगवान् श्रीराम एकान्तमें एक देवदूतसे बात कर रहे थे। उस समय लक्ष्मणजी पहरेपर थे और भगवान्‌की आज्ञा थी कि यदि इस समय कोई भीतर आवेगा तो वह मेरे हाथसे मारा जायगा। इतनेमें ही दुर्वासा मुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मणजीको अपने आनेकी सूचना देनेके लिये भीतर जानेको विवश किया। इससे अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् बड़े असमंजसमें पड़ गये। तब वसिष्ठजीने कहा कि लक्ष्मणजीके प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजनका त्याग मृत्युदण्डके समान ही है। इसीसे भगवान्‌ने उन्हें त्याग दिया।"},{"id":"v1:725","mark":"१","page":658,"after_verse":"5.19.11","text":"प्रा० पा०—परमगुरुवरायात्मारामा०।"},{"id":"v1:726","mark":"१","page":659,"after_verse":"5.19.16","text":"प्रा० पा०—कोल्लः।"},{"id":"v1:727","mark":"२","page":659,"after_verse":"5.19.16","text":"प्रा० पा०—कोकामुखः।"},{"id":"v1:728","mark":"१","page":660,"after_verse":"5.19.21","text":"प्रा० पा०—तेऽजिरे।"},{"id":"v1:729","mark":"२","page":660,"after_verse":"5.19.25","text":"प्रा० पा०—चेद्।"},{"id":"v1:730","mark":"१","page":661,"after_verse":"5.19.28","text":"प्रा० पा०—सृज्यसुखा०।"},{"id":"v1:731","mark":"२","page":661,"after_verse":"5.19.31","text":"प्रा० पा०—मन्दहरिणो।"}],"corrections":{"count":13,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}