{"id":"5.8","title":"पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8","part":"पञ्चम स्कन्ध","heading":"अथाष्टमोऽध्यायः","topics":["भरतजीका मृगके मोहमें फँसकर मृगयोनिमें जन्म लेना"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[606,610]},"verses":[{"id":"5.8.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/1/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश॥ १॥"],"iast":["ekadā tu mahānadyāṃ kṛtābhiṣekanaiyamikāvaśyako brahmākṣaramabhigṛṇāno muhūrtatrayamudakānta upaviveśa|| 1||"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे॥ १॥"},{"id":"5.8.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/2/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २॥"],"iast":["tatra tadā rājan hariṇī pipāsayā jalāśayābhyāśamekaivopajagāma || 2||"],"meaning":"राजन्! इसी समय एक हरिनी प्याससे व्याकुल हो जल पीनेके लिये अकेली ही उस नदीके तीरपर आयी॥ २॥"},{"id":"5.8.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/3/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्‍नादो लोकभयङ्कर उदपतत्॥ ३॥"],"iast":["tayā pepīyamāna udake tāvadevāvidūreṇa nadato mṛgapaterunnādo lokabhayaṅkara udapatat|| 3||"],"meaning":"अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी॥ ३॥"},{"id":"5.8.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/4/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम॥ ४॥"],"iast":["tamupaśrutya sā mṛgavadhūḥ prakṛtiviklavā cakitanirīkṣaṇā sutarāmapi haribhayābhiniveśavyagrahṛdayā pāriplavadṛṣṭiragatatṛṣā bhayāt sahasaivoccakrāma|| 4||"],"meaning":"हरिनजाति तो स्वभावसे ही डरपोक होती है। वह पहले ही चौकन्‍नी होकर इधर-उधर देखती जाती थी। अब ज्यों ही उसके कानमें वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंहके डरके मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गये। प्यास अभी बुझी न थी, किन्तु अब तो प्राणोंपर आ बनी थी। इसलिये उसने भयवश एकाकी नदी पार करनेके लिये छलाँग मारी॥ ४॥"},{"id":"5.8.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/5/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात॥ ५॥"],"iast":["tasyā utpatantyā antarvatnyā urubhayāvagalito yoninirgato garbhaḥ srotasi nipapāta|| 5||"],"meaning":"उसके पेटमें गर्भ था, अतः उछलते समय अत्यन्त भयके कारण उसका गर्भ अपने स्थानसे हटकर योनिद्वारसे निकलकर नदीके प्रवाहमें गिर गया॥ ५॥"},{"id":"5.8.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/6/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्प्रसवोत्सर्पणभयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार॥ ६॥"],"iast":["tatprasavotsarpaṇabhayakhedāturā svagaṇena viyujyamānā kasyāñciddaryāṃ kṛṣṇasārasatī nipapātātha ca mamāra|| 6||"],"meaning":"वह कृष्णमृगपत्नी अकस्मात् गर्भके गिर जाने, लम्बी छलाँग मारने तथा सिंहसे डरी होनेके कारण बहुत पीड़ित हो गयी थी। अब अपने झुंडसे भी उसका बिछोह हो गया, इसलिये वह किसी गुफामें जा पड़ी और वहीं मर गयी॥ ६॥"},{"id":"5.8.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/7/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभिवीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिर्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥ ७॥"],"iast":["taṃ tveṇakuṇakaṃ kṛpaṇaṃ srotasānūhyamānamabhivīkṣyāpaviddhaṃ bandhurivānukampayā rājarṣirbharata ādāya mṛtamātaramityāśramapadamanayat || 7||"],"meaning":"राजर्षि भरतने देखा कि बेचारा हरिनीका बच्चा अपने बन्धुओंसे बिछुड़कर नदीके प्रवाहमें बह रहा है। इससे उन्हें उसपर बड़ी दया आयी और वे आत्मीयके समान उस मातृहीन बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये॥ ७॥"},{"id":"5.8.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/8/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य ह वा एणकुणक उच्चैरेतस्मिन् कृतनिजाभिमानस्य अहरहस्तत्पोषणपालनलालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमाः सहयमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन्॥ ८॥"],"iast":["tasya ha vā eṇakuṇaka uccairetasmin kṛtanijābhimānasya aharahastatpoṣaṇapālanalālanaprīṇanānudhyānenātmaniyamāḥ sahayamāḥ puruṣaparicaryādaya ekaikaśaḥ katipayenāhargaṇena viyujyamānāḥ kila sarva evodavasan|| 8||"],"meaning":"उस मृगछौनेके प्रति भरतजीकी ममता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। वे नित्य उसके खाने-पीनेका प्रबन्ध करने, व्याघ्रादिसे बचाने, लाड़ लड़ाने और पुचकारने आदिकी चिन्तामें ही डूबे रहने लगे। कुछ ही दिनोंमें उनके यम, नियम और भगवत्पूजा आदि आवश्यक कृत्य एक-एक करके छूटने लगे और अन्तमें सभी छूट गये॥ ८॥"},{"id":"5.8.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/9/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्‍वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद‍्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा॥ ९॥"],"iast":["aho batāyaṃ hariṇakuṇakaḥ kṛpaṇa īśvararathacaraṇaparibhramaṇarayeṇa svagaṇasuhṛdbandhubhyaḥ parivarjitaḥ śaraṇaṃ ca mopasādito māmeva mātāpitarau bhrātṛjñātīn yauthikāṃścaivopeyāya nānyaṃ kañcana veda mayyativisrabdhaścāta eva mayā matparāyaṇasya poṣaṇapālanaprīṇanalālanamanasūyunānuṣṭheyaṃ śaraṇyopekṣādoṣaviduṣā|| 9||"],"meaning":"उन्हें ऐसा विचार रहने लगा—‘अहो! कैसे खेदकी बात है! इस बेचारे दीन मृगछौनेको कालचक्रके वेगने अपने झुंड, सुहृद‍् और बन्धुओंसे दूर करके मेरी शरणमें पहुँचा दिया है। यह मुझे ही अपना माता-पिता, भाई-बन्धु और यूथके साथी-संगी समझता है। इसे मेरे सिवा और किसीका पता नहीं है और मुझमें इसका विश्वास भी बहुत है। मैं भी शरणागतकी उपेक्षा करनेमें जो दोष हैं, उन्हें जानता हूँ। इसलिये मुझे अब अपने इस आश्रितका सब प्रकारकी दोषबुद्धि छोड़कर अच्छी तरह पालन-पोषण और प्यार-दुलार करना चाहिये॥ ९॥"},{"id":"5.8.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/10/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद‍् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते॥ १०॥"],"iast":["nūnaṃ hyāryāḥ sādhava upaśamaśīlāḥ kṛpaṇasuhṛd evaṃvidhārthe svārthānapi gurutarānupekṣante|| 10||"],"meaning":"निश्‍चय ही शान्तस्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थकी भी परवा नहीं करते’॥ १०॥"},{"id":"5.8.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/11/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥"],"iast":["iti kṛtānuṣaṅga āsanaśayanāṭanasthānāśanādiṣu saha mṛgajahunā snehānubaddhahṛdaya āsīt || 11||"],"meaning":"इस प्रकार उस हरिनके बच्चेमें आसक्ति बढ़ जानेसे बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाशमें बँधा रहता था॥ ११॥"},{"id":"5.8.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/12/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति॥ १२॥"],"iast":["kuśakusumasamitpalāśaphalamūlodakānyāhariṣyamāṇo vṛkasālāvṛkādibhyo bhayamāśaṃsamāno yadā saha hariṇakuṇakena vanaṃ samāviśati|| 12||"],"meaning":"जब उन्हें कुश, पुष्प, समिधा, पत्र और फल-मूलादि लाने होते तो भेड़ियों और कुत्तोंके भयसे उसे वे साथ लेकर ही वनमें जाते॥ १२॥"},{"id":"5.8.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/13/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥"],"iast":["pathiṣu ca mugdhabhāvena tatra tatra viṣaktamatipraṇayabharahṛdayaḥ kārpaṇyātskandhenodvahati evamutsaṅga urasi cādhāyopalālayanmudaṃ paramāmavāpa|| 13||"],"meaning":"मार्गमें जहाँ-तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता॥ १३॥"},{"id":"5.8.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/14/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥"],"iast":["kriyāyāṃ nirvartyamānāyāmantarāle'pyutthāyotthāya yadainamabhicakṣīta tarhi vāva sa varṣapatiḥ prakṛtisthena manasā tasmā āśiṣa āśāste svasti stādvatsa te sarvata iti|| 14||"],"meaning":"नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करते समय भी राजराजेश्‍वर भरत बीच-बीचमें उठ-उठकर उस मृगबालकको देखते और जब उसपर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्तको शान्ति मिलती। उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते—‘बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो’॥ १४॥"},{"id":"5.8.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/15/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपणः सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणकविरहविह्वलहृदयसन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच॥ १५॥"],"iast":["anyadā bhṛśamudvignamanā naṣṭadraviṇa iva kṛpaṇaḥ sakaruṇamatitarṣeṇa hariṇakuṇakavirahavihvalahṛdayasantāpastamevānuśocan kila kaśmalaṃ mahadabhirambhita iti hovāca|| 15||"],"meaning":"कभी यदि वह दिखायी न देता तो जिसका धन लुट गया हो, उस दीन मनुष्यके समान उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो जाता और फिर वे उस हरिनीके बच्चेके विरहसे व्याकुल एवं सन्तप्त हो करुणावश अत्यन्त उत्कण्ठित एवं मोहाविष्ट हो जाते तथा शोकमग्न होकर इस प्रकार कहने लगते॥ १५॥"},{"id":"5.8.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/16/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति॥ १६॥"],"iast":["api bata sa vai kṛpaṇa eṇabālako mṛtahariṇīsuto'ho mamānāryasya śaṭhakirātamaterakṛtasukṛtasya kṛtavisrambha ātmapratyayena tadavigaṇayan sujana ivāgamiṣyati|| 16||"],"meaning":"‘अहो! क्या कहा जाय? क्या वह मातृहीन दीन मृगशावक दुष्ट बहेलियेकी-सी बुद्धिवाले मुझ पुण्यहीन अनार्यका विश्वास करके और मुझे अपना मानकर मेरे किये हुए अपराधोंको सत्पुरुषोंके समान भूलकर फिर लौट आयेगा?॥ १६॥"},{"id":"5.8.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/17/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपि क्षेमेणास्मिन्‍नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि॥ १७॥"],"iast":["api kṣemeṇāsminnāśramopavane śaṣpāṇi carantaṃ devaguptaṃ drakṣyāmi|| 17||"],"meaning":"क्या मैं उसे फिर इस आश्रमके उपवनमें भगवान्‌की कृपासे सुरक्षित रहकर निर्विघ्न हरी-हरी दूब चरते देखूँगा?॥ १७॥"},{"id":"5.8.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/18/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति॥ १८॥"],"iast":["api ca na vṛkaḥ sālāvṛko'nyatamo vā naikacara ekacaro vā bhakṣayati|| 18||"],"meaning":"ऐसा न हो कि कोई भेड़िया, कुत्ता, गोल बाँधकर विचरनेवाले सूकरादि अथवा अकेले घूमनेवाले व्याघ्रादि ही उसे खा जायँ॥ १८॥"},{"id":"5.8.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/19/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत‍्क्षेमोदयस्त्रय्यात्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति॥ १९॥"],"iast":["nimlocati ha bhagavān sakalajagatkṣemodayastrayyātmādyāpi mama na mṛgavadhūnyāsa āgacchati|| 19||"],"meaning":"अरे! सम्पूर्ण जगत‍्की कुशलके लिये प्रकट होनेवाले वेदत्रयीरूप भगवान् सूर्य अस्त होना चाहते हैं; किन्तु अभीतक वह मृगीकी धरोहर लौटकर नहीं आयी!॥ १९॥"},{"id":"5.8.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/20/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन्॥ २०॥"],"iast":["apisvidakṛtasukṛtamāgatya māṃ sukhayiṣyati hariṇarājakumāro vividharuciradarśanīyanijamṛgadārakavinodairasantoṣaṃ svānāmapanudan|| 20||"],"meaning":"क्या वह हरिणराजकुमार मुझ पुण्यहीनके पास आकर अपनी भाँति-भाँतिकी मृगशावकोचित मनोहर एवं दर्शनीय क्रीडाओंसे अपने स्वजनोंका शोक दूर करते हुए मुझे आनन्दित करेगा?॥ २०॥"},{"id":"5.8.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/21/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्ष्वेलिकायां मां मृषासमाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति॥ २१॥"],"iast":["kṣvelikāyāṃ māṃ mṛṣāsamādhinā''mīlitadṛśaṃ premasaṃrambheṇa cakitacakita āgatya pṛṣadaparuṣaviṣāṇāgreṇa luṭhati|| 21||"],"meaning":"अहो! जब कभी मैं प्रणयकोपसे खेलमें झूठ-मूठ समाधिके बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्तसे मेरे पास आकर जलबिन्दुके समान कोमल और नन्हें-नन्हें सींगोंकी नोकसे किस प्रकार मेरे अंगोंको खुजलाने लगता था॥ २१॥"},{"id":"5.8.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/22/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवद् अवहितकरणकलाप आस्ते॥ २२॥"],"iast":["āsāditahaviṣi barhiṣi dūṣite mayopālabdho bhītabhītaḥ sapadyuparatarāsa ṛṣikumāravad avahitakaraṇakalāpa āste|| 22||"],"meaning":"मैं कभी कुशोंपर हवनसामग्री रख देता और वह उन्हें दाँतोंसे खींचकर अपवित्र कर देता तो मेरे डाँटने-डपटनेपर वह अत्यन्त भयभीत होकर उसी समय सारी उछल-कूद छोड़ देता और ऋषिकुमारके समान अपनी समस्त इन्द्रियोंको रोककर चुपचाप बैठ जाता था’॥ २२॥"},{"id":"5.8.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/23/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसुभगशिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविणविधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति॥ २३॥"],"iast":["kiṃ vā are ācaritaṃ tapastapasvinyānayā yadiyamavaniḥ savinayakṛṣṇasāratanayatanutarasubhagaśivatamākharakhurapadapaṅktibhirdraviṇavidhurāturasya kṛpaṇasya mama draviṇapadavīṃ sūcayantyātmānaṃ ca sarvataḥ kṛtakautukaṃ dvijānāṃ svargāpavargakāmānāṃ devayajanaṃ karoti|| 23||"],"meaning":"[फिर पृथ्वीपर उस मृगशावकके खुरके चिह्न देखकर कहने लगते—] ‘अहो! इस तपस्विनी धरतीने ऐसा कौन-सा तप किया है जो उस अतिविनीत कृष्णसारकिशोरके छोटे-छोटे सुन्दर, सुखकारी और सुकोमल खुरोंवाले चरणोंके चिह्नोंसे मुझे, जो मैं अपना मृगधन लुट जानेसे अत्यन्त व्याकुल और दीन हो रहा हूँ, उस द्रव्यकी प्राप्तिका मार्ग दिखा रही है और स्वयं अपने शरीरको भी सर्वत्र उन पदचिह्नोंसे विभूषित कर स्वर्ग और अपवर्गके इच्छुक द्विजोंके लिये यज्ञस्थल बना रही है॥ २३॥"},{"id":"5.8.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/24/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपिस्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभयान्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पया कृपणजनवत्सलः परिपाति॥ २४॥"],"iast":["apisvidasau bhagavānuḍupatirenaṃ mṛgapatibhayānmṛtamātaraṃ mṛgabālakaṃ svāśramaparibhraṣṭamanukampayā kṛpaṇajanavatsalaḥ paripāti|| 24||"],"meaning":"(चन्द्रमामें मृगका-सा श्याम चिह्न देख उसे अपना ही मृग मानकर कहने लगते—) ‘अहो! जिसकी माता सिंहके भयसे मर गयी थी, आज वही मृगशिशु अपने आश्रमसे बिछुड़ गया है। अतः उसे अनाथ देखकर क्या ये दीनवत्सल भगवान् नक्षत्रनाथ दयावश उसकी रक्षा कर रहे हैं?॥ २४॥"},{"id":"5.8.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/25/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं वाऽऽत्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणितनिजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभिः स्वधयतीति च॥ २५॥"],"iast":["kiṃ vā''tmajaviśleṣajvaradavadahanaśikhābhirupatapyamānahṛdayasthalanalinīkaṃ māmupasṛtamṛgītanayaṃ śiśiraśāntānurāgaguṇitanijavadanasalilāmṛtamayagabhastibhiḥ svadhayatīti ca|| 25||"],"meaning":"[फिर उसकी शीतल किरणोंसे आह्लादित होकर कहने लगते—] ‘अथवा अपने पुत्रोंके वियोगरूप दावानलकी विषम ज्वालासे हृदयकमल दग्ध हो जानेके कारण मैंने एक मृगबालकका सहारा लिया था। अब उसके चले जानेसे फिर मेरा हृदय जलने लगा है; इसलिये ये अपनी शीतल, शान्त, स्नेहपूर्ण और वदनसलिलरूपा अमृतमयी किरणोंसे मुझे शान्त कर रहे हैं’॥ २५॥"},{"id":"5.8.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/26/","page":609,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्‍निःश्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगारम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत॥ २६॥"],"iast":["evamaghaṭamānamanorathākulahṛdayo mṛgadārakābhāsena svārabdhakarmaṇā yogārambhaṇato vibhraṃśitaḥ sa yogatāpaso bhagavadārādhanalakṣaṇācca kathamitarathā jātyantara eṇakuṇaka āsaṅgaḥ sākṣānniḥśreyasapratipakṣatayā prākparityaktadustyajahṛdayābhijātasya tasyaivamantarāyavihatayogārambhaṇasya rājarṣerbharatasya tāvanmṛgārbhakapoṣaṇapālanaprīṇanalālanānuṣaṅgeṇāvigaṇayata ātmānamahirivākhubilaṃ duratikramaḥ kālaḥ karālarabhasa āpadyata|| 26||"],"meaning":"राजन्! इस प्रकार जिनका पूरा होना सर्वथा असम्भव था, उन विविध मनोरथोंसे भरतका चित्त व्याकुल रहने लगा। अपने मृगशावकके रूपमें प्रतीत होनेवाले प्रारब्धकर्मके कारण तपस्वी भरतजी भगवदाराधनरूप कर्म एवं योगानुष्ठानसे च्युत हो गये। नहीं तो, जिन्होंने मोक्षमार्गमें साक्षात् विघ्नरूप समझकर अपने ही हृदयसे उत्पन्‍न दुस्त्यज पुत्रादिको भी त्याग दिया था, उन्हींकी अन्यजातीय हरिणशिशुमें ऐसी आसक्ति कैसे हो सकती थी। इस प्रकार राजर्षि भरत विघ्नोंके वशीभूत होकर योगसाधनसे भ्रष्ट हो गये और उस मृगछौनेके पालन-पोषण और लाड़-प्यारमें ही लगे रहकर आत्मस्वरूपको भूल गये। इसी समय जिसका टलना अत्यन्त कठिन है, वह प्रबल वेगशाली कराल काल, चूहेके बिलमें जैसे सर्प घुस आये, उसी प्रकार उनके सिरपर चढ़ आया॥ २६॥"},{"id":"5.8.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/27/","page":609,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्तम् अभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७॥"],"iast":["tadānīmapi pārśvavartinamātmajamivānuśocantam abhivīkṣamāṇo mṛga evābhiniveśitamanā visṛjya lokamimaṃ saha mṛgeṇa kalevaraṃ mṛtamanu na mṛtajanmānusmṛtiritaravanmṛgaśarīramavāpa || 27||"],"meaning":"उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा पुत्रके समान शोकातुर हो रहा था। वे उसे इस स्थितिमें देख रहे थे और उनका चित्त उसीमें लग रहा था। इस प्रकारकी आसक्तिमें ही मृगके साथ उनका शरीर भी छूट गया। तदनन्तर उन्हें अन्तकालकी भावनाके अनुसार अन्य साधारण पुरुषोंके समान मृगशरीर ही मिला। किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट नहीं हुई॥ २७॥"},{"id":"5.8.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/28/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनुतप्यमान आह ॥ २८॥"],"iast":["tatrāpi ha vā ātmano mṛgatvakāraṇaṃ bhagavadārādhanasamīhānubhāvenānusmṛtya bhṛśamanutapyamāna āha || 28||"],"meaning":"उस योनिमें भी पूर्वजन्मकी भगवदाराधनाके प्रभावसे अपने मृगरूप होनेका कारण जानकर वे अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे,॥ २८॥"},{"id":"5.8.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/29/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो कष्टं भ्रष्टोऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्तसमस्तसङ्गस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनि सर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणाभियोगेनाशून्यसकलयामेन कालेन समावेशितं समाहितं कार्त्स्न्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनुपरिसुस्राव॥ २९॥"],"iast":["aho kaṣṭaṃ bhraṣṭo'hamātmavatāmanupathādyadvimuktasamastasaṅgasya viviktapuṇyāraṇyaśaraṇasyātmavata ātmani sarveṣāmātmanāṃ bhagavati vāsudeve tadanuśravaṇamananasaṅkīrtanārādhanānusmaraṇābhiyogenāśūnyasakalayāmena kālena samāveśitaṃ samāhitaṃ kārtsnyena manastattu punarmamābudhasyārānmṛgasutamanuparisusrāva|| 29||"],"meaning":"‘अहो! बड़े खेदकी बात है, मैं संयमशील महानुभावोंके मार्गसे पतित हो गया! मैंने तो धैर्यपूर्वक सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर एकान्त और पवित्र वनका आश्रय लिया था। वहाँ रहकर जिस चित्तको मैंने सर्वभूतात्मा श्रीवासुदेवमें, निरन्तर उन्हींके गुणोंका श्रवण, मनन और संकीर्तन करके तथा प्रत्येक पलको उन्हींकी आराधना और स्मरणादिसे सफल करके, स्थिरभावसे पूर्णतया लगा दिया था, मुझ अज्ञानीका वही मन अकस्मात् एक नन्हे-से हरिण-शिशुके पीछे अपने लक्ष्यसे च्युत हो गया!’॥ २९॥"},{"id":"5.8.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/30/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनः भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरात्प्रत्याजगाम॥ ३०॥"],"iast":["ityevaṃ nigūḍhanirvedo visṛjya mṛgīṃ mātaraṃ punaḥ bhagavatkṣetramupaśamaśīlamunigaṇadayitaṃ śālagrāmaṃ pulastyapulahāśramaṃ kālañjarātpratyājagāma|| 30||"],"meaning":"इस प्रकार मृग बने हुए राजर्षि भरतके हृदयमें जो वैराग्य-भावना जाग्रत् हुई, उसे छिपाये रखकर उन्होंने अपनी माता मृगीको त्याग दिया और अपनी जन्मभूमि कालंजर पर्वतसे वे फिर शान्तस्वभाव मुनियोंके प्रिय उसी शालग्रामतीर्थमें, जो भगवान्का क्षेत्र है, पुलस्त्य और पुलह ऋषिके आश्रमपर चले आये॥ ३०॥"},{"id":"5.8.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/31/","page":610,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मिन्‍नपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन्मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्‍नमुत्ससर्ज॥ ३१॥"],"iast":["tasminnapi kālaṃ pratīkṣamāṇaḥ saṅgācca bhṛśamudvigna ātmasahacaraḥ śuṣkaparṇatṛṇavīrudhā vartamāno mṛgatvanimittāvasānameva gaṇayanmṛgaśarīraṃ tīrthodakaklinnamutsasarja|| 31||"],"meaning":"वहाँ रहकर भी वे कालकी ही प्रतीक्षा करने लगे। आसक्तिसे उन्हें बड़ा भय लगने लगा था। बस, अकेले रहकर वे सूखे पत्ते, घास और झाड़ियोंद्वारा निर्वाह करते मृगयोनिकी प्राप्ति करानेवाले प्रारब्धके क्षयकी बाट देखते रहे। अन्तमें उन्होंने अपने शरीरका आधा भाग गण्डकीके जलमें डुबाये रखकर उस मृगशरीरको छोड़ दिया॥ ३१॥"}],"text":[{"b":14419,"kind":"adhyaya_heading","page":606,"text":"अथाष्टमोऽध्यायः"},{"b":14420,"kind":"topic_heading","page":606,"text":"भरतजीका मृगके मोहमें फँसकर मृगयोनिमें जन्म लेना"},{"b":14421,"kind":"topic_heading","page":606,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":14422,"kind":"hindi_translation","page":606,"verses":["5.8.1","5.8.2","5.8.3","5.8.4"],"text":"एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश॥ १॥ तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २॥ तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्‍नादो लोकभयङ्कर उदपतत्॥ ३॥ तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम॥ ४॥"},{"b":14423,"kind":"hindi_commentary","page":606,"explains":["5.8.1","5.8.2","5.8.3","5.8.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे॥ १॥ राजन्! इसी समय एक हरिनी प्याससे व्याकुल हो जल पीनेके लिये अकेली ही उस नदीके तीरपर आयी॥ २॥ अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी॥ ३॥ हरिनजाति तो स्वभावसे ही डरपोक होती है। वह पहले ही चौकन्‍नी होकर इधर-उधर देखती जाती थी। अब ज्यों ही उसके कानमें वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंहके डरके मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गये। प्यास अभी बुझी न थी, किन्तु अब तो प्राणोंपर आ बनी थी। इसलिये उसने भयवश एकाकी नदी पार करनेके लिये छलाँग मारी॥ ४॥"},{"b":14424,"kind":"hindi_translation","page":606,"verses":["5.8.5","5.8.6"],"text":"तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात॥ ५॥ तत्प्रसवोत्सर्पणभयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार॥ ६॥"},{"b":14425,"kind":"hindi_commentary","page":606,"explains":["5.8.5","5.8.6"],"text":"उसके पेटमें गर्भ था, अतः उछलते समय अत्यन्त भयके कारण उसका गर्भ अपने स्थानसे हटकर योनिद्वारसे निकलकर नदीके प्रवाहमें गिर गया॥ ५॥ वह कृष्णमृगपत्नी अकस्मात् गर्भके गिर जाने, लम्बी छलाँग मारने तथा सिंहसे डरी होनेके कारण बहुत पीड़ित हो गयी थी। अब अपने झुंडसे भी उसका बिछोह हो गया, इसलिये वह किसी गुफामें जा पड़ी और वहीं मर गयी॥ ६॥"},{"b":14426,"kind":"hindi_translation","page":606,"verses":["5.8.7","5.8.8"],"text":"तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभिवीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिर्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥ ७॥ तस्य ह वा एणकुणक उच्चैरेतस्मिन् कृतनिजाभिमानस्य अहरहस्तत्पोषणपालनलालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमाः सहयमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन्॥ ८॥"},{"b":14427,"kind":"hindi_commentary","page":606,"explains":["5.8.7","5.8.8"],"text":"राजर्षि भरतने देखा कि बेचारा हरिनीका बच्चा अपने बन्धुओंसे बिछुड़कर नदीके प्रवाहमें बह रहा है। इससे उन्हें उसपर बड़ी दया आयी और वे आत्मीयके समान उस मातृहीन बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये॥ ७॥ उस मृगछौनेके प्रति भरतजीकी ममता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। वे नित्य उसके खाने-पीनेका प्रबन्ध करने, व्याघ्रादिसे बचाने, लाड़ लड़ाने और पुचकारने आदिकी चिन्तामें ही डूबे रहने लगे। कुछ ही दिनोंमें उनके यम, नियम और भगवत्पूजा आदि आवश्यक कृत्य एक-एक करके छूटने लगे और अन्तमें सभी छूट गये॥ ८॥"},{"b":14428,"kind":"hindi_translation","page":607,"verses":["5.8.9","5.8.10"],"text":"अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्‍वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद‍्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा॥ ९॥ नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद‍् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते॥ १०॥"},{"b":14429,"kind":"hindi_commentary","page":606,"explains":["5.8.9","5.8.10"],"text":"उन्हें ऐसा विचार रहने लगा—‘अहो! कैसे खेदकी बात है! इस बेचारे दीन मृगछौनेको कालचक्रके वेगने अपने झुंड, सुहृद‍् और बन्धुओंसे दूर करके मेरी शरणमें पहुँचा दिया है। यह मुझे ही अपना माता-पिता, भाई-बन्धु और यूथके साथी-संगी समझता है। इसे मेरे सिवा और किसीका पता नहीं है और मुझमें इसका विश्वास भी बहुत है। मैं भी शरणागतकी उपेक्षा करनेमें जो दोष हैं, उन्हें जानता हूँ। इसलिये मुझे अब अपने इस आश्रितका सब प्रकारकी दोषबुद्धि छोड़कर अच्छी तरह पालन-पोषण और प्यार-दुलार करना चाहिये॥ ९॥ निश्‍चय ही शान्तस्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थकी भी परवा नहीं करते’॥ १०॥"},{"b":14430,"kind":"hindi_translation","page":607,"verses":["5.8.11","5.8.12","5.8.13","5.8.14"],"text":"इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥ कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति॥ १२॥ पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥ क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥"},{"b":14431,"kind":"hindi_commentary","page":607,"explains":["5.8.11","5.8.12","5.8.13","5.8.14"],"text":"इस प्रकार उस हरिनके बच्चेमें आसक्ति बढ़ जानेसे बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाशमें बँधा रहता था॥ ११॥ जब उन्हें कुश, पुष्प, समिधा, पत्र और फल-मूलादि लाने होते तो भेड़ियों और कुत्तोंके भयसे उसे वे साथ लेकर ही वनमें जाते॥ १२॥ मार्गमें जहाँ-तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता॥ १३॥ नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करते समय भी राजराजेश्‍वर भरत बीच-बीचमें उठ-उठकर उस मृगबालकको देखते और जब उसपर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्तको शान्ति मिलती। उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते—‘बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो’॥ १४॥"},{"b":14432,"kind":"hindi_translation","page":607,"verses":["5.8.15"],"text":"अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपणः सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणकविरहविह्वलहृदयसन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच॥ १५॥"},{"b":14433,"kind":"hindi_commentary","page":607,"explains":["5.8.15"],"text":"कभी यदि वह दिखायी न देता तो जिसका धन लुट गया हो, उस दीन मनुष्यके समान उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो जाता और फिर वे उस हरिनीके बच्चेके विरहसे व्याकुल एवं सन्तप्त हो करुणावश अत्यन्त उत्कण्ठित एवं मोहाविष्ट हो जाते तथा शोकमग्न होकर इस प्रकार कहने लगते॥ १५॥"},{"b":14434,"kind":"hindi_translation","page":608,"verses":["5.8.16","5.8.17","5.8.18","5.8.19","5.8.20","5.8.21","5.8.22"],"text":"अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति॥ १६॥ अपि क्षेमेणास्मिन्‍नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि॥ १७॥ अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति॥ १८॥ निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत‍्क्षेमोदयस्त्रय्यात्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति॥ १९॥ अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन्॥ २०॥ क्ष्वेलिकायां मां मृषासमाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति॥ २१॥ आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवद् अवहितकरणकलाप आस्ते॥ २२॥"},{"b":14435,"kind":"hindi_commentary","page":608,"explains":["5.8.16","5.8.17","5.8.18","5.8.19","5.8.20","5.8.21","5.8.22"],"text":"‘अहो! क्या कहा जाय? क्या वह मातृहीन दीन मृगशावक दुष्ट बहेलियेकी-सी बुद्धिवाले मुझ पुण्यहीन अनार्यका विश्वास करके और मुझे अपना मानकर मेरे किये हुए अपराधोंको सत्पुरुषोंके समान भूलकर फिर लौट आयेगा?॥ १६॥ क्या मैं उसे फिर इस आश्रमके उपवनमें भगवान्‌की कृपासे सुरक्षित रहकर निर्विघ्न हरी-हरी दूब चरते देखूँगा?॥ १७॥ ऐसा न हो कि कोई भेड़िया, कुत्ता, गोल बाँधकर विचरनेवाले सूकरादि अथवा अकेले घूमनेवाले व्याघ्रादि ही उसे खा जायँ॥ १८॥ अरे! सम्पूर्ण जगत‍्की कुशलके लिये प्रकट होनेवाले वेदत्रयीरूप भगवान् सूर्य अस्त होना चाहते हैं; किन्तु अभीतक वह मृगीकी धरोहर लौटकर नहीं आयी!॥ १९॥ क्या वह हरिणराजकुमार मुझ पुण्यहीनके पास आकर अपनी भाँति-भाँतिकी मृगशावकोचित मनोहर एवं दर्शनीय क्रीडाओंसे अपने स्वजनोंका शोक दूर करते हुए मुझे आनन्दित करेगा?॥ २०॥ अहो! जब कभी मैं प्रणयकोपसे खेलमें झूठ-मूठ समाधिके बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्तसे मेरे पास आकर जलबिन्दुके समान कोमल और नन्हें-नन्हें सींगोंकी नोकसे किस प्रकार मेरे अंगोंको खुजलाने लगता था॥ २१॥ मैं कभी कुशोंपर हवनसामग्री रख देता और वह उन्हें दाँतोंसे खींचकर अपवित्र कर देता तो मेरे डाँटने-डपटनेपर वह अत्यन्त भयभीत होकर उसी समय सारी उछल-कूद छोड़ देता और ऋषिकुमारके समान अपनी समस्त इन्द्रियोंको रोककर चुपचाप बैठ जाता था’॥ २२॥"},{"b":14436,"kind":"hindi_translation","page":608,"verses":["5.8.23","5.8.24","5.8.25"],"text":"किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसुभगशिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविणविधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति॥ २३॥ अपिस्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभयान्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पया कृपणजनवत्सलः परिपाति॥ २४॥ किं वाऽऽत्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणितनिजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभिः स्वधयतीति च॥ २५॥"},{"b":14437,"kind":"hindi_commentary","page":608,"explains":["5.8.23","5.8.24","5.8.25"],"text":"[फिर पृथ्वीपर उस मृगशावकके खुरके चिह्न देखकर कहने लगते—] ‘अहो! इस तपस्विनी धरतीने ऐसा कौन-सा तप किया है जो उस अतिविनीत कृष्णसारकिशोरके छोटे-छोटे सुन्दर, सुखकारी और सुकोमल खुरोंवाले चरणोंके चिह्नोंसे मुझे, जो मैं अपना मृगधन लुट जानेसे अत्यन्त व्याकुल और दीन हो रहा हूँ, उस द्रव्यकी प्राप्तिका मार्ग दिखा रही है और स्वयं अपने शरीरको भी सर्वत्र उन पदचिह्नोंसे विभूषित कर स्वर्ग और अपवर्गके इच्छुक द्विजोंके लिये यज्ञस्थल बना रही है॥ २३॥ (चन्द्रमामें मृगका-सा श्याम चिह्न देख उसे अपना ही मृग मानकर कहने लगते—) ‘अहो! जिसकी माता सिंहके भयसे मर गयी थी, आज वही मृगशिशु अपने आश्रमसे बिछुड़ गया है। अतः उसे अनाथ देखकर क्या ये दीनवत्सल भगवान् नक्षत्रनाथ दयावश उसकी रक्षा कर रहे हैं?॥ २४॥ [फिर उसकी शीतल किरणोंसे आह्लादित होकर कहने लगते—] ‘अथवा अपने पुत्रोंके वियोगरूप दावानलकी विषम ज्वालासे हृदयकमल दग्ध हो जानेके कारण मैंने एक मृगबालकका सहारा लिया था। अब उसके चले जानेसे फिर मेरा हृदय जलने लगा है; इसलिये ये अपनी शीतल, शान्त, स्नेहपूर्ण और वदनसलिलरूपा अमृतमयी किरणोंसे मुझे शान्त कर रहे हैं’॥ २५॥"},{"b":14438,"kind":"hindi_translation","page":609,"verses":["5.8.26"],"text":"एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्‍निःश्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगारम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत॥ २६॥"},{"b":14439,"kind":"hindi_commentary","page":609,"explains":["5.8.26"],"text":"राजन्! इस प्रकार जिनका पूरा होना सर्वथा असम्भव था, उन विविध मनोरथोंसे भरतका चित्त व्याकुल रहने लगा। अपने मृगशावकके रूपमें प्रतीत होनेवाले प्रारब्धकर्मके कारण तपस्वी भरतजी भगवदाराधनरूप कर्म एवं योगानुष्ठानसे च्युत हो गये। नहीं तो, जिन्होंने मोक्षमार्गमें साक्षात् विघ्नरूप समझकर अपने ही हृदयसे उत्पन्‍न दुस्त्यज पुत्रादिको भी त्याग दिया था, उन्हींकी अन्यजातीय हरिणशिशुमें ऐसी आसक्ति कैसे हो सकती थी। इस प्रकार राजर्षि भरत विघ्नोंके वशीभूत होकर योगसाधनसे भ्रष्ट हो गये और उस मृगछौनेके पालन-पोषण और लाड़-प्यारमें ही लगे रहकर आत्मस्वरूपको भूल गये। इसी समय जिसका टलना अत्यन्त कठिन है, वह प्रबल वेगशाली कराल काल, चूहेके बिलमें जैसे सर्प घुस आये, उसी प्रकार उनके सिरपर चढ़ आया॥ २६॥"},{"b":14440,"kind":"hindi_translation","page":609,"verses":["5.8.27"],"text":"तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्तम् अभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७॥"},{"b":14441,"kind":"hindi_translation","page":609,"explains":["5.8.27"],"text":"उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा पुत्रके समान शोकातुर हो रहा था। वे उसे इस स्थितिमें देख रहे थे और उनका चित्त उसीमें लग रहा था। इस प्रकारकी आसक्तिमें ही मृगके साथ उनका शरीर भी छूट गया। तदनन्तर उन्हें अन्तकालकी भावनाके अनुसार अन्य साधारण पुरुषोंके समान मृगशरीर ही मिला। किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट नहीं हुई॥ २७॥"},{"b":14442,"kind":"hindi_translation","page":610,"verses":["5.8.28","5.8.29"],"text":"तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनुतप्यमान आह ॥ २८॥ अहो कष्टं भ्रष्टोऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्तसमस्तसङ्गस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनि सर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणाभियोगेनाशून्यसकलयामेन कालेन समावेशितं समाहितं कार्त्स्न्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनुपरिसुस्राव॥ २९॥"},{"b":14443,"kind":"hindi_translation","page":610,"explains":["5.8.28","5.8.29"],"text":"उस योनिमें भी पूर्वजन्मकी भगवदाराधनाके प्रभावसे अपने मृगरूप होनेका कारण जानकर वे अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे,॥ २८॥ ‘अहो! बड़े खेदकी बात है, मैं संयमशील महानुभावोंके मार्गसे पतित हो गया! मैंने तो धैर्यपूर्वक सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर एकान्त और पवित्र वनका आश्रय लिया था। वहाँ रहकर जिस चित्तको मैंने सर्वभूतात्मा श्रीवासुदेवमें, निरन्तर उन्हींके गुणोंका श्रवण, मनन और संकीर्तन करके तथा प्रत्येक पलको उन्हींकी आराधना और स्मरणादिसे सफल करके, स्थिरभावसे पूर्णतया लगा दिया था, मुझ अज्ञानीका वही मन अकस्मात् एक नन्हे-से हरिण-शिशुके पीछे अपने लक्ष्यसे च्युत हो गया!’॥ २९॥"},{"b":14444,"kind":"hindi_translation","page":610,"verses":["5.8.30","5.8.31"],"text":"इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनः भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरात्प्रत्याजगाम॥ ३०॥ तस्मिन्‍नपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन्मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्‍नमुत्ससर्ज॥ ३१॥"},{"b":14445,"kind":"hindi_commentary","page":610,"explains":["5.8.30","5.8.31"],"text":"इस प्रकार मृग बने हुए राजर्षि भरतके हृदयमें जो वैराग्य-भावना जाग्रत् हुई, उसे छिपाये रखकर उन्होंने अपनी माता मृगीको त्याग दिया और अपनी जन्मभूमि कालंजर पर्वतसे वे फिर शान्तस्वभाव मुनियोंके प्रिय उसी शालग्रामतीर्थमें, जो भगवान्का क्षेत्र है, पुलस्त्य और पुलह ऋषिके आश्रमपर चले आये॥ ३०॥ वहाँ रहकर भी वे कालकी ही प्रतीक्षा करने लगे। आसक्तिसे उन्हें बड़ा भय लगने लगा था। बस, अकेले रहकर वे सूखे पत्ते, घास और झाड़ियोंद्वारा निर्वाह करते मृगयोनिकी प्राप्ति करानेवाले प्रारब्धके क्षयकी बाट देखते रहे। अन्तमें उन्होंने अपने शरीरका आधा भाग गण्डकीके जलमें डुबाये रखकर उस मृगशरीरको छोड़ दिया॥ ३१॥"},{"b":14446,"kind":"hindi_translation","page":610,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतचरितेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥"}],"notes":[{"id":"v1:678","mark":"*","page":609,"after_verse":"5.8.25","text":"शास्त्रोंमें उल्लेख आता है कि जिस भूमिमें कृष्णमृग विचरते हैं, वह अत्यन्त पवित्र और यज्ञानुष्ठानके योग्य होती है।"}],"corrections":{"count":6,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}