{"id":"9.19","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 19","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथैकोनविंशोऽध्यायः","topics":["ययातिका गृहत्याग"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[91,95]},"verses":[{"id":"9.19.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/1/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मनः।","बुद‍्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत॥ १"],"iast":["sa itthamācaran kāmān straiṇo'pahnavamātmanaḥ|","buddhvā priyāyai nirviṇṇo gāthāmetāmagāyata|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्‍नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया॥ १॥"},{"id":"9.19.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/2/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शृणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि।","धीरा यस्यानुशोचन्ति वने ग्रामनिवासिनः॥ २"],"iast":["śṛṇu bhārgavyamūṃ gāthāṃ madvidhācaritāṃ bhuvi|","dhīrā yasyānuśocanti vane grāmanivāsinaḥ|| 2"],"meaning":"‘भृगुनन्दिनी! तुम यह गाथा सुनो। पृथ्वीमें मेरे ही समान विषयीका यह सत्य इतिहास है। ऐसे ही ग्रामवासी विषयी पुरुषोंके सम्बन्धमें वनवासी जितेन्द्रिय पुरुष दुःखके साथ विचार किया करते हैं कि इनका कल्याण कैसे होगा?॥ २॥"},{"id":"9.19.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/3/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बस्त एको वने कश्‍चिद् विचिन्वन् प्रियमात्मनः।","ददर्श कूपे पतितां स्वकर्मवशगामजाम्॥ ३"],"iast":["basta eko vane kaścid vicinvan priyamātmanaḥ|","dadarśa kūpe patitāṃ svakarmavaśagāmajām|| 3"],"meaning":"एक था बकरा। वह वनमें अकेला ही अपनेको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था। उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी कूएँमें गिर पड़ी है॥ ३॥"},{"id":"9.19.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/4/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्या उद्धरणोपायं बस्तः कामी विचिन्तयन्।","व्यधत्त तीर्थमुद‍्धृत्य विषाणाग्रेण रोधसी॥ ४"],"iast":["tasyā uddharaṇopāyaṃ bastaḥ kāmī vicintayan|","vyadhatta tīrthamuddhṛtya viṣāṇāgreṇa rodhasī|| 4"],"meaning":"वह बकरा बड़ा कामी था। वह सोचने लगा कि इस बकरीको किस प्रकार कूएँसे निकाला जाय। उसने अपने सींगसे कूएँके पासकी धरती खोद डाली और रास्ता तैयार कर लिया॥ ४॥"},{"id":"9.19.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/5/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोत्तीर्य कूपात् सुश्रोणी तमेव चकमे किल।","तया वृतं समुद्वीक्ष्य बह्व्योऽजाः कान्तकामिनीः॥ ५"],"iast":["sottīrya kūpāt suśroṇī tameva cakame kila|","tayā vṛtaṃ samudvīkṣya bahvyo'jāḥ kāntakāminīḥ|| 5"],"meaning":"जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया। वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं। उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"9.19.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/6/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पीवानं श्मश्रुलं प्रेष्ठं मीढ्वांसं याभकोविदम्।","स एकोऽजवृषस्तासां बह्वीनां रतिवर्धनः।","रेमे कामग्रहग्रस्त आत्मानं नावबुध्यत॥ ६"],"iast":["pīvānaṃ śmaśrulaṃ preṣṭhaṃ mīḍhvāṃsaṃ yābhakovidam|","sa eko'javṛṣastāsāṃ bahvīnāṃ rativardhanaḥ|","reme kāmagrahagrasta ātmānaṃ nāvabudhyata|| 6"],"meaning":"जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया। वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं। उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"9.19.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/7/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमेव प्रेष्ठतमया रममाणमजान्यया।","विलोक्य कूपसंवि‌ग्‍ना नामृष्यद् बस्तकर्म तत्॥ ७"],"iast":["tameva preṣṭhatamayā ramamāṇamajānyayā|","vilokya kūpasaṃvignā nāmṛṣyad bastakarma tat|| 7"],"meaning":"जब उसकी कूएँमेंसे निकाली हुई प्रियतमा बकरीने देखा कि मेरा पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरीसे विहार कर रहा है तो उसे बकरेकी यह करतूत सहन न हुई॥ ७॥"},{"id":"9.19.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/8/","page":92,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं दुर्हृदं सुहृद्रूपं कामिनं क्षणसौहृदम्।","इन्द्रियाराममुत्सृज्य स्वामिनं दुःखिता ययौ॥ ८"],"iast":["taṃ durhṛdaṃ suhṛdrūpaṃ kāminaṃ kṣaṇasauhṛdam|","indriyārāmamutsṛjya svāminaṃ duḥkhitā yayau|| 8"],"meaning":"उसने देखा कि यह तो बड़ा कामी है, इसके प्रेमका कोई भरोसा नहीं है और यह मित्रके रूपमें शत्रुका काम कर रहा है। अतः वह बकरी उस इन्द्रियलोलुप बकरेको छोड़कर बड़े दुःखसे अपने पालनेवालेके पास चली गयी॥ ८॥"},{"id":"9.19.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/9/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽपि चानुगतः स्त्रैणः कृपणस्तां प्रसादितुम्।","कुर्वन्‍निडविडाकारं नाशक्‍नोत् पथि संधितुम्॥ ९"],"iast":["so'pi cānugataḥ straiṇaḥ kṛpaṇastāṃ prasāditum|","kurvanniḍaviḍākāraṃ nāśaknot pathi saṃdhitum|| 9"],"meaning":"वह दीन कामी बकरा उसे मनानेके लिये ‘में-में’ करता हुआ उसके पीछे-पीछे चला। परन्तु उसे मार्गमें मना न सका॥ ९॥"},{"id":"9.19.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/10/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यास्तत्र द्विजः कश्‍चिदजास्वाम्यच्छिनद् रुषा।","लम्बन्तं वृषणं भूयः सन्दधेऽर्थाय योगवित्॥ १०"],"iast":["tasyāstatra dvijaḥ kaścidajāsvāmyacchinad ruṣā|","lambantaṃ vṛṣaṇaṃ bhūyaḥ sandadhe'rthāya yogavit|| 10"],"meaning":"उस बकरीका स्वामी एक ब्राह्मण था। उसने क्रोधमें आकर बकरेके लटकते हुए अण्डकोषको काट दिया। परन्तु फिर उस बकरीका ही भला करनेके लिये फिरसे उसे जोड़ भी दिया। उसे इस प्रकारके बहुत-से उपाय मालूम थे॥ १०॥"},{"id":"9.19.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/11/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सम्बद्धवृषणः सोऽपि ह्यजया कूपलब्धया।","कालं बहुतिथं भद्रे कामैर्नाद्यापि तुष्यति॥ ११"],"iast":["sambaddhavṛṣaṇaḥ so'pi hyajayā kūpalabdhayā|","kālaṃ bahutithaṃ bhadre kāmairnādyāpi tuṣyati|| 11"],"meaning":"प्रिये! इस प्रकार अण्डकोष जुड़ जानेपर वह बकरा फिर कूएँसे निकली हुई बकरीके साथ बहुत दिनोंतक विषयभोग करता रहा, परन्तु आजतक उसे सन्तोष न हुआ॥ ११॥"},{"id":"9.19.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/12/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथाहं कृपणः सुभ्रु भवत्याः प्रेमयन्त्रितः।","आत्मानं नाभिजानामि मोहितस्तव मायया॥ १२"],"iast":["tathāhaṃ kṛpaṇaḥ subhru bhavatyāḥ premayantritaḥ|","ātmānaṃ nābhijānāmi mohitastava māyayā|| 12"],"meaning":"सुन्दरी! मेरी भी यही दशा है। तुम्हारे प्रेमपाशमें बँधकर मैं भी अत्यन्त दीन हो गया। तुम्हारी मायासे मोहित होकर मैं अपने-आपको भी भूल गया हूँ॥ १२॥"},{"id":"9.19.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/13/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।","न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते॥ १३"],"iast":["yat pṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ|","na duhyanti manaḥprītiṃ puṃsaḥ kāmahatasya te|| 13"],"meaning":"‘प्रिये! पृथ्वीमें जितने भी धान्य (चावल, जौ आदि), सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं—वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है॥ १३॥"},{"id":"9.19.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/14/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।","हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ १४"],"iast":["na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati|","haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate|| 14"],"meaning":"विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं॥ १४॥"},{"id":"9.19.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/15/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।","समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः॥ १५"],"iast":["yadā na kurute bhāvaṃ sarvabhūteṣvamaṃgalam|","samadṛṣṭestadā puṃsaḥ sarvāḥ sukhamayā diśaḥ|| 15"],"meaning":"जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं॥ १५॥"},{"id":"9.19.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/16/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते।","तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत्॥ १६"],"iast":["yā dustyajā durmatibhirjīryato yā na jīryate|","tāṃ tṛṣṇāṃ duḥkhanivahāṃ śarmakāmo drutaṃ tyajet|| 16"],"meaning":"विषयोंकी तृष्णा ही दुःखोंका उद्गम स्थान है। मन्दबुद्धि लोग बड़ी कठिनाईसे उसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोगवासना) का त्याग कर देना चाहिये॥ १६॥"},{"id":"9.19.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/17/","page":93,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्।","बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ १७"],"iast":["mātrā svasrā duhitrā vā nāviviktāsano bhavet|","balavānindriyagrāmo vidvāṃsamapi karṣati|| 17"],"meaning":"और तो क्या—अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानोंको भी विचलित कर देती हैं॥ १७॥"},{"id":"9.19.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/18/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयान् सेवतोऽसकृत्।","तथापि चानुसवनं तृष्णा तेषूपजायते॥ १८"],"iast":["pūrṇaṃ varṣasahasraṃ me viṣayān sevato'sakṛt|","tathāpi cānusavanaṃ tṛṣṇā teṣūpajāyate|| 18"],"meaning":"विषयोंका बार-बार सेवन करते-करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण-प्रति-क्षण उन भोगोंकी लालसा बढ़ती ही जा रही है॥ १८॥"},{"id":"9.19.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/19/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम्।","निर्द्वन्द्वो निरहंकारश्‍चरिष्यामि मृगैः सह॥ १९"],"iast":["tasmādetāmahaṃ tyaktvā brahmaṇyādhāya mānasam|","nirdvandvo nirahaṃkāraścariṣyāmi mṛgaiḥ saha|| 19"],"meaning":"इसलिये मैं अब भोगोंकी वासना—तृष्णाका परित्याग करके अपना अन्तःकरण परमात्माके प्रति समर्पित कर दूँगा और शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदिके भावोंसे ऊपर उठकर अहंकारसे मुक्त हो हरिनोंके साथ वनमें विचरूँगा॥ १९॥"},{"id":"9.19.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/20/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्टं श्रुतमसद् बुद‍्ध्वा नानुध्यायेन्‍न संविशेत्।","संसृतिं चात्मनाशं च तत्र विद्वान् स आत्मदृक्॥ २०"],"iast":["dṛṣṭaṃ śrutamasad buddhvā nānudhyāyenna saṃviśet|","saṃsṛtiṃ cātmanāśaṃ ca tatra vidvān sa ātmadṛk|| 20"],"meaning":"लोक-परलोक दोनोंके ही भोग असत् हैं, ऐसा समझकर न तो उनका चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही। समझना चाहिये कि उनके चिन्तनसे ही जन्म-मृत्युरूप संसारकी प्राप्ति होती है और उनके भोगसे तो आत्मनाश ही हो जाता है। वास्तवमें इनके रहस्यको जानकर इनसे अलग रहनेवाला ही आत्मज्ञानी है’॥ २०॥"},{"id":"9.19.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/21/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा नाहुषो जायां तदीयं पूरवे वयः।","दत्त्वा स्वां जरसं तस्मादाददे विगतस्पृहः॥ २१"],"iast":["ityuktvā nāhuṣo jāyāṃ tadīyaṃ pūrave vayaḥ|","dattvā svāṃ jarasaṃ tasmādādade vigataspṛhaḥ|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! ययातिने अपनी पत्‍नीसे इस प्रकार कहकर पूरुकी जवानी उसे लौटा दी और उससे अपना बुढ़ापा ले लिया। यह इसलिये कि अब उनके चित्तमें विषयोंकी वासना नहीं रह गयी थी॥ २१॥"},{"id":"9.19.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/22/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिशि दक्षिणपूर्वस्यां द्रुह्युं दक्षिणतो यदुम्।","प्रतीच्यां तुर्वसुं चक्र उदीच्यामनुमीश्‍वरम्॥ २२"],"iast":["diśi dakṣiṇapūrvasyāṃ druhyuṃ dakṣiṇato yadum|","pratīcyāṃ turvasuṃ cakra udīcyāmanumīśvaram|| 22"],"meaning":"इसके बाद उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशामें द्रुह्यु, दक्षिणमें यदु, पश्‍चिममें तुर्वसु और उत्तरमें अनुको राज्य दे दिया॥ २२॥"},{"id":"9.19.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/23/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूमण्डलस्य सर्वस्य पूरुमर्हत्तमं विशाम्।","अभिषिच्याग्रजांस्तस्य वशे स्थाप्य वनं ययौ॥ २३"],"iast":["bhūmaṇḍalasya sarvasya pūrumarhattamaṃ viśām|","abhiṣicyāgrajāṃstasya vaśe sthāpya vanaṃ yayau|| 23"],"meaning":"सारे भूमण्डलकी समस्त सम्पत्तियोंके योग्यतम पात्र पूरुको अपने राज्यपर अभिषिक्त करके तथा बड़े भाइयोंको उसके अधीन बनाकर वे वनमें चले गये॥ २३॥"},{"id":"9.19.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/24/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसेवितं वर्षपूगान् षड्वर्गं विषयेषु सः।","क्षणेन मुमुचे नीडं जातपक्ष इव द्विजः॥ २४"],"iast":["āsevitaṃ varṣapūgān ṣaḍvargaṃ viṣayeṣu saḥ|","kṣaṇena mumuce nīḍaṃ jātapakṣa iva dvijaḥ|| 24"],"meaning":"यद्यपि राजा ययातिने बहुत वर्षोंतक इन्द्रियोंसे विषयोंका सुख भोगा था—परन्तु जैसे पाँख निकल आनेपर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही उन्होंने एक क्षणमें ही सब कुछ छोड़ दिया॥ २४॥"},{"id":"9.19.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/25/","page":94,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तत्र निर्मुक्तसमस्तसंग","आत्मानुभूत्या विधुतत्रिलिंगः।","परेऽमले ब्रह्मणि वासुदेवे","लेभे गतिं भागवतीं प्रतीतः॥ २५"],"iast":["sa tatra nirmuktasamastasaṃga","ātmānubhūtyā vidhutatriliṃgaḥ|","pare'male brahmaṇi vāsudeve","lebhe gatiṃ bhāgavatīṃ pratītaḥ|| 25"],"meaning":"वनमें जाकर राजा ययातिने समस्त आसक्तियोंसे छुट्टी पा ली। आत्म-साक्षात्कारके द्वारा उनका त्रिगुणमय लिंगशरीर नष्ट हो गया। उन्होंने माया-मलसे रहित परब्रह्म परमात्मा वासुदेवमें मिलकर वह भागवती गति प्राप्त की, जो बड़े-बड़े भगवान्‌के प्रेमी संतोंको प्राप्त होती है॥ २५॥"},{"id":"9.19.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/26/","page":95,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुत्वा गाथां देवयानी मेने प्रस्तोभमात्मनः।","स्त्रीपुंसोः स्नेहवैक्लव्यात् परिहासमिवेरितम्॥ २६"],"iast":["śrutvā gāthāṃ devayānī mene prastobhamātmanaḥ|","strīpuṃsoḥ snehavaiklavyāt parihāsamiveritam|| 26"],"meaning":"जब देवयानीने वह गाथा सुनी, तो उसने समझा कि ये मुझे निवृत्तिमार्गके लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं। क्योंकि स्त्री-पुरुषमें परस्पर प्रेमके कारण विरह होनेपर विकलता होती है, यह सोचकर ही इन्होंने यह बात हँसी-हँसीमें कही है॥ २६॥"},{"id":"9.19.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/27/","page":95,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा संनिवासं सुहृदां प्रपायामिव गच्छताम्।","विज्ञायेश्‍वरतन्त्राणां मायाविरचितं प्रभोः॥ २७"],"iast":["sā saṃnivāsaṃ suhṛdāṃ prapāyāmiva gacchatām|","vijñāyeśvaratantrāṇāṃ māyāviracitaṃ prabhoḥ|| 27"],"meaning":"स्वजन-सम्बन्धियोंका—जो ईश्‍वरके अधीन है—एक स्थानपर इकट्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोंका। यह सब भगवान्‌की मायाका खेल और स्वप्नके सरीखा ही है। ऐसा समझकर देवयानीने सब पदार्थोंकी आसक्ति त्याग दी और अपने मनको भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके बन्धनके हेतु लिंगशरीरका परित्याग कर दिया—वह भगवान्‌को प्राप्त हो गयी॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"9.19.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/28/","page":95,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वत्र संगमुत्सृज्य स्वप्नौपम्येन भार्गवी।","कृष्णे मनः समावेश्य व्यधुनोल्लिंगमात्मनः॥ २८"],"iast":["sarvatra saṃgamutsṛjya svapnaupamyena bhārgavī|","kṛṣṇe manaḥ samāveśya vyadhunolliṃgamātmanaḥ|| 28"],"meaning":"स्वजन-सम्बन्धियोंका—जो ईश्‍वरके अधीन है—एक स्थानपर इकट्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोंका। यह सब भगवान्‌की मायाका खेल और स्वप्नके सरीखा ही है। ऐसा समझकर देवयानीने सब पदार्थोंकी आसक्ति त्याग दी और अपने मनको भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके बन्धनके हेतु लिंगशरीरका परित्याग कर दिया—वह भगवान्‌को प्राप्त हो गयी॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"9.19.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/19/29/","page":95,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे।","सर्वभूताधिवासाय शान्ताय बृहते नमः॥ २९"],"iast":["namastubhyaṃ bhagavate vāsudevāya vedhase|","sarvabhūtādhivāsāya śāntāya bṛhate namaḥ|| 29"],"meaning":"उसने भगवान्‌को नमस्कार करके कहा—‘समस्त जगत‍्के रचयिता, सर्वान्तर्यामी, सबके आश्रयस्वरूप सर्वशक्तिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। जो परमशान्त और अनन्त तत्त्व है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ’॥ २९॥"}],"text":[{"b":26370,"kind":"adhyaya_heading","page":92,"text":"अथैकोनविंशोऽध्यायः"},{"b":26371,"kind":"topic_heading","page":92,"text":"ययातिका गृहत्याग"},{"b":26372,"kind":"hindi_commentary","page":92,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":26373,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.1"],"text":"स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मनः।"},{"b":26374,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.1"],"text":"बुद‍्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत॥ १"},{"b":26375,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.2"],"text":"शृणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि।"},{"b":26376,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.2"],"text":"धीरा यस्यानुशोचन्ति वने ग्रामनिवासिनः॥ २"},{"b":26377,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.3"],"text":"बस्त एको वने कश्‍चिद् विचिन्वन् प्रियमात्मनः।"},{"b":26378,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.3"],"text":"ददर्श कूपे पतितां स्वकर्मवशगामजाम्॥ ३"},{"b":26379,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.4"],"text":"तस्या उद्धरणोपायं बस्तः कामी विचिन्तयन्।"},{"b":26380,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.4"],"text":"व्यधत्त तीर्थमुद‍्धृत्य विषाणाग्रेण रोधसी॥ ४"},{"b":26381,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.5"],"text":"सोत्तीर्य कूपात् सुश्रोणी तमेव चकमे किल।"},{"b":26382,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.5"],"text":"तया वृतं समुद्वीक्ष्य बह्व्योऽजाः कान्तकामिनीः॥ ५"},{"b":26383,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.6"],"text":"पीवानं श्मश्रुलं प्रेष्ठं मीढ्वांसं याभकोविदम्।"},{"b":26384,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.6"],"text":"स एकोऽजवृषस्तासां बह्वीनां रतिवर्धनः।"},{"b":26385,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.6"],"text":"रेमे कामग्रहग्रस्त आत्मानं नावबुध्यत॥ ६"},{"b":26386,"kind":"hindi_commentary","page":91,"explains":["9.19.1","9.19.2","9.19.3","9.19.4","9.19.5","9.19.6"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्‍नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया॥ १॥ ‘भृगुनन्दिनी! तुम यह गाथा सुनो। पृथ्वीमें मेरे ही समान विषयीका यह सत्य इतिहास है। ऐसे ही ग्रामवासी विषयी पुरुषोंके सम्बन्धमें वनवासी जितेन्द्रिय पुरुष दुःखके साथ विचार किया करते हैं कि इनका कल्याण कैसे होगा?॥ २॥ एक था बकरा। वह वनमें अकेला ही अपनेको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था। उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी कूएँमें गिर पड़ी है॥ ३॥ वह बकरा बड़ा कामी था। वह सोचने लगा कि इस बकरीको किस प्रकार कूएँसे निकाला जाय। उसने अपने सींगसे कूएँके पासकी धरती खोद डाली और रास्ता तैयार कर लिया॥ ४॥ जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया। वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं। उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा॥ ५-६॥"},{"b":26388,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.7"],"text":"तमेव प्रेष्ठतमया रममाणमजान्यया।"},{"b":26389,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.7"],"text":"विलोक्य कूपसंवि‌ग्‍ना नामृष्यद् बस्तकर्म तत्॥ ७"},{"b":26390,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.8"],"text":"तं दुर्हृदं सुहृद्रूपं कामिनं क्षणसौहृदम्।"},{"b":26391,"kind":"sanskrit_shloka","page":92,"verses":["9.19.8"],"text":"इन्द्रियाराममुत्सृज्य स्वामिनं दुःखिता ययौ॥ ८"},{"b":26392,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.9"],"text":"सोऽपि चानुगतः स्त्रैणः कृपणस्तां प्रसादितुम्।"},{"b":26393,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.9"],"text":"कुर्वन्‍निडविडाकारं नाशक्‍नोत् पथि संधितुम्॥ ९"},{"b":26394,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.10"],"text":"तस्यास्तत्र द्विजः कश्‍चिदजास्वाम्यच्छिनद् रुषा।"},{"b":26395,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.10"],"text":"लम्बन्तं वृषणं भूयः सन्दधेऽर्थाय योगवित्॥ १०"},{"b":26396,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.11"],"text":"सम्बद्धवृषणः सोऽपि ह्यजया कूपलब्धया।"},{"b":26397,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.11"],"text":"कालं बहुतिथं भद्रे कामैर्नाद्यापि तुष्यति॥ ११"},{"b":26398,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.12"],"text":"तथाहं कृपणः सुभ्रु भवत्याः प्रेमयन्त्रितः।"},{"b":26399,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.12"],"text":"आत्मानं नाभिजानामि मोहितस्तव मायया॥ १२"},{"b":26400,"kind":"hindi_commentary","page":92,"explains":["9.19.7","9.19.8","9.19.9","9.19.10","9.19.11","9.19.12"],"text":"जब उसकी कूएँमेंसे निकाली हुई प्रियतमा बकरीने देखा कि मेरा पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरीसे विहार कर रहा है तो उसे बकरेकी यह करतूत सहन न हुई॥ ७॥ उसने देखा कि यह तो बड़ा कामी है, इसके प्रेमका कोई भरोसा नहीं है और यह मित्रके रूपमें शत्रुका काम कर रहा है। अतः वह बकरी उस इन्द्रियलोलुप बकरेको छोड़कर बड़े दुःखसे अपने पालनेवालेके पास चली गयी॥ ८॥ वह दीन कामी बकरा उसे मनानेके लिये ‘में-में’ करता हुआ उसके पीछे-पीछे चला। परन्तु उसे मार्गमें मना न सका॥ ९॥ उस बकरीका स्वामी एक ब्राह्मण था। उसने क्रोधमें आकर बकरेके लटकते हुए अण्डकोषको काट दिया। परन्तु फिर उस बकरीका ही भला करनेके लिये फिरसे उसे जोड़ भी दिया। उसे इस प्रकारके बहुत-से उपाय मालूम थे॥ १०॥ प्रिये! इस प्रकार अण्डकोष जुड़ जानेपर वह बकरा फिर कूएँसे निकली हुई बकरीके साथ बहुत दिनोंतक विषयभोग करता रहा, परन्तु आजतक उसे सन्तोष न हुआ॥ ११॥ सुन्दरी! मेरी भी यही दशा है। तुम्हारे प्रेमपाशमें बँधकर मैं भी अत्यन्त दीन हो गया। तुम्हारी मायासे मोहित होकर मैं अपने-आपको भी भूल गया हूँ॥ १२॥"},{"b":26401,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.13"],"text":"यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।"},{"b":26402,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.13"],"text":"न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते॥ १३"},{"b":26403,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.14"],"text":"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।"},{"b":26404,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.14"],"text":"हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ १४"},{"b":26405,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.15"],"text":"यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।"},{"b":26406,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.15"],"text":"समदृष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः॥ १५"},{"b":26407,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.16"],"text":"या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते।"},{"b":26408,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.16"],"text":"तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत्॥ १६"},{"b":26409,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.17"],"text":"मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत्।"},{"b":26410,"kind":"sanskrit_shloka","page":93,"verses":["9.19.17"],"text":"बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ १७"},{"b":26411,"kind":"hindi_commentary","page":93,"explains":["9.19.13","9.19.14","9.19.15","9.19.16","9.19.17"],"text":"‘प्रिये! पृथ्वीमें जितने भी धान्य (चावल, जौ आदि), सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं—वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है॥ १३॥ विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं॥ १४॥ जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता तब वह समदर्शी हो जाता है, तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं॥ १५॥ विषयोंकी तृष्णा ही दुःखोंका उद्गम स्थान है। मन्दबुद्धि लोग बड़ी कठिनाईसे उसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोगवासना) का त्याग कर देना चाहिये॥ १६॥ और तो क्या—अपनी मा, बहिन और कन्याके साथ भी अकेले एक आसनपर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानोंको भी विचलित कर देती हैं॥ १७॥"},{"b":26412,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.18"],"text":"पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयान् सेवतोऽसकृत्।"},{"b":26413,"kind":"hindi_commentary","page":94,"verses":["9.19.18"],"text":"तथापि चानुसवनं तृष्णा तेषूपजायते॥ १८"},{"b":26414,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.19"],"text":"तस्मादेतामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम्।"},{"b":26415,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.19"],"text":"निर्द्वन्द्वो निरहंकारश्‍चरिष्यामि मृगैः सह॥ १९"},{"b":26416,"kind":"hindi_commentary","page":94,"verses":["9.19.20"],"text":"दृष्टं श्रुतमसद् बुद‍्ध्वा नानुध्यायेन्‍न संविशेत्।"},{"b":26417,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.20"],"text":"संसृतिं चात्मनाशं च तत्र विद्वान् स आत्मदृक्॥ २०"},{"b":26418,"kind":"hindi_translation","page":94,"explains":["9.19.18","9.19.19","9.19.20"],"text":"विषयोंका बार-बार सेवन करते-करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण-प्रति-क्षण उन भोगोंकी लालसा बढ़ती ही जा रही है॥ १८॥ इसलिये मैं अब भोगोंकी वासना—तृष्णाका परित्याग करके अपना अन्तःकरण परमात्माके प्रति समर्पित कर दूँगा और शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदिके भावोंसे ऊपर उठकर अहंकारसे मुक्त हो हरिनोंके साथ वनमें विचरूँगा॥ १९॥ लोक-परलोक दोनोंके ही भोग असत् हैं, ऐसा समझकर न तो उनका चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही। समझना चाहिये कि उनके चिन्तनसे ही जन्म-मृत्युरूप संसारकी प्राप्ति होती है और उनके भोगसे तो आत्मनाश ही हो जाता है। वास्तवमें इनके रहस्यको जानकर इनसे अलग रहनेवाला ही आत्मज्ञानी है’॥ २०॥"},{"b":26419,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.21"],"text":"इत्युक्त्वा नाहुषो जायां तदीयं पूरवे वयः।"},{"b":26420,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.21"],"text":"दत्त्वा स्वां जरसं तस्मादाददे विगतस्पृहः॥ २१"},{"b":26421,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.22"],"text":"दिशि दक्षिणपूर्वस्यां द्रुह्युं दक्षिणतो यदुम्।"},{"b":26422,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.22"],"text":"प्रतीच्यां तुर्वसुं चक्र उदीच्यामनुमीश्‍वरम्॥ २२"},{"b":26423,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.23"],"text":"भूमण्डलस्य सर्वस्य पूरुमर्हत्तमं विशाम्।"},{"b":26424,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.23"],"text":"अभिषिच्याग्रजांस्तस्य वशे स्थाप्य वनं ययौ॥ २३"},{"b":26425,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.24"],"text":"आसेवितं वर्षपूगान् षड्वर्गं विषयेषु सः।"},{"b":26426,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.24"],"text":"क्षणेन मुमुचे नीडं जातपक्ष इव द्विजः॥ २४"},{"b":26427,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.25"],"text":"स तत्र निर्मुक्तसमस्तसंग"},{"b":26428,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.25"],"text":"आत्मानुभूत्या विधुतत्रिलिंगः।"},{"b":26429,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.25"],"text":"परेऽमले ब्रह्मणि वासुदेवे"},{"b":26430,"kind":"sanskrit_shloka","page":94,"verses":["9.19.25"],"text":"लेभे गतिं भागवतीं प्रतीतः॥ २५"},{"b":26431,"kind":"hindi_translation","page":94,"explains":["9.19.21","9.19.22","9.19.23","9.19.24","9.19.25"],"text":"परीक्षित्! ययातिने अपनी पत्‍नीसे इस प्रकार कहकर पूरुकी जवानी उसे लौटा दी और उससे अपना बुढ़ापा ले लिया। यह इसलिये कि अब उनके चित्तमें विषयोंकी वासना नहीं रह गयी थी॥ २१॥ इसके बाद उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशामें द्रुह्यु, दक्षिणमें यदु, पश्‍चिममें तुर्वसु और उत्तरमें अनुको राज्य दे दिया॥ २२॥ सारे भूमण्डलकी समस्त सम्पत्तियोंके योग्यतम पात्र पूरुको अपने राज्यपर अभिषिक्त करके तथा बड़े भाइयोंको उसके अधीन बनाकर वे वनमें चले गये॥ २३॥ यद्यपि राजा ययातिने बहुत वर्षोंतक इन्द्रियोंसे विषयोंका सुख भोगा था—परन्तु जैसे पाँख निकल आनेपर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही उन्होंने एक क्षणमें ही सब कुछ छोड़ दिया॥ २४॥ वनमें जाकर राजा ययातिने समस्त आसक्तियोंसे छुट्टी पा ली। आत्म-साक्षात्कारके द्वारा उनका त्रिगुणमय लिंगशरीर नष्ट हो गया। उन्होंने माया-मलसे रहित परब्रह्म परमात्मा वासुदेवमें मिलकर वह भागवती गति प्राप्त की, जो बड़े-बड़े भगवान्‌के प्रेमी संतोंको प्राप्त होती है॥ २५॥"},{"b":26432,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.26"],"text":"श्रुत्वा गाथां देवयानी मेने प्रस्तोभमात्मनः।"},{"b":26433,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.26"],"text":"स्त्रीपुंसोः स्नेहवैक्लव्यात् परिहासमिवेरितम्॥ २६"},{"b":26434,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.27"],"text":"सा संनिवासं सुहृदां प्रपायामिव गच्छताम्।"},{"b":26435,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.27"],"text":"विज्ञायेश्‍वरतन्त्राणां मायाविरचितं प्रभोः॥ २७"},{"b":26436,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.28"],"text":"सर्वत्र संगमुत्सृज्य स्वप्नौपम्येन भार्गवी।"},{"b":26437,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.28"],"text":"कृष्णे मनः समावेश्य व्यधुनोल्लिंगमात्मनः॥ २८"},{"b":26438,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.29"],"text":"नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे।"},{"b":26439,"kind":"sanskrit_shloka","page":95,"verses":["9.19.29"],"text":"सर्वभूताधिवासाय शान्ताय बृहते नमः॥ २९"},{"b":26440,"kind":"hindi_translation","page":95,"explains":["9.19.26","9.19.27","9.19.28","9.19.29"],"text":"जब देवयानीने वह गाथा सुनी, तो उसने समझा कि ये मुझे निवृत्तिमार्गके लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं। क्योंकि स्त्री-पुरुषमें परस्पर प्रेमके कारण विरह होनेपर विकलता होती है, यह सोचकर ही इन्होंने यह बात हँसी-हँसीमें कही है॥ २६॥ स्वजन-सम्बन्धियोंका—जो ईश्‍वरके अधीन है—एक स्थानपर इकट्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊपर पथिकोंका। यह सब भगवान्‌की मायाका खेल और स्वप्नके सरीखा ही है। ऐसा समझकर देवयानीने सब पदार्थोंकी आसक्ति त्याग दी और अपने मनको भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके बन्धनके हेतु लिंगशरीरका परित्याग कर दिया—वह भगवान्‌को प्राप्त हो गयी॥ २७-२८॥ उसने भगवान्‌को नमस्कार करके कहा—‘समस्त जगत‍्के रचयिता, सर्वान्तर्यामी, सबके आश्रयस्वरूप सर्वशक्तिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। जो परमशान्त और अनन्त तत्त्व है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ’॥ २९॥"},{"b":26441,"kind":"hindi_translation","page":95,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥"}],"notes":[{"id":"v2:147","mark":"१","page":94,"after_verse":"9.19.18","text":"नुदिवसं।"},{"id":"v2:148","mark":"२","page":94,"after_verse":"9.19.20","text":"सद्विद्वान्।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}