{"id":"9.2","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 2","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ द्वितीयोऽध्यायः","topics":["पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.2.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[11,14]},"verses":[{"id":"9.2.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/1/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं गतेऽथ सुद्युम्‍ने मनुर्वैवस्वतः सुते।","पुत्रकामस्तपस्तेपे यमुनायां शतं समाः॥ १"],"iast":["evaṃ gate'tha sudyumne manurvaivasvataḥ sute|","putrakāmastapastepe yamunāyāṃ śataṃ samāḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार जब सुद्युम्‍न तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये, तब वैवस्वत मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्षतक तपस्या की॥ १॥"},{"id":"9.2.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/2/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽयजन्मनुर्देवमपत्यार्थं हरिं प्रभुम्।","इक्ष्वाकुपूर्वजान् पुत्राँल्लेभे स्वसदृशान् दश॥ २"],"iast":["tato'yajanmanurdevamapatyārthaṃ hariṃ prabhum|","ikṣvākupūrvajān putrām̐llebhe svasadṛśān daśa|| 2"],"meaning":"इसके बाद उन्होंने सन्तानके लिये सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी आराधना की और अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे॥ २॥"},{"id":"9.2.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/3/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः।","पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः॥ ३"],"iast":["pṛṣadhrastu manoḥ putro gopālo guruṇā kṛtaḥ|","pālayāmāsa gā yatto rātryāṃ vīrāsanavrataḥ|| 3"],"meaning":"उन मनुपुत्रोंमेंसे एकका नाम था पृषध्र। गुरु वसिष्ठजीने उसे गायोंकी रक्षामें नियुक्त कर रखा था, अतः वह रात्रिके समय बड़ी सावधानीसे वीरासनसे बैठा रहता और गायोंकी रक्षा करता॥ ३॥"},{"id":"9.2.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/4/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकदा प्राविशद् गोष्ठं शार्दूलो निशि वर्षति।","शयाना गाव उत्थाय भीतास्ता बभ्रमुर्व्रजे॥ ४"],"iast":["ekadā prāviśad goṣṭhaṃ śārdūlo niśi varṣati|","śayānā gāva utthāya bhītāstā babhramurvraje|| 4"],"meaning":"एक दिन रातमें वर्षा हो रही थी। उस समय गायोंके झुंडमें एक बाघ घुस आया। उससे डरकर सोयी हुई गौएँ उठ खड़ी हुईं। वे गोशालामें ही इधर-उधर भागने लगीं॥ ४॥"},{"id":"9.2.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/5/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकां जग्राह बलवान् सा चुक्रोश भयातुरा।","तस्यास्तत् क्रन्दितं श्रुत्वा पृषध्रोऽभिससार ह॥ ५"],"iast":["ekāṃ jagrāha balavān sā cukrośa bhayāturā|","tasyāstat kranditaṃ śrutvā pṛṣadhro'bhisasāra ha|| 5"],"meaning":"बलवान् बाघने एक गायको पकड़ लिया। वह अत्यन्त भयभीत होकर चिल्लाने लगी। उसका वह क्रन्दन सुनकर पृषध्र गायके पास दौड़ आया॥ ५॥"},{"id":"9.2.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/6/","page":11,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["खड्गमादाय तरसा प्रलीनोडुगणे निशि।","अजानन्‍नहनद् बभ्रोः शिरः शार्दूलशंकया॥ ६"],"iast":["khaḍgamādāya tarasā pralīnoḍugaṇe niśi|","ajānannahanad babhroḥ śiraḥ śārdūlaśaṃkayā|| 6"],"meaning":"एक तो रातका समय और दूसरे घनघोर घटाओंसे आच्छादित होनेके कारण तारे भी नहीं दीखते थे। उसने हाथमें तलवार उठाकर अनजानमें ही बड़े वेगसे गायका सिर काट दिया। वह समझ रहा था कि यही बाघ है॥ ६॥"},{"id":"9.2.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/7/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्याघ्रोऽपि वृक्णश्रवणो निस्त्रिंशाग्राहतस्ततः।","निश्‍चक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि समुत्सृजन्॥ ७"],"iast":["vyāghro'pi vṛkṇaśravaṇo nistriṃśāgrāhatastataḥ|","niścakrāma bhṛśaṃ bhīto raktaṃ pathi samutsṛjan|| 7"],"meaning":"तलवारकी नोकसे बाघका भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्तेमें खून गिराता हुआ वहाँसे निकल भागा॥ ७॥"},{"id":"9.2.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/8/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मन्यमानो हतं व्याघ्रं पृषध्रः परवीरहा।","अद्राक्षीत् स्वहतां बभ्रुं व्युष्टायां निशि दुःखितः॥ ८"],"iast":["manyamāno hataṃ vyāghraṃ pṛṣadhraḥ paravīrahā|","adrākṣīt svahatāṃ babhruṃ vyuṣṭāyāṃ niśi duḥkhitaḥ|| 8"],"meaning":"शत्रुदमन पृषध्रने यह समझा कि बाघ मर गया। परंतु रात बीतनेपर उसने देखा कि मैंने तो गायको ही मार डाला है, इससे उसे बड़ा दुःख हुआ॥ ८॥"},{"id":"9.2.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/9/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं शशाप कुलाचार्यः कृतागसमकामतः।","न क्षत्रबन्धुः शूद्रस्त्वं कर्मणा भवितामुना॥ ९"],"iast":["taṃ śaśāpa kulācāryaḥ kṛtāgasamakāmataḥ|","na kṣatrabandhuḥ śūdrastvaṃ karmaṇā bhavitāmunā|| 9"],"meaning":"यद्यपि पृषध्रने जान-बूझकर अपराध नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठजीने उसे शाप दिया कि ‘तुम इस कर्मसे क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ’॥ ९॥"},{"id":"9.2.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/10/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्णात् कृतांजलिः।","अधारयद् व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता मुनिप्रियम्॥ १०"],"iast":["evaṃ śaptastu guruṇā pratyagṛhṇāt kṛtāṃjaliḥ|","adhārayad vrataṃ vīra ūrdhvaretā munipriyam|| 10"],"meaning":"पृषध्रने अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण किया॥ १०॥"},{"id":"9.2.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/11/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेऽमले।","एकान्तित्वं गतो भक्त्या सर्वभूतसुहृत् समः॥ ११"],"iast":["vāsudeve bhagavati sarvātmani pare'male|","ekāntitvaṃ gato bhaktyā sarvabhūtasuhṛt samaḥ|| 11"],"meaning":"वह समस्त प्राणियोंका अहैतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान भावसे युक्त होकर भक्तिके द्वारा परम विशुद्ध सर्वात्मा भगवान् वासुदेवका अनन्य प्रेमी हो गया॥ ११॥"},{"id":"9.2.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/12/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विमुक्तसंगः शान्तात्मा संयताक्षोऽपरिग्रहः।","यदृच्छयोपपन्‍नेन कल्पयन् वृत्तिमात्मनः॥ १२"],"iast":["vimuktasaṃgaḥ śāntātmā saṃyatākṣo'parigrahaḥ|","yadṛcchayopapannena kalpayan vṛttimātmanaḥ|| 12"],"meaning":"उसकी सारी आसक्तियाँ मिट गयीं। वृत्तियाँ शान्त हो गयीं। इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं। वह कभी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह नहीं रखता था। जो कुछ दैववश प्राप्त हो जाता, उसीसे अपना जीवन-निर्वाह कर लेता॥ १२॥"},{"id":"9.2.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/13/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्तः समाहितः।","विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः॥ १३"],"iast":["ātmanyātmānamādhāya jñānatṛptaḥ samāhitaḥ|","vicacāra mahīmetāṃ jaḍāndhabadhirākṛtiḥ|| 13"],"meaning":"वह आत्मज्ञानसे सन्तुष्ट एवं अपने चित्तको परमात्मामें स्थित करके प्रायः समाधिस्थ रहता। कभी-कभी जड, अंधे और बहरेके समान पृथ्वीपर विचरण करता॥ १३॥"},{"id":"9.2.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/14/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्‍निमुत्थितम्।","तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः॥ १४"],"iast":["evaṃvṛtto vanaṃ gatvā dṛṣṭvā dāvāgnimutthitam|","tenopayuktakaraṇo brahma prāpa paraṃ muniḥ|| 14"],"meaning":"इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वनमें गया। वहाँ उसने देखा कि दावानल धधक रहा है। मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियोंको उसी अग्‍निमें भस्म करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गया॥ १४॥"},{"id":"9.2.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/15/","page":12,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कविः कनीयान् विषयेषु निःस्पृहो","विसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम्।","निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषं","विवेश कैशोरवयाः परं गतः॥ १५"],"iast":["kaviḥ kanīyān viṣayeṣu niḥspṛho","visṛjya rājyaṃ saha bandhubhirvanam|","niveśya citte puruṣaṃ svarociṣaṃ","viveśa kaiśoravayāḥ paraṃ gataḥ|| 15"],"meaning":"मनुका सबसे छोटा पुत्र था कवि। विषयोंसे वह अत्यन्त निःस्पृह था। वह राज्य छोड़कर अपने बन्धुओंके साथ वनमें चला गया और अपने हृदयमें स्वयंप्रकाश परमात्माको विराजमान कर किशोर अवस्थामें ही परम पदको प्राप्त हो गया॥ १५॥"},{"id":"9.2.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/16/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["करूषान्मानवादासन् कारूषाः क्षत्रजातयः।","उत्तरापथगोप्तारो ब्रह्मण्या धर्मवत्सलाः॥ १६"],"iast":["karūṣānmānavādāsan kārūṣāḥ kṣatrajātayaḥ|","uttarāpathagoptāro brahmaṇyā dharmavatsalāḥ|| 16"],"meaning":"मनुपुत्र करूषसे कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्‍न हुए। वे बड़े ही ब्राह्मणभक्त, धर्मप्रेमी एवं उत्तरापथके रक्षक थे॥ १६॥"},{"id":"9.2.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/17/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धृष्टाद् धार्ष्टमभूत् क्षत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ।","नृगस्य वंशः सुमतिर्भूतज्योतिस्ततो वसुः॥ १७"],"iast":["dhṛṣṭād dhārṣṭamabhūt kṣatraṃ brahmabhūyaṃ gataṃ kṣitau|","nṛgasya vaṃśaḥ sumatirbhūtajyotistato vasuḥ|| 17"],"meaning":"धृष्टके धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए। अन्तमें वे इस शरीरसे ही ब्राह्मण बन गये। नृगका पुत्र हुआ सुमति, उसका पुत्र भूतज्योति और भूतज्योतिका पुत्र वसु था॥ १७॥"},{"id":"9.2.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/18/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसोः प्रतीकस्तत्पुत्र ओघवानोघवत्पिता।","कन्या चौघवती नाम सुदर्शन उवाह ताम्॥ १८"],"iast":["vasoḥ pratīkastatputra oghavānoghavatpitā|","kanyā caughavatī nāma sudarśana uvāha tām|| 18"],"meaning":"वसुका पुत्र प्रतीक और प्रतीकका पुत्र ओघवान्। ओघवान्के पुत्रका नाम भी ओघवान् ही था। उनके एक ओघवती नामकी कन्या भी थी, जिसका विवाह सुदर्शनसे हुआ॥ १८॥"},{"id":"9.2.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/19/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चित्रसेनो नरिष्यन्तादृक्षस्तस्य सुतोऽभवत्।","तस्य मीढ्वांस्ततः कूर्च इन्द्रसेनस्तु तत्सुतः॥ १९"],"iast":["citraseno nariṣyantādṛkṣastasya suto'bhavat|","tasya mīḍhvāṃstataḥ kūrca indrasenastu tatsutaḥ|| 19"],"meaning":"मनुपुत्र नरिष्यन्तसे चित्रसेन, उससे ऋक्ष, ऋक्षसे मीढ्वान्, मीढ्वान्से कूर्च और उससे इन्द्रसेनकी उत्पत्ति हुई॥ १९॥"},{"id":"9.2.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/20/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वीतिहोत्रस्त्विन्द्रसेनात् तस्य सत्यश्रवा अभूत्।","उरुश्रवाः सुतस्तस्य देवदत्तस्ततोऽभवत्॥ २०"],"iast":["vītihotrastvindrasenāt tasya satyaśravā abhūt|","uruśravāḥ sutastasya devadattastato'bhavat|| 20"],"meaning":"इन्द्रसेनसे वीतिहोत्र, उससे सत्यश्रवा, सत्यश्रवासे उरुश्रवा और उससे देवदत्तकी उत्पत्ति हुई॥ २०॥"},{"id":"9.2.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/21/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽग्‍निवेश्यो भगवानग्‍निः स्वयमभूत् सुतः।","कानीन इति विख्यातो जातूकर्ण्यो महानृषिः॥ २१"],"iast":["tato'gniveśyo bhagavānagniḥ svayamabhūt sutaḥ|","kānīna iti vikhyāto jātūkarṇyo mahānṛṣiḥ|| 21"],"meaning":"देवदत्तके अग्‍निवेश्य नामक पुत्र हुए, जो स्वयं अग्‍निदेव ही थे। आगे चलकर वे ही कानीन एवं महर्षि जातूकर्ण्यके नामसे विख्यात हुए॥ २१॥"},{"id":"9.2.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/22/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो ब्रह्मकुलं जातमाग्‍निवेश्यायनं नृप।","नरिष्यन्तान्वयः प्रोक्तो दिष्टवंशमतः शृणु॥ २२"],"iast":["tato brahmakulaṃ jātamāgniveśyāyanaṃ nṛpa|","nariṣyantānvayaḥ prokto diṣṭavaṃśamataḥ śṛṇu|| 22"],"meaning":"परीक्षित्! ब्राह्मणोंका ‘आग्‍निवेश्यायन’ गोत्र उन्हींसे चला है। इस प्रकार नरिष्यन्तके वंशका मैंने वर्णन किया, अब दिष्टका वंश सुनो॥ २२॥"},{"id":"9.2.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/23/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाभागो दिष्टपुत्रोऽन्यः कर्मणा वैश्यतां गतः।","भलन्दनः सुतस्तस्य वत्सप्रीतिर्भलन्दनात्॥ २३"],"iast":["nābhāgo diṣṭaputro'nyaḥ karmaṇā vaiśyatāṃ gataḥ|","bhalandanaḥ sutastasya vatsaprītirbhalandanāt|| 23"],"meaning":"दिष्टके पुत्रका नाम था नाभाग। यह उस नाभागसे अलग है, जिसका मैं आगे वर्णन करूँगा। वह अपने कर्मके कारण वैश्य हो गया। उसका पुत्र हुआ भलन्दन और उसका वत्सप्रीति॥ २३॥"},{"id":"9.2.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/24/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वत्सप्रीतेः सुतः प्रांशुस्तत्सुतं प्रमतिं विदुः।","खनित्रः प्रमतेस्तस्माच्चाक्षुषोऽथ विविंशतिः॥ २४"],"iast":["vatsaprīteḥ sutaḥ prāṃśustatsutaṃ pramatiṃ viduḥ|","khanitraḥ pramatestasmāccākṣuṣo'tha viviṃśatiḥ|| 24"],"meaning":"वत्सप्रीतिका प्रांशु और प्रांशुका पुत्र हुआ प्रमति। प्रमतिके खनित्र, खनित्रके चाक्षुष और उनके विविंशति हुए॥ २४॥"},{"id":"9.2.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/25/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विविंशतिसुतो रम्भः खनिनेत्रोऽस्य धार्मिकः।","करन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो नृप॥ २५"],"iast":["viviṃśatisuto rambhaḥ khaninetro'sya dhārmikaḥ|","karandhamo mahārāja tasyāsīdātmajo nṛpa|| 25"],"meaning":"विविंशतिके पुत्र रम्भ और रम्भके पुत्र खनिनेत्र—दोनों ही परम धार्मिक हुए। उनके पुत्र करन्धम और करन्धमके अवीक्षित्। महाराज परीक्षित्! अवीक्षित्के पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा हुए। उनसे अंगिराके पुत्र महायोगी संवर्त्त ऋषिने यज्ञ कराया था॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"9.2.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/26/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यावीक्षित् सुतो यस्य मरुत्तश्‍चक्रवर्त्यभूत्।","संवर्तोऽयाजयद् यं वै महायोग्यंगिरःसुतः॥ २६"],"iast":["tasyāvīkṣit suto yasya maruttaścakravartyabhūt|","saṃvarto'yājayad yaṃ vai mahāyogyaṃgiraḥsutaḥ|| 26"],"meaning":"विविंशतिके पुत्र रम्भ और रम्भके पुत्र खनिनेत्र—दोनों ही परम धार्मिक हुए। उनके पुत्र करन्धम और करन्धमके अवीक्षित्। महाराज परीक्षित्! अवीक्षित्के पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा हुए। उनसे अंगिराके पुत्र महायोगी संवर्त्त ऋषिने यज्ञ कराया था॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"9.2.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/27/","page":13,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मरुत्तस्य यथा यज्ञो न तथान्यस्य कश्‍चन।","सर्वं हिरण्मयं त्वासीद् यत् किञ्चिच्चास्यशोभनम्॥ २७"],"iast":["maruttasya yathā yajño na tathānyasya kaścana|","sarvaṃ hiraṇmayaṃ tvāsīd yat kiñciccāsyaśobhanam|| 27"],"meaning":"मरुत्तका यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसीका नहीं हुआ। उस यज्ञके समस्त छोटे-बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए थे॥ २७॥"},{"id":"9.2.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/28/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः।","मरुतः परिवेष्टारो विश्‍वेदेवाः सभासदः॥ २८"],"iast":["amādyadindraḥ somena dakṣiṇābhirdvijātayaḥ|","marutaḥ pariveṣṭāro viśvedevāḥ sabhāsadaḥ|| 28"],"meaning":"उस यज्ञमें इन्द्र सोमपान करके मतवाले हो गये थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मण तृप्त हो गये थे। उसमें परसनेवाले थे मरुद्गण और विश्‍वेदेव सभासद् थे॥ २८॥"},{"id":"9.2.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/29/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मरुत्तस्य दमः पुत्रस्तस्यासीद् राज्यवर्धनः।","सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नरः सुतः॥ २९"],"iast":["maruttasya damaḥ putrastasyāsīd rājyavardhanaḥ|","sudhṛtistatsuto jajñe saudhṛteyo naraḥ sutaḥ|| 29"],"meaning":"मरुत्तके पुत्रका नाम था दम। दमसे राज्यवर्धन, उससे सुधृति और सुधृतिसे नर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई॥ २९॥"},{"id":"9.2.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/30/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्सुतः केवलस्तस्माद् बन्धुमान् वेगवांस्ततः।","बन्धुस्तस्याभवद् यस्य तृणबिन्दुर्महीपतिः॥ ३०"],"iast":["tatsutaḥ kevalastasmād bandhumān vegavāṃstataḥ|","bandhustasyābhavad yasya tṛṇabindurmahīpatiḥ|| 30"],"meaning":"नरसे केवल, केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान्से वेगवान्, वेगवान्से बन्धु और बन्धुसे राजा तृणबिन्दुका जन्म हुआ॥ ३०॥"},{"id":"9.2.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/31/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं भेजेऽलम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम्।","वराप्सरा यतः पुत्राः कन्या चेडविडाभवत्॥ ३१"],"iast":["taṃ bheje'lambuṣā devī bhajanīyaguṇālayam|","varāpsarā yataḥ putrāḥ kanyā ceḍaviḍābhavat|| 31"],"meaning":"तृणबिन्दु आदर्श गुणोंके भण्डार थे।अप्सराओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषा देवीने उनको वरण किया, जिससे उनके कई पुत्र और इडविडा नामकी एक कन्या उत्पन्‍न हुई॥ ३१॥"},{"id":"9.2.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/32/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यामुत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम्।","प्रादाय विद्यां परमामृषिर्योगेश्‍वरात् पितुः॥ ३२"],"iast":["tasyāmutpādayāmāsa viśravā dhanadaṃ sutam|","prādāya vidyāṃ paramāmṛṣiryogeśvarāt pituḥ|| 32"],"meaning":"मुनिवर विश्रवाने अपने योगेश्‍वर पिता पुलस्त्यजीसे उत्तम विद्या प्राप्त करके इडविडाके गर्भसे लोकपाल कुबेरको पुत्ररूपमें उत्पन्‍न किया॥ ३२॥"},{"id":"9.2.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/33/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विशालः शून्यबन्धुश्‍च धूम्रकेतुश्‍च तत्सुताः।","विशालो वंशकृद् राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम्॥ ३३"],"iast":["viśālaḥ śūnyabandhuśca dhūmraketuśca tatsutāḥ|","viśālo vaṃśakṛd rājā vaiśālīṃ nirmame purīm|| 33"],"meaning":"महाराज तृणबिन्दुके अपनी धर्मपत्‍नीसे तीन पुत्र हुए—विशाल, शून्यबन्धु और धूम्रकेतु। उनमेंसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नामकी नगरी बसायी॥ ३३॥"},{"id":"9.2.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/34/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हेमचन्द्रः सुतस्तस्य धूम्राक्षस्तस्य चात्मजः।","तत्पुत्रात् संयमादासीत् कृशाश्‍वः सहदेवजः॥ ३४"],"iast":["hemacandraḥ sutastasya dhūmrākṣastasya cātmajaḥ|","tatputrāt saṃyamādāsīt kṛśāśvaḥ sahadevajaḥ|| 34"],"meaning":"विशालसे हेमचन्द्र, हेमचन्द्रसे धूम्राक्ष, धूम्राक्षसे संयम और संयमसे दो पुत्र हुए—कृशाश्‍व और देवज॥ ३४॥"},{"id":"9.2.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/35/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृशाश्‍वात् सोमदत्तोऽभूद् योऽश्‍वमेधैरिडस्पतिम्।","इष्ट्वा पुरुषमापाग्र्यां गतिं योगेश्‍वराश्रितः॥ ३५"],"iast":["kṛśāśvāt somadatto'bhūd yo'śvamedhairiḍaspatim|","iṣṭvā puruṣamāpāgryāṃ gatiṃ yogeśvarāśritaḥ|| 35"],"meaning":"कृशाश्‍वके पुत्रका नाम था सोमदत्त। उसने अश्‍वमेध यज्ञोंके द्वारा यज्ञपति भगवान्‌की आराधना की और योगेश्‍वर संतोंका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की॥ ३५॥"},{"id":"9.2.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/36/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौमदत्तिस्तु सुमतिस्तत्सुतो जनमेजयः।","एते वैशालभूपालास्तृणबिन्दोर्यशोधराः॥ ३६"],"iast":["saumadattistu sumatistatsuto janamejayaḥ|","ete vaiśālabhūpālāstṛṇabindoryaśodharāḥ|| 36"],"meaning":"सोमदत्तका पुत्र हुआ सुमति और सुमतिसे जनमेजय। ये सब तृणबिन्दुकी कीर्तिको बढ़ानेवाले विशालवंशी राजा हुए॥ ३६॥"}],"text":[{"b":24559,"kind":"adhyaya_heading","page":11,"text":"अथ द्वितीयोऽध्यायः"},{"b":24560,"kind":"topic_heading","page":11,"text":"पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश"},{"b":24561,"kind":"topic_heading","page":11,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":24562,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.1"],"text":"एवं गतेऽथ सुद्युम्‍ने मनुर्वैवस्वतः सुते।"},{"b":24563,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.1"],"text":"पुत्रकामस्तपस्तेपे यमुनायां शतं समाः॥ १"},{"b":24564,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.2"],"text":"ततोऽयजन्मनुर्देवमपत्यार्थं हरिं प्रभुम्।"},{"b":24565,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.2"],"text":"इक्ष्वाकुपूर्वजान् पुत्राँल्लेभे स्वसदृशान् दश॥ २"},{"b":24566,"kind":"hindi_commentary","page":11,"explains":["9.2.1","9.2.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार जब सुद्युम्‍न तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये, तब वैवस्वत मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्षतक तपस्या की॥ १॥ इसके बाद उन्होंने सन्तानके लिये सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी आराधना की और अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे॥ २॥"},{"b":24568,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.3"],"text":"पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः।"},{"b":24569,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.3"],"text":"पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः॥ ३"},{"b":24570,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.4"],"text":"एकदा प्राविशद् गोष्ठं शार्दूलो निशि वर्षति।"},{"b":24571,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.4"],"text":"शयाना गाव उत्थाय भीतास्ता बभ्रमुर्व्रजे॥ ४"},{"b":24572,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.5"],"text":"एकां जग्राह बलवान् सा चुक्रोश भयातुरा।"},{"b":24573,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.5"],"text":"तस्यास्तत् क्रन्दितं श्रुत्वा पृषध्रोऽभिससार ह॥ ५"},{"b":24574,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.6"],"text":"खड्गमादाय तरसा प्रलीनोडुगणे निशि।"},{"b":24575,"kind":"sanskrit_shloka","page":11,"verses":["9.2.6"],"text":"अजानन्‍नहनद् बभ्रोः शिरः शार्दूलशंकया॥ ६"},{"b":24576,"kind":"hindi_translation","page":11,"explains":["9.2.3","9.2.4","9.2.5","9.2.6"],"text":"उन मनुपुत्रोंमेंसे एकका नाम था पृषध्र। गुरु वसिष्ठजीने उसे गायोंकी रक्षामें नियुक्त कर रखा था, अतः वह रात्रिके समय बड़ी सावधानीसे वीरासनसे बैठा रहता और गायोंकी रक्षा करता॥ ३॥ एक दिन रातमें वर्षा हो रही थी। उस समय गायोंके झुंडमें एक बाघ घुस आया। उससे डरकर सोयी हुई गौएँ उठ खड़ी हुईं। वे गोशालामें ही इधर-उधर भागने लगीं॥ ४॥ बलवान् बाघने एक गायको पकड़ लिया। वह अत्यन्त भयभीत होकर चिल्लाने लगी। उसका वह क्रन्दन सुनकर पृषध्र गायके पास दौड़ आया॥ ५॥ एक तो रातका समय और दूसरे घनघोर घटाओंसे आच्छादित होनेके कारण तारे भी नहीं दीखते थे। उसने हाथमें तलवार उठाकर अनजानमें ही बड़े वेगसे गायका सिर काट दिया। वह समझ रहा था कि यही बाघ है॥ ६॥"},{"b":24577,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.7"],"text":"व्याघ्रोऽपि वृक्णश्रवणो निस्त्रिंशाग्राहतस्ततः।"},{"b":24578,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.7"],"text":"निश्‍चक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि समुत्सृजन्॥ ७"},{"b":24579,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.8"],"text":"मन्यमानो हतं व्याघ्रं पृषध्रः परवीरहा।"},{"b":24580,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.8"],"text":"अद्राक्षीत् स्वहतां बभ्रुं व्युष्टायां निशि दुःखितः॥ ८"},{"b":24581,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.7","9.2.8"],"text":"तलवारकी नोकसे बाघका भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्तेमें खून गिराता हुआ वहाँसे निकल भागा॥ ७॥ शत्रुदमन पृषध्रने यह समझा कि बाघ मर गया। परंतु रात बीतनेपर उसने देखा कि मैंने तो गायको ही मार डाला है, इससे उसे बड़ा दुःख हुआ॥ ८॥"},{"b":24582,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.9"],"text":"तं शशाप कुलाचार्यः कृतागसमकामतः।"},{"b":24583,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.9"],"text":"न क्षत्रबन्धुः शूद्रस्त्वं कर्मणा भवितामुना॥ ९"},{"b":24584,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.10"],"text":"एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्णात् कृतांजलिः।"},{"b":24585,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.10"],"text":"अधारयद् व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता मुनिप्रियम्॥ १०"},{"b":24586,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.9","9.2.10"],"text":"यद्यपि पृषध्रने जान-बूझकर अपराध नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठजीने उसे शाप दिया कि ‘तुम इस कर्मसे क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ’॥ ९॥ पृषध्रने अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण किया॥ १०॥"},{"b":24587,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.11"],"text":"वासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेऽमले।"},{"b":24588,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.11"],"text":"एकान्तित्वं गतो भक्त्या सर्वभूतसुहृत् समः॥ ११"},{"b":24589,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.12"],"text":"विमुक्तसंगः शान्तात्मा संयताक्षोऽपरिग्रहः।"},{"b":24590,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.12"],"text":"यदृच्छयोपपन्‍नेन कल्पयन् वृत्तिमात्मनः॥ १२"},{"b":24591,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.11","9.2.12"],"text":"वह समस्त प्राणियोंका अहैतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान भावसे युक्त होकर भक्तिके द्वारा परम विशुद्ध सर्वात्मा भगवान् वासुदेवका अनन्य प्रेमी हो गया॥ ११॥ उसकी सारी आसक्तियाँ मिट गयीं। वृत्तियाँ शान्त हो गयीं। इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं। वह कभी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह नहीं रखता था। जो कुछ दैववश प्राप्त हो जाता, उसीसे अपना जीवन-निर्वाह कर लेता॥ १२॥"},{"b":24592,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.13"],"text":"आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्तः समाहितः।"},{"b":24593,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.13"],"text":"विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः॥ १३"},{"b":24594,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.13"],"text":"वह आत्मज्ञानसे सन्तुष्ट एवं अपने चित्तको परमात्मामें स्थित करके प्रायः समाधिस्थ रहता। कभी-कभी जड, अंधे और बहरेके समान पृथ्वीपर विचरण करता॥ १३॥"},{"b":24595,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.14"],"text":"एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्‍निमुत्थितम्।"},{"b":24596,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.14"],"text":"तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः॥ १४"},{"b":24597,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.14"],"text":"इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वनमें गया। वहाँ उसने देखा कि दावानल धधक रहा है। मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियोंको उसी अग्‍निमें भस्म करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गया॥ १४॥"},{"b":24598,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.15"],"text":"कविः कनीयान् विषयेषु निःस्पृहो"},{"b":24599,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.15"],"text":"विसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम्।"},{"b":24600,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.15"],"text":"निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषं"},{"b":24601,"kind":"sanskrit_shloka","page":12,"verses":["9.2.15"],"text":"विवेश कैशोरवयाः परं गतः॥ १५"},{"b":24602,"kind":"hindi_translation","page":12,"explains":["9.2.15"],"text":"मनुका सबसे छोटा पुत्र था कवि। विषयोंसे वह अत्यन्त निःस्पृह था। वह राज्य छोड़कर अपने बन्धुओंके साथ वनमें चला गया और अपने हृदयमें स्वयंप्रकाश परमात्माको विराजमान कर किशोर अवस्थामें ही परम पदको प्राप्त हो गया॥ १५॥"},{"b":24603,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.16"],"text":"करूषान्मानवादासन् कारूषाः क्षत्रजातयः।"},{"b":24604,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.16"],"text":"उत्तरापथगोप्तारो ब्रह्मण्या धर्मवत्सलाः॥ १६"},{"b":24605,"kind":"hindi_translation","page":13,"explains":["9.2.16"],"text":"मनुपुत्र करूषसे कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्‍न हुए। वे बड़े ही ब्राह्मणभक्त, धर्मप्रेमी एवं उत्तरापथके रक्षक थे॥ १६॥"},{"b":24606,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.17"],"text":"धृष्टाद् धार्ष्टमभूत् क्षत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ।"},{"b":24607,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.17"],"text":"नृगस्य वंशः सुमतिर्भूतज्योतिस्ततो वसुः॥ १७"},{"b":24608,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.18"],"text":"वसोः प्रतीकस्तत्पुत्र ओघवानोघवत्पिता।"},{"b":24609,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.18"],"text":"कन्या चौघवती नाम सुदर्शन उवाह ताम्॥ १८"},{"b":24610,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.19"],"text":"चित्रसेनो नरिष्यन्तादृक्षस्तस्य सुतोऽभवत्।"},{"b":24611,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.19"],"text":"तस्य मीढ्वांस्ततः कूर्च इन्द्रसेनस्तु तत्सुतः॥ १९"},{"b":24612,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.20"],"text":"वीतिहोत्रस्त्विन्द्रसेनात् तस्य सत्यश्रवा अभूत्।"},{"b":24613,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.20"],"text":"उरुश्रवाः सुतस्तस्य देवदत्तस्ततोऽभवत्॥ २०"},{"b":24614,"kind":"hindi_translation","page":13,"explains":["9.2.17","9.2.18","9.2.19","9.2.20"],"text":"धृष्टके धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए। अन्तमें वे इस शरीरसे ही ब्राह्मण बन गये। नृगका पुत्र हुआ सुमति, उसका पुत्र भूतज्योति और भूतज्योतिका पुत्र वसु था॥ १७॥ वसुका पुत्र प्रतीक और प्रतीकका पुत्र ओघवान्। ओघवान्के पुत्रका नाम भी ओघवान् ही था। उनके एक ओघवती नामकी कन्या भी थी, जिसका विवाह सुदर्शनसे हुआ॥ १८॥ मनुपुत्र नरिष्यन्तसे चित्रसेन, उससे ऋक्ष, ऋक्षसे मीढ्वान्, मीढ्वान्से कूर्च और उससे इन्द्रसेनकी उत्पत्ति हुई॥ १९॥ इन्द्रसेनसे वीतिहोत्र, उससे सत्यश्रवा, सत्यश्रवासे उरुश्रवा और उससे देवदत्तकी उत्पत्ति हुई॥ २०॥"},{"b":24615,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.21"],"text":"ततोऽग्‍निवेश्यो भगवानग्‍निः स्वयमभूत् सुतः।"},{"b":24616,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.21"],"text":"कानीन इति विख्यातो जातूकर्ण्यो महानृषिः॥ २१"},{"b":24617,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.22"],"text":"ततो ब्रह्मकुलं जातमाग्‍निवेश्यायनं नृप।"},{"b":24618,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.22"],"text":"नरिष्यन्तान्वयः प्रोक्तो दिष्टवंशमतः शृणु॥ २२"},{"b":24619,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.23"],"text":"नाभागो दिष्टपुत्रोऽन्यः कर्मणा वैश्यतां गतः।"},{"b":24620,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.23"],"text":"भलन्दनः सुतस्तस्य वत्सप्रीतिर्भलन्दनात्॥ २३"},{"b":24621,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.24"],"text":"वत्सप्रीतेः सुतः प्रांशुस्तत्सुतं प्रमतिं विदुः।"},{"b":24622,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.24"],"text":"खनित्रः प्रमतेस्तस्माच्चाक्षुषोऽथ विविंशतिः॥ २४"},{"b":24623,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.25"],"text":"विविंशतिसुतो रम्भः खनिनेत्रोऽस्य धार्मिकः।"},{"b":24624,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.25"],"text":"करन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो नृप॥ २५"},{"b":24625,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.26"],"text":"तस्यावीक्षित् सुतो यस्य मरुत्तश्‍चक्रवर्त्यभूत्।"},{"b":24626,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.26"],"text":"संवर्तोऽयाजयद् यं वै महायोग्यंगिरःसुतः॥ २६"},{"b":24627,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.27"],"text":"मरुत्तस्य यथा यज्ञो न तथान्यस्य कश्‍चन।"},{"b":24628,"kind":"sanskrit_shloka","page":13,"verses":["9.2.27"],"text":"सर्वं हिरण्मयं त्वासीद् यत् किञ्चिच्चास्यशोभनम्॥ २७"},{"b":24629,"kind":"hindi_translation","page":13,"explains":["9.2.21","9.2.22","9.2.23","9.2.24","9.2.25","9.2.26","9.2.27"],"text":"देवदत्तके अग्‍निवेश्य नामक पुत्र हुए, जो स्वयं अग्‍निदेव ही थे। आगे चलकर वे ही कानीन एवं महर्षि जातूकर्ण्यके नामसे विख्यात हुए॥ २१॥ परीक्षित्! ब्राह्मणोंका ‘आग्‍निवेश्यायन’ गोत्र उन्हींसे चला है। इस प्रकार नरिष्यन्तके वंशका मैंने वर्णन किया, अब दिष्टका वंश सुनो॥ २२॥ दिष्टके पुत्रका नाम था नाभाग। यह उस नाभागसे अलग है, जिसका मैं आगे वर्णन करूँगा। वह अपने कर्मके कारण वैश्य हो गया। उसका पुत्र हुआ भलन्दन और उसका वत्सप्रीति॥ २३॥ वत्सप्रीतिका प्रांशु और प्रांशुका पुत्र हुआ प्रमति। प्रमतिके खनित्र, खनित्रके चाक्षुष और उनके विविंशति हुए॥ २४॥ विविंशतिके पुत्र रम्भ और रम्भके पुत्र खनिनेत्र—दोनों ही परम धार्मिक हुए। उनके पुत्र करन्धम और करन्धमके अवीक्षित्। महाराज परीक्षित्! अवीक्षित्के पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा हुए। उनसे अंगिराके पुत्र महायोगी संवर्त्त ऋषिने यज्ञ कराया था॥ २५-२६॥ मरुत्तका यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसीका नहीं हुआ। उस यज्ञके समस्त छोटे-बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए थे॥ २७॥"},{"b":24630,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.28"],"text":"अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः।"},{"b":24631,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.28"],"text":"मरुतः परिवेष्टारो विश्‍वेदेवाः सभासदः॥ २८"},{"b":24632,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.29"],"text":"मरुत्तस्य दमः पुत्रस्तस्यासीद् राज्यवर्धनः।"},{"b":24633,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.29"],"text":"सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नरः सुतः॥ २९"},{"b":24634,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.30"],"text":"तत्सुतः केवलस्तस्माद् बन्धुमान् वेगवांस्ततः।"},{"b":24635,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.30"],"text":"बन्धुस्तस्याभवद् यस्य तृणबिन्दुर्महीपतिः॥ ३०"},{"b":24636,"kind":"hindi_commentary","page":14,"explains":["9.2.28","9.2.29","9.2.30"],"text":"उस यज्ञमें इन्द्र सोमपान करके मतवाले हो गये थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मण तृप्त हो गये थे। उसमें परसनेवाले थे मरुद्गण और विश्‍वेदेव सभासद् थे॥ २८॥ मरुत्तके पुत्रका नाम था दम। दमसे राज्यवर्धन, उससे सुधृति और सुधृतिसे नर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई॥ २९॥ नरसे केवल, केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान्से वेगवान्, वेगवान्से बन्धु और बन्धुसे राजा तृणबिन्दुका जन्म हुआ॥ ३०॥"},{"b":24637,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.31"],"text":"तं भेजेऽलम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम्।"},{"b":24638,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.31"],"text":"वराप्सरा यतः पुत्राः कन्या चेडविडाभवत्॥ ३१"},{"b":24639,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.32"],"text":"तस्यामुत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम्।"},{"b":24640,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.32"],"text":"प्रादाय विद्यां परमामृषिर्योगेश्‍वरात् पितुः॥ ३२"},{"b":24641,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.33"],"text":"विशालः शून्यबन्धुश्‍च धूम्रकेतुश्‍च तत्सुताः।"},{"b":24642,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.33"],"text":"विशालो वंशकृद् राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम्॥ ३३"},{"b":24643,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.34"],"text":"हेमचन्द्रः सुतस्तस्य धूम्राक्षस्तस्य चात्मजः।"},{"b":24644,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.34"],"text":"तत्पुत्रात् संयमादासीत् कृशाश्‍वः सहदेवजः॥ ३४"},{"b":24645,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.35"],"text":"कृशाश्‍वात् सोमदत्तोऽभूद् योऽश्‍वमेधैरिडस्पतिम्।"},{"b":24646,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.35"],"text":"इष्ट्वा पुरुषमापाग्र्यां गतिं योगेश्‍वराश्रितः॥ ३५"},{"b":24647,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.36"],"text":"सौमदत्तिस्तु सुमतिस्तत्सुतो जनमेजयः।"},{"b":24648,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.2.36"],"text":"एते वैशालभूपालास्तृणबिन्दोर्यशोधराः॥ ३६"},{"b":24649,"kind":"hindi_commentary","page":14,"explains":["9.2.31","9.2.32","9.2.33","9.2.34","9.2.35","9.2.36"],"text":"तृणबिन्दु आदर्श गुणोंके भण्डार थे।अप्सराओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषा देवीने उनको वरण किया, जिससे उनके कई पुत्र और इडविडा नामकी एक कन्या उत्पन्‍न हुई॥ ३१॥ मुनिवर विश्रवाने अपने योगेश्‍वर पिता पुलस्त्यजीसे उत्तम विद्या प्राप्त करके इडविडाके गर्भसे लोकपाल कुबेरको पुत्ररूपमें उत्पन्‍न किया॥ ३२॥ महाराज तृणबिन्दुके अपनी धर्मपत्‍नीसे तीन पुत्र हुए—विशाल, शून्यबन्धु और धूम्रकेतु। उनमेंसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नामकी नगरी बसायी॥ ३३॥ विशालसे हेमचन्द्र, हेमचन्द्रसे धूम्राक्ष, धूम्राक्षसे संयम और संयमसे दो पुत्र हुए—कृशाश्‍व और देवज॥ ३४॥ कृशाश्‍वके पुत्रका नाम था सोमदत्त। उसने अश्‍वमेध यज्ञोंके द्वारा यज्ञपति भगवान्‌की आराधना की और योगेश्‍वर संतोंका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की॥ ३५॥ सोमदत्तका पुत्र हुआ सुमति और सुमतिसे जनमेजय। ये सब तृणबिन्दुकी कीर्तिको बढ़ानेवाले विशालवंशी राजा हुए॥ ३६॥"},{"b":24650,"kind":"hindi_translation","page":14,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥"}],"notes":[{"id":"v2:8","mark":"१","page":12,"after_verse":"9.2.13","text":"ज्ञानहृष्टः।"},{"id":"v2:9","mark":"१","page":13,"after_verse":"9.2.27","text":"च्चात्र।"}],"corrections":{"count":1,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}