{"id":"9.24","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 24","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्विंशोऽध्यायः","topics":["विदर्भके वंशका वर्णन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.24.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[112,118]},"verses":[{"id":"9.24.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/1/","page":112,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यां विदर्भोऽजनयत् पुत्रौ नाम्‍ना कुशक्रथौ।","तृतीयं रोमपादं च विदर्भकुलनन्दनम्॥ १"],"iast":["tasyāṃ vidarbho'janayat putrau nāmnā kuśakrathau|","tṛtīyaṃ romapādaṃ ca vidarbhakulanandanam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा विदर्भकी भोज्या नामक पत्‍नीसे तीन पुत्र हुए—कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भवंशमें बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए॥ १॥"},{"id":"9.24.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/2/","page":112,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रोमपादसुतो बभ्रुर्बभ्रोः कृतिरजायत।","उशिकस्तत्सुतस्तस्माच्चेदिश्‍चैद्यादयो नृप॥ २"],"iast":["romapādasuto babhrurbabhroḥ kṛtirajāyata|","uśikastatsutastasmāccediścaidyādayo nṛpa|| 2"],"meaning":"रोमपादका पुत्र बभ्रु, बभ्रुका कृति, कृतिका उशिक और उशिकका चेदि। राजन्! इस चेदिके वंशमें ही दमघोष एवं शिशुपाल आदि हुए॥ २॥"},{"id":"9.24.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/3/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्रथस्य कुन्तिः पुत्रोऽभूद् धृष्टिस्तस्याथ निर्वृतिः।","ततो दशार्हो नाम्‍नाभूत् तस्य व्योमः सुतस्ततः॥ ३"],"iast":["krathasya kuntiḥ putro'bhūd dhṛṣṭistasyātha nirvṛtiḥ|","tato daśārho nāmnābhūt tasya vyomaḥ sutastataḥ|| 3"],"meaning":"क्रथका पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्तिका धृष्टि, धृष्टिका निर्वृति, निर्वृतिका दशार्ह और दशार्हका व्योम॥ ३॥"},{"id":"9.24.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/4/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जीमूतो विकृतिस्तस्य यस्य भीमरथः सुतः।","ततो नवरथः पुत्रो जातो दशरथस्ततः॥ ४"],"iast":["jīmūto vikṛtistasya yasya bhīmarathaḥ sutaḥ|","tato navarathaḥ putro jāto daśarathastataḥ|| 4"],"meaning":"व्योमका जीमूत, जीमूतका विकृति, विकृतिका भीमरथ, भीमरथका नवरथ और नवरथका दशरथ हुआ॥ ४॥"},{"id":"9.24.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/5/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["करम्भिः शकुनेः पुत्रो देवरातस्तदात्मजः।","देवक्षत्रस्ततस्तस्य मधुः कुरुवशादनुः॥ ५"],"iast":["karambhiḥ śakuneḥ putro devarātastadātmajaḥ|","devakṣatrastatastasya madhuḥ kuruvaśādanuḥ|| 5"],"meaning":"दशरथसे शकुनि, शकुनिसे करम्भि, करम्भिसे देवरात, देवरातसे देवक्षत्र, देवक्षत्रसे मधु, मधुसे कुरुवश और कुरुवशसे अनु हुए॥ ५॥"},{"id":"9.24.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/6/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरुहोत्रस्त्वनोः पुत्रस्तस्यायुः सात्वतस्ततः।","भजमानो भजिर्दिव्यो वृष्णिर्देवावृधोऽन्धकः॥ ६"],"iast":["puruhotrastvanoḥ putrastasyāyuḥ sātvatastataḥ|","bhajamāno bhajirdivyo vṛṣṇirdevāvṛdho'ndhakaḥ|| 6"],"meaning":"अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे आयु और आयुसे सात्वतका जन्म हुआ। परीक्षित्! सात्वतके सात पुत्र हुए—भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमानकी दो पत्‍नियाँ थीं एकसे तीन पुत्र हुए—निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्‍नीसे भी तीन पुत्र हुए—शताजित्, सहस्राजित् और अयुताजित्॥ ६—८॥","meaning_covers":[6,8]},{"id":"9.24.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/7/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सात्वतस्य सुताः सप्त महाभोजश्‍च मारिष।","भजमानस्य निम्लोचिः किंकिणो धृष्टिरेव च॥ ७"],"iast":["sātvatasya sutāḥ sapta mahābhojaśca māriṣa|","bhajamānasya nimlociḥ kiṃkiṇo dhṛṣṭireva ca|| 7"],"meaning":"अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे आयु और आयुसे सात्वतका जन्म हुआ। परीक्षित्! सात्वतके सात पुत्र हुए—भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमानकी दो पत्‍नियाँ थीं एकसे तीन पुत्र हुए—निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्‍नीसे भी तीन पुत्र हुए—शताजित्, सहस्राजित् और अयुताजित्॥ ६—८॥","meaning_covers":[6,8]},{"id":"9.24.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/8/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकस्यामात्मजाः पत्‍न्यामन्यस्यां च त्रयः सुताः।","शताजिच्च सहस्राजिदयुताजिदिति प्रभो॥ ८"],"iast":["ekasyāmātmajāḥ patnyāmanyasyāṃ ca trayaḥ sutāḥ|","śatājicca sahasrājidayutājiditi prabho|| 8"],"meaning":"अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे आयु और आयुसे सात्वतका जन्म हुआ। परीक्षित्! सात्वतके सात पुत्र हुए—भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमानकी दो पत्‍नियाँ थीं एकसे तीन पुत्र हुए—निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्‍नीसे भी तीन पुत्र हुए—शताजित्, सहस्राजित् और अयुताजित्॥ ६—८॥","meaning_covers":[6,8]},{"id":"9.24.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/9/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बभ्रुर्देवावृधसुतस्तयोः श्‍लोकौ पठन्त्यमू।","यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात्॥ ९"],"iast":["babhrurdevāvṛdhasutastayoḥ ślokau paṭhantyamū|","yathaiva śṛṇumo dūrāt sampaśyāmastathāntikāt|| 9"],"meaning":"देवावृधके पुत्रका नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रुके सम्बन्धमें यह बात कही जाती है—‘हमने दूरसे जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकटसे देखते भी हैं॥ ९॥"},{"id":"9.24.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/10/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः।","पुरुषाः पंचषष्टिश्‍च षट् सहस्राणि चाष्ट च॥ १०"],"iast":["babhruḥ śreṣṭho manuṣyāṇāṃ devairdevāvṛdhaḥ samaḥ|","puruṣāḥ paṃcaṣaṣṭiśca ṣaṭ sahasrāṇi cāṣṭa ca|| 10"],"meaning":"बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओंके समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृधसे उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वतके पुत्रोंमें महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसीके वंशमें भोजवंशी यादव हुए॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"9.24.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/11/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि।","महाभोजोऽपि धर्मात्मा भोजा आसंस्तदन्वये॥ ११"],"iast":["ye'mṛtatvamanuprāptā babhrordevāvṛdhādapi|","mahābhojo'pi dharmātmā bhojā āsaṃstadanvaye|| 11"],"meaning":"बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओंके समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृधसे उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वतके पुत्रोंमें महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसीके वंशमें भोजवंशी यादव हुए॥ १०-११॥","meaning_covers":[10,11]},{"id":"9.24.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/12/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वृष्णेः सुमित्रः पुत्रोऽभूद् युधाजिच्च परंतप।","शिनिस्तस्यानमित्रश्‍च निम्‍नोऽभूदनमित्रतः॥ १२"],"iast":["vṛṣṇeḥ sumitraḥ putro'bhūd yudhājicca paraṃtapa|","śinistasyānamitraśca nimno'bhūdanamitrataḥ|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! वृष्णिके दो पुत्र हुए—सुमित्र और युधाजित्। युधाजित्के शिनि और अनमित्र—ये दो पुत्र थे। अनमित्रसे निम्‍नका जन्म हुआ॥ १२॥"},{"id":"9.24.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/13/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्राजितः प्रसेनश्‍च निम्‍नस्याप्यासतुः सुतौ।","अनमित्रसुतो योऽन्यः शिनिस्तस्याथ सत्यकः॥ १३"],"iast":["satrājitaḥ prasenaśca nimnasyāpyāsatuḥ sutau|","anamitrasuto yo'nyaḥ śinistasyātha satyakaḥ|| 13"],"meaning":"सत्राजित् और प्रसेन नामसे प्रसिद्ध यदुवंशी निम्‍नके ही पुत्र थे। अनमित्रका एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनिसे ही सत्यकका जन्म हुआ॥ १३॥"},{"id":"9.24.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/14/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["युयुधानः सात्यकिर्वै जयस्तस्य कुणिस्ततः।","युगन्धरोऽनमित्रस्य वृष्णिः पुत्रोऽपरस्ततः॥ १४"],"iast":["yuyudhānaḥ sātyakirvai jayastasya kuṇistataḥ|","yugandharo'namitrasya vṛṣṇiḥ putro'parastataḥ|| 14"],"meaning":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥","meaning_covers":[14,18]},{"id":"9.24.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/15/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्‍वफल्कश्‍चित्ररथश्‍च गान्दिन्यां च श्‍वफल्कतः।","अक्रूरप्रमुखा आसन् पुत्रा द्वादश विश्रुताः॥ १५"],"iast":["śvaphalkaścitrarathaśca gāndinyāṃ ca śvaphalkataḥ|","akrūrapramukhā āsan putrā dvādaśa viśrutāḥ|| 15"],"meaning":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥","meaning_covers":[14,18]},{"id":"9.24.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/16/","page":113,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसंगः सारमेयश्‍च मृदुरो मृदुविद् गिरिः।","धर्मवृद्धः सुकर्मा च क्षेत्रोपेक्षोऽरिमर्दनः॥ १६"],"iast":["āsaṃgaḥ sārameyaśca mṛduro mṛduvid giriḥ|","dharmavṛddhaḥ sukarmā ca kṣetropekṣo'rimardanaḥ|| 16"],"meaning":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥","meaning_covers":[14,18]},{"id":"9.24.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/17/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शत्रुघ्नो गन्धमादश्‍च प्रतिबाहुश्‍च द्वादश।","तेषां स्वसा सुचीराख्या द्वावक्रूरसुतावपि॥ १७"],"iast":["śatrughno gandhamādaśca pratibāhuśca dvādaśa|","teṣāṃ svasā sucīrākhyā dvāvakrūrasutāvapi|| 17"],"meaning":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥","meaning_covers":[14,18]},{"id":"9.24.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/18/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देववानुपदेवश्‍च तथा चित्ररथात्मजाः।","पृथुर्विदूरथाद्याश्‍च बहवो वृष्णिनन्दनाः॥ १८"],"iast":["devavānupadevaśca tathā citrarathātmajāḥ|","pṛthurvidūrathādyāśca bahavo vṛṣṇinandanāḥ|| 18"],"meaning":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥","meaning_covers":[14,18]},{"id":"9.24.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/19/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुकुरो भजमानश्‍च शुचिः कम्बलबर्हिषः।","कुकुरस्य सुतो वह्निर्विलोमा तनयस्ततः॥ १९"],"iast":["kukuro bhajamānaśca śuciḥ kambalabarhiṣaḥ|","kukurasya suto vahnirvilomā tanayastataḥ|| 19"],"meaning":"सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए—कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुरका पुत्र वह्नि, वह्निका विलोमा, विलोमाका कपोतरोमा और कपोतरोमाका अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्वके साथ अनुकी बड़ी मित्रता थी। अनुका पुत्र अन्धक, अन्धकका दुन्दुभि, दुन्दुभिका अरिद्योत, अरिद्योतका पुनर्वसु और पुनर्वसुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहुकी नामकी एक कन्या हुई। आहुकके दो पुत्र हुए—देवक और उग्रसेन। देवकके चार पुत्र हुए॥ १९—२१॥","meaning_covers":[19,21]},{"id":"9.24.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/20/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कपोतरोमा तस्यानुः सखा यस्य च तुम्बुरुः।","अन्धको दुन्दुभिस्तस्मादरिद्योतः पुनर्वसुः॥ २०"],"iast":["kapotaromā tasyānuḥ sakhā yasya ca tumburuḥ|","andhako dundubhistasmādaridyotaḥ punarvasuḥ|| 20"],"meaning":"सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए—कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुरका पुत्र वह्नि, वह्निका विलोमा, विलोमाका कपोतरोमा और कपोतरोमाका अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्वके साथ अनुकी बड़ी मित्रता थी। अनुका पुत्र अन्धक, अन्धकका दुन्दुभि, दुन्दुभिका अरिद्योत, अरिद्योतका पुनर्वसु और पुनर्वसुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहुकी नामकी एक कन्या हुई। आहुकके दो पुत्र हुए—देवक और उग्रसेन। देवकके चार पुत्र हुए॥ १९—२१॥","meaning_covers":[19,21]},{"id":"9.24.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/21/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्याहुकश्‍चाहुकी च कन्या चैवाहुकात्मजौ।","देवकश्‍चोग्रसेनश्‍च चत्वारो देवकात्मजाः॥ २१"],"iast":["tasyāhukaścāhukī ca kanyā caivāhukātmajau|","devakaścograsenaśca catvāro devakātmajāḥ|| 21"],"meaning":"सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए—कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुरका पुत्र वह्नि, वह्निका विलोमा, विलोमाका कपोतरोमा और कपोतरोमाका अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्वके साथ अनुकी बड़ी मित्रता थी। अनुका पुत्र अन्धक, अन्धकका दुन्दुभि, दुन्दुभिका अरिद्योत, अरिद्योतका पुनर्वसु और पुनर्वसुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहुकी नामकी एक कन्या हुई। आहुकके दो पुत्र हुए—देवक और उग्रसेन। देवकके चार पुत्र हुए॥ १९—२१॥","meaning_covers":[19,21]},{"id":"9.24.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/22/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देववानुपदेवश्‍च सुदेवो देववर्धनः।","तेषां स्वसारः सप्तासन् धृतदेवादयो नृप॥ २२"],"iast":["devavānupadevaśca sudevo devavardhanaḥ|","teṣāṃ svasāraḥ saptāsan dhṛtadevādayo nṛpa|| 22"],"meaning":"देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं—धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेवजीने इन सबके साथ विवाह किया था॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"9.24.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/23/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शान्तिदेवोपदेवा च श्रीदेवा देवरक्षिता।","सहदेवा देवकी च वसुदेव उवाह ताः॥ २३"],"iast":["śāntidevopadevā ca śrīdevā devarakṣitā|","sahadevā devakī ca vasudeva uvāha tāḥ|| 23"],"meaning":"देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं—धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेवजीने इन सबके साथ विवाह किया था॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"9.24.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/24/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कंसः सुनामा न्यग्रोधः कंकः शंकुः सुहूस्तथा।","राष्ट्रपालोऽथ सृष्टिश्‍च तुष्टिमानौग्रसेनयः॥ २४"],"iast":["kaṃsaḥ sunāmā nyagrodhaḥ kaṃkaḥ śaṃkuḥ suhūstathā|","rāṣṭrapālo'tha sṛṣṭiśca tuṣṭimānaugrasenayaḥ|| 24"],"meaning":"उग्रसेनके नौ लड़के थे—कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान्॥ २४॥"},{"id":"9.24.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/25/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कंसा कंसवती कंका शूरभू राष्ट्रपालिका।","उग्रसेनदुहितरो वसुदेवानुजस्त्रियः॥ २५"],"iast":["kaṃsā kaṃsavatī kaṃkā śūrabhū rāṣṭrapālikā|","ugrasenaduhitaro vasudevānujastriyaḥ|| 25"],"meaning":"उग्रसेनके पाँच कन्याएँ भी थीं—कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेवजीके छोटे भाइयोंसे हुआ था॥ २५॥"},{"id":"9.24.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/26/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शूरो विदूरथादासीद् भजमानः सुतस्ततः।","शिनिस्तस्मात् स्वयम्भोजो हृदीकस्तत्सुतो मतः॥ २६"],"iast":["śūro vidūrathādāsīd bhajamānaḥ sutastataḥ|","śinistasmāt svayambhojo hṛdīkastatsuto mataḥ|| 26"],"meaning":"चित्ररथके पुत्र विदूरथसे शूर, शूरसे भजमान, भजमानसे शिनि, शिनिसे स्वयम्भोज और स्वयम्भोजसे हृदीक हुए॥ २६॥"},{"id":"9.24.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/27/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवबाहुः शतधनुः कृतवर्मेति तत्सुताः।","देवमीढस्य शूरस्य मारिषा नाम पत्‍न्यभूत्॥ २७"],"iast":["devabāhuḥ śatadhanuḥ kṛtavarmeti tatsutāḥ|","devamīḍhasya śūrasya māriṣā nāma patnyabhūt|| 27"],"meaning":"हृदीकसे तीन पुत्र हुए—देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढके पुत्र शूरकी पत्‍नीका नाम था मारिषा॥ २७॥"},{"id":"9.24.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/28/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यां स जनयामास दश पुत्रानकल्मषान्।","वसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम्॥ २८"],"iast":["tasyāṃ sa janayāmāsa daśa putrānakalmaṣān|","vasudevaṃ devabhāgaṃ devaśravasamānakam|| 28"],"meaning":"उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥","meaning_covers":[28,31]},{"id":"9.24.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/29/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सृंजयं श्यामकं कंकं शमीकं वत्सकं वृकम्।","देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि॥ २९"],"iast":["sṛṃjayaṃ śyāmakaṃ kaṃkaṃ śamīkaṃ vatsakaṃ vṛkam|","devadundubhayo nedurānakā yasya janmani|| 29"],"meaning":"उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥","meaning_covers":[28,31]},{"id":"9.24.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/30/","page":114,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेवं हरेः स्थानं वदन्त्यानकदुन्दुभिम्।","पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्तिः श्रुतश्रवाः॥ ३०"],"iast":["vasudevaṃ hareḥ sthānaṃ vadantyānakadundubhim|","pṛthā ca śrutadevā ca śrutakīrtiḥ śrutaśravāḥ|| 30"],"meaning":"उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥","meaning_covers":[28,31]},{"id":"9.24.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/31/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्यः पंच कन्यकाः।","कुन्तेः सख्युः पिता शूरो ह्यपुत्रस्य पृथामदात्॥ ३१"],"iast":["rājādhidevī caiteṣāṃ bhaginyaḥ paṃca kanyakāḥ|","kunteḥ sakhyuḥ pitā śūro hyaputrasya pṛthāmadāt|| 31"],"meaning":"उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥","meaning_covers":[28,31]},{"id":"9.24.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/32/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["साऽऽप दुर्वाससो विद्यां देवहूतीं प्रतोषितात्।","तस्या वीर्यपरीक्षार्थमाजुहाव रविं शुचिम्॥ ३२"],"iast":["sā''pa durvāsaso vidyāṃ devahūtīṃ pratoṣitāt|","tasyā vīryaparīkṣārthamājuhāva raviṃ śucim|| 32"],"meaning":"पृथाने दुर्वासा ऋषिको प्रसन्‍न करके उनसे देवताओंको बुलानेकी विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्याके प्रभावकी परीक्षा लेनेके लिये पृथाने परम पवित्र भगवान् सूर्यका आवाहन किया॥ ३२॥"},{"id":"9.24.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/33/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदैवोपागतं देवं वीक्ष्य विस्मितमानसा।","प्रत्ययार्थं प्रयुक्ता मे याहि देव क्षमस्व मे॥ ३३"],"iast":["tadaivopāgataṃ devaṃ vīkṣya vismitamānasā|","pratyayārthaṃ prayuktā me yāhi deva kṣamasva me|| 33"],"meaning":"उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्तीका हृदय विस्मयसे भर गया। उसने कहा—‘भगवन्! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करनेके लिये ही इस विद्याका प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’॥ ३३॥"},{"id":"9.24.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/34/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अमोघं दर्शनं देवि आधित्से त्वयि चात्मजम्।","योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे॥ ३४"],"iast":["amoghaṃ darśanaṃ devi ādhitse tvayi cātmajam|","yoniryathā na duṣyeta kartāhaṃ te sumadhyame|| 34"],"meaning":"सूर्यदेवने कहा—‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिये हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्‍न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा’॥ ३४॥"},{"id":"9.24.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/35/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति तस्यां स आधाय गर्भं सूर्यो दिवं गतः।","सद्यः कुमारः संजज्ञे द्वितीय इव भास्करः॥ ३५"],"iast":["iti tasyāṃ sa ādhāya garbhaṃ sūryo divaṃ gataḥ|","sadyaḥ kumāraḥ saṃjajñe dvitīya iva bhāskaraḥ|| 35"],"meaning":"यह कहकर भगवान् सूर्यने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्‍न हुआ। वह देखनेमें दूसरे सूर्यके समान जान पड़ता था॥ ३५॥"},{"id":"9.24.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/36/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं सात्यजन्‍नदीतोये कृच्छ्राल्लोकस्य बिभ्यती।","प्रपितामहस्तामुवाह पाण्डुर्वै सत्यविक्रमः॥ ३६"],"iast":["taṃ sātyajannadītoye kṛcchrāllokasya bibhyatī|","prapitāmahastāmuvāha pāṇḍurvai satyavikramaḥ|| 36"],"meaning":"पृथा लोकनिन्दासे डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःखसे उस बालकको नदीके जलमें छोड़ दिया। परीक्षित्! उसी पृथाका विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डुसे हुआ था, जो वास्तवमें बड़े सच्चे वीर थे॥ ३६॥"},{"id":"9.24.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/37/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुतदेवां तु कारूषो वृद्धशर्मा समग्रहीत्।","यस्यामभूद् दन्तवक्त्र ऋषिशप्तो दितेः सुतः॥ ३७"],"iast":["śrutadevāṃ tu kārūṣo vṛddhaśarmā samagrahīt|","yasyāmabhūd dantavaktra ṛṣiśapto diteḥ sutaḥ|| 37"],"meaning":"परीक्षित्! पृथाकी छोटी बहिन श्रुतदेवाका विवाह करूष देशके अधिपति वृद्धशर्मासे हुआ था। उसके गर्भसे दन्तवक्त्रका जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्वजन्ममें सनकादि ऋषियोंके शापसे हिरण्याक्ष हुआ था॥ ३७॥"},{"id":"9.24.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/38/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कैकेयो धृष्टकेतुश्‍च श्रुतकीर्तिमविन्दत।","सन्तर्दनादयस्तस्य पंचासन् कैकयाः सुताः॥ ३८"],"iast":["kaikeyo dhṛṣṭaketuśca śrutakīrtimavindata|","santardanādayastasya paṃcāsan kaikayāḥ sutāḥ|| 38"],"meaning":"कैकय देशके राजा धृष्टकेतुने श्रुतकीर्तिसे विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए॥ ३८॥"},{"id":"9.24.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/39/","page":115,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजाधिदेव्यामावन्त्यौ जयसेनोऽजनिष्ट ह।","दमघोषश्‍चेदिराजः श्रुतश्रवसमग्रहीत्॥ ३९"],"iast":["rājādhidevyāmāvantyau jayaseno'janiṣṭa ha|","damaghoṣaścedirājaḥ śrutaśravasamagrahīt|| 39"],"meaning":"राजाधिदेवीका विवाह जयसेनसे हुआ था। उसके दो पुत्र हुए—विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्तीके राजा हुए। चेदिराज दमघोषने श्रुतश्रवाका पाणिग्रहण किया॥ ३९॥"},{"id":"9.24.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/40/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिशुपालः सुतस्तस्याः कथितस्तस्य सम्भवः।","देवभागस्य कंसायां चित्रकेतुबृहद्बलौ॥ ४०"],"iast":["śiśupālaḥ sutastasyāḥ kathitastasya sambhavaḥ|","devabhāgasya kaṃsāyāṃ citraketubṛhadbalau|| 40"],"meaning":"उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्धमें) कर चुका हूँ। वसुदेवजीके भाइयोंमेंसे देवभागकी पत्‍नी कंसाके गर्भसे दो पुत्र हुए—चित्रकेतु और बृहद्बल॥ ४०॥"},{"id":"9.24.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/41/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कंसवत्यां देवश्रवसः सुवीर इषुमांस्तथा।","कंकायामानकाज्जातः सत्यजित् पुरुजित् तथा॥ ४१"],"iast":["kaṃsavatyāṃ devaśravasaḥ suvīra iṣumāṃstathā|","kaṃkāyāmānakājjātaḥ satyajit purujit tathā|| 41"],"meaning":"देवश्रवाकी पत्‍नी कंसवतीसे सुवीर और इषुमान् नामके दो पुत्र हुए। आनककी पत्‍नी कंकाके गर्भसे भी दो पुत्र हुए—सत्यजित् और पुरुजित्॥ ४१॥"},{"id":"9.24.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/42/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सृंजयो राष्ट्रपाल्यां च वृषदुर्मर्षणादिकान्।","हरिकेशहिरण्याक्षौ शूरभूम्यां च श्यामकः॥ ४२"],"iast":["sṛṃjayo rāṣṭrapālyāṃ ca vṛṣadurmarṣaṇādikān|","harikeśahiraṇyākṣau śūrabhūmyāṃ ca śyāmakaḥ|| 42"],"meaning":"सृंजयने अपनी पत्‍नी राष्ट्रपालिकाके गर्भसे वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्‍न किये। इसी प्रकार श्यामकने शूरभूमि (शूरभू) नामकी पत्‍नीसे हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ४२॥"},{"id":"9.24.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/43/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन् वत्सकस्तथा।","तक्षपुष्करशालादीन् दुर्वार्क्ष्यां वृक आदधे॥ ४३"],"iast":["miśrakeśyāmapsarasi vṛkādīn vatsakastathā|","takṣapuṣkaraśālādīn durvārkṣyāṃ vṛka ādadhe|| 43"],"meaning":"मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे वत्सकके भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृकने दुर्वाक्षीके गर्भसे तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ४३॥"},{"id":"9.24.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/44/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुमित्रार्जुनपालादीञ्छमीकात्तु सुदामिनी।","कंकश्‍च कर्णिकायां वै ऋतधामजयावपि॥ ४४"],"iast":["sumitrārjunapālādīñchamīkāttu sudāminī|","kaṃkaśca karṇikāyāṃ vai ṛtadhāmajayāvapi|| 44"],"meaning":"शमीककी पत्‍नी सुदामिनीने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्‍न किये। कंककी पत्‍नी कर्णिकाके गर्भसे दो पुत्र हुए—ऋतधाम और जय॥ ४४॥"},{"id":"9.24.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/45/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पौरवी रोहिणी भद्रा मदिरा रोचना इला।","देवकीप्रमुखा आसन् पत्‍न्य आनकदुन्दुभेः॥ ४५"],"iast":["pauravī rohiṇī bhadrā madirā rocanā ilā|","devakīpramukhā āsan patnya ānakadundubheḥ|| 45"],"meaning":"आनकदुन्दुभि वसुदेवजीकी पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्‍नियाँ थीं॥ ४५॥"},{"id":"9.24.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/46/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बलं गदं सारणं च दुर्मदं विपुलं ध्रुवम्।","वसुदेवस्तु रोहिण्यां कृतादीनुदपादयत्॥ ४६"],"iast":["balaṃ gadaṃ sāraṇaṃ ca durmadaṃ vipulaṃ dhruvam|","vasudevastu rohiṇyāṃ kṛtādīnudapādayat|| 46"],"meaning":"रोहिणीके गर्भसे वसुदेवजीके बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे॥ ४६॥"},{"id":"9.24.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/47/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुभद्रो भद्रवाहश्‍च दुर्मदो भद्र एव च।","पौरव्यास्तनया ह्येते भूताद्या द्वादशाभवन्॥ ४७"],"iast":["subhadro bhadravāhaśca durmado bhadra eva ca|","pauravyāstanayā hyete bhūtādyā dvādaśābhavan|| 47"],"meaning":"पौरवीके गर्भसे उनके बारह पुत्र हुए—भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि॥ ४७॥"},{"id":"9.24.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/48/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दोपनन्दकृतकशूराद्या मदिरात्मजाः।","कौसल्या केशिनं त्वेकमसूत कुलनन्दनम्॥ ४८"],"iast":["nandopanandakṛtakaśūrādyā madirātmajāḥ|","kausalyā keśinaṃ tvekamasūta kulanandanam|| 48"],"meaning":"नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिराके गर्भसे उत्पन्‍न हुए थे। कौसल्याने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्‍न किया था। उसका नाम था केशी॥ ४८॥"},{"id":"9.24.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/49/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रोचनायामतो जाता हस्तहेमांगदादयः।","इलायामुरुवल्कादीन् यदुमुख्यानजीजनत्॥ ४९"],"iast":["rocanāyāmato jātā hastahemāṃgadādayaḥ|","ilāyāmuruvalkādīn yadumukhyānajījanat|| 49"],"meaning":"उसने रोचनासे हस्त और हेमांगद आदि तथा इलासे उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रोंको जन्म दिया॥ ४९॥"},{"id":"9.24.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/50/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विपृष्ठो धृतदेवायामेक आनकदुन्दुभेः।","शान्तिदेवात्मजा राजञ्छ्रमप्रतिश्रुतादयः॥ ५०"],"iast":["vipṛṣṭho dhṛtadevāyāmeka ānakadundubheḥ|","śāntidevātmajā rājañchramapratiśrutādayaḥ|| 50"],"meaning":"परीक्षित्! वसुदेवजीके धृतदेवाके गर्भसे विपृष्ठ नामका एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवासे श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए॥ ५०॥"},{"id":"9.24.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/51/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजानः कल्पवर्षाद्या उपदेवासुता दश।","वसुहंससुवंशाद्याः श्रीदेवायास्तु षट् सुताः॥ ५१"],"iast":["rājānaḥ kalpavarṣādyā upadevāsutā daśa|","vasuhaṃsasuvaṃśādyāḥ śrīdevāyāstu ṣaṭ sutāḥ|| 51"],"meaning":"उपदेवाके पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवाके वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए॥ ५१॥"},{"id":"9.24.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/52/","page":116,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवरक्षितया लब्धा नव चात्र गदादयः।","वसुदेवः सुतानष्टावादधे सहदेवया॥ ५२"],"iast":["devarakṣitayā labdhā nava cātra gadādayaḥ|","vasudevaḥ sutānaṣṭāvādadhe sahadevayā|| 52"],"meaning":"देवरक्षिताके गर्भसे गद आदि नौ पुत्र हुए तथा जैसे स्वयं धर्मने आठ वसुओंको उत्पन्‍न किया था, वैसे ही वसुदेवजीने सहदेवाके गर्भसे पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्‍न किये। परम उदार वसुदेवजीने देवकीके गर्भसे भी आठ पुत्र उत्पन्‍न किये, जिनमें सातके नाम हैं—कीर्तिमान्, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलरामजी॥ ५२—५४॥","meaning_covers":[52,54]},{"id":"9.24.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/53/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरुविश्रुतमुख्यांस्तु साक्षाद् धर्मो वसूनिव।","वसुदेवस्तु देवक्यामष्ट पुत्रानजीजनत्॥ ५३"],"iast":["puruviśrutamukhyāṃstu sākṣād dharmo vasūniva|","vasudevastu devakyāmaṣṭa putrānajījanat|| 53"],"meaning":"देवरक्षिताके गर्भसे गद आदि नौ पुत्र हुए तथा जैसे स्वयं धर्मने आठ वसुओंको उत्पन्‍न किया था, वैसे ही वसुदेवजीने सहदेवाके गर्भसे पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्‍न किये। परम उदार वसुदेवजीने देवकीके गर्भसे भी आठ पुत्र उत्पन्‍न किये, जिनमें सातके नाम हैं—कीर्तिमान्, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलरामजी॥ ५२—५४॥","meaning_covers":[52,54]},{"id":"9.24.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/54/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कीर्तिमन्तं सुषेणं च भद्रसेनमुदारधीः।","ऋजुं सम्मर्दनं भद्रं संकर्षणमहीश्‍वरम्॥ ५४"],"iast":["kīrtimantaṃ suṣeṇaṃ ca bhadrasenamudāradhīḥ|","ṛjuṃ sammardanaṃ bhadraṃ saṃkarṣaṇamahīśvaram|| 54"],"meaning":"देवरक्षिताके गर्भसे गद आदि नौ पुत्र हुए तथा जैसे स्वयं धर्मने आठ वसुओंको उत्पन्‍न किया था, वैसे ही वसुदेवजीने सहदेवाके गर्भसे पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्‍न किये। परम उदार वसुदेवजीने देवकीके गर्भसे भी आठ पुत्र उत्पन्‍न किये, जिनमें सातके नाम हैं—कीर्तिमान्, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलरामजी॥ ५२—५४॥","meaning_covers":[52,54]},{"id":"9.24.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/55/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अष्टमस्तु तयोरासीत् स्वयमेव हरिः किल।","सुभद्रा च महाभागा तव राजन् पितामही॥ ५५"],"iast":["aṣṭamastu tayorāsīt svayameva hariḥ kila|","subhadrā ca mahābhāgā tava rājan pitāmahī|| 55"],"meaning":"उन दोनोंके आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित्! तुम्हारी परम सौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकीजीकी ही कन्या थीं॥ ५५॥"},{"id":"9.24.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/56/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यदा यदेह धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्‍च पाप्मनः।","तदा तु भगवानीश आत्मानं सृजते हरिः॥ ५६"],"iast":["yadā yadeha dharmasya kṣayo vṛddhiśca pāpmanaḥ|","tadā tu bhagavānīśa ātmānaṃ sṛjate hariḥ|| 56"],"meaning":"जब-जब संसारमें धर्मका ह्रास और पापकी वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं॥ ५६॥"},{"id":"9.24.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/57/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न ह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते।","आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः॥ ५७"],"iast":["na hyasya janmano hetuḥ karmaṇo vā mahīpate|","ātmamāyāṃ vineśasya parasya draṣṭurātmanaḥ|| 57"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है॥ ५७॥"},{"id":"9.24.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/58/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यन्मायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि।","अनुग्रहस्तन्‍निवृत्तेरात्मलाभाय चेष्यते॥ ५८"],"iast":["yanmāyāceṣṭitaṃ puṃsaḥ sthityutpattyapyayāya hi|","anugrahastannivṛtterātmalābhāya ceṣyate|| 58"],"meaning":"उनकी मायाका विलास ही जीवके जन्म, जीवन और मृत्युका कारण है। और उनका अनुग्रह ही मायाको अलग करके आत्मस्वरूपको प्राप्त करनेवाला है॥ ५८॥"},{"id":"9.24.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/59/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्षौहिणीनां पतिभिरसुरैर्नृपलाञ्छनैः।","भुव आक्रम्यमाणाया अभाराय कृतोद्यमः॥ ५९"],"iast":["akṣauhiṇīnāṃ patibhirasurairnṛpalāñchanaiḥ|","bhuva ākramyamāṇāyā abhārāya kṛtodyamaḥ|| 59"],"meaning":"जब असुरोंने राजाओंका वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वीको रौंदने लगे, तब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् मधुसूदन बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्धमें बड़े-बड़े देवता मनसे अनुमान भी नहीं कर सकते—शरीरसे करनेकी बात तो अलग रही॥ ५९-६०॥","meaning_covers":[59,60]},{"id":"9.24.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/60/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कर्माण्यपरिमेयाणि मनसापि सुरेश्‍वरैः।","सहसंकर्षणश्‍चक्रे भगवान् मधुसूदनः॥ ६०"],"iast":["karmāṇyaparimeyāṇi manasāpi sureśvaraiḥ|","sahasaṃkarṣaṇaścakre bhagavān madhusūdanaḥ|| 60"],"meaning":"जब असुरोंने राजाओंका वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वीको रौंदने लगे, तब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् मधुसूदन बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्धमें बड़े-बड़े देवता मनसे अनुमान भी नहीं कर सकते—शरीरसे करनेकी बात तो अलग रही॥ ५९-६०॥","meaning_covers":[59,60]},{"id":"9.24.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/61/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कलौ जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम्।","अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद् यशः॥ ६१"],"iast":["kalau janiṣyamāṇānāṃ duḥkhaśokatamonudam|","anugrahāya bhaktānāṃ supuṇyaṃ vyatanod yaśaḥ|| 61"],"meaning":"पृथ्वीका भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुगमें पैदा होनेवाले भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्‌ने ऐसे परम पवित्र यशका विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करनेसे ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायँगे॥ ६१॥"},{"id":"9.24.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/62/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्मिन् सत्कर्णपीयूषे यशस्तीर्थवरे सकृत्।","श्रोत्राञ्जलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम्॥ ६२"],"iast":["yasmin satkarṇapīyūṣe yaśastīrthavare sakṛt|","śrotrāñjalirupaspṛśya dhunute karmavāsanām|| 62"],"meaning":"उनका यश क्या है, लोगोंको पवित्र करनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतोंके कानोंके लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कानकी अंजलियोंसे उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्मकी वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं॥ ६२॥"},{"id":"9.24.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/63/","page":117,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशार्हकैः ।","श्‍लाघनीयेहितः शश्‍वत् कुरुसृंजयपाण्डुभिः॥ ६३"],"iast":["bhojavṛṣṇyandhakamadhuśūrasenadaśārhakaiḥ |","ślāghanīyehitaḥ śaśvat kurusṛṃjayapāṇḍubhiḥ|| 63"],"meaning":"परीक्षित्! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान्‌की लीलाओंकी आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे॥ ६३॥"},{"id":"9.24.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/64/","page":118,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्निग्धस्मितेक्षितोदारैर्वाक्यैर्विक्रमलीलया।","नृलोकं रमयामास मूर्त्या सर्वांगरम्यया॥ ६४"],"iast":["snigdhasmitekṣitodārairvākyairvikramalīlayā|","nṛlokaṃ ramayāmāsa mūrtyā sarvāṃgaramyayā|| 64"],"meaning":"उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोरम विग्रहसे तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीलाके द्वारा सारे मनुष्यलोकको आनन्दमें सराबोर कर दिया था॥ ६४॥"},{"id":"9.24.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/65/","page":118,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-","भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्।","नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो","नार्यो नराश्‍च मुदिताः कुपिता निमेश्‍च॥ ६५"],"iast":["yasyānanaṃ makarakuṇḍalacārukarṇa-","bhrājatkapolasubhagaṃ savilāsahāsam|","nityotsavaṃ na tatṛpurdṛśibhiḥ pibantyo","nāryo narāśca muditāḥ kupitā nimeśca|| 65"],"meaning":"भगवान्‌के मुखकमलकी शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलोंसे उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभासे कपोलोंका सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलासके साथ हँस देते, तो उनके मुखपर निरन्तर रहनेवाले आनन्दमें मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रोंके प्यालोंसे उनके मुखकी माधुरीका निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरनेसे उनके गिरानेवाले निमिपर खीझते भी॥ ६५॥"},{"id":"9.24.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/66/","page":118,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जातो गतः पितृगृहाद् व्रजमेधितार्थो","हत्वा रिपून् सुतशतानि कृतोरुदारः।","उत्पाद्य तेषु पुरुषः क्रतुभिः समीजे","आत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु॥ ६६"],"iast":["jāto gataḥ pitṛgṛhād vrajamedhitārtho","hatvā ripūn sutaśatāni kṛtorudāraḥ|","utpādya teṣu puruṣaḥ kratubhiḥ samīje","ātmānamātmanigamaṃ prathayañjaneṣu|| 66"],"meaning":"लीलापुरुषोत्तम भगवान् अवतीर्ण हुए मथुरामें वसुदेवजीके घर, परन्तु वहाँ रहे नहीं, वहाँसे गोकुलमें नन्दबाबाके घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन—जो ग्वाल, गोपी और गौओंको सुखी करना था—पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रजमें, मथुरामें तथा द्वारकामें रहकर अनेकों शत्रुओंका संहार किया। बहुत-सी स्त्रियोंसे विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्‍न किये। साथ ही लोगोंमें अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियोंकी मर्यादा स्थापित करनेके लिये अनेक यज्ञोंके द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया॥ ६६॥"},{"id":"9.24.67","number":67,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/67/","page":118,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृथ्व्याः स वै गुरुभरं क्षपयन् कुरूणा-","मन्तःसमुत्थकलिना युधि भूपचम्वः।","दृष्ट्या विधूय विजये जयमुद्विघोष्य","प्रोच्योद्धवाय च परं समगात् स्वधाम॥ ६७"],"iast":["pṛthvyāḥ sa vai gurubharaṃ kṣapayan kurūṇā-","mantaḥsamutthakalinā yudhi bhūpacamvaḥ|","dṛṣṭyā vidhūya vijaye jayamudvighoṣya","procyoddhavāya ca paraṃ samagāt svadhāma|| 67"],"meaning":"कौरव और पाण्डवोंके बीच उत्पन्‍न हुए आपसके कलहसे उन्होंने पृथ्वीका बहुत-सा भार हलका कर दिया तथा युद्धमें अपनी दृष्टिसे ही राजाओंकी बहुत-सी अक्षौहिणियोंको ध्वंस करके संसारमें अर्जुनकी जीतका डंका पिटवा दिया। फिर उद्धवको आत्मतत्त्वका उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधामको सिधार गये॥ ६७॥"}],"text":[{"b":26826,"kind":"adhyaya_heading","page":112,"text":"अथ चतुर्विंशोऽध्यायः"},{"b":26827,"kind":"topic_heading","page":112,"text":"विदर्भके वंशका वर्णन"},{"b":26828,"kind":"topic_heading","page":112,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":26829,"kind":"sanskrit_shloka","page":112,"verses":["9.24.1"],"text":"तस्यां विदर्भोऽजनयत् पुत्रौ नाम्‍ना कुशक्रथौ।"},{"b":26830,"kind":"sanskrit_shloka","page":112,"verses":["9.24.1"],"text":"तृतीयं रोमपादं च विदर्भकुलनन्दनम्॥ १"},{"b":26831,"kind":"hindi_commentary","page":112,"explains":["9.24.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा विदर्भकी भोज्या नामक पत्‍नीसे तीन पुत्र हुए—कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भवंशमें बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए॥ १॥"},{"b":26832,"kind":"sanskrit_shloka","page":112,"verses":["9.24.2"],"text":"रोमपादसुतो बभ्रुर्बभ्रोः कृतिरजायत।"},{"b":26833,"kind":"sanskrit_shloka","page":112,"verses":["9.24.2"],"text":"उशिकस्तत्सुतस्तस्माच्चेदिश्‍चैद्यादयो नृप॥ २"},{"b":26834,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.3"],"text":"क्रथस्य कुन्तिः पुत्रोऽभूद् धृष्टिस्तस्याथ निर्वृतिः।"},{"b":26835,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.3"],"text":"ततो दशार्हो नाम्‍नाभूत् तस्य व्योमः सुतस्ततः॥ ३"},{"b":26836,"kind":"hindi_commentary","page":112,"explains":["9.24.2","9.24.3"],"text":"रोमपादका पुत्र बभ्रु, बभ्रुका कृति, कृतिका उशिक और उशिकका चेदि। राजन्! इस चेदिके वंशमें ही दमघोष एवं शिशुपाल आदि हुए॥ २॥ क्रथका पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्तिका धृष्टि, धृष्टिका निर्वृति, निर्वृतिका दशार्ह और दशार्हका व्योम॥ ३॥"},{"b":26837,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.4"],"text":"जीमूतो विकृतिस्तस्य यस्य भीमरथः सुतः।"},{"b":26838,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.4"],"text":"ततो नवरथः पुत्रो जातो दशरथस्ततः॥ ४"},{"b":26839,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.5"],"text":"करम्भिः शकुनेः पुत्रो देवरातस्तदात्मजः।"},{"b":26840,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.5"],"text":"देवक्षत्रस्ततस्तस्य मधुः कुरुवशादनुः॥ ५"},{"b":26841,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.6"],"text":"पुरुहोत्रस्त्वनोः पुत्रस्तस्यायुः सात्वतस्ततः।"},{"b":26842,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.6"],"text":"भजमानो भजिर्दिव्यो वृष्णिर्देवावृधोऽन्धकः॥ ६"},{"b":26843,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.7"],"text":"सात्वतस्य सुताः सप्त महाभोजश्‍च मारिष।"},{"b":26844,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.7"],"text":"भजमानस्य निम्लोचिः किंकिणो धृष्टिरेव च॥ ७"},{"b":26845,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.8"],"text":"एकस्यामात्मजाः पत्‍न्यामन्यस्यां च त्रयः सुताः।"},{"b":26846,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.8"],"text":"शताजिच्च सहस्राजिदयुताजिदिति प्रभो॥ ८"},{"b":26847,"kind":"hindi_commentary","page":113,"explains":["9.24.4","9.24.5","9.24.6","9.24.7","9.24.8"],"text":"व्योमका जीमूत, जीमूतका विकृति, विकृतिका भीमरथ, भीमरथका नवरथ और नवरथका दशरथ हुआ॥ ४॥ दशरथसे शकुनि, शकुनिसे करम्भि, करम्भिसे देवरात, देवरातसे देवक्षत्र, देवक्षत्रसे मधु, मधुसे कुरुवश और कुरुवशसे अनु हुए॥ ५॥ अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे आयु और आयुसे सात्वतका जन्म हुआ। परीक्षित्! सात्वतके सात पुत्र हुए—भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमानकी दो पत्‍नियाँ थीं एकसे तीन पुत्र हुए—निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्‍नीसे भी तीन पुत्र हुए—शताजित्, सहस्राजित् और अयुताजित्॥ ६—८॥"},{"b":26848,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.9"],"text":"बभ्रुर्देवावृधसुतस्तयोः श्‍लोकौ पठन्त्यमू।"},{"b":26849,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.9"],"text":"यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात्॥ ९"},{"b":26850,"kind":"hindi_commentary","page":113,"explains":["9.24.9"],"text":"देवावृधके पुत्रका नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रुके सम्बन्धमें यह बात कही जाती है—‘हमने दूरसे जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकटसे देखते भी हैं॥ ९॥"},{"b":26851,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.10"],"text":"बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः।"},{"b":26852,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.10"],"text":"पुरुषाः पंचषष्टिश्‍च षट् सहस्राणि चाष्ट च॥ १०"},{"b":26853,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.11"],"text":"येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि।"},{"b":26854,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.11"],"text":"महाभोजोऽपि धर्मात्मा भोजा आसंस्तदन्वये॥ ११"},{"b":26855,"kind":"hindi_commentary","page":113,"explains":["9.24.10","9.24.11"],"text":"बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओंके समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृधसे उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वतके पुत्रोंमें महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसीके वंशमें भोजवंशी यादव हुए॥ १०-११॥"},{"b":26856,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.12"],"text":"वृष्णेः सुमित्रः पुत्रोऽभूद् युधाजिच्च परंतप।"},{"b":26857,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.12"],"text":"शिनिस्तस्यानमित्रश्‍च निम्‍नोऽभूदनमित्रतः॥ १२"},{"b":26858,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.13"],"text":"सत्राजितः प्रसेनश्‍च निम्‍नस्याप्यासतुः सुतौ।"},{"b":26859,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.13"],"text":"अनमित्रसुतो योऽन्यः शिनिस्तस्याथ सत्यकः॥ १३"},{"b":26860,"kind":"hindi_commentary","page":113,"explains":["9.24.12","9.24.13"],"text":"परीक्षित्! वृष्णिके दो पुत्र हुए—सुमित्र और युधाजित्। युधाजित्के शिनि और अनमित्र—ये दो पुत्र थे। अनमित्रसे निम्‍नका जन्म हुआ॥ १२॥ सत्राजित् और प्रसेन नामसे प्रसिद्ध यदुवंशी निम्‍नके ही पुत्र थे। अनमित्रका एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनिसे ही सत्यकका जन्म हुआ॥ १३॥"},{"b":26861,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.14"],"text":"युयुधानः सात्यकिर्वै जयस्तस्य कुणिस्ततः।"},{"b":26862,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.14"],"text":"युगन्धरोऽनमित्रस्य वृष्णिः पुत्रोऽपरस्ततः॥ १४"},{"b":26863,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.15"],"text":"श्‍वफल्कश्‍चित्ररथश्‍च गान्दिन्यां च श्‍वफल्कतः।"},{"b":26864,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.15"],"text":"अक्रूरप्रमुखा आसन् पुत्रा द्वादश विश्रुताः॥ १५"},{"b":26865,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.16"],"text":"आसंगः सारमेयश्‍च मृदुरो मृदुविद् गिरिः।"},{"b":26866,"kind":"sanskrit_shloka","page":113,"verses":["9.24.16"],"text":"धर्मवृद्धः सुकर्मा च क्षेत्रोपेक्षोऽरिमर्दनः॥ १६"},{"b":26867,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.17"],"text":"शत्रुघ्नो गन्धमादश्‍च प्रतिबाहुश्‍च द्वादश।"},{"b":26868,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.17"],"text":"तेषां स्वसा सुचीराख्या द्वावक्रूरसुतावपि॥ १७"},{"b":26869,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.18"],"text":"देववानुपदेवश्‍च तथा चित्ररथात्मजाः।"},{"b":26870,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.18"],"text":"पृथुर्विदूरथाद्याश्‍च बहवो वृष्णिनन्दनाः॥ १८"},{"b":26871,"kind":"hindi_commentary","page":113,"explains":["9.24.14","9.24.15","9.24.16","9.24.17","9.24.18"],"text":"इसी सत्यकके पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकिके नामसे प्रसिद्ध हुए। सात्यकिका जय, जयका कुणि और कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्रके तीसरे पुत्रका नाम वृष्णि था। वृष्णिके दो पुत्र हुए—श्‍वफल्क और चित्ररथ। श्‍वफल्ककी पत्‍नीका नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूरके अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्‍न हुए—आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूरके दो पुत्र थे—देववान् और उपदेव। श्‍वफल्कके भाई चित्ररथके पृथु, विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए—जो वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं॥ १४-१८॥"},{"b":26872,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.19"],"text":"कुकुरो भजमानश्‍च शुचिः कम्बलबर्हिषः।"},{"b":26873,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.19"],"text":"कुकुरस्य सुतो वह्निर्विलोमा तनयस्ततः॥ १९"},{"b":26874,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.20"],"text":"कपोतरोमा तस्यानुः सखा यस्य च तुम्बुरुः।"},{"b":26875,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.20"],"text":"अन्धको दुन्दुभिस्तस्मादरिद्योतः पुनर्वसुः॥ २०"},{"b":26876,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.21"],"text":"तस्याहुकश्‍चाहुकी च कन्या चैवाहुकात्मजौ।"},{"b":26877,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.21"],"text":"देवकश्‍चोग्रसेनश्‍च चत्वारो देवकात्मजाः॥ २१"},{"b":26878,"kind":"hindi_commentary","page":114,"explains":["9.24.19","9.24.20","9.24.21"],"text":"सात्वतके पुत्र अन्धकके चार पुत्र हुए—कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुरका पुत्र वह्नि, वह्निका विलोमा, विलोमाका कपोतरोमा और कपोतरोमाका अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्वके साथ अनुकी बड़ी मित्रता थी। अनुका पुत्र अन्धक, अन्धकका दुन्दुभि, दुन्दुभिका अरिद्योत, अरिद्योतका पुनर्वसु और पुनर्वसुके आहुक नामका एक पुत्र तथा आहुकी नामकी एक कन्या हुई। आहुकके दो पुत्र हुए—देवक और उग्रसेन। देवकके चार पुत्र हुए॥ १९—२१॥"},{"b":26879,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.22"],"text":"देववानुपदेवश्‍च सुदेवो देववर्धनः।"},{"b":26880,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.22"],"text":"तेषां स्वसारः सप्तासन् धृतदेवादयो नृप॥ २२"},{"b":26881,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.23"],"text":"शान्तिदेवोपदेवा च श्रीदेवा देवरक्षिता।"},{"b":26882,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.23"],"text":"सहदेवा देवकी च वसुदेव उवाह ताः॥ २३"},{"b":26883,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.24"],"text":"कंसः सुनामा न्यग्रोधः कंकः शंकुः सुहूस्तथा।"},{"b":26884,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.24"],"text":"राष्ट्रपालोऽथ सृष्टिश्‍च तुष्टिमानौग्रसेनयः॥ २४"},{"b":26885,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.25"],"text":"कंसा कंसवती कंका शूरभू राष्ट्रपालिका।"},{"b":26886,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.25"],"text":"उग्रसेनदुहितरो वसुदेवानुजस्त्रियः॥ २५"},{"b":26887,"kind":"hindi_commentary","page":114,"explains":["9.24.22","9.24.23","9.24.24","9.24.25"],"text":"देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं—धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेवजीने इन सबके साथ विवाह किया था॥ २२-२३॥ उग्रसेनके नौ लड़के थे—कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान्॥ २४॥ उग्रसेनके पाँच कन्याएँ भी थीं—कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेवजीके छोटे भाइयोंसे हुआ था॥ २५॥"},{"b":26888,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.26"],"text":"शूरो विदूरथादासीद् भजमानः सुतस्ततः।"},{"b":26889,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.26"],"text":"शिनिस्तस्मात् स्वयम्भोजो हृदीकस्तत्सुतो मतः॥ २६"},{"b":26890,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.27"],"text":"देवबाहुः शतधनुः कृतवर्मेति तत्सुताः।"},{"b":26891,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.27"],"text":"देवमीढस्य शूरस्य मारिषा नाम पत्‍न्यभूत्॥ २७"},{"b":26892,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.28"],"text":"तस्यां स जनयामास दश पुत्रानकल्मषान्।"},{"b":26893,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.28"],"text":"वसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम्॥ २८"},{"b":26894,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.29"],"text":"सृंजयं श्यामकं कंकं शमीकं वत्सकं वृकम्।"},{"b":26895,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.29"],"text":"देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि॥ २९"},{"b":26896,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.30"],"text":"वसुदेवं हरेः स्थानं वदन्त्यानकदुन्दुभिम्।"},{"b":26897,"kind":"sanskrit_shloka","page":114,"verses":["9.24.30"],"text":"पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्तिः श्रुतश्रवाः॥ ३०"},{"b":26898,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.31"],"text":"राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्यः पंच कन्यकाः।"},{"b":26899,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.31"],"text":"कुन्तेः सख्युः पिता शूरो ह्यपुत्रस्य पृथामदात्॥ ३१"},{"b":26900,"kind":"hindi_commentary","page":114,"explains":["9.24.26","9.24.27","9.24.28","9.24.29","9.24.30","9.24.31"],"text":"चित्ररथके पुत्र विदूरथसे शूर, शूरसे भजमान, भजमानसे शिनि, शिनिसे स्वयम्भोज और स्वयम्भोजसे हृदीक हुए॥ २६॥ हृदीकसे तीन पुत्र हुए—देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढके पुत्र शूरकी पत्‍नीका नाम था मारिषा॥ २७॥ उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥"},{"b":26901,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.32"],"text":"साऽऽप दुर्वाससो विद्यां देवहूतीं प्रतोषितात्।"},{"b":26902,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.32"],"text":"तस्या वीर्यपरीक्षार्थमाजुहाव रविं शुचिम्॥ ३२"},{"b":26903,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.33"],"text":"तदैवोपागतं देवं वीक्ष्य विस्मितमानसा।"},{"b":26904,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.33"],"text":"प्रत्ययार्थं प्रयुक्ता मे याहि देव क्षमस्व मे॥ ३३"},{"b":26905,"kind":"hindi_commentary","page":115,"verses":["9.24.34"],"text":"अमोघं दर्शनं देवि आधित्से त्वयि चात्मजम्।"},{"b":26906,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.34"],"text":"योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे॥ ३४"},{"b":26907,"kind":"hindi_commentary","page":115,"explains":["9.24.32","9.24.33","9.24.34"],"text":"पृथाने दुर्वासा ऋषिको प्रसन्‍न करके उनसे देवताओंको बुलानेकी विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्याके प्रभावकी परीक्षा लेनेके लिये पृथाने परम पवित्र भगवान् सूर्यका आवाहन किया॥ ३२॥ उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्तीका हृदय विस्मयसे भर गया। उसने कहा—‘भगवन्! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करनेके लिये ही इस विद्याका प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’॥ ३३॥ सूर्यदेवने कहा—‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिये हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्‍न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा’॥ ३४॥"},{"b":26908,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.35"],"text":"इति तस्यां स आधाय गर्भं सूर्यो दिवं गतः।"},{"b":26909,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.35"],"text":"सद्यः कुमारः संजज्ञे द्वितीय इव भास्करः॥ ३५"},{"b":26910,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.36"],"text":"तं सात्यजन्‍नदीतोये कृच्छ्राल्लोकस्य बिभ्यती।"},{"b":26911,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.36"],"text":"प्रपितामहस्तामुवाह पाण्डुर्वै सत्यविक्रमः॥ ३६"},{"b":26912,"kind":"hindi_commentary","page":115,"explains":["9.24.35","9.24.36"],"text":"यह कहकर भगवान् सूर्यने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्‍न हुआ। वह देखनेमें दूसरे सूर्यके समान जान पड़ता था॥ ३५॥ पृथा लोकनिन्दासे डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःखसे उस बालकको नदीके जलमें छोड़ दिया। परीक्षित्! उसी पृथाका विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डुसे हुआ था, जो वास्तवमें बड़े सच्चे वीर थे॥ ३६॥"},{"b":26913,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.37"],"text":"श्रुतदेवां तु कारूषो वृद्धशर्मा समग्रहीत्।"},{"b":26914,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.37"],"text":"यस्यामभूद् दन्तवक्त्र ऋषिशप्तो दितेः सुतः॥ ३७"},{"b":26915,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.38"],"text":"कैकेयो धृष्टकेतुश्‍च श्रुतकीर्तिमविन्दत।"},{"b":26916,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.38"],"text":"सन्तर्दनादयस्तस्य पंचासन् कैकयाः सुताः॥ ३८"},{"b":26917,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.39"],"text":"राजाधिदेव्यामावन्त्यौ जयसेनोऽजनिष्ट ह।"},{"b":26918,"kind":"sanskrit_shloka","page":115,"verses":["9.24.39"],"text":"दमघोषश्‍चेदिराजः श्रुतश्रवसमग्रहीत्॥ ३९"},{"b":26919,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.40"],"text":"शिशुपालः सुतस्तस्याः कथितस्तस्य सम्भवः।"},{"b":26920,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.40"],"text":"देवभागस्य कंसायां चित्रकेतुबृहद्बलौ॥ ४०"},{"b":26921,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.41"],"text":"कंसवत्यां देवश्रवसः सुवीर इषुमांस्तथा।"},{"b":26922,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.41"],"text":"कंकायामानकाज्जातः सत्यजित् पुरुजित् तथा॥ ४१"},{"b":26923,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.42"],"text":"सृंजयो राष्ट्रपाल्यां च वृषदुर्मर्षणादिकान्।"},{"b":26924,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.42"],"text":"हरिकेशहिरण्याक्षौ शूरभूम्यां च श्यामकः॥ ४२"},{"b":26925,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.43"],"text":"मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन् वत्सकस्तथा।"},{"b":26926,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.43"],"text":"तक्षपुष्करशालादीन् दुर्वार्क्ष्यां वृक आदधे॥ ४३"},{"b":26927,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.44"],"text":"सुमित्रार्जुनपालादीञ्छमीकात्तु सुदामिनी।"},{"b":26928,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.44"],"text":"कंकश्‍च कर्णिकायां वै ऋतधामजयावपि॥ ४४"},{"b":26929,"kind":"hindi_commentary","page":115,"explains":["9.24.37","9.24.38","9.24.39","9.24.40","9.24.41","9.24.42","9.24.43","9.24.44"],"text":"परीक्षित्! पृथाकी छोटी बहिन श्रुतदेवाका विवाह करूष देशके अधिपति वृद्धशर्मासे हुआ था। उसके गर्भसे दन्तवक्त्रका जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्वजन्ममें सनकादि ऋषियोंके शापसे हिरण्याक्ष हुआ था॥ ३७॥ कैकय देशके राजा धृष्टकेतुने श्रुतकीर्तिसे विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए॥ ३८॥ राजाधिदेवीका विवाह जयसेनसे हुआ था। उसके दो पुत्र हुए—विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्तीके राजा हुए। चेदिराज दमघोषने श्रुतश्रवाका पाणिग्रहण किया॥ ३९॥ उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्धमें) कर चुका हूँ। वसुदेवजीके भाइयोंमेंसे देवभागकी पत्‍नी कंसाके गर्भसे दो पुत्र हुए—चित्रकेतु और बृहद्बल॥ ४०॥ देवश्रवाकी पत्‍नी कंसवतीसे सुवीर और इषुमान् नामके दो पुत्र हुए। आनककी पत्‍नी कंकाके गर्भसे भी दो पुत्र हुए—सत्यजित् और पुरुजित्॥ ४१॥ सृंजयने अपनी पत्‍नी राष्ट्रपालिकाके गर्भसे वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्‍न किये। इसी प्रकार श्यामकने शूरभूमि (शूरभू) नामकी पत्‍नीसे हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ४२॥ मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे वत्सकके भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृकने दुर्वाक्षीके गर्भसे तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ४३॥ शमीककी पत्‍नी सुदामिनीने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्‍न किये। कंककी पत्‍नी कर्णिकाके गर्भसे दो पुत्र हुए—ऋतधाम और जय॥ ४४॥"},{"b":26930,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.45"],"text":"पौरवी रोहिणी भद्रा मदिरा रोचना इला।"},{"b":26931,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.45"],"text":"देवकीप्रमुखा आसन् पत्‍न्य आनकदुन्दुभेः॥ ४५"},{"b":26932,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.46"],"text":"बलं गदं सारणं च दुर्मदं विपुलं ध्रुवम्।"},{"b":26933,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.46"],"text":"वसुदेवस्तु रोहिण्यां कृतादीनुदपादयत्॥ ४६"},{"b":26934,"kind":"hindi_commentary","page":116,"explains":["9.24.45","9.24.46"],"text":"आनकदुन्दुभि वसुदेवजीकी पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्‍नियाँ थीं॥ ४५॥ रोहिणीके गर्भसे वसुदेवजीके बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे॥ ४६॥"},{"b":26935,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.47"],"text":"सुभद्रो भद्रवाहश्‍च दुर्मदो भद्र एव च।"},{"b":26936,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.47"],"text":"पौरव्यास्तनया ह्येते भूताद्या द्वादशाभवन्॥ ४७"},{"b":26937,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.48"],"text":"नन्दोपनन्दकृतकशूराद्या मदिरात्मजाः।"},{"b":26938,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.48"],"text":"कौसल्या केशिनं त्वेकमसूत कुलनन्दनम्॥ ४८"},{"b":26939,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.49"],"text":"रोचनायामतो जाता हस्तहेमांगदादयः।"},{"b":26940,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.49"],"text":"इलायामुरुवल्कादीन् यदुमुख्यानजीजनत्॥ ४९"},{"b":26941,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.50"],"text":"विपृष्ठो धृतदेवायामेक आनकदुन्दुभेः।"},{"b":26942,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.50"],"text":"शान्तिदेवात्मजा राजञ्छ्रमप्रतिश्रुतादयः॥ ५०"},{"b":26943,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.51"],"text":"राजानः कल्पवर्षाद्या उपदेवासुता दश।"},{"b":26944,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.51"],"text":"वसुहंससुवंशाद्याः श्रीदेवायास्तु षट् सुताः॥ ५१"},{"b":26945,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.52"],"text":"देवरक्षितया लब्धा नव चात्र गदादयः।"},{"b":26946,"kind":"sanskrit_shloka","page":116,"verses":["9.24.52"],"text":"वसुदेवः सुतानष्टावादधे सहदेवया॥ ५२"},{"b":26947,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.53"],"text":"पुरुविश्रुतमुख्यांस्तु साक्षाद् धर्मो वसूनिव।"},{"b":26948,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.53"],"text":"वसुदेवस्तु देवक्यामष्ट पुत्रानजीजनत्॥ ५३"},{"b":26949,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.54"],"text":"कीर्तिमन्तं सुषेणं च भद्रसेनमुदारधीः।"},{"b":26950,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.54"],"text":"ऋजुं सम्मर्दनं भद्रं संकर्षणमहीश्‍वरम्॥ ५४"},{"b":26951,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.55"],"text":"अष्टमस्तु तयोरासीत् स्वयमेव हरिः किल।"},{"b":26952,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.55"],"text":"सुभद्रा च महाभागा तव राजन् पितामही॥ ५५"},{"b":26953,"kind":"hindi_commentary","page":116,"explains":["9.24.47","9.24.48","9.24.49","9.24.50","9.24.51","9.24.52","9.24.53","9.24.54","9.24.55"],"text":"पौरवीके गर्भसे उनके बारह पुत्र हुए—भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि॥ ४७॥ नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिराके गर्भसे उत्पन्‍न हुए थे। कौसल्याने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्‍न किया था। उसका नाम था केशी॥ ४८॥ उसने रोचनासे हस्त और हेमांगद आदि तथा इलासे उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रोंको जन्म दिया॥ ४९॥ परीक्षित्! वसुदेवजीके धृतदेवाके गर्भसे विपृष्ठ नामका एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवासे श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए॥ ५०॥ उपदेवाके पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवाके वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए॥ ५१॥ देवरक्षिताके गर्भसे गद आदि नौ पुत्र हुए तथा जैसे स्वयं धर्मने आठ वसुओंको उत्पन्‍न किया था, वैसे ही वसुदेवजीने सहदेवाके गर्भसे पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्‍न किये। परम उदार वसुदेवजीने देवकीके गर्भसे भी आठ पुत्र उत्पन्‍न किये, जिनमें सातके नाम हैं—कीर्तिमान्, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलरामजी॥ ५२—५४॥ उन दोनोंके आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित्! तुम्हारी परम सौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकीजीकी ही कन्या थीं॥ ५५॥"},{"b":26954,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.56"],"text":"यदा यदेह धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्‍च पाप्मनः।"},{"b":26955,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.56"],"text":"तदा तु भगवानीश आत्मानं सृजते हरिः॥ ५६"},{"b":26956,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.57"],"text":"न ह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते।"},{"b":26957,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.57"],"text":"आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः॥ ५७"},{"b":26958,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.58"],"text":"यन्मायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि।"},{"b":26959,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.58"],"text":"अनुग्रहस्तन्‍निवृत्तेरात्मलाभाय चेष्यते॥ ५८"},{"b":26960,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.59"],"text":"अक्षौहिणीनां पतिभिरसुरैर्नृपलाञ्छनैः।"},{"b":26961,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.59"],"text":"भुव आक्रम्यमाणाया अभाराय कृतोद्यमः॥ ५९"},{"b":26962,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.60"],"text":"कर्माण्यपरिमेयाणि मनसापि सुरेश्‍वरैः।"},{"b":26963,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.60"],"text":"सहसंकर्षणश्‍चक्रे भगवान् मधुसूदनः॥ ६०"},{"b":26964,"kind":"hindi_commentary","page":117,"explains":["9.24.56","9.24.57","9.24.58","9.24.59","9.24.60"],"text":"जब-जब संसारमें धर्मका ह्रास और पापकी वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं॥ ५६॥ परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है॥ ५७॥ उनकी मायाका विलास ही जीवके जन्म, जीवन और मृत्युका कारण है। और उनका अनुग्रह ही मायाको अलग करके आत्मस्वरूपको प्राप्त करनेवाला है॥ ५८॥ जब असुरोंने राजाओंका वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वीको रौंदने लगे, तब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् मधुसूदन बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्धमें बड़े-बड़े देवता मनसे अनुमान भी नहीं कर सकते—शरीरसे करनेकी बात तो अलग रही॥ ५९-६०॥"},{"b":26965,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.61"],"text":"कलौ जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम्।"},{"b":26966,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.61"],"text":"अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद् यशः॥ ६१"},{"b":26967,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.62"],"text":"यस्मिन् सत्कर्णपीयूषे यशस्तीर्थवरे सकृत्।"},{"b":26968,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.62"],"text":"श्रोत्राञ्जलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम्॥ ६२"},{"b":26969,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.63"],"text":"भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशार्हकैः ।"},{"b":26970,"kind":"sanskrit_shloka","page":117,"verses":["9.24.63"],"text":"श्‍लाघनीयेहितः शश्‍वत् कुरुसृंजयपाण्डुभिः॥ ६३"},{"b":26971,"kind":"hindi_commentary","page":117,"explains":["9.24.61","9.24.62","9.24.63"],"text":"पृथ्वीका भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुगमें पैदा होनेवाले भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्‌ने ऐसे परम पवित्र यशका विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करनेसे ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायँगे॥ ६१॥ उनका यश क्या है, लोगोंको पवित्र करनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतोंके कानोंके लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कानकी अंजलियोंसे उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्मकी वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं॥ ६२॥ परीक्षित्! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान्‌की लीलाओंकी आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे॥ ६३॥"},{"b":26972,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.64"],"text":"स्निग्धस्मितेक्षितोदारैर्वाक्यैर्विक्रमलीलया।"},{"b":26973,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.64"],"text":"नृलोकं रमयामास मूर्त्या सर्वांगरम्यया॥ ६४"},{"b":26974,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.65"],"text":"यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-"},{"b":26975,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.65"],"text":"भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्।"},{"b":26976,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.65"],"text":"नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो"},{"b":26977,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.65"],"text":"नार्यो नराश्‍च मुदिताः कुपिता निमेश्‍च॥ ६५"},{"b":26978,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.66"],"text":"जातो गतः पितृगृहाद् व्रजमेधितार्थो"},{"b":26979,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.66"],"text":"हत्वा रिपून् सुतशतानि कृतोरुदारः।"},{"b":26980,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.66"],"text":"उत्पाद्य तेषु पुरुषः क्रतुभिः समीजे"},{"b":26981,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.66"],"text":"आत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु॥ ६६"},{"b":26982,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.67"],"text":"पृथ्व्याः स वै गुरुभरं क्षपयन् कुरूणा-"},{"b":26983,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.67"],"text":"मन्तःसमुत्थकलिना युधि भूपचम्वः।"},{"b":26984,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.67"],"text":"दृष्ट्या विधूय विजये जयमुद्विघोष्य"},{"b":26985,"kind":"sanskrit_shloka","page":118,"verses":["9.24.67"],"text":"प्रोच्योद्धवाय च परं समगात् स्वधाम॥ ६७"},{"b":26986,"kind":"hindi_translation","page":118,"explains":["9.24.64","9.24.65","9.24.66","9.24.67"],"text":"उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोरम विग्रहसे तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीलाके द्वारा सारे मनुष्यलोकको आनन्दमें सराबोर कर दिया था॥ ६४॥ भगवान्‌के मुखकमलकी शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलोंसे उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभासे कपोलोंका सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलासके साथ हँस देते, तो उनके मुखपर निरन्तर रहनेवाले आनन्दमें मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रोंके प्यालोंसे उनके मुखकी माधुरीका निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरनेसे उनके गिरानेवाले निमिपर खीझते भी॥ ६५॥ लीलापुरुषोत्तम भगवान् अवतीर्ण हुए मथुरामें वसुदेवजीके घर, परन्तु वहाँ रहे नहीं, वहाँसे गोकुलमें नन्दबाबाके घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन—जो ग्वाल, गोपी और गौओंको सुखी करना था—पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रजमें, मथुरामें तथा द्वारकामें रहकर अनेकों शत्रुओंका संहार किया। बहुत-सी स्त्रियोंसे विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्‍न किये। साथ ही लोगोंमें अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियोंकी मर्यादा स्थापित करनेके लिये अनेक यज्ञोंके द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया॥ ६६॥ कौरव और पाण्डवोंके बीच उत्पन्‍न हुए आपसके कलहसे उन्होंने पृथ्वीका बहुत-सा भार हलका कर दिया तथा युद्धमें अपनी दृष्टिसे ही राजाओंकी बहुत-सी अक्षौहिणियोंको ध्वंस करके संसारमें अर्जुनकी जीतका डंका पिटवा दिया। फिर उद्धवको आत्मतत्त्वका उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधामको सिधार गये॥ ६७॥"},{"b":26987,"kind":"hindi_translation","page":118,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीसूर्यसोमवंशानुकीर्तने यदुवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥"},{"b":26988,"kind":"hindi_commentary","page":118,"text":"इति नवमः स्कन्धः समाप्तः"},{"b":26989,"kind":"hindi_commentary","page":118,"text":"हरिः ॐ तत्सत्"}],"notes":[],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}