{"id":"9.4","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 4","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्थोऽध्यायः","topics":["नाभाग और अम्बरीषकी कथा"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[18,27]},"verses":[{"id":"9.4.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/1/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम्।","यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम्॥ १"],"iast":["nābhāgo nabhagāpatyaṃ yaṃ tataṃ bhrātaraḥ kavim|","yaviṣṭhaṃ vyabhajan dāyaṃ brahmacāriṇamāgatam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मनुपुत्र नभगका पुत्र था नाभाग। जब वह दीर्घकालतक ब्रह्मचर्यका पालन करके लौटा, तब बड़े भाइयोंने अपनेसे छोटे किन्तु विद्वान् भाईको हिस्सेमें केवल पिताको ही दिया (सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपसमें बाँट ली थी)॥ १॥"},{"id":"9.4.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/2/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भ्रातरोऽभाङ्क्त किं मह्यं भजाम पितरं तव।","त्वां ममार्यास्तताभाङ्‌क्षुर्मा पुत्रक तदादृथाः॥ २"],"iast":["bhrātaro'bhāṅkta kiṃ mahyaṃ bhajāma pitaraṃ tava|","tvāṃ mamāryāstatābhāṅkṣurmā putraka tadādṛthāḥ|| 2"],"meaning":"उसने अपने भाइयोंसे पूछा—‘भाइयो! आपलोगोंने मुझे हिस्सेमें क्या दिया है?’ तब उन्होंने उत्तर दिया कि ‘हम तुम्हारे हिस्सेमें पिताजीको ही तुम्हें देते हैं।’ उसने अपने पितासे जाकर कहा—‘पिताजी! मेरे बड़े भाइयोंने हिस्सेमें मेरे लिये आपको ही दिया है।’ पिताने कहा—‘बेटा! तुम उनकी बात न मानो॥ २॥"},{"id":"9.4.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/3/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इमे अंगिरसः सत्रमासतेऽद्य सुमेधसः।","षष्ठं षष्ठमुपेत्याहः कवे मुह्यन्ति कर्मणि॥ ३"],"iast":["ime aṃgirasaḥ satramāsate'dya sumedhasaḥ|","ṣaṣṭhaṃ ṣaṣṭhamupetyāhaḥ kave muhyanti karmaṇi|| 3"],"meaning":"देखो, ये बड़े बुद्धिमान् आंगिरसगोत्रके ब्राह्मण इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। परन्तु मेरे विद्वान् पुत्र! वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्ममें भूल कर बैठते हैं॥ ३॥"},{"id":"9.4.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/4/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्‍वदेवे महात्मनः।","ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मनः॥ ४"],"iast":["tāṃstvaṃ śaṃsaya sūkte dve vaiśvadeve mahātmanaḥ|","te svaryanto dhanaṃ satrapariśeṣitamātmanaḥ|| 4"],"meaning":"तुम उन महात्माओंके पास जाकर उन्हें वैश्‍व-देवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञसे बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे। इसलिये अब तुम उन्हींके पास चले जाओ।’ उसने अपने पिताके आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन आंगिरसगोत्री ब्राह्मणोंने भी यज्ञका बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्गमें चले गये॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"9.4.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/5/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दास्यन्ति तेऽथ तान् गच्छ तथा स कृतवान् यथा।","तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं ते सत्रपरिशेषितम्॥ ५"],"iast":["dāsyanti te'tha tān gaccha tathā sa kṛtavān yathā|","tasmai dattvā yayuḥ svargaṃ te satrapariśeṣitam|| 5"],"meaning":"तुम उन महात्माओंके पास जाकर उन्हें वैश्‍व-देवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञसे बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे। इसलिये अब तुम उन्हींके पास चले जाओ।’ उसने अपने पिताके आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन आंगिरसगोत्री ब्राह्मणोंने भी यज्ञका बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्गमें चले गये॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"9.4.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/6/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं कश्‍चित् स्वीकरिष्यन्तं पुरुषः कृष्णदर्शनः।","उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य ममेदं वास्तुकं वसु॥ ६"],"iast":["taṃ kaścit svīkariṣyantaṃ puruṣaḥ kṛṣṇadarśanaḥ|","uvācottarato'bhyetya mamedaṃ vāstukaṃ vasu|| 6"],"meaning":"जब नाभाग उस धनको लेने लगा, तब उत्तर दिशासे एक काले रंगका पुरुष आया। उसने कहा—‘इस यज्ञभूमिमें जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है’॥ ६॥"},{"id":"9.4.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/7/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ममेदमृषिभिर्दत्तमिति तर्हि स्म मानवः।","स्यान्‍नौ ते पितरि प्रश्‍नः पृष्टवान् पितरं तथा॥ ७"],"iast":["mamedamṛṣibhirdattamiti tarhi sma mānavaḥ|","syānnau te pitari praśnaḥ pṛṣṭavān pitaraṃ tathā|| 7"],"meaning":"नाभागने कहा—‘ऋषियोंने यह धन मुझे दिया है, इसलिये मेरा है।’ इसपर उस पुरुषने कहा—‘हमारे विवादके विषयमें तुम्हारे पितासे ही प्रश्‍न किया जाय।’ तब नाभागने जाकर पितासे पूछा॥ ७॥"},{"id":"9.4.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/8/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यज्ञवास्तुगतं सर्वमुच्छिष्टमृषयः क्‍वचित्।","चक्रुर्विभागं रुद्राय स देवः सर्वमर्हति॥ ८"],"iast":["yajñavāstugataṃ sarvamucchiṣṭamṛṣayaḥ kvacit|","cakrurvibhāgaṃ rudrāya sa devaḥ sarvamarhati|| 8"],"meaning":"पिताने कहा—‘एक बार दक्षप्रजापतिके यज्ञमें ऋषिलोग यह निश्‍चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमिमें जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेवका हिस्सा है। इसलिये वह धन तो महादेवजीको ही मिलना चाहिये’॥ ८॥"},{"id":"9.4.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/9/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम्।","इत्याह मे पिता ब्रह्मञ्छिरसा त्वां प्रसादये॥ ९"],"iast":["nābhāgastaṃ praṇamyāha taveśa kila vāstukam|","ityāha me pitā brahmañchirasā tvāṃ prasādaye|| 9"],"meaning":"नाभागने जाकर उन काले रंगके पुरुष रुद्र-भगवान्‌को प्रणाम किया और कहा कि ‘प्रभो! यज्ञ-भूमिकी सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिताने ऐसा ही कहा है। भगवन्! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ’॥ ९॥"},{"id":"9.4.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/10/","page":19,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत् ते पितावदद् धर्मं त्वं च सत्यं प्रभाषसे।","ददामि ते मन्त्रदृशे ज्ञानं ब्रह्म सनातनम्॥ १०"],"iast":["yat te pitāvadad dharmaṃ tvaṃ ca satyaṃ prabhāṣase|","dadāmi te mantradṛśe jñānaṃ brahma sanātanam|| 10"],"meaning":"तब भगवान् रुद्रने कहा—‘तुम्हारे पिताने धर्मके अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है। तुम वेदोंका अर्थ तो पहलेसे ही जानते हो। अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान देता हूँ॥ १०॥"},{"id":"9.4.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/11/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रे परिशेषितम्।","इत्युक्त्वान्तर्हितो रुद्रो भगवान् सत्यवत्सलः॥ ११"],"iast":["gṛhāṇa draviṇaṃ dattaṃ matsatre pariśeṣitam|","ityuktvāntarhito rudro bhagavān satyavatsalaḥ|| 11"],"meaning":"यहाँ यज्ञमें बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो।’ इतना कहकर सत्यप्रेमी भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये॥ ११॥"},{"id":"9.4.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/12/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["य एतत् संस्मरेत् प्रातः सायं च सुसमाहितः।","कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिं चैव तथाऽऽत्मनः॥ १२"],"iast":["ya etat saṃsmaret prātaḥ sāyaṃ ca susamāhitaḥ|","kavirbhavati mantrajño gatiṃ caiva tathā''tmanaḥ|| 12"],"meaning":"जो मनुष्य प्रातः और सायंकाल एकाग्रचित्तसे इस आख्यानका स्मरण करता है वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूपको भी जान लेता है॥ १२॥"},{"id":"9.4.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/13/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवतः कृती।","नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्‍वचित्॥ १३"],"iast":["nābhāgādambarīṣo'bhūnmahābhāgavataḥ kṛtī|","nāspṛśad brahmaśāpo'pi yaṃ na pratihataḥ kvacit|| 13"],"meaning":"नाभागके पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान्‌के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्मशाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीषका स्पर्श न कर सका॥ १३॥"},{"id":"9.4.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/14/","page":20,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः।","न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः॥ १४"],"iast":["bhagavañchrotumicchāmi rājarṣestasya dhīmataḥ|","na prābhūd yatra nirmukto brahmadaṇḍo duratyayaḥ|| 14"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीषका चरित्र सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मणने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया जो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता; परन्तु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका॥ १४॥"},{"id":"9.4.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/15/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अम्बरीषो महाभागः सप्तद्वीपवतीं महीम्।","अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि॥ १५"],"iast":["ambarīṣo mahābhāgaḥ saptadvīpavatīṃ mahīm|","avyayāṃ ca śriyaṃ labdhvā vibhavaṃ cātulaṃ bhuvi|| 15"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुलनीय ऐश्‍वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पड़कर मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। उसका दीपक तो बुझा-बुझाया है॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"9.4.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/16/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम्।","विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान्॥ १६"],"iast":["mene'tidurlabhaṃ puṃsāṃ sarvaṃ tat svapnasaṃstutam|","vidvān vibhavanirvāṇaṃ tamo viśati yat pumān|| 16"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुलनीय ऐश्‍वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पड़कर मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। उसका दीपक तो बुझा-बुझाया है॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"9.4.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/17/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वासुदेवे भगवति तद्भक्तेषु च साधुषु।","प्राप्तो भावं परं विश्‍वं येनेदं लोष्टवत् स्मृतम्॥ १७"],"iast":["vāsudeve bhagavati tadbhakteṣu ca sādhuṣu|","prāpto bhāvaṃ paraṃ viśvaṃ yenedaṃ loṣṭavat smṛtam|| 17"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णमें और उनके प्रेमी साधुओंमें उनका परम प्रेम था। उस प्रेमके प्राप्त हो जानेपर तो यह सारा विश्‍व और इसकी समस्त सम्पत्तियाँ मिट्टीके ढेलेके समान जान पड़ती हैं॥ १७॥"},{"id":"9.4.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/18/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो-","र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने।","करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु","श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥ १८"],"iast":["sa vai manaḥ kṛṣṇapadāravindayo-","rvacāṃsi vaikuṇṭhaguṇānuvarṇane|","karau harermandiramārjanādiṣu","śrutiṃ cakārācyutasatkathodaye|| 18"],"meaning":"उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दयुगलमें, वाणीको भगवद्गुणानुवर्णनमें, हाथोंको श्रीहरि-मन्दिरके मार्जन-सेचनमें और अपने कानोंको भगवान् अच्युतकी मंगलमयी कथाके श्रवणमें लगा रखा था॥ १८॥"},{"id":"9.4.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/19/","page":20,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुकुन्दलिंगालयदर्शने दृशौ","तद‍्भृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसंगमम् ।","घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे","श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते॥ १९"],"iast":["mukundaliṃgālayadarśane dṛśau","tadbhṛtyagātrasparśe'ṅgasaṃgamam |","ghrāṇaṃ ca tatpādasarojasaurabhe","śrīmattulasyā rasanāṃ tadarpite|| 19"],"meaning":"उन्होंने अपने नेत्र मुकुन्दमूर्ति एवं मन्दिरोंके दर्शनोंमें, अंग-संग भगवद्भक्तोंके शरीरस्पर्शमें, नासिका उनके चरणकमलोंपर चढ़ी श्रीमती तुलसीके दिव्य गन्धमें और रसना (जिह्वा)-को भगवान्‌के प्रति अर्पित नैवेद्य-प्रसादमें संल‌ग्‍न कर दिया था॥ १९॥"},{"id":"9.4.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/20/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे","शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने।","कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया","यथोत्तमश्‍लोकजनाश्रया रतिः॥ २०"],"iast":["pādau hareḥ kṣetrapadānusarpaṇe","śiro hṛṣīkeśapadābhivandane|","kāmaṃ ca dāsye na tu kāmakāmyayā","yathottamaślokajanāśrayā ratiḥ|| 20"],"meaning":"अम्बरीषके पैर भगवान्‌के क्षेत्र आदिकी पैदल यात्रा करनेमें ही लगे रहते और वे सिरसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना किया करते। राजा अम्बरीषने माला, चन्दन आदि भोग-सामग्रीको भगवान्‌की सेवामें समर्पित कर दिया था। भोगनेकी इच्छासे नहीं, बल्कि इसलिये कि इससे वह भगवत्प्रेम प्राप्त हो, जो पवित्रकीर्ति भगवान्‌के निज-जनोंमें ही निवास करता है॥ २०॥"},{"id":"9.4.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/21/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सदा कर्मकलापमात्मनः","परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे।","सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां","तन्‍निष्ठविप्राभिहितः शशास ह॥ २१"],"iast":["evaṃ sadā karmakalāpamātmanaḥ","pare'dhiyajñe bhagavatyadhokṣaje|","sarvātmabhāvaṃ vidadhanmahīmimāṃ","tanniṣṭhaviprābhihitaḥ śaśāsa ha|| 21"],"meaning":"इस प्रकार उन्होंने अपने सारे कर्म यज्ञपुरुष, इन्द्रियातीत भगवान्‌के प्रति उन्हें सर्वात्मा एवं सर्वस्वरूप समझकर समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अनुसार वे इस पृथ्वीका शासन करते थे॥ २१॥"},{"id":"9.4.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/22/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ईजेऽश्‍वमेधैरधियज्ञमीश्‍वरं","महाविभूत्योपचितांगदक्षिणैः ।","ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-","र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम्॥ २२"],"iast":["īje'śvamedhairadhiyajñamīśvaraṃ","mahāvibhūtyopacitāṃgadakṣiṇaiḥ |","tatairvasiṣṭhāsitagautamādibhi-","rdhanvanyabhisrotamasau sarasvatīm|| 22"],"meaning":"उन्होंने ‘धन्व’ नामके निर्जल देशमें सरस्वती नदीके प्रवाहके सामने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि भिन्‍न-भिन्‍न आचार्योंद्वारा महान् ऐश्‍वर्यके कारण सर्वांगपरिपूर्ण तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेकों अश्‍वमेध यज्ञ करके यज्ञाधिपति भगवान्‌की आराधना की थी॥ २२॥"},{"id":"9.4.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/23/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्य क्रतुषु गीर्वाणैः सदस्या ऋत्विजो जनाः।","तुल्यरूपाश्‍चानिमिषा व्यदृश्यन्त सुवाससः॥ २३"],"iast":["yasya kratuṣu gīrvāṇaiḥ sadasyā ṛtvijo janāḥ|","tulyarūpāścānimiṣā vyadṛśyanta suvāsasaḥ|| 23"],"meaning":"उनके यज्ञोंमें देवताओंके साथ जब सदस्य और ऋत्विज् बैठ जाते थे, तब उनकी पलकें नहीं पड़ती थीं और वे अपने सुन्दर वस्त्र और वैसे ही रूपके कारण देवताओंके समान दिखायी पड़ते थे॥ २३॥"},{"id":"9.4.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/24/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैरमरप्रियः।","शृण्वद्भिरुपगायद्भिरुत्तमश्‍लोकचेष्टितम्॥ २४"],"iast":["svargo na prārthito yasya manujairamarapriyaḥ|","śṛṇvadbhirupagāyadbhiruttamaślokaceṣṭitam|| 24"],"meaning":"उनकी प्रजा महात्माओंके द्वारा गाये हुए भगवान्‌के उत्तम चरित्रोंका किसी समय बड़े प्रेमसे श्रवण करती और किसी समय उनका गान करती। इस प्रकार उनके राज्यके मनुष्य देवताओंके अत्यन्त प्यारे स्वर्गकी भी इच्छा नहीं करते॥ २४॥"},{"id":"9.4.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/25/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["समर्द्धयन्ति तान् कामाः स्वाराज्यपरिभाविताः।","दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः॥ २५"],"iast":["samarddhayanti tān kāmāḥ svārājyaparibhāvitāḥ|","durlabhā nāpi siddhānāṃ mukundaṃ hṛdi paśyataḥ|| 25"],"meaning":"वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं॥ २५॥"},{"id":"9.4.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/26/","page":21,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिवः।","स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् संगान् सर्वाञ्छनैर्जहौ॥ २६"],"iast":["sa itthaṃ bhaktiyogena tapoyuktena pārthivaḥ|","svadharmeṇa hariṃ prīṇan saṃgān sarvāñchanairjahau|| 26"],"meaning":"राजा अम्बरीष इस प्रकार तपस्यासे युक्त भक्तियोग और प्रजापालनरूप स्वधर्मके द्वारा भगवान्‌को प्रसन्‍न करने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने सब प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर दिया॥ २६॥"},{"id":"9.4.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/27/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु","द्विपोत्तमस्यन्दनवाजिपत्तिषु ।","अक्षय्यरत्‍नाभरणायुधादि-","ष्वनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम् ॥ २७"],"iast":["gṛheṣu dāreṣu suteṣu bandhuṣu","dvipottamasyandanavājipattiṣu |","akṣayyaratnābharaṇāyudhādi-","ṣvanantakośeṣvakarodasanmatim || 27"],"meaning":"घर, स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, बड़े-बड़े हाथी, रथ, घोड़े एवं पैदलोंकी चतुरंगिणी सेना, अक्षय रत्‍न, आभूषण और आयुध आदि समस्त वस्तुओं तथा कभी समाप्त न होनेवाले कोशोंके सम्बन्धमें उनका ऐसा दृढ़ निश्‍चय था कि वे सब-के-सब असत्य हैं॥ २७॥"},{"id":"9.4.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/28/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मा अदाद्धरिश्‍चक्रं प्रत्यनीकभयावहम्।","एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भृत्याभिरक्षणम्॥ २८"],"iast":["tasmā adāddhariścakraṃ pratyanīkabhayāvaham|","ekāntabhaktibhāvena prīto bhṛtyābhirakṣaṇam|| 28"],"meaning":"उनकी अनन्य प्रेममयी भक्तिसे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियोंको भयभीत करनेवाला एवं भगवद्भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है॥ २८॥"},{"id":"9.4.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/29/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आरिराधयिषुः कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया।","युक्तः सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम्॥ २९"],"iast":["ārirādhayiṣuḥ kṛṣṇaṃ mahiṣyā tulyaśīlayā|","yuktaḥ sāṃvatsaraṃ vīro dadhāra dvādaśīvratam|| 29"],"meaning":"राजा अम्बरीषकी पत्‍नी भी उन्हींके समान धर्मशील, संसारसे विरक्त एवं भक्तिपरायण थीं। एक बार उन्होंने अपनी पत्‍नीके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये एक वर्षतक द्वादशीप्रधान एकादशी-व्रत करनेका नियम ग्रहण किया॥ २९॥"},{"id":"9.4.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/30/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्रतान्ते कार्तिके मासि त्रिरात्रं समुपोषितः।","स्नातः कदाचित् कालिन्द्यां हरिं मधुवनेऽर्चयत्॥ ३०"],"iast":["vratānte kārtike māsi trirātraṃ samupoṣitaḥ|","snātaḥ kadācit kālindyāṃ hariṃ madhuvane'rcayat|| 30"],"meaning":"व्रतकी समाप्ति होनेपर कार्तिक महीनेमें उन्होंने तीन रातका उपवास किया और एक दिन यमुनाजीमें स्नान करके मधुवनमें भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की॥ ३०॥"},{"id":"9.4.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/31/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा।","अभिषिच्याम्बराकल्पैर्गन्धमाल्यार्हणादिभिः ॥ ३१"],"iast":["mahābhiṣekavidhinā sarvopaskarasampadā|","abhiṣicyāmbarākalpairgandhamālyārhaṇādibhiḥ || 31"],"meaning":"उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥","meaning_covers":[31,34]},{"id":"9.4.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/32/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम्।","ब्राह्मणांश्‍च महाभागान् सिद्धार्थानपि भक्तितः॥ ३२"],"iast":["tadgatāntarabhāvena pūjayāmāsa keśavam|","brāhmaṇāṃśca mahābhāgān siddhārthānapi bhaktitaḥ|| 32"],"meaning":"उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥","meaning_covers":[31,34]},{"id":"9.4.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/33/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याङ्‌घ्रीणां सुवाससाम्।","पयःशीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम्॥ ३३"],"iast":["gavāṃ rukmaviṣāṇīnāṃ rūpyāṅghrīṇāṃ suvāsasām|","payaḥśīlavayorūpavatsopaskarasampadām|| 33"],"meaning":"उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥","meaning_covers":[31,34]},{"id":"9.4.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/34/","page":22,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राहिणोत् साधु विप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट्।","भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्‍नं गुणवत्तमम्॥ ३४"],"iast":["prāhiṇot sādhu viprebhyo gṛheṣu nyarbudāni ṣaṭ|","bhojayitvā dvijānagre svādvannaṃ guṇavattamam|| 34"],"meaning":"उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥","meaning_covers":[31,34]},{"id":"9.4.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/35/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लब्धकामैरनुज्ञातः पारणायोपचक्रमे।","तस्य तर्ह्यतिथिः साक्षाद् दुर्वासा भगवानभूत्॥ ३५"],"iast":["labdhakāmairanujñātaḥ pāraṇāyopacakrame|","tasya tarhyatithiḥ sākṣād durvāsā bhagavānabhūt|| 35"],"meaning":"जब ब्राह्मणोंको सब कुछ मिल चुका, तब राजाने उन लोगोंसे आज्ञा लेकर व्रतका पारण करनेकी तैयारी की। उसी समय शाप और वरदान देनेमें समर्थ स्वयं दुर्वासाजी भी उनके यहाँ अतिथिके रूपमें पधारे॥ ३५॥"},{"id":"9.4.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/36/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमानर्चातिथिं भूपः प्रत्युत्थानासनार्हणैः।","ययाचेऽभ्यवहाराय पादमूलमुपागतः॥ ३६"],"iast":["tamānarcātithiṃ bhūpaḥ pratyutthānāsanārhaṇaiḥ|","yayāce'bhyavahārāya pādamūlamupāgataḥ|| 36"],"meaning":"राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही उठकर खड़े हो गये, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियोंसे अतिथिके रूपमें आये हुए दुर्वासाजीकी पूजा की। उनके चरणोंमें प्रणाम करके अम्बरीषने भोजनके लिये प्रार्थना की॥ ३६॥"},{"id":"9.4.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/37/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रतिनन्द्य स तद्याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः।","निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे॥ ३७"],"iast":["pratinandya sa tadyācñāṃ kartumāvaśyakaṃ gataḥ|","nimamajja bṛhad dhyāyan kālindīsalile śubhe|| 37"],"meaning":"दुर्वासाजीने अम्बरीषकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्मका ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे॥ ३७॥"},{"id":"9.4.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/38/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति।","चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैस्तद्धर्मसंकटे॥ ३८"],"iast":["muhūrtārdhāvaśiṣṭāyāṃ dvādaśyāṃ pāraṇaṃ prati|","cintayāmāsa dharmajño dvijaistaddharmasaṃkaṭe|| 38"],"meaning":"इधर द्वादशी केवल घड़ीभर शेष रह गयी थी। धर्मज्ञ अम्बरीषने धर्म-संकटमें पड़कर ब्राह्मणोंके साथ परामर्श किया॥ ३८॥"},{"id":"9.4.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/39/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे।","यत् कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत्॥ ३९"],"iast":["brāhmaṇātikrame doṣo dvādaśyāṃ yadapāraṇe|","yat kṛtvā sādhu me bhūyādadharmo vā na māṃ spṛśet|| 39"],"meaning":"उन्होंने कहा—‘ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मणको बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करनेसे मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये॥ ३९॥"},{"id":"9.4.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/40/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये व्रतपारणम्।","प्राहुरब्भक्षणं विप्रा ह्यशितं नाशितं च तत्॥ ४०"],"iast":["ambhasā kevalenātha kariṣye vratapāraṇam|","prāhurabbhakṣaṇaṃ viprā hyaśitaṃ nāśitaṃ ca tat|| 40"],"meaning":"तब ब्राह्मणोंके साथ विचार करके उन्होंने कहा—‘ब्राह्मणो! श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिये इस समय केवल जलसे पारण किये लेता हूँ॥ ४०॥"},{"id":"9.4.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/41/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यपः प्राश्य राजर्षिश्‍चिन्तयन् मनसाच्युतम्।","प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः॥ ४१"],"iast":["ityapaḥ prāśya rājarṣiścintayan manasācyutam|","pratyacaṣṭa kuruśreṣṭha dvijāgamanameva saḥ|| 41"],"meaning":"ऐसा निश्‍चय करके मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीषने जल पी लिया और परीक्षित्! वे केवल दुर्वासाजीके आनेकी बाट देखने लगे॥ ४१॥"},{"id":"9.4.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/42/","page":23,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुर्वासा यमुनाकूलात् कृतावश्यक आगतः।","राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया॥ ४२"],"iast":["durvāsā yamunākūlāt kṛtāvaśyaka āgataḥ|","rājñābhinanditastasya bubudhe ceṣṭitaṃ dhiyā|| 42"],"meaning":"दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातटसे लौट आये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है॥ ४२॥"},{"id":"9.4.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/43/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः।","बुभुक्षितश्‍च सुतरां कृतांजलिमभाषत॥ ४३"],"iast":["manyunā pracaladgātro bhrukuṭīkuṭilānanaḥ|","bubhukṣitaśca sutarāṃ kṛtāṃjalimabhāṣata|| 43"],"meaning":"उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे। इसलिये यह जानकर कि राजाने पारण कर लिया है, वे क्रोधसे थर-थर काँपने लगे। भौंहोंके चढ़ जानेसे उनका मुँह विकट हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीषसे डाँटकर कहा॥ ४३॥"},{"id":"9.4.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/44/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत।","धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिनः॥ ४४"],"iast":["aho asya nṛśaṃsasya śriyonmattasya paśyata|","dharmavyatikramaṃ viṣṇorabhaktasyeśamāninaḥ|| 44"],"meaning":"‘अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धनके मदमें मतवाला हो रहा है। भगवान्‌की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी और यह अपनेको बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्मका उल्लंघन करके बड़ा अन्याय किया है॥ ४४॥"},{"id":"9.4.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/45/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च।","अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम्॥ ४५"],"iast":["yo māmatithimāyātamātithyena nimantrya ca|","adattvā bhuktavāṃstasya sadyaste darśaye phalam|| 45"],"meaning":"देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ’॥ ४५॥"},{"id":"9.4.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/46/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं ब्रुवाण उत्कृत्य जटां रोषविदीपितः।","तया स निर्ममे तस्मै कृत्यां कालानलोपमाम्॥ ४६"],"iast":["evaṃ bruvāṇa utkṛtya jaṭāṃ roṣavidīpitaḥ|","tayā sa nirmame tasmai kṛtyāṃ kālānalopamām|| 46"],"meaning":"यों कहते-कहते वे क्रोधसे जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे अम्बरीषको मार डालनेके लिये एक कृत्या उत्पन्‍न की। वह प्रलयकालकी आगके समान दहक रही थी॥ ४६॥"},{"id":"9.4.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/47/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम्।","वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्‍नृपः॥ ४७"],"iast":["tāmāpatantīṃ jvalatīmasihastāṃ padā bhuvam|","vepayantīṃ samudvīkṣya na cacāla padānnṛpaḥ|| 47"],"meaning":"वह आगके समान जलती हुई, हाथमें तलवार लेकर राजा अम्बरीषपर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी काँप रही थी। परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों-के-त्यों खड़े रहे॥ ४७॥"},{"id":"9.4.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/48/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राग्दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना।","ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावकः॥ ४८"],"iast":["prāgdiṣṭaṃ bhṛtyarakṣāyāṃ puruṣeṇa mahātmanā|","dadāha kṛtyāṃ tāṃ cakraṃ kruddhāhimiva pāvakaḥ|| 48"],"meaning":"परमपुरुष परमात्माने अपने सेवककी रक्षाके लिये पहलेसे ही सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोधसे गुर्राते हुए साँपको भस्म कर देती है, वैसे ही चक्रने दुर्वासाजीकी कृत्याको जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ४८॥"},{"id":"9.4.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/49/","page":24,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदभिद्रवदुद्वीक्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम्।","दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिक्षु प्राणपरीप्सया॥ ४९"],"iast":["tadabhidravadudvīkṣya svaprayāsaṃ ca niṣphalam|","durvāsā dudruve bhīto dikṣu prāṇaparīpsayā|| 49"],"meaning":"जब दुर्वासाजीने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले॥ ४९॥"},{"id":"9.4.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/50/","page":25,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमन्वधावद् भगवद्रथांगं","दावाग्‍निरुद‍्धूतशिखो यथाहिम्।","तथानुषक्तं मुनिरीक्षमाणो","गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः॥ ५०"],"iast":["tamanvadhāvad bhagavadrathāṃgaṃ","dāvāgniruddhūtaśikho yathāhim|","tathānuṣaktaṃ munirīkṣamāṇo","guhāṃ vivikṣuḥ prasasāra meroḥ|| 50"],"meaning":"जैसे ऊँची-ऊँची लपटोंवाला दावानल साँपके पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌का चक्र उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरु पर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े॥ ५०॥"},{"id":"9.4.51","number":51,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/51/","page":25,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिशो नभः क्ष्मां विवरान् समुद्रा-","ल्‍ँलोकान् सपालांस्त्रिदिवं गतः सः।","यतो यतो धावति तत्र तत्र","सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श॥ ५१"],"iast":["diśo nabhaḥ kṣmāṃ vivarān samudrā-","lm̐lokān sapālāṃstridivaṃ gataḥ saḥ|","yato yato dhāvati tatra tatra","sudarśanaṃ duṣprasahaṃ dadarśa|| 51"],"meaning":"दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचेके लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्गतकमें गये; परन्तु जहाँ-जहाँ वे गये, वहीं-वहीं उन्होंने असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगा देखा॥ ५१॥"},{"id":"9.4.52","number":52,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/52/","page":25,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अलब्धनाथः स यदा कुतश्‍चित्","संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः ।","देवं विरिंचं समगाद् विधात-","स्त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम्॥ ५२"],"iast":["alabdhanāthaḥ sa yadā kutaścit","saṃtrastacitto'raṇameṣamāṇaḥ |","devaṃ viriṃcaṃ samagād vidhāta-","strāhyātmayone'jitatejaso mām|| 52"],"meaning":"जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले—‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये’॥ ५२॥"},{"id":"9.4.53","number":53,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/53/","page":25,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["स्थानं मदीयं सहविश्‍वमेतत्","क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे।","भ्रूभंगमात्रेण हि संदिधक्षोः","कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति॥ ५३"],"iast":["sthānaṃ madīyaṃ sahaviśvametat","krīḍāvasāne dviparārdhasaṃjñe|","bhrūbhaṃgamātreṇa hi saṃdidhakṣoḥ","kālātmano yasya tirobhaviṣyati|| 53"],"meaning":"ब्रह्माजीने कहा—‘जब मेरी दो परार्धकी आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान् अपनी यह सृष्टिलीला समेटने लगेंगे और इस जगत‍्को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रूभंगमात्रसे यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जायगा॥ ५३॥"},{"id":"9.4.54","number":54,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/54/","page":25,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["अहं भवो दक्षभृगुप्रधानाः","प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्याः ।","सर्वे वयं यन्‍नियमं प्रपन्‍ना","मूर्ध्‍न्‍यर्पितं लोकहितं वहामः॥ ५४"],"iast":["ahaṃ bhavo dakṣabhṛgupradhānāḥ","prajeśabhūteśasureśamukhyāḥ |","sarve vayaṃ yanniyamaṃ prapannā","mūrdhnyarpitaṃ lokahitaṃ vahāmaḥ|| 54"],"meaning":"मैं, शंकरजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्‍वर, देवेश्‍वर आदि सब जिनके बनाये नियमोंमें बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसारका हित करते हैं, (उनके भक्तके द्रोहीको बचानेके लिये हम समर्थ नहीं हैं)’॥ ५४॥"},{"id":"9.4.55","number":55,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/55/","page":25,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["प्रत्याख्यातो विरिंचेन विष्णुचक्रोपतापितः।","दुर्वासाः शरणं यातः शर्वं कैलासवासिनम्॥ ५५"],"iast":["pratyākhyāto viriṃcena viṣṇucakropatāpitaḥ|","durvāsāḥ śaraṇaṃ yātaḥ śarvaṃ kailāsavāsinam|| 55"],"meaning":"जब ब्रह्माजीने इस प्रकार दुर्वासाको निराश कर दिया, तब भगवान्‌के चक्रसे संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकरकी शरणमें गये॥ ५५॥"},{"id":"9.4.56","number":56,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/56/","page":25,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["वयं न तात प्रभवाम भूम्‍नि","यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः।","भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः","सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः॥ ५६"],"iast":["vayaṃ na tāta prabhavāma bhūmni","yasmin pare'nye'pyajajīvakośāḥ|","bhavanti kāle na bhavanti hīdṛśāḥ","sahasraśo yatra vayaṃ bhramāmaḥ|| 56"],"meaning":"श्रीमहादेवजीने कहा—‘दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्‍वरमें ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्डके समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे-जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं—उन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते॥ ५६॥"},{"id":"9.4.57","number":57,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/57/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["अहं सनत्कुमारश्‍च नारदो भगवानजः।","कपिलोऽपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरिः॥ ५७"],"iast":["ahaṃ sanatkumāraśca nārado bhagavānajaḥ|","kapilo'pāntaratamo devalo dharma āsuriḥ|| 57"],"meaning":"मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्‍वर—ये हम सभी भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते। क्योंकि हम उसी मायाके घेरेमें हैं॥ ५७-५८॥","meaning_covers":[57,58]},{"id":"9.4.58","number":58,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/58/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["मरीचिप्रमुखाश्‍चान्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः।","विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययाऽऽवृताः॥ ५८"],"iast":["marīcipramukhāścānye siddheśāḥ pāradarśanāḥ|","vidāma na vayaṃ sarve yanmāyāṃ māyayā''vṛtāḥ|| 58"],"meaning":"मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्‍वर—ये हम सभी भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते। क्योंकि हम उसी मायाके घेरेमें हैं॥ ५७-५८॥","meaning_covers":[57,58]},{"id":"9.4.59","number":59,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/59/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["तस्य विश्‍वेश्‍वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि नः।","तमेव शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति॥ ५९"],"iast":["tasya viśveśvarasyedaṃ śastraṃ durviṣahaṃ hi naḥ|","tameva śaraṇaṃ yāhi hariste śaṃ vidhāsyati|| 59"],"meaning":"यह चक्र उन विश्‍वेश्‍वरका शस्त्र है। यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मंगल करेंगे’॥ ५९॥"},{"id":"9.4.60","number":60,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/60/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["ततो निराशो दुर्वासाः पदं भगवतो ययौ।","वैकुण्ठाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवासः श्रिया सह॥ ६०"],"iast":["tato nirāśo durvāsāḥ padaṃ bhagavato yayau|","vaikuṇṭhākhyaṃ yadadhyāste śrīnivāsaḥ śriyā saha|| 60"],"meaning":"वहाँसे भी निराश होकर दुर्वासा भगवान्‌के परमधाम वैकुण्ठमें गये। लक्ष्मीपति भगवान् लक्ष्मीके साथ वहीं निवास करते हैं॥ ६०॥"},{"id":"9.4.61","number":61,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/61/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["संदह्यमानोऽजितशस्त्रवह्निना","तत्पादमूले पतितः सवेपथुः।","आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो","कृतागसं माव हि विश्‍वभावन॥ ६१"],"iast":["saṃdahyamāno'jitaśastravahninā","tatpādamūle patitaḥ savepathuḥ|","āhācyutānanta sadīpsita prabho","kṛtāgasaṃ māva hi viśvabhāvana|| 61"],"meaning":"दुर्वासाजी भगवान्‌के चक्रकी आगसे जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा—‘हे अच्युत! हे अनन्त! आप संतोंके एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो! विश्‍वके जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ६१॥"},{"id":"9.4.62","number":62,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/62/","page":26,"speaker":"श्रीरुद्र उवाच","sanskrit":["अजानता ते परमानुभावं","कृतं मयाघं भवतः प्रियाणाम्।","विधेहि तस्यापचितिं विधात-","र्मुच्येत यन्‍नाम्‍न्युदिते नारकोऽपि॥ ६२"],"iast":["ajānatā te paramānubhāvaṃ","kṛtaṃ mayāghaṃ bhavataḥ priyāṇām|","vidhehi tasyāpacitiṃ vidhāta-","rmucyeta yannāmnyudite nārako'pi|| 62"],"meaning":"आपका परम प्रभाव न जाननेके कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्तका अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नामका ही उच्चारण करनेसे नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है’॥ ६२॥"},{"id":"9.4.63","number":63,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/63/","page":26,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।","साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥ ६३"],"iast":["ahaṃ bhaktaparādhīno hyasvatantra iva dvija|","sādhubhirgrastahṛdayo bhaktairbhaktajanapriyaḥ|| 63"],"meaning":"श्रीभगवान्‌ने कहा—दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे॥ ६३॥"},{"id":"9.4.64","number":64,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/64/","page":26,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना।","श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा॥ ६४"],"iast":["nāhamātmānamāśāse madbhaktaiḥ sādhubhirvinā|","śriyaṃ cātyantikīṃ brahman yeṣāṃ gatirahaṃ parā|| 64"],"meaning":"ब्रह्मन्! अपने भक्तोंका एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधुस्वभाव भक्तोंको छोड़कर मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाशरहित लक्ष्मीको॥ ६४॥"},{"id":"9.4.65","number":65,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/65/","page":26,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।","हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥ ६५"],"iast":["ye dārāgāraputrāptān prāṇān vittamimaṃ param|","hitvā māṃ śaraṇaṃ yātāḥ kathaṃ tāṃstyaktumutsahe|| 65"],"meaning":"जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?॥ ६५॥"},{"id":"9.4.66","number":66,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/66/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः।","वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥ ६६"],"iast":["mayi nirbaddhahṛdayāḥ sādhavaḥ samadarśanāḥ|","vaśīkurvanti māṃ bhaktyā satstriyaḥ satpatiṃ yathā|| 66"],"meaning":"जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं॥ ६६॥"},{"id":"9.4.67","number":67,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/67/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादिचतुष्टयम्।","नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविद्रुतम्॥ ६७"],"iast":["matsevayā pratītaṃ ca sālokyādicatuṣṭayam|","necchanti sevayā pūrṇāḥ kuto'nyat kālavidrutam|| 67"],"meaning":"मेरे अनन्यप्रेमी भक्त सेवासे ही अपनेको परिपूर्ण—कृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवाके फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते; फिर समयके फेरसे नष्ट हो जानेवाली वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ ६७॥"},{"id":"9.4.68","number":68,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/68/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।","मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ ६८"],"iast":["sādhavo hṛdayaṃ mahyaṃ sādhūnāṃ hṛdayaṃ tvaham |","madanyat te na jānanti nāhaṃ tebhyo manāgapi|| 68"],"meaning":"दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता॥ ६८॥"},{"id":"9.4.69","number":69,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/69/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["उपायं कथयिष्यामि तव विप्र शृणुष्व तत्।","अयं ह्यात्माभिचारस्ते यतस्तं यातु वै भवान्।","साधुषु प्रहितं तेजः प्रहर्तुः कुरुतेऽशिवम्॥ ६९"],"iast":["upāyaṃ kathayiṣyāmi tava vipra śṛṇuṣva tat|","ayaṃ hyātmābhicāraste yatastaṃ yātu vai bhavān|","sādhuṣu prahitaṃ tejaḥ prahartuḥ kurute'śivam|| 69"],"meaning":"दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पड़ना पड़ा है, आप उसीके पास जाइये। निरपराध साधुओंके अनिष्टकी चेष्टासे अनिष्ट करनेवालेका ही अमंगल होता है॥ ६९॥"},{"id":"9.4.70","number":70,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/70/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे।","ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा॥ ७०"],"iast":["tapo vidyā ca viprāṇāṃ niḥśreyasakare ubhe|","te eva durvinītasya kalpete karturanyathā|| 70"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं। परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं॥ ७०॥"},{"id":"9.4.71","number":71,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/71/","page":27,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ब्रह्मंस्तद् गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम्।","क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति॥ ७१"],"iast":["brahmaṃstad gaccha bhadraṃ te nābhāgatanayaṃ nṛpam|","kṣamāpaya mahābhāgaṃ tataḥ śāntirbhaviṣyati|| 71"],"meaning":"दुर्वासाजी! आपका कल्याण हो। आप नाभाग-नन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी॥ ७१॥"}],"text":[{"b":24745,"kind":"adhyaya_heading","page":18,"text":"अथ चतुर्थोऽध्यायः"},{"b":24746,"kind":"topic_heading","page":18,"text":"नाभाग और अम्बरीषकी कथा"},{"b":24747,"kind":"hindi_commentary","page":18,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":24748,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.4.1"],"text":"नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम्।"},{"b":24749,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.4.1"],"text":"यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम्॥ १"},{"b":24750,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.4.2"],"text":"भ्रातरोऽभाङ्क्त किं मह्यं भजाम पितरं तव।"},{"b":24751,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.4.2"],"text":"त्वां ममार्यास्तताभाङ्‌क्षुर्मा पुत्रक तदादृथाः॥ २"},{"b":24752,"kind":"hindi_commentary","page":18,"explains":["9.4.1","9.4.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मनुपुत्र नभगका पुत्र था नाभाग। जब वह दीर्घकालतक ब्रह्मचर्यका पालन करके लौटा, तब बड़े भाइयोंने अपनेसे छोटे किन्तु विद्वान् भाईको हिस्सेमें केवल पिताको ही दिया (सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपसमें बाँट ली थी)॥ १॥ उसने अपने भाइयोंसे पूछा—‘भाइयो! आपलोगोंने मुझे हिस्सेमें क्या दिया है?’ तब उन्होंने उत्तर दिया कि ‘हम तुम्हारे हिस्सेमें पिताजीको ही तुम्हें देते हैं।’ उसने अपने पितासे जाकर कहा—‘पिताजी! मेरे बड़े भाइयोंने हिस्सेमें मेरे लिये आपको ही दिया है।’ पिताने कहा—‘बेटा! तुम उनकी बात न मानो॥ २॥"},{"b":24753,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.3"],"text":"इमे अंगिरसः सत्रमासतेऽद्य सुमेधसः।"},{"b":24754,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.3"],"text":"षष्ठं षष्ठमुपेत्याहः कवे मुह्यन्ति कर्मणि॥ ३"},{"b":24755,"kind":"hindi_translation","page":19,"explains":["9.4.3"],"text":"देखो, ये बड़े बुद्धिमान् आंगिरसगोत्रके ब्राह्मण इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। परन्तु मेरे विद्वान् पुत्र! वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्ममें भूल कर बैठते हैं॥ ३॥"},{"b":24757,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.4"],"text":"तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्‍वदेवे महात्मनः।"},{"b":24758,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.4"],"text":"ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मनः॥ ४"},{"b":24759,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.5"],"text":"दास्यन्ति तेऽथ तान् गच्छ तथा स कृतवान् यथा।"},{"b":24760,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.5"],"text":"तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं ते सत्रपरिशेषितम्॥ ५"},{"b":24761,"kind":"hindi_translation","page":19,"explains":["9.4.4","9.4.5"],"text":"तुम उन महात्माओंके पास जाकर उन्हें वैश्‍व-देवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञसे बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे। इसलिये अब तुम उन्हींके पास चले जाओ।’ उसने अपने पिताके आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन आंगिरसगोत्री ब्राह्मणोंने भी यज्ञका बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्गमें चले गये॥ ४-५॥"},{"b":24762,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.6"],"text":"तं कश्‍चित् स्वीकरिष्यन्तं पुरुषः कृष्णदर्शनः।"},{"b":24763,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.6"],"text":"उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य ममेदं वास्तुकं वसु॥ ६"},{"b":24764,"kind":"hindi_translation","page":19,"explains":["9.4.6"],"text":"जब नाभाग उस धनको लेने लगा, तब उत्तर दिशासे एक काले रंगका पुरुष आया। उसने कहा—‘इस यज्ञभूमिमें जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है’॥ ६॥"},{"b":24765,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.7"],"text":"ममेदमृषिभिर्दत्तमिति तर्हि स्म मानवः।"},{"b":24766,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.7"],"text":"स्यान्‍नौ ते पितरि प्रश्‍नः पृष्टवान् पितरं तथा॥ ७"},{"b":24767,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.8"],"text":"यज्ञवास्तुगतं सर्वमुच्छिष्टमृषयः क्‍वचित्।"},{"b":24768,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.8"],"text":"चक्रुर्विभागं रुद्राय स देवः सर्वमर्हति॥ ८"},{"b":24769,"kind":"hindi_commentary","page":19,"explains":["9.4.7","9.4.8"],"text":"नाभागने कहा—‘ऋषियोंने यह धन मुझे दिया है, इसलिये मेरा है।’ इसपर उस पुरुषने कहा—‘हमारे विवादके विषयमें तुम्हारे पितासे ही प्रश्‍न किया जाय।’ तब नाभागने जाकर पितासे पूछा॥ ७॥ पिताने कहा—‘एक बार दक्षप्रजापतिके यज्ञमें ऋषिलोग यह निश्‍चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमिमें जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेवका हिस्सा है। इसलिये वह धन तो महादेवजीको ही मिलना चाहिये’॥ ८॥"},{"b":24770,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.9"],"text":"नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम्।"},{"b":24771,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.9"],"text":"इत्याह मे पिता ब्रह्मञ्छिरसा त्वां प्रसादये॥ ९"},{"b":24772,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.10"],"text":"यत् ते पितावदद् धर्मं त्वं च सत्यं प्रभाषसे।"},{"b":24773,"kind":"sanskrit_shloka","page":19,"verses":["9.4.10"],"text":"ददामि ते मन्त्रदृशे ज्ञानं ब्रह्म सनातनम्॥ १०"},{"b":24774,"kind":"hindi_translation","page":19,"explains":["9.4.9","9.4.10"],"text":"नाभागने जाकर उन काले रंगके पुरुष रुद्र-भगवान्‌को प्रणाम किया और कहा कि ‘प्रभो! यज्ञ-भूमिकी सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिताने ऐसा ही कहा है। भगवन्! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ’॥ ९॥ तब भगवान् रुद्रने कहा—‘तुम्हारे पिताने धर्मके अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है। तुम वेदोंका अर्थ तो पहलेसे ही जानते हो। अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान देता हूँ॥ १०॥"},{"b":24775,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.11"],"text":"गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रे परिशेषितम्।"},{"b":24776,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.11"],"text":"इत्युक्त्वान्तर्हितो रुद्रो भगवान् सत्यवत्सलः॥ ११"},{"b":24777,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.12"],"text":"य एतत् संस्मरेत् प्रातः सायं च सुसमाहितः।"},{"b":24778,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.12"],"text":"कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिं चैव तथाऽऽत्मनः॥ १२"},{"b":24779,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.13"],"text":"नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवतः कृती।"},{"b":24780,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.13"],"text":"नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्‍वचित्॥ १३"},{"b":24781,"kind":"hindi_commentary","page":20,"explains":["9.4.11","9.4.12","9.4.13"],"text":"यहाँ यज्ञमें बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो।’ इतना कहकर सत्यप्रेमी भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये॥ ११॥ जो मनुष्य प्रातः और सायंकाल एकाग्रचित्तसे इस आख्यानका स्मरण करता है वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूपको भी जान लेता है॥ १२॥ नाभागके पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान्‌के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्मशाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीषका स्पर्श न कर सका॥ १३॥"},{"b":24783,"kind":"topic_heading","page":20,"text":"राजोवाच"},{"b":24784,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.14"],"text":"भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः।"},{"b":24785,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.14"],"text":"न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः॥ १४"},{"b":24786,"kind":"hindi_commentary","page":20,"explains":["9.4.14"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीषका चरित्र सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मणने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया जो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता; परन्तु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका॥ १४॥"},{"b":24788,"kind":"topic_heading","page":20,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":24789,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.15"],"text":"अम्बरीषो महाभागः सप्तद्वीपवतीं महीम्।"},{"b":24790,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.15"],"text":"अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि॥ १५"},{"b":24791,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.16"],"text":"मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम्।"},{"b":24792,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.16"],"text":"विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान्॥ १६"},{"b":24793,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.17"],"text":"वासुदेवे भगवति तद्भक्तेषु च साधुषु।"},{"b":24794,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.17"],"text":"प्राप्तो भावं परं विश्‍वं येनेदं लोष्टवत् स्मृतम्॥ १७"},{"b":24795,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.18"],"text":"स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो-"},{"b":24796,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.18"],"text":"र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने।"},{"b":24797,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.18"],"text":"करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु"},{"b":24798,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.18"],"text":"श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥ १८"},{"b":24799,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.19"],"text":"मुकुन्दलिंगालयदर्शने दृशौ"},{"b":24800,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.19"],"text":"तद‍्भृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसंगमम् ।"},{"b":24801,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.19"],"text":"घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे"},{"b":24802,"kind":"sanskrit_shloka","page":20,"verses":["9.4.19"],"text":"श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते॥ १९"},{"b":24803,"kind":"hindi_commentary","page":20,"explains":["9.4.15","9.4.16","9.4.17","9.4.18","9.4.19"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुलनीय ऐश्‍वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पड़कर मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। उसका दीपक तो बुझा-बुझाया है॥ १५-१६॥ भगवान् श्रीकृष्णमें और उनके प्रेमी साधुओंमें उनका परम प्रेम था। उस प्रेमके प्राप्त हो जानेपर तो यह सारा विश्‍व और इसकी समस्त सम्पत्तियाँ मिट्टीके ढेलेके समान जान पड़ती हैं॥ १७॥ उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दयुगलमें, वाणीको भगवद्गुणानुवर्णनमें, हाथोंको श्रीहरि-मन्दिरके मार्जन-सेचनमें और अपने कानोंको भगवान् अच्युतकी मंगलमयी कथाके श्रवणमें लगा रखा था॥ १८॥ उन्होंने अपने नेत्र मुकुन्दमूर्ति एवं मन्दिरोंके दर्शनोंमें, अंग-संग भगवद्भक्तोंके शरीरस्पर्शमें, नासिका उनके चरणकमलोंपर चढ़ी श्रीमती तुलसीके दिव्य गन्धमें और रसना (जिह्वा)-को भगवान्‌के प्रति अर्पित नैवेद्य-प्रसादमें संल‌ग्‍न कर दिया था॥ १९॥"},{"b":24804,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.20"],"text":"पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे"},{"b":24805,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.20"],"text":"शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने।"},{"b":24806,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.20"],"text":"कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया"},{"b":24807,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.20"],"text":"यथोत्तमश्‍लोकजनाश्रया रतिः॥ २०"},{"b":24808,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.21"],"text":"एवं सदा कर्मकलापमात्मनः"},{"b":24809,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.21"],"text":"परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे।"},{"b":24810,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.21"],"text":"सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां"},{"b":24811,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.21"],"text":"तन्‍निष्ठविप्राभिहितः शशास ह॥ २१"},{"b":24812,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.22"],"text":"ईजेऽश्‍वमेधैरधियज्ञमीश्‍वरं"},{"b":24813,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.22"],"text":"महाविभूत्योपचितांगदक्षिणैः ।"},{"b":24814,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.22"],"text":"ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-"},{"b":24815,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.22"],"text":"र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम्॥ २२"},{"b":24816,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.23"],"text":"यस्य क्रतुषु गीर्वाणैः सदस्या ऋत्विजो जनाः।"},{"b":24817,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.23"],"text":"तुल्यरूपाश्‍चानिमिषा व्यदृश्यन्त सुवाससः॥ २३"},{"b":24818,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.24"],"text":"स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैरमरप्रियः।"},{"b":24819,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.24"],"text":"शृण्वद्भिरुपगायद्भिरुत्तमश्‍लोकचेष्टितम्॥ २४"},{"b":24821,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.25"],"text":"समर्द्धयन्ति तान् कामाः स्वाराज्यपरिभाविताः।"},{"b":24822,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.25"],"text":"दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः॥ २५"},{"b":24823,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.26"],"text":"स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिवः।"},{"b":24824,"kind":"sanskrit_shloka","page":21,"verses":["9.4.26"],"text":"स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् संगान् सर्वाञ्छनैर्जहौ॥ २६"},{"b":24825,"kind":"hindi_translation","page":21,"explains":["9.4.20","9.4.21","9.4.22","9.4.23","9.4.24","9.4.25","9.4.26"],"text":"अम्बरीषके पैर भगवान्‌के क्षेत्र आदिकी पैदल यात्रा करनेमें ही लगे रहते और वे सिरसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना किया करते। राजा अम्बरीषने माला, चन्दन आदि भोग-सामग्रीको भगवान्‌की सेवामें समर्पित कर दिया था। भोगनेकी इच्छासे नहीं, बल्कि इसलिये कि इससे वह भगवत्प्रेम प्राप्त हो, जो पवित्रकीर्ति भगवान्‌के निज-जनोंमें ही निवास करता है॥ २०॥ इस प्रकार उन्होंने अपने सारे कर्म यज्ञपुरुष, इन्द्रियातीत भगवान्‌के प्रति उन्हें सर्वात्मा एवं सर्वस्वरूप समझकर समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अनुसार वे इस पृथ्वीका शासन करते थे॥ २१॥ उन्होंने ‘धन्व’ नामके निर्जल देशमें सरस्वती नदीके प्रवाहके सामने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि भिन्‍न-भिन्‍न आचार्योंद्वारा महान् ऐश्‍वर्यके कारण सर्वांगपरिपूर्ण तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेकों अश्‍वमेध यज्ञ करके यज्ञाधिपति भगवान्‌की आराधना की थी॥ २२॥ उनके यज्ञोंमें देवताओंके साथ जब सदस्य और ऋत्विज् बैठ जाते थे, तब उनकी पलकें नहीं पड़ती थीं और वे अपने सुन्दर वस्त्र और वैसे ही रूपके कारण देवताओंके समान दिखायी पड़ते थे॥ २३॥ उनकी प्रजा महात्माओंके द्वारा गाये हुए भगवान्‌के उत्तम चरित्रोंका किसी समय बड़े प्रेमसे श्रवण करती और किसी समय उनका गान करती। इस प्रकार उनके राज्यके मनुष्य देवताओंके अत्यन्त प्यारे स्वर्गकी भी इच्छा नहीं करते॥ २४॥ वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं॥ २५॥ राजा अम्बरीष इस प्रकार तपस्यासे युक्त भक्तियोग और प्रजापालनरूप स्वधर्मके द्वारा भगवान्‌को प्रसन्‍न करने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने सब प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर दिया॥ २६॥"},{"b":24826,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.27"],"text":"गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु"},{"b":24827,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.27"],"text":"द्विपोत्तमस्यन्दनवाजिपत्तिषु ।"},{"b":24828,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.27"],"text":"अक्षय्यरत्‍नाभरणायुधादि-"},{"b":24829,"kind":"topic_heading","page":22,"verses":["9.4.27"],"text":"ष्वनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम् ॥ २७"},{"b":24830,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.28"],"text":"तस्मा अदाद्धरिश्‍चक्रं प्रत्यनीकभयावहम्।"},{"b":24831,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.28"],"text":"एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भृत्याभिरक्षणम्॥ २८"},{"b":24832,"kind":"hindi_translation","page":22,"explains":["9.4.27","9.4.28"],"text":"घर, स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, बड़े-बड़े हाथी, रथ, घोड़े एवं पैदलोंकी चतुरंगिणी सेना, अक्षय रत्‍न, आभूषण और आयुध आदि समस्त वस्तुओं तथा कभी समाप्त न होनेवाले कोशोंके सम्बन्धमें उनका ऐसा दृढ़ निश्‍चय था कि वे सब-के-सब असत्य हैं॥ २७॥ उनकी अनन्य प्रेममयी भक्तिसे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियोंको भयभीत करनेवाला एवं भगवद्भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है॥ २८॥"},{"b":24833,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.29"],"text":"आरिराधयिषुः कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया।"},{"b":24834,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.29"],"text":"युक्तः सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम्॥ २९"},{"b":24835,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.30"],"text":"व्रतान्ते कार्तिके मासि त्रिरात्रं समुपोषितः।"},{"b":24836,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.30"],"text":"स्नातः कदाचित् कालिन्द्यां हरिं मधुवनेऽर्चयत्॥ ३०"},{"b":24837,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.31"],"text":"महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा।"},{"b":24838,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.31"],"text":"अभिषिच्याम्बराकल्पैर्गन्धमाल्यार्हणादिभिः ॥ ३१"},{"b":24839,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.32"],"text":"तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम्।"},{"b":24840,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.32"],"text":"ब्राह्मणांश्‍च महाभागान् सिद्धार्थानपि भक्तितः॥ ३२"},{"b":24841,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.33"],"text":"गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याङ्‌घ्रीणां सुवाससाम्।"},{"b":24842,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.33"],"text":"पयःशीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम्॥ ३३"},{"b":24843,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.34"],"text":"प्राहिणोत् साधु विप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट्।"},{"b":24844,"kind":"sanskrit_shloka","page":22,"verses":["9.4.34"],"text":"भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्‍नं गुणवत्तमम्॥ ३४"},{"b":24845,"kind":"hindi_translation","page":22,"explains":["9.4.29","9.4.30","9.4.31","9.4.32","9.4.33","9.4.34"],"text":"राजा अम्बरीषकी पत्‍नी भी उन्हींके समान धर्मशील, संसारसे विरक्त एवं भक्तिपरायण थीं। एक बार उन्होंने अपनी पत्‍नीके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये एक वर्षतक द्वादशीप्रधान एकादशी-व्रत करनेका नियम ग्रहण किया॥ २९॥ व्रतकी समाप्ति होनेपर कार्तिक महीनेमें उन्होंने तीन रातका उपवास किया और एक दिन यमुनाजीमें स्नान करके मधुवनमें भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की॥ ३०॥ उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥"},{"b":24846,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.35"],"text":"लब्धकामैरनुज्ञातः पारणायोपचक्रमे।"},{"b":24847,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.35"],"text":"तस्य तर्ह्यतिथिः साक्षाद् दुर्वासा भगवानभूत्॥ ३५"},{"b":24848,"kind":"hindi_translation","page":23,"explains":["9.4.35"],"text":"जब ब्राह्मणोंको सब कुछ मिल चुका, तब राजाने उन लोगोंसे आज्ञा लेकर व्रतका पारण करनेकी तैयारी की। उसी समय शाप और वरदान देनेमें समर्थ स्वयं दुर्वासाजी भी उनके यहाँ अतिथिके रूपमें पधारे॥ ३५॥"},{"b":24849,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.36"],"text":"तमानर्चातिथिं भूपः प्रत्युत्थानासनार्हणैः।"},{"b":24850,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.36"],"text":"ययाचेऽभ्यवहाराय पादमूलमुपागतः॥ ३६"},{"b":24851,"kind":"hindi_commentary","page":23,"explains":["9.4.36"],"text":"राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही उठकर खड़े हो गये, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियोंसे अतिथिके रूपमें आये हुए दुर्वासाजीकी पूजा की। उनके चरणोंमें प्रणाम करके अम्बरीषने भोजनके लिये प्रार्थना की॥ ३६॥"},{"b":24852,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.37"],"text":"प्रतिनन्द्य स तद्याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः।"},{"b":24853,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.37"],"text":"निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे॥ ३७"},{"b":24854,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.38"],"text":"मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति।"},{"b":24855,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.38"],"text":"चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैस्तद्धर्मसंकटे॥ ३८"},{"b":24856,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.39"],"text":"ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे।"},{"b":24857,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.39"],"text":"यत् कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत्॥ ३९"},{"b":24858,"kind":"hindi_commentary","page":23,"explains":["9.4.37","9.4.38","9.4.39"],"text":"दुर्वासाजीने अम्बरीषकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्मका ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे॥ ३७॥ इधर द्वादशी केवल घड़ीभर शेष रह गयी थी। धर्मज्ञ अम्बरीषने धर्म-संकटमें पड़कर ब्राह्मणोंके साथ परामर्श किया॥ ३८॥ उन्होंने कहा—‘ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मणको बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करनेसे मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये॥ ३९॥"},{"b":24859,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.40"],"text":"अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये व्रतपारणम्।"},{"b":24860,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.40"],"text":"प्राहुरब्भक्षणं विप्रा ह्यशितं नाशितं च तत्॥ ४०"},{"b":24861,"kind":"hindi_commentary","page":23,"explains":["9.4.40"],"text":"तब ब्राह्मणोंके साथ विचार करके उन्होंने कहा—‘ब्राह्मणो! श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिये इस समय केवल जलसे पारण किये लेता हूँ॥ ४०॥"},{"b":24863,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.41"],"text":"इत्यपः प्राश्य राजर्षिश्‍चिन्तयन् मनसाच्युतम्।"},{"b":24864,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.41"],"text":"प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः॥ ४१"},{"b":24865,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.42"],"text":"दुर्वासा यमुनाकूलात् कृतावश्यक आगतः।"},{"b":24866,"kind":"sanskrit_shloka","page":23,"verses":["9.4.42"],"text":"राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया॥ ४२"},{"b":24867,"kind":"hindi_commentary","page":23,"explains":["9.4.41","9.4.42"],"text":"ऐसा निश्‍चय करके मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीषने जल पी लिया और परीक्षित्! वे केवल दुर्वासाजीके आनेकी बाट देखने लगे॥ ४१॥ दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातटसे लौट आये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है॥ ४२॥"},{"b":24868,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.43"],"text":"मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः।"},{"b":24869,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.43"],"text":"बुभुक्षितश्‍च सुतरां कृतांजलिमभाषत॥ ४३"},{"b":24870,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.43"],"text":"उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे। इसलिये यह जानकर कि राजाने पारण कर लिया है, वे क्रोधसे थर-थर काँपने लगे। भौंहोंके चढ़ जानेसे उनका मुँह विकट हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीषसे डाँटकर कहा॥ ४३॥"},{"b":24871,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.44"],"text":"अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत।"},{"b":24872,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.44"],"text":"धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिनः॥ ४४"},{"b":24873,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.44"],"text":"‘अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धनके मदमें मतवाला हो रहा है। भगवान्‌की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी और यह अपनेको बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्मका उल्लंघन करके बड़ा अन्याय किया है॥ ४४॥"},{"b":24874,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.45"],"text":"यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च।"},{"b":24875,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.45"],"text":"अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम्॥ ४५"},{"b":24876,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.45"],"text":"देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ’॥ ४५॥"},{"b":24877,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.46"],"text":"एवं ब्रुवाण उत्कृत्य जटां रोषविदीपितः।"},{"b":24878,"kind":"topic_heading","page":24,"verses":["9.4.46"],"text":"तया स निर्ममे तस्मै कृत्यां कालानलोपमाम्॥ ४६"},{"b":24879,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.46"],"text":"यों कहते-कहते वे क्रोधसे जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे अम्बरीषको मार डालनेके लिये एक कृत्या उत्पन्‍न की। वह प्रलयकालकी आगके समान दहक रही थी॥ ४६॥"},{"b":24880,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.47"],"text":"तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम्।"},{"b":24881,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.47"],"text":"वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्‍नृपः॥ ४७"},{"b":24882,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.47"],"text":"वह आगके समान जलती हुई, हाथमें तलवार लेकर राजा अम्बरीषपर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी काँप रही थी। परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों-के-त्यों खड़े रहे॥ ४७॥"},{"b":24883,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.48"],"text":"प्राग्दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना।"},{"b":24884,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.48"],"text":"ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावकः॥ ४८"},{"b":24885,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.48"],"text":"परमपुरुष परमात्माने अपने सेवककी रक्षाके लिये पहलेसे ही सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोधसे गुर्राते हुए साँपको भस्म कर देती है, वैसे ही चक्रने दुर्वासाजीकी कृत्याको जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ४८॥"},{"b":24886,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.49"],"text":"तदभिद्रवदुद्वीक्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम्।"},{"b":24887,"kind":"sanskrit_shloka","page":24,"verses":["9.4.49"],"text":"दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिक्षु प्राणपरीप्सया॥ ४९"},{"b":24888,"kind":"hindi_translation","page":24,"explains":["9.4.49"],"text":"जब दुर्वासाजीने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले॥ ४९॥"},{"b":24889,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.50"],"text":"तमन्वधावद् भगवद्रथांगं"},{"b":24890,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.50"],"text":"दावाग्‍निरुद‍्धूतशिखो यथाहिम्।"},{"b":24891,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.50"],"text":"तथानुषक्तं मुनिरीक्षमाणो"},{"b":24892,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.50"],"text":"गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः॥ ५०"},{"b":24893,"kind":"hindi_commentary","page":25,"explains":["9.4.50"],"text":"जैसे ऊँची-ऊँची लपटोंवाला दावानल साँपके पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌का चक्र उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरु पर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े॥ ५०॥"},{"b":24894,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.51"],"text":"दिशो नभः क्ष्मां विवरान् समुद्रा-"},{"b":24895,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.51"],"text":"ल्‍ँलोकान् सपालांस्त्रिदिवं गतः सः।"},{"b":24896,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.51"],"text":"यतो यतो धावति तत्र तत्र"},{"b":24897,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.51"],"text":"सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श॥ ५१"},{"b":24898,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.52"],"text":"अलब्धनाथः स यदा कुतश्‍चित्"},{"b":24899,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.52"],"text":"संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः ।"},{"b":24900,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.52"],"text":"देवं विरिंचं समगाद् विधात-"},{"b":24901,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.52"],"text":"स्त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम्॥ ५२"},{"b":24902,"kind":"hindi_commentary","page":25,"explains":["9.4.51","9.4.52"],"text":"दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचेके लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्गतकमें गये; परन्तु जहाँ-जहाँ वे गये, वहीं-वहीं उन्होंने असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगा देखा॥ ५१॥ जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले—‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये’॥ ५२॥"},{"b":24903,"kind":"topic_heading","page":25,"text":"ब्रह्मोवाच"},{"b":24904,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.53"],"text":"स्थानं मदीयं सहविश्‍वमेतत्"},{"b":24905,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.53"],"text":"क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे।"},{"b":24906,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.53"],"text":"भ्रूभंगमात्रेण हि संदिधक्षोः"},{"b":24907,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.53"],"text":"कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति॥ ५३"},{"b":24908,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.54"],"text":"अहं भवो दक्षभृगुप्रधानाः"},{"b":24909,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.54"],"text":"प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्याः ।"},{"b":24910,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.54"],"text":"सर्वे वयं यन्‍नियमं प्रपन्‍ना"},{"b":24911,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.54"],"text":"मूर्ध्‍न्‍यर्पितं लोकहितं वहामः॥ ५४"},{"b":24912,"kind":"hindi_commentary","page":25,"explains":["9.4.53","9.4.54"],"text":"ब्रह्माजीने कहा—‘जब मेरी दो परार्धकी आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान् अपनी यह सृष्टिलीला समेटने लगेंगे और इस जगत‍्को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रूभंगमात्रसे यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जायगा॥ ५३॥ मैं, शंकरजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्‍वर, देवेश्‍वर आदि सब जिनके बनाये नियमोंमें बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसारका हित करते हैं, (उनके भक्तके द्रोहीको बचानेके लिये हम समर्थ नहीं हैं)’॥ ५४॥"},{"b":24913,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.55"],"text":"प्रत्याख्यातो विरिंचेन विष्णुचक्रोपतापितः।"},{"b":24914,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.55"],"text":"दुर्वासाः शरणं यातः शर्वं कैलासवासिनम्॥ ५५"},{"b":24915,"kind":"hindi_commentary","page":25,"explains":["9.4.55"],"text":"जब ब्रह्माजीने इस प्रकार दुर्वासाको निराश कर दिया, तब भगवान्‌के चक्रसे संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकरकी शरणमें गये॥ ५५॥"},{"b":24916,"kind":"topic_heading","page":25,"text":"श्रीरुद्र उवाच"},{"b":24917,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.56"],"text":"वयं न तात प्रभवाम भूम्‍नि"},{"b":24918,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.56"],"text":"यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः।"},{"b":24919,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.56"],"text":"भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः"},{"b":24920,"kind":"sanskrit_shloka","page":25,"verses":["9.4.56"],"text":"सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः॥ ५६"},{"b":24921,"kind":"hindi_commentary","page":25,"explains":["9.4.56"],"text":"श्रीमहादेवजीने कहा—‘दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्‍वरमें ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्डके समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे-जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं—उन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते॥ ५६॥"},{"b":24922,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.57"],"text":"अहं सनत्कुमारश्‍च नारदो भगवानजः।"},{"b":24923,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.57"],"text":"कपिलोऽपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरिः॥ ५७"},{"b":24924,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.58"],"text":"मरीचिप्रमुखाश्‍चान्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः।"},{"b":24925,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.58"],"text":"विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययाऽऽवृताः॥ ५८"},{"b":24926,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.57","9.4.58"],"text":"मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्‍वर—ये हम सभी भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते। क्योंकि हम उसी मायाके घेरेमें हैं॥ ५७-५८॥"},{"b":24927,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.59"],"text":"तस्य विश्‍वेश्‍वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि नः।"},{"b":24928,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.59"],"text":"तमेव शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति॥ ५९"},{"b":24929,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.59"],"text":"यह चक्र उन विश्‍वेश्‍वरका शस्त्र है। यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मंगल करेंगे’॥ ५९॥"},{"b":24930,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.60"],"text":"ततो निराशो दुर्वासाः पदं भगवतो ययौ।"},{"b":24931,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.60"],"text":"वैकुण्ठाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवासः श्रिया सह॥ ६०"},{"b":24932,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.60"],"text":"वहाँसे भी निराश होकर दुर्वासा भगवान्‌के परमधाम वैकुण्ठमें गये। लक्ष्मीपति भगवान् लक्ष्मीके साथ वहीं निवास करते हैं॥ ६०॥"},{"b":24933,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.61"],"text":"संदह्यमानोऽजितशस्त्रवह्निना"},{"b":24934,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.61"],"text":"तत्पादमूले पतितः सवेपथुः।"},{"b":24935,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.61"],"text":"आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो"},{"b":24936,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.61"],"text":"कृतागसं माव हि विश्‍वभावन॥ ६१"},{"b":24937,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.61"],"text":"दुर्वासाजी भगवान्‌के चक्रकी आगसे जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा—‘हे अच्युत! हे अनन्त! आप संतोंके एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो! विश्‍वके जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ६१॥"},{"b":24938,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.62"],"text":"अजानता ते परमानुभावं"},{"b":24939,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.62"],"text":"कृतं मयाघं भवतः प्रियाणाम्।"},{"b":24940,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.62"],"text":"विधेहि तस्यापचितिं विधात-"},{"b":24941,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.62"],"text":"र्मुच्येत यन्‍नाम्‍न्युदिते नारकोऽपि॥ ६२"},{"b":24942,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.62"],"text":"आपका परम प्रभाव न जाननेके कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्तका अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नामका ही उच्चारण करनेसे नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है’॥ ६२॥"},{"b":24943,"kind":"topic_heading","page":26,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":24944,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.63"],"text":"अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।"},{"b":24945,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.63"],"text":"साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥ ६३"},{"b":24946,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.64"],"text":"नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना।"},{"b":24947,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.64"],"text":"श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा॥ ६४"},{"b":24948,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.65"],"text":"ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।"},{"b":24949,"kind":"sanskrit_shloka","page":26,"verses":["9.4.65"],"text":"हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥ ६५"},{"b":24950,"kind":"hindi_commentary","page":26,"explains":["9.4.63"],"text":"श्रीभगवान्‌ने कहा—दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे॥ ६३॥"},{"b":24951,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.64"],"text":"ब्रह्मन्! अपने भक्तोंका एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधुस्वभाव भक्तोंको छोड़कर मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाशरहित लक्ष्मीको॥ ६४॥"},{"b":24952,"kind":"hindi_translation","page":26,"explains":["9.4.65"],"text":"जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?॥ ६५॥"},{"b":24953,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.66"],"text":"मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः।"},{"b":24954,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.66"],"text":"वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥ ६६"},{"b":24955,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.66"],"text":"जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं॥ ६६॥"},{"b":24956,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.67"],"text":"मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादिचतुष्टयम्।"},{"b":24957,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.67"],"text":"नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविद्रुतम्॥ ६७"},{"b":24958,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.67"],"text":"मेरे अनन्यप्रेमी भक्त सेवासे ही अपनेको परिपूर्ण—कृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवाके फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते; फिर समयके फेरसे नष्ट हो जानेवाली वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ ६७॥"},{"b":24959,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.68"],"text":"साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।"},{"b":24960,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.68"],"text":"मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ ६८"},{"b":24961,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.68"],"text":"दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता॥ ६८॥"},{"b":24962,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.69"],"text":"उपायं कथयिष्यामि तव विप्र शृणुष्व तत्।"},{"b":24963,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.69"],"text":"अयं ह्यात्माभिचारस्ते यतस्तं यातु वै भवान्।"},{"b":24964,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.69"],"text":"साधुषु प्रहितं तेजः प्रहर्तुः कुरुतेऽशिवम्॥ ६९"},{"b":24965,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.69"],"text":"दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पड़ना पड़ा है, आप उसीके पास जाइये। निरपराध साधुओंके अनिष्टकी चेष्टासे अनिष्ट करनेवालेका ही अमंगल होता है॥ ६९॥"},{"b":24966,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.70"],"text":"तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे।"},{"b":24967,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.70"],"text":"ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा॥ ७०"},{"b":24968,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.70"],"text":"इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं। परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं॥ ७०॥"},{"b":24969,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.71"],"text":"ब्रह्मंस्तद् गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम्।"},{"b":24970,"kind":"sanskrit_shloka","page":27,"verses":["9.4.71"],"text":"क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति॥ ७१"},{"b":24971,"kind":"hindi_translation","page":27,"explains":["9.4.71"],"text":"दुर्वासाजी! आपका कल्याण हो। आप नाभाग-नन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी॥ ७१॥"},{"b":24972,"kind":"hindi_translation","page":27,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे- ऽम्बरीषचरिते चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥"}],"notes":[{"id":"v2:13","mark":"१","page":19,"after_verse":"9.4.5","text":"शेषणम्।"},{"id":"v2:14","mark":"१","page":21,"after_verse":"9.4.22","text":"भिः स्वर्धुन्यभिस्रोतवतीं सर०।"},{"id":"v2:15","mark":"२","page":21,"after_verse":"9.4.25","text":"वेष्टिताः।"},{"id":"v2:16","mark":"३","page":21,"after_verse":"9.4.25","text":"पश्यताम्।"},{"id":"v2:17","mark":"१","page":22,"after_verse":"9.4.27","text":"जिवस्तुषु।"},{"id":"v2:18","mark":"२","page":22,"after_verse":"9.4.28","text":"भूताभि०।"},{"id":"v2:19","mark":"३","page":22,"after_verse":"9.4.29","text":"षुर्विष्णुं।"},{"id":"v2:20","mark":"४","page":22,"after_verse":"9.4.31","text":"र्लब्ध०।"},{"id":"v2:21","mark":"५","page":22,"after_verse":"9.4.34","text":"गुणवन्मधु।"},{"id":"v2:22","mark":"१","page":23,"after_verse":"9.4.37","text":"तद्वाक्यं।"},{"id":"v2:23","mark":"२","page":23,"after_verse":"9.4.37","text":"निर्म०।"},{"id":"v2:24","mark":"३","page":23,"after_verse":"9.4.37","text":"शुचौ।"},{"id":"v2:25","mark":"१","page":24,"after_verse":"9.4.44","text":"श्रिया मत्तस्य।"},{"id":"v2:26","mark":"२","page":24,"after_verse":"9.4.44","text":"स्येष्टमानिनः।"},{"id":"v2:27","mark":"३","page":24,"after_verse":"9.4.46","text":"तपसा नि०।"},{"id":"v2:28","mark":"४","page":24,"after_verse":"9.4.47","text":"लन्तीमसि०।"},{"id":"v2:29","mark":"५","page":24,"after_verse":"9.4.49","text":"द्रवमुद्वी०।"},{"id":"v2:30","mark":"१","page":25,"after_verse":"9.4.50","text":"थावसक्तं।"},{"id":"v2:31","mark":"१","page":26,"after_verse":"9.4.61","text":"मामव विश्‍व।"},{"id":"v2:32","mark":"१","page":27,"after_verse":"9.4.66","text":"दर्शिनः।"},{"id":"v2:33","mark":"२","page":27,"after_verse":"9.4.68","text":"ह्यहम्।"}],"corrections":{"count":8,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}