{"id":"9.5","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 5","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ पञ्चमोऽध्यायः","topics":["दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[28,31]},"verses":[{"id":"9.5.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/1/","page":28,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्‍चक्रतापितः।","अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत्॥ १"],"iast":["evaṃ bhagavatā''diṣṭo durvāsāścakratāpitaḥ|","ambarīṣamupāvṛtya tatpādau duḥkhito'grahīt|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्‌ने इस प्रकार आज्ञा दी तब सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीषके पास आये और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजाके पैर पकड़ लिये॥ १॥"},{"id":"9.5.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/2/","page":28,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य सोद्यमनं वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः।","अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम्॥ २"],"iast":["tasya sodyamanaṃ vīkṣya pādasparśavilajjitaḥ|","astāvīt taddharerastraṃ kṛpayā pīḍito bhṛśam|| 2"],"meaning":"दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्‌के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था॥ २॥"},{"id":"9.5.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/3/","page":28,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["त्वमग्‍निर्भगवान् सूर्यस्त्वं सोमो ज्योतिषां पतिः।","त्वमापस्त्वं क्षितिर्व्योम वायुर्मात्रेन्द्रियाणि च॥ ३"],"iast":["tvamagnirbhagavān sūryastvaṃ somo jyotiṣāṃ patiḥ|","tvamāpastvaṃ kṣitirvyoma vāyurmātrendriyāṇi ca|| 3"],"meaning":"अम्बरीषने कहा—प्रभो सुदर्शन! आप अग्‍निस्वरूप हैं। आप ही परम समर्थ सूर्य हैं। समस्त नक्षत्रमण्डलके अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप हैं। जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, पंचतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके रूपमें भी आप ही हैं॥ ३॥"},{"id":"9.5.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/4/","page":28,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय।","सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते॥ ४"],"iast":["sudarśana namastubhyaṃ sahasrārācyutapriya|","sarvāstraghātin viprāya svasti bhūyā iḍaspate|| 4"],"meaning":"भगवान्‌के प्यारे, हजार दाँतवाले चक्रदेव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस्त्र-शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले एवं पृथ्वीके रक्षक! आप इन ब्राह्मणकी रक्षा कीजिये॥ ४॥"},{"id":"9.5.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/5/","page":28,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोऽखिलयज्ञभुक्।","त्वं लोकपालः सर्वात्मा त्वं तेजः पौरुषं परम्॥ ५"],"iast":["tvaṃ dharmastvamṛtaṃ satyaṃ tvaṃ yajño'khilayajñabhuk|","tvaṃ lokapālaḥ sarvātmā tvaṃ tejaḥ pauruṣaṃ param|| 5"],"meaning":"आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं; आप ही समस्त यज्ञोंके अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं। आप समस्त लोकोंके रक्षक एवं सर्वलोकस्वरूप भी हैं। आप परमपुरुष परमात्माके श्रेष्ठ तेज हैं॥ ५॥"},{"id":"9.5.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/6/","page":28,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे","ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।","त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे।","मनोजवायाद्भुतकर्मणे गृणे॥ ६"],"iast":["namaḥ sunābhākhiladharmasetave","hyadharmaśīlāsuradhūmaketave |","trailokyagopāya viśuddhavarcase|","manojavāyādbhutakarmaṇe gṛṇe|| 6"],"meaning":"सुनाभ! आप समस्त धर्मोंकी मर्यादाके रक्षक हैं। अधर्मका आचरण करनेवाले असुरोंको भस्म करनेके लिये आप साक्षात् अग्‍नि हैं। आप ही तीनों लोकोंके रक्षक एवं विशुद्ध तेजोमय हैं। आपकी गति मनके वेगके समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता हूँ॥ ६॥"},{"id":"9.5.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/7/","page":29,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं","तमः प्रकाशश्‍च धृतो महात्मनाम्।","दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते","त्वद्रूपमेतत् सदसत् परावरम्॥ ७"],"iast":["tvattejasā dharmamayena saṃhṛtaṃ","tamaḥ prakāśaśca dhṛto mahātmanām|","duratyayaste mahimā girāṃ pate","tvadrūpametat sadasat parāvaram|| 7"],"meaning":"वेदवाणीके अधीश्‍वर! आपके धर्ममय तेजसे अन्धकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषोंके प्रकाशकी रक्षा होती है। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन है। ऊँचे-नीचे और छोटे-बड़ेके भेदभावसे युक्त यह समस्त कार्य-कारणात्मक संसार आपका ही स्वरूप है॥ ७॥"},{"id":"9.5.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/8/","page":29,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["यदा विसृष्टस्त्वमनंजनेन वै","बलं प्रविष्टोऽजित दैत्यदानवम्।","बाहूदरोर्वङ्‌घ्रिशिरोधराणि","वृक्णन्‍नजस्रं प्रधने विराजसे॥ ८"],"iast":["yadā visṛṣṭastvamanaṃjanena vai","balaṃ praviṣṭo'jita daityadānavam|","bāhūdarorvaṅghriśirodharāṇi","vṛkṇannajasraṃ pradhane virājase|| 8"],"meaning":"सुदर्शन चक्र! आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। जिस समय निरंजनभगवान् आपको चलाते हैं और आप दैत्य एवं दानवोंकी सेनामें प्रवेश करते हैं, उस समय युद्धभूमिमें उनकी भुजा, उदर, जंघा, चरण और गरदन आदि निरन्तर काटते हुए आप अत्यन्त शोभायमान होते हैं॥ ८॥"},{"id":"9.5.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/9/","page":29,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["स त्वं जगत्त्राण खलप्रहाणये","निरूपितः सर्वसहो गदाभृता।","विप्रस्य चास्मत्कुलदैवहेतवे","विधेहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः॥ ९"],"iast":["sa tvaṃ jagattrāṇa khalaprahāṇaye","nirūpitaḥ sarvasaho gadābhṛtā|","viprasya cāsmatkuladaivahetave","vidhehi bhadraṃ tadanugraho hi naḥ|| 9"],"meaning":"विश्‍वके रक्षक! आप रणभूमिमें सबका प्रहार सह लेते हैं, आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गदाधारी भगवान्‌ने दुष्टोंके नाशके लिये ही आपको नियुक्त किया है। आप कृपा करके हमारे कुलके भाग्योदयके लिये दुर्वासाजीका कल्याण कीजिये। हमारे ऊपर यह आपका महान् अनुग्रह होगा॥ ९॥"},{"id":"9.5.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/10/","page":29,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः।","कुलं नो विप्रदैवं चेद् द्विजो भवतु विज्वरः॥ १०"],"iast":["yadyasti dattamiṣṭaṃ vā svadharmo vā svanuṣṭhitaḥ|","kulaṃ no vipradaivaṃ ced dvijo bhavatu vijvaraḥ|| 10"],"meaning":"यदि मैंने कुछ भी दान किया हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्मका पालन किया हो, यदि हमारे वंशके लोग ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव समझते रहे हों, तो दुर्वासाजीकी जलन मिट जाय॥ १०॥"},{"id":"9.5.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/11/","page":29,"speaker":"अम्बरीष उवाच","sanskrit":["यदि नो भगवान् प्रीत एकः सर्वगुणाश्रयः।","सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः॥ ११"],"iast":["yadi no bhagavān prīta ekaḥ sarvaguṇāśrayaḥ|","sarvabhūtātmabhāvena dvijo bhavatu vijvaraḥ|| 11"],"meaning":"भगवान् समस्त गुणोंके एक-मात्र आश्रय हैं। यदि मैंने समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें उन्हें देखा हो और वे मुझपर प्रसन्‍न हों तो दुर्वासाजीके हृदयकी सारी जलन मिट जाय॥ ११॥"},{"id":"9.5.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/12/","page":29,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम्।","अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाच्ञया॥ १२"],"iast":["iti saṃstuvato rājño viṣṇucakraṃ sudarśanam|","aśāmyat sarvato vipraṃ pradahad rājayācñayā|| 12"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब राजा अम्बरीषने दुर्वासाजीको सब ओरसे जलानेवाले भगवान्‌के सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थनासे चक्र शान्त हो गया॥ १२॥"},{"id":"9.5.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/13/","page":29,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स मुक्तोऽस्त्राग्‍नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः।","प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः॥ १३"],"iast":["sa mukto'strāgnitāpena durvāsāḥ svastimāṃstataḥ|","praśaśaṃsa tamurvīśaṃ yuñjānaḥ paramāśiṣaḥ|| 13"],"meaning":"जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३॥"},{"id":"9.5.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/14/","page":29,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे।","कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे॥ १४"],"iast":["aho anantadāsānāṃ mahattvaṃ dṛṣṭamadya me|","kṛtāgaso'pi yad rājan maṃgalāni samīhase|| 14"],"meaning":"दुर्वासाजीने कहा—धन्य है! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा। राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल-कामना ही कर रहे हैं॥ १४॥"},{"id":"9.5.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/15/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम्।","यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरिः॥ १५"],"iast":["duṣkaraḥ ko nu sādhūnāṃ dustyajo vā mahātmanām|","yaiḥ saṃgṛhīto bhagavān sātvatāmṛṣabho hariḥ|| 15"],"meaning":"जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलोंको दृढ़ प्रेमभावसे पकड़ लिया है—उन साधुपुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य कठिन है? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तुका परित्याग नहीं कर सकते?॥ १५॥"},{"id":"9.5.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/16/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["यन्‍नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः।","तस्य तीर्थपदः किं वा दासानामवशिष्यते॥ १६"],"iast":["yannāmaśrutimātreṇa pumān bhavati nirmalaḥ|","tasya tīrthapadaḥ kiṃ vā dāsānāmavaśiṣyate|| 16"],"meaning":"जिनके मंगलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव निर्मल हो जाता है—उन्हीं तीर्थपाद भगवान्‌के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है?॥ १६॥"},{"id":"9.5.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/17/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["राजन्‍ननुगृहीतोऽहं त्वयातिकरुणात्मना।","मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः॥ १७"],"iast":["rājannanugṛhīto'haṃ tvayātikaruṇātmanā|","madaghaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā prāṇā yanme'bhirakṣitāḥ|| 17"],"meaning":"महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है!॥ १७॥"},{"id":"9.5.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/18/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाङ्क्षया।","चरणावुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत्॥ १८"],"iast":["rājā tamakṛtāhāraḥ pratyāgamanakāṅkṣayā|","caraṇāvupasaṃgṛhya prasādya samabhojayat|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्‍न करके विधिपूर्वक भोजन कराया॥ १८॥"},{"id":"9.5.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/19/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["सोऽशित्वाऽऽदृतमानीतमातिथ्यं सार्वकामिकम्।","तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतामिति सादरम्॥ १९"],"iast":["so'śitvā''dṛtamānītamātithyaṃ sārvakāmikam|","tṛptātmā nṛpatiṃ prāha bhujyatāmiti sādaram|| 19"],"meaning":"राजा अम्बरीष बड़े आदरसे अतिथिके योग्य सब प्रकारकी भोजन-सामग्री ले आये। दुर्वासाजी भोजन करके तृप्त हो गये। अब उन्होंने आदरसे कहा—‘राजन्! अब आप भी भोजन कीजिये॥ १९॥"},{"id":"9.5.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/20/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै।","दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २०"],"iast":["prīto'smyanugṛhīto'smi tava bhāgavatasya vai|","darśanasparśanālāpairātithyenātmamedhasā || 20"],"meaning":"अम्बरीष! आप भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त हैं। आपके दर्शन, स्पर्श, बातचीत और मनको भगवान्‌की ओर प्रवृत्त करनेवाले आतिथ्यसे मैं अत्यन्त प्रसन्‍न और अनुगृहीत हुआ हूँ॥ २०॥"},{"id":"9.5.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/21/","page":30,"speaker":"दुर्वासा उवाच","sanskrit":["कर्मावदातमेतत् ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः।","कीर्तिं परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम्॥ २१"],"iast":["karmāvadātametat te gāyanti svaḥstriyo muhuḥ|","kīrtiṃ paramapuṇyāṃ ca kīrtayiṣyati bhūriyam|| 21"],"meaning":"स्वर्गकी देवांगनाएँ बार-बार आपके इस उज्ज्वल चरित्रका गान करेंगी। यह पृथ्वी भी आपकी परम पुण्यमयी कीर्तिका संकीर्तन करती रहेगी’॥ २१॥"},{"id":"9.5.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/22/","page":30,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः।","ययौ विहायसाऽऽमन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम्॥ २२"],"iast":["evaṃ saṃkīrtya rājānaṃ durvāsāḥ paritoṣitaḥ|","yayau vihāyasā''mantrya brahmalokamahaitukam|| 22"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ २२॥"},{"id":"9.5.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/23/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संवत्सरोऽत्यगात् तावद् यावता नागतो गतः।","मुनिस्तद्दर्शनाकांक्षो राजाऽब्भक्षो बभूव ह॥ २३"],"iast":["saṃvatsaro'tyagāt tāvad yāvatā nāgato gataḥ|","munistaddarśanākāṃkṣo rājā'bbhakṣo babhūva ha|| 23"],"meaning":"परीक्षित्! जब सुदर्शन चक्रसे भयभीत होकर दुर्वासाजी भगे थे, तबसे लेकर उनके लौटनेतक एक वर्षका समय बीत गया। इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकांक्षासे केवल जल पीकर ही रहे॥ २३॥"},{"id":"9.5.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/24/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गते च दुर्वाससि सोऽम्बरीषो","द्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् ।","ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च बुद‍्ध्वा","मेने स्ववीर्यं च परानुभावम्॥ २४"],"iast":["gate ca durvāsasi so'mbarīṣo","dvijopayogātipavitramāharat |","ṛṣervimokṣaṃ vyasanaṃ ca buddhvā","mene svavīryaṃ ca parānubhāvam|| 24"],"meaning":"जब दुर्वासाजी चले गये, तब उनके भोजनसे बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्‍नका उन्होंने भोजन किया। अपने कारण दुर्वासाजीका दुःखमें पड़ना और फिर अपनी ही प्रार्थनासे उनका छूटना—इन दोनों बातोंको उन्होंने अपने द्वारा होनेपर भी भगवान्‌की ही महिमा समझा॥ २४॥"},{"id":"9.5.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/25/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवंविधानेकगुणः स राजा","परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे।","क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं","ययाऽऽविरिञ्च्यान् निरयांश्‍चकार॥ २५"],"iast":["evaṃvidhānekaguṇaḥ sa rājā","parātmani brahmaṇi vāsudeve|","kriyākalāpaiḥ samuvāha bhaktiṃ","yayā''viriñcyān nirayāṃścakāra|| 25"],"meaning":"राजा अम्बरीषमें ऐसे-ऐसे अनेकों गुण थे। अपने समस्त कर्मोंके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌में भक्तिभावकी अभिवृद्धि करते रहते थे। उस भक्तिके प्रभावसे उन्होंने ब्रह्मलोकतकके समस्त भोगोंको नरकके समान समझा॥ २५॥"},{"id":"9.5.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/26/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं","समानशीलेषु विसृज्य धीरः।","वनं विवेशात्मनि वासुदेवे","मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः॥ २६"],"iast":["athāmbarīṣastanayeṣu rājyaṃ","samānaśīleṣu visṛjya dhīraḥ|","vanaṃ viveśātmani vāsudeve","mano dadhad dhvastaguṇapravāhaḥ|| 26"],"meaning":"तदनन्तर राजा अम्बरीषने अपने ही समान भक्त पुत्रोंपर राज्यका भार छोड़ दिया और स्वयं वे वनमें चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरताके साथ आत्मस्वरूप भगवान्‌में अपना मन लगाकर गुणोंके प्रवाहरूप संसारसे मुक्त हो गये॥ २६॥"},{"id":"9.5.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/27/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्येतत् पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपतेः।","संकीर्तयन्‍ननुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत्॥ २७"],"iast":["ityetat puṇyamākhyānamambarīṣasya bhūpateḥ|","saṃkīrtayannanudhyāyan bhakto bhagavato bhavet|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! महाराज अम्बरीषका यह परम पवित्र आख्यान है। जो इसका संकीर्तन और स्मरण करता है, वह भगवान्‌का भक्त हो जाता है॥ २७॥"}],"text":[{"b":24973,"kind":"adhyaya_heading","page":28,"text":"अथ पञ्चमोऽध्यायः"},{"b":24974,"kind":"topic_heading","page":28,"text":"दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति"},{"b":24975,"kind":"topic_heading","page":28,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":24976,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.1"],"text":"एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्‍चक्रतापितः।"},{"b":24977,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.1"],"text":"अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत्॥ १"},{"b":24978,"kind":"hindi_commentary","page":28,"explains":["9.5.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्‌ने इस प्रकार आज्ञा दी तब सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीषके पास आये और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजाके पैर पकड़ लिये॥ १॥"},{"b":24979,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.2"],"text":"तस्य सोद्यमनं वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः।"},{"b":24980,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.2"],"text":"अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम्॥ २"},{"b":24981,"kind":"hindi_translation","page":28,"explains":["9.5.2"],"text":"दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्‌के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था॥ २॥"},{"b":24982,"kind":"topic_heading","page":28,"text":"अम्बरीष उवाच"},{"b":24983,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.3"],"text":"त्वमग्‍निर्भगवान् सूर्यस्त्वं सोमो ज्योतिषां पतिः।"},{"b":24984,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.3"],"text":"त्वमापस्त्वं क्षितिर्व्योम वायुर्मात्रेन्द्रियाणि च॥ ३"},{"b":24985,"kind":"hindi_commentary","page":28,"explains":["9.5.3"],"text":"अम्बरीषने कहा—प्रभो सुदर्शन! आप अग्‍निस्वरूप हैं। आप ही परम समर्थ सूर्य हैं। समस्त नक्षत्रमण्डलके अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप हैं। जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, पंचतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके रूपमें भी आप ही हैं॥ ३॥"},{"b":24986,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.4"],"text":"सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय।"},{"b":24987,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.4"],"text":"सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते॥ ४"},{"b":24988,"kind":"hindi_translation","page":28,"explains":["9.5.4"],"text":"भगवान्‌के प्यारे, हजार दाँतवाले चक्रदेव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस्त्र-शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले एवं पृथ्वीके रक्षक! आप इन ब्राह्मणकी रक्षा कीजिये॥ ४॥"},{"b":24989,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.5"],"text":"त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोऽखिलयज्ञभुक्।"},{"b":24990,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.5"],"text":"त्वं लोकपालः सर्वात्मा त्वं तेजः पौरुषं परम्॥ ५"},{"b":24991,"kind":"hindi_translation","page":28,"explains":["9.5.5"],"text":"आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं; आप ही समस्त यज्ञोंके अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं। आप समस्त लोकोंके रक्षक एवं सर्वलोकस्वरूप भी हैं। आप परमपुरुष परमात्माके श्रेष्ठ तेज हैं॥ ५॥"},{"b":24992,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.6"],"text":"नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे"},{"b":24993,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.6"],"text":"ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।"},{"b":24994,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.6"],"text":"त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे।"},{"b":24995,"kind":"sanskrit_shloka","page":28,"verses":["9.5.6"],"text":"मनोजवायाद्भुतकर्मणे गृणे॥ ६"},{"b":24996,"kind":"hindi_translation","page":28,"explains":["9.5.6"],"text":"सुनाभ! आप समस्त धर्मोंकी मर्यादाके रक्षक हैं। अधर्मका आचरण करनेवाले असुरोंको भस्म करनेके लिये आप साक्षात् अग्‍नि हैं। आप ही तीनों लोकोंके रक्षक एवं विशुद्ध तेजोमय हैं। आपकी गति मनके वेगके समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता हूँ॥ ६॥"},{"b":24997,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.7"],"text":"त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं"},{"b":24998,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.7"],"text":"तमः प्रकाशश्‍च धृतो महात्मनाम्।"},{"b":24999,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.7"],"text":"दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते"},{"b":25000,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.7"],"text":"त्वद्रूपमेतत् सदसत् परावरम्॥ ७"},{"b":25001,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.8"],"text":"यदा विसृष्टस्त्वमनंजनेन वै"},{"b":25002,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.8"],"text":"बलं प्रविष्टोऽजित दैत्यदानवम्।"},{"b":25003,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.8"],"text":"बाहूदरोर्वङ्‌घ्रिशिरोधराणि"},{"b":25004,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.8"],"text":"वृक्णन्‍नजस्रं प्रधने विराजसे॥ ८"},{"b":25005,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.9"],"text":"स त्वं जगत्त्राण खलप्रहाणये"},{"b":25006,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.9"],"text":"निरूपितः सर्वसहो गदाभृता।"},{"b":25007,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.9"],"text":"विप्रस्य चास्मत्कुलदैवहेतवे"},{"b":25008,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.9"],"text":"विधेहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः॥ ९"},{"b":25009,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.10"],"text":"यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः।"},{"b":25010,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.10"],"text":"कुलं नो विप्रदैवं चेद् द्विजो भवतु विज्वरः॥ १०"},{"b":25011,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.11"],"text":"यदि नो भगवान् प्रीत एकः सर्वगुणाश्रयः।"},{"b":25012,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.11"],"text":"सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः॥ ११"},{"b":25013,"kind":"hindi_commentary","page":29,"explains":["9.5.7","9.5.8","9.5.9","9.5.10","9.5.11"],"text":"वेदवाणीके अधीश्‍वर! आपके धर्ममय तेजसे अन्धकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषोंके प्रकाशकी रक्षा होती है। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन है। ऊँचे-नीचे और छोटे-बड़ेके भेदभावसे युक्त यह समस्त कार्य-कारणात्मक संसार आपका ही स्वरूप है॥ ७॥ सुदर्शन चक्र! आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। जिस समय निरंजनभगवान् आपको चलाते हैं और आप दैत्य एवं दानवोंकी सेनामें प्रवेश करते हैं, उस समय युद्धभूमिमें उनकी भुजा, उदर, जंघा, चरण और गरदन आदि निरन्तर काटते हुए आप अत्यन्त शोभायमान होते हैं॥ ८॥ विश्‍वके रक्षक! आप रणभूमिमें सबका प्रहार सह लेते हैं, आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गदाधारी भगवान्‌ने दुष्टोंके नाशके लिये ही आपको नियुक्त किया है। आप कृपा करके हमारे कुलके भाग्योदयके लिये दुर्वासाजीका कल्याण कीजिये। हमारे ऊपर यह आपका महान् अनुग्रह होगा॥ ९॥ यदि मैंने कुछ भी दान किया हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्मका पालन किया हो, यदि हमारे वंशके लोग ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव समझते रहे हों, तो दुर्वासाजीकी जलन मिट जाय॥ १०॥ भगवान् समस्त गुणोंके एक-मात्र आश्रय हैं। यदि मैंने समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें उन्हें देखा हो और वे मुझपर प्रसन्‍न हों तो दुर्वासाजीके हृदयकी सारी जलन मिट जाय॥ ११॥"},{"b":25014,"kind":"topic_heading","page":28,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25015,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.12"],"text":"इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम्।"},{"b":25016,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.12"],"text":"अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाच्ञया॥ १२"},{"b":25017,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.13"],"text":"स मुक्तोऽस्त्राग्‍नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः।"},{"b":25018,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.13"],"text":"प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः॥ १३"},{"b":25019,"kind":"hindi_commentary","page":29,"explains":["9.5.12","9.5.13"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब राजा अम्बरीषने दुर्वासाजीको सब ओरसे जलानेवाले भगवान्‌के सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थनासे चक्र शान्त हो गया॥ १२॥ जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३॥"},{"b":25020,"kind":"topic_heading","page":29,"text":"दुर्वासा उवाच"},{"b":25021,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.14"],"text":"अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे।"},{"b":25022,"kind":"sanskrit_shloka","page":29,"verses":["9.5.14"],"text":"कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे॥ १४"},{"b":25023,"kind":"hindi_translation","page":29,"explains":["9.5.14"],"text":"दुर्वासाजीने कहा—धन्य है! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा। राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल-कामना ही कर रहे हैं॥ १४॥"},{"b":25024,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.15"],"text":"दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम्।"},{"b":25025,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.15"],"text":"यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरिः॥ १५"},{"b":25026,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.16"],"text":"यन्‍नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः।"},{"b":25027,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.16"],"text":"तस्य तीर्थपदः किं वा दासानामवशिष्यते॥ १६"},{"b":25028,"kind":"hindi_commentary","page":30,"explains":["9.5.15","9.5.16"],"text":"जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलोंको दृढ़ प्रेमभावसे पकड़ लिया है—उन साधुपुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य कठिन है? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तुका परित्याग नहीं कर सकते?॥ १५॥ जिनके मंगलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव निर्मल हो जाता है—उन्हीं तीर्थपाद भगवान्‌के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है?॥ १६॥"},{"b":25029,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.17"],"text":"राजन्‍ननुगृहीतोऽहं त्वयातिकरुणात्मना।"},{"b":25030,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.17"],"text":"मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः॥ १७"},{"b":25031,"kind":"hindi_translation","page":30,"explains":["9.5.17"],"text":"महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है!॥ १७॥"},{"b":25032,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.18"],"text":"राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाङ्क्षया।"},{"b":25033,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.18"],"text":"चरणावुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत्॥ १८"},{"b":25034,"kind":"hindi_translation","page":30,"explains":["9.5.18"],"text":"परीक्षित्! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्‍न करके विधिपूर्वक भोजन कराया॥ १८॥"},{"b":25035,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.19"],"text":"सोऽशित्वाऽऽदृतमानीतमातिथ्यं सार्वकामिकम्।"},{"b":25036,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.19"],"text":"तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतामिति सादरम्॥ १९"},{"b":25037,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.20"],"text":"प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै।"},{"b":25038,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.20"],"text":"दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २०"},{"b":25039,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.21"],"text":"कर्मावदातमेतत् ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः।"},{"b":25040,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.21"],"text":"कीर्तिं परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम्॥ २१"},{"b":25041,"kind":"hindi_translation","page":30,"explains":["9.5.19","9.5.20","9.5.21"],"text":"राजा अम्बरीष बड़े आदरसे अतिथिके योग्य सब प्रकारकी भोजन-सामग्री ले आये। दुर्वासाजी भोजन करके तृप्त हो गये। अब उन्होंने आदरसे कहा—‘राजन्! अब आप भी भोजन कीजिये॥ १९॥ अम्बरीष! आप भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त हैं। आपके दर्शन, स्पर्श, बातचीत और मनको भगवान्‌की ओर प्रवृत्त करनेवाले आतिथ्यसे मैं अत्यन्त प्रसन्‍न और अनुगृहीत हुआ हूँ॥ २०॥ स्वर्गकी देवांगनाएँ बार-बार आपके इस उज्ज्वल चरित्रका गान करेंगी। यह पृथ्वी भी आपकी परम पुण्यमयी कीर्तिका संकीर्तन करती रहेगी’॥ २१॥"},{"b":25042,"kind":"topic_heading","page":29,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25043,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.22"],"text":"एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः।"},{"b":25044,"kind":"sanskrit_shloka","page":30,"verses":["9.5.22"],"text":"ययौ विहायसाऽऽमन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम्॥ २२"},{"b":25045,"kind":"hindi_commentary","page":30,"explains":["9.5.22"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—दुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ २२॥"},{"b":25046,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.23"],"text":"संवत्सरोऽत्यगात् तावद् यावता नागतो गतः।"},{"b":25047,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.23"],"text":"मुनिस्तद्दर्शनाकांक्षो राजाऽब्भक्षो बभूव ह॥ २३"},{"b":25048,"kind":"hindi_translation","page":31,"explains":["9.5.23"],"text":"परीक्षित्! जब सुदर्शन चक्रसे भयभीत होकर दुर्वासाजी भगे थे, तबसे लेकर उनके लौटनेतक एक वर्षका समय बीत गया। इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकांक्षासे केवल जल पीकर ही रहे॥ २३॥"},{"b":25049,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.24"],"text":"गते च दुर्वाससि सोऽम्बरीषो"},{"b":25050,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.24"],"text":"द्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् ।"},{"b":25051,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.24"],"text":"ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च बुद‍्ध्वा"},{"b":25052,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.24"],"text":"मेने स्ववीर्यं च परानुभावम्॥ २४"},{"b":25053,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.25"],"text":"एवंविधानेकगुणः स राजा"},{"b":25054,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.25"],"text":"परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे।"},{"b":25055,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.25"],"text":"क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं"},{"b":25056,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.25"],"text":"ययाऽऽविरिञ्च्यान् निरयांश्‍चकार॥ २५"},{"b":25057,"kind":"hindi_commentary","page":31,"explains":["9.5.24","9.5.25"],"text":"जब दुर्वासाजी चले गये, तब उनके भोजनसे बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्‍नका उन्होंने भोजन किया। अपने कारण दुर्वासाजीका दुःखमें पड़ना और फिर अपनी ही प्रार्थनासे उनका छूटना—इन दोनों बातोंको उन्होंने अपने द्वारा होनेपर भी भगवान्‌की ही महिमा समझा॥ २४॥ राजा अम्बरीषमें ऐसे-ऐसे अनेकों गुण थे। अपने समस्त कर्मोंके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌में भक्तिभावकी अभिवृद्धि करते रहते थे। उस भक्तिके प्रभावसे उन्होंने ब्रह्मलोकतकके समस्त भोगोंको नरकके समान समझा॥ २५॥"},{"b":25058,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.26"],"text":"अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं"},{"b":25059,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.26"],"text":"समानशीलेषु विसृज्य धीरः।"},{"b":25060,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.26"],"text":"वनं विवेशात्मनि वासुदेवे"},{"b":25061,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.26"],"text":"मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः॥ २६"},{"b":25062,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.27"],"text":"इत्येतत् पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपतेः।"},{"b":25063,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.5.27"],"text":"संकीर्तयन्‍ननुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत्॥ २७"},{"b":25064,"kind":"hindi_translation","page":31,"explains":["9.5.26","9.5.27"],"text":"तदनन्तर राजा अम्बरीषने अपने ही समान भक्त पुत्रोंपर राज्यका भार छोड़ दिया और स्वयं वे वनमें चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरताके साथ आत्मस्वरूप भगवान्‌में अपना मन लगाकर गुणोंके प्रवाहरूप संसारसे मुक्त हो गये॥ २६॥ परीक्षित्! महाराज अम्बरीषका यह परम पवित्र आख्यान है। जो इसका संकीर्तन और स्मरण करता है, वह भगवान्‌का भक्त हो जाता है॥ २७॥"},{"b":25065,"kind":"hindi_commentary","page":31,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धेऽम्बरीषचरितं"},{"b":25066,"kind":"hindi_translation","page":31,"text":"नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥"}],"notes":[{"id":"v2:34","mark":"१","page":28,"after_verse":"9.5.2","text":"तद‍्व्यसनं।"},{"id":"v2:35","mark":"२","page":28,"after_verse":"9.5.2","text":"स्पर्शेन लज्जि०।"},{"id":"v2:36","mark":"१","page":30,"after_verse":"9.5.17","text":"तोऽस्मि।"},{"id":"v2:37","mark":"२","page":30,"after_verse":"9.5.21","text":"कीर्तिं तां परमां पुण्यां कीर्त०।"},{"id":"v2:38","mark":"१","page":31,"after_verse":"9.5.24","text":"गतेऽथ।"},{"id":"v2:39","mark":"२","page":31,"after_verse":"9.5.24","text":"गाभिपवि०।"},{"id":"v2:40","mark":"३","page":31,"after_verse":"9.5.24","text":"महानुभावम्।"},{"id":"v2:41","mark":"४","page":31,"after_verse":"9.5.26","text":"वीरः।"},{"id":"v2:42","mark":"५","page":31,"after_verse":null,"text":"चरिते।"}],"corrections":{"count":2,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}