{"id":"9.6","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 6","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ षष्ठोऽध्यायः","topics":["इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[30,38]},"verses":[{"id":"9.6.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/1/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः।","विरूपात् पृषदश्‍वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः॥ १"],"iast":["virūpaḥ ketumāñchambhurambarīṣasutāstrayaḥ|","virūpāt pṛṣadaśvo'bhūt tatputrastu rathītaraḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे—विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्‍व और उसका पुत्र रथीतर हुआ॥ १॥"},{"id":"9.6.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/2/","page":31,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः।","अंगिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २"],"iast":["rathītarasyāprajasya bhāryāyāṃ tantave'rthitaḥ|","aṃgirā janayāmāsa brahmavarcasvinaḥ sutān|| 2"],"meaning":"रथीतर सन्तानहीन था। वंश परम्पराकी रक्षाके लिये उसने अंगिरा ऋषिसे प्रार्थना की, उन्होंने उसकी पत्‍नीसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न कई पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥"},{"id":"9.6.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/3/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एते क्षेत्रे प्रसूता वै पुनस्त्वांगिरसाः स्मृताः।","रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः॥ ३"],"iast":["ete kṣetre prasūtā vai punastvāṃgirasāḥ smṛtāḥ|","rathītarāṇāṃ pravarāḥ kṣatropetā dvijātayaḥ|| 3"],"meaning":"यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्‍न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे आंगिरस ही कहलाये। ये ही रथीतर-वंशियोंके प्रवर (कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये। क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे—क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रोंसे इनका सम्बन्ध था॥ ३॥"},{"id":"9.6.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/4/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः।","तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः॥ ४"],"iast":["kṣuvatastu manorjajñe ikṣvākurghrāṇataḥ sutaḥ|","tasya putraśatajyeṣṭhā vikukṣinimidaṇḍakāḥ|| 4"],"meaning":"परीक्षित्! एक बार मनुजीके छींकनेपर उनकी नासिकासे इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्‍न हुआ। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे—विकुक्षि, निमि और दण्डक॥ ४॥"},{"id":"9.6.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/5/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेषां पुरस्तादभवन्‍नार्यावर्ते नृपा नृप।","पंचविंशतिः पश्‍चाच्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः॥ ५"],"iast":["teṣāṃ purastādabhavannāryāvarte nṛpā nṛpa|","paṃcaviṃśatiḥ paścācca trayo madhye pare'nyataḥ|| 5"],"meaning":"परीक्षित्! उनसे छोटे पचीस पुत्र आर्यावर्तके पूर्वभागके और पचीस पश्‍चिमभागके तथा उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति हुए। शेष सैंतालीस दक्षिण आदि अन्य प्रान्तोंके अधिपति हुए॥ ५॥"},{"id":"9.6.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/6/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एकदाष्टकाश्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत्।","मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ माचिरम्॥ ६"],"iast":["sa ekadāṣṭakāśrāddhe ikṣvākuḥ sutamādiśat|","māṃsamānīyatāṃ medhyaṃ vikukṣe gaccha māciram|| 6"],"meaning":"एक बार राजा इक्ष्वाकुने अष्टका-श्राद्धके समय अपने बड़े पुत्रको आज्ञा दी—‘विकुक्षे! शीघ्र ही जाकर श्राद्धके योग्य पवित्र पशुओंका मांस लाओ’॥ ६॥"},{"id":"9.6.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/7/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान्।","श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः॥ ७"],"iast":["tatheti sa vanaṃ gatvā mṛgān hatvā kriyārhaṇān|","śrānto bubhukṣito vīraḥ śaśaṃ cādadapasmṛtiḥ|| 7"],"meaning":"वीर विकुक्षिने ‘बहुत अच्छा’ कहकर वनकी यात्रा की। वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत-से पशुओंका शिकार किया। वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये। उसने एक खरगोश खा लिया॥ ७॥"},{"id":"9.6.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/8/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्गुरुः।","चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम्॥ ८"],"iast":["śeṣaṃ nivedayāmāsa pitre tena ca tadguruḥ|","coditaḥ prokṣaṇāyāha duṣṭametadakarmakam|| 8"],"meaning":"विकुक्षिने बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको दिया। इक्ष्वाकुने अब अपने गुरुसे उसे प्रोक्षण करनेके लिये कहा, तब गुरुजीने बताया कि यह मांस तो दूषित एवं श्राद्धके अयोग्य है॥ ८॥"},{"id":"9.6.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/9/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ज्ञात्वा पुत्रस्य तत् कर्म गुरुणाभिहितं नृपः।","देशान्‍निःसारयामास सुतं त्यक्तविधिं रुषा॥ ९"],"iast":["jñātvā putrasya tat karma guruṇābhihitaṃ nṛpaḥ|","deśānniḥsārayāmāsa sutaṃ tyaktavidhiṃ ruṣā|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! गुरुजीके कहनेपर राजा इक्ष्वाकुको अपने पुत्रकी करतूतका पता चल गया। उन्होंने शास्त्रीय विधिका उल्लंघन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया॥ ९॥"},{"id":"9.6.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/10/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन्।","त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम्॥ १०"],"iast":["sa tu vipreṇa saṃvādaṃ jāpakena samācaran|","tyaktvā kalevaraṃ yogī sa tenāvāpa yat param|| 10"],"meaning":"तदनन्तर राजा इक्ष्वाकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक चर्चा की। फिर योगके द्वारा शरीरका परित्याग करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया॥ १०॥"},{"id":"9.6.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/11/","page":32,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम्।","शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः॥ ११"],"iast":["pitaryuparate'bhyetya vikukṣiḥ pṛthivīmimām|","śāsadīje hariṃ yajñaiḥ śaśāda iti viśrutaḥ|| 11"],"meaning":"पिताका देहान्त हो जानेपर विकुक्षि अपनी राजधानीमें लौट आया और इस पृथ्वीका शासन करने लगा। उसने बड़े-बड़े यज्ञोंसे भगवान्‌की आराधना की और संसारमें शशादके नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ११॥"},{"id":"9.6.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/12/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरंजयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः।","ककुत्स्थ इति चाप्युक्तः शृणु नामानि कर्मभिः॥ १२"],"iast":["puraṃjayastasya suta indravāha itīritaḥ|","kakutstha iti cāpyuktaḥ śṛṇu nāmāni karmabhiḥ|| 12"],"meaning":"विकुक्षिके पुत्रका नाम था पुरंजय। उसीको कोई ‘इन्द्रवाह’ और कोई ‘ककुत्स्थ’ कहते हैं। जिन कर्मोंके कारण उसके ये नाम पड़े थे, उन्हें सुनो॥ १२॥"},{"id":"9.6.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/13/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृतान्त आसीत् समरो देवानां सह दानवैः।","पार्ष्णिग्राहो वृतो वीरो देवैर्दैत्यपराजितैः॥ १३"],"iast":["kṛtānta āsīt samaro devānāṃ saha dānavaiḥ|","pārṣṇigrāho vṛto vīro devairdaityaparājitaiḥ|| 13"],"meaning":"सत्ययुगके अन्तमें देवताओंका दानवोंके साथ घोर संग्राम हुआ था। उसमें सब-के-सब देवता दैत्योंसे हार गये। तब उन्होंने वीर पुरंजयको सहायताके लिये अपना मित्र बनाया॥ १३॥"},{"id":"9.6.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/14/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वचनाद् देवदेवस्य विष्णोर्विश्‍वात्मनः प्रभोः।","वाहनत्वे वृतस्तस्य बभूवेन्द्रो महावृषः॥ १४"],"iast":["vacanād devadevasya viṣṇorviśvātmanaḥ prabhoḥ|","vāhanatve vṛtastasya babhūvendro mahāvṛṣaḥ|| 14"],"meaning":"पुरंजयने कहा कि ‘यदि देवराज इन्द्र मेरे वाहन बनें तो मैं युद्ध कर सकता हूँ।’ पहले तो इन्द्रने अस्वीकार कर दिया, परन्तु देवताओंके आराध्यदेव सर्वशक्तिमान् विश्‍वात्मा भगवान्‌की बात मानकर पीछे वे एक बड़े भारी बैल बन गये॥ १४॥"},{"id":"9.6.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/15/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स संनद्धो धनुर्दिव्यमादाय विशिखाञ्छितान्।","स्तूयमानः समारुह्य युयुत्सुः ककुदि स्थितः॥ १५"],"iast":["sa saṃnaddho dhanurdivyamādāya viśikhāñchitān|","stūyamānaḥ samāruhya yuyutsuḥ kakudi sthitaḥ|| 15"],"meaning":"सर्वान्तर्यामी भगवान् विष्णुने अपनी शक्तिसे पुरंजयको भर दिया। उन्होंने कवच पहनकर दिव्य धनुष और तीखे बाण ग्रहण किये। इसके बाद बैलपर चढ़कर वे उसके ककुद् (डील)-के पास बैठ गये। जब इस प्रकार वे युद्धके लिये तत्पर हुए तब देवता उनकी स्तुति करने लगे। देवताओंको साथ लेकर उन्होंने पश्‍चिमकी ओरसे दैत्योंका नगर घेर लिया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"9.6.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/16/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेजसाऽऽप्यायितो विष्णोः पुरुषस्य परात्मनः।","प्रतीच्यां दिशि दैत्यानां न्यरुणत् त्रिदशैः पुरम्॥ १६"],"iast":["tejasā''pyāyito viṣṇoḥ puruṣasya parātmanaḥ|","pratīcyāṃ diśi daityānāṃ nyaruṇat tridaśaiḥ puram|| 16"],"meaning":"सर्वान्तर्यामी भगवान् विष्णुने अपनी शक्तिसे पुरंजयको भर दिया। उन्होंने कवच पहनकर दिव्य धनुष और तीखे बाण ग्रहण किये। इसके बाद बैलपर चढ़कर वे उसके ककुद् (डील)-के पास बैठ गये। जब इस प्रकार वे युद्धके लिये तत्पर हुए तब देवता उनकी स्तुति करने लगे। देवताओंको साथ लेकर उन्होंने पश्‍चिमकी ओरसे दैत्योंका नगर घेर लिया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"9.6.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/17/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैस्तस्य चाभूत् प्रधनं तुमुलं लोमहर्षणम्।","यमाय भल्लैरनयद् दैत्यान् येऽभिययुर्मृधे॥ १७"],"iast":["taistasya cābhūt pradhanaṃ tumulaṃ lomaharṣaṇam|","yamāya bhallairanayad daityān ye'bhiyayurmṛdhe|| 17"],"meaning":"वीर पुरंजयका दैत्योंके साथ अत्यन्त रोमांचकारी घोर संग्राम हुआ। युद्धमें जो-जो दैत्य उनके सामने आये पुरंजयने बाणोंके द्वारा उन्हें यमराजके हवाले कर दिया॥ १७॥"},{"id":"9.6.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/18/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्येषुपाताभिमुखं युगान्ताग्‍निमिवोल्बणम्।","विसृज्य दुद्रुवुर्दैत्या हन्यमानाः स्वमालयम्॥ १८"],"iast":["tasyeṣupātābhimukhaṃ yugāntāgnimivolbaṇam|","visṛjya dudruvurdaityā hanyamānāḥ svamālayam|| 18"],"meaning":"उनके बाणोंकी वर्षा क्या थी, प्रलयकालकी धधकती हुई आग थी। जो भी उसके सामने आता, छिन्‍न-भिन्‍न हो जाता। दैत्योंका साहस जाता रहा। वे रणभूमि छोड़कर अपने-अपने घरोंमें घुस गये॥ १८॥"},{"id":"9.6.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/19/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जित्वा पुरं धनं सर्वं सश्रीकं वज्रपाणये।","प्रत्ययच्छत् स राजर्षिरिति नामभिराहृतः॥ १९"],"iast":["jitvā puraṃ dhanaṃ sarvaṃ saśrīkaṃ vajrapāṇaye|","pratyayacchat sa rājarṣiriti nāmabhirāhṛtaḥ|| 19"],"meaning":"पुरंजयने उनका नगर, धन और ऐश्‍वर्य—सब कुछ जीतकर इन्द्रको दे दिया। इसीसे उन राजर्षिको पुर जीतनेके कारण ‘पुरंजय’, इन्द्रको वाहन बनानेके कारण ‘इन्द्रवाह’ और बैलके ककुद्पर बैठनेके कारण ‘ककुत्स्थ’ कहा जाता है॥ १९॥"},{"id":"9.6.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/20/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरंजयस्य पुत्रोऽभूदनेनास्तत्सुतः पृथुः।","विश्‍वरन्धिस्ततश्‍चन्द्रो युवनाश्‍वश्‍च तत्सुतः॥ २०"],"iast":["puraṃjayasya putro'bhūdanenāstatsutaḥ pṛthuḥ|","viśvarandhistataścandro yuvanāśvaśca tatsutaḥ|| 20"],"meaning":"पुरंजयका पुत्र था अनेना। उसका पुत्र पृथु हुआ। पृथुके विश्‍वरन्धि, उसके चन्द्र और चन्द्रके युवनाश्‍व॥ २०॥"},{"id":"9.6.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/21/","page":33,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाबस्तस्तत्सुतो येन शाबस्ती निर्ममे पुरी।","बृहदश्‍वस्तु शाबस्तिस्ततः कुवलयाश्‍वकः॥ २१"],"iast":["śābastastatsuto yena śābastī nirmame purī|","bṛhadaśvastu śābastistataḥ kuvalayāśvakaḥ|| 21"],"meaning":"युवनाश्‍वके पुत्र हुए शाबस्त, जिन्होंने शाबस्तीपुरी बसायी। शाबस्तके बृहदश्‍व और उसके कुवलयाश्‍व हुए॥ २१॥"},{"id":"9.6.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/22/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यः प्रियार्थमुतंकस्य धुन्धुनामासुरं बली।","सुतानामेकविंशत्या सहस्रैरहनद् वृतः॥ २२"],"iast":["yaḥ priyārthamutaṃkasya dhundhunāmāsuraṃ balī|","sutānāmekaviṃśatyā sahasrairahanad vṛtaḥ|| 22"],"meaning":"ये बड़े बली थे। इन्होंने उतंक ऋषिको प्रसन्‍न करनेके लिये अपने इक्कीस हजार पुत्रोंको साथ लेकर धुन्धु नामक दैत्यका वध किया॥ २२॥"},{"id":"9.6.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/23/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धुन्धुमार इति ख्यातस्तत्सुतास्ते च जज्वलुः।","धुन्धोर्मुखाग्‍निना सर्वे त्रय एवावशेषिताः॥ २३"],"iast":["dhundhumāra iti khyātastatsutāste ca jajvaluḥ|","dhundhormukhāgninā sarve traya evāvaśeṣitāḥ|| 23"],"meaning":"इसीसे उनका नाम हुआ ‘धुन्धुमार’। धुन्धु दैत्यके मुखकी आगसे उनके सब पुत्र जल गये। केवल तीन ही बच रहे थे॥ २३॥"},{"id":"9.6.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/24/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृढाश्‍वः कपिलाश्‍वश्‍च भद्राश्‍व इति भारत।","दृढाश्‍वपुत्रो हर्यश्‍वो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः॥ २४"],"iast":["dṛḍhāśvaḥ kapilāśvaśca bhadrāśva iti bhārata|","dṛḍhāśvaputro haryaśvo nikumbhastatsutaḥ smṛtaḥ|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! बचे हुए पुत्रोंके नाम थे—दृढाश्‍व, कपिलाश्‍व और भद्राश्‍व। दृढाश्‍वसे हर्यश्‍व और उससे निकुम्भका जन्म हुआ॥ २४॥"},{"id":"9.6.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/25/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बर्हणाश्‍वो निकुम्भस्य कृशाश्‍वोऽथास्य सेनजित्।","युवनाश्‍वोऽभवत् तस्य सोऽनपत्यो वनं गतः॥ २५"],"iast":["barhaṇāśvo nikumbhasya kṛśāśvo'thāsya senajit|","yuvanāśvo'bhavat tasya so'napatyo vanaṃ gataḥ|| 25"],"meaning":"निकुम्भके बर्हणाश्‍व, उसके कृशाश्‍व, कृशाश्‍वके सेनजित् और सेनजित्के युवनाश्‍व नामक पुत्र हुआ। युवनाश्‍व सन्तानहीन था, इसलिये वह बहुत दुःखी होकर अपनी सौ स्त्रियोंके साथ वनमें चला गया। वहाँ ऋषियोंने बड़ी कृपा करके युवनाश्‍वसे पुत्रप्राप्तिके लिये बड़ी एकाग्रताके साथ इन्द्रदेवताका यज्ञ कराया॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"9.6.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/26/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः।","इष्टिं स्म वर्तयांचक्रुरैन्द्रीं ते सुसमाहिताः॥ २६"],"iast":["bhāryāśatena nirviṇṇa ṛṣayo'sya kṛpālavaḥ|","iṣṭiṃ sma vartayāṃcakruraindrīṃ te susamāhitāḥ|| 26"],"meaning":"निकुम्भके बर्हणाश्‍व, उसके कृशाश्‍व, कृशाश्‍वके सेनजित् और सेनजित्के युवनाश्‍व नामक पुत्र हुआ। युवनाश्‍व सन्तानहीन था, इसलिये वह बहुत दुःखी होकर अपनी सौ स्त्रियोंके साथ वनमें चला गया। वहाँ ऋषियोंने बड़ी कृपा करके युवनाश्‍वसे पुत्रप्राप्तिके लिये बड़ी एकाग्रताके साथ इन्द्रदेवताका यज्ञ कराया॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"9.6.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/27/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।","दृष्ट्वा शयानान् विप्रांस्तान् पपौ मन्त्रजलं स्वयम्॥ २७"],"iast":["rājā tad yajñasadanaṃ praviṣṭo niśi tarṣitaḥ|","dṛṣṭvā śayānān viprāṃstān papau mantrajalaṃ svayam|| 27"],"meaning":"एक दिन राजा युवनाश्‍वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥"},{"id":"9.6.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/28/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्थितास्ते निशाम्याथ व्युदकं कलशं प्रभो।","पप्रच्छुः कस्य कर्मेदं पीतं पुंसवनं जलम्॥ २८"],"iast":["utthitāste niśāmyātha vyudakaṃ kalaśaṃ prabho|","papracchuḥ kasya karmedaṃ pītaṃ puṃsavanaṃ jalam|| 28"],"meaning":"परीक्षित्! जब प्रातःकाल ऋषिलोग सोकर उठे और उन्होंने देखा कि कलशमें तो जल ही नहीं है, तब उन लोगोंने पूछा कि ‘यह किसका काम है? पुत्र उत्पन्‍न करनेवाला जल किसने पी लिया?’॥ २८॥"},{"id":"9.6.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/29/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राज्ञा पीतं विदित्वाथ ईश्‍वरप्रहितेन ते।","ईश्‍वराय नमश्‍चक्रुरहो दैवबलं बलम्॥ २९"],"iast":["rājñā pītaṃ viditvātha īśvaraprahitena te|","īśvarāya namaścakruraho daivabalaṃ balam|| 29"],"meaning":"अन्तमें जब उन्हें यह मालूम हुआ कि भगवान्‌की प्रेरणासे राजा युवनाश्‍वने ही उस जलको पी लिया है तो उन लोगोंने भगवान्‌के चरणोंमें नमस्कार किया और कहा—‘धन्य है! भगवान्‌का बल ही वास्तवमें बल है’॥ २९॥"},{"id":"9.6.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/30/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः काल उपावृत्ते कुक्षिं निर्भिद्य दक्षिणम्।","युवनाश्‍वस्य तनयश्‍चक्रवर्ती जजान ह॥ ३०"],"iast":["tataḥ kāla upāvṛtte kukṣiṃ nirbhidya dakṣiṇam|","yuvanāśvasya tanayaścakravartī jajāna ha|| 30"],"meaning":"इसके बाद प्रसवका समय आनेपर युवनाश्‍वकी दाहिनी कोख फाड़कर उसके एक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्‍न हुआ॥ ३०॥"},{"id":"9.6.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/31/","page":34,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कं धास्यति कुमारोऽयं स्तन्यं रोरूयते भृशम्।","मां धाता वत्स मा रोदीरितीन्द्रो देशिनीमदात्॥ ३१"],"iast":["kaṃ dhāsyati kumāro'yaṃ stanyaṃ rorūyate bhṛśam|","māṃ dhātā vatsa mā rodīritīndro deśinīmadāt|| 31"],"meaning":"उसे रोते देख ऋषियोंने कहा—‘यह बालक दूधके लिये बहुत रो रहा है; अतः किसका दूध पियेगा?’ तब इन्द्रने कहा, ‘मेरा पियेगा’ ‘(मां धाता)’ ‘बेटा! तू रो मत।’ यह कहकर इन्द्रने अपनी तर्जनी अँगुली उसके मुँहमें डाल दी॥ ३१॥"},{"id":"9.6.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/32/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न ममार पिता तस्य विप्रदेवप्रसादतः।","युवनाश्‍वोऽथ तत्रैव तपसा सिद्धिमन्वगात्॥ ३२"],"iast":["na mamāra pitā tasya vipradevaprasādataḥ|","yuvanāśvo'tha tatraiva tapasā siddhimanvagāt|| 32"],"meaning":"ब्राह्मण और देवताओंके प्रसादसे उस बालकके पिता युवनाश्‍वकी भी मृत्यु नहीं हुई। वह वहीं तपस्या करके मुक्त हो गया॥ ३२॥"},{"id":"9.6.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/33/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम तस्य वै।","यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्वि‌ग्‍ना दस्यवो रावणादयः॥ ३३"],"iast":["trasaddasyuritīndro'ṅga vidadhe nāma tasya vai|","yasmāt trasanti hyudvignā dasyavo rāvaṇādayaḥ|| 33"],"meaning":"परीक्षित्! इन्द्रने उस बालकका नाम रखा त्रसद्दस्यु, क्योंकि रावण आदि दस्यु (लुटेरे) उससे उद्वि‌ग्‍न एवं भयभीत रहते थे॥ ३३॥"},{"id":"9.6.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/34/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यौवनाश्‍वोऽथ मान्धाता चक्रवर्त्यवनीं प्रभुः।","सप्तद्वीपवतीमेकः शशासाच्युततेजसा॥ ३४"],"iast":["yauvanāśvo'tha māndhātā cakravartyavanīṃ prabhuḥ|","saptadvīpavatīmekaḥ śaśāsācyutatejasā|| 34"],"meaning":"युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाता (त्रसद्दस्यु) चक्रवर्ती राजा हुए। भगवान्‌के तेजसे तेजस्वी होकर उन्होंने अकेले ही सातों द्वीपवाली पृथ्वीका शासन किया॥ ३४॥"},{"id":"9.6.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/35/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ईजे च यज्ञं क्रतुभिरात्मविद् भूरिदक्षिणैः।","सर्वदेवमयं देवं सर्वात्मकमतीन्द्रियम्॥ ३५"],"iast":["īje ca yajñaṃ kratubhirātmavid bhūridakṣiṇaiḥ|","sarvadevamayaṃ devaṃ sarvātmakamatīndriyam|| 35"],"meaning":"वे यद्यपि आत्मज्ञानी थे, उन्हें कर्म-काण्डकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी—फिर भी उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे उन यज्ञस्वरूप प्रभुकी आराधना की जो स्वयंप्रकाश, सर्वदेवस्वरूप, सर्वात्मा एवं इन्द्रियातीत हैं॥ ३५॥"},{"id":"9.6.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/36/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्रव्यं मन्त्रो विधिर्यज्ञो यजमानस्तथर्त्विजः।","धर्मो देशश्‍च कालश्‍च सर्वमेतद् यदात्मकम्॥ ३६"],"iast":["dravyaṃ mantro vidhiryajño yajamānastathartvijaḥ|","dharmo deśaśca kālaśca sarvametad yadātmakam|| 36"],"meaning":"भगवान्‌के अतिरिक्त और है ही क्या? यज्ञकी सामग्री, मन्त्र, विधि-विधान, यज्ञ, यजमान, ऋत्विज्, धर्म, देश और काल—यह सब-का-सब भगवान्‌का ही स्वरूप तो है॥ ३६॥"},{"id":"9.6.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/37/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति।","सर्वं तद् यौवनाश्‍वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते॥ ३७"],"iast":["yāvat sūrya udeti sma yāvacca pratitiṣṭhati|","sarvaṃ tad yauvanāśvasya māndhātuḥ kṣetramucyate|| 37"],"meaning":"परीक्षित्! जहाँसे सूर्यका उदय होता है और जहाँ वे अस्त होते हैं, वह सारा-का-सारा भूभाग युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाताके ही अधिकारमें था॥ ३७॥"},{"id":"9.6.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/38/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शशबिन्दोर्दुहितरि बिन्दुमत्यामधान्‍नृपः।","पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च योगिनम्।","तेषां स्वसारः पंचाशत् सौभरिं वव्रिरे पतिम्॥ ३८"],"iast":["śaśabindorduhitari bindumatyāmadhānnṛpaḥ|","purukutsamambarīṣaṃ mucukundaṃ ca yoginam|","teṣāṃ svasāraḥ paṃcāśat saubhariṃ vavrire patim|| 38"],"meaning":"राजा मान्धाताकी पत्‍नी शशबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमती थी। उसके गर्भसे उनके तीन पुत्र हुए—पुरुकुत्स, अम्बरीष (ये दूसरे अम्बरीष हैं) और योगी मुचुकुन्द। इनकी पचास बहनें थीं। उन पचासोंने अकेले सौभरि ऋषिको पतिके रूपमें वरण किया॥ ३८॥"},{"id":"9.6.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/39/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यमुनान्तर्जले म‌ग्‍नस्तप्यमानः परंतपः।","निर्वृतिं मीनराजस्य वीक्ष्य मैथुनधर्मिणः॥ ३९"],"iast":["yamunāntarjale magnastapyamānaḥ paraṃtapaḥ|","nirvṛtiṃ mīnarājasya vīkṣya maithunadharmiṇaḥ|| 39"],"meaning":"परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्‍नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है॥ ३९॥"},{"id":"9.6.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/40/","page":35,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जातस्पृहो नृपं विप्रः कन्यामेकामयाचत।","सोऽप्याह गृह्यतां ब्रह्मन् कामं कन्या स्वयंवरे॥ ४०"],"iast":["jātaspṛho nṛpaṃ vipraḥ kanyāmekāmayācata|","so'pyāha gṛhyatāṃ brahman kāmaṃ kanyā svayaṃvare|| 40"],"meaning":"उसके इस सुखको देखकर ब्राह्मण सौभरिके मनमें भी विवाह करनेकी इच्छा जग उठी और उन्होंने राजा मान्धाताके पास आकर उनकी पचास कन्याओंमेंसे एक कन्या माँगी। राजाने कहा—‘ब्रह्मन्! कन्या स्वयंवरमें आपको चुन ले तो आप उसे ले लीजिये’॥ ४०॥"},{"id":"9.6.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/41/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स विचिन्त्याप्रियं स्त्रीणां जरठोऽयमसम्मतः।","वलीपलित एजत्क इत्यहं प्रत्युदाहृतः॥ ४१"],"iast":["sa vicintyāpriyaṃ strīṇāṃ jaraṭho'yamasammataḥ|","valīpalita ejatka ityahaṃ pratyudāhṛtaḥ|| 41"],"meaning":"सौभरि ऋषि राजा मान्धाताका अभिप्राय समझ गये। उन्होंने सोचा कि ‘राजाने इसलिये मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, बाल पक गये हैं और सिर काँपने लगा है! अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती॥ ४१॥"},{"id":"9.6.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/42/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरस्त्रीणामपीप्सितम्।","किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभुः॥ ४२"],"iast":["sādhayiṣye tathā''tmānaṃ surastrīṇāmapīpsitam|","kiṃ punarmanujendrāṇāmiti vyavasitaḥ prabhuḥ|| 42"],"meaning":"अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥"},{"id":"9.6.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/43/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुनिः प्रवेशितः क्षत्त्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत्।","वृतश्‍च राजकन्याभिरेकः पंचाशता वरः॥ ४३"],"iast":["muniḥ praveśitaḥ kṣattrā kanyāntaḥpuramṛddhimat|","vṛtaśca rājakanyābhirekaḥ paṃcāśatā varaḥ|| 43"],"meaning":"फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकने सौभरि मुनिको कन्याओंके सजे-सजाये महलमें पहुँचा दिया। फिर तो उन पचासों राजकन्याओंने एक सौभरिको ही अपना पति चुन लिया॥ ४३॥"},{"id":"9.6.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/44/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तासां कलिरभूद् भूयांस्तदर्थेऽपोह्य सौहृदम्।","ममानुरूपो नायं व इति तद्गतचेतसाम्॥ ४४"],"iast":["tāsāṃ kalirabhūd bhūyāṃstadarthe'pohya sauhṛdam|","mamānurūpo nāyaṃ va iti tadgatacetasām|| 44"],"meaning":"उन कन्याओंका मन सौभरिजीमें इस प्रकार आसक्त हो गया कि वे उनके लिये आपसके प्रेमभावको तिलांजलि देकर परस्पर कलह करने लगीं और एक-दूसरीसे कहने लगी कि ‘ये तुम्हारे योग्य नहीं, मेरे योग्य हैं॥ ४४॥"},{"id":"9.6.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/45/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स बह्वृचस्ताभिरपारणीय-","तपःश्रियानर्घ्यपरिच्छदेषु ।","गृहेषु नानोपवनामलाम्भः -","सरस्सु सौगन्धिककाननेषु॥ ४५"],"iast":["sa bahvṛcastābhirapāraṇīya-","tapaḥśriyānarghyaparicchadeṣu |","gṛheṣu nānopavanāmalāmbhaḥ -","sarassu saugandhikakānaneṣu|| 45"],"meaning":"ऋग्वेदी सौभरिने उन सभीका पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्याके प्रभावसे बहुमूल्य सामग्रियोंसे सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जलसे परिपूर्ण सरोवरोंसे युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पोंके बगीचोंसे घिरे महलोंमें बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंके साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवामें लगे रहते। कहीं पक्षी चहकते रहते तो कहीं भौंरे गुंजार करते रहते और कहीं-कहीं वन्दीजन उनकी विरदावलीका बखान करते रहते॥ ४५-४६॥","meaning_covers":[45,46]},{"id":"9.6.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/46/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महार्हशय्यासनवस्त्रभूषण-","स्नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकैः ।","स्वलंकृतस्त्रीपुरुषेषु नित्यदा","रेमेऽनुगायद‍्द्विजभृंगवन्दिषु ॥ ४६"],"iast":["mahārhaśayyāsanavastrabhūṣaṇa-","snānānulepābhyavahāramālyakaiḥ |","svalaṃkṛtastrīpuruṣeṣu nityadā","reme'nugāyaddvijabhṛṃgavandiṣu || 46"],"meaning":"ऋग्वेदी सौभरिने उन सभीका पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्याके प्रभावसे बहुमूल्य सामग्रियोंसे सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जलसे परिपूर्ण सरोवरोंसे युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पोंके बगीचोंसे घिरे महलोंमें बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंके साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवामें लगे रहते। कहीं पक्षी चहकते रहते तो कहीं भौंरे गुंजार करते रहते और कहीं-कहीं वन्दीजन उनकी विरदावलीका बखान करते रहते॥ ४५-४६॥","meaning_covers":[45,46]},{"id":"9.6.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/47/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद्गार्हस्थ्यं तु संवीक्ष्य सप्तद्वीपवतीपतिः।","विस्मितः स्तम्भमजहात् सार्वभौमश्रियान्वितम्॥ ४७"],"iast":["yadgārhasthyaṃ tu saṃvīkṣya saptadvīpavatīpatiḥ|","vismitaḥ stambhamajahāt sārvabhaumaśriyānvitam|| 47"],"meaning":"सप्तद्वीपवती पृथ्वीके स्वामी मान्धाता सौभरिजीकी इस गृहस्थीका सुख देखकर आश्‍चर्यचकित हो गये। उनका यह गर्व कि मैं सार्वभौम सम्पत्तिका स्वामी हूँ, जाता रहा॥ ४७॥"},{"id":"9.6.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/48/","page":36,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं गृहेष्वभिरतो विषयान् विविधैः सुखैः।","सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानलः॥ ४८"],"iast":["evaṃ gṛheṣvabhirato viṣayān vividhaiḥ sukhaiḥ|","sevamāno na cātuṣyadājyastokairivānalaḥ|| 48"],"meaning":"इस प्रकार सौभरिजी गृहस्थीके सुखमें रम गये और अपनी नीरोग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते रहे। फिर भी जैसे घीकी बूँदोंसे आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ॥ ४८॥"},{"id":"9.6.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/49/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स कदाचिदुपासीन आत्मापह्नवमात्मनः।","ददर्श बह्वृचाचार्यो मीनसंगसमुत्थितम्॥ ४९"],"iast":["sa kadācidupāsīna ātmāpahnavamātmanaḥ|","dadarśa bahvṛcācāryo mīnasaṃgasamutthitam|| 49"],"meaning":"ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा॥ ४९॥"},{"id":"9.6.50","number":50,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/50/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो इमं पश्यत मे विनाशं","तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य।","अन्तर्जले वारिचरप्रसंगात्","प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत्॥ ५०"],"iast":["aho imaṃ paśyata me vināśaṃ","tapasvinaḥ saccaritavratasya|","antarjale vāricaraprasaṃgāt","pracyāvitaṃ brahma ciraṃ dhṛtaṃ yat|| 50"],"meaning":"वे सोचने लगे—‘अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था। मैंने भलीभाँति अपने व्रतोंका अनुष्ठान भी किया था। मेरा यह अधःपतन तो देखो! मैंने दीर्घकालसे अपने ब्रह्मतेजको अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जलके भीतर विहार करती हुई एक मछलीके संसर्गसे मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया॥ ५०॥"},{"id":"9.6.51","number":51,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/51/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संगं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः","सर्वात्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि।","एकश्‍चरन् रहसि चित्तमनन्त ईशे","युंजीत तद्व्रतिषु साधुषु चेत् प्रसंगः॥ ५१"],"iast":["saṃgaṃ tyajeta mithunavratināṃ mumukṣuḥ","sarvātmanā na visṛjed bahirindriyāṇi|","ekaścaran rahasi cittamananta īśe","yuṃjīta tadvratiṣu sādhuṣu cet prasaṃgaḥ|| 51"],"meaning":"अतः जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चाहिये कि वह भोगी प्राणियोंका संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख न होने दे। अकेला ही रहे और एकान्तमें अपने चित्तको सर्वशक्तिमान् भगवान्‌में ही लगा दे। यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान्‌के अनन्यप्रेमी निष्ठावान् महात्माओंका ही संग करे॥ ५१॥"},{"id":"9.6.52","number":52,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/52/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकस्तपस्व्यहमथाम्भसि मत्स्यसंगात्","पंचाशदासमुत पंचसहस्रसर्गः।","नान्तं व्रजाम्युभयकृत्यमनोरथानां","मायागुणैर्हृतमतिर्विषयेऽर्थभावः॥ ५२"],"iast":["ekastapasvyahamathāmbhasi matsyasaṃgāt","paṃcāśadāsamuta paṃcasahasrasargaḥ|","nāntaṃ vrajāmyubhayakṛtyamanorathānāṃ","māyāguṇairhṛtamatirviṣaye'rthabhāvaḥ|| 52"],"meaning":"मैं पहले एकान्तमें अकेला ही तपस्यामें संल‌ग्‍न था। फिर जलमें मछलीका संग होनेसे विवाह करके पचास हो गया और फिर सन्तानोंके रूपमें पाँच हजार। विषयोंमें सत्यबुद्धि होनेसे मायाके गुणोंने मेरी बुद्धि हर ली। अब तो लोक और परलोकके सम्बन्धमें मेरा मन इतनी लालसाओंसे भर गया है कि मैं किसी तरह उनका पार ही नहीं पाता॥ ५२॥"},{"id":"9.6.53","number":53,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/53/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं वसन् गृहे कालं विरक्तो न्यासमास्थितः।","वनं जगामानुययुस्तत्पत्‍न्यः पतिदेवताः॥ ५३"],"iast":["evaṃ vasan gṛhe kālaṃ virakto nyāsamāsthitaḥ|","vanaṃ jagāmānuyayustatpatnyaḥ patidevatāḥ|| 53"],"meaning":"इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे। फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वनमें चले गये। अपने पतिको ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्‍नियोंने भी उनके साथ ही वनकी यात्रा की॥ ५३॥"},{"id":"9.6.54","number":54,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/54/","page":37,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान्।","सहैवाग्‍निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि॥ ५४"],"iast":["tatra taptvā tapastīkṣṇamātmakarśanamātmavān|","sahaivāgnibhirātmānaṃ yuyoja paramātmani|| 54"],"meaning":"वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्‍नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया॥ ५४॥"},{"id":"9.6.55","number":55,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/55/","page":38,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम्।","अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्‍निं शान्तमिवार्चिषः॥ ५५"],"iast":["tāḥ svapatyurmahārāja nirīkṣyādhyātmikīṃ gatim|","anvīyustatprabhāveṇa agniṃ śāntamivārciṣaḥ|| 55"],"meaning":"परीक्षित्! उनकी पत्‍नियोंने जब अपने पति सौभरि मुनिकी आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्‍निमें लीन हो जाती हैं—वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर उन्हींमें लीन हो गयीं, उन्हींकी गतिको प्राप्त हुईं॥ ५५॥"}],"text":[{"b":25069,"kind":"adhyaya_heading","page":31,"text":"अथ षष्ठोऽध्यायः"},{"b":25070,"kind":"topic_heading","page":31,"text":"इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा"},{"b":25071,"kind":"topic_heading","page":30,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25072,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.6.1"],"text":"विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः।"},{"b":25073,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.6.1"],"text":"विरूपात् पृषदश्‍वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः॥ १"},{"b":25074,"kind":"hindi_commentary","page":31,"explains":["9.6.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे—विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्‍व और उसका पुत्र रथीतर हुआ॥ १॥"},{"b":25075,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.6.2"],"text":"रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः।"},{"b":25076,"kind":"sanskrit_shloka","page":31,"verses":["9.6.2"],"text":"अंगिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २"},{"b":25077,"kind":"hindi_translation","page":31,"explains":["9.6.2"],"text":"रथीतर सन्तानहीन था। वंश परम्पराकी रक्षाके लिये उसने अंगिरा ऋषिसे प्रार्थना की, उन्होंने उसकी पत्‍नीसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न कई पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥"},{"b":25078,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.3"],"text":"एते क्षेत्रे प्रसूता वै पुनस्त्वांगिरसाः स्मृताः।"},{"b":25079,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.3"],"text":"रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः॥ ३"},{"b":25080,"kind":"hindi_translation","page":32,"explains":["9.6.3"],"text":"यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्‍न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे आंगिरस ही कहलाये। ये ही रथीतर-वंशियोंके प्रवर (कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये। क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे—क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रोंसे इनका सम्बन्ध था॥ ३॥"},{"b":25081,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.4"],"text":"क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः।"},{"b":25082,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.4"],"text":"तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः॥ ४"},{"b":25083,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.5"],"text":"तेषां पुरस्तादभवन्‍नार्यावर्ते नृपा नृप।"},{"b":25084,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.5"],"text":"पंचविंशतिः पश्‍चाच्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः॥ ५"},{"b":25085,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.6"],"text":"स एकदाष्टकाश्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत्।"},{"b":25086,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.6"],"text":"मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ माचिरम्॥ ६"},{"b":25087,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.7"],"text":"तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान्।"},{"b":25088,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.7"],"text":"श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः॥ ७"},{"b":25089,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.8"],"text":"शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्गुरुः।"},{"b":25090,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.8"],"text":"चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम्॥ ८"},{"b":25091,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.9"],"text":"ज्ञात्वा पुत्रस्य तत् कर्म गुरुणाभिहितं नृपः।"},{"b":25092,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.9"],"text":"देशान्‍निःसारयामास सुतं त्यक्तविधिं रुषा॥ ९"},{"b":25093,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.10"],"text":"स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन्।"},{"b":25094,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.10"],"text":"त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम्॥ १०"},{"b":25095,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.11"],"text":"पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम्।"},{"b":25096,"kind":"sanskrit_shloka","page":32,"verses":["9.6.11"],"text":"शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः॥ ११"},{"b":25097,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.12"],"text":"पुरंजयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः।"},{"b":25098,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.12"],"text":"ककुत्स्थ इति चाप्युक्तः शृणु नामानि कर्मभिः॥ १२"},{"b":25099,"kind":"hindi_translation","page":32,"explains":["9.6.4","9.6.5","9.6.6","9.6.7","9.6.8","9.6.9","9.6.10","9.6.11","9.6.12"],"text":"परीक्षित्! एक बार मनुजीके छींकनेपर उनकी नासिकासे इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्‍न हुआ। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे—विकुक्षि, निमि और दण्डक॥ ४॥ परीक्षित्! उनसे छोटे पचीस पुत्र आर्यावर्तके पूर्वभागके और पचीस पश्‍चिमभागके तथा उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति हुए। शेष सैंतालीस दक्षिण आदि अन्य प्रान्तोंके अधिपति हुए॥ ५॥ एक बार राजा इक्ष्वाकुने अष्टका-श्राद्धके समय अपने बड़े पुत्रको आज्ञा दी—‘विकुक्षे! शीघ्र ही जाकर श्राद्धके योग्य पवित्र पशुओंका मांस लाओ’॥ ६॥ वीर विकुक्षिने ‘बहुत अच्छा’ कहकर वनकी यात्रा की। वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत-से पशुओंका शिकार किया। वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये। उसने एक खरगोश खा लिया॥ ७॥ विकुक्षिने बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको दिया। इक्ष्वाकुने अब अपने गुरुसे उसे प्रोक्षण करनेके लिये कहा, तब गुरुजीने बताया कि यह मांस तो दूषित एवं श्राद्धके अयोग्य है॥ ८॥ परीक्षित्! गुरुजीके कहनेपर राजा इक्ष्वाकुको अपने पुत्रकी करतूतका पता चल गया। उन्होंने शास्त्रीय विधिका उल्लंघन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया॥ ९॥ तदनन्तर राजा इक्ष्वाकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक चर्चा की। फिर योगके द्वारा शरीरका परित्याग करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया॥ १०॥ पिताका देहान्त हो जानेपर विकुक्षि अपनी राजधानीमें लौट आया और इस पृथ्वीका शासन करने लगा। उसने बड़े-बड़े यज्ञोंसे भगवान्‌की आराधना की और संसारमें शशादके नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ११॥ विकुक्षिके पुत्रका नाम था पुरंजय। उसीको कोई ‘इन्द्रवाह’ और कोई ‘ककुत्स्थ’ कहते हैं। जिन कर्मोंके कारण उसके ये नाम पड़े थे, उन्हें सुनो॥ १२॥"},{"b":25101,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.13"],"text":"कृतान्त आसीत् समरो देवानां सह दानवैः।"},{"b":25102,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.13"],"text":"पार्ष्णिग्राहो वृतो वीरो देवैर्दैत्यपराजितैः॥ १३"},{"b":25103,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.14"],"text":"वचनाद् देवदेवस्य विष्णोर्विश्‍वात्मनः प्रभोः।"},{"b":25104,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.14"],"text":"वाहनत्वे वृतस्तस्य बभूवेन्द्रो महावृषः॥ १४"},{"b":25106,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.15"],"text":"स संनद्धो धनुर्दिव्यमादाय विशिखाञ्छितान्।"},{"b":25107,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.15"],"text":"स्तूयमानः समारुह्य युयुत्सुः ककुदि स्थितः॥ १५"},{"b":25108,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.16"],"text":"तेजसाऽऽप्यायितो विष्णोः पुरुषस्य परात्मनः।"},{"b":25109,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.16"],"text":"प्रतीच्यां दिशि दैत्यानां न्यरुणत् त्रिदशैः पुरम्॥ १६"},{"b":25110,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.17"],"text":"तैस्तस्य चाभूत् प्रधनं तुमुलं लोमहर्षणम्।"},{"b":25111,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.17"],"text":"यमाय भल्लैरनयद् दैत्यान् येऽभिययुर्मृधे॥ १७"},{"b":25112,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.18"],"text":"तस्येषुपाताभिमुखं युगान्ताग्‍निमिवोल्बणम्।"},{"b":25113,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.18"],"text":"विसृज्य दुद्रुवुर्दैत्या हन्यमानाः स्वमालयम्॥ १८"},{"b":25114,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.19"],"text":"जित्वा पुरं धनं सर्वं सश्रीकं वज्रपाणये।"},{"b":25115,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.19"],"text":"प्रत्ययच्छत् स राजर्षिरिति नामभिराहृतः॥ १९"},{"b":25116,"kind":"hindi_translation","page":33,"explains":["9.6.13","9.6.14","9.6.15","9.6.16","9.6.17","9.6.18","9.6.19"],"text":"सत्ययुगके अन्तमें देवताओंका दानवोंके साथ घोर संग्राम हुआ था। उसमें सब-के-सब देवता दैत्योंसे हार गये। तब उन्होंने वीर पुरंजयको सहायताके लिये अपना मित्र बनाया॥ १३॥ पुरंजयने कहा कि ‘यदि देवराज इन्द्र मेरे वाहन बनें तो मैं युद्ध कर सकता हूँ।’ पहले तो इन्द्रने अस्वीकार कर दिया, परन्तु देवताओंके आराध्यदेव सर्वशक्तिमान् विश्‍वात्मा भगवान्‌की बात मानकर पीछे वे एक बड़े भारी बैल बन गये॥ १४॥ सर्वान्तर्यामी भगवान् विष्णुने अपनी शक्तिसे पुरंजयको भर दिया। उन्होंने कवच पहनकर दिव्य धनुष और तीखे बाण ग्रहण किये। इसके बाद बैलपर चढ़कर वे उसके ककुद् (डील)-के पास बैठ गये। जब इस प्रकार वे युद्धके लिये तत्पर हुए तब देवता उनकी स्तुति करने लगे। देवताओंको साथ लेकर उन्होंने पश्‍चिमकी ओरसे दैत्योंका नगर घेर लिया॥ १५-१६॥ वीर पुरंजयका दैत्योंके साथ अत्यन्त रोमांचकारी घोर संग्राम हुआ। युद्धमें जो-जो दैत्य उनके सामने आये पुरंजयने बाणोंके द्वारा उन्हें यमराजके हवाले कर दिया॥ १७॥ उनके बाणोंकी वर्षा क्या थी, प्रलयकालकी धधकती हुई आग थी। जो भी उसके सामने आता, छिन्‍न-भिन्‍न हो जाता। दैत्योंका साहस जाता रहा। वे रणभूमि छोड़कर अपने-अपने घरोंमें घुस गये॥ १८॥ पुरंजयने उनका नगर, धन और ऐश्‍वर्य—सब कुछ जीतकर इन्द्रको दे दिया। इसीसे उन राजर्षिको पुर जीतनेके कारण ‘पुरंजय’, इन्द्रको वाहन बनानेके कारण ‘इन्द्रवाह’ और बैलके ककुद्पर बैठनेके कारण ‘ककुत्स्थ’ कहा जाता है॥ १९॥"},{"b":25117,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.20"],"text":"पुरंजयस्य पुत्रोऽभूदनेनास्तत्सुतः पृथुः।"},{"b":25118,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.20"],"text":"विश्‍वरन्धिस्ततश्‍चन्द्रो युवनाश्‍वश्‍च तत्सुतः॥ २०"},{"b":25119,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.21"],"text":"शाबस्तस्तत्सुतो येन शाबस्ती निर्ममे पुरी।"},{"b":25120,"kind":"sanskrit_shloka","page":33,"verses":["9.6.21"],"text":"बृहदश्‍वस्तु शाबस्तिस्ततः कुवलयाश्‍वकः॥ २१"},{"b":25121,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.22"],"text":"यः प्रियार्थमुतंकस्य धुन्धुनामासुरं बली।"},{"b":25122,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.22"],"text":"सुतानामेकविंशत्या सहस्रैरहनद् वृतः॥ २२"},{"b":25123,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.23"],"text":"धुन्धुमार इति ख्यातस्तत्सुतास्ते च जज्वलुः।"},{"b":25124,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.23"],"text":"धुन्धोर्मुखाग्‍निना सर्वे त्रय एवावशेषिताः॥ २३"},{"b":25125,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.24"],"text":"दृढाश्‍वः कपिलाश्‍वश्‍च भद्राश्‍व इति भारत।"},{"b":25126,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.24"],"text":"दृढाश्‍वपुत्रो हर्यश्‍वो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः॥ २४"},{"b":25127,"kind":"hindi_translation","page":33,"explains":["9.6.20","9.6.21","9.6.22","9.6.23","9.6.24"],"text":"पुरंजयका पुत्र था अनेना। उसका पुत्र पृथु हुआ। पृथुके विश्‍वरन्धि, उसके चन्द्र और चन्द्रके युवनाश्‍व॥ २०॥ युवनाश्‍वके पुत्र हुए शाबस्त, जिन्होंने शाबस्तीपुरी बसायी। शाबस्तके बृहदश्‍व और उसके कुवलयाश्‍व हुए॥ २१॥ ये बड़े बली थे। इन्होंने उतंक ऋषिको प्रसन्‍न करनेके लिये अपने इक्कीस हजार पुत्रोंको साथ लेकर धुन्धु नामक दैत्यका वध किया॥ २२॥ इसीसे उनका नाम हुआ ‘धुन्धुमार’। धुन्धु दैत्यके मुखकी आगसे उनके सब पुत्र जल गये। केवल तीन ही बच रहे थे॥ २३॥ परीक्षित्! बचे हुए पुत्रोंके नाम थे—दृढाश्‍व, कपिलाश्‍व और भद्राश्‍व। दृढाश्‍वसे हर्यश्‍व और उससे निकुम्भका जन्म हुआ॥ २४॥"},{"b":25128,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.25"],"text":"बर्हणाश्‍वो निकुम्भस्य कृशाश्‍वोऽथास्य सेनजित्।"},{"b":25129,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.25"],"text":"युवनाश्‍वोऽभवत् तस्य सोऽनपत्यो वनं गतः॥ २५"},{"b":25130,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.26"],"text":"भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः।"},{"b":25131,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.26"],"text":"इष्टिं स्म वर्तयांचक्रुरैन्द्रीं ते सुसमाहिताः॥ २६"},{"b":25132,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.27"],"text":"राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।"},{"b":25133,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.27"],"text":"दृष्ट्वा शयानान् विप्रांस्तान् पपौ मन्त्रजलं स्वयम्॥ २७"},{"b":25134,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.28"],"text":"उत्थितास्ते निशाम्याथ व्युदकं कलशं प्रभो।"},{"b":25135,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.28"],"text":"पप्रच्छुः कस्य कर्मेदं पीतं पुंसवनं जलम्॥ २८"},{"b":25136,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.29"],"text":"राज्ञा पीतं विदित्वाथ ईश्‍वरप्रहितेन ते।"},{"b":25137,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.29"],"text":"ईश्‍वराय नमश्‍चक्रुरहो दैवबलं बलम्॥ २९"},{"b":25138,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.30"],"text":"ततः काल उपावृत्ते कुक्षिं निर्भिद्य दक्षिणम्।"},{"b":25139,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.30"],"text":"युवनाश्‍वस्य तनयश्‍चक्रवर्ती जजान ह॥ ३०"},{"b":25140,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.31"],"text":"कं धास्यति कुमारोऽयं स्तन्यं रोरूयते भृशम्।"},{"b":25141,"kind":"sanskrit_shloka","page":34,"verses":["9.6.31"],"text":"मां धाता वत्स मा रोदीरितीन्द्रो देशिनीमदात्॥ ३१"},{"b":25142,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.32"],"text":"न ममार पिता तस्य विप्रदेवप्रसादतः।"},{"b":25143,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.32"],"text":"युवनाश्‍वोऽथ तत्रैव तपसा सिद्धिमन्वगात्॥ ३२"},{"b":25144,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.33"],"text":"त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम तस्य वै।"},{"b":25145,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.33"],"text":"यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्वि‌ग्‍ना दस्यवो रावणादयः॥ ३३"},{"b":25146,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.34"],"text":"यौवनाश्‍वोऽथ मान्धाता चक्रवर्त्यवनीं प्रभुः।"},{"b":25147,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.34"],"text":"सप्तद्वीपवतीमेकः शशासाच्युततेजसा॥ ३४"},{"b":25148,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.35"],"text":"ईजे च यज्ञं क्रतुभिरात्मविद् भूरिदक्षिणैः।"},{"b":25149,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.35"],"text":"सर्वदेवमयं देवं सर्वात्मकमतीन्द्रियम्॥ ३५"},{"b":25150,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.36"],"text":"द्रव्यं मन्त्रो विधिर्यज्ञो यजमानस्तथर्त्विजः।"},{"b":25151,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.36"],"text":"धर्मो देशश्‍च कालश्‍च सर्वमेतद् यदात्मकम्॥ ३६"},{"b":25152,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.37"],"text":"यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति।"},{"b":25153,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.37"],"text":"सर्वं तद् यौवनाश्‍वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते॥ ३७"},{"b":25154,"kind":"hindi_translation","page":34,"explains":["9.6.25","9.6.26","9.6.27","9.6.28","9.6.29","9.6.30","9.6.31","9.6.32","9.6.33","9.6.34","9.6.35","9.6.36","9.6.37"],"text":"निकुम्भके बर्हणाश्‍व, उसके कृशाश्‍व, कृशाश्‍वके सेनजित् और सेनजित्के युवनाश्‍व नामक पुत्र हुआ। युवनाश्‍व सन्तानहीन था, इसलिये वह बहुत दुःखी होकर अपनी सौ स्त्रियोंके साथ वनमें चला गया। वहाँ ऋषियोंने बड़ी कृपा करके युवनाश्‍वसे पुत्रप्राप्तिके लिये बड़ी एकाग्रताके साथ इन्द्रदेवताका यज्ञ कराया॥ २५-२६॥ एक दिन राजा युवनाश्‍वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥ परीक्षित्! जब प्रातःकाल ऋषिलोग सोकर उठे और उन्होंने देखा कि कलशमें तो जल ही नहीं है, तब उन लोगोंने पूछा कि ‘यह किसका काम है? पुत्र उत्पन्‍न करनेवाला जल किसने पी लिया?’॥ २८॥ अन्तमें जब उन्हें यह मालूम हुआ कि भगवान्‌की प्रेरणासे राजा युवनाश्‍वने ही उस जलको पी लिया है तो उन लोगोंने भगवान्‌के चरणोंमें नमस्कार किया और कहा—‘धन्य है! भगवान्‌का बल ही वास्तवमें बल है’॥ २९॥ इसके बाद प्रसवका समय आनेपर युवनाश्‍वकी दाहिनी कोख फाड़कर उसके एक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्‍न हुआ॥ ३०॥ उसे रोते देख ऋषियोंने कहा—‘यह बालक दूधके लिये बहुत रो रहा है; अतः किसका दूध पियेगा?’ तब इन्द्रने कहा, ‘मेरा पियेगा’ ‘(मां धाता)’ ‘बेटा! तू रो मत।’ यह कहकर इन्द्रने अपनी तर्जनी अँगुली उसके मुँहमें डाल दी॥ ३१॥ ब्राह्मण और देवताओंके प्रसादसे उस बालकके पिता युवनाश्‍वकी भी मृत्यु नहीं हुई। वह वहीं तपस्या करके मुक्त हो गया॥ ३२॥ परीक्षित्! इन्द्रने उस बालकका नाम रखा त्रसद्दस्यु, क्योंकि रावण आदि दस्यु (लुटेरे) उससे उद्वि‌ग्‍न एवं भयभीत रहते थे॥ ३३॥ युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाता (त्रसद्दस्यु) चक्रवर्ती राजा हुए। भगवान्‌के तेजसे तेजस्वी होकर उन्होंने अकेले ही सातों द्वीपवाली पृथ्वीका शासन किया॥ ३४॥ वे यद्यपि आत्मज्ञानी थे, उन्हें कर्म-काण्डकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी—फिर भी उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे उन यज्ञस्वरूप प्रभुकी आराधना की जो स्वयंप्रकाश, सर्वदेवस्वरूप, सर्वात्मा एवं इन्द्रियातीत हैं॥ ३५॥ भगवान्‌के अतिरिक्त और है ही क्या? यज्ञकी सामग्री, मन्त्र, विधि-विधान, यज्ञ, यजमान, ऋत्विज्, धर्म, देश और काल—यह सब-का-सब भगवान्‌का ही स्वरूप तो है॥ ३६॥ परीक्षित्! जहाँसे सूर्यका उदय होता है और जहाँ वे अस्त होते हैं, वह सारा-का-सारा भूभाग युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाताके ही अधिकारमें था॥ ३७॥"},{"b":25155,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.38"],"text":"शशबिन्दोर्दुहितरि बिन्दुमत्यामधान्‍नृपः।"},{"b":25156,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.38"],"text":"पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च योगिनम्।"},{"b":25157,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.38"],"text":"तेषां स्वसारः पंचाशत् सौभरिं वव्रिरे पतिम्॥ ३८"},{"b":25158,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.39"],"text":"यमुनान्तर्जले म‌ग्‍नस्तप्यमानः परंतपः।"},{"b":25159,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.39"],"text":"निर्वृतिं मीनराजस्य वीक्ष्य मैथुनधर्मिणः॥ ३९"},{"b":25160,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.40"],"text":"जातस्पृहो नृपं विप्रः कन्यामेकामयाचत।"},{"b":25161,"kind":"sanskrit_shloka","page":35,"verses":["9.6.40"],"text":"सोऽप्याह गृह्यतां ब्रह्मन् कामं कन्या स्वयंवरे॥ ४०"},{"b":25162,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.41"],"text":"स विचिन्त्याप्रियं स्त्रीणां जरठोऽयमसम्मतः।"},{"b":25163,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.41"],"text":"वलीपलित एजत्क इत्यहं प्रत्युदाहृतः॥ ४१"},{"b":25164,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.42"],"text":"साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरस्त्रीणामपीप्सितम्।"},{"b":25165,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.42"],"text":"किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभुः॥ ४२"},{"b":25166,"kind":"hindi_translation","page":35,"explains":["9.6.38","9.6.39","9.6.40","9.6.41","9.6.42"],"text":"राजा मान्धाताकी पत्‍नी शशबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमती थी। उसके गर्भसे उनके तीन पुत्र हुए—पुरुकुत्स, अम्बरीष (ये दूसरे अम्बरीष हैं) और योगी मुचुकुन्द। इनकी पचास बहनें थीं। उन पचासोंने अकेले सौभरि ऋषिको पतिके रूपमें वरण किया॥ ३८॥ परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्‍नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है॥ ३९॥ उसके इस सुखको देखकर ब्राह्मण सौभरिके मनमें भी विवाह करनेकी इच्छा जग उठी और उन्होंने राजा मान्धाताके पास आकर उनकी पचास कन्याओंमेंसे एक कन्या माँगी। राजाने कहा—‘ब्रह्मन्! कन्या स्वयंवरमें आपको चुन ले तो आप उसे ले लीजिये’॥ ४०॥ सौभरि ऋषि राजा मान्धाताका अभिप्राय समझ गये। उन्होंने सोचा कि ‘राजाने इसलिये मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, बाल पक गये हैं और सिर काँपने लगा है! अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती॥ ४१॥ अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥"},{"b":25167,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.43"],"text":"मुनिः प्रवेशितः क्षत्त्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत्।"},{"b":25168,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.43"],"text":"वृतश्‍च राजकन्याभिरेकः पंचाशता वरः॥ ४३"},{"b":25169,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.44"],"text":"तासां कलिरभूद् भूयांस्तदर्थेऽपोह्य सौहृदम्।"},{"b":25170,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.44"],"text":"ममानुरूपो नायं व इति तद्गतचेतसाम्॥ ४४"},{"b":25171,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.45"],"text":"स बह्वृचस्ताभिरपारणीय-"},{"b":25172,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.45"],"text":"तपःश्रियानर्घ्यपरिच्छदेषु ।"},{"b":25173,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.45"],"text":"गृहेषु नानोपवनामलाम्भः -"},{"b":25174,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.45"],"text":"सरस्सु सौगन्धिककाननेषु॥ ४५"},{"b":25175,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.46"],"text":"महार्हशय्यासनवस्त्रभूषण-"},{"b":25176,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.46"],"text":"स्नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकैः ।"},{"b":25177,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.46"],"text":"स्वलंकृतस्त्रीपुरुषेषु नित्यदा"},{"b":25178,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.46"],"text":"रेमेऽनुगायद‍्द्विजभृंगवन्दिषु ॥ ४६"},{"b":25179,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.47"],"text":"यद्गार्हस्थ्यं तु संवीक्ष्य सप्तद्वीपवतीपतिः।"},{"b":25180,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.47"],"text":"विस्मितः स्तम्भमजहात् सार्वभौमश्रियान्वितम्॥ ४७"},{"b":25181,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.48"],"text":"एवं गृहेष्वभिरतो विषयान् विविधैः सुखैः।"},{"b":25182,"kind":"sanskrit_shloka","page":36,"verses":["9.6.48"],"text":"सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानलः॥ ४८"},{"b":25183,"kind":"hindi_commentary","page":36,"explains":["9.6.43","9.6.44","9.6.45","9.6.46","9.6.47","9.6.48"],"text":"फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकने सौभरि मुनिको कन्याओंके सजे-सजाये महलमें पहुँचा दिया। फिर तो उन पचासों राजकन्याओंने एक सौभरिको ही अपना पति चुन लिया॥ ४३॥ उन कन्याओंका मन सौभरिजीमें इस प्रकार आसक्त हो गया कि वे उनके लिये आपसके प्रेमभावको तिलांजलि देकर परस्पर कलह करने लगीं और एक-दूसरीसे कहने लगी कि ‘ये तुम्हारे योग्य नहीं, मेरे योग्य हैं॥ ४४॥ ऋग्वेदी सौभरिने उन सभीका पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्याके प्रभावसे बहुमूल्य सामग्रियोंसे सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जलसे परिपूर्ण सरोवरोंसे युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पोंके बगीचोंसे घिरे महलोंमें बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंके साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवामें लगे रहते। कहीं पक्षी चहकते रहते तो कहीं भौंरे गुंजार करते रहते और कहीं-कहीं वन्दीजन उनकी विरदावलीका बखान करते रहते॥ ४५-४६॥ सप्तद्वीपवती पृथ्वीके स्वामी मान्धाता सौभरिजीकी इस गृहस्थीका सुख देखकर आश्‍चर्यचकित हो गये। उनका यह गर्व कि मैं सार्वभौम सम्पत्तिका स्वामी हूँ, जाता रहा॥ ४७॥ इस प्रकार सौभरिजी गृहस्थीके सुखमें रम गये और अपनी नीरोग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते रहे। फिर भी जैसे घीकी बूँदोंसे आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ॥ ४८॥"},{"b":25184,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.49"],"text":"स कदाचिदुपासीन आत्मापह्नवमात्मनः।"},{"b":25185,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.49"],"text":"ददर्श बह्वृचाचार्यो मीनसंगसमुत्थितम्॥ ४९"},{"b":25186,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.50"],"text":"अहो इमं पश्यत मे विनाशं"},{"b":25187,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.50"],"text":"तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य।"},{"b":25188,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.50"],"text":"अन्तर्जले वारिचरप्रसंगात्"},{"b":25189,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.50"],"text":"प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत्॥ ५०"},{"b":25190,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.51"],"text":"संगं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः"},{"b":25191,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.51"],"text":"सर्वात्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि।"},{"b":25192,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.51"],"text":"एकश्‍चरन् रहसि चित्तमनन्त ईशे"},{"b":25193,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.51"],"text":"युंजीत तद्व्रतिषु साधुषु चेत् प्रसंगः॥ ५१"},{"b":25194,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.52"],"text":"एकस्तपस्व्यहमथाम्भसि मत्स्यसंगात्"},{"b":25195,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.52"],"text":"पंचाशदासमुत पंचसहस्रसर्गः।"},{"b":25196,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.52"],"text":"नान्तं व्रजाम्युभयकृत्यमनोरथानां"},{"b":25197,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.52"],"text":"मायागुणैर्हृतमतिर्विषयेऽर्थभावः॥ ५२"},{"b":25198,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.53"],"text":"एवं वसन् गृहे कालं विरक्तो न्यासमास्थितः।"},{"b":25199,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.53"],"text":"वनं जगामानुययुस्तत्पत्‍न्यः पतिदेवताः॥ ५३"},{"b":25200,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.54"],"text":"तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान्।"},{"b":25201,"kind":"sanskrit_shloka","page":37,"verses":["9.6.54"],"text":"सहैवाग्‍निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि॥ ५४"},{"b":25202,"kind":"sanskrit_shloka","page":38,"verses":["9.6.55"],"text":"ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम्।"},{"b":25203,"kind":"sanskrit_shloka","page":38,"verses":["9.6.55"],"text":"अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्‍निं शान्तमिवार्चिषः॥ ५५"},{"b":25204,"kind":"hindi_translation","page":37,"explains":["9.6.49","9.6.50","9.6.51","9.6.52","9.6.53","9.6.54","9.6.55"],"text":"ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा॥ ४९॥ वे सोचने लगे—‘अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था। मैंने भलीभाँति अपने व्रतोंका अनुष्ठान भी किया था। मेरा यह अधःपतन तो देखो! मैंने दीर्घकालसे अपने ब्रह्मतेजको अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जलके भीतर विहार करती हुई एक मछलीके संसर्गसे मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया॥ ५०॥ अतः जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चाहिये कि वह भोगी प्राणियोंका संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख न होने दे। अकेला ही रहे और एकान्तमें अपने चित्तको सर्वशक्तिमान् भगवान्‌में ही लगा दे। यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान्‌के अनन्यप्रेमी निष्ठावान् महात्माओंका ही संग करे॥ ५१॥ मैं पहले एकान्तमें अकेला ही तपस्यामें संल‌ग्‍न था। फिर जलमें मछलीका संग होनेसे विवाह करके पचास हो गया और फिर सन्तानोंके रूपमें पाँच हजार। विषयोंमें सत्यबुद्धि होनेसे मायाके गुणोंने मेरी बुद्धि हर ली। अब तो लोक और परलोकके सम्बन्धमें मेरा मन इतनी लालसाओंसे भर गया है कि मैं किसी तरह उनका पार ही नहीं पाता॥ ५२॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे। फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वनमें चले गये। अपने पतिको ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्‍नियोंने भी उनके साथ ही वनकी यात्रा की॥ ५३॥ वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्‍नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया॥ ५४॥ परीक्षित्! उनकी पत्‍नियोंने जब अपने पति सौभरि मुनिकी आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्‍निमें लीन हो जाती हैं—वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर उन्हींमें लीन हो गयीं, उन्हींकी गतिको प्राप्त हुईं॥ ५५॥"},{"b":25205,"kind":"hindi_translation","page":38,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सौभर्याख्याने षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥"}],"notes":[{"id":"v2:43","mark":"१","page":32,"after_verse":"9.6.3","text":"क्षेत्रप्रसू०।"},{"id":"v2:44","mark":"२","page":32,"after_verse":"9.6.7","text":"ह्यपाहरन्।"},{"id":"v2:45","mark":"१","page":33,"after_verse":"9.6.12","text":"च प्रोक्तः।"},{"id":"v2:46","mark":"२","page":33,"after_verse":"9.6.15","text":"स गन्धर्वैः।"},{"id":"v2:47","mark":"१","page":34,"after_verse":"9.6.25","text":"बार्हश्‍वासो।"},{"id":"v2:48","mark":"२","page":34,"after_verse":"9.6.25","text":"शाश्‍वश्‍चास्य।"},{"id":"v2:49","mark":"३","page":34,"after_verse":"9.6.30","text":"ह्यजायत।"},{"id":"v2:50","mark":"१","page":35,"after_verse":"9.6.33","text":"यस्य।"},{"id":"v2:51","mark":"२","page":35,"after_verse":"9.6.38","text":"मजीजनत्।"},{"id":"v2:52","mark":"१","page":37,"after_verse":"9.6.50","text":"संगदोषं।"},{"id":"v2:53","mark":"२","page":37,"after_verse":"9.6.53","text":"कामं।"},{"id":"v2:54","mark":"३","page":37,"after_verse":"9.6.54","text":"तीव्र०।"},{"id":"v2:55","mark":"४","page":37,"after_verse":"9.6.54","text":"वित्।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/shuddhi/"}}