अब आप इस रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार कीजिये और अपने स्वजनोंको इस विपत्तिसे बचाइये। भगवन्! साधुओंका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने अवतार ग्रहण किया है॥ १४॥
यानमास्थाय जह्येतद् व्यसनात् स्वान् समुद्धर।
एतदर्थं हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत्॥ १४
अब आप इस रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार कीजिये और अपने स्वजनोंको इस विपत्तिसे बचाइये। भगवन्! साधुओंका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने अवतार ग्रहण किया है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 446) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/50/14/