॥ श्रीहरिः ॥
पारायण
श्रीमद्भागवत-पाठके विभिन्न प्रयोग१
भागवत-महिमा
श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतं पठेत्।
यः पुमान् सोऽपि संसारान्मुच्यते किमुताखिलात्॥
आधा श्लोक या चौथाई श्लोकका भी नित्य जो मनुष्य पाठ करता है, उसकी भी संसारसे मुक्ति हो जाती है; फिर सम्पूर्ण पाठ करनेवालेकी तो बात ही क्या है।
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्यद् भागवतमादरात्।
नित्यं पठेद् यथाशक्ति यतः स्यात् संसृतिक्षयः॥
बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता यही है कि संसारभयनाशक श्रीमद्भागवतका आदरपूर्वक यथाशक्ति पाठ करे।
अशक्तो नित्य पठने मासे वर्षेऽपि वैकदा।
पालयन् नियमान् भक्त्या श्रीमद्भागवतं पठेत्॥
यदि नित्य पाठ न कर सकता हो तो महीने या वर्षमें एक बार नियमपूर्वक भक्तिसहित भागवतका पाठ अवश्य करना चाहिये।
एकाहे नैव शक्तस्तु द्व्यहेनाथ त्र्यहेण वा।
पंचभिर्दिवसैः षड्भिः सप्तभिर्वा पठेत् पुमान्॥
दशाहेनाथ पक्षेण मासेन ऋतुनापि वा।
पठेद् भागवतं यस्तु भुक्तिं मुक्तिं स विन्दते॥
जो एक दिनमें पाठ न कर सकता हो वह दो, तीन, पाँच, छः, सात, दस, पंद्रह, तीस या साठ दिनमें श्रीमद्भागवतका पाठ करे। इससे भोग एवं मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है।
एषोऽप्यत्युत्तमः पक्षः सप्ताहो बहुसम्मतः।
श्रीवासुदेवप्रीत्यर्थं पठतः पुंस आदरात्॥
सर्वे पक्षाः सन्ति तुल्या विशेषो नास्ति कश्चन।
विशेषोऽस्ति सकामानां कामनाफलभेदतः॥
बहुत-से ऋषियोंने सप्ताहपारायणका भी उत्तम पक्ष माना है। केवल भगवान्की प्रीतिके लिये सम्पूर्ण पक्ष बराबर हैं। कोई न्यूनाधिक नहीं हैं। फल चाहनेवालोंके लिये फलभेदसे पारायणभेद कहा गया है।
प्रयोग
एक दिनमें
2 दिनमें
3 दिनमें
4 दिनमें
5 दिनमें
6 दिनमें
7 दिनमें
- 1निष्कामपारायण भगवत्प्रीत्यर्थ7 दिन
- 2सप्ताहपारायण (सात दिनका)निष्कामपारायण भगवत्प्रीत्यर्थ7 दिन
- 3सप्ताहपारायण (सात दिनका)मोक्षप्राप्तिके लिये7 दिन
- 4आरम्भ किये हुए कार्यमें विघ्ननाशके लिये7 दिन
- 5सप्ताहपारायण (सात दिनका)विघ्ननाशके लिये7 दिन
- 6सप्ताहपारायण (सात दिनका)धनप्राप्तिके लिये7 दिन
- 7सप्ताहपारायणके प्रयोग (सात दिनके)बान्धवपीडानिवृत्ति और संकटनाशके लिये7 दिन
- 8कैदसे छुड़ानेके लिये7 दिन
- 9शत्रुपराजयके लिये7 दिन
- 10रोगमुक्तिके लिये7 दिन
- 11पुत्र और स्त्रीप्राप्तिके लिये7 दिन
- 12निष्कण्टक राज्यके लिये7 दिन
8 दिनमें
9 दिनमें
10 दिनमें
11 दिनमें
12 दिनमें
13 दिनमें
14 दिनमें
15 दिनमें
16 दिनमें
17 दिनमें
18 दिनमें
19 दिनमें
20 दिनमें
21 दिनमें
22 दिनमें
23 दिनमें
24 दिनमें
25 दिनमें
26 दिनमें
27 दिनमें
28 दिनमें
29 दिनमें
30 दिनमें
60 दिनमें
ऐसा माना जाता है कि निम्नलिखित स्कन्धोंके निम्नलिखित अध्यायोंपर विश्राम नहीं करना चाहिये। ऐसा करनेवालोंके प्रयोग सिद्ध नहीं होंगे।
स्कन्ध |
अध्याय |
१ |
१, ८, १०, ११, १६ |
२ |
३, ८ |
३ |
१, ७, १०, १८, २०, २३ |
४ |
१, ३, १०, १७, १८ |
५ |
५, १३ |
६ |
६, १० |
७ |
१, ४, ६ |
८ |
१, २, ८, १०, २१ |
९ |
१, ४, १०, १५ |
१० |
१, ९, १०, २२, २९, ३०, ६२, ७६, ७७ |
११ |
१०, २२, ३० |
१२ |
९ |
टिप्पणियाँ
- १
(भागवतांकमें प्रकाशित ‘श्रीमद्भागवतकी अनुष्ठान-विधि’ शीर्षक दो लेखोंके आधारपर।)