श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.52

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् ।

हेमशृङ्गैर्दिविस्पृग्भिः स्फाटिकाट्टालगोपुरैः॥ ५२

suradrumalatodyānavicitropavanānvitam |

hemaśṛṅgairdivispṛgbhiḥ sphāṭikāṭṭālagopuraiḥ|| 52

अर्थ

वह नगर ऐसे सुन्दर-सुन्दर उद्यानों और विचित्र-विचित्र उपवनोंसे युक्त था, जिनमें देवताओंके वृक्ष और लताएँ लहलहाती रहती थीं। सोनेके इतने ऊँचे-ऊँचे शिखर थे, जो आकाशसे बातें करते थे। स्फटिकमणिकी अटारियाँ और ऊँचे-ऊँचे दरवाजे बड़े ही सुन्दर लगते थे॥ ५२॥

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