वह पुरुष वहाँ बहुत दिनोंसे सोया हुआ था। पैरकी ठोकर लगनेसे वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं। इधर-उधर देखनेपर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखायी दिया॥ ११॥
स उत्थाय चिरं सुप्तः शनैरुन्मील्य लोचने।
दिशो विलोकयन् पार्श्वे तमद्राक्षीदवस्थितम्॥ ११
वह पुरुष वहाँ बहुत दिनोंसे सोया हुआ था। पैरकी ठोकर लगनेसे वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं। इधर-उधर देखनेपर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखायी दिया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 453) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/11/