॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.51.48
ममैष कालोऽजित निष्फलो गतो
राज्यश्रियोन्नद्धमदस्य भूपतेः।
मर्त्यात्मबुद्धेः सुतदारकोशभू-
ष्वासज्जमानस्य दुरन्तचिन्तया॥ ४८
mamaiṣa kālo'jita niṣphalo gato
rājyaśriyonnaddhamadasya bhūpateḥ|
martyātmabuddheḥ sutadārakośabhū-
ṣvāsajjamānasya durantacintayā|| 48
अर्थ
भगवन्! मैं राजा था, राज्यलक्ष्मीके मदसे मैं मतवाला हो रहा था। इस मरनेवाले शरीरको ही तो मैं आत्मा—अपना स्वरूप समझ रहा था और राजकुमार, रानी, खजाना तथा पृथ्वीके लोभ-मोहमें ही फँसा हुआ था। उन वस्तुओंकी चिन्ता दिन-रात मेरे गले लगी रहती थी। इस प्रकार मेरे जीवनका यह अमूल्य समय बिलकुल निष्फल—व्यर्थ चला गया॥ ४८॥