श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.52

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

निर्जित्य दिक्चक्रमभूतविग्रहो

वरासनस्थः समराजवन्दितः।

गृहेषु मैथुन्यसुखेषु योषितां

क्रीडामृगः पूरुष ईश नीयते॥ ५२

nirjitya dikcakramabhūtavigraho

varāsanasthaḥ samarājavanditaḥ|

gṛheṣu maithunyasukheṣu yoṣitāṃ

krīḍāmṛgaḥ pūruṣa īśa nīyate|| 52

अर्थ

प्रभो! जिसने सारी दिशाओंपर विजय प्राप्त कर ली है और जिससे लड़नेवाला संसारमें कोई रह नहीं गया है, जो श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठता है और बड़े-बड़े नरपति, जो पहले उसके समान थे, अब जिसके चरणोंमें सिर झुकाते हैं, वही पुरुष जब विषय-सुख भोगनेके लिये, जो घर-गृहस्थीकी एक विशेष वस्तु है, स्त्रियोंके पास जाता है, तब उनके हाथका खिलौना, उनका पालतू पशु बन जाता है॥ ५२॥

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