॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.51.55
मन्ये ममानुग्रह ईश ते कृतो
राज्यानुबन्धापगमो यदृच्छया।
यः प्रार्थ्यते साधुभिरेकचर्यया
वनं विविक्षद्भिरखण्डभूमिपैः॥ ५५
manye mamānugraha īśa te kṛto
rājyānubandhāpagamo yadṛcchayā|
yaḥ prārthyate sādhubhirekacaryayā
vanaṃ vivikṣadbhirakhaṇḍabhūmipaiḥ|| 55
अर्थ
भगवन्! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आपने मेरे ऊपर परम अनुग्रहकी वर्षा की, क्योंकि बिना किसी परिश्रमके—अनायास ही मेरे राज्यका बन्धन टूट गया। साधु-स्वभावके चक्रवर्ती राजा भी जब अपना राज्य छोड़कर एकान्तमें भजन-साधन करनेके उद्देश्यसे वनमें जाना चाहते हैं, तब उसके ममता-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये बड़े प्रेमसे आपसे प्रार्थना किया करते हैं॥ ५५॥