श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तस्माद् विसृज्याशिष ईश सर्वतो

रजस्तमःसत्त्वगुणानुबन्धनाः ।

निरंजनं निर्गुणमद्वयं परं

त्वां ज्ञप्तिमात्रं पुरुषं व्रजाम्यहम्॥ ५७

tasmād visṛjyāśiṣa īśa sarvato

rajastamaḥsattvaguṇānubandhanāḥ |

niraṃjanaṃ nirguṇamadvayaṃ paraṃ

tvāṃ jñaptimātraṃ puruṣaṃ vrajāmyaham|| 57

अर्थ

इसलिये प्रभो! मैं सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे सम्बन्ध रखनेवाली समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल मायाके लेशमात्र सम्बन्धसे रहित, गुणातीत, एक—अद्वितीय, चित्स्वरूप परमपुरुष आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ५७॥

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