द्वारकागमन, श्रीबलरामजीका विवाह तथा श्रीकृष्णके पास रुक्मिणीजीका सन्देशा लेकर ब्राह्मणका आना
श्रीशुक उवाच
इत्थं सोऽनुगृहीतोऽङ्ग कृष्णेनेक्ष्वाकुनन्दनः।
तं परिक्रम्य सन्नम्य निश्चक्राम गुहामुखात्॥ १
itthaṃ so'nugṛhīto'ṅga kṛṣṇenekṣvākunandanaḥ|
taṃ parikramya sannamya niścakrāma guhāmukhāt|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्यारे परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार इक्ष्वाकुनन्दन राजा मुचुकुन्दपर अनुग्रह किया। अब उन्होंने भगवान्की परिक्रमा की, उन्हें नमस्कार किया और गुफासे बाहर निकले॥ १॥✎ 1684
इत्थं सोऽनुगृहीतोऽङ्ग कृष्णेनेक्ष्वाकुनन्दनः।
तं परिक्रम्य सन्नम्य निश्चक्राम गुहामुखात्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्यारे परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार इक्ष्वाकुनन्दन राजा मुचुकुन्दपर अनुग्रह किया। अब उन्होंने भगवान्की परिक्रमा की, उन्हें नमस्कार किया और गुफासे बाहर निकले॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)