श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गिरौ निलीनावाज्ञाय नाधिगम्य पदं नृप।

ददाह गिरिमेधोभिः समन्तादग्‍निमुत्सृजन्॥ ११

girau nilīnāvājñāya nādhigamya padaṃ nṛpa|

dadāha girimedhobhiḥ samantādagnimutsṛjan|| 11

अर्थ

परीक्षित्! जब जरासन्धने देखा कि वे दोनों पहाड़में छिप गये और बहुत ढूँढ़नेपर भी पता न चला, तब उसने ईंधनसे भरे हुए प्रवर्षण पर्वतके चारों ओर आग लगवाकर उसे जला दिया॥ ११॥✎ 1685

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1685 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धरती-पर → धरतीपर

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