महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, धैर्य तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय-सन्देहसे मुक्त थे। वे अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें लगाकर गन्धमादन पर्वतपर जा पहुँचे॥ ३॥✎ 1684
तपःश्रद्धायुतो धीरो निःसंगो मुक्तसंशयः।
समाधाय मनः कृष्णे प्राविशद् गन्धमादनम्॥ ३
महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, धैर्य तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय-सन्देहसे मुक्त थे। वे अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें लगाकर गन्धमादन पर्वतपर जा पहुँचे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 461) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/52/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)