श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तपःश्रद्धायुतो धीरो निःसंगो मुक्तसंशयः।

समाधाय मनः कृष्णे प्राविशद् गन्धमादनम्॥ ३

tapaḥśraddhāyuto dhīro niḥsaṃgo muktasaṃśayaḥ|

samādhāya manaḥ kṛṣṇe prāviśad gandhamādanam|| 3

अर्थ

महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, धैर्य तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय-सन्देहसे मुक्त थे। वे अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें लगाकर गन्धमादन पर्वतपर जा पहुँचे॥ ३॥✎ 1684

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1684 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गन्ध-मादन → गन्धमादन

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