श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

रुक्मिण्युवाच

श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते ✎ 2175

निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।✎ 2175

रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं

त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ ३७

śrutvā guṇān bhuvanasundara śṛṇvatāṃ te

nirviśya karṇavivarairharato'ṅgatāpam|

rūpaṃ dṛśāṃ dṛśimatāmakhilārthalābhaṃ

tvayyacyutāviśati cittamapatrapaṃ me|| 37

अर्थ

रुक्मिणीजीने कहा है—त्रिभुवनसुन्दर! आपके गुणोंको, जो सुननेवालोंके कानोंके रास्ते हृदयमें प्रवेश करके एक-एक अंगके ताप, जन्म-जन्मकी जलन बुझा देते हैं तथा अपने रूप-सौन्दर्यको जो नेत्रवाले जीवोंके नेत्रोंके लिये धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंके फल एवं स्वार्थ-परमार्थ, सब कुछ हैं, श्रवण करके प्यारे अच्युत! मेरा चित्त लज्जा, शर्म सब कुछ छोड़कर आपमें ही प्रवेश कर रहा है॥ ३७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2175 छूटा या अधिक पाठ: श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां / ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्। → श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते / निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।

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