॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.52.40
पूर्तेष्टदत्तनियमव्रतदेवविप्र-
गुर्वर्चनादिभिरलं भगवान् परेशः।
आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणिं
गृह्णातु मे न दमघोषसुतादयोऽन्ये॥ ४०
pūrteṣṭadattaniyamavratadevavipra-
gurvarcanādibhiralaṃ bhagavān pareśaḥ|
ārādhito yadi gadāgraja etya pāṇiṃ
gṛhṇātu me na damaghoṣasutādayo'nye|| 40
अर्थ
मैंने यदि जन्म-जन्ममें पूर्त (कुआँ, बावली आदि खुदवाना), इष्ट (यज्ञादि करना), दान, नियम, व्रत तथा देवता, ब्राह्मण और गुरु आदिकी पूजाके द्वारा भगवान् परमेश्वरकी ही आराधना की हो और वे मुझपर प्रसन्न हों तो भगवान् श्रीकृष्ण आकर मेरा पाणिग्रहण करें; शिशुपाल अथवा दूसरा कोई भी पुरुष मेरा स्पर्श न कर सके॥ ४०॥