॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.52.42
अन्तःपुरान्तरचरीमनिहत्य बन्धूं-
स्त्वामुद्वहे कथमिति प्रवदाम्युपायम्।
पूर्वेद्युरस्ति महती कुलदेवियात्रा
यस्यां बहिर्नववधूर्गिरिजामुपेयात्॥ ४२
antaḥpurāntaracarīmanihatya bandhūṃ-
stvāmudvahe kathamiti pravadāmyupāyam|
pūrvedyurasti mahatī kuladeviyātrā
yasyāṃ bahirnavavadhūrgirijāmupeyāt|| 42
अर्थ
यदि आप यह सोचते हों कि ‘तुम तो अन्तःपुरमें—भीतरके जनाने महलोंमें पहरेके अंदर रहती हो, तुम्हारे भाई-बन्धुओंको मारे बिना मैं तुम्हें कैसे ले जा सकता हूँ?’ तो इसका उपाय मैं आपको बतलाये देती हूँ। हमारे कुलका ऐसा नियम है कि विवाहके पहले दिन कुलदेवीका दर्शन करनेके लिये एक बहुत बड़ी यात्रा होती है, जुलूस निकलता है—जिसमें विवाही जानेवाली कन्याको, दुलहिनको नगरके बाहर गिरिजादेवीके मन्दिरमें जाना पड़ता है॥ ४२॥