श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दुर्भगाया न मे धाता नानुकूलो महेश्‍वरः।

देवी वा विमुखा गौरी रुद्राणी गिरिजा सती॥ २५

durbhagāyā na me dhātā nānukūlo maheśvaraḥ|

devī vā vimukhā gaurī rudrāṇī girijā satī|| 25

अर्थ

ठीक है, मेरे भाग्य ही मन्द हैं! विधाता और भगवान् शंकर भी मेरे अनुकूल नहीं जान पड़ते। यह भी सम्भव है कि रुद्रपत्‍नी गिरिराजकुमारी सती पार्वतीजी मुझसे अप्रसन्‍न हों’॥ २५॥

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