फिर भी इस बातको लेकर मैं न तो कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्धके अनुसार काल भगवान् ही इस चराचर जगत्को झकझोरते रहते हैं॥ १४॥
तथाप्यहं न शोचामि न प्रहृष्यामि कर्हिचित्।
कालेन दैवयुक्तेन जानन् विद्रावितं जगत्॥ १४
फिर भी इस बातको लेकर मैं न तो कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्धके अनुसार काल भगवान् ही इस चराचर जगत्को झकझोरते रहते हैं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 475) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/14/