महाबाहु रुक्मी क्रोधके मारे जल रहा था। उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियोंके सामने यह प्रतिज्ञा की—॥ १९॥
रुक्म्यमर्षी सुसंरब्धः शृण्वतां सर्वभूभुजाम्।
प्रतिजज्ञे महाबाहुर्दंशितः सशरासनः॥ १९
महाबाहु रुक्मी क्रोधके मारे जल रहा था। उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियोंके सामने यह प्रतिज्ञा की—॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 476) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/19/