श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

धनुर्विकृष्य सुदृढं जघ्ने कृष्णं त्रिभिः शरैः।

आह चात्र क्षणं तिष्ठ यदूनां कुलपांसन॥ २४

dhanurvikṛṣya sudṛḍhaṃ jaghne kṛṣṇaṃ tribhiḥ śaraiḥ|

āha cātra kṣaṇaṃ tiṣṭha yadūnāṃ kulapāṃsana|| 24

अर्थ

उसने अपने धनुषको बलपूर्वक खींचकर भगवान् श्रीकृष्णको तीन बाण मारे और कहा—‘एक क्षण मेरे सामने ठहर! यदुवंशियोंके कुलकलंक! जैसे कौआ होमकी सामग्री चुराकर उड़ जाय, वैसे ही तू मेरी बहिनको चुराकर कहाँ भागा जा रहा है? अरे मन्द! तू बड़ा मायावी और कपट-युद्धमें कुशल है। आज मैं तेरा सारा गर्व खर्व किये डालता हूँ॥ २४-२५॥

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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