श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कृष्णान्तिकमुपव्रज्य ददृशुस्तत्र रुक्मिणम्।

तथाभूतं हतप्रायं दृष्ट्वा संकर्षणो विभुः।

विमुच्य बद्धं करुणो भगवान् कृष्णमब्रवीत्॥ ३६

kṛṣṇāntikamupavrajya dadṛśustatra rukmiṇam|

tathābhūtaṃ hataprāyaṃ dṛṣṭvā saṃkarṣaṇo vibhuḥ|

vimucya baddhaṃ karuṇo bhagavān kṛṣṇamabravīt|| 36

अर्थ

फिर वे लोग उधरसे लौटकर श्रीकृष्णके पास आये तो देखा कि रुक्मी दुपट्टेसे बँधा हुआ अधमरी अवस्थामें पड़ा हुआ है। उसे देखकर सर्वशक्तिमान् भगवान् बलरामजीको बड़ी दया आयी और उन्होंने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड़ दिया तथा श्रीकृष्णसे कहा—॥ ३६॥

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